भरत प्रसाद की कविताएँ


भरत प्रसाद
'आदमी होने के तमाम ऋण होने' को बिरले ही पहचान पाते हैं भरत प्रसाद ऐसे संवेदनशील युवा कवि हैं जिन्होंने अपने इस दायित्व को पहचाना है शायद यही वह भाव है जिससे यह कवि साहसपूर्ण ढंग से यह कह पाया है कि 'उठ गया है यकीन, अपने ही फैसलों से/ नफ़रत हो उठती है- अपने रेडीमेड मकसद से' आज जब लोग अपनी स्वार्थ-सिद्धि के लिए तमाम दाँव-पेंच करने से नहीं चूकते तब कवि को सहसा अपने ही रेडीमेड मकसदों पर सन्देह हो आता है आत्मश्लाघा वाले दौर में हम सबके लिए यह एक आश्वस्ति की तरह है ऐसे ही आश्वस्ति वाले कवि भरत प्रसाद की कविताएँ प्रस्तुत है आप सब के लिए        

भरत प्रसाद की कविताएँ 

मैं कृतज्ञ हूँ

मैं कृतज्ञ हूँ उन शब्दों का
जिसने मुझको गढ़ा- तराशा,
तोड़ा-मोड़ा, जिंदा रक्खा,
मैं कृतज्ञ हूँ उस माटी का
जिसने मुझको सांसें सौंपी
पाला-पोसा, बड़ा कर दिया
मैं कृतज्ञ हूँ उन फसलों का
जिनकी ममता, जीवन बन कर
मेरी रग में दौड़ रही है।

धूप-छाँव, सन्ध्या-प्रभात का
सर्दी, गर्मी, वर्षा ऋतु का
मद्धिम, तेज हवाओं का भी
अंग-अंग पर कितना ऋण है?
तन में घुस कर, घुल कर, मिल कर
मन में कितना राग भर गयीं?

जाने कितने पीपल, बरगद?
जाने कितने जन्तु, जानवर?
जाने कितने पतझड़ मौसम?
जाने कितनी शुष्क झाडि़याँ?
शिल्पकार हैं इस शरीर की।

आँखों के आँसू पर मेरे
जीवित गुमनामों का ऋण है,
चेहरे की जुबान पर मेरी
गूंगी आत्माओं का भार?
आभारी है दिल की धड़कन
आज उमड़ता ऋण का ज्वार।

जड़-चेतन का, वन-पर्वत का
समतल-उबड़-खाबड़, बंजर
घाटी, मरूथल, बियावान का
रोम-रोम से कर्जदार हूँ
साँस-साँस से मैं कृतज्ञ हूँ,
मैं कृतज्ञ हूँ -
मैं कृतज्ञ हूँ।

और उम्र चाहिए

नहीं है संतोष, अपने जीने के अंदाज से
नहीं है सुकून, अपनी शरीर की चाल से
उठ गया है यकीन, अपने ही फैसलों से
नफरत ही उठती है- अपने रेडीमेड मकसद से
अपने विश्वास से
बगावत करने का जी करता है।
अंग-अंग विद्रोह करते हैं
मन की गुलामी से
पक चुकी है आत्मा
बुद्धि की मनमानी से
बढ़ई की तरह
खुद को गढ़ने का जी क्यों करता है ?
अनसुना ही करता रहा
गुलाम कदमों का विलाप
पीछा छुड़ा कर भागता रहा
अपनी ही दृष्टि से
जीवन भर भुलाता रहा
अन्तर्मन के सवाल
सीमाओं से आजाद होने को
तड़प उठता है हृदय।
बीत रही उम्र
ज्यों हार रहा हूँ युद्ध
बीत रहा है जीवन
ज्यों भागता है कायर।
पृथ्वी को अपने भार से
मुक्त करने के पहले,
उतार देना चाहता हूँ
आदमी होने के तमाम ऋण
इस जहाँ के पागलपन में
बहा देना चाहता हूँ
रोवां-रोवां से जीवन भर के आँसू
फिर हमें कहाँ मिलेगी?
इतनी बेजोड़ पृथ्वी
चाहिए ही चाहिए,
हमें और उम्र चाहिए
ताकि मैं
जी भर कर पछता सकूँ
खुद को दण्डित कर सकूँ
धिक्कार सकूँ
बदबू की तरह बस्साते
अपने जहरीले कर्मों पर
हिक्क भर थूक सकूँ।



              

इस प्रभात में

जीवन में पहले दिन की तरह आता है
प्रातः काल
देखो, तो किसकी मुस्कान पा कर
जी उठता है दिक्-दिगन्त?
इस सुबह के लिए ही
धरती के नाचने का रहस्य
अब समझ में आया
कूट-कूट कर भरा है इस रोशनी में प्राण
इसके अणु-अणु में भरा हुआ है अमृत रस
पृथ्वी तो क्या ? समूचे ब्रह्माण्ड में
असम्भव है जीवन इसके बिना।

प्रकाश के महामौन में छिपी है
धरती के हरेपन की गाथा
समाया हुआ है इसमें
समुद्रों, नदियों की मानवता का इतिहास
मानव-सृष्टि अपनी प्रत्येक सांस के लिए
इस प्रकाश की ऋणी है।
धीरे-धीरे बीज, कैसे बन गये वृक्ष?
चुप्पी साधे फूल, कैसे बन गये फल?
अरे, अरे! पृथ्वी के दूधिया दाने
अन्न में कैसे तब्दील हो गये?
आइए, पूछते हैं रोशनी से इसका रहस्य
कण-कण में संजीवनी की तरह उपस्थित
इस सृष्टिकर्ता का जादू
बार-बार क्यों बजता है?

आँखें ही नहीं,
बुद्धि, विवेक और आत्मा भी अंधी हो जाती है
रोशनी के बग़ैर
रूह की खुराक है यह
जान में जान फूंकने वाली उर्जा
चेतना की जननी,
तन-मन को समर्पित यह रोशनी
ईश्वर से कई गुना ईश्वर है।
ब्रह्माण्ड के कोने-कोने को
जीत लेने वाली यह रोशनी
मनुष्य के हाथों रोज-रोज मर रही है
खत्म हो रहा है इसमें जीवन बोने का जादू
हमारा अंधकार पराजित करने लगा है इसे
सचमुच पीला पड़ने लगा है इसका शरीर
सुन सको तो ग़ौर से सुनो
रोशनी भीतर से टूट रही है,
खो रही है ममता
सिर्फ एक पृथ्वी के आगे
घुटने टेकते हुए
मानो दसों दिशाओं में चीख रही है।
 

                          
आओ! मुझमें साकार हो जाओ

तुम्हारे माथे का पसीना
हमारे हृदय में खून की तरह चूता है
तुम्हारी मात खाई हुई आंखें
ललकारती हैं हमें,
काठ हो चुके चेहरे का मौन
हमें अपराधी घोषित कर चुका है,
मस्तक पर जमी ही रहती थी,
पराजय-दर-पराजय
लहूलुहान ही रहता था
घाव खाया हुआ हृदय-
हमारी माँ जैसी माओं वाला माईपन
तुम्हारी माँ भी था
वैसी ही सिधाई
बछड़े के लिए हूबहू गाय जैसी डंकार
सन्तान के ऊपर
अग-जग को न्यौछावर करने वाली
वैसी ही अहक,
भाई !
किस कलेजे से सहते थे ?
बंधुआ कहलाने का दर्द
किस हिम्मत से पीते थे ?
अछूत कहलाने का अपमान
वह कौन सी बेवशी थी ?
जिसने तुमसे तुम्हारी जुबान ही छीन ली
अपनी कद-काठी से
आजीवन दुश्मन की तरह पेश आने वाले
तुम किस मिट्टी के बने थे- सुक्खू?
घर-गृहस्थी के हर मोर्चे पर
एक योद्धा से बढ़ कर लड़े
रोजी-रोटी की महामाया में
खुद को नचा मारा,
तुम्हारी अकाल मौत से
खुद के खूनी होने की आहट
क्यों सुनाई देती है ?
आओ ! अपनी मौत के बाद
मुझमें साकार हो जाओ,
जी उठो मेरे आत्मधिक्कार में
उठ बैठो मेरे वजूद में
पुकारो मेरी बहरी हो चुकी आत्मा को
चूर-चूर कर डालो मेरा पत्थरपन
आओ जिलाओ मुझे
आओ..........।





मैं हार-हार जाता हूँ
झटक कर फेंकना चाहता हूँ
पल-पल दबोचते हुए हजारों भय
इन्कार करना चाहता हूँ
जोर-जुगाड़ से मिला हुआ, एक-एक मुकाम,
लो, वापस लौटाता हूँ
बे-सिर पैर की तारीफें
जो मुझसे स्वार्थ साधने के एवज में मिलीं
सीखना ही है मुझे, पानी पीने के लिए-
कुआं खोदने की कारीगरी।
बेखौफ हो कर धरती पर नाचते
 मज़हबी जुनून को देख कर
सिर फोड़ लेने का मन करता है,
दिल करता है, शूल बन कर धंस जाऊँ,
दहशतगर्दीं के सीने में,
हर कट्टरता को सरेआम
नंगा कर देने का जी करता है।
अंधकार के खिलाफ जि़द में,
मुझे कोई हिला कर तो देखे,
नहीं झुक सकता,
मायावी चेहरों के खिलाफ
मेरा तना हुआ माथा
अब नहीं बुझने वाली
खूनी भेदभाव के विरूद्ध
उठी हुई चिंगारी
अपने भीतर के इंकार को मार डालना ही
असली मृत्यु है।

मगर, अवाक् रह जाता हूँ
मौत से पहले
बेख़ौफ हो कर चमकती
बेकसूर आदमी की आँखें देख कर,
टूट कर बिखर जाता हूँ
लाखों टूटते हुए कदम देख कर
लरज जाता हूँ
अंग-अंग से बहने को बेताब
अपने ही आँसुओं की सिहरन से,
सह नहीं पाता
दंगे में परिवार खो चुके
एक भी लावारिश बच्चे का विलाप
मुझे तोड़ देने के लिए
भय से गूंगा हो चुका एक चेहरा ही काफी है,
मुझे पता है
मैं अपनी मौत से नहीं मरूँगा
कभी मरती हुई नदियाँ,
कभी मरते हुए जंगल
कभी गुलाम-दर-गुलाम होती हुई पृथ्वी
कभी पसीने से तरबतर चेहरे पर
मुरझाई हुई मानवता,
इस पर भी लम्बी उम्र जीने का कायरपन
मुझे बार-बार मारेगा।


कहाँ हैं आँखें ?

आँखें ?
कहाँ हैं आँखें ?
असलियत इनसे दिखाई देती है क्या ?
मन के अंधेपन की गुलाम हैं ये
खुदगर्जी की पर्तों से ढंकी हुईं
आवारा इच्छाओं की दासियां
कौन कहता है- आँखें देखती हैं ?
कौन कहता है- आँखें हमें अंधा नहीं करतीं?
हमारी आँखें, क्या अंधे की आँखें देख पायीं?
क्या देख लिया हमारे भीतर का नाटक?
क्या समझ लिया जीवन में रात-दिन का खेल?
आँसुओं के बहाने किसी के खून रोने का रहस्य
ये आँखें क्या जाने?
सही वक्त पर
ये कितना कायर हो जाती हैं?
जानने लगा हूँ
सर्वनाश से भरी हुई इनकी अदा
पहचानने लगा हूँ-
छिपाने की तमाम कोशिशों के बावजूद
पकड़ में आ ही जाती है इनकी चाल
फुफकार से भरी हुई आँखों की शालीनता
कितनी भयानक होती है?
आकाश को भूख की तरह
पुकारने वाली आँखें कहाँ गयीं?
कहाँ गयीं वे आँखें,
जो मिट्टी की पुकार सुन कर पागल हो जाती थीं
कण-कण में प्राण खोजने वाली निगाहें
कहाँ खो गयीं ?
धरती खाली हो रही है
दिवानी आँखों से;
निकाल लो अपनी आँखों से
सिर्फ अपना ही अपनापन
देखो तो, वक्त से पहले
कितना बूढ़ी हो चली हैं आँखें?
रात-दिन के पीछे, मौत की आहटें
चुपचाप सह लेने वाली निगाहों को
अभी, इसी वक्त बदल डालो।



सम्पर्क- 
मोबाईल- 09863076138

टिप्पणियाँ

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (08-12-2014) को "FDI की जरुरत भारत को नही है" (चर्चा-1821) पर भी होगी।
    --
    सभी पाठकों को हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. भरत प्रसाद की सुन्दर कविताएँ प्रस्तुतीकरण हेतु धन्यवाद!

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  3. जीवन और कविताओं से सम्वेदनायें गायब हो रही है लेकिन भरत प्रसाद की कवितायें पढकर यह आश्वस्ति होती है कि अभी बहुत कुछ बचा हुआ है.

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  4. Vandana Dev Shukla

    भरत प्रसाद जी के लेख पढ़े थे लेकिन कवितायेँ पहली बार ही पढी हैं ...अच्छी कवितायेँ ..विशेषतौर पर मैं हार हार जाता हूँ ,और उम्र चाहिये ,और कहाँ हैं आँखें बहुत अच्छी लगीं ...धन्यवाद संतोष जी

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  5. महाभूत चन्दन राय

    hmare padhe gaye samay ko apna rini bna le rhi hain kavitayen...alg si damakti hui..!!!

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  6. Ramesh Prasad Shukla

    "Aadami hone ke tamaam rina hone" kitana marmik sach hai.kash! log iss vishay ko gambhirata se lete Itani sashakt kavita jo jhakjhor kar rakh de rahi hai.issake liye aap ko bar-bar dhanyavaad.
    Samaj ke prati sochane ko vivash kar de rahi hai. Yah kavita padh kar man aahladit ho raha hai.kahan hain desh ke ve tamam tathakathit kavi jo iss par tippani nahi kar rahe hain.ho sakata hai unaki samajh me yah kavita starheen ho.andhe ko to duniya andhi hi lagati hai

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