रेखा चमोली की कविताएँ

रेखा चमोली

इधर के जिन कवियों की कविता में उतरोत्तर विकास दिखायी पड़ता है उसमें रेखा चमोली का नाम प्रमुख रूप से लिया जा सकता है. रेखा की नयी कविताएँ इसकी एक बानगी हैं जिनमें काव्यत्व के साथ उनकी दृष्टि सम्पन्नता सहज ही देखी जा सकती है. आज जब जीवन की दुश्वारियां बढीं हैं. हत्या और आत्महत्या की खबरें आम हैं ऐसे में रेखा की ‘आत्महत्या माय फुट’ कविता हमें आश्वस्त करती है कि (स्वयं रेखा चमोली के ही शब्दों में कहें तो) ‘जीना कितना भी दुश्वार क्यों न हो/ मरने से थोड़ा सा हसीन तो होता ही है’ जीवन हमेशा बड़ा होता है. यह अलग बात है कि आज इसी जीवन के लिए जाति, धर्म, भाषा आदि के नाम पर खतरे पैदा किए जा रहे हैं. ऐसे में चंडीदास की पंक्ति याद आती है ‘सबसे ऊपर मनुष्य धर्म है/ उसके ऊपर कुछ भी नहीं.’ आज पहली बार पर रेखा चमोली की कुछ नयी और तारो-ताजा कविताएँ प्रस्तुत हैं. तो आइए आज पढ़ते हैं रेखा चमोली की कविताएँ. 


रेखा चमोली की कविताएँ 

                                                    

आत्महत्या माय फुट


बहुत बार मन करता है तेज स्कूटर चलाते हुए,
किसी पहाड़ी मोड पर कर लूं आँखें  बंद
कुछेक मिनट की बात होगी और किस्सा खत्म

या फिर कूद जाऊं छप से
नदी के गहरे हरे नीले ठंडे पानी में
जब भरेगा फेफड़ों में पानी
तड़प कर बाहर निकलने का होगा मन
कुछ दिनों बाद फूला भद्दा शरीर फंसा मिलेगा
किन्हीं पत्थरों की ओट में आधा मछलियों का खाया हुआ

कभी सोचती हूँ अनमनी बैठी रहूँ देर तक
पाला बरसाते आसमान के नीचे
जब तक जम कर लुढक न जाऊं एक ओर

पर पलक झपकते ही झटके से खुल जाती हैं बोझिल आँखें
पानी पर उभरती है एक छाया
आसमान में टिमटिमाता है कोई तारा
इंतजार करती दिखती हैं दो जोड़ी आँखें

आना होता है बार बार लौट कर वहीं
जहां से उठती हैं मन में ये ख्वाहिशें
मरना इतना आसान होता तो कब की खत्म हो जाती ये दुनिया
मरना अपने हाथ में नहीं पर आत्महत्या तो है
क्या फायदा ऐसे जीवन का जिसमें जीने की कोई लय न हो
अंतहीन चलना हो थकान कभी उतरती न हो

पिछले साल मरने की सोची तो याद आया बिटिया की बोर्ड परीक्षा है
कैसे संभालेगी वो अपने आप को
इस साल सोचती हूँ अभी छोटा है बेटा
थोड़ा बड़ा हो जाए
कर सके अपनी देखभाल

बार-बार यही होता है
मरने से ठीक पहले याद आ जाता है कोई न कोई जरूरी काम
मन के चोर कोने से झांकता है कोई बहाना
कोई नया अर्थ खुलता है अपने होने का

माँ का जान बूझ कर मरना कोई आसान बात नहीं
फिर भी हर सेंकड मर जाती या मार डाली जाती है कोई न कोई माँ

मरना स्थगित करने के बाद
शीशे में मुस्कुराता है आंसुओं से भीगा चेहरा

जानी! जीना कितना भी दुश्वार क्यों न हो
मरने से थोड़ा सा हसीन तो होता ही है।




जाने के बाद


अस्त व्यस्त है कमरा
तकिया चादर पर सिलवटें अटकी हैं
फर्श पर फैले हैं कागज
थोडी सी खीझ और ढेर सारी उदासी
धुंधले से उभरते हैं यादों के खट्टे मीठे दृश्य
छूने से मिट जाने वाले
याद आने पर रूलाने वाले
एक अजीब सी मनहूसियत और इंतजार पसरा है
ठंडे कमरे में बंद हीटर की शक्ल में।



खेलने के लिए


कितनी जगह है इस दुनिया में
दीवारें बनाने के लिए
पंडाल लगाने के लिए
युद्ध वाहनों को खडा करने के लिए
युद्ध परीक्षणों के लिए
मॉल, दुकानों, होटलों, बाजारों के लिए
संकरी से संकरी सड़क पर गाड़ियाँ खड़ी करने के लिए
कूडा फेंकने के लिए तो मनमानी जगहें हैं
बस नहीं हैं तो कोई जगह बच्चों के खेलने के लिए।





अघोषित युद्ध

आत्महत्या करने वाला
अपने पीछे छोड़ जाता है कई सवाल
जो बहुत कुछ मेल खाते हैं उन सवालों से
जो किसी निर्दोष की हत्या होते हुए उसकी चीखों से उपजे थे
हम इन सवालों से चुराते हैं आँखें
पलटते हैं पन्ने
लिखते हैं पंक्तियां
मचाते हैं शोर
करते हैं रोजमर्रा के काम
देखते हैं फूहड टी वी चैनल
प्रायोजित समाचारों में ढूंढते हैं हल
और धीरे-धीरे करते हैं खुद को तैयार
आत्मघाती हमलों के लिए
हत्यारे का शिकार होने के लिए
हम इस लतफहमी में काटते हैं दिन कि बचा ही लेगा
कोई धर्म, जाति या भीड़ का हिस्सा
हमें शिकार होने से

हम एक अघोषित युद्ध लड़ रहे हैं।



हत्यारे

वे चाहते हैं
अव्यवस्थाएँ इतनी फैलें
कि हम इन्हें मान लें अपनी दिनचर्या

इतना शोर मचे
कि हमें लगे शोर है तो चल रही हैं सांसे

सडकों पर इतना खून बहे
कि हम लाल रं को लेकर तटस्थ हो जाएँ

इतनी अफवाहें हों हवा में कि
असल बात कहीं दफ्न हो जाए

आत्महत्याएँ इतनी आम हों कि
इन्हें स्वाभाविक मान लिया जाए

वे हमारी सामूहिक हत्याओं की तैयारी में हैं।



अपने हिस्से का प्रेम


जब तुम कहते हो, इन दिनों धूप सुनहरी लरही है
मैं तुम्हारी हथेली का ताप अपनी हथेली पर महसूस करती हूँ
जब तुम कहते हो, देखो तो कितने नवजात पत्ते झांक रहे हैं टहनियों से
मुझे अपनी त्वचा चमकदार दिखती है
जब तुम कहते हो, समय के साथ नदी का पानी रंबदलता है
मुझे लता है
मेरी सारी थकान ठंडे पानी में बह यी है
तुम्हारा यह सब कहना तुम्हारी किसी भी बात का हिस्सा क्यों न हो
मैं अपने लिए चुन ही लेती हूँ
अपने हिस्से का प्रेम।

(अपने हिस्से का प्रेम नित्यानंद गायेन जी के कविता संग्रह का भी शीर्षक है, उन्हें आभार सहित।)




महिला मित्र


आपके साथ इनको हमेशा संदेह से देखा जाता है
हमउम्र या छोटी हो तो शंका और भी हराती है
आपके जीवन में नाटक के उस पात्र जैसा होता है इनका रोल
जिसे जरूरत पड़ने पर कोई भी निभा सकता है
ये आम दोस्तों की तरह नहीं जा सकतीं आपके स्कूटर के पीछे बैठ कर
इनके साथ किसी सड़क किनारे ढाबे पर
नहीं पी जा सकती एक कप चाय
पारिवारिक समाराहों में इन्हें नहीं मिलता मौका माँलिक गीगाने का
जबकि ये यह सब करना चाहती हैं
ये आपकी पीठ पर एक धप्पा मार कर चौंकाना चाहती हैं
देर शाम फोन पर अपनी कविता सुनाना चाहती हैं
किसी बहस में उलझे-उलझे सडक पर घूमना चाहती हैं
कठिन समय में हाथ पकड़ कर साथ होने का भरोसा देना चाहती हैं
पहाड की ऊंची चोटी पर चढ कर जोर से आपका नाम पुकारना चाहती हैं
लांड्राइव पर आपके साथ किशोर लता के गाने सुनना चाहती हैं
ये आपकी हर बात को धैर्य से सुनती हैं
इनसे बात करके आप थोडा और जीना चाहते हैं
दुनिया पर आपका भरोसा थोड़ा और ज्यादा बढ जाता है
ये आपके लिए दरवाजे के पीछे लगे हैंर सी जरूरी होती हैं

इनकी भूमिका हमेशा परदे के पीछे की होती है
इनकी फोन काल्स और मैसैजस को आप तुरंत डिलीट कर देते हैं
आपके आस-पास के लोगों को ये क्यारी में उगे अनचाहे पौधे सी खटकती हैं
इनके आने पर शुरू हुई खुफुसाहट अर्थभरी मुस्कानों पर रूकती हैं

आप इनको कभी नहीं देख पाते घर के कपडों में
बर्तन साफ करते या कपडे धोते
ना ही आपका सामना इनसे कभी सिलेण्डर की लाइन में होता है
आप कई बार नहीं जान पाते
पिछले दिनों किस कदर बुखार से तप रहीं थीं ये
ये भी कहॉ पूछ पाती हैं समय पर आपकी खैर खबर
ये ऐसा कुछ भी नहीं कर पातीं हैं
ये आपकी महिला मित्र जो होती हैं।


सम्पर्क-

रेखा चमोली
जोशियाडा, उत्तरकाशी
उत्तराखण्ड 249193
        

मोबाईल- 9411576387


(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स विजेन्द्र जी की हैं)  

टिप्पणियाँ

  1. बहुत सुन्‍दर भावों को शब्‍दों में समेट कर रोचक शैली में प्रस्‍तुत करने का आपका ये अंदाज बहुत अच्‍छा लगा,

    जवाब देंहटाएं
  2. कुछ कविताओं ने बहुत प्रभावित किया।
    हत्यारे आज के हिंसक वातावरण को जैसा बनाये रखना चाहते हैं,उसका चिट्ठा है।वे सचमुच यही चाहते हैं,दुरभाग्य से यह बढ़ता ही जा रहा है।
    महिला मित्र हमारी सामाजिक ढांचे में अस्वीकृत हैं,उन्हें हर बार उसी नजर से देखा जाता है जैसेे दो सदी पहले ।उस समस्याओं की जटिलता में उतरती है यह कविता।
    बधाई रेखा जी। और संतोष भाई का धन्यवाद।

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  3. जब भी कोई साहित्यकार जो जीता है वही लिखता है अपने जीए हुए को ही अपने साहित्य का विषय बनाता है तो हम सब के जीवन के ज्यादा करीब होता है यही कारण है कि उनकी कविताएं हमारे जीवन से जुड़ी हुई लगती हैं यह बात रेखा चमोली जी की कविताओं में बिल्कुल स्पष्ट है चाहे बच्चों के खेल के मैदान वाली बात हो या चलते हुए आत्महत्या कर लेने वाली बात सभी कविताएं जीवन के बेहद करीब है
    खासकर महिला मित्र कविता मुझे बहुत पसंद आई बहुत बहुत बधाई

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  4. जानी! जीना कितना भी दुश्वार क्यों न हो
    मरने से थोड़ा सा हसीन तो होता ही है।

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