प्रिया वर्मा की कविताएं


प्रिया वर्मा


हर नया एक दिन पुराना होता ही है। जीवन की यही नियति है। पुरानापन अनुभवों से भरा होता है। मनुष्य होने के नाते हर पुराने का यह कर्तव्य होता है कि वह अपने अनुभवों को नई पीढ़ी से साझा करे। ज्ञान को अगली पीढ़ी को हस्तांतरित करने की इस क्षमता के चलते ही मनुष्य आज इस पृथिवी का सबसे बुद्धिमान प्राणी है। नए कवि अपने पुराने कवियों से वह सब सुनना जानना चाहते हैं जो उन्हें कविता की दुनिया में बेहतर बना सके। लेकिन दिक्कत यह है कि पुराने कवियों के पास नए कवियों को सुनने समझने के लिए समय ही नहीं होता। प्रिया वर्मा अपनी कविता पुराने कवि में लिखती हैं "पुराने कवि नहीं होते यूं तो पुराने चावल/ पुरानी शराब ज़रूर होते हैं/ इतने दुरूह इतने दुर्गम और दुर्लभ भी/ कि वे नए आयोजनों में नहीं जाते/ उन नयों के लिए जो अभी अभी जन्म ले कर/ भाषा में अपनी रुलाई ले कर चले आए हैं/ जिनके तलवे और गाल दोनों ही एक बराबर चिकने और गुदगुदे हैं/ पुराने कवि उन नए मेहमानों से मिलने नहीं जाते/ लेकिन इंतज़ार करते रहते हैं कि वे कब आएंगे/ पुराने कवियों की मज़ार पर मौसम की कोई चादर चढ़ाने को/ किसी तस्वीर में नए और पुराने का फ़र्क मिटाने को/ और घोषित करने को कि वे उन्हीं को पढ़ कर पले और बढ़े हैं"। प्रिया वर्मा चुपचाप वे गंभीर बातें कह जाती हैं जो प्रायः जीवन के मर्म से जुड़ी होती हैं। उनके कहन का अपना एक ढंग है जो उन्हें और कवियों से अलग खड़ा कर देता है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं प्रिया वर्मा की कविताएं।



प्रिया वर्मा की कविताएं


अंधेरा ही तो है


छाँव में भी तो मुट्ठी भर अंधेरा है 

और तुम्हारी छाया में भी 

चांद के उस पार भी अंधेरा है सूरज के उस पार भी 

जो कुछ भी जिसे भी मैंने नहीं देखा वह सब कुछ मेरे लिए अंधेरे में ही है। 

अंधेरा ही तो है जो मकान बदलने के बाद भी सोने के कमरे में लेटे हुए मुझ पर छाता तान देता है 

और मेरे भीतर पुराने मकान के सोने के कमरे का दिशाबोध जागने लगता है 

तब 

तब लगता है मैं वहीं सोई हूँ 

पुराने कमरे में या कि जननी के गर्भाशय में ही हूँ 

अभी नहीं जन्मी 

सुबह होगी और पहली किरण के फूटते ही 

मेरा प्रसव हो जाएगा।


लानत है ऐसी मुझ पर


क्या वह मैं ही थी जो लिखती थी कविता 

जो जीती थी। जो अनायास पैदा हुई थी। 

जो जानती नहीं थी कुछ।

देखती थी टुकुर-टुकुर। 

पर देखना नहीं जानती थी। 

चलती नहीं थी चलाई जाती थी 

क्या मैं रिमोट की गुड़िया थी? 

या ऑटोमैटिक तकनीक की प्रयोगशाला में गिनी-लड़की थी। मिनी थी या मास।


अचानक अंग्रेज़ी चली आती जा रही है पंक्तियों में


क्या मैं ही थी वह जो तब नहीं जानती थी हिंदी अंग्रेजी कन्नड़ तमिल मलयालम ये सब भाषाओं के नाम हैं। 


मैं ही थी जो तब केवल अपना नाम जानती थी। केवल नाम की पुकार सुनना। बोलना नहीं। सीखती ज़रूर थी। तब मैं सीखना जानती थी। जन्म लेने की लय जानती थी। 


जानती थी चार छः आवाज़ें जिनमें तीन झुनझुने के घुंघरू थे और एक थी साइकिल की घंटी। एक कुत्ते के भौंकने की आवाज़ और एक आवाज़ 

एक स्त्री की थी। 

दो स्तन जानती थी। उसी के।

और जानती थी हल्के मीठे दूध की तेज़ धार और नींद और गोद की गरम गंध और नरम छुअन और पुचकार और चुंबन 

और डमडम करता भरा हुआ पेट। 

अब यह मैं ही हूँ जिस के लिए जैसे वर्जित हो गए हैं बचपन के सारे रास्ते। 

अब मैं इस पहाड़ से उतरना शुरू कर रही हूँ। इतनी ही ऊंचाई तक आ सकती थी मेरे भीतर बाहर की यह ऑक्सीजन। 

अब मैं आगे बढ़ आई हूँ। 

अब मैं सभ्य हूँ 

और लानत है ऐसी मुझ पर!


अभी यहाँ चीज़ें नहीं हैं 


यहाँ दीवारें हैं

दरवाज़े और खिड़कियां 

दराज़ें और अलमारियाँ 


अभी तस्वीरें नहीं हैं यहाँ 

वे आएंगी 

साथ लाएंगीं शायद यादें 

शायद इच्छाएं 

कि दिख सकें खुश और खूबसूरत 

रह सकें मुक्त इस चिंता से कि कोई गरीब नहीं समझेगा मुझे 

यहाँ चीज़ें नहीं हैं 

पर वे आ रही हैं अप्रत्यक्ष 

अगले महीने की पगार के साथ 

वे झोले में भरी चली आएंगी। 

अनायास मुस्कुराऊंगी मैं शायद 

शायद एक दिन या दो या ज़्यादा से ज़्यादा एक सप्ताह 

हो सकता है उस महीने की पंद्रह तारीख़ तक 

फिर आएंगी नई इच्छाएं 

नई चीज़ों की।





पानी के लिए


लड़ा जाएगा तीसरा महायुद्ध पानी के लिए 

पानी अनवरत बहता है,

रुकता है तो काई हो जाता है। 

रहता है तो कचरा बन जाता है। 

रोक दिया जाता है पानी। 

प्यासा तड़पा कर मारने के लिए। 

कुओं के सूखने के बाद 

पानी जो कभी खींचा जाता था घर की नाली के पास के टुल्लू पंप से। 

घरेलू सप्लाई कभी आती थी, कभी-कभी आती ही रहती थी। 

ज़्यादातर नहीं आती थी। 

पाइप लाइन फट जाती थी तब 

वे कतार में खड़े पानी का करते थे इंतज़ार। 

टैंकर आते थे। 

टैंकर विश्वयुद्ध में भी आते हैं।  

बारूद से भरे पानी से खाली। युद्ध के लिए। 

युद्ध जो होने को है। पानी रोकने के बाद लड़ा जाएगा। संदर्भ के बाद प्रसंग आएगा। 


अभी छोटी मोटी लड़ाइयाँ हैं। 

एक घर जल चुका है। एक जल रहा है। तीसरा जलने को है। 

एक शहर बस रहा है। एक शहर मिट चुका है नक्शे से। 

मिट तो खैर पहले भी कई शहर चुके हैं।

जैसे पेंसिल से लिखे हुए शब्द हों 

इस तरह मिटाए गए हैं 

कि बदल गए हैं नाम। उन शहरों में अब रहवासी नहीं। 

है तो मलबा धुआं और गुबार है। 

जिन्होंने बाढ़ का एक दिन पर निबंध लिखा और नहीं देखी बाढ़ कभी 

वे पानी की मार देखना चाहते हैं कम अज़ कम एक बार 

जिन्होंने सिर्फ़ इतिहास की लड़ाइयों की तारीखों का रट्टा मारा 

वे देखना चाहते हैं कम अज़ कम एक विश्वयुद्ध 

वे लड़ना चाहते हैं। जज़्बे को साबित करना। 

दिल चीर कर देशभक्ति दिखाना 

उन्हें लगता है किसी तारीख़ को नोटिस आएगा उनके दरवाज़े पर

फिर वे जूते मोजे कमीज़ पतलून बेल्ट टाई पहनेंगे 

कंधे पर रायफल लटकाएंगे 

और युद्ध के मैदान में चले जाएंगे। 


युद्ध एक रोमांस की तरह लगता है या सपने की तरह  

उनके पास नहीं है 

दिन का खर्च करने और रात का 

पेट भरने के पैसे। 

किताबें खरीदने और पढ़ने, 

फिल्म देखने, 

संगीत सुनने का अवकाश। 

खून की जाँच कराने, 

साथी का इलाज करवाने, 

अपना एक घर बनवाने की रकम। 

उनके पास प्यार करने का वक्त नहीं है।

प्यार जताने का वक्त, प्यार से देखने का वक्त भी नहीं है। 

वे रोज़ लड़ रहे हैं दो रुपए बचाने के लिए 

रिक्शे वाले से। पांच रुपए पर भिड़ रहे हैं रेहड़ी वाले से। 

वे अपने घर की ओर जा रहे हैं। 

पानी से आधी भरी आधी खाली बोतल 

बज रही है झोले में

युद्ध के बिगुल की जैसी।



तब मुझे काजल से आँख आंजना आया 


बहुत से अर्थहीन शब्द हैं मेरे आसपास

पर वे झूठे नहीं।

जो झूठे हैं परिचय की बस्ती में


बरतते हैं अधिक आत्मीयता।

विवशता 

यह नहीं कि अर्थहीन को करती हूँ उपेक्षित। यह है 

कि झूठे शब्दों को धकेल नहीं पाती 

बाहर शब्दकोश के। 


सच्चों से नहीं शायद झूठों से ही करती हूँ मोह।


जबकि अर्थहीन होना झूठे होने जैसा नहीं


अर्थपूर्ण है झूठापन भी सत्यता के लिए

अर्थहीनता अर्थपूर्ण है सार्थकता के लिए


अब धुंधला-सा भी याद नहीं 

वे झूठे शब्द कब और कहाँ से चले आए?

बहुत संभव है कि वे 

मेरे पालतू जीवन के कैशोर्य के माथे पर 

सींग की तरह उगे। उन दिनों


दर्पण नहीं था पास। 

दर्पण मुझे बहुत बाद में मिला।


तब मुझे काजल से आँख आंजना आया।




मात्र एक पँक्ति के लिए


धरे रहते हैं कृतघ्न पांव 

बहुत पँक्तियों के धरातल पर 


जैसे नवीन कोंपल में की जा रही हो परिकल्पना 

प्रेमिल सम्बन्ध की


या जैसे खोज रही होऊं मैं 

अपनी ही मृत्यु का सर्वाधिक सरलतम विकल्प


मेरे ऊपर से घड़ों पानी उतरता है 

और मैं हूँ कि पूरी भीग भी नहीं पाती

पीती हूँ तो मर जाती हूँ और जीती हूँ तो भी मर जाती हूँ



सुंदरताएँ अपने बीत जाने के बाद


कितना सुंदर होता 

अगर अनुभूतियों की कल्पनाएं होतीं

कल्पनाओं की अनुभूति की तरह-

नर्म और गुनगुनाहट से भरी हुई 

या कपासी रंग की तरह भारयुक्त हल्की और गाढ़ी पड़ती धुंधली 


कितना सुंदर होता अगर मेरे पास थोड़ा कम अवसाद होता 

कुछ समय पहले मेरे पास इस बात का अहसास होता कि

यह जो बीत रहा है, 

यह लौटने की तबीयत का नहीं है 

यह वक़्त है


और मेरे पास सही वक़्त पर सही-सही होता सब 

गलतियाँ भी 

सही जगह पर गलत हुई होतीं

और तुम्हारे हाथ में मेरी हथेली की गुदगुदाहट होती

तुम टटोलते मेरे भाग्य में अपना होना 

और अपने होने में मेरे नाम का होना


तुम पूछते 

बताओ मेरे नाम का सही सही अर्थ क्या है!


इस बात से आख़िर क्या फ़र्क़ पड़ता है कि

जिन बातों के जवाब हम पहले से जानते हों

अगर उन्हें ही सवाल की तरह पेश कर दें

सिर्फ़ इसलिए कि साथ में जो है, 

सिर्फ़ उसे अच्छा लगे।


सिर्फ़ इसलिए 

कि सारी सुंदरताएँ अपने बीत जाने के बाद बेतरह ज़िंदा रहती हैं 

एक भद्दे मज़ाक़ की तरह


कितना अच्छा होता 

अगर सही समय पर 

उस समय की सुन्दरता का पता चल जाता!



मैं नदी जैसी हूँ 


मैं उसके सामने गई 

एक केबिन था जिसमें वह मेज के उस पार था 

मैं थी इस पार। मैं उसके सामने उसके हाथ के इशारे से बैठ गई 

और रो पड़ी 

वह मेरा कोई नहीं था

मैं कुछ कहने नहीं गई थी। पर मैंने पैसे चुकाए थे। 

कीमत थी उसकी। उसके वक्त की। मेरी नहीं। 

मेरी कहीं कीमत नहीं थी। मैं रोई। मेरे आंसुओं की भी क़ीमत नहीं थी। 

इस तरह मैं और मेरे आंसुओं में गहरा रिश्ता था। उन आंसुओं में। 

आज के आंसू ओस बन चुके हैं। आधी शाम के बाद महसूस होने लगते हैं। 

महसूस होते हैं। अब मैं उससे मिलने नहीं जाऊंगी। 

उसके सामने नहीं रोऊंगी। 

कहावत परखूँगी कि 

ओस चाटने से प्यास नहीं बुझती

रो लेने बाद साँस लेते हुए लगा 

रुलाई किसी के हिस्से की भी हो 

साँस रुलाई रोकने वाले की घुटती है 

मेरे वक्त की कोई क़ीमत इसलिए नहीं होती 

क्योंकि मैं नदी जैसी हूँ 

सबसे मिल लेती हूँ, बात कर लेती हूँ। 

आगे बढ़ सकती हूँ। फिर भी ठहरी रहती हूँ। कहीं पर।

अपना रोना रोके हुए।



दिखना 


उन्हें निष्पक्ष दिखना है उन्हें रहना भी है

उन्हें काम नहीं करना उन्हें काम करते दिखना भी है

उन्हें सब कुछ चाहिए उन्हें कुछ नहीं चाहिए वाली भंगिमा में छुपना भी है 


उन्हें कहती हूँ तो तमाम उन्हें याद आने लगते हैं 


राजनीति से बचती हूँ 

और दाहिना पांव उठा कर कहीं और रखती हूँ 

राजनीति में ही धंसती हूँ 

नहीं बच सकती मैं उनसे 

कहीं से भी आ जाते हैं उनके नुमाइंदे 

मैं कोई शैतान हूँ जैसे और वे समाज के ईश्वर 

मेरा वध कर के उन्हें महान दिखना भी है




पुराने कवि 


धार हो जाते हैं पानी की पुराने कवि 

वे जाने पहचाने जाने लगते हैं 

अब वे इतने आने जाने लगते हैं 

कि पुरखे पुराने लगते हैं पुराने कवि 


वे नहीं आते नए कवियों की पीठ थपथपाने 

उन्हें समझने और बताने 

कि पंक्तियों के बीच ही कहीं 

रहता है छुप कर वह जादू  

जो नए से कर देता है पुराना 

उनका आना उनका जाना और उनका जाना पहचाना जाना 

उनके घर के अते पते सा लगता है

पत्ते पत्ते पर रक्खा खुशबू का कोना लगता है 

पुराने कवि अलग होते हैं बाकी के कवियों से 

कि बाकी के कवि मंदिर की स्थापनाओं की तरह पार्थिव नहीं होते 

उनके द्वार पर भूले भटके ही कोई दस्तक दे आता हो तो हो 

अन्यथा उनके रहने या न रहने या कहीं और रहने किसी और पन्ने पर बसने से भी 

भाषा की आवाजाही पर कोई फ़र्क नहीं पड़ता 

पुराने कवि नहीं होते यूं तो पुराने चावल 

पुरानी शराब ज़रूर होते हैं 

इतने दुरूह इतने दुर्गम और दुर्लभ भी 

कि वे नए आयोजनों में नहीं जाते 

उन नयों के लिए जो अभी अभी जन्म ले कर 

भाषा में अपनी रुलाई ले कर चले आए हैं 

जिनके तलवे और गाल दोनों ही एक बराबर चिकने और गुदगुदे हैं 

पुराने कवि उन नए मेहमानों से मिलने नहीं जाते 

लेकिन इंतज़ार करते रहते हैं कि वे कब आएंगे 

पुराने कवियों की मज़ार पर मौसम की कोई चादर चढ़ाने को 

किसी तस्वीर में नए और पुराने का फ़र्क मिटाने को 

और घोषित करने को कि वे उन्हीं को पढ़ कर पले और बढ़े हैं 

और चले आए हैं अपनी तमाम प्रोफेसरी, टीचरी और कारगुज़ारियों के बावजूद 

पानी की धार से अपने लोहे को तेज़ करवाने


अकारण


तमाम कारण हैं 

उदास रहने के

एक कारण यह भी है जो अकारण है 

एक सवाल के जवाब में 

कि मुस्कुराने से 

नहीं मिलेगा मेहनताना 

मुस्कुराने पर मुझे कौन-सा दादा साहेब फाल्के खिताब मिल जाएगा 



मेरे लिए


लखनऊ सीतापुर की बस की सीट 

एक सौ तीस रुपए में 

खरीदी हुई दो घंटे की

आज़ादी है 

न घर है यहाँ न बाहर है 

न काम है। बस आप हैं 

और है 

खूंटे से बंध जाने का 

इंतज़ार। 

और मेरे लिए थोड़ी-सी नींद भी है। 



(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)


सम्पर्क 


ई मेल : itspriyaverma@gmail.com

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