यादवेन्द्र का आलेख 'ईश्वर को फांसी लटकाने वालों का न्याय'
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| हरिशंकर परसाई |
विज्ञान चाहें जो कहता हो, कवियों और लेखकों के लिए चांद हमेशा एक जीवन्त प्रतीक के तौर पर रहा है। लोरियों में वह बच्चों के लिए मामा बन जाता है तो किंवदंतियों वहां पर सूत कातती बुढ़िया है जिसे हम अपनी आंखों से आज भी देख सकते हैं। चांद जैसे मुखड़े की कल्पना कवि हमेशा करते रहे। शांति, शीतलता, धवलता और सुंदरता के अनूठे प्रतीक के रूप में भी चांद को याद किया जाता है। अनूठे व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई ने एक व्यंग्य लिखा : "इंस्पेक्टर मातादीन चाँद पर"। अपने आप में यह व्यंग्य आलेख एक उपलब्धि की तरह है। आलेख में परसाई जी लिखते हैं "जब मातादीन एक भले आदमी को पकड़ लेते हैं तो स्थानीय पुलिस वाले एक निरपराध भले आदमी को सज़ा दिलाने का विरोध करते हैं। मातादीन उन्हें धमकाते हुए समझाते है : "सज़ा इसे हो या किसी कातिल को सब में उसी ईश्वर का अंश है....। फाँसी पर तो ईश्वर ही चढ़ेगा न।" यादवेन्द्र के अनुसार "पूरी रचना का सूत्र वाक्य यही है। वर्तमान भारतीय समाज किस दिशा में बढ़ रहा है यह दशकों पहले परसाई जी देख रहे थे….। क्या हम ईश्वर को हर रोज़ फांसी पर चढ़ते नहीं देख रहे हैं?" यह कहानी उस भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करती है जो हमारे समाज का एक नियमित व्यवहार बन गया है। लोकतन्त्र के मूल उद्देश्य को यह भ्रष्टाचार ही नष्ट कर देता है।
आजकल पहली बार पर हम प्रत्येक महीने के पहले रविवार को यादवेन्द्र का कॉलम 'जिन्दगी एक कहानी है' प्रस्तुत कर रहे हैं जिसके अन्तर्गत वे किसी महत्त्वपूर्ण कहानी को आधार बना कर अपनी बेलाग बातें करते हैं। इस बार अपने कॉलम के अन्तर्गत उन्होंने महान व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई की व्यंग्य कहानी '"इंस्पेक्टर मातादीन चाँद पर" की चर्चा की है। कॉलम के अंतर्गत यह चौदहवीं प्रस्तुति है। अपरिहार्य कारणों से पिछले महीने हम इसे प्रस्तुत नहीं कर पाए थे। इसके लिए हमें खेद है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं यादवेन्द्र का आलेख ईश्वर को फांसी लटकाने वालों का न्याय'।
जिन्दगी एक कहानी है : 14
'ईश्वर को फांसी लटकाने वालों का न्याय'
यादवेन्द्र
मनुष्य के चंद्रमा पर पाँव धरे हुए छप्पन साल हो गए - 20 जुलाई 1969 को जब अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री नील आर्मस्ट्रॉंग और एडविन एल्ड्रिन एक एक कर चंद्रमा की सतह पर उतरे तो अज्ञात आशंकाओं से भरे हुए थे - "हमारे चारों तरफ अज्ञात आशंकाएँ उमड़ घुमड़ रही थीं ...। हजारों तरह के डर मन में सिर उठा रहे थे।" आर्मस्ट्रॉंग ने बाद में एक इंटरव्यू में कहा भी।
यह एक युगांतकारी घटना थी जिसके अद्वितीय वैज्ञानिक तकनीकी महत्त्व तो थे ही उससे भी ज्यादा भावनात्मक महत्त्व था... सदियों से मनुष्य ने चंद्रमा को केन्द्र में रख कर जो कल्पना-लोक निर्मित किया था वह धड़धड़ा कर जमींदोज हो गया था। चंद्रमा को हमेशा से शांति, शीतलता, धवलता और सुंदरता के अनूठे प्रतीक के रूप में जो मान्यता मिली हुई थी वह उसकी ऊबड़-खाबड़ सतह की पहली बार निकट से ली गयी तस्वीरें देख कर खंडित होने लगी...। वहाँ बैठ कर चरखा कातती बुढ़िया भी एकदम से गुम हो गयी। पूरी दुनिया में चंद्रमा को ले कर मनुष्य के मन में अब तक बसे रहे कल्पना लोक के ध्वस्त होने को ले कर बहुत कुछ रचा गया - कविता, कहानी, लेख, नाटक, फ़िल्म इत्यादि में।
हिंदी में भी सृजनात्मक समाज ने अपने अपने ढंग से इस बेमिसाल परिघटना को रेखांकित किया। इस घटना के कुछ समय बाद अपनी तरह के अनूठे गद्यकार हरिशंकर परसाई ने एक व्यंग्य रचना लिखी थी : "इंस्पेक्टर मातादीन चाँद पर"। लिखे जाने के साढ़े पांच दशक बाद भी बेहद सामयिक और प्रासंगिक बने रहना इस कहानी को इतिहास और हिन्दी समाज के विमर्श में मील का पत्थर साबित करता है।
यह रचना शुरू इन पंक्तियों से होती है : "वैज्ञानिक कहते हैं चाँद पर जीवन नहीं है। सीनियर पुलिस इंस्पेक्टर मातादीन कहते हैं : वैज्ञानिक झूठ बोलते हैं, वहाँ हमारे जैसे ही मनुष्य की आबादी है......। उन्होंने चाँद का उजला हिस्सा देखा और कह दिया : वहाँ जीवन नहीं है। मैं चाँद का अँधेरा हिस्सा देख कर आया हूँ, वहाँ मनुष्य जाति है।" अंधेरे उजाले का यह रूपक भारत की पुलिस की खतरनाक और मनुष्य विरोधी कार्य प्रणाली को बड़े प्रखर रूप में चित्रित करता है।
दरअसल यह रचना मनुष्यता के इसी अँधेरे चेहरे की कथा कहती है - धरती के रामराज से "सांस्कृतिक आदान प्रदान" के अंतर्गत चल कर चंद्रमा के साफ़-सुथरे सामाजिक माहौल को दानवी जलकुम्भी की तरह नष्ट कर देता है। इसके प्रभाव से कुछ ही समय में चंद्रमा के समाज में व्याप्त नेकनीयती और भाईचारा पर आधारित आधी संस्कृति नष्ट हो गयी - "आदमी जानवर से बदतर हो गया और सारे मानवीय संबंध समाप्त होने लगे।" हाल-फ़िलहाल के सालों में इजराइल के साथ वर्तमान शासकों की बढ़ती निकटता ने नियम कानून की धज्जियाँ उड़ाते हुए खुलेआम बुलडोजर चढ़ा देने की संस्कृति इसी सांस्कृतिक आदान-प्रदान से आयातित हुई है… और इसका इतना ज्यादा उपयोग किया जा रहा है कि लोक-मानस में इसकी गैर कानूनी छवि धूमिल होती जा रही है।
हुआ यह कि चंद्रमा की सरकार ने भारत सरकार को लिखा : "यों हमारी सभ्यता बहुत आगे बढ़ी है पर हमारे पुलिस में पर्याप्त सक्षमता नहीं है। वह अपराधी का पता लगाने और उसे सज़ा दिलाने में अक्सर सफल नहीं होती। सुना है आपके यहाँ रामराज है...। मेहरबानी कर के किसी पुलिस ऑफिसर को भेजें जो हमारी पुलिस को शिक्षित कर दे।" और इस तरह इंस्पेक्टर मातादीन अपने सिर पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी ले कर पहुँच गये चाँद पर। चलने से पहले उन्होंने दिखावे के लिए
"प्रविसी नगर कीजे सब काजा, हृदय राखि कौसलपुर राजा।"
उचारा और रास्ते में ही चंद्रयान के चालक को दनादन गालियाँ देने लगे तो उसने फ़ौरन टोका : "हमारे यहाँ आदमी से इस तरह नहीं बोलते।" इसका जवाब भी मातादीन के पास एकदम हाजिर था : "जानता हूँ बे। तुम्हारी पुलिस कमजोर है, अभी मैं उसको ठीक करता हूँ।" पिछले सालों के अनगिनत उदाहरण हमारे सामने हैं जब पुलिस ने बस शक, संप्रदाय, जाति, रूप रंग, भाषा इत्यादि के आधार पर बेबुनियाद और पूर्वाग्रह आधारित आरोप लगा कर लोगों को ठीक करने का काम किया है।
चाँद पर पहुँच कर मातादीन वहाँ की पुलिस को सचमुच ठीक कर देते हैं - और तो और विज्ञान को भी मात दे देते हैं। वे सबसे पहले पूरे चंद्रमा के पुलिस थानों में हनुमान जी की मूर्तियाँ स्थापित करवाते हैं फिर जिसको पकड़ा उसको बगैर लिखत पढ्त और मुक़दमे के जहाँ की तहाँ सजा दे देने की (रावण ने सीता का एब्डक्शन किया तो उन्होंने उसकी लंका में आग लगा कर मामला वहीँ निबटा डाला) कार्य-संस्कृति की नींव रखते हैं। हमारे यहाँ भी एनकाउंटर संस्कृति को इसी तरह महिमामंडित किया जाता है। पुलिस वालों की पगार कम करवा कर उन्हें लूट खसोट के लिए प्रेरित करते हैं, झूठी गवाहियों का सिलसिला शुरू करते हैं..... और तो और अपराधों की तार्किक परिणति के नाम पर सीधे-सादे, निर्भीक और सत्ता के प्रति असहमति रखने वाले लोगों को अनाप-शनाप मामलों का दोषी बना कर सज़ा दिलवाते हैं। आज के भारत में सीडीशन के नाम पर सरकार से असहमत लोगों को जेल में बगैर मुकदमों के बंद रखने का सिलसिला अब आम बन गया है।
मातादीन की इस कार्यशैली से शुरू में तो एकदम से फ़र्क पड़ता दिखाई दिया....।। अपराधियों की दुनिया में घबराहट छा गयी और चंद्रमा के पुलिस मंत्री ने न सिर्फ़ मातादीन की सूझ-बूझ की तारीफ़ की बल्कि उनसे इस "क्रांति" का राज भी जानना चाहा। उन्होंने इन्वेस्टिगेशन और एविडेंस की पुरानी परिपाटी में आमूलचूल बदलाव कर डाला। उनकी थ्योरी थी कि एक मनुष्य ने अपराध किया और दूसरा मनुष्य आसानी से पकड़ लिया गया तो कहीं कुछ गलत नहीं हुआ - किसी मनुष्य को सजा होगी ही, वह चाहे मारने वाला हो या बेकसूर....। यह अपने सोचने की बात नहीं है। हम भेदभाव नहीं करते, यह पुलिस का मानवतावाद है।
उससे भी बड़ी बात मातादीन ने चंद्रमा की पुलिस को बताई - जुर्म किस पर साबित होना चाहिए इसका निर्णय दो बातों से होगा।
(1) क्या वह आदमी पुलिस के रास्ते में आता है?
(2)क्या उसे सज़ा दिलाने से उपर के लोग खुश होंगे?
टेस्ट केस के तौर पर जब मातादीन एक भले आदमी को पकड़ लेते हैं तो स्थानीय पुलिस वाले एक निरपराध भले आदमी को सज़ा दिलाने का विरोध करते हैं। मातादीन उन्हें धमकाते हुए समझाते है : "सज़ा इसे हो या किसी कातिल को सब में उसी ईश्वर का अंश है....। फाँसी पर तो ईश्वर ही चढ़ेगा न।" पूरी रचना का सूत्र वाक्य यही है। वर्तमान भारतीय समाज किस दिशा में बढ़ रहा है यह दशकों पहले परसाई जी देख रहे थे….। क्या हम ईश्वर को हर रोज़ फांसी पर चढ़ते नहीं देख रहे हैं?
इन नवोन्मेषी कार्य संस्कृति को धरती से ले कर चंद्रमा पर फैलाने वाले मातादीन का सार्वजनिक अभिनंदन किया गया, फूलों से लाद कर खुली जीप में घुमाया गया, जय जयकार भी किया गया। भारत के पुलिस मंत्री टीवी पर यह सब लाइव देख रहे थे और खुश हो रहे थे कि मातादीन की उपलब्धियों को खुद अपने चुनावी लाभ के लिए कैसे भुनायें।
पर कुछ महीने बाद ही पासा पलट गया - चंद्रमा के सांसदों ने संसद का गुप्त अधिवेशन बुला कर मातादीन की कारस्तानियों के चलते सरकार से इस्तीफ़ा माँगना शुरू किया। उनका आरोप था कि पुलिस की इस नयी कार्य-संस्कृति से आदमी जानवर से बदतर हो गया है ....। किसी की मदद करने की सामाजिक परिपाटी से लोगों ने इसलिए किनारा कर लिया कि मदद करते हुए जाने कौन पुलिस के हत्थे चढ़ जाए। चंद्रमा की सरकार ने भारत सरकार की सहायता को शत्रुवत बर्ताव माना और दृढ़तापूर्वक कहा कि हम भोले लोगों के साथ आपने विश्वासघात किया है। मातादीन के रहने पर उन्हें अपनी संस्कृति नष्ट होने का खतरा दिखाई दिया और अनिच्छुक होते हुए भी वे बड़े बेआबरू हो कर वापस "रामराज" में भेज दिए गए। कोई भी आसानी से अनुमान लगा सकता है कि बे आबरू हो कर जब मातादीन लौट कर धरती पर आए होंगे तो क्या उनका हृदय परिवर्तन हो गया होगा और वे न्याय की नई मिसाल कायम कर रहे होंगे - या चंद्रमा रिटर्न्ड होने का तमगा लगाए हुए और ज्यादा नृशंसता का परिचय देने लगे होंगे?
आज हम जिस समाज में जीने को अभिशप्त हैं उसके संदर्भ में मुझे अनायास हिंदी की यह महत्वपूर्ण कहानी याद आती है और साढ़े पांच दशक पहले लिखी इस कहानी में वर्णित कार्य संस्कृति के अपने आस-पास के समाज में शब्दशः चरितार्थ होते हुए देखना बेहद उद्वेलित भी करता है। शताब्दी पूर्व जन्मे और अपने समय से बहुत आगे देखने वाले अनूठे शब्द-शिल्पी हरिशंकर परसाई को सादर प्रणाम!
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| यादवेन्द्र |
(यादवेन्द्र सीएसआईआर - सीबीआरआई, रूड़की में पूर्व मुख्य वैज्ञानिक के तौर पर कार्य कर चुके हैं।)
सम्पर्क :
72, आदित्य नगर कॉलोनी,
जगदेव पथ, बेली रोड,
पटना - 800014
मोबाइल - +91 9411100294


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