चैतन्य नागर का आलेख ‘सन्नाटा है, तनहाई है, कुछ बात करो’


चैतन्य नागर
सभ्यता के विकास के साथ-साथ मनुष्य अपने भयावह एकाकीपन की तरफ भी बढ़ा है। ऐसा एकाकीपन जो अवसाद में डाल दे लोगों से आज हम अक्सर यह सुनते हैं कि हमारे पास सब कुछ है लेकिन समय नहीं। मनुष्य के आगे बढ़ने और सर्वशक्तिमान होने के पीछे जो महत्वपूर्ण कारक रहा है उसमें उसकी सामूहिकता भी रही है। अलग बात है कि रचनात्मकता के लिए एकाकीपन जरुरी होता है। प्राचीन भारतीय ऋषि-मुनि चिन्तन के लिए दुर्गम पर्वतों की गुफाओं और कंदराओं को चुना करते थे। अपने चिन्तन के लिए वे प्रायः घने जंगलों (अरण्यों) में चले जाते थे। इसी क्रम में ‘आरण्यक ग्रंथों’ की रचनाएँ की गयीं। लेकिन आज का एकाकीपन ऐसा है जिसमें अपनों के लिए भी किसी के पास समय नहीं है। इस एकाकीपन पर एक चिंतनपरक और महत्वपूर्ण आलेख लिखा है कवि चैतन्य नागर ने। तो आइए पहली बार पर आज पढ़ते हैं चैतन्य नागर का आलेख ‘सन्नाटा है, तनहाई है, कुछ बात करो’।           

सन्नाटा है, तन्हाई हैकुछ बात करो! *


चैतन्य नागर

हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी
 फिर भी तनहाइयों का शिकार आदमी। 

पिछले हफ्ते किसी समाचार पत्र में एक खबर पढ़ते-पढ़ते आज के आदमी और उसकी तन्हाई का बयान करती निदा फाजली की ग़ज़ल कानों में गूंजने लगी। 1990 के दशक तक जब हम यह सुनते थे कि पश्चिम में बेटे और माँ-बाप को एक दूसरे से मिलने से पहले अपॉइंटमेंट लेनी पड़ती है, तो आश्चर्य होता था और अजीब भी लगता था। अब हमारे देश में भी ऐसे ही हालात पैदा हो रहे हैं। अकेलेपन का दर्द बड़े-बुजुर्गों को भी है, युवाओं को भी। मिड लाइफ क्राइसिस (अधेड़ उम्र से जुडी भावनात्मक दिक्कतें) तो बड़ी ही सामान्य बात है और मनोवैज्ञानिक बताते हैं कि यदि सही समय पर व्यक्त न हों  तो पैंतालीस-पचास के आस-पास किशोरावस्था की दबी हुई कामनाएं फिर से जागने लगती हैं और यह भी संभव है कि बढती उम्र में वे बिलकुल ही अलग और विकृत रूप से व्यक्त होने लगें।


सार्त्र जैसे अस्तित्ववादी दार्शनिक मानते हैं कि एकाकीपन ही मानव जीवन का सार है। हर इंसान अकेला दुनिया में आता है, अपने अकेलेपन के साथ अपनी जीवन यात्रा को पूरा करता है और आखिरकार अकेला ही दुनिया से विदा हो जाता है। संसार में उसे फेंक दिया गया है, और उसे अपने फेंक दिए जाने (थ्रोननेस) के साथ जीना ही है। इसी अकेलेपन और शून्य के बीच वह जीवन का अर्थ ढूंढता है। सार्त्र के अनुसार अर्थ की खोज अपने आप में ही एक विरोधाभास है। अस्तित्ववादी विचारक कामू के उपन्यास द मिथ ऑफ़ सिसीफस में देवताओं ने सिसिफस को पहाड़ की चोटी पर एक चट्टान को ले जाने की सज़ा दी थी। जब भी उस चट्टान को वह शिखर पर ले जाता, तब वह अपने ही वज़न से नीचे लुढ़क जाती। देवताओं ने सोचा होगा कि व्‍यर्थ और निष्‍फल परिश्रम से बढ़ कर कोई सज़ा नहीं हो सकती। आम आदमी का जीवन ऐसा ही है। अपने अकेलेपन का बोझ लादे वह जीवन की ट्रेडमिल पर हाँफते हुए दौड़ता है; रुकता है, फिर शुरू हो जाता है। शबो-रोज़ इसी तमाशे को वह जीता चला जाता है।
         

पर मामला ज्यादा गंभीर है। जितना हम समझते हैं, अकेलापन उससे कहीं ज्यादा गहरा है। अब तो यह एक महामारी की तरह है। पढाई-लिखाई का तनाव, नौकरी की तलाश, साथ ही भावनात्मक क्लेशों का चौतरफा हमला, विवाह या नौकरी के बाद अक्सर परिवार का टूट जाना, नौकरी में आगे बढ़ने की महत्वाकांक्षा और फिर चीज़ें बटोरने की होड़ में शामिल होना---ये सभी मिल कर जीवन को बड़ा तनावपूर्ण बना दे रहे हैं। ज़िन्दगी के किसी भी क्षेत्र में जो हैऔर हमारे हिसाब से जो होना चाहिए’---इनके बीच की खाई भी तनाव का बड़ा कारण है। लगातार बढ़ते तनाव का कारण और परिणाम दोनों ही है आपसी संबंधों में आत्मीयता का ख़त्म होना। सम्बन्ध समय, अवधान और स्नेहपूर्ण ऊर्जा की मांग करते हैं। संबंधों में आत्मीयता धीरे-धीरे गहराती है। समय तो अब किसी के पास है ही नहीं, और अवधान का दायरा और विस्तार दोनों सिकुड़ता जा रहा है। रिश्ते बनाना और उन्हें कायम रखना ही एक चुनौती बन गया है। सोशल मीडिया पर गुमनाम रहते हुए, अपरिचित लोगों के साथ जिस आभासी आत्मीयता का अनुभव होता है, उसके झूठे स्वाद ने ही वास्तविक, गहरी, गुनगुनी आत्मीयता की जगह ले ली है।

Loneliness by Hans Thoma (National Museum in Warsaw).
ढलती उम्र का अकेलापन


ढलती उम्र, थकती काया और दिन-ब-दिन कम होती मनो दैहिक क्षमताओं के बीच बुजुर्गों का सबसे बड़ा रोग असुरक्षा के अलावा अकेलेपन की भावना है। उनकी देखभाल के लिए कोई सेवक रख देने से या उन्हें ओल्ड एज होम भेजने से उनकी परिचर्या तो हो जाती है, लेकिन भावनात्मक रूप से उन्हें वैसा संतोष नहीं मिल पाता जो सिर्फ अपने परिजनों के बीच में रह कर मिलता है। शहरी जीवन की आपाधापी तथा परिवारों के बिखराव ने समाज में कई समस्याओं को बढ़ा दिया है। एक तो परिवार के ज्यादातर सदस्यों के पास अपने बुजुर्गों के साथ बिताने के लिए समय ही नहीं है, वहीं कुछ बुजुर्गों का खुद का नजरिया भी उनकी परेशानी का कारण बन जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार जरूरत इस बात की है कि परिवारों में इस बुजुर्ग पीढ़ी को संसाधन के रूप में माना जाए, लेकिन कुछ परिवारों में उन्हें बोझ के रूप में लिया जाता है। वृद्धावस्था में देह के थक जाने के कारण हृदय संबंधी रोग, रक्तचाप, मधुमेह, जोड़ों के दर्द जैसी आम समस्याएँ तो होती हैं, लेकिन इससे बड़ी समस्या होती है भावनात्मक असुरक्षा की। भावनात्मक असुरक्षा के कारण ही बड़े बुजुर्गों में तनाव, चिड़चिड़ाहट, उदासी, बेचैनी जैसी समस्याएँ होती हैं। पश्चिमी समाज की तरह हमारे देश में भी बुजुर्ग पीढ़ी में अकेलेपन की भावना तेजी से बढ़ रही है। अपनी पीड़ा से उबरने के लिए बुजुर्गों को यह गौर करना चाहिए कि उनकी समस्या में उनका अपना क्या योगदान है। आर्थिक-सामाजिक दबावों के कारण अक्सर बच्चे बड़े हो कर दूसरे शहर या विदेश चले जाते हैं। ऐसे में खासकर भारतीय बच्चों के मन में भयंकर द्वंद्व होता है और वे अपने माँ बाप को साथ ले जाने और उन्हें घर पर छोड़ देने की दुविधा में जकड़ जाते हैं। ऐसे में बुजुर्गों को उनके साथ सहयोग करना चाहिए, न कि उनकी दुविधा को और अधिक बढ़ाना चाहिए। बच्चों को भी अपने अभिभावकों, माता-पिता के प्रति इस्तेमालवादी रुख न अपना कर उन्हें अपने साथी-सहयोगी और ऐसे सह-यात्रियों की तरह देखना चाहिए जिन्होंने उनकी परवरिश में अपने जीवन के कई बरस खपाए हैं और उनकी उपलब्धियों में उनका सकारात्मक योगदान रहा है। इस तरह की सोच आपसी स्नेह बढ़ाएगी और अकेलेपन एवं उससे जन्म लेने वाले अवसाद को काफी हद तक कम करेगी। 

Loneliness Paintings Abstract Canvas Zoltan Pal
    
 
अकेलेपन का साथी, अवसाद

अकेलेपन और अवसाद यानी डिप्रेशन के बीच एक गहरा सम्बन्ध है जिसे समझने की जरुरत है। गौरतलब है कि एक देश जिसकी गहरी जड़ें आध्यात्मिकता में रहीं हैं, उसके धर्म और आध्यात्मिक ज्ञान उसे नैराश्य और अवसाद का सामना करने में मदद नहीं कर पाए हैं! पर इसके बारे में शुरू से ही एक सजगता रही है ऐसा प्रतीत होता है। गीता को विश्व की महानतम आध्यात्मिक पुस्तकों में गिना जाता है, और उसकी शुरुआत ही होती है विषाद से। विषाद का अर्थ ही है गहरा दुःख और इसके निहितार्थ अवसाद के बहुत ही निकट है। इसका सीधा सम्बन्ध अकेलेपन के साथ है। गीता के पहले अध्याय में ही जब अर्जुन कौरव सेना में अपने रिश्ते-नातेदारों को देखता है तो उसकी जो मनोदैहिक स्थिति होती है, वह अवसाद के लक्षण ही दर्शाती है। अवसाद के इन क्षणों में वह अपने साथी-संगियों, नाते-रिश्तेदारों और यहाँ तक कि अपने प्रिय सखा कृष्ण की उपस्थिति में भी पूरी तरह अकेला महसूस करता है। यह उसके लिए गहरे भय का क्षण भी होता है और उसके व्यवहार में उस व्यक्ति के ऐसे सभी लक्षण दिखाई पड़ते हैं जो लम्बे समय से निपट अकेलेपन का शिकार रहा हो। कृष्ण से वह कहंता है कि उसके अंग शिथिल होते जा रहे हैं, और गांडीव उसके हाथ से छूटा जा रहा है, उसका शरीर काँप रहा है और कंठ सूख रहा है। बाद में मित्र और सारथी कृष्ण के साथ एक लम्बे संवाद के बाद वह इस पीड़ादायक उहापोह से बाहर आता है। एक तरह से देखा जाय तो इसमें यह संकेत मिलता है कि अकेलेपन से पीड़ित कोई व्यक्ति जब अपने भावों को किसी मित्र के सामने व्यक्त कर पाए, तो वह अपनी दुखदायी स्थिति से बाहर हो सकता है। यही काम आज के समय में पेशेवर मनोचिकित्सक और मनोविश्लेषक करते हैं। परिवार के सदस्य और मित्र ऐसी परिस्थितियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।  
         

विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में अकेलेपन से जन्मे अवसाद से ग्रस्त लोगों की संख्या दुनिया में सबसे अधिक है, यानी ३६ फीसदी!! जब कोई देश या समाज अभूतपूर्व सामाजिक और आर्थिक बदलावों के दौर से गुज़रता है, तो बने बनाये तौर तरीकों, जीवन शैली का टूटना कईयों को अकेलेपन और अवसाद की ओर ले जाता है। कभी वे इन बदलावों को संकट के रूप में देख कर इनके बारे में तरह तरह की कल्पनाएँ करते हैं, और कभी ये बदलाव उनके लिए वास्तविक संकट बन कर आ जाते हैं। इस अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन में एक और और बात सामने आयी है और वह यह कि स्त्रियों के अवसाद में जाने की सम्भावना पुरुषों की तुलना में दुगुनी होती है। आम तौर पर कम विकसित देशों में अवसाद कम होता है, पर भारत की ओर देखें तो यह एक अपवाद है। भारत में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों में हाल ही में बताया गया कि देश में कुल 13545 लोगों ने ख़ुदकुशी की। इसका अर्थ है कि हमारे देश में हर रोज़ 371 लोग आत्महत्या करते हैं। आत्महत्या, अकेलेपन और अवसाद के गहरे आपसी सम्बन्ध हैं और  इस विषय में विस्तार से जाने की आवश्यकता नहीं।

Painting Loneliness - Artist Maria Gruza
 
किराये पर दोस्त  


जिस खबर का शुरू में ज़िक्र किया है वह कुछ वेबसाइट्स से जुड़ी है जिनमे से एक का नाम है रेंटअफ्रेंड.कॉम। बड़े शहरों में किसी भी अकेले युवक और युवती, या बुजुर्ग को दिन भर की थकान, चिक चिक के बाद किसी के साथ शाम को बैठ कर कॉफ़ी पीने और अपने सुख-दुःख शेयर करने का दिल कर सकता है। ऐसे में इस वेबसाइट के जरिये आप किरायेपर किसी दोस्त को बुला सकते हैं। उसके साथ आप किसी रेस्त्रां में या पार्क में समय बिता सकते हैं। यह सम्बन्ध कुछ घंटो के लिए ही होगा, और सिर्फ भावनात्मक शेयरिंग तक ही सीमित रहेगा। यदि यह स्वाभाविक रूप से आगे बढ़ता है, तो यह दोनों पक्षों की सहमति पर निर्भर करेगा। आप साथ बैठ कर सिर्फ चाय-कॉफ़ी पीना चाहते हैं तो आपको इसका करीब पांच से छह सौ रूपये किराया देना होगा और यदि डिनर पर, माँ-बाप, घर वालों के साथ जाना हो तो इसकी कीमत 1000 रुपये तक हो सकती है। रेंटअलोकलफ्रेंड.कॉम और फाइंडफ्रेंड्स.कॉम भी ऐसे ही पोर्टल्स हैं जो आपको अपने ही शहर या इलाके के दोस्तों से मिलवाने का वादा करते हैं। कुछ पोर्टल्स ऐसे भी हैं जो पांच सौ या एक हज़ार रुपये सदस्यता शुल्क भी लेते हैं। कई लोगों को यह चौंका देने वाला अजीबोगरीब तरीका लग सकता है, पर जरुरी नहीं कि इसमें हमेशा कोई अप्रिय घटना होने की ही सम्भावना हो। कुछ वेबसाइट्स स्पष्ट रूप से यह कहती हैं कि वे सिर्फ और सिर्फ प्लेटोनिक संबंधों को, सिर्फ दोस्ती को बढ़ावा देने के लिए बनायी गयी हैं। रेंटअफ्रेंड.कॉम पर इस महीने के पहले हफ्ते में छह लाख इक्कीस हज़ार पांच सौ पचासी दोस्त किराये पर उपलब्ध थे। फेसबुक पर भी ऐसे कई पेजेस हैं जो इस तरह के दोस्ताना रिश्तों को शुरू करने में मदद करते हैं। मित्र बनने या होने से ज्यादा जरुरी हो गया है मित्र खोजना और पाना। कहते हैं मित्र पाने का सबसे आसान तरीका है कि आप खुद मित्र बन जाइए। पर इस तरह की बातों को अब ज्ञान बघारना कहा जाता है। मित्र बनाने की होड़ सी लगी हुई है। फेसबुक पर आप पांच हजारिया हो जाएँ तो आपकी गर्दन सारस की तरह अकड़ जाती है। पर यह सिर्फ एक आवरण है जिसके पीछे बैठा व्यक्ति अपने अकेलेपन के साथ घुटता हुआ भी देखा जा सकता है।



मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि अकेलापन एक मूलभूत भावना है और जो क्रोध, उदासी, अवसाद, व्यर्थता के भाव, खालीपन और निराशा को जन्म देती है। अकेले लोग अक्सर सोचते हैं कि उन्हें कोई पसंद नहीं करता, वे खुद के बारे में लगातार चिंतित रहते हैं और दूसरों के प्रति उनकी समानुभूति कम होती जाती है। वे परित्यक्त महसूस करते हैं और इसलिए खुद को लोगों से दूर ही रखते हैं। इस तरह की सभी आदतें और आचरण अकेलेपन के लिए और अधिक खाद-पानी का काम करते हैं। जो अकेले होते हैं वे यह भी सोचते हैं कि दुनिया में उनके अलावा और सभी राजी-ख़ुशी हैं। अकेलापन एक भाव दशा है और इसके असर में ऐसा लगता है जैसे कोई दुनिया से बिलकुल अलग थलग पड़ गया हो; भीतर से एकदम खाली हो गया हो, खोखला हो गया हो। यह भाव इतना गहरा हो जाता है कि एक ऐसी भी स्थिति आती है जिसमे इंसान किसी के साथ सम्बन्ध बना ही नहीं पाता। बस वह जीवन की सतह पर चलते फिरते समय बिताता है। भीतर से एक विचित्र सा उचाटपन उसकी रूह को कुतरता रहता है। अकेलापन समस्या तभी बनता है जब किसी को अकेले होने में भय महसूस होने लगे। ऐसे में हमेशा लोगों से घिरे रहने की आदत पड़ जाती है और जैसे ही लोग इधर उधर हो जाते हैं,  अकेलापन अपने भय के साथ फिर उन्हें लीलने लगता है। यह भय इस हद तक बढ़ जाता है कि एक फोबिया (असामान्य भय) की शक्ल भी ले सकता है जिसे मोनोफोबिया कहते हैं। यह स्थिति भयावह होती है और बहुत अधिक कष्ट भी देती है। इस भय की वजह से साँसे फूलने लगती हैं, तेज़ी से चलने लगती हैं, दिल की धड़कन असामान्य हो जाती है, देह से लगातार पसीना निकलता है और डर से जैसे दम घुटने लगता है। ग़ालिब की एक मशहूर नज़्म उनकी तन्हाई और उससे उपजी उदासी का बखूबी बयान करती है, जिसमे वह लिखते हैं: 

रहिये अब ऐसी जगह चल कर जहाँ अपना कोई न हो,
हमसुखन कोई न हो, हमजुबां कोई न हो।

नज़्म के आखिर में वह अकेलेपन के करीब-करीब आखिरी दौर में पहुँच जाते हैं और कहते हैं:

पड़िए गर बीमार तो कोई न हो तीमारदार,
और गर मर जाइए तो नौहा ख्वाँ कोई न हो...। 

ये शेर इंसान के मन में अकेले और उचाट होने की चरम स्थिति को दर्शाते हैं जहाँ वह किसी को देखना तक नहीं चाहता; यह भी नहीं चाहता कि उसे भी कोई  देखे। अगिनत अपेक्षाएं और सपने टूटने के बाद और कईयों के व्यवहार से निराश होकर ही किसी की ऐसी दशा होती है। अपने इर्द गिर्द हम देखें तो ग़ालिब की इस दशा को जीने वाले अलग अलग उम्र के कई लोग हमे दिखाई देगें। हम कभी कभी खुद भी ऐसी मनोदशा से गुज़रते हैं, भले ही उसे इतने मर्मस्पर्शी तरीके से व्यक्त न कर पायें। एक सूनापन है जो हर तरह के संग-साथ, मित्रता, प्रतिष्ठा और समृद्धि के बाद भी हमारा साथ नहीं छोड़ता। अपनी पेंटिंग्स में सूरजमुखी के फूलों की रोशनी ढूँढने वाला विन्सेंट वैन गो एक दिन खुद को सीने में गोली मार कर ख़ुदकुशी कर देता है; और हाल ही में जब हॉलीवुड के मशहूर कमीडियन रोबिन विलियम्स ने जब आत्महत्या की तो दुनिया चौंक गयी यह जान कर कि सबको हंसाने वाले की रूह कितनी ज़ख्मी रही होगी।   

Loneliness Painting by Lanre Buraimoh
  
अकेलापन और सृजनशीलता


हालाँकि अकेलेपन के एक सृजनात्मक पहलू पर भी कवियों और दार्शनिकों ने रोशनी डाली है पर अकेलेपन को सृजनात्मकता के स्त्रोत के रूप में बदल देना गहरी समझ की मांग करता है। जे कृष्णमूर्ति ने लोनलीनेस, एकाकीपन या  निर्जनता और अलोननेस या अकेलेपन में साफ़ साफ़ फर्क किया है। वह कहते हैं कि एकाकीपन आपको अलग थलग करता है, जबकि अलोन का अर्थ है ऑल वन’, अर्थात जो अकेला होता है, वह पूरी सृष्टि के साथ होता है। उसे किसी व्यक्ति विशेष के साथ की आवश्यकता नहीं पड़ती। गौरतलब है कि लेखकों, चिंतकों और कलाकारों का अकेलापन मानसिक ज्यादा और भौतिक कम होता है, तभी तो सार्त्र ने अपना ज़्यादातर काम फ्रांस के कैफ़े और रेस्टोरेंट में ही बैठ कर किया। कलाकार के भीतर एक ख़ास किस्म की क्षमता होती है कि वह भीड़ में भी खुद को अकेला कर लेता है। अंग्रेजी कवि विलियम वर्ड्सवर्थ अक्सर पर्वतों और वादियों के ऊपर से तैरते बादल की तरह अकेला हो जाता है और उन क्षणों को अपनी रचनाशीलता के लिए संजो कर रखता है। काफ्का कहता है कि लिखना बिलकुल तनहा हो जाना है, अपने अंतर्मन की ठंडी गहराइयों में डूबते जाना है। अमेरिकी चिंतक-लेखक हेनरी डेविड थोरू का कहना है कि उन्हें अकेलेपन से बेहतर साथी कभी मिला ही नहीं। पर एकाकीपन की मजबूत दीवार तोड़ कर अकेलेपन की सृजनात्मकता की ओर बढ़ना सबके वश की बात नहीं।  

Abstract Art Loneliness! by rudolf brink
 
मौत के बाद भी तनहा


पिछले दिनों एक और खबर पढ़ी जो यहाँ की संस्कृति के सन्दर्भ में चौंका देने वाली है। हैदराबाद से आकर कोलकाता में बसी एक महिला ने एक ऐसी एजेंसी बनायी है जो लोगों के अंतिम संस्कार की पूरी व्यवस्था करती है। शव की देखभाल, उसे सुरक्षित रखने से ले कर शव वाहक गाडी और पंडित-पुरोहितों का इन्तेजाम तक यह एजेंसी करती है। अलग-अलग संप्रदाय के लोगों के लिए तरह तरह के पैकेजेस हैं। एजेंसी की सेवाएं ऑन लाइन भी बुक करवाई जा सकती हैं। वह श्राद्ध वगैरह का भी प्रबंध कर देती हैं और जरुरत पड़े तो शव को दूसरे देश भी भेजने की व्यवस्था करवा देती हैं। देश से बाहर रहने वाले लोगों के किसी रिश्तेदार की भारत में मौत हो जाए तो ऐसे में यह एजेंसी बहुत मददगार साबित होती है। लम्बे समय तक बाहर रहने वालों का भारत में अपने नाते रिश्तेदारों के साथ संपर्क टूट जाता है और ऐसे में हर छोटी-बड़ी चीज़ों का बंदोबस्त करना उनके वश की बात नहीं रह जाती। अंत्येष्टि फ्यूनरल सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड नाम की एजेंसी उनकी सहायता करती है। भविष्य में कभी ऐसा भी हो सकता है कि किसी रिश्तेदार की मौत पर लोग बाहर से ही फ़ोन कर दें और इस तरह की एजेंसियां देश में ही अंतिम संस्कार से जुड़े सभी कर्मकांड निपटा कर करके उन्हें बस सूचना दे दें। इस अनूठी एजेंसी के काम को सफलता मिल रही है और सामाजिक-आर्थिक कारणों से हो रहे बदलाव जल्दी ही कई और लोगों को इस तरह का व्यापारशुरू करने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। अभी तो हमे इन ख़बरों को पढ़ कर थोडा अजीब लग सकता है, पर धीरे धीरे अन्य बातों की साथ इनकी भी आदत पड़ जानी है। हो सकता है मानवीय संबंधों की देख-रेख का समूचा काम विशेषज्ञ और पेशेवर एजेंसियां ही संभाल लें। हो सकता है अकेलापन और उससे जुड़ा अवसाद भी साथ ही बढ़ता चला जाए।  

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*गुलज़ार की एक नज़्म से



सम्पर्क - 
ई-मेल : chaitanyanagar@gmail.com

टिप्पणियाँ

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (04-09-2016) को "आदमी बना रहा है मिसाइल" (चर्चा अंक-2455) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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