आदित्य की कविताएं
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| आदित्य |
दुनिया की कोई भी तकनीक मनुष्य के लिए सुविधाएं ले कर आती है। लेकिन विडम्बना यह है कि आम आदमी इस तकनीक के उपयोग से प्रायः वंचित रहते हैं। रेल ने कष्टप्रद यात्राओं के दौर को खत्म कर आम आदमी के जीवन को सुविधाजनक बना दिया। इस क्रम में छोटी दूरी की रेल आम जन के लिए वरदान ही साबित हुई जिस पर टिकट वाले तो चढ़ते ही थे, वे भी इसका फायदा उठा लेते थे जो टिकट लेने की सामर्थ्य से वंचित होते थे। लोकल ट्रेन का वह सफर कई मायनों में जीवन के सफर के विविध आयाम को समेटे हुए होता। इसके कई शेड्स कहानियों और कविताओं में करीने से दर्ज किए गए। आदित्य की कविता 'बरहजिया' रेल के उस रोचक सफर को दर्ज करती है 'जिसके बारे किंवदन्तियाँ थीं/ कहीं भी रुक सकती थी, जिस पर कोई भी सवार हो सकता था/ टिकट बेटिकट।' आदित्य ने अपने अलग शिल्प के जरिए ध्यान आकृष्ट किया है। उनके यहां कोई बनावटीपन नहीं है बल्कि जीवन का वह राग है जिसका स्वर मद्धिम करने के तमाम प्रयास किए जा रहे हैं। यह दुनिया केवल सुविधाभोगियों के लिए ही नहीं है बल्कि उनकी भी है जो जीवन के लिए रोजाना एक जंग लड़ते हैं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं आदित्य की कविताएं।
आदित्य की कविताएं
बरहजिया
छोटी रेल जैसे एक छोटी नदी
प्रदूषित, परित्यक्त गंडक
छोटी रेल प्रतीक्षारत ग्रीन सिग्नल के लिए
किसान, व्यापारी अपनी साप्ताहिक ख़रीद का बोझ लाद लौट रहे हैं घर
एक भटका हुआ बच्चा
इसलिए नहीं कि वह अब बेचने लगा है भुनी मूँगफलियाँ, सूखे समोसे
बल्कि इसलिए कि उसकी माँ मौत की कगार पर है
वह अपने बाप से दूर भाग जाना चाहता है।
उस रेल के बारे में मुझे बस इतना ही मालूम है
जब एक पुलिस वाला उसका हाथ पकड़ कर मेरे घर के सामने आ खड़ा हुआ
‘इसे तुम जहन्नुम के दरवाज़े पर भी छोड़ आओ’ मुझे फ़र्क़ नहीं पड़ता
कहा था मैंने
उसके बड़े भाई ने मुझे दिखाई थी पिस्तौल।
एक छोटी रेल, जिसके बारे किंवदन्तियाँ थीं
कहीं भी रुक सकती थी, जिस पर कोई भी सवार हो सकता था
टिकट बेटिकट।
रेल जो एक बड़ी नदी से निकल कर एक छोटी नदी तक जाती थी, में
चढ़ने का मेरा पहला और आख़िरी प्रयास असफल हुआ
एक सहपाठी के साथ देर रात तक बड़ी नदी से छोटी नदी तक
जहन्नुम की सड़क पर भटकता रहा।
और त्रिपाठी तुम, उसी बड़ी नदी के किनारे पैदा हुए
मुझे अस्पताल ले गए
जी भर कर गालियाँ दीं
कहा गालियाँ तुम्हारी भाषा में प्रेम हैं
और मैं प्रेमहीन, अभिजात्य!
कायर हूँ, मगरूर हूँ, अभिजात्य हूँ, भाषा का भगोड़ा हूँ।
तब तक बहुत देर हो चुकी थी
रेल धुएँ का गुबार छोड़ती हुई गंदे प्लेटफॉर्म से आगे निकल चुकी थी
अगले शहर का मरकज़ क़रीब है,
रेल पटरियों के किनारे दिखाई देती हैं बकरियां, झोपड़ियाँ और तुम्हारे
एंथ्रोपोसीन को धता बताते हुए…
एक जहन्नुम से मैं दूसरे जहन्नुम की अनंत यात्रा पर निकल चुका था।
जंगल में हरा है
तुम्हारी आरी चलती है इक पेड़ पर
लट्ठे लुढ़कते हुए सरकते हैं सूखी नदी के पत्थरों बीच
जंगल में हरा है
हरे के बीच चमकती है सूरज की रोशनी
इस धरती में इतिहास का स्वप्न दफ़न है.
एक परिंदा पर फड़फड़ाता है
यातनाओं के धूल उड़ते हैं
आँखों से टपकती है एक बूँद
काई की एक परत पर जमी है निगाह
तुम्हारे जूते में धँसी है एक कील
झरने में ख़ुद को निहारते चेहरे पर जमे हुए बर्फ़ के निशान हैं.
मैं इधर से गुजरता हूँ
तुम्हारा नाम लेता हूँ
घाटी में बस और बस अनुगूँज है
एक पुकार पर देखो कैसे इकट्ठे हो गए हैं पेड़ों के प्रहरी
आसमान के नीले में उनके रंग की बाधाएँ हैं
धरती के धूसर पर उनकी दृष्टि का प्रकाश है
एक परिंदे ने पूछा है प्रश्न उससे कंपकपाती है सृष्टि.
तुम्हारी आरी चलती है इक पेड़ पर
तुम्हारी आरी चल सकती है कहीं भी
इस पर उन्माद के स्वप्न हैं
अभिमान की यह धातुई आकृति
किसी निर्दोष के सीने पर शोर मचाती हुई गुज़र सकती है
इन सबके बीच गुजरती है एक रेल आदिम प्रवृत्तियों की पटरी पर.
रेल के पीछे मलबे पर बैठ कर सुबकता है वनदेवता
एक मैनेजर की डायरी प्रविष्टि
तोंद पर चिपका हुआ लकोस्ट टी-शर्ट
रंग – बेनूर
तारीख – 13 जून 2034
निर्मम खयालों में डूबता उबराता
सिगरेट बट को पीस कर अगर कोई व्यापार निकल आता,
जूतों की रगड़ से कांपती है पृथ्वी।
मैंने कितने अंधेरे देखे हैं
परछाईयाँ देखी हैं
चिपचिपे पसीने, खटखटाते कीबोर्ड
पन्नों का अंबार
फड़फड़ाते जेरॉक्स मशीन
धूल मिट्टी और सूखे पत्तों से खड़ा किया है साम्राज्य।
मेरे ऊपर और मेरे नीचे बनी हुई है मानव श्रृंखला
एक को मैं निगलता हूं, एक मेरे को।
भागता हूं अतल अनंत में, चिल्लाता हूं खाई है आधुनिकता की महान खाई
और गूंजती है मेरी आवाज़
और मैं उन्हें सुनता हूं जो छोटी खाई में गिर रहे हैं
गिरते जा रहे हैं।
नींद है, एक फूल है, मेरे हाथ हैं
रंगे हुए खून से
क्योंकि मैंने उनसे हाथ मिलाया था।
इस जंगल में फ़ाख्ते नहीं देखे
ये कौन-सा जंगल है जिसमें खुद को कैद पाता हूं
कौन-सी यादें हैं जिसमें सब कुछ भूला हुआ है
मेरी देह पर उन ज़ख्मों के निशान हैं जो मैंने खुद को अनजाने में दिए
तुम्हें याद तो करता हूं मगर तुम्हारी पहचान मुझसे छूट गई
मेरे माथे पर ठठकता है चंद्रमा का वक्र
बहुत दूर, बहुत दूर चला आया हूं..
याद कौंधती है एक पहाड़ी झरने पर इंद्रधनु की
ये कौन-सा मंजर है जिसपर हम रुके हुए हैं
ये कौन-सा समय है हिमानी की तरह जमा हुआ,
नहीं, नहीं, समय चला जा रहा है..
मेरे खयालों में एक नाव अटकी पड़ी
खामोश लहरों पर हिल रही
बागीचे में एक किशोरी के गाए गीत बचे हैं
इस जंगल से देखे हैं गुजरते
पनिहारिन को, उसके पीछे शोर मचाते बच्चे
सब है यहां बस उड़ते सफ़ेद फ़ाख्ते नहीं दिखाई देते।
अर्थ
प्रिय पाठक तुम्हें इसका जो अर्थ निकालना हो निकालो
तुम चाहो तो इसे मोड़ कर तकिये के नीचे रखो
चाहो तो इसे कूड़ेदान में डाल दो
तुम चाहो तो इसके अर्थ का इस्तेमाल
तबाह होती दुनिया को समझने में कर सकते हो
या चाहो तो इस पर सिर पटक कर दे मारो
अगर चाहो तो इसे जनांदोलन का हथियार बना लो
या फिर चाहो तो इसे धीमी आंच पर रख
कोई स्वादिष्ट पकवान बना लो।
प्रिय पाठक तुम्हारी नींद मुझे प्यारी है
तुम एक ठंडी नींद में मुस्कुराओ तो मेरी दुनिया की सुबह हो जाए
घाटियों में चहचहाएं पंछी
इस दूर तक तुम्हारे स्वप्नों के दीगर दिखाई दें।
सबसे पहले अर्थ किसी खोपड़े में उपजा होगा
किसी नज़र से देखी होगी दुनिया, सपने
अर्थ को रौंदने के लिए बहुत से आततायी आए
अत्याधुनिक हथियारों से लैस
कोई भूखा था,
कभी ठंड थी, प्रदूषण था, कभी फरवरी में जून की चिलचिलाती दुपहरी थी
या बहुत लंबे समय से चला आ रहा संघर्ष था
कपड़े लत्ते नहीं थे
वैचारिकी मृतप्राय पड़ी थी
चमकती धूप में भी दांत किटकिटाते थे
यूं ही हाथ मांगने की दिशा में बढ़ जाते थे।
तुम्हें यह भटकन पसंद नहीं
लेकिन अनर्थ में तुम सदियों से भटक रहे हो
तुम्हारी आत्माएं छलनी हैं उन घावों से जो तुम दूसरों को देना चाहते थे
तुम कभी आत्मप्रशंसा तो कभी आत्मदया से पीड़ित रहे
कभी तुमने शायद ही आत्मालोचना में शब्द नष्ट किए
तुम सब कुछ समझ लेने का दावा करते हो
तुम सब कुछ साबित करने का दावा करते हो
प्रिय पाठक मैं यह नहीं कहता तुम्हारे दावे खोखले हैं
मुझे तुम पर टिप्पणी का अधिकार नहीं
इन छिछली आलोचनाओं से आज़िज़ आ चुका हूं
ये अधूरी व्यंजनाएं मेरे माथे पर हथौड़े की तरह गिरती हैं।
मगर एक सच के अलावे हमारे पास बचा क्या है?
हमारे सारे अधिकार छीने जा चुके हैं
हमें दासता की अटूट बेड़ियों में जकड़ा जा चुका है
हम उनके इशारे बिना हिल भी नहीं सकते
हम उनकी आज्ञा के बिना कोई आंदोलन तक नहीं खड़ा कर सकते
नारे तक नहीं लगा सकते..
तो प्रिय पाठक तुम्हीं बताओ हमारे पास क्या बचा है?
तुम्हीं कहो इस सच को किस कीमत पर बख़्शा जायेगा!
पुस्तकालय
कविता वाले खानों में
कुछ परिचित कवि पड़े हैं
ख़र्राटे भरते, खाँसते, मुस्कुराते
टिमटिमाते
अँधेरा उगलते
चप्पलें खड़काते
फुसफुसाते
फुसफुसाते युगांत के बारे में
जंग की शुरुआत के बारे में
मैं बारता हूँ टॉर्च सारे खानों पर
धीरे धीरे
कहाँ हो तुम?
ओ अपरिचित
ओ भुला दिए गए
मिल तो जाओ
मैं नहीं देख पा रहा तुम्हें
और निराशा को भी
कहाँ है मेरी आत्मा की कविता
अस्तित्व के पुस्तकालय को अतिक्रमित करने वाली
कवियों की सूची- नेरुदा, लोर्का, हिकमत
मुक्तिबोध, शमशेर, निराला
बढ़ती ही चली जाती है ये सूची... मैं देखता हूँ नाम बार बार
नेरुदा, लोर्का, रामानुजम और और...
ओ अपरिचित!
कहाँ हो तुम?
मैं रोशनी डालता हूँ
हर कोनों-अँतरों तक तुम्हारे लिए
तुम्हारे ही लिए, जो गाता है हृदय का गीत।
एक कवि का अधेड़ विचार-विघटन
सबसे पहले उसने यह कबूल किया कि
आंदोलनों में बहुत कुछ झूठ है
क्रांतियां हैं तानाशाहों के सत्तानशीं होने का उपक्रम
फिर इससे मिली तालियों पर उसने निर्णय दिया –
क्रांति एक छलावा थी
अतीत एक भ्रम
आदमी इतिहास से टूट चुका है
सब सबके दुश्मन हैं
सबको हक है महंगी कारों
आलीशान बंगलों
और गुमशुदगी का,
हथियार फेंकने का और नाम भूलने का।
जब आसमान से बरसेंगे अन्याय के बारूद
देखा जायेगा,
जब अपहरण, हत्या, धमकियां आम हो जाएंगी
देखा जायेगा
जब षडयंत्र, हूटिंग और हरामखोरी
अगली पंक्ति की तरह दिखाई देने लगें
सोची जाएगी आगे की रूपरेखा।
अभी के लिए तो यही सच है
विचार होता नहीं कुछ
खोया है स्वप्न और नींद और प्यार और न्याय
मगर पाया तो है ताकत, धन, वैभव, अनुयायी।
एक विचार की इतनी तो कीमत होती है
कोई चाहे उस पर जिंदगी भर रोटियां सेंके।
(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)
सम्पर्क
ई मेल : shuklaaditya48@gmail.com



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