भाविनी त्रिपाठी की लघु-कथा 'तस्वीर'






साहित्यकार की चौकस निगाहें चारों तरफ रहती हैं। न जाने कौन सी घटना उसे अपने लिखे जाने के लिए बेचैन कर दे। अभी हाल ही में सोलह दिसंबर को पूरी दुनिया तब स्तब्ध रह गयी जब तालिबानी आतंकवादियों ने पेशावर के आर्मी स्कूल पर धावा बोल कर 132 मासूम बच्चों को मार डाला। समूचे विश्व में इस पर कड़ी प्रतिक्रिया हुई और प्रायः सबने आतंकवाद के इस क्रूर चेहरे से जूझने का संकल्प लिया।

भाविनी त्रिपाठी जो छात्रा बी0 टेक0 की द्वितीय वर्ष की छात्रा हैं, भी इस घटना से काफी उद्वेलित हुईं। पहली बार की इस युवतम रचनाकार ने ‘तस्वीर’ नाम की अपनी यह ताजातरीन लघु-कहानी जब मुझे सुनाई, तो मैं इनकी संवेदनाओं से हिल सा गया। कहानी के अन्त तक आते-आते हम सिहर से जाते हैं। आप कहानी पढ़ कर इसका अंदाजा खुद लगा सकते हैं। तो आइए पढ़ते हैं भाविनी की यह लघु-कहानी।        
    
तस्वीर


भाविनी त्रिपाठी
 
उस अंधेरे कमरे  में सूर्य की किरणें आरजु़ओं की सुराखों के सहारे आहिस्ता-आहिस्ता पैठ रहीं थीं। कलीम के कु़छ-कुछ फटे हुए दस्तानों से झाँकती नन्हीं अंगुलियाँ उस चीर की  लकड़ी से बने ताबूत-नुमा बक्से में शिद्दत से कुछ तलाश रही थीं। अम्मीज़ान की सबसे  कीमती शलवार  कमीज़ के नीचे उसे आखिर रंगों का वह थैला मिल ही गया। कलीम के मासूम  चेहरे  पर  बचपन की उस बेहद सस्ती या शायद  मुफ्त, मगर सबसे खूबसूरत मुस्कान का राज्य स्थापित हुआ। नन्हें कदमों की चुहलती तेज़ी से वह तोशखाने  में पहुँचा और अम्मीजान के पैरों से लिपटा हुआ अपनी तोतली ज़बान में बोला- ’’अम्मी! आज हम स्कूल में तस्वीर बनाएँगे।‘’   


प्यार से उसके काकुलों को सहला कर, माथा चूम कर माँ ने उसके झोले में टिफ़िन डाला और निकल पड़ा नन्हा कलीम, स्कूल।

स्कूल में टीचर साहिबा ने सब को कागज़ दिए। सारे बच्चे अपनी पसंद की तस्वीर बनाने में मशगूल हो गए। उन रंगों से जब नन्हें हाथ कागज पर कुछ उकेरने का प्रयास कर रहे थे तो सच्चाई और वफ़ाई अपने इन नन्हें सिपाहियों पर दुआ का हाथ फेर रहे थे।

कलीम के पास लाल रंग नहीं था। उसने जब टीचर साहिबा से पूछा तो उन्होंने कहा- ‘‘जो रंग तुम्हारे पास हैं उन्हीं से तस्वीर बनाओ शहज़ादे!’’ कलीम का मुँह उतर गया। उसने सोचा- ’’लाल रंग बिना मेरी तस्वीर वैसी न बन सकेगी। शायद पूरी भी न हो सके।‘‘




उसी वक्त कक्षा में बन्दूकधारी, नकाबपोश आतंकवादियों का प्रवेश हुआ। वे बच्चों को सिर्फ इसलिए  मारने आये थे क्यों कि उनकी कौम का सरगना उस मुल्क से खफा था।

उनकी अन्धाधुन्ध गोलियाँ भी सही निशाने पर लगीं। कलीम के सिर के बीचो-बीच एक गोली धंसी और उसका ब़ेजान सिर उसकी उसी मेज़ पर लुढ़क कर रह गया।

 
सच कहते हैं- ‘‘अल्लाह बच्चों की दुआ और ख्वाहिशें ज़ल्दी सुनते हैं।’’ कलीम के तस्वीर का वह कागज़ अब लहू के लाल रंग में डूब चुका था।

 
उसकी माँ घर पर अब भी उसकी पसन्द का हलवा बना कर उसका खाने पर इन्तज़ार कर रही थीं।

(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग वरिष्ठ कवि विजेन्द्र जी की है)

टिप्पणियाँ

  1. रोजनामा कहानी "तस्वीर" के लिये भाविनी आपको मेरा सलाम ।
    दहशतगर्दी जैसे मौजू पे आपका लिख्नना यह बताता है कि इनसानियत पे आपकी सोच निहायत ही उम्दा है ।
    इन्साल्ला आपका मुस्तकबिल रौशन हो ।

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  2. कितनी मेहनत की थी माँ ने सुबह स्कूल भेजने में,
    एक पल को सोचा होता जब गोली चलाई ।
    किताबें तो उनके पास भी थी,
    पर ये नफ़रत किसी ने नहीं पढ़ाई ।
    भाविनी, आपको बधाई ।

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  3. इस लघुकथा की "भाषा” और लघुकथा में आए दो शब्द "लाल रंग" तथा "खून” लघुकथा की केन्द्रिय विषयवस्तु का वास्तविक चित्र उकेरते हैं। अपने ही एक शेर के साथ लघुकथा की लेखिका को बधाई.
    "रंग के घोल से सस्ता है आदमी का लहू ।
    ऐसे माहौल मे हम होली मनाएं कैसे ॥"
    रवीन्द्र नाथ मिश्र "बलिदानी"

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  4. सुनील कुमार9 जुलाई 2015 को 8:00 pm

    मर्मस्पर्शी....................

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