बलभद्र




मार्कण्डेय जी की पुण्यतिथि पर आयोजित विशेष प्रस्तुति के अंतर्गत आज पेश है युवा कवि एवं आलोचक बलभद्र का यह संस्मरण। ध्यातव्य है कि बलभद्र का शोध कार्य मार्कंडेय की रचनाधर्मिता पर ही है। इसी क्रम में बलभद्र मार्कण्डेय के बहुत नजदीक आये. स्वयं मार्कण्डेय जी का मानना था कि उन पर किये गए सारे शोध कार्यों में बलभद्र का काम अलग एवं बेहतर है। पहली बार पर प्रस्तुत है बलभद्र का एक आत्मीय संस्मरण। 
बकौल बलभद्र संस्मरण का यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा जिसे वे पहली बार के पाठकों के लिए उपलब्ध कराते रहेंगे.
 

यह तो घर है प्रेम का

कोई रचना कैसे प्रभावित करती है, किस स्तर पर, इसका एक रोचक प्रसंग मार्कण्डेय जी की कहानियों से भी जुड़ा हुआ है। याद है मुझे कि ‘हंसा जाई अकेला’ पढ़ते वक्त मैं मन-ही-मन खूब हँसा था। भीतर से, खूब खिलखिला कर। हंसा को रतौंधी है और अँधेरे में वह एक औरत से टकरा जाता है। मजगवाँ की पहलवानी देख कर वह अपने गाँव के लोगों के साथ लौट रहा है। टकराता है तो वह समझता है कि अपने ही बीच का कोई है। पर, तुरन्त वह समझ जाता है कि अरे, यह तो औरत है। फिर तो मच जाती है भाग-पराह। गाँव के लोग दौड़ा लेते हैं। सब भागे जा रहे हैं, रतौंधी से ग्रस्त हंसा भी। कुछ भी उसे नहीं सूझता। पर भाग रहा है। यह पूरा वर्णन इतना सजीव,  गतिशील और गुदगुदाता हुआ है कि पढ़ते वक्त खूब हँसा था, खूब और कहानी पढ़ता गया, पढ़ता गया और मेरी पूरी हँसी धीरे-धीरे गंभीरता में बदलती गई। करुणा से मन भींगता गया। ‘हंसा’ एक ऐसा पात्र है जिसे बीमारी के चलते, महज रतौंधी के चलते रात में नहीं दिखता। हमारे समाज में बहुतेरे ऐसे लोग हैं जो कुपोषण और अज्ञानता के चलते ऐसी सामान्य बीमारियों से आज भी जूझते हैं। बहुतेरे ऐसे हैं जो सब देखते हुए भी नहीं देखते हैं। ‘हंसा’ आदमी के मन को,  आदमी के भीतर के आदमी को पहचानने में कोई भूल नहीं करता, और बहुतेरे आँख वाले, सुखी-सम्पन्न ‘हंसा’ जैसों को तिरस्कृत और अपमानित करने में ही अपनी बहादुरी समझते हैं। इस कहानी में वह औरत से दो बार टकराता है। पहली बार मजगँवा की पहलवानी देख कर लौटते वक्त और दूसरी बार खाना बनाने के लिए अंधेरे में सामान टटोलते वक्त पहली बार वह जिस औरत से टकराता है, उसका नाम नहीं है, महज टकरा जाने का उल्लेख है और फिर पिटे जाने के भय से भागने का वर्णन है। दूसरी बार टकराता है जिस औरत से उसका नाम सुशीला है और वह गाँधीवादी है और साथ ही कम उम्र की विधवा भी है। गाँधी जी के विचारों की प्रचारिका है, वोलेंटियर है और एक मीटिंग में आई हुई है। यहाँ का जो ‘टकराना’ है वह पहले वाले ‘टकराने’ से भिन्न है। यहाँ भागना नहीं होता, बल्कि ठहरना होता है। यहाँ का ‘टकराना’ दोनों के लिए महत्वपूर्ण है और वे प्रेम-सूत्र में बँध जाते हैं। और फिर, ‘हंसा’ को इस पवित्र और जरूरी प्रेम के लिए टकराना होता है, कूढ़ मगज कांग्रेसियों से, सामंती मन-मिजाज वालों से और दोनों को इस प्रेम की कीमत भी चुकानी पड़ती है-

‘‘यह तो घर है प्रेम का खाला का घर नाहिं।
सीस उतारे भुइँ धरे तब पैठे घर माहिं।’

‘तीसरी कसम’ का ‘हिरामन’ तीन कसमें खाता है और यहाँ ‘हंसा’ दो बार टकराता है। पहली बार टकराता है तो वह मन ही मन बहुत कुछ महसूस करता है। दूसरी बार टकराता है तो महसूस होता है कि हमारा समाज अपनी बद्धमूल धारणाओं में इतना जटिल और क्रूर है कि जीवन को उसकी स्वाभाविक गति में समझने और स्वीकार करने को तैयार ही नहीं है। पढ़ते हुए मैं भींग गया था पूरी तरह। इसी तरह ‘बीच के लोग’ पढ़ते वक्त भी हँसा था पूरी तबियत से। कोई एक पात्र है जो की विशेष मुद्रा बनाते हुए हवा छोड़ता है। मानव-मुद्राओं का वर्णन ही कुछ ऐसा है कि मेरा गँवई मन बिन हँसे नहीं रह सका। गाँव का वर्णन, कउड़े का वर्णन, गली का वर्णन, लोगों का बतियाना, गाँव की साँयफुस्स, सब बड़ा जानदार लगा था, सरस और वास्तव में ऐसा ही है। इतनी मानव-मुद्राएँ देखने को मिलती हैं, इतने प्रामाणिक, इतने जाने-पहचाने कि प्रसन्न हुए बिना नहीं रहा जा सकता। ‘प्रलय और मनुष्य’ नामक कहानी पढ़ते वक्त महसूस कर रहा था कि मार्कण्डेय जी ने जल-जीवों और बाढ़ के रूपक के जरिए आजादी के बाद मची लूट-खसोट, राजनीतिक-आर्थिक भ्रष्टाचार और गाँधी जी के इस्तेमाल की वास्तविक तसवीर पेश की है। गाँधी टोपी में बैठे मेढ़क और मेढ़की को देखना बड़ा अच्छा लगता है। 

मैं बिहार के भोजपुर जिला का रहने वाला हूँ। भाकपा (माले) का कार्यकर्ता हूँ और भोजपुर के किसान-संघर्ष में बतौर एक कार्यकर्ता शामिल हूँ। ‘बीच के लोग’ में जो एक तनाव है, सामंती भूमि सम्बन्धों को ले कर जो एक बहस है, जमीन जमींदारों से वापस लेने अथवा उनके कब्जे से मुक्त करने का जो एक संकल्प और संघर्ष है, इन समग्र स्थितियों और तनावों को मैं सीधे-सीधे देख रहा था। पूरी कहानी पढ़ गया एक उत्सुकता के साथ, आदि से अंत तक। हँसी और तनाव से गुजरते हुए। ‘हंसा जाई अकेला’ में हँसी और करुणा है, एक जबर्दस्त व्यंग्य भी है। हँसी, तनाव, करुणा और व्यंग्य का सम्मिश्रण है इनमें। ‘बीच के लोग’ का अंत जब आया तो सोचने लगा कि ‘मनरा’ का संकल्प कि पहले बीच के लोगों को रास्ते से हटाना होगा, कुछ जँच-पच नहीं रहा था। बीच के लोग तो हैं पर उन्हें हटाने के लिए अलग से क्या कार्यक्रम लिया जा सकता है? मैं महसूस कर रहा था तब और अब भी कि आन्दोलनों और कार्यक्रमों की निरंतरता में ही इन्हें हटाया जा सकता है, संट किया जा सकता है अथवा पक्ष में। मार्कण्डेय जी से एक बार ऐसे ही गप्प करते वक्त पूछा था यह सब, तो कहा उन्होंने कि ‘तुम ठीक कहते हो।’

वे बहुत मानते थे सुरेश काँटक को। काँटक जी भोजपुर के हैं और वहाँ के किसान संघर्षों की अनुगूँजें हैं इनकी कहानियों में। इनके पात्र लड़ते हुए पात्र हैं। रण की नीति तय करते हुए। इनकी एक कहानी है ‘एक बनिहार का आत्मनिवेदन।’ मार्कण्डेय की कहानियों में भी बनिहार हैं, मजूरे हैं। इस कहानी में भोजपुर के भूमिहीन खेत-मजदूरों की कठिन स्थितियों के साथ-साथ उनकी नई संघर्षशील चेतना, भोर की पहली लाली की तरह प्रस्फुटित होती दिखाई देती है। ‘बीच के लोग’ में मनरा है और ‘एक बनिहार का आत्मनिवेदन’ में ‘गनपत’। मुझे लगता है कि ‘गनपत’ जो है सो ‘मनरा’ का अगला रूप है, दोनों एक ही सूत्र में बँधे हुए हैं। मार्कण्डेय जी और काँटक जी के पात्रों की यह जो स्थिति है, उससे भी हम समझ सकते हैं कि वे काँटक जी को क्यों मानते थे। दरअसल, वे जो चाहते थे वो काँटक में पाते थे। संघर्ष का ताप उन्हें मिल रहा था। दोनों गाँव के कथाकार हैं, यह तो एक कारण है ही, पर बड़ा कारण है कि काँटक जी में वो संघर्ष देख रहे थे, किसान-संघर्ष, बनिहारों का संघर्ष। मार्कण्डेय जी से जब पहली बार मिला 2-डी, मिन्टो रोड वाले घर पर सन् 1992 में, तब भी उन्होंने सुरेश काँटक का नाम लिया था यह जान कर कि मैं भोजपुर का हूँ। तब मैं नहीं जानता था कि काँटक जी को वे इतना मानते हैं। अपनी पत्रिका ‘कथा’ में वे काँटक जी की कहानियाँ बार-बार प्रकाशित करते रहे। अपने आखिरी दिनों में भी उन्होंने कहानी के लिए तगादा करवाया था संतोष कुमार चतुर्वेदी से। ‘कथा’ गवाह है, सन्तोष चतुर्वेदी गवाह हैं और कुछ-कुछ मैं भी। वे चन्द्रभूषण तिवारी की भी चर्चा करते थे।

मैं गाँव में था, पार्टी से जुड़ा। किसानों और खेतिहर मजदूरों और महिलाओं की समस्याओं को समझने-बूझने में लगा था, पार्टी की बैठकों और कार्यक्रमों में शामिल होता था। इस कारण गाँव-जवार के बड़े और बड़ी जाति वाले मुझे पसंद नहीं करते थे। मैं हिन्दी से एम.ए. भी कर रहा था और खेती भी थोड़ी-बहुत सँभाल रहा था। अनेक तरह के प्रश्नों के बीच था। तनावपूर्ण जीवन था। एम.ए. के बाद शोध-कार्य करने के इरादे के साथ आया बी.एच.यू.। मार्कण्डेय की ये कुछ कहानियाँ थीं जो पढ़ी थीं और मन में था कि इन्हीं पर काम करना ठीक रहेगा। लेकिन यह भी आसान नहीं था। मेरा एक छोटा भाई है सन्तोष सहर। ‘सहर’ लिखता है अपने नाम के साथ। उसके हाथ में एक दिन ‘अग्निबीज’ देखा। ताक में था कि वह पहले पढ़ ले तो मैं भी पढूँ। मौका मिला और पढ़ गया। अच्छा लगा। जो सोचा था कि मार्कण्डेय की रचनाओं पर शोध-कार्य करूँगा, उसको और बल मिला। गाँव में रहने के चलते पुस्तकें कायदे से मिल नहीं पा रही थीं। बस, फिर रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया शुरू हुई। मेरे लिए यह भी आसान नहीं था। प्रकाश उदय के साथ प्रो. शुकदेव सिंह से मिला तो उन्होंने ‘चक्रधर’ की चर्चा की और ‘साहित्य-धारा’ के बारे में बताया। ‘चक्रधर’ के बारे में कुछ भी नहीं जानता था इसके पहले। उन्होंने कहा कि मार्कण्डेय की किताब ‘कहानी की बात’ पढ़िये। मैं उनसे मिलकर बहुत प्रसन्न हुआ।
मुझे याद है कि श्रीकांत (आरा वाले) की कहानी ‘कुत्ते’ पढ़ते वक्त भी खूब हँसा था। वर्णन ही कुछ ऐसा था। रेणु के उपन्यास ‘मैला आँचल’ और ‘परती परिकथा’ पढ़ते हुए भी हँसा था। रेणु की बात चली तो मालूम हुआ कि मार्कण्डेय जी ‘मैला आँचल’ की तुलना में ‘परती परिकथा’ को बेहतर मानते हैं। ‘रसप्रिया’ कहानी उन्हें खूब पसंद थी। इस कहानी की, बातचीत के क्रम में उन्होंने कई बार चर्चा की। सन् 2000 के बाद उनसे मेरी बातचीत लगातार होती रही। कभी-कभार उनके यहाँ चला जाता था, कभी-कभार फोन पर बातें होती थीं। उन्हें मालूम हुआ कि मैं पार्टी से जुड़ा से हुआ हूँ तो मुझे यह महसूस हुआ कि उनका प्रेम-स्नेह मेरे प्रति और बढ़ता गया। फोन पर वे घर की हाल-चाल भी पूछा करते थे। महज शोध-कार्य ही उनके प्रेम-स्नेह पाने का कारण नहीं था। वह तो परिचय का एक आधार-मात्र था। प्रणय कृष्ण का नाम लेते तो कहते कि अरे जो तुम लोगों का साथी है, वह बड़ा तेज है, बहुत साफ लिखता है। वे मुझे आलसी भी कहते थे। सन्तोष चतुर्वेदी से कहते कि जरा लगाओ उसको फोन। फिर तो पूछ बैठते कि क्या पढ़ रहे हो? कब आओगे? उनसे किसी विषय पर बात करना बड़ा कठिन था। एक बार सन्तोष से कहा मैंने कि आज उनसे उनकी ही कहानियों पर बात करनी है। सन्तोष मुसकाये। चलिये तो सही। हम लोग गये। चाय पी साथ-साथ। बात हम लोग कुछ कहते, वो कुछ और कहते- दुष्यंत बड़ा बदमाश था, तो कभी अपने बाबा के बारे में। अपनी कहानी पर जल्दी कुछ नहीं कहते। हाँ, हमसे पूछते कभी-कभी कि तुमने कैसे खोजा मेरी कहानियों में ‘बाबा’ को। मार्कण्डेय को मैंने उनकी कहानियों से जाना। कहानियों के चलते उनके करीब गया। कहानियों में पाया कि किसानों और मजदूरों को ले कर, देश की स्थितियों को ले कर वे चिंतित हैं। उनकी चिंताओं को पकड़ते हुए मैं गया उनके पास। गया तो पाया कि यह आदमी अपने बारे में ज्यादा कुछ नहीं कहता। और जो कहता है तो पता नहीं क्या-क्या कहता है, कहाँ-कहाँ से। जैसा कि अपनी कुछ कहानियों में कहता है। कुछ तो ऐसी कहानियाँ हैं इनकी, जिसमें लगता है कि कथा कहते हुए वे कथा का अगला-सूत्र तलाश रहे हैं, कोई ‘अगली कहानी।’

इतना बड़ा रचनाकार, और उनकी बहुत-सी रचनाएँ अप्रकाशित हैं, बिखरी हुई। ‘चक्रधर’ नाम से लिखा गया उनका ‘साहित्य-धारा’ स्तम्भ यूँ ही ‘कल्पना’ की फाइलों में था। पिछले साल छपा, 2012 में। लोकभारती प्रकाशन से। ‘कल्पना’ की प्रतियाँ भी नहीं रह गई थीं उनके पास। उनके यहाँ आने-जाने वाला तब का एक युवा कवि उनकी सारी प्रतियां उठा ले गया था, उसके बारे में मार्कंडेय जी बराबर कहते कि वो बड़ा चालू है। ‘कथा’ में उस कवि की कविताएँ भी छपी हैं।

मार्कण्डेय जी जैसे किसानों से, खेत-मजदूरों से, पवनी-पंसारियों से प्रेम करते थे, उसी तरह अपने इलाहाबाद से भी। हम सबों से भी। मैं उन्हें बार-बार सलाम करता हूँ यह गुनगुनाते हुए कि ‘यह तो घर है प्रेम का.....।’

संपर्क:
गिरिडीह कॉलेज, गिरिडीह, झारखंड।
मो0 9801326311

बलभद्र युवा कवि एवं आलोचक हैं. उनके सम्पादन 
में लोकभारती इलाहाबाद से अभी-अभी एक किताब
‘चक्रधर की साहित्य धारा’ प्रकाशित हुई है. इन 
दिनों वे झारखंड के गिरिडीह कालेज गिरिडीह में 
हिन्दी के प्राध्यापक हैं एवं हजारीबाग़ से छपने 
वाली महत्वपूर्ण लघु पत्रिका प्रसंग के सम्पादन से
 जुड़े हुए हैं.

संपर्क-
ई-मेल- balbhadrabhojpur@gmail.com
मोबाईल-
  09801326311


टिप्पणियाँ

  1. आत्मीय संस्मरण! हंसा जाई अकेला का गंभीर विवेचन. मैंने जब यह कहानी पढ़ी तो हंसा के टकरा जाने को नोटिस किया था लेकिन इसके यूं मायने होंगे, यह व्याख्या अभिभूत करने वाली है. खासकर रेनू की कहानी तीसरी कसम से जुड़कर यह उस दौर को भी बढ़िया से व्याख्यायित करती है.
    आपके संस्मरणों का इंतजार रहेगा..

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  2. मार्कण्डेय जी पर बलभद्र जी का आत्मीय संस्मरण,बलभद्र जी के कथा समझ की बारीकियाँ तो दर्शाता है।साथ ही मार्कण्डेय जैसे बड़े रचनाकार के संग बिताए गए अनुभवों को जिस अंदाज़ मे बलभद्र जी ने प्रस्तुत किया है उससे उनके एक सुगठित गद्यकार की पूरी छवि बनती है।क़ाबिलेगौर बात की रेणु की कालजयी कहानी 'तीसरी कसम' और मार्कण्डेय की कालजयी कहानी 'हंसा जाये अकेला' की जिस समानता को इनहोने पकड़ कर एकदम सहज रूप मे तुलनात्मक अध्ययन और आलोचना का सूत्र भी दे दिया है.....आगे भी बलभद्र जी के संस्मरणों का इंतज़ार रहेगा।बल्कि इनसे विनम्र आग्रह कि मार्कण्डेय जी के साथ बिताए क्षणों से प्राप्त अनुभवों की एक पुस्तक तैयार करें।ताकि इस सुखद अनुभव को संरक्षित किया जा सके

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  3. अमर शिल्पी मार्कण्डेय जी पर बलभद्र जी का आत्मीय संस्मरण,बलभद्र जी के कथा समझ की
    बारीकियाँ तो दर्शाता है।साथ ही मार्कण्डेय जैसे बड़े रचनाकार के संग बिताए गए अनुभवों को जिस अंदाज़ मे बलभद्र जी ने प्रस्तुत किया है उससे उनके एक सुगठित गद्यकार की पूरी छवि बनती है।क़ाबिलेगौर बात की रेणु की कालजयी कहानी 'तीसरी कसम' और मार्कण्डेय की कालजयी कहानी 'हंसा जाये अकेला' की जिस समानता को इनहोने पकड़ कर एकदम सहज रूप मे तुलनात्मक अध्ययन और आलोचना का सूत्र भी दे दिया है.....आगे भी बलभद्र जी के संस्मरणों का इंतज़ार रहेगा।बल्कि इनसे विनम्र आग्रह कि मार्कण्डेय जी के साथ बिताए क्षणों से प्राप्त अनुभवों की एक पुस्तक तैयार करें।ताकि इस सुखद अनुभव को संरक्षित किया जा सके

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  4. मार्केण्डेय जी पर यह पूरी श्रृंखला..बहुत ही रोचक एवं उपोयोगी है , ...सादर
    -नित्यानंद गायेन

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    1. *मार्कण्डेय जी पढ़ें . टाइपिंग मिस्टेक है .
      नित्यानंद

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  5. Faqir Jay

    interpretation is redoubling of meaning. The novelty, the new dimension and the new angle which is found in the critique is critic creation , these are absent in story Hansa Jai Akela. No doubt Hansa jai Akela is a literary success because of its unmatched narration but what critic finds in it is his own creation. As Pierre Macherey analyzed any work of art is incomplete in a sense that it is different from itself , it is full of gaps. Filling those gaps is not criticism rather it consists in making those gaps explicit.Analyse , do not interpret

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  6. डॉ. सुनीता

    आपके इस श्रृंखला ने मार्कण्डेय जी को एक नए तरीके से जानने/परखने/समझने का मौका दिया है...सादर..

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