संदेश

जनवरी, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

विनोद दास का आलेख 'लोकतन्त्र के प्रहरी - रघुवीर सहाय'

चित्र
रघुवीर सहाय  रघुवीर सहाय हमारे समय के अनिवार्य कवियों में से एक रहे हैं। सामान्य बोलचाल की भाषा का इस्तेमाल करते हुए  रघुवीर जी  ने उम्दा कविताएं लिखीं जिन्हें क्लासिकल की संज्ञा दी जा सकती है। वे एक पत्रकार थे इसलिए उनके साहित्य में पत्रकारिता का और उनकी पत्रकारिता पर साहित्य का असर स्वाभाविक रूप से दिखाई पड़ता है। उनकी कविताएँ आज़ादी के बाद विशेष रूप से सन् 1960 के बाद के भारत की तस्वीर को जानने समझने के लिए एक दस्तावेज की तरह हैं। उनकी कविताएँ नए मानव संबंधों की खोज करना चाहती हैं जिसमें गैर बराबरी, अन्याय और गुलामी न हो। उनकी समूची काव्य-यात्रा का केंद्रीय लक्ष्य ऐसी जनतांत्रिक व्यवस्था की निर्मिति है जिसमें शोषण, अन्याय, हत्या, आत्महत्या, विषमता, दासता, राजनीतिक संप्रभुता, जाति-धर्म में बँटे समाज के लिए कोई जगह न हो। जिन आशाओं और सपनों से आज़ादी की लड़ाई लड़ी गई थी उन्हें साकार करने में जो बाधाएँ आ रही हों, उनका निरंतर विरोध करना उनका रचनात्मक लक्ष्य रहा है। संस्मरण ऐसी विधा है जिसके जरिए हम उस व्यक्ति, विचार या घटना के अंदरूनी तथ्यों से परिचित होते हैं जिस पर वह लिख...