आशीष मिश्र का आलेख ‘ये जो हमारा क्षयग्रस्त जीवन है’

मन्नू भण्डारी

               
पाखी का मन्नू भण्डारी पर केन्द्रित अंक अभी-अभी प्रकाशित हुआ है। इस अंक में एक आलेख युवा आलोचक आशीष मिश्र का भी है। हम पहली बार के पाठकों के लिए इसे यहाँ पर प्रस्तुत कर रहे हैं। तो आइए पढ़ते हैं आशीष मिश्र का यह आलेख ‘ये जो हमारा क्षयग्रस्त जीवन है’ 

‘ये जो हमारा क्षयग्रस्त जीवन है’

आशीष मिश्र

नई कहानी के दौर में जिन महिला कहानीकारों ने कथा में जगह बनाया उन्हें आज भी इत्यादि में गिना जाता है,क्योंकि कनिष्ठिकाधीष्ठित और अंगुलिपरिगणनीय तो पुरुष ही हैं। परंतु ठीक से देखा जाए तो मन्नू भण्डारी, कृष्णा सोबती, उषा प्रियम्वदा की कहानियाँ कथित नायकों की आत्मबद्ध दुनिया को सेंसर करती हुई, उन्हें तोड़ती हुई नज़र आती हैं। वे स्त्री की निर्मित छवियों को तोड़ने के साथ-साथ पुंसवाद के महीन भाव-सम्बन्धों तक को भी उधेड़ती हैं। पुरुष कहानीकारों की अपेक्षा इनका रुख भी अपने समय-समाज के प्रति ज़्यादा आलोचनात्मक है। यह बहुत स्वाभाविक है, कारण कि उन्हें जिस दुनिया में, जिस भाषा में खुद को संभव करना है, वह पुरुष की आत्मवत्ता का विस्तार है पर इसे सार्वभौमिक बोध की तरह फैला दिया गया है। इसलिए लगातार एक आलोचनात्मक विवेक सक्रिय दिखता है। इस बात को समझने के लिए मैंने यादृच्छिक ढंग से हाथ में आये पहले संग्रह से पहली कहानी ही चुन ली। और यह कहानी यही सच है संकलन की अपेक्षाकृत कम चर्चित क्षय शीर्षक से है।

मन्नू भण्डारी

कहानी में एक क्षयग्रस्त बाप है, पूँजी के नाम पर जिसके पास कुल पंद्रह हजार जमा हैं। और इस छोटी-सी पूँजी के प्रति उम्र के साथ उसका मोह बढ़ता जा रहा है। जिसे वह कभी कुन्ती के ब्याह के लिए बता कर एक उत्तरदायी बाप होने का संतोष प्राप्त करता है तो कभी अपने बेटे टुन्नी की पढ़ाई के लिए बता कर उसके उज्ज्वल भविष्य की कल्पना का सुख लेता है। वह अपने सारे आदर्श छोड़ कर फेल बेटे को अगली क्लास में किसी तरह पहुँचा देना चाहता है। वह इतनी छोटी-सी चीज़ के लिए अपना सारा आदर्श छोड़ सकता है। इस समय एक निम्न मध्य वर्ग का व्यक्ति अपने किस मानसिक नरक में जी रहा है - उस उथल-पुथल को संवेदना के स्तर पर कहानी में महसूस किया जा सकता है। उच्च मध्य वर्ग पहले से ही पतित है। धनाढ्य सावित्री की माँ किसी तरह, पैसे ले-दे कर भी अपनी बेटी को पास करवा लेना चाहती है। निम्न मध्य वर्ग भी सुविधाओं के लिए अपने आदर्श को छोड़ रहा है। आख़िर कुन्ती यही तो करती है। वह गाड़ी और ट्राम की सवारी में अंतर समझने लगी है। वह उस सुविधा को छोड़ना नहीं चाहती। इसीलिए तो वह सावित्री की माँ के कहने से उसे पास करवाने स्कूल तक जाती है। वह पहले सोचती है कि अगर वह सावित्री को सुधरते हुए नहीं देखेगी तो ट्यूशन छोड़ देगी पर बाद में वह किसी तरह इसे छोड़ना नहीं चाहती। पहले वह मकान मालिक के बच्चों के ट्यूटर को देखती है, जो इक्के पर सर-समान लदवा कर लाते हैं, और सोचती है कि वह स्वाभिमान के साथ जियेगी, कुछ रुपयों के लिए ऐसा गिर नहीं जाएगी। पर धीरे-धीरे सब कुछ स्वीकार करने लगती है। जिसके विरोध में उसकी मनोरचना हुई थी उसी से अनुकूलित होने लगती है। कुन्ती को इतना आत्महीन बना देने वाली परिस्थितियों के साथ-साथ एक हद तक सुविधाओं का मोह भी शामिल है। पर अंततः आदर्श उसे ऐसा करने नहीं देता, उसका विवेक, उसका जीवन-मूल्य जीतता है। वह कह नहीं पाती, सिफ़ारिश नहीं कर पाती। उसके आदर्शों पर स्कूल के सहकर्मी हँसते हैं। पर वह अपने पीड़ित विवेक के साथ जिंदा है। वह ख़ुद से संघर्ष करती मनुष्य के रूप में आलोचनात्मक और नैतिक भूमि का बड़ा बिम्ब है। वह परिस्थितियों में ढह रहा है पर लड़ रहा है। अंततः इसी पीड़ित विवेक से इस मनुष्यता को आशा भी है। मन्नू भण्डारी कोई आदर्श नहीं रच रही हैं, वे आदर्श के टूटने की कथा रच रही हैं। वे दिखा रही हैं कि आदर्श के साथ जीता मनुष्य कैसे क्षयग्रस्त हो रहा है।


स्वातंत्र्योत्तर कथा मे टी॰ बी॰ (क्षय) और कविता में कनेर के पीले फूलों का बिदका देने की हद तक चित्रण है। क्षय रोग पर लिखी कहानियां इतनी रूमानी लगती हैं कि कई बार मन होता है कि मुझे भी हो जाए। और इसी तरह सूर्य के साथ एक पीले आलोकवृत्त में लिपटा धीरे-धीरे मैं भी डूब जाऊँ। और अगर मुझे न हो, तो मेरे किसी क़रीबी को हो जाए और उसे एक पीली रोशनी में मरते हुए देखूँ और उस पर कविता या कहानी लिख सकूँ। हाँ, अगर मुझे हो तो इतना पैसा ज़रूर हो कि किसी हिल स्टेशन पर, सेनोटोरियम में जा सकूँ। असाध्य रोग भी इतना आकर्षक होगा - यह स्वातंत्र्योत्तर कहानियों को पढ़ते हुए विश्वास होने लगता है। नई कहानियों से पूर्व समाज से व्यक्ति की तरफ़ आने या फिर व्यक्ति को समाज के विस्तृत संदर्भ में कार्य-कारण संबंध में देखने-पहचानने का प्रयास होता है। नई कहानी में व्यक्ति से समाज की तरफ जाने का प्रयास है। यहाँ व्यक्ति एक प्रस्थान बिन्दु है, वहाँ खड़ा हो कर समाज को देखने का बोध है। क्षय रोग व्यक्ति को समाज से काटने और तत्सन्दर्भ में सोचने के लिए प्लाट उपलब्ध करवाता है। यह सही है कि तत्कालीन समाज में यह एक असाध्य रोग था पर साहित्य में यह रोग के रूप में नहीं दर्शन के रूप में है। इस दर्शन को सहारा था अस्तित्ववाद का। मन्नू भण्डारी की यह कहानी पढ़ते हुए मेरे दिमाग में तमाम कहानियाँ, कविताएं गूँजने लगती हैं। और सके  साथ इस कहानी की वस्तु और वास्तु भी नये तरह से खुलने लगता है। यह कहानी किसी तरह के रोग, शारीरिक-सामाजिक रोग के सौंदर्यीकृत रूमान को अपने ढंग से विच्छेदित करती हैं। कहानी अपने मूल कथ्य में इस शारीरिक व्याधि को सामाजिक व्याधि में बदलती है। एक निम्न-मध्य वर्गीय समाज किस तरह क्षयग्रस्त होता जा रहा है - मन्नू भण्डारी इसका पूरा संदर्भ देती हैं। कोई अन्य कहानीकार होता तो इसे नैतिक, व्यक्तिगत या मनोवैज्ञानिक समस्या में रिड्यूश कर देता, परन्तु  मन्नू भण्डारी जिस तरह चीज़ों को एक सकारण ऐतिहासिक प्रक्रिया में रखती हैं, उससे किसी चरित्र के साथ उसका रचनाभूत संरचनात्मक-संदर्भ उद्घाटित हो जाता है।

मन्नू भण्डारी
आधुनिकता मनुष्य को एकक्रिटिकल स्पेसकी तरह मानती है। जो चीज़ों को समझ सकता है और उन्हें रच सकता है। जो तर्क से सही-गलत का फर्क कर सकता है। जिसमें एक मूल्यबोध है और चीज़ों को सही दिशा में ले जाना चाहता है। यह कहानी मनुष्य के रूप में इसआलोचनात्मक भूमिका छीजते जाना है। और मन्नू भण्डारी कहीं भी उस चरित्र को दोषारोपित नहीं करती हैं, उसके भौतिक परिदृश्य को भी रचती हैं। अगर यह कारणभूत परिदृश्य छूट जाता तो कहानी एक अस्तित्ववादी बोध का रूपक बन जाती पर मन्नू भण्डारी सजग हैं। कुन्ती की वायलिन इस मनुष्यता की एक और पहचान है। जब वह बहुत ऊब जाती है तो छत पर जा कर वायलिन बजाती है। यही उसके नीरस जीवन का एक आधार था। बाद में इसे सिर्फ देखती रहती है और कभी धूल साफ कर देती है। वह कहती है कि इसे एकटक देखते रहना भी सांत्वना देता है। कहानी के अंत में संकेत है कि वायलिन पर धूल की मोटी परत जम गयी है, वायलिन बजाना तो छूट ही गया इसकी धूल भी नहीं पोछ पाती, फिर वह सोचती है कि क्या वह कभी वायलिन बजा पाएगी? यह एक समानान्तर अवांतर कथा है पर कहानी की मूल भाव-दृष्टि, कहानी की आँख इस संकेत में ही है। वह अपने अंदर संवेदनशीलता को बचाए रखना चाहती है, उस सर्जनात्मक, आलोचनात्मक जमीन को बचाए रखना चाहती है। और जब यह सोचती है कि क्या वह इसे फिर बजा पाएगी? तो यह पूछ रही होती है कि क्या वह अपने सर्जनात्मक आत्म को फिर से पा सकेगी? आज जब हम 21 वीं शताब्दी में इस कहानी को पढ़ रहे हैं तो पाते हैं कि यह सर्जनात्मक आत्म नष्ट हो चुका है और हमारे चेतन-अवचेतन में उसे बचाए रखने की कोई चाहत भी नहीं! एलियनेशन का यह बहुत संवेदनशील बिम्ब है। अपने से ही कटते जाने की इस प्रक्रिया को क्षय ही कहा जा सकता था। हमारे समय में मीडिया द्वारा इस प्रक्रिया को एक सौंदर्यबोध की तरह फैलाया जाता है। हम इसे ही जीवन मान लेते हैं। कहाँ कुन्ती अपने पिता को बीमार देख कर परेशान हो जाती थी और बाद में सोचती है कि अब उन्हें मर जाना चाहिए। वह सोचती है कि अब छोटा भाई क्यों नहीं संभालता पिता को। यह एक दिशा है जिस तरफ़ एक वर्ग का विकास हुआ है। यह जीवन और संवेदनशीलता से कटते जाने की प्रक्रिया है। कुन्ती के भाव-बोध में परिवर्तन वायलिन के माध्यम से बहुत सूक्ष्मता से व्यंजित हुआ है। दोनों में बहुत संवादी संबंध है और इस छोटे से संकेत के छूट जाने से कहानी छूट सकती है। हम आज जिस उत्तर-आधुनिक समय में हैं उसमें कुछ छूटने का, असंवेदनशील होते जाने का, निष्क्रिय उपभोक्ता होते जाने का बोध ही नष्ट हो गया है। इस कहानी में हमारा अपना समय भ्रूण के रूप में देखा जा सकता है। यह किसी भी अच्छी रचना की प्रवृत्ति होती है। अच्छी कहानियों में भूत और भविष्य एक साथ झलक उठता है। 
    
मन्नू भण्डारी की कहानियों में अधिकतर निम्न-मध्यवर्गी स्त्रियाँ आती हैं। वे कई स्तरों पर सक्षम हैं पर संरचनागत दबावों में निरंतर संघर्षरत  दिती हैं। वे एक मनुष्य, एक स्त्री के रूप में गरिमा पूर्ण जीवन के लिए निरंतर संघर्ष में हैं। अधिकतर कहानियों में यह व्यंजना है कि स्त्री की मुक्ति निरपेक्ष नहीं है। संरचनात्मक बदलाव के बिना यह टूटन, यह द्वंद्व रहेगा ही। इन कहानियों में बहुत यथार्थ ढंग से स्त्री लड़ती हुई और टूटती हुई भी दिखती हैं। कुन्ती एक स्कूल में टीचर है। उसमें आत्मसम्मान बहुत गहराई से भरा हुआ है। वह इसी के साथ जीना चाहती है। इस तरह जीने के लिए वह संघर्ष करती है। यह उसका संघर्ष ही एक बिम्ब है। पर यह कहानी स्त्री जागरण के लिए लिखी जाने वाली रस्मी कहानी नहीं है। उससे अलग एक सक्षम स्त्री का संघर्ष है, जो आर्थिक स्तर पर मज़बूत होकर भी अपने वर्गीय निर्मितियों से मुक्त नहीं हो जाती है। यह बात तो इस कहानी से पता चल जाती है कि संकट कुन्ती के अंदर नहीं उस संरचना में है जिस संरचना में वह जिंदा है, जिस संरचना ने उसे रचा है। पर कहानी उस संरचना को विश्लेषित नहीं करती है। यह उनकी लगभग कहानियों में है। एक कहानी से इतनी आशा भी नहीं की जा सकती। इसकी अपनी विधागत सीमाएँ हैं, संरचनात्मक संदर्भों की तरफ़ संकेत भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। इस दौर की अधिकतर कहानियों में बादलों के घेरे तो हैं पर उस घेरे के कारण की तरफ कोई इशारा नहीं है। 
    
कहानी बहुत सुलझी हुई ऋजु रेखीय गति करती है। कथा का विकास एक दिशा में होता है। पर नई कहानियों की प्रतीक रचने वाली ख़ास प्रवृत्ति इस कहानी में बहुत सूक्ष्म और गहराई से है। यही काम इस दौर के अधिकतर कहानीकार बहुत उथले ढंग से करते हैं। पात्र तो कई हैं पर चरित्र एक ही है। अधिकतम दोकुन्ती और उसके पापा। पर कहानी मेंफोकल प्वाइंटकुन्ती है और अगर फोकल प्वाइंट पापा को बना दिया जाए तो कहानी दूसरी होगी। यह चुनाव सार्थक है, इससे स्त्री के संघर्ष का एक बड़ा और यथार्थ प्रकाश-वृत्त में आता है। यह कहानी कई स्तरों परयही सच हैशीर्षक कहानी से ज़्यादा सार्थक कहानी है और एक दौर के जीवन को बहुत संवेदनशीलता से खोलती है। यह सिर्फ टेकनीक से संभव नहीं है। बल्कि इस बात का प्रमाण है कि अगर बात स्पष्ट और सुलझी हुई हो तो टेकनीक भी इतनी ही सुलझी हुई हो सकती है। जब हम लगभग आधी शताब्दी बाद इस कहानी को पढ़ते हैं। यह दुनिया मन्नू भण्डारी की दुनिया से बहुत अलग है पर इस कहानी में आने वाली हमारी दुनिया साफ झलक उठती है।   

आशीष मिश्र








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