प्रशान्त पाठक की कविताएँ


आज जब व्यापक पैमाने पर नफरतों का कारोबार किया जा रहा हो, एक दूसरे के बीच घृणायें फैलायीं जा रहीं हो, रचनाकार अपनी रचनात्मक सोच जारी रखे हुए हैं. यह दुनिया के लिए एक भरपूर उम्मीद है. घटाटोप अन्धकार के बीच प्रकाश के ये जुगनू अपनी कोशिशें लगातार जारी रखते हैं. इन्हें तमाम हताशाएं भी हताश नहीं कर पातीं. तमाम पराजएँ भी पराजित नहीं कर पातीं. प्रशान्त पाठक ऐसे ही कवि हैं जो चाहते हैं कि ‘रिश्तों की गर्माहट/ महसूस होती रहे/ हृदय के किसी गहरे तल तक/ माथे पर छलक आया पसीना/ घबराहट का नहीं/ मेहनत का हो/ आंखों से एक दूसरे को देख/ आंसू ही टपके/ खून नहीं... ...’ प्रशान्त की इधर की कविताओं में निखार स्पष्ट तौर पर दिख रहा है. आज पहली बार पर प्रशान्त की बिल्कुल टटकी कविताएँ देते हुए यह अहसास हो रहा है कि ‘बेहतरीन कविताएँ हमेशा टटकी होती हैं.’ अब प्रशान्त ने कवियों की दुनिया में अपने कदम रख दिए हैं. उनकी जिम्मेदारियाँ निश्चित रूप से बढ़ गयी हैं. इस युवा कवि का स्वागत करते हुए हम पहली बार पर प्रस्तुत कर रहे हैं इनकी कविताएँ.
             

प्रशान्त पाठक की कविताएँ


सिर्फ होना चाहिए इतना


सिर्फ होना चाहिए इतना 
भरोसा बना रहे अंत तक
तीर न धंसे किसी बात का
कोई खटक न रहे हर वक्त
हँसते मुस्कुराते 
आना जाना बना रहे
सीने में अकुलाहट बढ़ाती
कोई खास दिन कोई खास रात 
बार बार 
याद न आये बेवजह,,,,,,,,,,,

रिश्तों की गर्माहट 
महसूस होती रहे
हृदय के किसी गहरे तल तक
माथे पर छलक आया पसीना
घबराहट का नहीं 
मेहनत का हो
आंखों से एक दूसरे को देख
आंसू ही टपके 
खून नहीं... ...

सिर्फ होना चाहिए इतना
सब एक दूसरे को 
इंसान ही जाने
स्वर्ग से उतरा 
कोई देवता नहीं
माफ़ करते रहें 
गुस्ताखियों को
इतना अपनापन हमेशा बचा रहे,,,,,,,

सिर्फ होना चाहिए इतना 
कँप पड़ें होंठ 
मुस्कुराहट वाले
देखते ही पुकारने को
भर लेने को 
आलिंगन में
उठ पड़े हाथ
चूम लेने को माथा
उमड़ आये हृदय
बिछड़ जाते ही भर जाये
खालीपन की चादर... ...

सिर्फ होना चाहिए इतना ही...




बच्चे जब खाते हैं 


जब खाते हैं बच्चे
तो सिर्फ बच्चे ही नहीं
खाते उस वक्त
खाता है उनका गाल भी
खाता है उनका बाल भी
खाता है उनका कपड़ा भी 
खाता है उनका खिलौना भी
खाते हैं उनके वो दोस्त
जो खा नहीं सकते
जिन्दगी की दूसरी वजहों से
खाता है उनके आस-पास मौजूद
हर वो चीज 
जो छूट जाता है खिलाने से
उनके माताओं और पिताओं से....

बच्चे जब खाते हैं 
तब ही खाती है 
ये धरती भी ठीक से....

बच्चों का खाना ही
होता है खाना
इस धरती पर मौजूद 
उन तमाम माताओं पिताओं का
जो दिनों रात अपने बच्चों का
पेट भरने के लिए 
करते हैं
चिंता से भरे
हांड तोड़ मेहनत.....


बच्चे जब खाते ह़ै
तो अघा उठती है
ये सारी की सारी धरती
अपने ही उगाये अनाजों से
आसमान बरसता है झमाझम
नये रोपे पौधों की प्यास बुझाने
धूप खिल उठती है कुछ और सुनहरी
ताकि तेजी से बढती जायें वो फसलों में
हवा चलने लगती है कुछ और खुशनुमा
क्योंकि फैल सके खुशबू उन पके अनाजों की
और झूमने नाचने लगे सब उसके मदहोश गंध में

बच्चों का खाना ही
होता है खाना
उन सब का
जो नहीं खा पाते
भरपेट..........


सम्पर्क –

मोबाईल - 09450630932


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