अरविन्द गौतम की कविताएँ




कुछ अरसा पहले 'पहली बार' ब्लॉग पर हमने 'वाचन-पुनर्वाचन' कालम आरम्भ किया था जिसमें एक कवि दूसरे कवि पर टिप्पणी करते हुए उसकी कुछ चयनित कविताएँ प्रस्तुत करता है। इसी क्रम में आज युवा कवि शिवानन्द मिश्र की टिप्पणी के साथ नवोदित कवि अरविन्द गौतम की कविताएँ प्रस्तुत हैं। पहले शिवानन्द मिश्र की टिप्पणी

    
'गौतम अभी उस कच्चे घड़े के समान हैं जिसमें अपनी मिट्टी का सौंधापन और ठेठ देसीपन रचा-बसा है और जो समय की आँच में पकने के बाद अपने शीतल काव्य सुधा से हमारे अंतर्तम को तृप्त कर जाएगा। ये कहते भी हैं ......मैं जौनपुरी बन जाता हूँ जब मिट्टी में सन जाता हूँ .....। गौतम अपनी जड़ों और परम्पराओं से तो जुड़े हैं लेकिन उन रूढ़ियों से नहीं जो समाज को पीछे ले जाती हैं। गौतम आज के समाज में व्याप्त ऊँच-नीच का भेद-भाव, छोटे-बड़े की थोपी हुई मान्यताओं पर सवाल खड़े करते हैं। कहना न होगा कि कवि में अपार सम्भावनाएँ हैं।'

-         शिवानन्द मिश्र 


  अरविन्द गौतम की कविताएँ


जौनपुरी मैं बन जाता हूँ


जौनपुरी मैं बन जाता हूँ
जब मिट्टी में सन जाता हूँ
            बोली भाषा भाव बचन
            सब बदल हैं जाते
            जब अपनों से घिर जाता हूँ।

कोई साल महीने में
जब आ जाता है
मिलने मुझ से
अपने सब काम छोड छाड़ कर
मैं उससे मिल जाता हूँ।




इक नदी सीधी बह रही थी


इक नदी
सीधी बह रही थी
शांत शीतल सी धरा पर
चल रही थी
दोनों तट
समतल दिखे थे
दोनों ही तट के किनारे
पक्षियों के
पर दिखे थे
हरे भरे जंगल दिखे थे
फसलों की लम्बी कतारें
और कतारों के किनारे
तर दिखे थे
ऐसा ही तो
दिख रहा था
स्वप्न में
कि देखा मैंने
धरती कुछ
कॉपी थी जैसे
और अचानक
नदी टेढी हो गयी थी
और फिर कुछ यॅू हुआ कि
एक तट ऊँचा हुआ
और दूसरा नीचा हुआ था
और नदी
अब रूप थोडा सा नहीं
ज्यादा बदल कर
बह रही थी
ऊँचे तट से साफ पानी
और निचले तट से  
पूरी गंदगी के साथ
नदी अब चल रही थी
निचले तट ही के किनारे
इस ढुलाई में कहीं
रह रह कर
पानी रूक रहा था
खाइयों और खन्तियों के
निचले तल में
और संग में रूक रही थी
ढेर सारी गंदगी- बदबू के संग में

समय बीता
गंदगी अब खाद में बदली हुई थी
खाद से पौधे उगे थे
और तब जब धरा कुछ
समृद्ध हो समतल हुई तो
जैसे एक तूफान आया
पानी अब तक जो चला था
धीमी गति से
अब वहीं कुछ
तीव्र हो तूफान सा
फिर से चला था
अपने ऊँचे पाट को
कुछ नम बना कर
थोडे बहुत पतवार
जो तट पर पड़े थे
उन सभी को साथ ले कर
डूबते से निचले तट को
रौदने को।

देखता हूँ स्वप्न में हर साल
यह तट
निचले तट को
रौदता ही चल रहा है।
भले स्वयं उपजा ना पाए
उन परिंदों के लिए
भोजन के साधन
जो नदी में तैरते हैं
जो हवा में उड रहे हैं
और जो इस तट पर जीवन काटते हैं
और इसके बाद भी यह
ऊँचा तट
चिल्ला रहा है
अपने को दूसरे से
उच्चतर बता रहा है

मैंने देखा पुनः धरती
कॉप उठी
नदी फिर से
सीधी हो कर
अपने पथ को नाप उठी
अब तलक जो पट
हुए थे उच्च अधम
दोनों ही अब पूर्व जैसे
सम दिखे थे
दोनों ही तट के किनारे
नम दिखे थे
और इसके साथ ही
दोनों ही तट के किनारे
कूल मिले, फूल मिले और
समता नाच उठी।



आह तुम सुनते नहीं

आह तुम सुनते नहीं
यूँ देखते हो
आँख से
पर मन में
कुछ गुनते नहीं।

तुम अगर ये सुन भी लो
तो हाय!

कुछ करते नहीं।
यूँ देखते हो
आँख से
पर मन में कुछ गुनते नहीं।
आह तुम सुनते नहीं........।

थाम कर पतवार हम
मझधार तक आये मगर
है किधर जाना
दिशा अब
हाय! तुम चुनते नहीं
यूँ देखते हो
आँख से
पर मन में कुछ गुनते नहीं।
आह! तुम सुनते नहीं............।

हो जहाँ रौशन सभी का रोशनी से
तम का आना हर समय बाधित रहे
ओ रहनुमा तुम उस जहाँ का
खुशनुमा सा
ख्वाब क्यूँ बुनते नहीं।
यूँ देखते हो
आँख से
पर मन में कुछ गुनते नहीं।
आह! तुम सुनते नहीं.............।

यूँ ना कर कि सब्र का तटबन्ध टूटे
और इक सैलाब आये
जिंदगी और मौत की
भरमार लाये
आह और कलंक
अपने साथ लाये
हाँ, तनिक ऐसा ही
कुछ होने को है
वह शोर तुम सुनते नहीं।
आह! तुम सुनते नहीं.............।



सम्पर्क –

अरविन्द गौतम – 08004996757
शिवानन्द मिश्रा - 08789436343


(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स वरिष्ठ कवि विजेन्द्र जी की हैं.)

  

टिप्पणियाँ

  1. बहुत अच्छा लगा अपनी कविता को ब्लॉग पर देखकर....

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  2. Very good sir.
    Glad to see the Litrature Talent is still alive in the toughest environment of High Court.
    Keep It up both Sir (Arvind Sir and Shivanand Sir).

    --Nilesh Mishra

    उत्तर देंहटाएं
  3. ऐसा कमाल का लिखा है आपने कि पढ़ते समय एक बार भी ले बाधित नहीं हुआ और भाव तो सीधे मन तक पहुंचे !!

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    उत्तर
    1. मेरी कविता पर प्रतिक्रिया अच्छी लगी... धन्यवाद....

      हटाएं

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