स्वप्निल श्रीवास्तव का आलेख ‘आलोचना में नामवर होना’।



 
नामवर सिंह


हिन्दी के प्रख्यात आलोचक प्रोफेसर नामवर सिंह का बीते 20 फरवरी 2019 को निधन हो गया। नामवर जी अपने जीते जी ही किंवदन्ती बन गए थे। आलोचना जैसी शुष्क और उबाऊ विधा को उन्होंने अपने बल बूते विधाओं के शीर्ष पर स्थापित कर दिया। यह उनकी विद्वता और अध्ययन का ही असर था कि उनके समकालीन भी उनका लोहा मानते थे। नामवर जी ने लिखा कम, बोला अधिक। इस रूप में भी उन्होंने लिख कर मशहूर बनने की रूढ़ि को तोड़ा। उनके जाने से हिन्दी साहित्य में जो खालीपन आया है उसे भर पाना सबके लिए एक चुनौती होगी। नामवर जी को नमन करते हुये आज पहली बार पर प्रस्तुत है स्वप्निल श्रीवास्तव का आलेख आलोचना में नामवर होना  



आलोचना में नामवर होना


स्वप्निल श्रीवास्तव



नामवर सिंह का चेहरा किसानी था। सांवला रंग, सीधी रीढ़, जो अन्त तक तनी रही। उनके भीतर आलोचनात्मक दृढ़ता थी। वे देखने में बहुत सुंदर नहीं थे लेकिन जब बोलते थे तो सुंदर दिखने लगते थे। ज्ञान की आभा से उनका चेहरा दीप्त हो उठता था वह अभूतपूर्व वक्ता थे। आलोचना की उनके पास एक समर्थ भाषा थी। यह सब सहज सम्भव नहीं हुआ, उसे उन्होंने अपने ज्ञानार्जन और सहज भाषा के जरिये अर्जित किया वे भारतीय वांगमय और पश्चिमी समाज की विचारधाराओ के गहन अध्येता थे उनकी आलोचना उद्धरणों से बोझिल नहीं थी। उनका लिखा और कहा हुआ कम महत्वपूर्ण नहीं था उनके पूर्व में आचार्य रामचंद्र शुक्ल और हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे आलोचक भी थे वह उन दोनो से अलग थे उन्होंने आलोचना की मुश्किल राह को सुगम बनाया ताकि वह आम पाठको तक पहुँच सके


हिन्दी में आलोचना ऐसी विधा है जिसमें पाण्डित्य का भाव प्रबल होता है भाषा जितनी कठिन हो आलोचक उतना ही विद्वान माना जाता है कुछ आलोचक तो खोज-खोज कर अपनी आलोचना में ऐसी दुरूह भाषा का वैभव दिखाते हैं कि पाठक चमकृत हो जाये। नामवर सिंह ने इस रूढि को तोडा‌ है और उसकी जगह पर ऐसी भाषा को जगह दी है, जिसे समझने और ग्राह्य करने में कोई बाधा न हो।


बनारस के एक गांव से निकल कर उन्होंने बनारस को अपनी शिक्षा और दीक्षा की भूमि बनाया। बनारस में उन्हें हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसा गुरू मिला यह कुछ ऐसा था जैसे कबीर को रामानंद मिल गये हो। जिस तरह रामानन्द ने कबीर का जीवन बदल दिया, ठीक उसी प्रकार की घटना नामवर सिंह के जीवन में हुई यह परम्परा और आधुनिकता का मिलन था नामवर सिंह अपने गुरू की लीक से हट कर अपने लिए एक नया मार्ग बनाया बनारस उनके लिए प्रिय नगर था उसमें साहित्य और संस्कृति की अनेक विभूतियां पैदा हुई थी कबीर, तुलसीदास और रैदास के अलावा, ुक्ल जी और द्विवेदी जी इसी सरजमीन के थे। बनारस में उन्हें एक साहित्यिक मंडली भी मिली – जिसमें त्रिलोचन, केदार नाथ सिंह के साथ विष्णु चंद्र शर्मा, विश्वनाथ त्रिपाठी प्रमुख थे बनारस एक नगर नहीं बल्कि परम्परा और आधुनिकता का शहर था। बनारस में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्था थी लेकिन राजनीति भी कम नहीं  थी। वहां पर बहुत दिन तक टिके नहीं। वहाँ  से वह सागर और फिर जोधपुर पहुँचेवहाँ उन्होंने राही मासूम रजा के उपन्यास – आधा गाँव जैसे ही कार्यक्रम में लगाया, उस उपन्यास को ले साम्प्रदािकता की चर्चा होने लगी। उपन्यास में अश्लील स्थल को लेकर हाहाकार उठने लगा। विवाद नामवर सिंह के जीवन का पर्याय होने लगा बाद में वाद विवाद और सम्वाद में उनकी आलोचना को विलय किया जाने लगा उनकी स्थापनायें विवाद का विषय बनती रहे। लेकिन वह आलोचना क्या, जो विवाद का कारण न बने। जो लीक से हट कर काम करते हैं, उन्हें  स संकट का सामना तो करना ही पड़ता है



वर्ष 1974 में वे जे. एन. यू. के भारतीय भाषा केंद्र के संस्थापक और प्रोफेसर का ओहदा सम्भाला और अन्त तक इसी पद पर कायम रहे। इसके बाद उनके जीवन और आलोचना का महत्वपूर्ण समय शुरू होता है। दिल्ली जैसे आधुनिक नगर में अपने ठेठ बनारसीपन के साथ आये थे वे अपने रहन-सहन और मिजाज में इस बनारसीपन को बचाये रखा मुँह  में पान और खैनी का सेवन उनका व्यसन था। दिल्ली एक आला शहर है।  वहाँ आ कर लोग बदल जाते है – जो नहीं बदलना चाहते उन्हें दिल्ली बदल देती है वह लोगो को कमेडी में नहीं ट्रेजिडी में बदलती है जो इस नगर का चरित्र जानते है, वे इस शहर के मारे हु लोगों को जरूर जानते होंगे।  बनारस की एक और खासियत है, वह है उसका बांकपन जो बनारस के माटी-पानी से बने हैं, वे अपना बांकपन नहीं छोड़ते। जहाँ यह बांकपन बढ़ जाता है, वहीं उसकी जगह कुटिलता ले लेती है




नामवर सिंह के जीवन में 1974 के पहले का समय मानसिक उद्वेलन और निर्मिति का समय था। आलोचक बनने के पहले उन्होंने निबंधकार और कवि के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज करायी उनका निबंध संग्रह – बकलम खुद 1951 में प्रकाशित हुआ। नीम के पत्ते और उदिता नाम से कविता संग्रह का उल्लेख मिलता है लेकिन संग्रह उदिता ही प्रकाशित हुआ। इसके साथ वे गद्य लेखन में भी सक्रिय थे। हिंदी विकास में अपभ्रंश का योगदान, उनका शोध प्रबंध था। पृथ्वीराज रासो पुस्तक का सम्पादन किया। तुलसीदास पर लिखे उनके लेख को पढ़ कर शमशेर ने भैरव प्रसाद गुप्त से कहा था कि हिंदी आलोचना क्षेत्र में एक नयी प्रतिभा का पदार्पण किया है आगे चल कर यह भविष्यवाणी सच हुई। 


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किसी का जीवन एक सा नहीं होता। उसमें कभी न कभी दारूण समय आता है। लेकिन एक कवि या लेखक के जीवन के त्रासद विवरण उनके संस्मरणों में मिल जाते हैं र उसे अतिरिक्त रंग भी दे दिये जाते हैं। हर एक व्यक्ति को अपने हिस्से का दुख झेलना पड़ता है। कवि –लेखक इस पीड़ा को महिमामंडित करते रहते हैं जबकि आम आदमी इसे प्रकट करने का मंच नहीं मिल पाता है। उसे वह अपने अंतरंग मित्रों के बीच जरूर बाँटता है। कुछ लेखकों को इस दुख को भुनाने की कला आती है



नामवर सिंह के जीवन के कठिन समय का विवरण काशी नाथ सिंह को लिखे गये पत्रों मे मिलता है लेकिन तफ्सील से उनकी किताब – का जोगी जोगड़ा,  में उनके जीवन के करूण प्रसंग मिलते हैं। इस कहावत को पूरा पढ़े – घर का जोगी जोगड़ा, आन गांव का सिद्ध। यानी नामवर सिंह को घर में महत्व कभी नहीं मिला लेकिन घर की बाहर की दुनिया में वे बहुत मशहूर हु। यह केवल नामवर सिंह के जीवन की बिडम्बना नहीं है यह प्राय: महान लोगों के जीवन की ट्रेजिडी है यह भी सच है कि मशहूर लोगो के आगे की पीढ़ी अपने पूर्वजों के बराबर कभी नहीं हो सकती



काशीनाथ सिंह को लिखे गये एक मार्मिक पत्र का एक अंश देखे ‌ -आज पहली बार आंखों में आये, तुम्हारे पत्र को पढ़ते समय ब जी कुछ हल्का लग रहा है। ुलसीदास ने ठीक ही लिखा है



पितु हित भरत कीन्ह जसि करनी सो मुख लाख जाइ न बरनी।।



भरत राम से अधिक भाग्यशाली थे और महान भी क्योंकि पिता के दाह-संस्कार का गौरव उन्हीं को प्राप्त हुआ। राम उम्र में बडे हुआ करें, लेकिन रहे वंचित ही



ऐसे ही नहीं तुलसीदास उनके प्रिय कवि नहीं थे उनके लिखे और कहे में तुलसी की चौपाई अक्सर मिलती है नामवर सिंह को भी तुलसी की तरह काशी में अपने विरोध का सामना करना पड़ा। अभी इंटरव्यू में उन्होने बताया कि उनके सिरहाने मानस का गुटका हमेशा मौजूद रहता है



नामवर सिंह का दाम्पत्य जीवन सुखी नहीं था।  उन्हें पत्नी, बेटे-बेटी से प्रेम नहीं मिला वे अपनी निसंगता में कैद रहे। इस अभाव की पूर्ति उन्होने पठन –पाठन से की और हिन्दी आलोचना समृद्ध हुई। यह केवल नामवर सिंह के जीवन की बिड्म्बना नहीं प्रसिद्ध लोगों के जीवन की दुर्घटना है। बड़े होने के लिए बड़ी कीमत अदा करनी पड़ती है इतिहास में ऐसे बहुत से उदाहरण मिलते हैं। टालस्टाय के वैवाहिक जीवन को याद करि, कैसे उन्हे अपना घर छोड़ना पड़ा था संभवत: यह उदाहरण कहीं नामवर सिंह ने दिया है राहुल,  नागार्जुन और रेणु के जीवन को देखि तो वहां यह अपूर्णता विद्यमान है





जीवन के इस अधूरेपन को लेखक अपने सृजन से पूरा करता है, वह नामवर सिंह ने भी किया। इसका फायदा साहित्य को मिला। यानी किसी के हिस्से में प्यास आयी, किसी के हिस्से में जाम आया। यही जीवन की गति है, जो कभी सदगति में बदल जाती है



नामवर सिंह और  काशी नाथ सिंह के सम्वाद के बीच में ऐसे तमाम स्थल है जो हमे द्रवित करते हैं। उन्हीं से वह दिल खोल कर बातें करते हैं। काशी नाथ सिंह उनके जीवन के सर्वाधिक निकट रहे है। उनका सम्वंध राम और भरत की तरह है। काशीनाथ सिंह भाई से ज्यादा उनके भक्त हैं। बल्कि वह उनके – पितु मातु सहायक स्वामी सखा है। वह उनके आदेश मानते थे तो दूसरी तरफ उनकी नाराजगी भी झेलते थे। कुछ लोग तो यह आरोप लगाते रहे कि काशी नाथ सिंह को कथा – साहित्य में जो महत्वपूर्ण स्थान मिला, उसके पीछे नामवर सिंह का हाथ है। यह आरोप निराधार है। काशी नाथ सिंह समर्थ कहानीकार हैं, वह अपने लेखन के बल पर स्थापित हुए हैं।


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नामवर सिंह ने विपुल लेखन नहीं किया है लेकिन जो लिखा है, वह महत्वपूर्ण है। वे मार्क्सवादी आलोचक थे लेकिन उनकी स्थापनाएँ उनसे वरिष्ठ आलोचक राम विलास शर्मा से भिन्न थी। दोनो आलोचको के वाद – विवाद हिंदी में कम मशहूर नहीं हु। इस मत – मतांतर से नये विचार पैदा हुए। देखा जाय ये दोनो आलोचक दो अलग –अलग ध्रुव थे। घनघोर असहमतियों के बावजूद व्यक्तिगत सम्बन्धों में कोई खरोच नहीं आयी । यह बडकपन आज के समय में दिवा – स्वप्न जैसा है। आज के समय में ज्ञान का अहंकार ज्यादा है। सूत न कपास जुलाहों में लट्ठम – लट्ठा। नामवर सिंह के जाने के बाद उनकी जगह हमेशा ही खाली रहेगी। उस मेधा का कोई आलोचक अब नहीं पैदा हो सकता। वैसी प्रतिबद्धता और जुनून सम्भव नहीं है। हिंदी में सुविधावादी लेखन ज्यादा है। कोई अभिव्यक्ति के लिए खतरे नहीं उठाता। आलोचना इस मायने में अन्य विधाओं से अलग है। वह गहन अध्ययन की मांग करता है। जे. एन. यू. के जिस विभाग में वे रहे अब उस पद पर कोई नामचीन व्यक्ति नहीं है। एक दौर था जब जे. एन. यू. उनके नाम से जाना जाता था । उसमें केदार नाथ सिंह, मैंनेजर पांडेय और पुरूषोत्तम अग्रवाल जैसे हिंदी के बुद्धिजीवी आलोचक थे। इन लोगों के बाद यह ज्ञानधारा ठहर गयी है। जे. एन. यू.  जैसी संस्थाओं में अभिज्ञान की नहीं जरूरत नहीं है। वहां अब ज्ञान- पिपासु कम ही आते हैं।



छायावाद’, ‘इतिहास और आलोचना’, ‘दूसरी परम्परा की खोज और कविता के नये प्रतिमान उनकी प्रमुख आलोचना ग्रंथ है। उन्हें सबसे ज्यादा प्रसिद्धि- कविता के नये प्रतिमान से मिली।  उन्होने मैले हुए प्रतिमान की जगह नये प्रतिमान गढ़े हैं। इस किताब से उन्होने मुक्तिबोध को स्थापित किया। रघुवीर सहाय, श्रीकांत वर्मा और विजयदेव नारायण शाही की कविता पर नये ढ़ंग से विचार किया। इस पुस्तक में अगर नागार्जुन, त्रिलोचन एवम केदार नाथ अग्रवाल की कविता पर विचार न किया जाना कुछ प्रगतिशीलों को जरूर बुरा लगा। यह आलोचक का चुनाव था। इस पर आपत्ति तो की जा सकती है लेकिन खारिज नहीं किया जा सकता। आलोचना मे कोई अवधारणा अमिट नहीं होती। समय के साथ उसमें बदलाव होता रहता है। यही तो वाद – विवाद – सम्वाद है, जो नामवर सिंह की आलोचना का पर्याय है।



दूसरी परम्परा की खोज उनकी लिखी हुई अंतिम आलोचना पुस्तक है। इसके बाद वे नियमित रूप से व्याख्यान की ओर प्रवृत हुए। उनके व्याख्यान आलोचना से कम महत्वपूर्ण नहीं थे। वे तैयारी के साथ व्याख्यान देते रहे। उनकी व्याख्यान सभा में कोई जगह खाली नहीं रहती थी। उनके पास मंत्रमुग्ध करने की कला थी। आलोचना जैसे शुष्क विधा को  उन्होने लोकप्रिय बनाया। उनके समकालीन लेखक उन्हें आलोचना के ओशो नाम से अलंकृत करते रहे। उनके अनुनायियो ने उनके भाषणों के अनेक संग्रह संग्रहीत किए – जिसे पढ़ना अपने समय और समाज को ठीक से समझने के अवसर देते हैं। उनके व्याख्यानों में सिर्फ साहित्य नहीं, दुनिया भर के विचारों और गतिविधियों की प्रतिध्वनियां सुनाई पड़ती हैं।



वे नयी कहानी और नई कविता के उदय काल के आलोचक थे। निर्मल वर्मा की कहानी परिंदे को उन्होने नयी कहानी का गौरव दिया और उषा प्रियम्वदा की कहानी – वापसी की सामाजिक संदर्भ में व्याख्या की। निर्मल वर्मा वामपंथी लेखक नहीं थे। लेकिन यह उनका आलोचकीय अतिक्रमण था – जो कम विवादास्पद नहीं हुआ। नयी कहानी हो या नयी कविता उन्होने उसे अपने लेखन से प्रतिस्थापित किया। नामवर सिंह जो कहे या लिखे, वह विवादस्पद न हो यह सम्भव नहीं था। लेकिन उनके विवाद के पीछे अचूक तर्कशास्त्र था, उसे यूं ही नहीं खारिज किया जा सकता है। वे जिसका नाम लेते थे, वह रातोरात मशहूर हो जाता था। बाद के दिनों में उनका यह जादू कम होता चला गया। उनके समीकरण बदल गये थे। नामांकन में सहूलियते ज्यादा थी – प्रतिभा कम। कुछ लोग अपना नाम लेने के लिए उन्हें विवश करने लगे। कुछ लोग इसे महाबली का पतन मानते थे। उनका सिंहासन डिगने लगा था। उनके भक्त ही उसे हिलाने लगे थे। उनके शत्रु सक्रिय होने लगे थे।


बड़े लेखको के जीवन में कम विचलन नहीं होते। लेखन में कोई हमेशा शीर्ष पर नहीं रहता। जिस सीढ़ी से कोई चढ़ता है उसी सीढ़ी से उतरना पड़ता है। कोई लाख उनकी आलोचना करे उन्हें खारिज करने की कोशिश करे, वह कामयाब नहीं हो सकता। किसी आलोचक या लेखक को आंशिक मूल्यांकन से नहीं जाना जा सकता, उसे समग्रता में देखना जरूरी होगा। जब भी इस तरह का प्रयत्न होगा, वह कसौटी पर खरे उतरेंगे। हिंदी आलोचना की कल्पना उनके बिना सम्भव नहीं होगी। आजादी के बाद की आलोचना में उनका नाम प्रमुख रहेगा।


उनकी मृत्यु के बाद उनकी आलोचना का मूल्यांकन आसान काम नहीं होगा। उनके लिए अलग शास्त्र की जरूरत होगी। उनकी आलोचना परम्परागत आलोचना नहीं है। उन्होने आलोचना विधा का अतिक्रमण किया है। इसमें विद्रोह के साथ विद्रूप भी हैं। वह अपने समय और समाज में नये विचार के साथ प्रवेश करते हैं। नामवर सिंह पर लिखते हुए मुझे अल्लामा इकबाल का यह शेर याद आता है – 


हजारों साल  नरगिस अपनी बेनूरी पे रोती है
बहुत मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा।



इस शेर के अंत की पक्तियों में थोड़ा फेर–बदल कर कहा जा सकता है – बहुत मुश्किल से होता है हिंदी में नामवर पैदा
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