रुचि भल्ला की कविताएँ


रूचि भल्ला
नाम :रुचि भल्ला
जन्म :25 फरवरी 1972
शिक्षा : बी. ए.,  बी. एड.
प्रकाशन: विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और समाचारपत्रों में  कविताएँ प्रकाशित

काव्य संग्रह : 'कविताएँ फेसबुक से', 'काव्यशाला, सारांश समय का, क्योंकि हम ज़िन्दा हैंकविता अनवरत

ब्लॉग : गाथांतर, अटूट बंधन
प्रसारण : आकाशवाणी के इलाहाबाद तथा पुणे केन्द्रों से कविताओं का प्रसारण.

कुछ वर्षों तक अध्यापन भी किया

आधुनिकता की आपाधापी कुछ ऐसी है कि हम अपना सारा अतीत भूलते जा रहे हैं. शहर एक संक्रामक बीमारी की तरह फैलते जा रहे हैं जबकि गाँव दिन-ब-दिन सिकुड़ते जा रहे हैं. ऐसा नहीं कि शहर जा कर व्यक्ति की सारी समस्याओं का निदान हो जाता हो. वहाँ भी बेहिसाब समस्याएँ हैं. आज दुनिया में जो भी प्रदूषण है, उसमें शहरों की एक बड़ी भूमिका है. हमने औद्योगीकरण का गुण तो सीखा लेकिन अपनी पृथिवी अपने वातावरण को साफ़-सुथरा बनाने की तहजीब सीखी ही नहीं. ऐसे में सहज ही एक कवि का ध्यान ऐसे तथ्यों की तरफ जाता है जो इस दुनिया को मलीन किए हुए है. आधुनिकता की बेहिसाब चीख-चिल्लाहटों और शोर-शराबों के बीच कवयित्री रूचि भल्ला का ध्यान भूखमरी के शिकार उस व्यक्ति की तरफ भी जाता है जो अपनी मौत के इन्तजार के बीच ही  'हर राहगीर से/ पूछ रहा था/ एक ही सवाल/ क्या हर ज़िन्दगी रब की/ नेमत होती है?' आज रूचि भल्ला का जन्मदिन भी है. पहली बार की तरफ से रूचि को जन्मदिन की बधाई के साथ हम प्रस्तुत कर रहे हैं उनकी कुछ नयी कविताएँ.  
           

रुचि भल्ला की कविताएँ


बच्चा

चमचमाती कार में
बैठा हुआ
वो गोरा चिट्टा बच्चा
जब भी खेलने जाता है
बीच रास्ते में
झुग्गी के सामने
उसे दिखते हैं
अपनी मां के संग खेलते
फटेहाल कई बदरंग बच्चे
गोरा चिट्टा बच्चा
मुड़ मुड़ कर उनके
खेल देखता है
कार
आया को साथ लिए
पार्क की ओर मुड़ जाती है।



मौन

खामोश रहा ईश्वर
जब मैंने पूछा
प्रभु!
तुमने जगत बनाया
फिर यह मिथ्या क्यों
क्यों तजने को कहा
अपने ही बसाये संसार को
मृत्यु क्यों दी
जीवन देने के बाद
क्यों तोड़ा अपने ही
आस-विश्वास को
बिल्कुल मौन
बस देखता रहा
चुपचाप
सन्नाटे से भरा
अपना ही नीलाम्बर


हमारे पात्र

फुटपाथ पर सो जाते हैं
थक- हार कर
वे मैले-कुचैले
जो दिन भर
लिए हाथ में कटोरे
दौड़ती-भागती गाड़ियों
के पीछे देते हैं अपनी गूंगी दस्तक
वे हर बार वहीं लाल बत्ती चौराहे पर
मिल जाते हैं
वे पात्र हैं
हमारी नई-पुरानी कविताओं के
हम उन पर लिखते हैं
खूब छपते हैं
और वे
हमें देने के लिए
अनगिनत कविताएँ
खुद चौराहे पर खड़े
रह जाते हैं 

राजपथ को गयी लड़की......

पीपल का पेड़
रहता होगा उदास
तेरे घर की खिड़की को रहती होगी
तेरे आने की आस
छत पर टूट-टूट कर बिखरती होगी
धूप की कनी
जहाँ तुम खेला करती थी नंगे पाँव
चाँद को आती होगी तुम्हारी याद
घर का कोना होगा खाली
तुम्हारे होने के लिए
एक रात मेरी नींद में उतर कर
मेरे राष्ट्राध्यक्ष ने बतलाया
तारकोल का काला - कलूटा राजपथ
रोता रहा कई दिन कई रात
तुम्हें निगलने के बाद



चाहता तो वो भी है
चाहता तो वो भी है
कि थमा दे अपनी गुड़िया के हाथ सतरंगी गुब्बारे
डाल दे पत्नी की झोली में
रोज़ रुपहले तारे
सोचते-सोचते जाने कौन
दिशा में निकल जाता है
सुबह- सवेरे हरिया
साँझ ढले जब लौटता है
खाली हाथ नहीं आता है
गीत गुनगुनाते
थैला झुलाते
रोज़ लाता है
राह तकती आँखों के वास्ते
गिनती की आठ रोटियाँ


फ़ुरसत का एक दिन


वो नहीं करना चाहती
किसी से भी आज
घर-गृहस्थी व्रत-उपवास
न तवा परात रोटी की
कोई बात
अपने कमरे में जा कर
जंग लगे संदूक को
खोल कर
वो निकाल बैठी है
अपनी गुड़िया
बस ........
आज कुछ नहीं करेगी
गुड़िया को
हाथों में थाम कर
दिन भर उसका हाल सुनेगी
जी भर उसको प्यार करेगी


मायका

पिता के न रहने पर
माँ की अनुपस्थिति में
आज भी मोहल्ले की चाची
विदा होती हुई बिटिया की मुट्ठी में
रख देती हैं
तोड़-मरोड़ कर कुछ नोट
उसकी टाफ़ियों के वास्ते


कुछ रोज़ हुए

उस सड़क पर चलते हुए
मैने उसे देखा था
सुना था उसे
वो भुखमरी का मारा
चौराहे पर बैठा कर रहा था
अपनी मौत का इंतज़ार
वो जानता था
खूब जानता था
कि अब उसे कोई नहीं बचा सकता
किसी भी वक्त निकल सकता था उसका दम
और इसी खुशी में वो
चिल्ला कर घोषणा कर रहा था
अपनी मृत्यु की
गालियाँ दे रहा था
खुलेआम ईश्वर को
और हर राहगीर से
पूछ रहा था
एक ही सवाल
क्या हर ज़िन्दगी रब की
नेमत होती है?

जीसस

काश !
कि कोई अपना
तुम्हें भी मिल जाता
जो उतारता घड़ी भर को
तुम्हारे कंधे से सलीब
रख देता उतार कर
तुम्हारे सर से
काँटों का ताज
करता तुम्हारे
ज़ख्मों की मरहम-पट्टी
और पूछता प्यार से
तुम्हारा भी हाल

काश !
इतनी बड़ी दुनिया में
कहीं किसी कोने में
मिल जाता तुम्हें
तेरी फ़िक्र में डूबा बैठा
एक अदद आदमी



कैंसर के साथ हुई लड़ाई के बाद

श्रद्धांजलि में लोग बहुत थे
हॉल चहल-पहल से भरा हुआ 
रंग-बिरंगे फूलों से सजा हुआ 
हर चेहरे पर मुस्कुराहट थी
खास तौर से वो एक चेहरा
अपने फ़ोटो-फ़्रेम में
सबसे ज़्यादा
मुस्कराहट बिखेरता हुया
पत्नी व्यस्त थी
मिलने-जुलने वालों
के स्वागत में
बच्चे सब से कह रहे थे
मेरे पिता की मृत्यु नहीं हुई
उनका Transition हुआ है
हाल भी सब देख रहा था
सुन रहा था
और सबसे हाथ जोड़ कर
विनती कर रहा था
मुस्कराते रहिए
ये शोक सभा नहीं है।

आई जब मेरी विदा की बेला

मेरी थाली-मेरी कुर्सी को
मैंने सूनी होते हुए देखा
मनी-प्लांट मेरी बोगनवेलिया
को खुद से लिपटते देखा
जाते-जाते जो भाग कर गयी
मिलने गंगा-जमुना से
उन आँखों में उतर आया
एक और दरिया देखा
चौक की गलियां
सिविल लाइन्स की सड़कें
स्कूल का चौराहा मेरा मोहल्ला
सबको मैंने खूब पुकारा
मैं रोती रही बेतरह
कभी माँ के गले लग
कभी सहेलियों के संग
जो मुड़ कर देखा
शहर को दूर तलक
मैंने हाथ हिलाते देखा


महानगर में

हाईटेक सोसायटी में
11वें माले पर एक मौत हो जाती है
और खबर दिखती है
लिफ़्ट के दरवाज़े पर
लिखे एक नोटिस में
न रोना-धोना
न चीख-चिल्लाहट
राम नाम सत्य की कोई गूँज नहीं
चार कंधों की भी दरकार नहीं
शव-वाहिका चुपचाप आती है
और लाश बिना किसी को डिस्टर्ब किए सोसायटी से बाहर हो जाती है।

'' से अम्मा '' से आग

बच्चा बिना पढ़े भी
जान जाता है
'' से अम्मा
'' से आग
भूख से आतुर
उसकी पेट की आँख देखती है
तवे पर सिंकती जाती रोटी की यात्रा
और आँच का सफ़र तय करती अम्मा
देखते-देखते उँगली थामे
वह सब सीख जाता है
अम्मा-आग-रोटी-भूख
और जीवन के मायने

भागता शहर

देख रही हूँ
शाम-सवेरे
गाँव के गाँव
आ रहे हैं
दौड़े - दौड़े
बस पकड़ कर
शहर में बसने
कल तुम देखोगे
शहर को भागते
बस के पीछे-पीछे
अपना गाँव पकड़ने

धर्म-अधर्म

जब कोई भूखा
दे तुम्हें दो रोटियों के लिए दस्तक
सुनोतुम दरवाज़ा न खोलना
कोई फ़ायदा नहीं इसमें
वह क्या लौटाएगा तुम्हें
इस जीवन बाज़ार में
लेकिन याद कर
हर पूर्णिमा, अमावस्या
अपने देव-पुजारी को न्योतना
जी भर देना पकवानों से
फ़िर बंधवा देना उसकी अंगोछी
तन पर छाता की तरह उभरे
पेट के लिए
वस्त्र देना
ताकि ढंक ले
अपने अंदर का कालापन
नकद देना
वह बाज़ार लाएगा
अपने घर
अपनी ओर खींचने के लिए हमारी बेटियाँ

सम्पर्क: 

एम-506 सिसपाल विहार,
सेक्टर-
49
गुडगाँव -
122018, हरियाणा
मो .
09560180202
ई. मेल

ruchibhalla72@gmail.com

 
(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स वरिष्ठ कवि विजेन्द्र जी की हैं.)

टिप्पणियाँ

  1. वाकई कम शब्दों में इतने गहरे भाव। बहुत ही खूबसूरत कविताएं हैं, सच की आंच पर पकी हुई।

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