ममता सिंह का आलेख "आषाढ़ का पहला दिन बनाम ग्यारहवां दिन"

ममता सिंह



हिन्दू पंचांग का चौथा महीना है – आषाढ़। यह वह महीना है जब न केवल आसमान बल्कि मन-मस्तिष्क को भी काले कजरारे बादलों की शिद्दत से प्रतीक्षा रहती है। मिट्टी की सोंधी गंध फिज़ा में बनी रहती है. हरियाली कुछ और सघन हो कर झूमने लगती है. किसान हल-बैल के साथ खेतों में निकल पड़ते हैं. हालांकि बदलते हुए समय के साथ अब बहुत कुछ बदल चुका है. स्वाभाविक रूप से आषाढ़ का वर्णन साहित्य में भी प्रचुरता से आया है। इसी क्रम में मोहन राकेश के चर्चित नाटक ‘आषाढ़ के एक दिन’ की याद आती है। ममता सिंह ने इस आषाढ़ को ले कर एक निबन्ध लिखा है जिसे हम पहली बार के पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं।       


"आषाढ़ का पहला दिन बनाम ग्यारहवां दिन"

ममता सिंह


"मल्लिका-आषाढ़ का पहला दिन और ऐसी वर्षा, माँ!...ऐसी धारासार वर्षा! दूर-दूर तक की उपत्यकाएँ भीग गईं।.. और मैं भी तो! देखो न माँ कैसी भीग गई हूँ।"


इन पंक्तियों को पढ़ते हुए सहसा सोच उठी यदि आज आषाढ़ के ग्यारहवें दिन मल्लिका उपस्थित होती तो इस धूल-धूसरित, पपड़ियाये होंठों और उदास आँखों वाले श्रीहीन आषाढ़ को देख कर कैसे अपने मन में उमगती भावनाओं, छलछलाती उमंगों और निश्छल-तरल प्रेम की अभिव्यक्ति माँ के सम्मुख कर पाती!


मन के मौसम पर वातावरण का गहरा प्रभाव पड़ता है यह सर्वविदित है। ग्रीष्म के तपे हृदयों पर जब आषाढ़ की बूँदे बरसती हैं तभी प्रेम के अंकुर निकलते हैं, मनमयूर नाचता है, और उम्मीदें परवान चढ़ती हैं। पौधा प्रेम का हो या धान का स्नेह-जल बिन दोनों मुरझा और मर जायेंगे।


आज निष्चेष्ट आषाढ़ सोच रहा क्या यह वही है जिसकी प्रशंसा और प्रशस्ति में संस्कृत साहित्य से ले कर लोक साहित्य तक में जाने कितने आख्यान, गीत, कहानियाँ, महाकाव्य रचे गए.... "आईना मुझ से मेरी पहली सी सूरत मांगे" के तर्ज़ पर यह ढूंढ रहा खुद को अतीत के गौरवशाली इतिहास में... तनिक सा उझक कर देखने पर आषाढ़ के गौरव का पता जायसी के पदमावत में मिलता है जब नागमती चिंतित हो कहती है....


"चढ़ा आसाढ़ गगन घन गाजा।
साजा बिरह दुंद दल बाजा।
धूम, साम, धीरे घन धाये।
सेत धजा बग-पांति देखाये।"


आज नागमती होती तो निश्चिन्त होती पर आषाढ़ के नात-रिश्तेदार दादुर, मोर, पपीहा, झींगुर सब उसके बिना हैरान-परेशान हैं, जेठ की तपन से तृषित पावस के आगमन के इंतजार में उनके कंठ चिटक रहे, आँखों में रेत भर गई है... सदियों से संजोए गीत बिला गए।


कितना कुछ बदल गया... कितना कुछ सभ्यता/ विकास की बलि चढ़ गया, आज जहाँ किसानों को सांस लेने की फ़ुर्सत न होती वह बैठे हैं बादलों की ओर टकटकी लगाए क्योंकि तालाब पोखर सूखे हैं। जलस्तर ख़तरनाक हद तक नीचे जा चुका है.. फिर भी जहाँ संसाधन है, रुपया है वहाँ नलकूपों से,नहरों से खेत भर कर रोपनी हो रही... रोपनी के समय का उल्लास बीते समय की बात हो गई.. लोग चुपचाप किचड़ाये धान की जड़ों में अपने सुर और उल्लास  दबा दे रहे।


यूँ तो मानसूनी प्रदेश में बरखा की अनिश्चितता, कम या देर में होना सामान्य बात है पर जो सामान्य नहीं वह है इस स्थिति का साल दर साल गम्भीर समस्या में बदलते जाना... जानते हुए भी समस्या से आंखें चुराना, कुतर्क गढ़ना हमारी परंपरा रही है।बारिश की देरी महज प्राकृतिक संयोग नहीं वरन मनुष्य के अंतहीन लोभ और पर्यावरण की परवाह किये बिना हो रहे विकास का प्रतिफल भी है।


वह समय दूसरा था जब प्रकृति और मनुष्य का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध था।.. प्रकृति मानव जीवन के हर रूप में शामिल थी।.. यह अनायास नहीं था कि कालिदास ने मेघदूत में यक्ष के माध्यम से मेघों के हाथ प्रिया तक सन्देशा भिजवाया बल्कि यह संदेश था मनुष्य मात्र को कि हमारा अस्तित्व एक दूसरे के बिना सम्भव नहीं।


"त वय्यायत त कृषिफलमिति भ्रू विलासानभिज्ञईः
प्रीतिस्निग् धैर्जनपद वधू लोचनै पीयमानहः
सद्य सीरोत कषणमुरभि क्षेत्रमारिहय मालं
किंचित पश चादब्रज लघुगतिभूरायः एवोन तरेण"


अर्थात खेती का फल तुम्हारे अधीन है, इस उमंग से ग्राम-बधुटियां भौंहें चलाने में भोले, पर प्रेम से गीले अपने नेत्रों में तुम्हें भर लेंगी। माल क्षेत्र के ऊपर इस प्रकार उमड़-घुमड़ कर बरसना कि हल से तत्काल खुरची हुई भूमि गंधवती हो उठे। फिर कुछ देर बाद चटक-गति से तुम पुनः उत्तर की ओर चल पड़ना।



यह वह समय है जब हम विज्ञान और प्रौद्योगिकी में नित नये आयाम रच रहे, उसी रचे जाने की सनक में हम मेघों की उत्पत्ति के सबसे सशक्त कारक वृक्षों को बेहिचक काट रहे।.. वनों, जंगलों का सफाया कर वहाँ औद्योगिक और आवासीय स्थल विकसित करते समय हम भूल जाते हैं कि यदि वृक्ष नहीं होंगे तो बादल कैसे आएंगे?... बादल बिना बारिश और बारिश बिना जीवन कैसे चलेगा... कभी भवन निर्माण, कभी सड़क निर्माण तो कभी चौड़ीकरण के नाम पर सैकड़ों साल पुराने पेड़ों को काटने में सभ्य मनुष्यों को तनिक भी चिंता या क्षोभ नहीं होता।... वह अभी नलकूपों और सबमर्सिबल पम्प पर इतरा रहा है...। भूमि के सीने से जल की एक-एक बूंद खींचते वक्त वह बिल्कुल नहीं सोचता कि आख़िर कब तक भूमि में जल रहेगा.. तेजी से घटते जलस्तर भी उसे डरा नहीं रहे?


फ़िलहाल डीजल के आकाश छूते दामों और चिरौरी-विनती के बाद मिले पम्पिंग सेट, जुताई के महँगे ट्रैक्टर शुल्क के लिए किसी तरह कतर ब्योन्त और उधार-व्यवहार के बाद तैयार कुछ खेतों में रोपनी तो हो गई है पर जो किसान बारिश के भरोसे हैं वह अभी भी आकाश निहार रहे हैं। रोपनी के बाद तेज धूप और बिना बारिश के मुरझाए खेतों को देख "केदारनाथ सिंह" की कविता याद आती है...


"हम नये-नये धानों के बच्चे तुम्हें पुकार रहे
बादल ओ ! बादल ओ ! बादल ओ!
हम बच्चे हैं
(चिड़ियों की परछाईं पकड़ रहे हैं उड़-उड़)
हम बच्चे हैं,
हमें याद आई है जाने कितने जन्मों की
आज हो गया जी उन्मन!
तुम कि पिता हो
इंद्रधनुष बरसो
कि फूल बरसो
कि नींद बरसो
बादल ओ"


बमुश्किल सांस लेने भर को कीचड़ में खड़े यह धान-शिशु अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी से मरते बच्चों की तरह हैं जिनकी मृत्यु के पीछे के कारकों की पड़ताल करना कोई नहीं चाहता क्योंकि उनकी मृत्यु के पीछे असंवेदनशील मनुष्य के लोभ का इतिहास छुपा होता है। कहाँ पहले आषाढ़ में धारोधार बरसते मेंह के कारण मीलों पसरे जल चादर से सिर निकाले यह धान शिशु दुनिया को मुदित हो निहारते थे, कहाँ यह उदास, पियराये-मुरझाए बादल की राह निहार रहे।


बीत गए हमारे बालपन के वह दिन जब चढ़ते आषाढ़ धान रोपनी के लिए गीत गाती औरतों के झुंड निकलते थे। जैसे-जैसे बारिश तेज होती, गीतों का स्वर भी आकाश छूता।.. आषाढ़ बीतते धानों की कालिमा छूता हरापन बादलों के कालेपन से होड़ लेता दिखाई देता था।


वह कीचड़ से सने किंतु उत्फुल्लित चेहरे बस स्मृतियों में रह गए हैं जिनके सपनों में भी भात आता था। बाहर बरसता मेंह भीतर बटलोई में खदबदाते अदहन की धुन में नृत्यरत चावल संसार में सबसे मधुर बजती सिम्फनी पर सपनों के नृत्य की कथा है... तभी तो "केदार नाथ सिंह" की कविता हर किसान बादलों का आह्वान करते हुए कहता है...


"धान उगेंगे कि प्रान उगेंगे
उगेंगे हमारे खेत में,
आना जी बादल जरूर!"


ख़ैर सूखे धूल उड़ाते आषाढ़ से क्या शिकायत करना क्योंकि इसके स्नेह-जल के सूखने में हमारा बड़ा हाथ है। हम शर्मिन्दा हैं मल्लिका। हम शर्मिन्दा हैं यक्ष कि तुम्हारे बादलों की रक्षा हम नहीं कर सके।


सम्पर्क -

ग्राम - अग्रेसर 
पोस्ट - त्रिसुंडी रामगंज 
जिला - अमेठी - 228159  

टिप्पणियाँ

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (23-07-2018) को "एक नंगे चने की बगावत" (चर्चा अंक-3041) (चर्चा अंक-3034) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    राधा तिवारी

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  2. बहुत सुन्दर सावनी फुहार लिए प्रस्तुति

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति

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