शेखर जोशी: जन्म दिन विशेष-4








शेखर जोशी: जन्म दिन विशेष पर प्रस्तुति के क्रम की चौथी कड़ी के अंतर्गत आज पढ़िए गायत्री सिंह का आलेख ‘कृषि, कृषक और शेखर जोशी’   






गायत्री सिंह

कृषि, कृषक और शेखर जोशी

स्वतंत्र भारत में भी विकास की लंबी-चौड़ी योजनाओं से जनता को विकास के मोह में बांधने की कोशिश की गयी, परन्तु जल्द ही जनतंत्र भारत का वास्तविक चेहरा उभर कर सामने आ गया।

                1962 ई. में हुए हिन्द-चीन युद्ध ने पंचशील सिद्धान्तों की धज्जियां उड़ा दी। रही-सही कसर हिन्दुस्तान-पाकिस्तान युद्ध ने पूरी कर दी। चारों तरफ अविश्वास,  भय और संशय का माहौल व्याप्त हो गया। बाहरी सुरक्षा व्यवस्था के लिए सरकार ने सीमा पर सैनिकों का जमावड़ा शुरु किया, परन्तु देश की आंतरिक अव्यवस्था को सुव्यवस्थित करने में वह नाकाम रही।

                आर्थिक स्तर पर अव्यवस्था के चलते सबसे पहले देश प्रभावित हुआ, उसके बाद सामाजिक संरचना। सामाजिक संरचना में पहले परिवार टूटा, फिर व्यक्ति-व्यक्ति भी बिखराव, बेरोजगारी और अकेलेपन का शिकार हुआ। संघर्ष की नित नयी स्थितियाँ जन्म लेने लगीं। संबंधो में बदलाव (स्त्री-पुरुष, पिता-पुत्र सहित अन्य संबंधो में भी) आए और मूल्यों का क्षरण भी हुआ।
विभिन्न साहित्यकारों ने देश से जुड़ी विभिन्न समस्याओं को अपनी कहानियों में निरूपित किया है। व्यक्तिनिष्ठ कथाकारों ने व्यक्ति स्तर पर हो रहे बदलावों का चित्रण अपनी कहानियों में किया है। वस्तुनिष्ठ कथाकारों में प्रेमचन्द के बाद शेखर जोशी ने अपनी कहानियों में सामाजिक समस्याओं को गहराई के साथ चित्रित किया है।

पूस की रातमें प्रेमचन्द्र ने हल्कू को किसान से श्रमिक बनते दिखाया है, ‘आखिरी टुकड़ामें शेखर जोशी ने उसके आगे की कहानी लिखी है। संक्रान्ति काल अधिक पीड़ादायी होता है, जहाँ मूल से अलगाव और नवीन की समस्या व अनिश्चितता का माहौल रहता है। स्वतंत्रता उपरान्त किसानों के जीवन में यही स्थितियाँ बन रही थी। आखिरी टुकड़ाका प्रथम वाक्य किसान मंगरू की दुहरी विवशता और पराजय को सफलता से अभिव्यक्त करता है- ‘‘मंगरू ने जलती आँखो से सूरजा को देखा।’’  जलती आँख का ज्यादातर दुःख किसान का अपना दुःख है। अपनी आँखों के सामने ही अपनी जमीन पर कारखाने का बनना वह रोक नही सकता, पिता का भूमि के लिए अपनी जान गंवाना (हांलाकि वह स्वतंत्रतापूर्व की कहानी है, जिसे प्रेमचन्द्र ने उच्च जातियों के शोषणकारी रूप में पहले ही चित्रित किया है) वह भूल नही सकता। पण्डित मंगरू की कृषि जमीन को हथियाना चाहता था, जिसका विरोध उसके पिता ने किया था, फलतः उसे अपनी जान गँवानी पड़ी थी। जिसका प्रत्यक्ष गवाह मंगरु की आँखें रही हैं। वही आँखें अपने पुत्र के भिन्न दृष्टिकोण को भी देख रही हैं। पुत्र का कारखाने के प्रति अपनत्व भाव रखना, पिता के दुःख से अनजान होना, सब कुछ एक के बाद एक घटित होता जाता है, और कृषक वर्ग देखता रह जाता है। यह परिणति स्वाभाविक रूप से इस तरह घटित हो रही है जैसे यही उस किसान की नियति है। इसलिए इस विपत्ति को स्वीकारने के सिवाय जैसे उनके पास कोई विकल्प शेष ही नहीं। मनुष्य के सामने सदा ही अस्तित्व का संकट रहा है कभी प्राकृतिक कारणों से तो कभी सजातीय संघर्षों से। इन दारुण परिस्थितियों ने किसान के जीवट को भी कमजोर किया है। कृषक लगातार समस्याओं से जूझ रहे हैं,  उन्हें श्रमिक जीवन व्यतीत करने के लिए बाध्य होना पड़ रहा है। यह समस्या स्वतंत्रता पूर्व दूसरे रूपों में विद्यमान थी। स्वतंत्रता उपरान्त अन्य रूप में आयी है। किसान वर्ग जानता है कि कभी भी किसी भी सत्ता में उनकी स्थिति बदलनें वाली नहीं है। फिर भी वह संघर्ष कर रहा है। पहले अपने व्यवस्था के स्तर पर फिर अस्तित्व संकट के रूप में।

                आखिरी टुकड़ा में कृषक जीवन के अस्तित्व की उपस्थिति है, परन्तु अन्ततः वह लोहारखाने की सीमा में आ जाती है। बैलों के प्रति किसानों का प्रेम जगजाहिर है, और बैल भी अपनी ममता भरी भाषा में किसान के प्रति अपना लगाव अभिव्यक्त करते हैं। किसानों के जीवन में सर्वाधिक कष्टकारी क्षण वह होता है जब उसकी जमीन हथिया ली जाती है, और उससे भी भयंकर कष्ट तब होता है, जब बैलों से भी उनका अलगाव हो जाता है। बैल किसान-जीवन के अभिन्न अंग होते हैं। यह अभिन्नता भंग होते ही कृषक स्वयं को अकेला और असहाय महसूस करता है। कृषक वर्ग की बैलों के प्रति यही संवेदना आखिरी टुकड़ामें चित्रित हुई है। ‘‘जिस दिन अपने बैलों के कंधे पर जुआ रखने के बजाय उसने दिन-दिन भर ईंट ढोने के लिए गाड़ी में जोता था, उस दिन सूरजा की माई रोने लगी थी।’’  कृषक पत्नी का रोना किसान के भयंकर कष्ट की सूचना देता है। अपने जीवन साथी के कष्ट की अनुभूति कर रोना परस्पर प्रेम की संलिप्तता को अभिव्यक्त करता है। परन्तु संभवतः इस कहानी में शेखर जोशी ने कृषक को प्रत्यक्ष रूप से रोते हुए इसलिए प्रदर्शित नहीं किया है, क्योंकि उनका उद्देश्य उसकी संघर्ष क्षमता को उजागर करना है, जिसे वे टूटते हुए या कमजोर नहीं दिखाना चाहते। कृषक पत्नी के रूदन के माध्यम से कृषक के कष्ट की अनुभूति करानें में वे सक्षम हुए हैं। ऐसी विपरीत  परिस्थिति में भी किसान की जीवट भरी संघर्ष चेतना का पता मिलता है।

                ‘‘सूरजा की माई फिर नही रोई- तब भी नहीं, जब धान गेहूँ की बालियों की जगह सिर में ईटें उठा कर वह एक सिरे से दूसरे सिरे तक ले आने लगी थी, और तब भी नहीं जब पाँच-सात वर्ष के लछमी-सूरजा किलकते हुए, खाद की जगह गारे सीमेन्ट के तसले इसी धरती पर उलटने लगे थे।’’ 

                वास्तविकता को स्वीकार करने के बाद जीवन में कष्टकारी परिस्थितियों को सहन करने की क्षमता विकसित होने लगती है, और संघर्ष की दिशा बदल जाती है। कृषक परिवार ने अच्छी तरह यह महसूस कर लिया कि अब बदलते हालातों में कृषक जीवन जीना उनके लिए संभव नहीं। वे चाहें जितना प्रयत्न कर लें, ना ही जमीन मिलने वाली है, ना ही उतनी आय, कि जिससे नई जमीन खरीद लें। दूसरे के खेतों पर काम करते हुए  भी उन्हे वही जीवन जीना है, जो कारखानों में जीना पड़ रहा है। इसलिए अब उनके लिए बेहतर हालातों की गुंजाइश या उम्मीद रखना भी बेमानी है। हालांकि हालातों से उपजे कष्ट को मिटा पाना असंभव है, पर इससे जीवन के प्रति बेरूख होना भी उनके स्वभाव में नहीं। अपने सामने आ खड़ी नयी परिस्थिति से जूझने में वे अपनी ताकत लगा देते हैं।

                किसानों के जीवन में औद्योगिक कारखानों ने दखल दी है, साथ ही ग्रामीण माहौल व परिवेश के सहज स्वाभाविक रूप को शहर की कृत्रिमता की तरफ धकेला है। इसका परिणाम यह हुआ कि गाँव के लोग गाँव में रह कर भी अपनी स्वभावगत विशेषताएँ और प्रकृति प्रदत्त आजीविका को स्वयं छोड़ रहे हैं। निर्णयमें श्रीधर गाँव में स्थायी रूप से रह कर विकास का कार्य करना चाहता है, और इसकी सूचना जब अपने परिवार वालों को देता है तो सभी उसके निर्णयका विरोध करतें हैं। अन्ततः वह अकेला ही गाँव जाता है। गाँव वालों के बीच जाकर उसे लगता है कि अब वह क्या करें ? कोई ग्रामीण इस सहज व्यवहार को नहीं जान पाता और सभी उसके शहर से स्थायी रूप से गाँव में रहने के पीछे अपना-अपना तर्क देते हैं। अन्ततः एक बृद्ध अपनी व्यावहारिक बुद्धि का परिचय देते हुए कहता है- ‘‘बेटा, कोई घूसखोरी, गबन का मामला तो नहीं हुआ? घबराना नहीं। सब ठीक हो जायेगा। देवी रक्षा करेंगी।’’

                श्रीधर अवाक् उनके चेहरे की ओर ताकता ही रह गया। फिर उसने सोचा और एहसास किया कि ‘‘मन-प्राणों में बसी गाँव की धरती का यह अंधकार ही उसे यहाँ खींच लाया है और इसी अंधकार से उसे जूझना है।’’ 

                शेखर जोशी सम्भवतः पहले कथाकर है जिन्होंने शहरी जीवन के अभ्यस्त व्यक्ति को गाँव की तरफ भेजा है। श्रीधरगाँव में रह कर वास्तविक विकास कार्य करना चाहता है। इसके लिए श्रीधर स्वयं अपने भीतर लड़ता है, परिवार के दबावों से जूझता है और ग्रामीण जनों के तर्को,  संशयों और अविश्वास को भी झेलता है।

                स्वतंत्रता पूर्व से ही हमारे देश में जो जाति आधारित शोषण व्यवस्था थी,  स्वतंत्रता उपरान्त वह नयी चुनौती के रूप में सामने आयी। सभी जातियों को अपनी तरह से संघर्ष करना पड़ रहा था। जो जातिगत समस्या सदियों से भारतीय समाज में चली आ रही थी, जिसे स्वतंत्र भारत में समाप्त करने की कोशिश की गयी और सभी को काम चुनने की स्वतंत्रता दी गयी। ज्यादातर कार्य निम्न जातियों द्वारा ही कराया जाता था और उँची जातियाँ उनका शोषण करती थीं। काम चुनने की स्वतंत्रता मिलते ही अब कोई भी कार्य व्यवसाय अपनाने के लिए सभी स्वतंत्र हो गये थे, जिसका ज्यादातर लाभ उँची जातियों वाले लोग या पूँजी से सम्पन्न लोग ही उठा पा रहे थे। सामाजिक व्यवस्थाओं में आकस्मिक परिवर्तन असंभव है। धीरे-धीरे ही रूढ़ियाँ टूटती हैं। जातियों का संस्कार तो सदियों पुराना था, इसलिए मानसिकता में आकस्मिक परिवर्तन संभव नही था। ऊँची जातियों के लोग स्वतंत्र भारत में भी अधिक सामर्थ्यवान थे। इसलिए उन्हे जो भी व्यवसाय लाभकर लगा, उन्होने उसे अपना लिया। नीची जाति का व्यक्ति उनसे टक्कर नहीं ले सकता था। अपनें कामों में विशेष रूप से दक्ष होने के बावजूद उनके पास शक्ति व धन दोनों का अभाव था। इसलिए अगर राजपूत धुलाई केन्द्र खोलने में अपना लाभ देखता, तो वह इसे व्यवसाय के रूप में अपनाता तो था, परन्तु गरीबों की कमी तो नही थी। वह उन्हे दिन भर का पारिश्रमिक दे कर ज्यादातर लाभ स्वयं प्राप्त करता था। इससे विशेष कार्य से सम्बद्ध जातियाँ अपना व्यवसाय तो खो ही रही थी, साथ ही उनका जीवन जटिलतर हो रहा था। सभी जातियों में संघर्षरत ज्यादातर वही लोग थे, जिनके पास आर्थिक कमी थी या प्राचीन व्यवस्था को तोड़ने की विवशता या जातिगत संकीर्णता थी। शेखर जोशी ने दोनों का चित्रांकन अपनी कहानियों में किया है। उच्च जातियाँ जो पहले अपनी जातिगत श्रेष्ठता के आधार पर निम्न जातियों से सेवा कराना अपना अधिकार समझती थीं, उन्हें भी अपनी श्रेष्ठता त्यागनी पड़ रही थी। इसका कारण भारत देश में प्रत्येक नागरिक को मिली व्यक्तिगत स्वतंत्रता थी। कोई भी व्यक्ति अपनी इच्छा से कोई काम अपना सकता था या छोड़ सकता था। परन्तु उच्च जातियाँ जो निम्न जातियों से काम लेने की अभ्यस्त थी, उन्हें यह बदलाव कष्टकारी साबित हो रहा था।

                पहले जमींदारों, सामन्तों के पास हजारों एकड़ तक जमीनें हुआ करती थी। और हलवाहाआदि कामगारों के माध्यम से वे खेती-बारी का काम मजदूरों से कराते थे। बदले में इच्छानुसार अनाज, भोजन या पारिश्रमिक दे कर उनके अधिकारों से वंचित कर रहे थे। पारिश्रमिक का कोई निश्चित प्रावधान न होने के कारण कोई आपत्ति भी नही कर सकता था। कभी-कभी बेगारी में भी काम कराया जाता था। स्वतंत्रता बाद जब सड़कें, पुल, टॉवर आदि का निर्माण जोरों पर होने लगा तो सरकार ने मजदूरों को काम देना आरम्भ किया, जहाँ उन्हे नकद आमदनी मिलने लगी। प्रत्यक्ष आमदनी मिलने के कारण मजदूरों का ध्यान इन कामों की तरफ होने लगा। 

यह तो सर्वविदित है कि बैलों के प्रति किसान को अगाध प्रेम होता है। वह अपने भोजन की पहली रोटी बैलों को देता है। बैल भी इस प्रेम का प्रतिफल देते हैं। जब विवश हो कर प्रेमचन्द के किसान ने अपने बैल बेच दिये थे, बैलों ने चारा-पानी तक छोड़ दिया और एक दिन भाग कर अपने मालिक के पास चले आये। बैलों के दुःख से दुःखी किसान स्त्री का क्रन्दन उसके लगाव व दर्द को बड़ी गहराई से अभिव्यक्त करता है। पूस की रातका हल्कू जिस तरह ठण्ड से बचने के लिए झबरे कुत्ते के पास लेट जाता है, वह कुत्ते और हल्कू के अपनत्व का सूचक है। यह लेखक की संवेदना है, जो जानवरों की मूक प्रतिक्रिया को भी अर्थवान बना देती है। शेखर जोशी ने इसका चित्रण हलवाहाकहानी में किया है जहाँ जीवानन्द खेती के लिए हलवाहान मिल पाने के कारण चिंतित है, और इसी उधेड़ बुन में पहली बार पशुशाला में घुसता है। वह जीवन में पहली बार बैलों को प्यार से सहलाता है। बैल भी अपनी प्रतिक्रिया देते हैं, जैसे कह रहे हों, दुःख की इस घड़ी में हम तुम्हारे साथ हैं, तुम जो भी कहो,  हम सब करने को तैयार हैं। तुम बदलाव को स्वीकार करो,  तो हम साथ देने को तैयार हैं। जीवानन्द को जैसे समाधान मिल गया हो। अगली सुबह वह स्वयं अपने खेत में हल चलाने को प्रस्तुत हो जाता है। कितनी अजीब बात है कि जीवानन्द के इस फैसले में किसी मनुष्य की सार्थक उपस्थिति नहीं है, जबकि जानवर होते हुए भी बैल जीवानन्द के नौसिखिएकदम के साथ भी कदम मिलाकर चलते हैं। यहाँ यह बात ध्यान देने की है कि जहाँ पशुओं में अभी भी अपनी सहज वृत्ति कायम है, वहीं मनुष्य अपने स्वभाव को खोता जा रहा है। पशु अपने मालिक के प्रति अभी भी वही संवेदना व्यक्त करता है, जो पहले से करता आ रहा है, परन्तु मानव अपने स्वार्थ के वशीभूत हो कर हर कार्य व परिस्थिति में अपना व्यक्तिगत लाभ देखने लगा है। यही कारण है कि पद्म बार-बार बुलाये जाने पर भी जीवानन्द का हल चलाने नही आता। सड़क निर्माण या सरकार द्वारा प्रायोजित अन्य कार्यों में उसे नकद आमदनी मिलती है, जिससे वह अपने परिवार का भरण-पोषण आसानी से कर लेता है, यहाँ तक कि वहाँ वह अपनी पत्नी और बच्चों को साथ ही काम में लगा कर अपनी आमदनी बढ़ा सकता है। परन्तु हलवाहा रह कर उसे यह फायदा नहीं मिलता। जीवानन्द भले ही उन दिनों की याद करें, जब पद्म एक ही आवाज में दौड़ा चला आता था, परन्तु पद्म उन दिनों को भुला चुका है। या वह याद नहीं करना चाहता। परिवर्तन उसके जीवन में थोड़ा सुखमय बदलाव लाया है, इसके विपरीत जीवानन्द के सामने समस्याएं और जटिल रूप में बढ़ गयी हैं। बड़ी प्रधान की नजर उसकी जमीन पर है, जो पहले ही झूठी संवेदना दिखा कर शहर में नौकरी दिलाने का लालच दे चुके हैं, और साथ ही मथुरा जैसे अवसरवादी चापलूस को भी उसके पीछे खबरिया बना चुके हैं। पद्म बार-बार बुलाने पर भी नहीं आता। चारों तरफ से हताश है जीवानन्द। वह गोठ में जाता है, जहाँ उसे निराशा नहीं मिलती, और जो दुःख में साथ दे वही सच्चा साथी होता है। बैल किसानों के सच्चे मित्र होते हैं। जहाँ किसान उनसे अपनत्व व लगाव प्रदर्शित करता है, वहीं बैल भी अपनी सकारात्मक प्रतिक्रिया देते हैं।

‘‘जीवानन्द ने गोठ में घुसकर अपने बैल को थपथपाया। बहुत दिनों बाद उसने इतने ध्यान से अपने इस पशु को देखा था। . . . मालिक का दुलार पा कर खैरा जुगाली करता हुआ टुकुर-टुकुर उसे ताकने लगा जैसे कह रहा हो,  तुम जो कहो, मैं करने को तैयार हूँ। जीवानन्द देर तक उसकी पीठ और गर्दन सहलाता रहा और फिर सिर झुका कर सकरे दरवाजे से बाहर निकल आया। गोठ में प्रवेश करते समय खैरा के प्रति वह जितना विरक्त था, बाहर निकलने तक उतनी ही आत्मीयता से भर उठा था।’’ 

इसी अपनत्व ने उसे साहसिक कदम उठाने का हौसला दिया और जीवानन्द ने स्वयं अपने खेत में हल चलाने का अन्तिम फैसला लिया। बद्री प्रधान को उसके इस कदम से निराश हुई। परन्तु जो आशा न दे,  उसकी निराशा से भी क्या मतलब? जीवानन्द बिना किसी की परवाह किये हल की मुठिया स्वयं थाम लेता है। यहीं से उसके किसान (श्रमिक) जीवन की शुरूआत होती है।
‘‘जो कुछ उन्होंने देखा उसे देख कर उन्हें सहसा विश्वास नहीं हुआ और क्रोध, घृणा तथा ग्लानि के कारण उनका सारा शरीर कांपने लगा. कुलघातक जिबुआ स्वयं हल चला रहा था। फाल की टेढ़ी-मेढ़ी लकीरें उसके नौसिखियेपन की गवाही दे रहीं थी।’’  

जिबुआ नाम अपनत्व सूचक है, परन्तु यह अपनत्व उसे मिलता क्यों नहीं? क्यों अपनत्व का दिखावटी रूप ही समाज में सर्वत्र व्यवहृत हो रहा है। नगरीय जीवन में तो यह रूप पहले ही दिखायी देता था, परन्तु ग्रामीण जीवन में इसकी पहुंच कैसे हुई? क्यों हुई? गाँव का सहज, सरल जीवन व सीधे-सादे लोगों की मूल छवि तो प्रेमचन्द के समय में ही तोड़ दी गयी थी, फिर भी उनमें ‘‘पंच परमेश्वर’’ यानि सार्वजनिक सहभागिता का विश्वास बचा हुआ था, न्याय की उम्मीद बची हुई थी। स्वतन्त्र भारत से प्रत्येक व्यक्ति को कुछ मिला हो या न मिला हो, परन्तु स्वतंत्रता अवश्य मिली जहाँ सभी अपना रोजगार चुनने के लिए स्वतंत्र हुए। निम्न-मध्यम जातियों को जो विशेष आरक्षण मिला, उससे कुछ तो बदलाव अवश्य आए। हालांकि उन्हें वहाँ भी अधिसंख्य उच्च जातियों की बहुल आबादी में कठिनाईयां और कई तरह के संघर्ष झेलने पड़े, परन्तु धीरे-धीरे वहाँ भी बदलाव आया। इन बदलावों ने उनके जीवन स्तर और सोच को प्रभावित किया। 

पद्म खुली चुनौती नहीं देता, परन्तु जिस तरह मुस्करा कर उसने उस दिन साली के पेट में दर्द उठने की बात कही थी, क्या वह बात पहले कभी पद्म कह लेता? पद्म का यह बहाना ही नहीं, साथ ही कोठरी के अन्दर से किसी के खिस्सहँसने की आवाज जीवानन्द को कहीं अन्दर तक बेध गयी थी।

यह खिस्सहँसने की आवाज जीवानन्द की असहाय स्थिति को और अधिक कष्टप्रद बना देती है। भले ही स्पष्ट रूप से कुछ भी नहीं कहा गया, परन्तु अस्पष्ट संकेतो में जीवानन्द की मजबूरी पर व्यंग्य किया गया था, जिसके प्रभाव ने जीवानन्द को विचलित किया।
‘‘कभी-कभी जीवानन्द का मन होता कि वह सड़क पर जाकर ही पद्म को रंगे हाथों पकड़ ले और जलील करे, लेकिन फिर उसके कानों में सहसा कोठरी के अन्दर से आती हुई खिस्सकी आवाज गूँज  उठती और वह बीच चौराहे पर अपनी हास्यास्यपद स्थिति की कल्पना कर सिहर उठता।’’
यह सिहरनजीवानन्द को बेचारगी की स्थिति में ला देती है, परन्तु चौतरफा घेराव के कारण जीवानन्द द्वन्द्वात्मक स्थिति में पड़ जाता है। वह इन परिस्थितियों का मुकाबला कैसे करे? वह पीढ़ियों से चली आ रही परम्परा को खेता रहे? या परिवर्तन को स्वीकार कर ले और डट कर मुकाबला करे? अगर वह परम्परा को ढ़ोता है तो दिन-प्रतिदिन परेशानियां बढ़ती ही रहेंगी। पद्म एक दिन आ कर खेत जोत भी जाय, परन्तु वह पहले जैसा हलवाहामिलना अब असंभव ही है। फिर वह कब तक दूसरों के घर का चक्कर लगा पाएगा? अपने आत्मसम्मान व स्वाभिमान पर कब तक वह खिस्स हंसी की आवाज बर्दाश्त कर सकेगा?

अगर वह परिवर्तन को स्वीकार कर लेता है तो परिस्थितियों का मुकाबला बेहतर तरीके से कर सकता है। भले ही इसके लिए उसे अपने अतीत की परम्परा को तोड़ना पड़े परन्तु इससे उसका वर्तमान जीवन सुधर सकता है। सबसे पहले तो उसे पदम के घर का चक्कर नही लगाना पडे़गा और खिस्सहँसी के आतंककारी अनुभव को झेलना नही पड़ेगा। बद्री प्रधान, कमला सिंह और मथुरा जैसे लोगों के स्वार्थी प्रस्तावों से भी छूट जाएगा। शहर में नौकरी का आकर्षण भले ही न छूटे, परन्तु अन्धा होकर वह नौकरी के पीछे नही भागेगा। अपने ही पुश्तैनी जमीन को सींचकर वह अपना जीवन व्यतीत कर सकता है। नौकरी का क्या भरोसा? मिले न मिले ? फिर दूसरों की इच्छा पर बंधना पड़ेगा। अपने घर में तो वह अपना मालिक है, जमीन भी उसकी अपनी हैं जीवानन्द के मन में हजारों तरह की बातें उभरती हैं। परन्तु इस मानसिक संघर्ष का मूल इसी द्वन्द्व में समाहित हैं कि वह क्या करे? पीढ़ियों की परम्परा को स्वयं ढ़हा दे? या परिवर्तन को स्वीकार कर ले? परिस्थितियाँ परिवर्तन को स्वीकार करने के पक्ष में हैं और जीवानन्द भी अन्ततः नये पथ पर अग्रसर हो जाता है। 

शेखर जोशी स्वयं बदलाव को स्वीकार करने के पक्षधर हैं और यही विचारधारा जीवानंद के व्यवहार में दिखायी पड़ती है। उनकी संवेदना में बदलाव के कारण किसानों के जीवन में आये संकट के प्रति  ममत्वपूर्ण हैं, फिर भी जीवन-राग उनसे छूटता नही। भयंकर कष्ट के बावजूद नवीनता को आत्मसात कर जीवन को जीना और जीते चले जाना ही जिजीविषा है। किसानों के जीवन में भले ही कष्टकारी परिवर्तन आए है, ‘हलवाहाजीवानन्द ने जीवन के लिए किसान-जीवन अपना लिया हैं, और यही स्वतन्त्र भारत में परिवर्तन के स्तर को स्वीकारने की संघर्षशील परिस्थितियाँ हैं। जिजीविषापूर्ण किसान जीवन की आत्मनिर्भर व कठिन श्रम करने की अपनी मूल छवि की नवीन स्वीकार्यता भी है।

                हलवाहा  में जीवानन्द के सामने यह समस्या चुनौती के रूप में आयी है। वह जाति से ब्राह्मण है,  इसलिए हल नहीं चला सकता। शेखर जोशी ने इस कहानी में ब्राह्मण को किसान बनते दिखाया है। यह परिवर्तन परिस्थितियों की अनिवार्य परिणति थी, परन्तु  किसान जीवन के सारे अवलम्बों का सही प्रयोग कर व्यावहारिकता का परिचय दिया गया है। इस प्रकार शेखर जोशी के लिए वर्ग और वर्ण से उभरती जटिलताएं संवेदना के स्तर पर ऐसे कथानकों के रूप में आती हैं। जातिगत प्रभुता और वर्चस्व के आधारों का खिसकना वे यहाँ लक्ष्य करते हैं।

इस तरह शेखर जोशी अपनी कहानियों में संवेदनशील मुद्दो को उठाते हैं और तत्कालीन सामाजिक यथार्थ में चाहे जितनी निराशाजनक परिथितियाँ हो, उनके बीच से ही रास्ता निकालने का मार्ग भी प्रशस्त करतें हैं। सम्भवतः यही कारण है कि शेखर जोशी अपने समकालीन कथाकारों से भिन्न दिखायी देतें हैं। जहाँ नयी कहानी के कहानीकार अकेलेपन के मनोविज्ञान तथा स्त्री-पुरुष सम्बन्धों के नये आयामों को अभिव्यक्त करने में मशगूल थे, और मध्यवर्गीय चरित्रों की स्थापना में लगे हुए थे, वहीं शेखर जोशी का ध्यान मुख्य रुप से मनुष्य की बुनियादी समस्याओं की ओर केन्द्रित था। उनकी कहानियों के कई पात्र जीवन के संघर्ष में कहीं बेहद अकेले पड़ जाते हैं। निश्चित ही अकेलापन आज की सामाजिक सच्चाई भी है और इस रुप में एक सामाजिक समस्या भी। इसके बावजूद भी शेखर जोशी ने इस मनोभाव को किसी चरित्र पर आरोपित नहीं किया है, बल्कि यही सच्चाई नैसर्गिक सच्चाई बन कर उनकी कहानियों में सहजता का रुप ले लेती है, और यही विशेषता उन्हे अन्य कहानीकारों से बिल्कुल भिन्न व्यक्तित्व के रुप में स्थापित भी करती है।


 
(गायत्री ने अभी हाल ही में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से चन्द्रकला त्रिपाठी के निर्देशन में अपना शोध कार्य ‘कहानीकार शेखर जोशी: कथ्य और शिल्प’ पूरा किया है.)

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