शिरीष कुमार मौर्य की 15 नई कविताएं






साहित्य की जो सबसे बड़ी खूबी है वह यही है कि वह हर समय में शोषण और अत्याचार के खिलाफ खड़ा रहता है. सत्ता जो एक मद जैसा होता है, उसको उसकी सीमा का अहसास यह साहित्य ही कराता है. यह इसलिए भी काबिलेगौर है कि अभी-अभी हुए आम चुनावों में मीडिया (जिसे अब तक लोकतन्त्र का चौथा स्तम्भ भी कहा जाता रहा है) ने जो संदिग्ध भूमिका निभायी और जिस तरह यह एक व्यक्ति और दल की कठपुतली बन कर रह गया उससे इसकी निष्पक्षता की तरफ उंगलियाँ उठने लगी हैं. ऐसे में साहित्य प्रतिरोध के सबसे मजबूत स्तम्भ के रूप में उभर कर सामने आता है. शिरीष कुमार मौर्य हमारे समय के ऐसे कवि हैं जो अपनी कविताओं के माध्यम से अपना मुखर प्रतिरोध दर्ज कराते हैं. आज जब सत्ता के समक्ष घुटने टेकने की होड़ मची हुई है शिरीष यह कहने का साहस रखते हैं कि 'सत्‍ताओं समक्ष खड़े रहना मैंने कभी सीखा नहीं /लड़ना सीखा है /आप एक लड़ने वाले कवि को बुलाना तो /नहीं ही चाहते होंगे /चाहें तो मेरे न आ पाने पर अपना आभार प्रकट कर सकते हैं /मुझे अच्‍छा लगेगा।' शुक्र है कुम्भन दास की परम्परा अपने उसी अंदाज में कुछ कवि बचाए हुए हैं. ऐसे ही स्वर वाले कवि शिरीष की पन्द्रह नयी कविताएँ पहली बार के पाठकों के लिए प्रस्तुत हैं. आईए पढ़ते हैं शिरीष की कविताएँ


       

शिरीष कुमार मौर्य की  15 नई कविताएं

1

दिल्‍ली में कविता-पाठ

प्रिय आयोजक मुझे माफ़ करना

मैं नहीं आ सकता

आदरणीय श्रोतागण ख़ुश रहना

मैं नहीं आ सका



मैं आ भी जाता तो कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता

मैं हिन्‍दी के सीमान्‍तों की कुछ अनगढ़ बातें सुनाता अटपट अंदाज़ में

मैं वो आवाज़ हूं जिसके आगे उत्‍तरआधुनिक माइक अकसर भर्रा उठते हैं

आपके लिए अच्‍छा है मेरा न आना



अध्‍यक्ष महोदय अवमानना से बच गए

संचालक महोदय अवहेलना से

न आने के सिवा और मैं कुछ नहीं कर सकता था आपके कवितापाठ की

अपूर्व सफलता के लिए



तस्‍वीरें दिखाती हैं

कविता-पाठ अत्‍यन्‍त सफल रहा

ख़बरें बताती हैं मंच पर थे कई चांद-तारे

सभागार भरा था

एक आदमी के बैठने लायक भी जगह नहीं बची थी



आप इसे यूं समझ लें

कि मैं कवि नहीं

बस वही एक आदमी हूं जिसके बैठने लायक जगह नहीं बची थी

राजधानी के सभागार में



नहीं आया अच्‍छा हुआ आपके और मेरे लिए

आपका धैर्य भले नहीं थकता

पर मेरे पांव थक जाते खड़े-खड़े

सत्‍ताओं समक्ष खड़े रहना मैंने कभी सीखा नहीं

लड़ना सीखा है



आप एक लड़ने वाले कवि को बुलाना तो

नहीं ही चाहते होंगे

चाहें तो मेरे न आ पाने पर अपना आभार प्रकट कर सकते हैं

मुझे अच्‍छा लगेगा।
***

2

भूला हुआ नहीं भूला

मैं राजाओं की शक्ति और वैभव भूल गया

उस शक्ति और वैभव के तले पिसे अपने जनों को नहीं भूला

सैकड़ों बरस बाद भी वे मेरी नींद में कराहते हैं



मैं इतिहास की तारीख़ें भूल गया

अन्‍याय और अनाचार के प्रसंग नहीं भूला

आज भी कोसता हूं उन्‍हें



मैं कुछ पुराने दोस्‍तों के नाम भूल गया

चेहरे नहीं भूला

इतने बरस बाद भी पहचान सकता हूं उन्‍हें

तमाम बदलावों के बावजूद



मैं शैशव में ही छूट गए मैदान के बसन्‍त भूल गया

धूप में झुलसते दु:ख याद हैं उनके

वो आज भी मेरी आवाज़ में बजते हैं 



बड़े शहरों के वे मोड़ मुझे कभी याद नहीं हुए

जो मंजिल तक पहुंचाते हैं

मेरे पहाड़ी गांव को दूसरे कई-कई गांवों को जोड़ती

हर एक छरहरी पगडंडी याद है मुझे



किन पुरखे या अग्रज कवियों को कौन-से पुरस्‍कार-सम्‍मान मिले

याद रखना मैं ज़रूरी नहीं समझता

उनकी रोशनी से भरी कई कविताएं और उनके साथ हुई

हिंसा के प्रसंग मैं हमेशा याद रखता हूं



भूल जाना हमेशा ही कोई रोग नहीं

एक नेमत भी है

यही बात न भूलने के लिए भी कही जा सकती है



क्‍योंकि बहुत कुछ भूला हुआ नहीं भी भूला



उस भूले हुए की याद बाक़ी है

तो सांसों में तेज़ चलने की चिंगारियां बाक़ी हैं

वही इस थकते हुए हताश हृदय को चलाती हैं। 
*** 



3

खुला घाव

मैं खुला घाव हूं कोई साफ़ कर देता

कोई दवा लगा देता है

मैं सबका आभार नहीं मान सकता

पर उसे महसूस करता हूं

सच कहूं तो सहानुभूति पसन्‍द नहीं मुझे



खुले घाव जल्‍दी भरते हैं

गुमचोटें देर में ठीक होती हैं

पर खुले घाव को लपेट कर रखना होता है



मैं कभी प्रेम लपेटता

कभी स्‍वप्‍न लपेटता हूं कई सारे

कभी कोई अपनी कराहती हुई कविता भी लपेट लेता हूं

लेकिन हर पट्टी के अंदर घुटता हुआ घाव तंग करता है

वह ताज़ा हवा के लिए तड़पता है



प्रेम, स्‍वप्‍न और कविता ऐसी पट्टियां हैं जो लिपट जाएं

तो खुलने में दिक्‍कत करती हैं

मैं इनमें से किसी को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहता

पर घाव के चीख़ पड़ने पर इन्‍हें जगह-जगह से काटकर

खोल देना पड़ता है 



खुला घाव खुला ही रहना चाहता है

खुला घाव तुरत इलाज चाहता है अपने में बंधा रहना नहीं चाहता

गुमचोटों की तरह बरसों टीसना नहीं चाहता

उसकी ओर से मैं क्षमा मांग लेता हूं - 

ओ मेरे प्रेम !

हे मेरे स्‍वप्‍नों !!

अरी मेरी कविता !!!



बना रहे प्रेम पर घाव को न छुपाए

बने रहेंगे मेरे स्‍वप्‍न सही राह चले तो झूटे आवरण नहीं बन जाएंगे

उघाड़ेंगे ही मुझे भीतर तक

बनी रहे कविता लगभग जैसी वह जीवन में है विकल पुकारती



यह खुला घाव खुला घाव ही है

बस कीड़े न पड़ें इसमें

वे जब ख़ूब छक चुकने के बाद भी

आसपास बिलबिलाते हैं

तो उनकी असमाप्‍त भूख मैं महसूस कर पाता हूं



उनका जैविक आचरण रहा है मृत्‍यु के बाद देह को खा जाना

पर अब जीवन भी उनकी भूख में शामिल हैं

विचारहीन मनुष्‍यता उनका सामना नहीं कर सकती 

वह जीवित रहते खा ली जाएगी



खुले घाव और बिलबिलाते कीड़ों के इस जुगुप्‍सा भरे प्रसंग में

मैं अपनी कोई चिन्‍ता नहीं करता

अपनी चिन्‍ता करना अपनी वैचारिकी के खिलाफ़ जाना है 



लगातार लगते घावों से ही अब तक जीवन कई भटकावों से बचा है

कुछ और सधा है

मेरे अपनो 

आश्‍वस्‍त रहो



मेरा होना एक खुला घाव तो है 

लेकिन विचारों से बंधा है।   
***  


4

हाशिया

मुझे हाशिए के जीवन को कविता में लाने के लिए पहचाना गया –

ऐसा मुझे मिले पुरस्‍कार के मानपत्र पर लिखा है

जिस पर दो बड़े आलोचकों और दो बड़े कवियों के नाम हैं



उस वक्‍़त पुरस्‍कृत होते हुए

मैं देख पा रहा था हाशिए पर भी नहीं बच रही थी जगह

और रहा जीवन तो उसे हाशिए पर मान लेना मेरे हठ के खिलाफ़ जाता है

मैंने पूरे पन्‍ने पढ़े थे

उन पर लिखा बहुत कुछ ग़लत भी पढ़ा था

मैंने उस ग़लत पर ही सही लिखने से शुरूआत करने की छोटी-सी कोशिश की थी

हाशिया मेरे जीवन में महज इसलिए आया था

क्‍योंकि पहाड़ के एक कोने में मेरा रहवास था और कोने अकसर हाशिए मान लिए जाते हैं

बड़े शहर पन्‍ना हो जाते हैं



मैं दरअसल लिखे हुए पर लिख रहा हूं अब तक

यानी पन्‍ने पर लिख रहा हूं

साफ़ पन्‍ना मेरे समय में मिलेगा नहीं 

लिख-लिखकर साफ़ करना पड़ेगा



कुछ पुरखे सहारा देंगे

कुछ अग्रज मान रखेंगे

कुछ साथी साथ-साथ लिखते रहेंगे

तो मैं लिखे हुए पन्‍नों पर भी कविता लिख कर दिखा दूंगा



कवि न कहलाया तो क्‍या हुआ

कुछ साफ़-सफ़ाई का काम ही अपने हिस्‍से में लिखा लूंगा।
****



5

वसन्‍त
(सत्‍यानन्‍द निरूपम के लिए)



हर बरस की तरह

इस बरस भी वसन्‍त खोजेगा मुझे

मैं पिछले सभी पतझरों में

थोड़ा-थोड़ा मिलूंगा उसे

उनमें भी

जिनकी मुझे याद नहीं



प्रेम के महान क्षणों के बाद मरे हुए वसन्‍त

अब भी मेरे हैं

मिलूंगा कहीं तो वे भी मिलेंगे



द्वन्‍द्व के रस्‍तों पर

सीधे चलने और लड़ने के सुन्‍दर वसन्‍त

लाल हैं पहले की तरह

उनसे ताज़ा रक्‍त छलकता है तो नए हो जाते हैं

मेरे पीले-भूरे पतझरों में

उनकी आंखें चमकती हैं



वसन्‍त खोजेगा मुझे

और मैं अपने उन्‍हीं पीले-भूरे पतझरों के साथ

मिट्टी में दबा मिलूंगा



साथी,

ये पतझर सर्दियों भर

मिट्टी में

अपनी ऊष्‍मा उगलते

गलते-पिघलते हैं



महज मेरे नहीं

दुनिया के सारे वसन्‍त

अपने-अपने पतझरों पर ही पलते हैं।
*** 
6

कुछ फूल रात में ही खिलते हैं

कुछ बिम्‍ब बहुत रोशनी में

अपनी चमक खो देते हैं



कुछ प्रतीक इतिहास में झूट हो जाते हैं

वर्तमान में अनाचारियों के काम आते है



कुछ मिथक सड़ जाते हैं पुराकथाओं में

नए प्रसंगों में उनकी दुर्गंध आती है



कुछ भाषा परिनिष्‍ठण में दम तोड़ देती है

कविता के मैदान में नुचे हुए मिलते हैं कुछ पंख



सारे ही सुख दु:ख से परिभाषित होते हैं

गो परिभाषा करना कवि का काम नहीं है 



घुप्‍प अंधेरे में

माचिस की तीली जला

वह काग़ज़ पर कुछ शब्‍द लिखता है



यह समूची सृष्टि पर छाया एक अंधेरा है

और सब जानते हैं

कि कुछ फूल सिर्फ़ रात ही में खिलते हैं
***

7

हेर रहे हम



अरे पहाड़ी रस्‍ते

कल वो भी थी संग तिरे

हम उसके साथ-साथ चलते थे



उसकी वह चाल बावली-सी

बच्‍चों-सी पगथलियां

ख़ुद वो बच्‍ची-सी



उसकी वह ख़ुशियां

बहुत नहीं मांगा था उसने



अब हेर रहे हम पथ का साथी

आया

आकर चला गया



क्‍यों चला गया

उसके जाने में क्‍या मजबूरी थी

मैं सब कुछ अनुभव कर पाता हूं



कभी खीझ कर पांव ज़ोर से रख दूं तुझ पर

मत बुरा मानना साथी

अब हम दो ही हैं 

मारी लंगड़ी गए साल जब तूने मुझे गिराया था

मैंने भी हंसकर सहलाया था

घाव

पड़ा रहा था बिस्‍तर पर

तू याद बहुत आया था



मगर लगी जो चोट

बहुत भीतर

तेरा-मेरा जीवन रहते तक टीसेगी



क्‍या वो लौटेगी



चल एक बार तू-मैं मिलकर पूछें

उससे



अरी बावरी

क्‍या तूने फिर से ख़ुद को जोड़ लिया

क्‍या तू फिर से टूटेगी

****
 

8

दिनचर्या



आज सुबह सूरज नहीं निकला अपनी हैसियत के हिसाब से

बहुत मोटी थी बादलों की परत

उस नीम उजाले से मैंने

उजाला नहीं बादलों में संचित गई रात का

नम अंधेरा मांगा

उसमें मेरे हिस्‍से का जल था



काम पर जाते हुए बुद्ध मूर्ति-सा शांत और एकाग्र था रास्‍ता

उस विराट शांति से मैंने

सन्‍नाटा नहीं गए दिन की थोड़ी हलचल मांगी

मेरे कुछ लोग जो फंस गए थे उसमें आज दिख भी नहीं रहे थे दूर-दूर तक

उनके लिए चिन्तित हुआ



दिन भर बांयें पांव का अंगूठा दुखता रहा था

मैंने रोज़ शाम के अपने भुने हुए चने नहीं मांगे

कुछ गाजर काटीं और

शाम में मिला दिया एक अजीब-सा रंग



रात बादल छंट गए

बालकनी में खड़े हुए देख रहा हूं

भरपूर निकला है पूनम का चांद

मैं उससे क्‍या मांगू



थोड़ा उजाला मैंने कई सुबहों से बचा कर रखा है

उस उजाले से अब मैं एक कविता मांग रहा हूं

अपने हिस्‍से की रात को

कुछ रोशन करने के लिए



शर्म की बात है

पर जिन्‍हें अब तब गले में लटकाए घूम रहा था

वे भी कम पड़ गईं भूख मिटाने को

*** 



9

काव्‍यालोचना



एक रास्‍ते पर मैं रोज़ आता-जाता रहा

अपनी ज़रूरत के हिसाब से उसे बिगाड़ता-बनाता रहा

अब उस पर श्रम और सौन्‍दर्य खोजने का एक काम लिया है



सार्थक-निरर्थक होने के फेर में नहीं पड़ा कभी

जीवन और कविता में जो कुछ जानना था

ज्‍़यादातर अभिप्रायों से जान लिया  है  

*** 


10

काशी हिन्‍दू विश्‍वविद्यालय में सुरक्षित है रामचन्‍द्र शुक्‍ल की कुर्सी



पुख्‍़ता ख़बर है

कि काशी हिन्‍दू विश्‍वविद्यालय में सम्‍भालकर रखी गई है

रामचन्‍द्र शुक्‍ल की कुर्सी



रामचन्‍द्र शुक्‍ल की कुर्सी को सम्‍भालने की इच्‍छा रखने वाले भक्‍तजन

जीवनपर्यन्‍त रामचन्‍द्र शुक्‍ल को नहीं एक आचार्यनुमा कुर्सी को पढ़ते रहे हैं



अपने लिए भी महज एक कुर्सी ही गढ़ते रहे हैं 

***




11

विद्रोहिणी



उसने मां के पेट से फेमिनिज्‍़म नहीं पढ़ा था

उसके वहां रहते मां के पेट में कुछ भोजन आता था

सुबह-शाम

और अपमान में पिए हुए ग़ुस्‍से के कई घूंट

वह मां का जीवन था



वह जन्‍मते ही अभागी कहाई

यह पुराकथा है

फिर फिर दोहराई जाए ज़रूरी नहीं



स्‍कूल जा पायी इतनी बड़भागी थी

बड़ी पढ़ाई का हठ ठाने शहर जाने को अड़ी तो

बिगड़ैल कहाई

पर उसने बिगड़ी बात बनाई



नौकरी मिलना सरल नहीं था  मिली

पढ़ते हुए एकाध बार और नौकरी करते दो-तीन बार प्रेम में पड़ी

शादी को मना करती विद्रोही कहलाने लगी थी तब तक

रिश्‍तों के दमघोंटूं ताने-बाने में जिसे सरलता के लिए अतिव्‍याप्ति के बावजूद

समाज कह लेते हैं



अभी उसका प्रेम टूटा है जिसे वो अंतिम कहती है

शादी करने को तैयार थी पर बच्‍चे के लिए दूर-दूर तक नहीं

टूटकर अलग हो चुका है भावुक प्रेमी



कोई गूढ़ राजनीति नहीं है यह

कि चरम पर पहुंचे और सही राह पर हो

तो विद्रोह से

राज पलट जाते हैं

संसार बदल जाता है



स्‍त्री विद्रोही हो जाए

तो थम जाता है संसार का बनना



उसे बदलने की नहीं

बचाने की ज़रूरत बचती है।  

***


12

अपनी भाषा में वास



हैरां हूं कि किसे ग़ैर बताऊं,अपना कहूं किसे 



मैं किसी और भाषा की कविता के मर्म में बिंधा हूं

बंधा हूं किसी और की गरदन के दर्द में



न मुझे लिखने के लिए बाध्‍य किया गया न लटकाया फांसी पर

दूसरों के अनुभवों में बिंधना और बंधना हो रहा है 



इतना होने पर भी प्रवास पर नहीं हूं

मेरा वास अपनी ही भाषा के भीतर है



वह भाषा मेरी भाषा में प्रवासी है

इन दिनों



आप चाहें तो सुविधा के लिए उसे अंग्रेज़ी कह सकते हैं

***






13

मैं बहुत मजबूर आदमी हूं



मिले हुए जीवन को सुविधाओं से जीता हुआ मैं बहुत मजबूर आदमी हूं

यही मेरी मजबूरी है



मेरी मजबूरी सरल नहीं है

मेरे सिरहाने वह आकाश तक खड़ी है

मेरे पैताने बैठी है पाताल तक

मेरी बगल में क्षितिज तक लेटी है

पर यह एक छोटी मजबूरी है



मजबूरियां जिन्‍हें कहते हैं वे मेरे दरवाज़े के बाहर खड़ी हैं

वहां से न जाने कहां-कहां तक फैली हैं



चीड़ की कच्‍ची डाल टूटने से मरे लकड़ी तोड़ने वाले की मजबूरी

हम पक्‍के बरामदों में आग तापते हुए अपनी चमड़ी से लील जाते हैं

उधर जिन कच्‍चे घरों को वाकई आग की ज़रूरत है

वे सर्द और नम हवाओं में सील जाते हैं



हमारे घरों में मटर-पनीर की सब्‍ज़ी बच जाती है

असंख्‍य रसोईघरों में बासी रोटियां भी खप जाती हैं

मजबूरियां जिन्‍हें कहते हैं

वे सरल होती हैं उनसे पार पाना जटिल होता है



अपनी मजबूरी कहते अब शर्म आने लगी है



जैसे इसी कविता के भीतर और बाहर

मैं बहुत मजबूर आदमी नहीं हूं



यह शीर्षक एक बेशर्म धोखा है

और मैं अपनी मजबूरी में दरअसल एक बेशर्म आदमी हूं



आदमी की जगह कवि कहता

पर कवि कहना शर्म के चलते अब छोड़ दिया है

*** 



14

लोकसभा चुनाव 2014



चढ़ती रातों में कुछ पढ़ते हुए

तमतमा जाता चेहरा

हाथ की नसें तन जातीं

पांवों में कुछ ऐंठता

कभी आंखों में नमी महसूस होती

गालों पर आंसू की लकीर भी दिखती



लेकिन पागल नहीं था मैं कि अकेला बैठा गुस्‍साता या रोता

सामान्‍य मनुष्‍य ही था

सामान्‍य मनुष्‍य जैसी ही थीं ये हरक़तें भी



आजकल सामान्‍य होना पागल होना है

और पागलों की तरह दहाड़ना-चीख़ना-हुंकारना

सामान्‍यों में रहबरी के सर्वोच्‍च मुकाम हैं 



संयोग मत जानिएगा

पर जून 2014 में मुझे अपने साइको-सोमैटिक पुनर्क्षीण के लिए

दिल्‍ली के अधपगले डाक्‍टर के पास जाना है

*** 




15

अधमकहानी



स्‍त्री देह में धंस जाने की लालसा पुरुषों में पुरानी है

और मन टटोलने का कायदा अब भी उतना प्रचलित नहीं

लाखों वर्षो में मनुष्‍य के मस्तिष्‍क का विकास इस दिशा में बेकार ही गया है  



जब भी

नाभि से दाना चुगती है होटों की चिडिया

तो डबडबा जाती हैं उसकी आंखें

कुछ प्रेम कुछ पछतावे से



प्राक्-ऐतिहासिक तथ्‍य की तरह याद आता है कि यह भी एक मनुष्‍य ही है

इसे अब प्रेम चाहिए

लानतों से भरा कोई पछतावा नहीं
*** 

सम्पर्क-

मोबाईल - 09412963674

(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेटिंग्स वरिष्ठ कवि विजेन्द्र जी की हैं.)

टिप्पणियाँ

  1. एक साथ इतनी कविताएं पढ़कर अच्‍छा लगा...सबसे अच्‍छा यह है कि समझने के लिए किसी कविता को दुबारा नहीं पढ़ना पड़ा। एक कविता में 'हेर' को आया देखकर रोमांचित हूं।

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  2. Drishti , vichaar, bhaav aur samvedna se bhara adbhut lagu kavya sankalan!! Haardik Badhai tatha Dhanyavaad!! Shirish jee , Santosh jee...
    - Kamal Jeet Choudhary ( J & K )

    उत्तर देंहटाएं

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