विनोद दास का आलेख 'लोकतन्त्र के प्रहरी - रघुवीर सहाय'


रघुवीर सहाय 


रघुवीर सहाय हमारे समय के अनिवार्य कवियों में से एक रहे हैं। सामान्य बोलचाल की भाषा का इस्तेमाल करते हुए रघुवीर जी ने उम्दा कविताएं लिखीं जिन्हें क्लासिकल की संज्ञा दी जा सकती है। वे एक पत्रकार थे इसलिए उनके साहित्य में पत्रकारिता का और उनकी पत्रकारिता पर साहित्य का असर स्वाभाविक रूप से दिखाई पड़ता है। उनकी कविताएँ आज़ादी के बाद विशेष रूप से सन् 1960 के बाद के भारत की तस्वीर को जानने समझने के लिए एक दस्तावेज की तरह हैं। उनकी कविताएँ नए मानव संबंधों की खोज करना चाहती हैं जिसमें गैर बराबरी, अन्याय और गुलामी न हो। उनकी समूची काव्य-यात्रा का केंद्रीय लक्ष्य ऐसी जनतांत्रिक व्यवस्था की निर्मिति है जिसमें शोषण, अन्याय, हत्या, आत्महत्या, विषमता, दासता, राजनीतिक संप्रभुता, जाति-धर्म में बँटे समाज के लिए कोई जगह न हो। जिन आशाओं और सपनों से आज़ादी की लड़ाई लड़ी गई थी उन्हें साकार करने में जो बाधाएँ आ रही हों, उनका निरंतर विरोध करना उनका रचनात्मक लक्ष्य रहा है। संस्मरण ऐसी विधा है जिसके जरिए हम उस व्यक्ति, विचार या घटना के अंदरूनी तथ्यों से परिचित होते हैं जिस पर वह लिखा गया होता है। इसके लिए निस्पृहता की जरूरत पड़ती है। निस्पृह हुए बिना बेहतर संस्मरण नहीं लिखा जा सकता। विनोद दास का अनुभव संसार व्यापक है। उनके पास लिखने की वह शैली है जो सहज तो है ही, पढ़ने पर कथात्मक आस्वाद प्रदान करती है। बीते 30 दिसम्बर को रघुवीर सहाय की पुण्यतिथि थी। पहली बार की तरफ से उन्हें सादर नमन। आज से नए वर्ष की शुरुआत हो रही है। पहली बार के लेखकों एवम पाठकों  को नव वर्ष की बधाई एवम शुभकामनाएं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं विनोद दास का आलेख 'लोकतन्त्र के प्रहरी - रघुवीर सहाय'।


'लोकतन्त्र के प्रहरी - रघुवीर सहाय'  


विनोद दास


वह हमारे शहर लखनऊ से थे। 

वह हमारी तरह लखनऊ विश्वविद्यालय के अँग्रेज़ी विभाग के विद्यार्थी भी रह चुके थे। 

हमारी तरह दिल्ली उनके लिए भी परदेस था। 

वह भी हमारी तरह रामकृष्णपुरम स्थित आबंटित सरकारी मकान में रहते थे। 

मैं संसद में नौकरी करता था। वह भी कुछ अरसे तक नवभारत टाइम्स के लिए संसद की रिपोर्टिंग कर चुके थे। 


यह कहना गलत होगा की सिर्फ़ ऊपर गिनाये तमाम मिलते-जुलते कारणों से उनका आत्मीय बनने की उत्कट भूख मुझे थी बल्कि सच यह था कि वह हिन्दी के ऐसे आधुनिक कवियों में से थे जो लोकतन्त्र के प्रबल पक्षधर थे जिसके कारण उनकी कविता के प्रति मेरा आकर्षण दुर्निवार था तो वहीं दूसरी ओर वह ऐसे अन्यतम सम्पादक और विचारक थे जिनसे समाज को देखने-समझने का तरीका मैं सीख रहा था। 


मुझे आजीवन अफ़सोस रहेगा कि उनका आत्मीय नहीं बन सका जबकि वह मेरे बसेरे से चन्द कदमों की दूरी पर रहते थे। शायद मेरे व्यक्तित्व में वह सरसता नहीं है कि किसी की निकटता जल्दी पा सकूँ। रघुवीर सहाय आर. के. पुरम सेक्टर चार में रहते थे। उस सेक्टर के ठीक सामने अपने पिता जी के साथ सेक्टर एक में मेरी रिहायश थी। ऐसा नहीं कि मैंने उनका आत्मीय बनने की कोशिश नहीं की लेकिन रघुवीर जी अपने इर्द-गिर्द निस्संगता का एक ऐसा वलय बना कर रखते थे कि उसकी सीमा रेखा को पार कर उन तक पहुँचने का कोई सूत्र मेरे पास नहीं था। उन दिनों उनके सबसे आत्मीय सुरेश शर्मा हैं, ऐसी हवा हिन्दी के साहित्यिक हलके में व्याप्त थी। सुरेश शर्मा जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय नयी दिल्ली के छात्र थे। शायद उन पर शोध भी कर रहे थे। 


10, दरियागंज स्थित दिनमान कार्यालय में कार्यरत कवि प्रयाग शुक्ल और विनोद भारद्वाज से मिलने कई बार जाता था। वहाँ रघुवीर सहाय को धीर-गम्भीर क़दमों से आते-जाते कई बार देखा था। छोटा कद और छोटी ग्रीवा पर खिला गोरा बड़ा सा रघुवीर सहाय जी का चेहरा। उनके होठों पर थिरकती एक अज़ीब सी रहस्यमय मुस्कान। 


वह अक्सर कुर्ता-पैजामा में होते। पता नहीं क्यों, कई बार उनकी धजा देख कर उनके सिर पर मुझे खादी टोपी अपने आप दिख जाती थी हालाँकि वह होती नहीं थी। वेशभूषा सादी जरूर होती थी लेकिन उसके पहनने में एक ख़ास किस्म की नफ़ासत झलकती थी। वह धुले-धुले और इतने साफ़ सुथरे लगते थे जैसे अभी-अभी लॉन्ड्री से निकले हों। होंठों पर हल्की स्मित थिरकती रहती थी। उनकी भाव-भँगिमा में एक गरिमा होती थी जैसे उनका एक अलग विश्व हो। बाहर से अछूती और अपने में सिमटी हुई। मनोहर श्याम जोशी की इस बात पर  विश्वास भी नहीं होता है कि रघुवीर सहाय और मनोहर जोशी आकाशवाणी की ड्यूटी से लौटते समय कभी हल्की-फुल्की तुकबन्दियाँ करके हास-परिहास भी करते रहे होंगे। 


दरअसल मेरी दिलचस्पी रघुवीर सहाय के व्यक्तित्त्व से ज्यादा उनकी कविता और लेखन में थी। दिनमान में छपने का प्रलोभन भी नहीं था। हो भी नहीं सकता था। दिनमान में इसके लिए कोई जगह नहीं थी। दिनमान की सम्पादकीय टीम के हर व्यक्ति के लिए कॉलम पहले से तय थे। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना- साहित्य, प्रयाग शुक्ल- कला और विनोद भारद्वाज- फिल्म और आधुनिक जीवन पर नियमित लिखते थे। "चर्चे-चरखे” सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का लोकप्रिय स्तम्भ था। अन्तर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय और प्रदेश की खबरों के साप्ताहिक सार-संक्षेप के लिए पन्ने सुरक्षित रहते थे। पत्रिका का कलेवर छोटा था। संसद में कार्य करने के कारण मेरे पास इतना समय भी न था कि दिनमान की कभी कभार की ज़मीनी रिपोर्टिंग में कुछ कर पाता। दूसरे, मैं अपने को इसके योग्य भी नहीं पाता था। रघुवीर सहाय ने उन दिनों दिनमान के आख़िरी पन्ने पर “आज की कविता” नामक एक अपूर्व स्तम्भ शुरू किया था जिसमें विश्व कविता के अनुवाद छपते थे। इस स्तम्भ में दिनमान से बाहर के कवियों-लेखकों के अनुवाद भी छपते थे। यह स्तम्भ मुझे आकर्षित करता था लेकिन उन दिनों एकाध पेंगुइन के कविता संग्रह के अलावा विश्व कविता परिदृश्य से मेरा परिचय विरल था। ऐसे में उस स्तम्भ के लिए भी मैं उम्मीदवार नहीं हो सकता था। बस! रघुवीर जी के बारे में जानने-समझने का एक युवकोचित कौतूहल अवश्य था जिसका अवसर मैंने जल्दी ही खोज लिया। 



फ़ैज़ाबाद से “सूर्यबाला” नामक एक छोटी पत्रिका के कविता विशेषांक के लिए मुझे दिल्ली स्थित कवियों की रचनाएँ जुटानी थीं। रघुवीर सहाय ऐसी किसी असाहित्यिक नाम की पत्रिका के लिए मुझ जैसे अपरिचित को रचना देंगे, ऐसी कोई उम्मीद मुझे कतई नहीं थी। लेकिन इस बहाने उनकी देहरी को छूने और उनकी ज़िन्दगी पर पड़े पर्दे की बीच झाँकने के लोभ से मैंने रविवार की एक सुबह उनके घर की कॉलबेल बजा दी। 


दरवाज़ा खुला। उनकी पत्नी सामने थीं। लम्बोतरा चेहरा। सुबह की गृहस्थी की साज़-सँवार में लगी वह भीतर गईं जहाँ से रघुवीर जी की आवाज़ मुझे उड़ती हुई सुनायी दी, "बिठाओ- आता हूँ।” इस बार उनकी बेटी आयी और उन्होंने मुझे भीतर बुला कर बैठने के लिए कहा। बैठने के बाद मैंने नज़रें घुमायीं, दीवार पर टँगी पूर्वोत्तर राज्य की एक कलाकृति पर आँखें टिक गयीं।

 

कुछ देर बाद रघुवीर जी आये। मैंने उनसे लखनऊ का जिक्र किया। कुँवर नारायण, कृष्ण नारायण कक्कड़ और मुद्राराक्षस की चर्चा की। उनके रुख से लगा कि इन जिक्रों का कोई उन पर खास असर नहीं पड़ा है। फिर अपने आने का प्रयोजन बताया। मेरी आशंका सही साबित हुई। कविताएँ नहीं है, यह कह कर उन्होंने कविताएँ देने से साफ़ मना कर दिया। मुझे तब यह सुखद आश्चर्य हुआ, जब मेरे इस अनुरोध को मान गये कि वह समकालीन कविता परिदृश्य पर अपनी एक टिप्पणी दे सकते हैं। उस दिन सुबह की गर्म चाय भी उनके साथ पी। 


उन दिनों दिल्ली में आठवाँ अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव चल रहा था। बातों-बातों में मैंने उनसे जानना चाहा कि उन्होंने क्या महोत्सव में प्रदर्शित कोई फिल्म देखी है। उन्होंने कहा कि फिल्म फेस्टिवल विनोद भारद्वाज कवर कर रहे हैं। फिर उन्होंने मुझसे सहसा पूछा कि कौन सी फिल्म आपको अच्छी लगी है। मैंने जो एकाध फ़िल्में देखी थी, उसका हवाला दिया। कौन सी अच्छी फिल्म प्रदर्शित की जा रही हैं, उनकी इस पत्रकारीय जिज्ञासा से मेरी आँखों का रंग बदल गया। 


रघुवीर सहाय के चेहरे की हलचल से मुझे लगा कि बातचीत के लिए एक खिड़की खुल गयी है। मैंने उत्साह से गोविन्द निहलानी की फिल्म “आक्रोश” का जिक्र किया। रघुवीर सहाय ने कहा कि अगर आप फिल्म टिकट लेने जाएँ तो दो टिकट मेरे लिए भी ले आएगा। मुझे बहुत खुशी हुई कि मेरे प्रिय कवि ने मुझे अपने लिए कुछ करने का अवसर दिया। 



दिल्ली की ठिठुरती सुबह में तब लम्बी क़तार में लग कर फ़िल्म महोत्सव के लिए टिकट लेना कितना यंत्रणादायक होता था, आज सोचता हूँ तो ठण्ड से काँप जाता हूँ। किसी तरह अपनी टिकटों के साथ रघुवीर जी के लिए भी दो टिकट खरीद लाया। उन्हें अगली सुबह दो टिकट सौंप भी आया। 


बहरहाल अगले दिन शाम का शो था। रघुवीर जी अपनी बेटी हेमा के साथ फिल्म देखने आये। मेरी सीट उनके आगे की कतार में थी। रघुवीर जी एक युवक पर तुनक से गये कि वह बारहा उनके पाँवों को अपने पाँवों से छू रहा था। उनकी बेटी तमाम अपने साथियों को देख कर हाथ हिला कर खुशी व्यक्त कर रही थी। उसने रघुवीर जी से उत्साह में यह भी कहा कि पंकज कपूर भी आये हैं। तब तक अभिनेता पंकज कपूर को मैं नहीं जानता था। फिल्म जब खत्म हुई तो मैं एकदम स्तब्ध था। किसी से कुछ बात करने का मन नहीं था। बस पकड़ कर घर आ गया। 


लगभग एक पखवाड़े के बाद मेरी नज़र जब दिनमान पर पड़ी तो उसमें रघुवीर जी की “आक्रोश” फ़िल्म पर समीक्षा थी। रघुवीर जी ने इस फ़िल्म को किस तरह से देखा समझा है, इसको लेकर मेरे मन में एक कौतूहल था। उस समीक्षा को पढ़ कर मैं चकित था। जिस फ़िल्म ने मुझे मानसिक रूप से सबसे अधिक झकझोरा था, जिस फ़िल्म को सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिए गोल्डन पीकॉक पुरूस्कार से सम्मानित किया गया था, रघुवीर जी ने उस फ़िल्म की तीखी आलोचना की थी। 


उनका कहना था कि “आक्रोश” फ़िल्म आदिवासियों के शोषण की कहानी बतायी जाती है पर उसे आदिवासियों को कहने नहीं दिया जाता। आक्रोश में तमाम वक्त आदिवासी जीवन के राजनैतिक पिछड़ेपन का प्रचार किया गया है और यह बात भी रेत-रेत कर बतायी गयी है कि सिर्फ़ सवर्ण ही उनका उद्धार कर सकते हैं। रघुवीर जी का तर्क था कि “फ़िल्म का आदिवासी आधुनिक नागर मनोविज्ञान के कारण गुमसुम बनाया गया है।" उन्होंने तो यहाँ तक लिख दिया था कि “फ़िल्म के सब आदिवासी पात्र चेहरे-मोहरे भाव-भंगिमा, अभिनय के शैलीकरण और चरित्रांकन सौ फीसदी गैर आदिवासी है। उन्होंने अपनी टिप्पणी में फिल्म पर  तंज किया कि “यह ऐसा ही है जैसे दीवानखाने में शरीफ़घरों के लड़के-लड़कियाँ आदिवासी-आदिवासी खेल रहे हों।”


यहाँ मैं स्वीकार करना चाहता हूँ कि रघुवीर जी की इस फ़िल्म समीक्षा को मेरा युवा मन स्वीकार नहीं कर पा रहा था लेकिन वह चीज़ों को देखना सिखा रहे थे। दिनमान के चाहे सम्पादकीय हो या उनका अर्थात् स्तम्भ वह किसी भी घटना या प्रसंग को एक नई दृष्टि से देखते थे। यह दृष्टि हमेशा आम जन और लोकतन्त्र के पक्ष में होती थी। हिन्दी में इस दृष्टि से वह विरल पत्रकार थे जिन्होंने एक बड़ी पीढ़ी को समाज में समता, आज़ादी और लोकतन्त्र को खुली आँखों से देखना- समझना सिखाया। 





पत्रिका के लिए लेख के लिए बार-बार आग्रह करने पर एक दिन उन्होंने शायद कुछ आज़िज़ आ कर कहा कि मुझे बोल कर लिखाने की कुछ आदत पड़ गयी है। क्या यह हो सकता है कि वह बोलें और मैं उसे लिख लूँ। मैं उनसे लेख लेने के लिए उनकी इस शर्त को सहज ही तैयार हो गया। 


अगले इतवार को मैं कागज़-कलम के साथ उनके घर की कॉलबेल बजायी। वह भीतर थे। तब तक सहाय जी के परिजन मेरा चेहरा पहचानने लगे थे। मैं भी उनके बैठकखाने को पहचानने लगा था। टेबल पर कुछ अखबार बिखरे थे। एक अखबार उठा कर बाँचने लगा। एक बिल्ली उनके कमरे में इधर-उधर मटकते हुए म्याऊँ-म्याऊँ करते हुए घूम रही थी। इस बीच चाय की एक प्याली ने मेरा स्वागत किया। रघुवीर जी आये। मन में आज भी विफलता की आशंका थी। संशय से तब छुटकारा मिल गया जब वह सीधे मुद्दे पर आ गये। लगभग आधे घण्टे वह रुक-रुक कर बोलते रहे। विचार के एक छोर को पकड़ कर वह रफ्ता-रफ्ता लेख के निष्कर्ष तक पहुँच गये। 


पिछले चार दशकों की कविता के बारे में उनका विचार था कि “हिन्दी कविता ने क्रान्तिकारी उपलब्धियाँ हासिल नहीं की हैं जितनी हम स्वयं मानते हैं या चाहते हैं कि हुई होती। मुझे लगता है कि दो-चार अपवादों को छोड़ कर कवि स्वयं एक गहरी और सतत प्रक्रिया में शामिल रहे हैं। अधिसंख्य कवियों को जैसे ही किसी दूसरे के द्वारा एक नई जमीन टूटती दिखाई दी है, वे उसमें प्रवेश कर गये हैं और अपने इसी अभियान से सन्तुष्ट हो कर रह गये हैं। ऐसा होना कोई नई बात नहीं है। छायावाद के दौर में भी कुछ ऐसा हुआ था। कविता में क्रान्ति क्या है को व्याख्यायित करते हुए रघुवीर जी ने आगे स्पष्ट किया कि “वह समाज में एक नया मानव सम्बन्ध पहचानने के परिणाम में अभिव्यक्ति का विस्फोट है।”


आज मैं उन घड़ियों को याद करता हूँ तो लगता है कि दबे पाँव हम फिर उनके बैठक खाने में प्रवेश कर गये हैं और रघुवीर जी बोल कर लिखा रहे हैं, “पिछले चार दशकों में हिन्दी कविता ने बहुत कम प्रगति की है, यह कहते हुए मैं वास्तव में यह स्वीकार करना चाह रहा हूँ कि कवि की बराबरी, अधिकार, न्याय, स्वतन्त्रता और प्रेम के पक्ष में चिन्ता ने उसे इन्हीं मान्यताओं के भ्रष्टाचार और दुरूपयोग की बनी बनी-बनायी शोषणमूलक प्रणालियों के प्रति यथेष्ट रूप से निराश ही नहीं किया है, उसने इसी अनुपात में सामाजिक सरंचना और विश्व के आर्थिक इतिहास की अपनी समझ को स्वयं ललकारा भी नहीं है। वह साथ ही कला, भाषा, सौन्दर्य और प्रेम के अनुभवों को खोजने के लिए भी व्याकुल नहीं रहा है जो उसे एक शोषण मुक्त और कर्ममय समाज की सम्पूर्ण कल्पना दे सकें।”


रघुवीर जी एकाग्र मुद्रा में बोल रहे थे। उनका एक वाक्य दूसरे वाक्य से ऐसे जुड़ा होता था जैसे दाम्पत्य में एक के बिना दूसरा अधूरा होता है। एक भी शब्द छूट जाने से उनकी चिन्तन की लड़ी के टूट जाने का भय बना रहता था। रघुवीर जी का जीवन और साहित्य को तोलने-परखने के बुनियादी बाँट हमेशा बराबरी, अधिकार, न्याय, स्वतन्त्रता और प्रेम रहे हैं। ऐसा शायद समाजवाद विचारों के प्रति खासतौर से राममनोहर लोहिया के निकट होने के कारण रहा होगा। रघुवीर जी के विचारों में कई बार लोहिया के विचारों का खून मिला दिखाई देता था। रघुवीर जी जब बोलते हुए आगे निकल जाते तो मुझे लगता कि उनकी आवाज़ के एक सिरा मेरे हाथ में है। मैं भी उनके साथ हूँ। मेरे लिए उनका साथ होना ही एक उपलब्धि थी। वह कुछ क्षण के लिए ठिठक जाते। फिर मुझे ऐसे देखते जैसे कि मैं उनसे कैसे छिटक गया हूँ जबकि हम एक साथ चलने के लिए प्रतिश्रुति थे। पहली बार लगा कि एक लेखक किस तरह अपने से संवाद करता है। इस लेख का शीर्षक “कविता पर कुछ विचार” दे कर उन्होंने मुझे अपनी चिर-परिचित मुस्कान बिखेर कर विदा किया। 


फिर उनके घर सूर्यबाला की प्रति देने गया। उस दिन रघुवीर जी घर पर नहीं थे। दुबारा उनसे मिलने का उत्साह नहीं रहा। पता नहीं क्यों मुझे लगा कि हमारे उनके रिश्ते में आर्द्रता नहीं थी। एक लेखक के रूप में मैं उनका बहुत आदर करता था लेकिन हाड़-माँस के मनुष्य के रूप में जिस आपसी स्नेह की जरूरत थी, उसकी पूर्ति शायद हमारे बीच रिश्ते से नहीं होती थी। 



इस बीच मैंने दिल्ली छोड़ दिया। बैंक ऑफ़ बडौदा में नौकरी लग गयी और पटना चला गया।पटना प्रवास के बाद नाबार्ड की नौकरी में तबादले पर लखनऊ आ गया। इस बीच टाइम्स समूह में अशोक जैन के बेटे समीर जैन के आने से उथल-पुथल मच गयी। रघुवीर जी को दिनमान से नवभारत टाइम्स में तबादला कर दिया गया। रघुवीर जी को यह अपमानजनक लगा। कुछ अरसा काम करने के बाद तंग आ कर उन्होंने इस्तीफा दे दिया। वह जनसत्ता में “अर्थात” नाम से कॉलम लिखने लगे। 


कवि-कथाकार विष्णु नागर के सौजन्य से “अन्तर्दृष्टि” पत्रिका में उनका साक्षात्कार छपने के बाद उनसे जुड़ने का एक बार फिर सिलसिला बना। इस बीच 1989 में लखनऊ दूरदर्शन ने राष्ट्रीय काव्य संगोष्ठी का आयोजन किया था। इस संगोष्ठी में रघुवीर सहाय के साथ हिन्दी कविता के अनेक कवि शामिल थे। सौभाग्य से मुझे भी कविता पाठ के लिए आमंत्रण मिला था। हम सभी दूरदर्शन केंद्र समय पर पहुँच गये थे। मंच की साज-सज्जा शानदार थी। फ़र्श पर बैठ कर कविता पढने की व्यवस्था थी। रघुवीर जी नहीं आये थे। हम सब उन्हीं का इन्तज़ार कर रहे थे। हालाँकि यह खबर लग गयी थी कि वह लखनऊ पधार चुके हैं। आखिरकार रघुवीर जी अपनी चिर-परिचित दबी मुस्कान बिखेरते हुए आए। वह संगोष्ठी के वरिष्ठतम कवि थे। नमस्कारों का आदान प्रदान हुआ। उनके आते ही मंच पर उनके सम्मान में ख़ामोशी छा गयी। दूरदर्शन की रिकॉर्डिंग में तब कैमरे और प्रकाश को संयोजित करने में काफ़ी समय लगता था। हम सब कवि मित्र रघुवीर जी से इस समय में बातचीत का लाभ उठाना चाहते थे। किन्तु रघुवीर जी ने अपने हाव-भाव से इसके लिए कोई सुअवसर नहीं दिया। वह अपनी कविताओं के चयन और पाठ को ले कर अपने में खोये रहे। हम सब कवि उनके एकनिष्ठ काव्यप्रेम और उनकी प्रस्तुति की तैयारी पर मुग्ध थे। कुछ उनकी निस्संगता को ले कर चकित भी। कविता पाठ हुआ। रघुवीर जी ने किसी की कविता पर वाह-आह कुछ नहीं किया। हम जानते थे कि वह इन कवि सम्मेलनी रिवाजों के खिलाफ़ थे। हालाँकि इस पर ज़रूर अचरज हुआ कि कविता पाठ खत्म होने के बाद किसी की कविता के बारे में उन्होंने एक शब्द भी नहीं कहा। कहना न होगा कि कुछ कवि इसके मुन्तज़िर थे। 


पारिश्रमिक का चेक लेने के लिए विशेष व्यवस्था थी। दोपहर हो गयी थी। सबको भूख लग आयी थी। वरिष्ठ होने के नाते सबने रघुवीर जी को चेक देने के लिए स्टाफ़ से अनुरोध किया। हम बाकी सब कवि मित्र धीमी आवाज़ में हँसी-मज़ाक और गपशप करते रहे। दूरदर्शन की प्रचलित परम्परा है कि वह पारिश्रमिक का चेक मानदेय और आने-जाने का भाडा जोड़ कर तैयार रखते हैं। सभी कवियों के चेक पहले से तैयार थे। रघुवीर जी चेक लेने को तैयार नहीं थे। उनका कहना था कि उन्होंने भाडा ज्यादा अदा किया है जबकि चेक उन्हें कम का दिया गया है। रकम मामूली थी। लेकिन सिद्धान्तः वह कम रकम लेने को राज़ी न थे। फिर से नया चेक तत्काल बनाने के लिए आकाशवाणी के स्टाफ़ बच रहे थे। वे बाद में संशोधित राशि का चेक देने को तैयार भी हो गये। रघुवीर जी को इस पर आपत्ति थी जो शायद सही भी थी कि पिछली बार भी दिल्ली आकाशवाणी ने ऐसा कुछ किया था। संशोधित राशि भेजने का वायदा किया था लेकिन उनको कई बार अनुस्मारक भेजने के बावजूद उन्हें तब तक रकम नहीं मिली। इस बार वह अपना पूरा पारिश्रमिक ले कर रहेंगे। हम सब रघुवीर जी के पक्ष से सहमत होते हुए भी हो रही देरी को ले कर सब थोड़ा परेशान थे। एक कवि मित्र ने तब हमें बताया कि रघुवीर जी पारिश्रमिक के मामले में पक्के हैं और कोई समझौता नहीं करते हैं। मुझे याद नहीं है कि किस तरह यह मामला सुलटा लेकिन उनका यह पक्ष लेखकीय अधिकारों के प्रति सजगता को दर्शाता है। 


हर कवि की तरह रघुवीर जी को सर्जनात्मक सुख इस बात में मिलता था कि उनके कविता को समाज में किस तरह से पढ़ा और समझा जा रहा है। “अन्तर्दृष्टि” पत्रिका के प्रवेशांक में उनका लम्बा साक्षात्कार छापने के बाद अगले अंक में उनकी कविता पर कवि स्वप्निल श्रीवास्तव का एक लेख हमने प्रकाशित किया था। रघुवीर जी उस लेख को पढ़ने के लिए इतने व्यग्र थे कि इसके लिए उन्होंने मुझे दो पत्र लिखे थे। उस पत्र में उन्होंने अपनी कविता पर लिखे कवि राजेश जोशी के उस लेख की भी चर्चा की थी जो शायद उन दिनों किसी पत्रिका में छपा था। पत्र में इस बात का हल्का सा रंज भी व्यक्त किया था कि राजेश जोशी ने उनकी कविता के आकलन में उनके नए संग्रह “कुछ पते और कुछ चिट्ठियाँ” को शामिल नहीं किया था। एक ऐसा भी समय था कि रघुवीर सहाय और केदार नाथ सिंह के बीच हल्की और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा भी दिखती थी। 




रघुवीर सहाय से आख़िरी मुलाक़ात उनके साकेत स्थित घर पर हुई थी। कवि और फिल्म समीक्षक विनोद भारद्वाज उनके पड़ोस में रहते थे। रामकृष्ण पुरम सरकार से आबँटित निवास था। साकेत का घर उनका अपना था। बैठकखाने में एक भद्र सादगी और आत्मीयता थी। कुछ देर इन्तज़ार के बाद रघुवीर जी आये। वह उन दिनों विदेश से किसी अन्तर्राष्ट्रीय कार्यक्रम में शिरकत कर के आये थे। कुछ देर वहाँ की चर्चा करते रहे। फिर देश में चल रही साम्प्रायिक लहर और अख़बारों की भूमिका पर अपनी चिन्ता प्रकट की। एक छोटी पत्रिका के सम्पादक का धर्म निर्वाह करने की दृष्टि से उनसे झिझकते हुए कविता देने के लिए विनम्रता से अनुरोध किया। उनका उत्तर हमेशा की तरह दृढ़ “ना” रहा। यह कोई नई बात नहीं थी। उनका उत्तर जरूर चौकाने वाला था। उनका कहना था कि वह अमूमन अपनी अप्रकाशित कविताएँ संग्रह में देते हैं। मैंने कहा कि पत्रिकाओं में कविताएँ छपने से बड़ी संख्या में पाठकों तक पहुँच जाती हैं जिससे कविता संग्रह को लोकप्रिय बनने में मदद ही मिलती है। उनका दृष्टिकोण मुझसे कुछ अलग था। उनका कहना था कि वह कविताएँ कम लिखते हैं। संग्रह छपने में कुछ देरी होती है लेकिन अगर मेरी कविताएँ पत्रिकाओं में पहले छप जाती हैं तो उनकी तमाम नकलें साहित्यिक परिदृश्य पर इस कदर छा जाती हैं कि मेरी अपनी कविता की पहचान खो जाती है। उसके बाद वहाँ ज़्यादा बैठना न हो सका। पत्रिका के लिए अपने प्रिय कवि की कविता न पाने के कारण उदास मन से उनसे विदा ली। 


अपनी उदासी कुछ कम करने और पुरानी मैत्री को सींचने के लिए विनोद भारद्वाज के घर की घंटी बजा दी। सुखद था कि वह मौजूद थे। उनके घर की सजावट में उच्चवर्गीय भद्रता झलकती थी। किताबों और पेंटिंग्स को रखने में कलात्मक सुरुचि थी। दिल्ली प्रवास के दौरान कई बार पहले भी उनके घर गया था। उनसे उस दिन “अन्तर्दृष्टि” पत्रिका को ले कर चर्चा हुई। वह अपनी पत्रिका “आरम्भ” के नास्टैल्जिक संसार में खो गये। उन दिनों खरीदी अपनी नयी किताबों का संग्रह भी उन्होंने उत्साह से दिखाया। 


विनोद जी के घर से लौट कर मैं बस डिपो पर बस का इन्तज़ार कर रहा था। तभी मेरी नज़र सहसा रघुवीर जी पर पड़ी। वह थोडा झुके हुए धीमे कदमों से बस अड्डे की तरफ आ रहे थे। उनकी चाल में उम्र झलक रही थी। मैंने उत्साह से उनकी अगवानी की। वह भी उसी बस से उसी दिशा में जाने वाले थे। बस में हम साथ बैठे। रघुवीर जी अपनी विदेश यात्रा के अनुभव फिर साझा करने लगे। उनका यह साथ मुझे चमत्कार से कम नहीं लग रहा था। मैं उन्हें एक उत्साही बच्चे की तरह धीरज से सुन रहा था। मुझे उनसे पहले उतरना था। उनको नमस्कार कर मैं ऑल इंण्डिया मेडिकल इंस्टिट्यूट पर उतर गया। मुझे क्या पता था कि उनसे यह अन्तिम नमस्कार होगा। कुछ अरसा बाद पता चला कि दिल का दौरा पड़ने से वह नहीं रहे। बाद में पता चला कि अन्तिम समय में अपने घर में प्रेस कौन्सिल द्वारा गठित समिति के एक सदस्य पी. रमन के साथ मिल कर वह उस महत्त्वपूर्ण रिपोर्ट को पूरी कर रहे थे जो उत्तर भारत के समाचारपत्रों ने बाबरी मस्जिद ढहाने के दौरान अपनी खबरों को साम्प्रदायिक रंग देने की भूमिका पर केन्द्रित थी। एक तरह से वह देश में लोकतन्त्र और धर्म निरपेक्षता को बचाने के क्रम में शहीद हो गए। वह ऐसे समय नहीं रहे जब हमें उनकी सबसे अधिक जरूरत थी।


विनोद दास



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