पूनम शुक्ला की कहानी 'अमृत की धार'


पूनम शुक्ला

जन्म - 26 जून 1972  बलिया, उत्तर प्रदेश

शिक्षा - बी० एस-सी० आनर्स (जीव विज्ञान)
, एम० एस-सी० (कम्प्यूटर साइन्स), एम० सी० ए०। चार वर्षों तक विभिन्न विद्यालयों में कम्प्यूटर शिक्षा प्रदान की। अब कविता, ग़ज़ल, कहानी लेखन मे संलग्न।

कविता संग्रह "सूरज के बीज" अनुभव प्रकाशन
, गाजियाबाद द्वारा प्रकाशित।
"सुनो समय जो कहता है" ३४ कवियों का संकलन में रचनाएँ -आरोही प्रकाशन
देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित।
 
स्त्री का जिंदगी दोधारी तलवार की तरह होती है। उसकी अपनी जिंदगी के साथ ही उससे जुडी होती हैं तमाम जिंदगियाँ, जिनकी अपेक्षा एकमात्र बस यही रहती है कि वह स्त्री उनका हर पल उसका ध्यान रखे। शायद ही कोई हो जो उसे एक व्यक्ति मान कर उसके बारे में यह सोचता हो कि उस स्त्री की भी अपनी भावनाएँ हैं, आशाएँ और अपेक्षाएँ हैं। पूनम शुक्ला ने अपनी कहानी 'अमृत की धार' में इसी महीन संवेदना को उभारने का सफल प्रयत्न किया है। तो आइए पढ़ते हैं पूनम की यह नयी कहानी 'अमृत की धार' 
 
अमृत की धार


ठंढ़ के मौसम में सबकी नजरें धूप ही तलाशती रहती हैं। पन्द्रह दिनों तक
मौसम ने अपनी नाराजगी पूरी तरह दिखाई थी। आज कहीं जाकर सूर्य देवता नें अपनी आँखें खोली हैं। धूप देखते ही सौरभ नें पार्क में पिकनिक का प्रस्ताव रख दिया था। अच्छा हुआ कि मैंने भी जल्दी उठ़ कर सारी तैयारियाँ कर लीं। फिर भी दो तीन घंटे तो लग ही गए। पिकनिक के लिए खाना, पानी, प्लेट्स, नैप्कीन्स, कुछ मीठा  सब कुछ जो रखना था। अगर एक सामान भी छूट जाए तो सौरभ का गुस्सा देखने लायक होता है। पिकनिक में किरकिरी मुझे बिल्कुल भी अच्छी नहीं लगती। सौरभ की तो आदत ही हो गई है हर जगह बस बात-बात पर डाँटते रहने की। इनका चले तो बस हँसते-हँसते रुला दें। कहीं कुछ छूट तो नहीं गया......... डर ही लगा रहता है। सौरभ के मम्मी पापा भी कितनी बार इस आदत के लिए टोक चुके हैं पर बचपन में जो आदत पड़ गई सो पड़ गई। बड़ी मशक्कत करनी पड़ती है ऐसी आदतों से छुटकारा पाने के लिए। मशक्कत भी वही करेगा जो पहले मान ले कि हाँ कुछ गलती भी है। पर सौरभ तो उफ्फ! जो कुछ भी बोल दिया तो क्या मजाल कि एक इंच भी धरती इधर से उधर खिसक ले। भले ही उनकी बात किसी के पल्ले न पड़ रही हो पर वो अपनी बात को एरोबिक्स से लेकर दंड पेलने तक सारे व्यायाम करवा कर वैल टोन्ड बाडी की तरह सबके सम्मुख पेश कर ही देते हैं। आफिस का काम ही कुछ ऐसा है। हर जगह अपने ही पाइन्ट को ऊपर रखना पड़ता है, अपने आप को बेस्ट साबित करना होता है ताकि डील इन्हीं के पलड़े में आ कर गिरे पर क्या घर में भी यही रवैया मेरे घर की नींव को हिला कर नहीं रख देगा। अरे ये गेंद मेरी तरफ ही आ रही है कहीं चोट न लग जाए। जल्दी से कैच करती हूँ।

"
श्वेता वहाँ बैठ कर क्या कर रही हो, आओ तुम भी जरा खेलो।"

सौरभ की आवाज से मेरी चुप्पी टूट गई है। अब उठना ही पड़ेगा। दिन भर घर के
कामों में ही थक जाती हूँ । यहाँ छुप कर कुछ देर बैठी थी कि थोड़ा आराम कर लूँ। पर अब अगर नहीं उठी तो कहीं यहाँ भी न हंगामा शुरू हो जाए। बेहतर होगा उठ कर सब के साथ थोड़ा खेल ही लूँ।

"
सौरभ सँभालना मेरा थ्रो" कहते हुए मैंने गेंद अपनी पूरी ताकत लगा कर फेंक दी पर गेंद की दिशा थोड़ी सी तिरछी होने के कारण सौरभ के हाथों से छूट गई और दूर चली गई है।

"
क्या यार तुमको गेंद फेंकना भी नहीं आता है, बच्चों की तरह तो तुम्हारा थ्रो है।" सौरभ तिलमिला कर बोल पड़े।

बच्चों की तरह .........


हाँ चलो थोड़ी देर बच्चों की तरह ही बन जाती हूँ। खूबसूरत पार्क है पास
में एक गेंद है और साथ बच्चों की एक टीम भी। फिर ऐसे पार्क में आना भी कभी कभार ही हो पाता है। यहाँ की हवा कितनी खुशनुमा है। तरह तरह के फूल क्यारियों में लगे हुए हैं जो अब खिलना शुरू होंगे। बसंत आने में अभी कुछ दिन बाकी हैं। दाहिने पैर में कभी- कभी दर्द उभर आता है। पर आज शायद इन खुशनुमा हवाओं नें कुछ ऐसा संगीत छेड़ दिया है कि दर्द थोड़ा कम महसूस हो रहा है। चल श्वेता सँजो ले थोड़े पल बचपन के।
 
मुझे छोटे बच्चे बहुत अच्छे लगते हैं। उनकी एक अलग दुनिया होती है। उनकी मीठी-मीठी तोतली बातों में जो रस टपकता है दुनिया की किसी भी चाकलेट या मिठाई में पाना असंभव है। उनकी आँखें कितनी मासूम होती हैं। मासूम आँखों को देखते ही ऐसा महसूस होता है ज्यों खुदा स्वयं उन प्यारी आँखों से झाँक रहा हो और मीठी सी मुस्कान के साथ हमारे साथ कुछ बातें करना चाहता हो । कभी मैं भी ऐसे ही छोटी और बहुत प्यारी थी। शरीर तो उम्र के साथ बदल ही जाता है पर बचपन की स्मृतियों को सहेज कर तो रखा जा सकता है।


 
जब से मेरा विवाह सौरभ के साथ हुआ जिन्दगी तो ज्यों आसमान से सीधे धरती पर औंधें मुँह गिर पड़ी। आज अगर मैंने अपनी पसंद से विवाह किया होता तो शायद ऐसी परिस्थिति न आती पर हमारे समाज में लड़कियों की पसंद कौन देखता है। विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली हर क्षेत्र में आज समाज कितना आगे है पर जब विवाह की बात आती है तो सारी की सारी तरक्की धरी की धरी रह जाती है । सभी अपनी जात बिरादर देखने लगते हैं और फिर पैसों का लेन देन एक और मुसीबत। शादी के वक्त मैंने अपने माता पिता से अपने मित्र विरेन के बारे में बताया भी था पर दूसरी जात होने के कारण घर के सभी लोगों नें साफ इंकार कर दिया। मुझमें और विरेन में कई बातें एक सी थीं जैसे हम-दोनों को घूमने का शौक था। हम-दोनों की साहित्य में रुचि थी और तो और हम दोनों जब एक साथ बाजार जाते तो वहाँ भी हम दोनों की पसंद एक जैसी ही होती। कई बार तो हम-दोनों की उँगली एक साथ एक ही सामान पर इशारा करती और फिर हम-दोनों एक-दूसरे को देख कर मुस्कुरा पड़ते। दो वर्षों की मित्रता में हमारे बीच कोई झगड़ा नहीं हुआ और हम एक-दूसरे के मन की बात बिना कहे ही समझ जाते। इस सफल मित्रता में मुझे लगने लगा था कि हम-दोनों अगर साथ जीवन व्यतीत करें तो हमारा जीवन बड़ा ही सुखमय होगा पर घर वालों को अपने जात विरादर की ज्यादा चिंता थी।

मुझे पढ़ना बहुत पसंद था और हमेशा सभी विषयों में मुझे अच्छे अंक आते थे।
स्कूल कालेज में मैं अन्य गतिविधियों में भी भाग लेती रहती थी जिसके परिणामस्वरूप मुझे कोई न कोई पुरस्कार मिलता रहता था। सभी मुझे कितना प्यार करते थे। स्कूल में मैं टीचर्स की लाडली थी और घर में मम्मी पापा भइया की। आस-पास के बच्चे भी दीदी दीदी करते अपना प्यार लुटाते थे। कई लोग तो मेरे पास अपनी समस्या का समाधान पाने भी आ जाते थे और मेरे पास समस्याओं का निदान सचमुच होता था। सच पूछें तो कभी कभी मुझे खुद अपनी योग्यता पर नाज़ होता था आइने के सम्मुख खड़े हो मैं खुद को निहारने लगती थी और फिर इच्छा होती कि खुद को अपनी बाँहों में भर लूँ और चूम लूँ। पर अब ..................

पर अब मेरी समस्या का समाधान इतना विकट क्यों है
?

किसी अजनबी के साथ मेरा संबंध जोड़ते वक्त मेरे घर वालों नें क्या कभी ये
नहीं सोचा कि दोनों में तालमेल बैठ भी पाएगा या नहीं। दोनों की इच्छाएँ अलग भी हो सकती हैं। दोनों के स्वभाव में कहीं जमीन आसमान का अंतर तो नहीं। हाँ आज हम-दोनों की सोच में सचमुच जमीन आसमान का अंतर है। आज हमारी इच्छाएँ अलग-अलग हैं। मुझे घूमना पसंद है इन्हें घर में बैठे रहना। मुझे गंभीर साहित्यिक सामग्री पढ़ना पसंद है इन्हें हल्की छिछली चीजें पढ़ना। मैं जब भी किसी गंभीर मुद्दे पर बात करना चाहती हूँ इनके पल्ले ही नहीं पड़ता। बातचीत अगर थोड़ी बढ़ भी गई तो सीधे लड़ाई झगड़े पर समाप्त होती है। मैं समय की पाबंद हूँ और इनका उठने सोने खाने का कोई समय ही नहीं । सौरभ के साथ रहना इतना आसान नहीं। हमारे समाज में पुरुष हमेशा से अपनी ही बात को ऊपर रखता है और स्त्री को किसी भी तरह कदमों तले दबा कर। ससुराल में एक स्त्री को दबाना आसान भी होता है क्योंकि वहाँ वह अकेले होती है बाकी सारे तो पुरुष के परिवार के होते हैं। बीच-बीच में पुरुष के परिवार वाले महिला की ओर से भी बोल देते हैं पर वो मात्र दिखावा और छलावा होता है। सामने तो वे महिला का पक्ष ले लेते हैं पर पीठ पीछे सारे मिल कर दाँत भी निपोरते हैं
 
हाँ, मैं एक स्त्री हूँ इसीलिए मेरी हर कही बात अब अर्थहीन हो जाती है। मेरे भाव हृदय से निकलते ही कोई छुरी लेकर उसका गला रेतने को तैयार रहता है। मेरी सोच ज्यों ही अंकुरित होती है उसे कुचल मसल कर मिट्टी में दबा दिया जाता है। ससुराल ..... ये शब्द सुनने में ही कितना भयावना है। कभी- कभी दादी कहा करती थी -

"
बिटिया रहन ढंग सीख लो ससुराल जाना है।"

"
इतने ऊँचे सपने भी न देखो बेटी ससुराल में बड़ी दिक्कत होगी।"

"
दब कर रहना सीख श्वेता ससुराल में दबेगी तभी खपेगी।"

विदाई के समय तो पापा ने भी कह दिया था -


"
श्वेता स्कूल कालेज में तो तुमने बड़े भाषण दिए हैं , पुरस्कार जीते हैं पर ससुराल में जा कर भाषण मत देना। वहाँ चुप रहना और सहना।"

सहना ...
दबना...... खपना..........?

यही है न ससुराल की परिभाषा
? जहाँ अपना अस्तित्व खो जाता है वाणी मूक हो जाती। आपमें प्रतिभा देखते ही लोग नाक भौं सिकोड़ने लगते हैं ताकि आप उसे अपने भीतर ही दफन कर लें। और नहीं तो तरह-तरह की उटपटाँग बातें बिना किसी गलती के सुनाई जाती हैं ताकि आपका आत्मविश्वास धीरे- धीरे घिस कर समाप्त हो जाए। और अगर थोड़ा बहुत डिप्रेशन की शिकार हो जाएँ तो और बढ़िया।

पर मैंने तो बचपन के वो हँसीन पल सँजो रखे हैं। मुझे बोलने नहीं दिया जाता
पर मेरे भीतर मौन संवाद चलते रहते हैं फिर वहीं कहीं से एक रोशनी सी फूटती है और मेरा रोम-रोम प्रकाशमान हो जाता है। बचपन की स्मृतियाँ तो अक्सर मेरे आगे पीछे घूमती और छेड़ती रहती हैं। बचपन की अल्हड़ हँसी, तरह-तरह के खेल खिलौने, रोना-गाना, मासूमियत के वो सबसे प्यारे पल आँखों के सामने ज्यों के त्यों जीवंत हो मुझमें अक्सर नई ऊर्जा भरते हैं। खुले आकाश में बिना किसी कलम कूची के चित्रकारी करना और फिर आसमान में निकले इंद्रधनुष से रंग निकाल कर रंग भरना बचपन में ही संभव था। वो एक ऐसी उम्र थी जिसमें मैं आसमान में समुद्र का चित्र बना उसमें तैरती उतराती नाव में बैठ दूर-दूर से सीपियाँ व मोतियाँ बीन लाती थी तो कभी आकाश में उड़ता पंछी बना स्वयं उसपर सवार हो चाँद तारों को छू आती थी। एक बार मैंने चाँद को बहुत नजदीक से देखा था जो बिल्कुल गोल रोटी सा था पर गर्म नहीं ठंडा। कई बार मैंनें तारों को तोड़ कर अपने बालों व घाघरे में भी टाँका था। आज मेरी उम्र बावन वर्ष की है पर मैंने बचपन के वो दस बारह साल खुद से कभी भी जुदा नहीं होने दिए। व्यक्ति अगर एक बार अमृत की धार पा जाए तो फिर वही धार हर बार विषैले हमलों से बचाती है बस हमें उस धार को प्यार से सहेजना होता है। मैंने उन पलों को सहेजकर अपने ही भीतर छुपे लाकर में रख दिया है जिसे न तो कोई देख पाता है न ही हाथ लगा पाता है। अपशब्दों की बौछार मेरे पास भी आती है पर तब मैं धीरे से अपना लाकर खोल देती हूँ और बौछार पलट कर भाग जाती है। बचपन के मासूमियत में बहुत गुण हैं। मुझे तो गलत बातों का अर्थ ही समझ नहीं आता सो भीतर कुछ विषैला पनपता ही नहीं। भीतर बस प्रकाश ही प्रकाश है और अमृत की एक निर्मल धार हैं।

सम्पर्क 
50 डी, अपना इन्कलेव
रेलवे रोड, गुड़गाँव, हरियाणा - 122001

मोबाइल -
9818423425

ई मेल -
poonamashukla60@gmail.com

(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग वरिष्ठ कवि विजेन्द्र जी की हैं.)

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