प्रकर्ष मालवीय 'विपुल' की कविताएँ

प्रकर्ष  मालवीय 'विपुल'  




आज समूची दुनिया में एक अजीब उन्माद फैला हुआ है. जातिवाद, नस्लवाद, राष्ट्रवाद लोगों के सर पर चढ़ कर बोल रहे हैं. इन सब के बीच निरन्तर आहत हो रही है मनुष्यता. म्यांमार की बौद्ध जनता, जिसे आमतौर पर शांतिप्रिय और अहिंसक समझा जाता था, रोहिंग्या मुसलामानों के खून की प्यासी हो गयी है. रोहिंग्या लोगों को शरण देने के नाम पर भी आज राजनीति चरम पर है. कभी नैतिक रूप से माना जाता था कि शरणागत की रक्षा करना मेजबान का प्रमुख कर्तव्य होता है लेकिन अब यह सब बीती बातें हो गयीं लगती हैं. युवा कवि प्रकर्ष मालवीय 'विपुल' अपनी कविता 'रोहिंग्या रोहिंग्या कौन हो तुम?' में रोहिंग्या लोगों के साथ इसी बर्ताव को आधार बना कर कुछ ऐसे सवाल उठाते हैं जो राष्ट्रवादियों के लिए असुविधाजनक है. प्रकर्ष के रूप में इलाहाबाद में युवा पीढ़ी इलाहाबाद के उन संभावनाशील युवा कवियों में से एक हैं जिन पर हम एक कवि के रूप में भरोसा कर सकते हैं. तो आइए आज पहली बार पर पढ़ते हैं प्रकर्ष की कुछ नयी कविताएँ.      
     

प्रकर्ष मालवीय 'विपुल' की कविताएँ


रोहिंग्या रोहिंग्या : कौन हो तुम?


रोहिंग्या रोहिंग्या
कौन हो तुम?
इंसान हो?
लगता तो नहीं!
दो पैर, दो हाथ के धड़ के ऊपर,
सर रख देने से कोई इंसान नहीं बन जाता!
इंसान होने के लिए आवश्यक है
उस जगह के,
जहाँ तुम इंसान होने का हक़ माँग रहे हो,
बहुसंख्यक समुदाय से होना,
जितना बड़ा समुदाय,
उतने सभ्य लोग,
उच्च कुल से होना,
जितना ऊँचा कुल,
उतना अच्छा इंसान.
पर तुम तो.......


रोहिंग्या रोहिंग्या
कौन हो तुम?
क्या कहा रिफ़्यूजी हो?
रिफ़्यूजी होना,
इंसान होने के सबसे अंतिम लक्षण हैं.
रिफ़्यूजी होना,
दुनिया पे बोझ होना है.
रिफ़्यूजी होना,
मुल्क की सुरक्षा में ख़तरा होना है.
रिफ़्यूजी होना,
इस ख़ूबसूरत दुनिया की,
सुंदरता में बट्टा लगाना है.
ना तुम बर्मा के हो,
ना बांग्लादेश के,
ना भूटान या नेपाल के,
और भारत के होना तो भूल ही जाओ.
अब तुम क्या करोगे,
कहाँ जाओगे,
कहाँ जा कर ढूँढोगे,
अपने पुरातात्विक प्रमाण,
जाओ डूब मरो
बंगाल की खाड़ी में,
इसके पहले कि,
सारे देशों की चुस्त दुरुस्त कर्तव्यनिष्ट सेनाएँ,
उठा के फेंक दें तुम्हें,
बंगाल की खाड़ी में,


लेकिन क्या बंगाल की खाड़ी में इतना पानी है?
कि डूबो दे तुम्हें?
जाओ गला घोंट दो अपनी संतानों का,
और डूब मरो,
ताकि मानवीय सभ्यता बची रहे,
अपने सफलतम रूप में.
जाओ कि तुम्हारी किसी को ज़रूरत नहीं है,
जाओ कि तुम्हारे पास इस दुनिया को देने को कुछ नहीं है,
जाओ कि तुम्हारे श्रम से कुछ भी निर्मित नहीं हो सकता,
जाओ कि हमारे देश में भूखे नंगों की,
वैसे भी कोई कमी नहीं है.


रोहिंग्या रोहिंग्या
आज वो भी तुम्हें देख कर डरे हुए हैं,
जो ख़ुद,
किसी समय,
कहीं पर,
रिफ़्यूजी थे



गौरी लंकेश की हत्या पर

वो जो कल गांधी को मार कर,
बाँट रहा मिठाइयाँ था,
वो जो आज गौरी को मार कर,
दे रहा बधाइयाँ है,
याद रखिएगा..........
कल आप की हत्या को भी जायज़ ठहराएगा.
वो आपके विचारों को,
देश की सुरक्षा में ख़तरा बतलाएगा,
आप की लाश पर चढ़ कर,
देशभक्ति के फूहड़ नग़मे,
ऊँचे स्वर में गाएगा.
वो इतिहास को रौंदेगा,
संस्कृति का नाश करेगा,
और संस्कृति का रक्षक कहलाएगा.
वो मुझको आपको चुन चुन कर मारेगा,
और हर बार एक ही पिस्तौल से मारेगा,
लेकिन वो हर बार,
बार बार और अनंत बार,
हमें मार कर भी,
उन विचारों को नहीं मार पाएगा,
जिनसे वो डरता है.




रसोई में खड़ी औरत


रसोई में खड़ी औरत के माथे पर
चमकती पसीने की मोतीनुमा बूंदे
गवाह हैं उसके महान श्रम की
और पुरुष के कांईएपन की,
कि वह समाज के श्रम के
अधिकांश हिस्से को
औरत के मत्थे मढ़कर
खुद मालिक बन बैठा
संपत्ति का,
श्रम का,
गृहस्थी का,
और औरत की इच्छाओं का।

उसके हाथों की बनी रोटी
जिस आटे से पकाई गई है
वह मात्र पानी से ही नही गूंथा गया
उसमें मिली है
उसके श्रम की मिठास,
उसके गुस्से की कड़वाहट,
कि मैंने उसे देवी बना कर
उसके श्रम को हथिया लिया बेमोल,
उसका रूखापन
कि माहवारी के कष्ट में भी वो खड़ी है
रसोई की गर्मी में
ताकि भकोस सकूँ मैं,
एक के बाद एक,
रोटियां अनेक।



आज मेरे शहर में


आज मेरे शहर में बादल कुछ यूं बरसे कि लगा,
जैसे सोच कर आये हैं कि धुल ही देंगे आज,
सारे गिले, शिकवे,दिलों के दाग और ज़ख्म,
देंगे संदेश उम्मीद का, हौसले का और
किसी प्रेयसी को उसके मीत का "मेघदूत" बन कर।

आज मेरे शहर में बादल कुछ यूं बरसे कि लगा,
कि कराएंगे एहसास मानुष को,
प्रकृति के बल का
और उसको उसकी सीमाओं का,
फिर फूटेगा जीवन
किसी बीज में पौध बन कर,
और बिखरेगी चमक
किसान की आंखों में
उसकी फसल बन कर।


आज मेरे शहर में बादल कुछ यूं बरसे कि लगा,
बरसे हैं बादल किसी गरीब की कुटिया में,
आफतपीड़ा और दर्द बन कर,
करता है प्रयास वह रक्षक बन कर,
पर सोचता है कि क्या बचाये
भीगता हुआ अनाज,
अधपकी सब्ज़ी  
या कि वो छत
जो अभी अभी टपकनी शुरू हुई है,
या कि उसका नवजात
जो कि लेटा है,
फटी हुई पुरानी साड़ी के बंधे हुए पालने में,
पर वह बचाने में जुटता है
अपनी कुटिया की चौखट,
ताकि पानी अंदर आने पाए,
अनाजसब्ज़ियां और लल्ला भीगने पाए।

सम्पर्क-

मोबाईल - 09389352502
08765968806

(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स वरिष्ठ कवि विजेन्द्र जी की हैं.)


टिप्पणियाँ

  1. prakarsh ki kavitayen ......pratirodh ki kavitayen hain...jise nahin swikar manmanapan.

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  2. rasoi mein khadi aurat ek behad prabhavshali kavita hai..... mann prasann hua.... baki kavitaon pe tipanni karna mere liye munasib nahi kyonki vishayvastu pe main abhi addhyyan kar raha hoon......

    उत्तर देंहटाएं
  3. Vipul ki apaar sambhavnaon ke kuch chamakte amulya moti ... keep it up

    उत्तर देंहटाएं
  4. Vipul ki apaar sambhavnaon ke kuch chamakte amulya moti ... keep it up

    उत्तर देंहटाएं
  5. प्रकर्ष की कविताओं की परिपक्वता देखकर ये नहीं लगता कि ये किसी उदीयमान और युवा कवि की लेखनी है। कविताओं का शिल्प और कथ्य तो श्रेष्ठ है ही, इनकी सम्प्रेषणीयता भी बेजोड़ है। ढेरों शुभकामनाएं

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  6. समाज मे व्याप्त छुद्रता को प्रकर्ष ने बेहतरीन तरीके से छुआ है। बधाई ऐसे युवा कवि को।

    परिवेश मालवीय

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    1. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  7. सभी सम्मानित पाठकों का साधारण सी रचनाओं पर असधारण टिप्पणियों और हौसला अफज़ाई के लिये धन्यवाद.

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