यतीश कुमार की कविताएँ

यतीश कुमार
 
 
दृष्टि सम्पन्नता किसी भी कवि को उसके समय के अन्य कवियों से अलग खड़ा कर देती है। अपने समय को सूक्ष्म दृष्टि से देखना और उसे शब्दबद्ध करना आसान नहीं होता। लेकिन कवि तो वही होता है जो इस कठिन चुनौती को स्वीकार करता है। इस चुनौती को स्वीकार करने वाला कवि ही दूर तक का सफ़र तय करता है। अनुभवजन्यता के साथ-साथ कल्पनाशीलता को बरतने का हुनर यतीश कुमार को कवियों की भीड़ से अलग खड़ा करता है। यतीश की इन पंक्तियों को देखिए : 'सच तो ये है कि/ सारी जीवंत उत्पत्ति/ दबाव में आ कर उभरती है/ चाहे कोख में शिशु हो/ या ज़मीन के नीचे पड़े/ बीज का अंकुरण'। यतीश कुमार ऐसे ही कवि हैं जो दबाव को कविता में साफ़गोई से उकेरते हैं। आज पहली बार पर प्रस्तुत है यतीश कुमार की कविताएँ
 


यतीश कुमार की कविताएँ
 


देह, बाज़ार और रोशनी - 1



उस कोने में धूप 
कुछ धुँधली सी पड़ रही है

रंगीन लिबास में मुस्कुराहट 
नक़ाब ओढ़े घूम रही है 

उस गली में पहुँचते ही
बसंत पीला से गुलाबी हो जाता है

इंद्रधनुषी उजास किरणें
उदास एकरंगी हो जाती है

और वहाँ से गुज़रती हवा
थोड़ी सी नमदार
थोड़ी सी शुष्क 
नमक से लदी 
भारीपन के साथ
हर जगह पसर जाती है

हवा में सिर्फ़ देह का पसीना तैरता है 

दर्द और उबासी में घुलती हँसी 
ख़ूब ज़ोर से ठहाके मारती है 
सब रूप बदल कर मिलते है वहाँ

सिर्फ मिट्टी जानती है
बदन पिघलने का सोंधापन
और बर्दाश्त कर लेती है
हर पसीने की दुर्गन्ध

उन्ही मिट्टियों के ढूह पर
बालू से घर बनाता है 
एक आठ साल का बच्चा
और ठीक उसी समय
एक बारह साल की लड़की
कुछ अश्लील पन्नों को फाड़ती है
और लिखती है आज़ादी के गीत

पंद्रह अगस्त को बीते 
अभी कुछ दिन ही हुए है


देह, बाज़ार और रोशनी २


वक़्त से पहले 
अँधेरा दस्तक देता है
शाम होते होते सभी खुद को
पेट के अंधेरे में गर्त कर लेते हैं

रंगीन कमरों से निकलती रोशनी
आँगन में धुँधली
और दरवाज़े पर अंधी हो जाती है

बच्चा वहाँ जन्मा जरूर
पर दूध कौन पिलाएगा 
यह तय नहीं है

माँ मुट्ठियों में वक़्त को धकेलते
भोर के पहले पहर मिलती है
उस वक़्त दिखते हैं अजनबी चेहरे 
देहरी से बाहर भागते-फिरते 

दोपहर तक खिलखिलाहट में 
नमकीन मुस्कुराहट पनाह पाती है
और शाम होते ही 
सर्प की तरह फिर से फ़न फैलाती है
हर शाम ज़िंदगी
अपनी परिभाषा भूल जाती है
सिसकियों में घुली खिलखिलाहट
रात भर बेसुरा गीत गाती है

तभी रात कब्र में दफन आठ साल का लड़का
कुछ बासी फूलों में सांस फूँकता है
और ग्यारह साल की लड़की के हाथों में सौंप देता है
कब्र के स्याह अँधेरें में एक जोड़ी आँखें चमक उठती हैं।
 



देह, बाज़ार और रोशनी ३
 
 
असमय फूल अक्सर यहाँ खिल जाते हैं
फूल खिलना यहाँ एक दर्दनाक हादसा है
अगर खिल गए 
तो मसल भी दिए जाते हैं
तब खिलती मुस्कुराहट पर
सुर्ख़ छींटे भी पड़ जाते हैं

बदलते दृश्यों में 
अजीब सी बौखलाहट तैरती  है
भावनाएँ यांत्रिक बन मुखौटे लगाती हैं

पेट से पूरे बदन पर 
चढ़ती आग की भी एक उम्र होती है 
उम्र की साँझ पर तपिश 
पेट से ही चिपकी रह जाती है 
बदन पर नहीं उतरती
और तब इंतज़ार मौत से भी बदतर लगती है

अकेला खड़ा तुलसी चौरा 
कभी आँखे बंद नहीं करता
आँगन में मुस्कुराता चहबच्चा
सारे आँसुओं को ज़ज्ब कर लेता है
वह कभी नहीं सूखता 
बस दाग़ धोता रहता है 

इन्हीं दृश्यों के बीच 
आठ साला बच्चा 
ढ़ूह की मिट्टी
मस्तक पर लगाता है
और ग्यारह साल की लड़की ने अब
उसकी उंगली सख़्ती से पकड़ ली है।



देह, बाज़ार और रोशनी ४


धुँध नीम अंधेरे में 
झीमती आँखों के बीच
कुछ तारे टिमटिमा रहे हैं
बालू के ढेर पर
लोहा पिघलाने की तैयारी चल रही है

आठ साल के बच्चे ने अब
पत्थरों को तराशना सीख लिया है
उन्हीं मूर्तियों में ग्यारह साल की लड़की 
अब  रंग भर रही है

वे गोबर में जन्में कुकुरमुत्ते हैं
बिल्कुल सफ़ेद शफ़्फ़ाक 
एक चिंगारी की तरह 
सूरज की ताप बनने की यात्रा है

सोच में जमी हुई बारूद 
अब पिघलने लगा है
चित्त की शीतल परतों पर हलचल है
बाह्य और भीतर एकमेव हो जाने को है
इस संगम से एक नए आन्दोलन का 
उद्बोधन होने वाला है 

भँवर में पतवार मिल चुका है उन्हें
चिंगारी विस्फोट के लिए तैयार है
स्वतंत्रता का सही अर्थ 
तराशने की यात्रा है अब

और ऐसा ही हुआ
पंक से निकले अरुण कमल ने
पूरे पोखर को एक उपवन बना दिया 
और अब वहाँ फूल खिलने से 
दर्द नहीं उमंग की अभिलाषा होती है 

परंतु इस शहर में कितने वनपोखर हैं 
जिन्हें एक अरुण कमल का इंतज़ार है
 



दबाव और सृजन 

पहाड़ बनते देखा है कभी
या नदी बनते देखी है 
नक्षत्र में सितारे जुडते देखे हैं कभी
या जंगल का सृजन होते देखा है 

दुखों के पहाड़ भी
अनदेखे खड़े हो जाते है 
भावना की नदी भी
बिन बताए अनचाहे बह जाती है

तने का फैलाव 
और लदे फल का झुकाव
तो सब देखते हैं
पर मिट्टी के दबाव में 
बीज का अंकुरण
और जड़ का संतुलन
कोई नहीं देखता

जनता के हालात तो दिख जाते हैं
पर भीड़ के हालात 
राजतंत्र को भी नहीं दिखता
भीड़ को बनते नहीं
बल्कि भीड़ को दिशाहीन होते 
सब देखते हैं

पहाड़ को उजड़ते
नदी को सूखते-भटकते 
उल्कापिंडो को गिरते और भस्म होते 
सबने देखा है 

सच तो ये है कि 
सारी जीवंत उत्पत्ति
दबाव में आ कर उभरती है
चाहे कोख में शिशु हो
या ज़मीन के नीचे पड़े 
बीज का अंकुरण

सृजन दबाव का विस्तार है
पर दबाव को कोई 
देखना नहीं चाहता

 

स्मृति में कुआँ


उसकी दीवारें बोलती थीं 
और आँगन भी चहचहाता था

बालटियों की ताल पर 
पायल और चूड़ियों की जुगलबंदी भी थी

असल में वो कुआँ 
हमारे प्रेम में अंधा था

बचपना उसकी आग़ोश में
किलकारियाँ भरता था
माँ की उससे 
बहुत ज़्यादा बनती थी 
वो दिल की सारी बातें 
उससे सहज कह देती थी
वो भी चुपचाप सब
सुन लेता था

वो माँ की तरह ही था
मन की बात समझता था
मौसम के मिज़ाज को देख
पानी की तासीर बदलता था

वर्षों बाद लौटा हूँ
तो देखता हूँ
पत्तों ने उसके आँगन को ढाँप दिया है
और दीवारों के गासों में अब
कई पेड़ और जड़ें उग आई हैं
वो बस 
शिकायतों की पोटली बांधे
आँखे मूँदे चुपचाप पड़ा है

वहीं बग़ल वाले काका की 
झोपड़ी पर 
इंटे की छत उग आयी है
और कुएँ की सिसकियों से ज्यादा
टुल्लु पम्प के घों घों का शोर है

बड़ीं हिम्मत करके मैं
सूखे कुएँ में झाँकता हूँ
वो कुआँ हल्का सा मुस्कुराता है

कुएँ का प्रतिबिम्ब
मेरे अंदर भी
सूखे पानी में नज़र आता है



पिता

पिता मेरे कंधे की 
एक टहनी टूट गयी है
प्रौढ़ वृक्ष हूँ मैं अब
और मेरी घनी लदी शाखाओं में
कोई छिद्र  तक नहीं दिखता
सूरज की महीन रोशनी भी 
इसे भेद नहीं पाती

पिता मेरा लदा हुआ होना 
मेरी स्थिति का द्योतक है 
समय से ज़्यादा 
स्वयं के भार में 
तुम्हारे दबे होने का अहसास लिए
फलता फूलता हूँ मैं

आज अचानक चटकी टहनी में 
तुम्हारी पीड़ा और जंग लगे दर्द 
अपने हस्ताक्षर करते दिख रहे है

तुम्हारे धज़ को रेशा दर रेशा बिखरते 
मूक देखता था कभी
और विशाल तुम्हारे आग़ोश से 
अपनी स्वतंत्रता का उदघोष 
थाली पीट कर किया था मैंने
मेरी स्वतंत्रता का एक तमाचा
आज चेहरे के बाई ओर दिख रहा है 

पिता तुम्हारी टहनियों और पत्तों को
रोज़ गिरते झरते देखता था 
वो पत्ते रोज़ गिर कर 
मेरे पथ के काँटों को ढाँपते थे 
मैं पत्तों को देखता था 
पर काटों ने कभी
अपनी शक्ल नहीं दिखाई
आज जब तुम्हारे सारे पत्ते झर चुके है 
तो पहली बार काँटे ने मुझे डसा है
और आज ही मेरे कंधे की
पहली टहनी चटकी है 



जाति

बचपन में 
किसी ने जूते की नोक से
दर्द चुभो दी थी
उस टीस से
अब तक मैं रोज़ सिका हूँ
इतना पका हूँ
कि सोच की लचक ने 
खाल पहन लिया है

आँखें बंद करता हूँ
जूतों की वही खट खट
कानों से धड़कन की 
धक धक को जोड़ देती है 
उस खट खट में आवाज़ों तले
अपनी माँ को
घंटों लड़ते देखा था

जाति से जूतों का संबंध 
और जूतों की संख्या 
ऐसा प्रतीत होता है
कि जैसे हज़ारों घोड़े
धान की बीचरे रौंदते जा रहे हो
कीचड़ के छींटे
पानी के छींटे 
और ख़ून के भी 
खाट के पीछे छिपे मेरे चेहरे तक उड़कर आ जाती

कुचलने की पुरज़ोर कोशिश के बीच
अपने दुम और फ़न
दोनो ही बचा लिए है मैंने
हिस्से में रह गया एक अमिट चोट का धब्बा 
और
टक़ टक़ की आवाज है
पीछा ही नहीं छोड़ती।
 
 
सम्पर्क 
 
मोबाईल : 8420637209
 
 
(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स वरिष्ठ कवि विजेंद्र जी की हैं।)
 

टिप्पणियाँ

  1. एक साथ इतनी सारी कविताएँ। वाह! सब एक से बढ़कर एक। मज़ा आ गया।
    मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।
    iwillrocknow.com

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. शुक्रिया इसे पढ़ने के लिए ।दिल से दिल दिलतक बात पहुँच पा रही हो तो मैं सफल राह पर हूँ

      हटाएं
  2. यतीश जी की सारी कविताएं पसंद आईं।
    इन कविताओं पर 'पहली बार' की टिप्पणी भी।
    ■ शहंशाह आलम

    उत्तर देंहटाएं
  3. यतीश जी की कविताओं में सघन वैचारिकता की अन्तर्धारा बहती हुई सुनाई देती है।यही उनकी कविताई का प्राण भी है।ध्यान रखने योग्य यह भी कि उनके कहन की बेलीकियत अर्थ को ताजगी देती चलती है ,जिससे भाव और ज्ञान दोनों स्तरों पर पाठक मन समृद्ध होता चलता है।

    उत्तर देंहटाएं
  4. कोई पांचवी-छठी बार इन कविताओं को पढ़ने के बाद जब मैं यह टिप्पणी लिख रहा हूँ तो रात के तीन से अधिक बजे रहे हैं. कथ्य, शिल्प-विधान अथवा ट्रीटमेंट की नोक पर जब कविता किसी आदमी के पाठकीय चित्त को हैक कर ले तो मेरी दृष्टि में यह उस कविता की सफलता और सार्थकता दोनों है.

    यतीश कुमार जी की कविताएँ मूलतः ऑब्जर्वेशन की कविताएँ हैं. लेकिन साथ ही यह स्मृतियों की अंतर्यात्रा और मोहभंग की भी कविताएँ हैं. पहली लंबी कविता के चारों अंशों के कई-कई अन्तरपाठ हो सकते हैं. 'देह, बाज़ार और रोशनी' को आप चाहें तो कोमोडिटी, ग्लोबलाइजेशन और प्रेम भी पढ़ सकते हैं. 'दवाब और सृजन', 'स्मृति में कुआँ', और 'जाति' भी अच्छी कविताएँ हैं. बल्कि इन चारों के मुक़ाबले 'पिता' शीर्षक कविता अपने क्लीशे में बहुत अधिक भिन्न नहीं है.

    भाषिक चमत्कार की क़वायद में मसरूफ समकालीन कविता के इस उबाऊ समय में भाषा के बिल्कुल सहज प्रयोग की रचनात्मक घटना वाक़ई चमत्कृत करती है. कई मुहावरे मौलिक और बेहतरीन हैं, जो कविता को विजुअलाइज करने में मददगार हैं. उन में से कुछेक पँक्तियों को उनके कवि-परिचय में उध्दृत भी किया गया है. हलांकि एक पढ़ाकू साहित्यानुरागी के तौर पर उनको पहले से जानता था लेकिन उनके सहज और गंभीर कवि से सँभवतः यह पहला साक्षात्कार है. बतौर पाठक इसे मैं निजी नुकसान मानता हूँ. ये कविताएँ आगाह करती हैं कि उनको अब अधिक सजगता से पढ़े जाने की दरकार है. पुनः निरंतर और सार्थक लेखन के लिए आशापूर्ण बधाई!

    प्रभात मिलिन्द

    उत्तर देंहटाएं
  5. इन कविताओं को पढ़ने के बाद,तुरन्त कुछ कहना ज़रा जल्दबाज़ी सी होगी। हर कविता अपने आप मे पूर्ण और शब्दों के माध्यम से पाठक को उसी जगह ले जाने में पूर्णरूप से सक्षम।
    *देह,बाज़ार और रौशनी *इस सीरीज़ की चारों कविताएँ ,नीमतल्ला जाते या आते देखी हुई उन दबड़े नुमा कोठरियों से झांकती बेज़ान आँखों के सूनेपन की याद एक कसक के साथ महसूस कराती है,तो अंत में एक उम्मीद भी देती है कि शायद बाज़ार से इतर कभी देह मन भी हो जाये शायद।
    दबाव में सृजन ये तो अपने कवि भाई के अंदर भी है ।जाति एक कसक है ।तो स्मृतियों का कुआँ आज भी मुस्कुराता सा ,इस कुएँ के मुंडेर पर हाथ रख अंदर हर वो पाठक झांकना चाहता जो कभी कुएँ से एक बूंद याद सहेजना चाहता हमारी तरह।
    सबसे ज्यादा जो कविता मेरे साथ जा रही स्मृतियों के कुएँ से अपनों को तलाशती वो है *पिता*...शायद दिखते हैं इसमें पापा
    कवि के रूप में इसी तरह रचते रहें आप और पाठक सम्रद्ध होते रहें इस आशा के साथ
    आशा पांडे

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. दीदीया दिल की लिखी बातों को आपने दिल से महसूस किया है ।बहुत संजीदगी से कविता के अर्थ के अंतस में उतर कर आपने सार्थक कार दी इस कवि भाई की इस लेखनी को।
      आपका आभार तो कह भी नहीं सकता मैं

      हटाएं
  6. इन कविताओं ( खासकर "देह,बाजार और रोशनी )से होकर गुजरना उन कोनों, अंतरों के पीले, मुरझाए ,जर्द पड़े स्याह स्थलों की दर्द और पीड़ा भरी यात्रा है ,जहाँ जिंदगी की धुप धुंधली पड़ती है।जहाँ से गुजरती हवा भारीपन और नमक से लदी हुई होती है ,जहां हवा में देह पसीने की गंध तैरती रहती है, जहाँ हँसी भी दर्द और उबासियों में लिपटी रहती है।यह हमारे इसी संसार का वह अलक्षित कोना है जहाँ सिसकियों में घुली हुई मुस्कराहट रात भर बेसुरा गाती रहती है।
    इन कविताओं की यंत्रणादायक यात्रा परेशानी में डालती है, बेचैन करती है, आपकी सम्वेदना को विस्तारित करती है।

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपकी संवेदना आपके लिखे उत्तर में छुपी है ।
      आपने वो सब महसूस किया जिसे मैंने महसूस किया और लिखा।
      शुक्रिया कह कर औपरिचकिता नहीं निभाऊँगा अपितु आपकी सुलझी समझ का क़द्रदान हूँ मैं अब

      हटाएं
  7. धुप के धुंधलेपन में रंगीन लिबासों की नकली मुस्कराहट के साथ हवा में तैरती पसीने की गंध व दर्द और उबासी की लहक के दरमियान एक आठ साल के बच्चे का बालू का घर बनाना और ग्यारह साल की लड़की का अश्लील पन्नों को फाड़ कर आज़ादी का गीत लिखना – अद्भुत है |
    और शाम होते होते सभी का खुद को पेट के अंधेरे में गर्त कर लेना जिस पीड़ा को व्याख्यायित कर रहा है उसे कैसे संप्रेषित करूँ| लेकिन यहाँ भी बासी फूल में सांस फूंकना और फिर आँखों का चमक जाना कितनी गहरी वेदना जगाता है मन में|
    आँसूओं का जज़्ब होना, पत्थरों को तराशना सीख लेना जिंदगी को एक नई उम्मीद देता है, यात्रा को रौशनी..कि अरुण कमल खिलेंगे किसी एक दिन...क्योंकि कुएँ का प्रतिबिम्ब अब भी अन्दर के सूखे पानी में दिख जाते हैं जो संभावनाओं को विस्तृत कर रहे हैं|
    पिता की पीड़ा को बखूबी उकेरा है कवि ने| एक पिता का ह्रदय समझना इतना आसान भी कहाँ|
    जाति कविता मुझे ज़्यादा तीखी लगी|
    यतीश, आप भाव-पक्ष के कवि हैं| आपकी कविताएँ पीछा नहीं छोड़ेंगी... ये सच है|

    उत्तर देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

कुँवर नारायण की कविताएँ