शेखर जोशी : जन्म दिन विशेष-2




 


शेखर जोशी इस १० सितम्बर को अपने जीवन के अस्सी वर्ष पूरा करने वाले हैं. इस अवसर पर पहली बार उन पर कुछ विशेष आलेख प्रस्तुत कर रहा है. इसी क्रम में दूसरी कड़ी में प्रस्तुत है रमाकांत राय का आलेख ‘शेखर जोशी: मजदूर जीवन के अप्रतिम कथाकार
 
  
रमाकांत राय


शेखर जोशी : मजदूर जीवन के अप्रतिम कथाकार



भारतीय परंपरा में साहित्यकार का दर्ज़ा अतिविशिष्ट है. उसे ब्रह्मा के समानांतर रचनाकार कहा गया है. रचनाकार, जो रचनाएं करता है. पुनर्रचना. इसी क्रम में आधुनिक साहित्य में उपन्यास और कहानी को मध्यवर्ग की विधा मानी गयी है. और इसका रचयिता भी नए समाज की पुनर्रचना करता है. हिंदी में अगर कहानी विधा को लें तो सर्वसम्मति से यह बात मान ली जायेगी कि प्रेमचंद इस विधा के न सिर्फ बड़े रचनाकार हैं बल्कि बहुत बड़े फलक के आधार निर्माता भी. उन्होंने किसानों, दलितों, महिलाओं और पोंगा पंडितों पर जिस अधिकार और प्रमाणिकता पर लिखा है वह तमाम अत्याधुनिक दृष्टियों और विमर्शों के नकार के बावजूद मूल्यवान है और सच्ची तस्वीर उकेरने वाला है. प्रेमचंद ने अपनी कहानियों में जिस किसान जीवन को रचा है, उसकी चुनौतियों और दुश्वारियों से वे वाकिफ हो गए थे. 

यहाँ यह बताना जरूरी है कि प्रेमचंद ने जिन किसानों के बारे में लिखा है वे छोटे और सुविधाविहीन किसान हैं, जो गुलामी की जंजीरों में जकड़े हुए भी थे. ये वे किसान नहीं हैं जो बड़े पैमाने पर खेती करते हैं और जिनके लिए किसानी फायदे का सौदा है. उत्तर प्रदेश और बिहार के जिन किसानों से प्रेमचंद परिचित थे वे छोटे खेतिहर ही हैं. प्रेमचंद इसलिए बड़े नहीं हैं कि उन्होंने किसान जीवन पर लिखा बल्कि इसलिए कि उन्होंने चुनौतियों को पहचाना था. यह अनायास नहीं है कि पूस की रात का हल्कू अपनी खड़ी फसल को नष्ट देख कर भी ज्यादा दुखी नहीं होता बल्कि इस अहसास से संतुष्ट दीखता है कि कम से कम जाड़े की रात में बगीचे में रखवारी नहीं करनी पड़ेगी. इसी तरह “गोदान” का गोबर भी खेती छोड़कर मजदूर बन जाता है. होरी को जबरन बेदखल होना पड़ता है और वह मजदूर बनने को विवश है. प्रेमचंद ने अनेकशः यह दिखाने का प्रयास किया है कि कैसे एक किसान मजदूर के रूप में बदल जा रहा है. उनकी कहानियों के कई पात्र खेती से बेदखल होने के बाद- खेती से बेदखल होने के कई कारण हैं जिनमे शोषण सर्वप्रमुख है- मजदूर बन जा रहे हैं. सही भी है. सर्वहारा वर्ग की अवधारणा भी इसी से है. खोने के लिए कुछ भी नहीं और पाने के लिए सारा जहाँ. 

प्रेमचंद ने किसान जीवन की चुनौतियाँ जहाँ अपने साहित्य में प्रस्तुत कीं वहीँ उन्होंने उनकी आखिरी परिणति मजदूर और श्रमिक जीवन में की. कई बार वे इसके लिए जैसे संतोष प्रकट करने की मुद्रा में दिखते हैं कि किसान जीवन के खतरों से ज्यादा आरामदेह जीवन मजदूर बनकर जीने में है. यह अलग बात है कि अपने उत्तरवर्ती लेखन में वे मजदूरी के जीवन को भी मानने लगे थे कि यह भी कुछ बदलाव नहीं ला सकता. कफ़न कहानी के घीसू-माधव इसकी मिसाल हैं जो भले कामचोर हैं लेकिन इतना ज्ञान तो रखते ही हैं कि ज्यादा श्रम कर लेने से कुछ ज्यादा बदलने से रहा. आखिर माधव की पत्नी जियादा श्रम के कारण ही अल्पायु को प्राप्त होती है.

प्रेमचंद की परम्परा को आगे बढ़ाने वाले कुछ गिने-चुने कहानीकारों में हमारे प्रिय कहानीकार शेखर जोशी भी हैं. इलाहाबाद का समूचा साहित्यिक समाज उन्हें शेखर दादा के रूप में जानता है. उन्होंने साहित्यिक समाज में अपनी छवि बेहद मितभाषी, मधुर और मिलनसार व्यक्ति के रूप में बने है. वे अपनी गरिमामय उपस्थिति से सभाओं, गोष्ठियों और बैठकियों की जान बने रहते हैं. शेखर दादा ने बहुत कम कहानियां लिखी हैं, लगभग साठ. उन्होंने लोकप्रिय और चर्चित विधा उपन्यास में हाथ तक नहीं आजमाया है. यदा कदा साहित्यिक बिरादरी को उनके लेख या सभाओं-गोष्ठियों में उनके वक्तव्य सुनने को मिल जाते हैं. ऐसा भी नहीं है कि वो हर उपस्थिति में वक्ता होते हैं बल्कि सही यह है कि वे अक्सर श्रोता होते हैं. शालीन और विशिष्ट श्रोता. हम लोगों ने दादा को अनेकशः सभाओं या गोष्ठियों में ही देखा या जाना है.


शेखर जोशी हमलोगों के लिए “बदबू” के कहानीकार हैं..


अपने शुरुआती दिनों में जब भी शेखर जोशी को देखना होता था, बदबू के कहानीकार को देखना होता था. हम जब उन्हें देखते थे तो अवश्य इस पहचान को दुहराते थे- बदबू के कहानीकार. सुनने वाला पहले चौंकता था फिर अगले ही क्षण तादात्म्य स्थापित कर लेता था. दरअसल, राजेंद्र यादव ने नयी कहानी के बाद कहानी के लिए जो नया नामकरण किया- समानांतर कहानी, उसके लिए एक किताब भी बाकायदा सम्पादित की- एक दुनिया समानांतर. उसमे उन्होंने कई नामचीन कहानियों के साथ “बदबू” को भी शामिल किया. कहानीकार- शेखर जोशी. अलग-अलग मूड की कहानियों में एक अछूते विषय को लेकर बेहद मार्मिक कहानी थी- बदबू. न सिर्फ मजदूर जीवन पर केंद्रित बल्कि इस अहसास को भी झकझोर देने वाली कि जल्दी ही हम व्यवस्था का हिस्सा बन जाते हैं. व्यवस्था हमें अपने रंग में ढाल लेने के लिए तमाम हथकंडे अपनाता है और हमारा प्रतिरोध धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है. बदबू इसी अहसास को उकेरती है. कथानायक –जो है उससे बेहतरी के लिए- सबसे ज्यादा जरूरी यह समझता है कि पहले अपने आप को बचाया जाए. इस क्रम में वह न सिर्फ जागरूक करना चाहता है बल्कि यह भी चाहता है कि लोग संगठित बनें. इस अभियान में उसे दुष्कर कार्य के लिए नियुक्त कर दिया जाता है. उसे बुलाकर पहले तो समझाया जाता है. लेकिन अपनी निस्संगता और ठोस तर्कों से वो चीफ़ साहब को लाजवाब कर देता है. कहानीकार ने बेहद सधे अंदाज में इस प्रक्रिया को उभारा है. चीफ़ साहब भी उसी व्यवस्था का अंग है. वो कहता भी है- “मैं तो भाई, तुम्ही लोगों की तरह एक छोटा-मोटा नौकर हूँ.” लेकिन जब वह देखता है कि यह सारी कवायद बेअसर है तो धमकी भी देता है. शेखर दादा बहुत सहजता से और बेहद सजगता से सचाई को उकेरते हैं. वो यह तो देख ही रहे हैं कि श्रमिकों का एक वर्ग आदती हो गया है तो दूसरा वर्ग कुछ बदलने के लिए कोशिश भी करता है लेकिन डरता भी है. खतरनाक है, आदती होना. इसीलिए कथानायक का आखिर में हाथ से आनेवाली बदबू से हर्षित होना ज्यादा मानीखेज हो जाता है. यहाँ बदबू से युक्त होना जीवन को बचाए रखना है. मशीन में तब्दील होना नहीं है,जैसा कि घासी की कहानी के पात्रों का बदल जाना है या कि खुद घासी का भी. बदबू इसीलिए बड़ी कहानी बनती है कि वो तमाम झंझावातों के बावजूद स्वत्व को बचाए रखने में सफल रहती है. और तब, जब हम शेखर दादा को बदबू का कहानीकार कहते हैं तो यह उसी मानी को बचाए रखने के लिए होता है.

यहाँ यह अवश्य ध्यान देने की बात है कि शेखर जोशी उन गिने-चुने कहानीकारों में हैं जिन्होंने मजदूरों के जीवन को आधार बनाकर कहानियां लिखी हैं. मैं जब उन्हें प्रेमचंद की परम्परा का कहानीकार कहता हूँ तो इसीलिए कि वे प्रेमचंद के छोड़े हुए सिरे से कहानी उठाते हैं. प्रेमचंद ने किसान जीवन से मजदूर जीवन में जो रूपांतरण दिखाया है उसके बरक्स शेखर जोशी मजदूर जीवन की चुनौतियों को रखते हैं.

अगर थोड़ी देर के लिए विषयान्तर करते हुए यह देखा जाय कि हिंदी में क्यों किसान जीवन पर तो खूब लिखा गया है और आज भी लिखा जा रहा है लेकिन मजदूरों के जीवन पर आधारित बहुत कम. मजदूरों के जीवन पर प्रामाणिक तरीके से कुछ ही लोगों ने लिखा है- शेखर जोशी, सतीश जमाली और इसराइल इनमे प्रमुख हैं. आखिर क्या कारण है? मुझे लगता है- कहानीकार की पृष्ठभूमि. हमारे अधिकांश कहानीकार जिन्होंने किसान जीवन पर लिखा है, वे या तो ग्रामीण परिवेश के हैं या किसी न किसी तरह से उस परिवेश से जुड़े हैं. और तमाम असहमतियों के बावजूद यह कहना पड़ेगा कि किसान का जीवन आज भी सामंती जीवन है. राजशाही ठाठ वाला. हमारे माँ या दादी या नानी की कहानियों का राजा यों ही नहीं गरीब भी हो सकता था. वह जमीन-जायदाद से नहीं अपने मन से राजा हुआ करता था. मजदूर जीवन पर लिखने के लिए सर्वहारा होना पड़ेगा. उनकी व्यथा-कथा को न सिर्फ महसूस करना होगा बल्कि सर्वहारा का सा जीवन जीना होगा. मेरा आशय कतई स्थूल रूप में न लिया जाय. मैं यह कहना चाहता हूँ कि मजदूर जीवन पर लिखने के लिए वैसा मानस तैयार करना पड़ेगा. इस हिसाब से शेखर जोशी सही अर्थों में सर्वहारा हैं और यह सबसे बड़ी नेमत है.


लोहा नहीं गल रहा है, जाति और वर्ण की व्यवस्था गल रही है- गलता लोहा....


शेखर जोशी की एक कहानी है- गलता लोहा. शेखर जोशी की इस कहानी में एक मेधावी बालक मोहन के गाँव से बेहतर भविष्य के लिए शहर जाने और वहाँ के कुचक्र में फंस जाने और वापस गाँव लौट आने की कथा है. मोहन को शहर लिवा जाने वाले उसके अपनी जाति के रिश्तेदार उसके साथ नौकर की तरह व्यवहार करते हैं और अन्ततः वह मेधावी बालक कुछ नहीं कर पता. वह वापस गाँव लौट आता है. कहानी में वह अपने बचपन के लोहार मित्र के यहाँ हँसिया पर धार लगाने के लिए जाता है. कहानी बहुत धीमे से जाति की स्वीकार्यता को तोड़ने के बाद वर्ण के व्यवस्था को ध्वस्त करती है जब मोहन निम्न मानेजाने वाले धनराम की बस्ती में जाता है और बैठता है. कहानीकार संकेतित करता है कि कोई उस बस्ती में बैठता नहीं है लेकिन मोहन बैठता ही नहीं है बल्कि जब धनराम अपना काम कर रहा होता है, वह हथौड़ा उठाकर घन की लगातार चोट करता है. मोहन का घन उठाना और लगातार मारना मात्र लोहे को मनमाफिक स्वरुप देना नहीं है बल्कि वर्ण और जाति की व्यवस्था को चोट पहुँचाना है. यहाँ हमें प्रेमचंद की कहानी सद्गति की सहज याद आ जाती है जिसमें दुखी चमार पंडित जी के यहाँ लकड़ी की गाँठ चीरने के लिए लगातार कोशिश करता है. व्याख्याकारों ने दुखी के उस कार्य को जाति के व्यवस्था को तोड़ने वाला कहा था. लेकिन कहानी में दुखी मर जाता है. गलता लोहा में मोहन भी वही करता है और चूंकि समाज में यहाँ मामला मजदूरी से सम्बंधित है बेगारी से नहीं, इसलिए चीजें बदल जाती हैं. आप देखें कि कहानी के अंत में मोहन अपने किये से बहुत खुश है और उसने जो निर्माण किया है वह धनराम के प्रयास से बेहतर है. गलता लोहा इस तरह से एक जरूरी और महत्त्वपूर्ण कहानी बन जाती है. यह जरूर ध्यान देने की बात है कि कहानीकार ने सारा आख्यान बहुत सहज तरीके से बयान कर दिया है.


अरे! कोसी के घटवार का नायक भी मजदूर है?......


शेखर जोशी की प्रसिद्ध कहानियों में से एक है कोसी का घटवार. यूं तो यह रोमानियत से भरी हुई एक प्रेम कहानी है लेकिन अलगाने वाली बात यह है कि इस कहानी का नायक गुसाईं सिंह फौजी रह चुका है और फ़ौज से लौटने के बाद गेँहू पीसने की मशीन लगाता है. मैंने जब इसे रोमानियत से भरपूर कहा तो इसलिए भी कि उसका प्रेम परवान तो नहीं चढ़ पाता पर मरता भी नहीं और जब लछमा यानि उसकी प्रेमिका मिलती है तो वह प्यार कुलांचे भरने लगता है. कहानी का नायक गुसाईं सिंह का मजदूर बनना या यों कहें कि श्रम के क्षेत्र में उतरना शेखर जोशी के जनवादी सोच का ही परिणाम है.

शेखर जोशी वास्तव में मजदूर जीवन के रचनाकार हैं और इस तरह कहीं ज्यादा जनवादी. उनकी कहानी - 'नौरंगी बीमार है'- कारखाने और श्रमिकों की कहानी का अच्छा उदहारण है. “दाज्यू” छोटी किन्तु मार्मिक कहानी है. इस कहानी में भी वर्गांतरण कर गए दाज्यू को यह बुरा लगता है कि बेयरा उन्हें इस तरह संबोधित करे. वे इसके लिए उसे डांटते हैं. बेयरा इस बात से ज्यादा दुखी होता है और कुछ ज्यादा ही प्रौढ़ और समझदार बन कर प्रस्तुत होता है इसीलिए नए आगंतुक के सामने दाज्यू की उपस्थिति में वह कुछ यूं उत्तर देता है- “बॉय कहते हैं शाब मुझे.” कहानीकार की टिप्पणी ज्यादा मार्मिक हो जाती है-“संक्षिप्त-सा उत्तर देकर वह मुड़ गया. आवेश में उसका चेहरा लाल होकर और भी अधिक सुन्दर हो गया था.”

संजीव कुमार ने नेशनल बुक ट्रस्ट की ओर से हाल में ही प्रकाशित शेखर जोशी की कहानियों की भूमिका लिखते हुए शेखर जोशी को “दबे पाँव चलने वाली कहानियों के सृजेता” कहा है और मूल्यांकन करते हुए सही ही लिखा है कि –“मूड को आधार बनाने की बजाय घटनाओं और ठोस ब्यौरों में किस्सा कहने वाले शेखर जोशी ने इन सभी विषयों को लेकर ऐसी कहानियां लिखी हैं जो एक ओर विचार केन्द्रित कृत्रिम गढ़ंत से मुक्त हैं, तो दूसरी ओर ‘अनुभव की प्रमाणिकता’ और ‘भोगा हुआ यथार्थ’ के संकरे आशय से भी. इस लिहाज से वे अमरकांत और भीष्म सहनी की तरह घातक अतियों से कहानी का बचाव करने वाले रचनाकार हैं.”

हमारे प्रिय रचनाकार को हाल में ही दूसरे श्रीलाल शुक्ल सम्मान से नवाजे जाने की घोषणा हुई है. सूर्यनारायण जी, जो मेरे गुरु भी हैं, ने इस अवसर पर जो टिप्पणी की है उसे साभार आपके सामने रख रहा हूँ- “आज हमारे शहर- इलाहाबाद की साहित्यिक दुनिया के लिए एक प्रसन्नता की खबर है- वरिष्ठ कहानीकार आदरणीय शेखर जोशी, जिन्हें हमलोग प्यार और सम्मान से "जोशी दादा" कहते हैं, को दूसरा श्रीलाल शुक्ल सम्मान मिला है. श्रीलाल शुक्ल के निधन के बाद इस सम्मान/पुरस्कार की स्थापना हुई.पहला सम्मान विद्या सागर नौटियाल को मिला था. इलाहाबाद के ४  बुजुर्ग महान व्यक्तित्वों- भैरव दादा, मार्कंडेय दादा, अमरकान्त जी और जोशी दादा ,में सबसे सौम्य, सबसे कम विवादास्पद, किसी भी प्रकार के ताल-तिकड़म से परे, नए लोगो को अतिशय प्यार और स्नेह करने वाले, अपने व्यवहार में भी जनवादी दिखने वाले जोशी दादा ही हैं. इसे बाकी लोगों की तौहीन के रूप में न समझा/पढ़ा जाय. जितना सहज, सरल व्यक्तित्व उनका है, उतना सबका नहीं है. वे हिंदी जगत के अजातशत्रु हैं. लेकिन अपने विचारों, अपनी पक्षधरता में अडिग और दृढ हैं उतने ही. कोई लोभ-लाभ उन्हें डिगा नहीं सकता. भारतीय भाषा परिषद्, म.प्र.साहित्य परिषद्, राही मासूम रज़ा अकादमी की ओर से भी उन्हें पुरस्कार/सम्मान मिल चुका है. सबसे पहले उन्हें पहल पत्रिका ने "पहल सम्मान" से नवाज़ा था. यह साहित्य अकादमी और ज्ञानपीठ जैसी साहित्यिक संस्थाओं की नासमझी है या दुर्बुद्धि कि इतने महत्वपूर्ण रचनाकारों को आज तक सम्मानित नहीं किया! जबकि एक से एक नमूनों को यह सम्मान/पुरस्कार बांटे गए हैं. क्या यह संस्थाएं इतनी जड़ हैं कि इन महान लेखकों का मूल्यांकन नहीं कर पा रही हैं! जब हिंदी विभागों के कूढ़मगज मास्टर और विभागाध्यक्ष ही निर्णायक होंगे तो और क्या होगा! शेखर जोशी, ज्ञानरंजन और इसी कद के कई बड़े लेखक जिस भाषा में हों/ सक्रिय रहे हों- उस भाषा और साहित्य के लिए गर्व और गौरव की बात है. लेकिन हिंदी की संस्थाओं की मूढमति के कारन यह दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारे ये वरिष्ठ और महत्वपूर्ण रचनाकार इन पुरस्कारों से आज तक वंचित हैं. ईश्वर, यदि कहीं  है तो इन मूढमति संस्थाओं को सद्बुद्धि दे-इसी कामना के साथ जोशी दादा और उनको प्यार करने वाले पाठकों को बहुत-बहुत बधाइयाँ!”

सितम्बर की १०वीं तारीख को शेखर दादा का जन्मदिन है. हम सबकी तरफ से दादा को बहुत-बहुत बधाइयाँ और शुभकामनायें. वे हमारी विरासत और धरोहर हैं. उनको हमारा प्रणाम...



रमाकान्त राय
प्रवक्ता, हिंदी
राजकीय इण्टरमिडीएट कालेज. कोन, सोनभद्र,
जन्म- २३ दिसंबर, १९७७. गाजीपुर में.
प्रारम्भिक शिक्षा- पश्चिम बंगाल से. उच्च शिक्षा 
(डी.फिल.- राही मासूम रज़ा के उपन्यासों में 
हिन्दू-मुस्लमान सम्बन्ध और उनकी रचना दृष्टि)
इलाहाबाद विश्वविद्यालय से.
ई पता-royramakant@rediffmail.com
 mobile-09838952426



टिप्पणियाँ

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (09-09-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  2. बहुत अच्छी पोस्ट और मेरे लिये तो वैसे ही गर्व की बात है की शेखर जोशी जी मेरे शहर अल्मोड़ा के ही रहने वाले हैं कुछ वर्ष पूर्व मुलाकात हुई थी जब वे यहाँ किसी कार्यक्रम में शिरकत करने पधारे थे ! उन्हे जन्मदिन पर ढेरों शुभकामनाऎं !

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  3. is aalekh se meri poori sahamati banati hai. ....ramakant bhayi ne unaki kahaniyon ko bahut gaharayi se samajha hai. nihsandeh shekhar ji ke yahan majdoor jeewan poori pramanikata se aata hai jisako ramakant bhayi ne sahi rekhankit kiya hai.

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  4. शेखर दादा पर विशिष्ट सामग्री देने का 'पहली बार' का यह प्रयास अत्यंत सराहनीय है | महेश भाई ने पिछली पोस्ट में जहाँ अपने पत्र के माध्यम से पहाड़ और मैदान के बीच पुल का निर्माण किया था , आज रमाकांत जी ने सादगी की प्रतिमूर्ति माने जाने वाले इस महान कथाकार के अंतस में प्रवेश किया है | इस लेख से हमे यह भी पता चलता है , कि शेखर दादा की कहानिया , उनके जीवन से अलगाई नहीं जा सकती | जैसा लिखा , वैसा ही जिया | ...शेखर दादा शतायु हों , हमारी कामना है , और बेहतरीन लेख के लिए रमाकांत भाई का आभार |

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  5. bahut achha likha hai.badhai ramakantji.

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  6. achcha likha hai ramakant aapne....shekharji ki kahaniyon ki smeeksha thos aur nihitarth hai.swasth rahte hue woh shatayu hon.

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