वैभव सिंह का आलेख 'गढ़ाकोला में दिखे उदास निराला'



सूर्यकान्त त्रिपाठी
आज वसंत पंचमी है वसंत पंचमी का दिन महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' का जन्म दिन भी है। हाल ही में युवा आलोचक वैभव सिंह उनके पैतृक गांव उन्नाव के गढ़ाकोला गए थे। गढ़ाकोला से लौट कर हाँ की दशा-दुर्दशा पर युवा आलोचक वैभव ने एक आलेख लिखा हैवसंतपंचमी की बधाई देते हुए पहली बार के पाठकों के लिए आज हम इसे विशेष तौर पर प्रस्तुत कर रहे हैं

   
गढ़ाकोला में दिखे उदास निराला

वैभव सिंह

ब्रिटेन में एक शहर है  - स्ट्रेटफोर्ड अपान-एवन। यह वह शहर है जहां प्रसिद्ध अंग्रेजी नाटककार शेक्सपियर का जन्म हुआ था। शेक्सपियर के मरणोपरांत कुछ साल बाद उनका पैतृक आवास खंडहर में बदल गया था लेकिन डेढ सौ साल पहले उसका जीर्णोद्धार किया गया और उसे भव्य स्मारक के रूप में विकसित किया गया। इमारत की मरम्मत कर उसे चटख रंगों में सजाया गया ताकि देश-विदेश से आने वाले लोग इस स्थल को देख सकें। एक रिपोर्ट के अनुसार अब साढ़े सात लाख लोग प्रति वर्ष इस जगह को देखने आते हैं। इसी तरह हैंपशायर में जेन आस्टिन के आवास और चार्ल्स डिकेंस के लंदन में स्थित घर में आने वाली सैलानियों की संख्या भी लाखों में है। प्रसिद्ध फ्रांसीसी लेखक विक्टर ह्यूगो ने जिस अपार्टमेंट में पहली बार अपनी प्रेमिका को देखा था या दूसरे महायुद्ध में ज्यां पाल सार्त्र अपने दोस्तों के साथ पेरिस के बाहर जिस सराय में छिपे थे, वे जगहें आज भी साहित्य व विचारप्रेमियों द्वारा भावविभोर हो कर याद की जाती हैं। यूरोप में लिटरेरी टूरिज्म को विशेष तौर पर प्रोत्साहित किया जाता है और कई पर्यटन क्षेत्र की कंपनियां अपने टूर पैकेज में इसे प्रमुखता से स्थान देती हैं। पर खुद को विकसित व यूरोप की तरह समृद्ध देश बनाने की आकांक्षा पालने वाला अपना देश यूरोप के साहित्य प्रेम व साहित्यकारों की धरोहर सजोने की परंपरा से कुछ नहीं सीखना चाहता। भारत में कला व लेखन से जुड़े मनीषियों के बारे में जो अजीबोगरीब किस्म की निर्मम उपेक्षा का भाव है, वह विदेशी सैलानियों को भी हैरानी में डाल देता है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे हिंदी जगत को अपनी साहित्यिक धरोहर की बिलकुल परवाह नहीं है। इसका संबंध हिंदी क्षेत्र में लंबे समय तक फैली अशिक्षा से है, तो दूसरी ओर लेखकों के प्रति सरकारी उदासीनता से है। एक कारण यह भी है कि लंबे समय तक हिंदी समाज को अपने सांस्कृतिक पुनरुद्धार की चिंता नहीं करनी पड़ी। अतीत की काल्पनिक महानता से उसकी चेतना नियंत्रित होती रही। हिंदी समाज ने इस बात पर कम ध्यान दिखा कि संस्कृति स्थिर या जड़ नहीं बल्कि सचेत रूप से विकसित करने वाली चीज होती है। इसे विकसित करने के लिए नए विचार, दृष्टि, कल्पनाएं व सौंदर्य-बोध को अपनाना जरूरी होता है। अपनी संस्कृति को विकसित करने की चिंता के अभाव ने उसके मन भविष्यदृष्टा लेखकों व चिंतकों के महत्व को समझने के रास्ते में शर्मनाक बाधा खड़ी कर दी। 


हाल ही में हिंदी के महान छायावादी कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला के पैतृक गांव गढ़ाकोला की यात्रा करने पर लेखकों से जुड़ी स्मृतियों के बारे में हिंदी समाज की उपेक्षा को बड़ा तीखा अहसास हुआ। गढ़ाकोला गांव उत्तर प्रदेश के शहर उन्नाव से लगभग 40 किलोमीटर दूर बीघापुर तहसील में पड़ता है। बीघापुर स्वयं में अच्छा-खासा रेलवे स्टेशन भी है और यह गांव उस स्टेशन से करीब पांच किलोमीटर आगे हैं। निराला पर लिखी अपनी पुस्तक में रामविलास शर्मा ने इस गांव के बारे में लिखा- कानपुर-रायबरेली लाइन पर बीघापुर स्टेशन से लगभग दो कोस पर गढाकोला गांव बसा हुआ है। लोन नदी को पार करने पर गांव के कच्चे घर दिखाई पड़ने लगते हैं। और घरों की तरह चौपाल, छप्पर, दहलीज, आंगन, खमसार और अटारी के नक्शे पर पंडित राम सहाय का मकान भी बना हुआ है।निराला के पिता का नाम राम सहाय त्रिपाठी था जो बंगाल के मेदिनीपुर जिले की रियासत में काम करते थे। वहीं वसंत पंचमी के दिन निराला का जन्म हुआ था जो इकलौते पुत्र थे। पर उन्नाव स्थित अपने पैतृक गांव में निराला लगातार आते-जाते रहे। 



वर्तमान में निराला के गांव जाने तक की पक्की सड़क बनी हुई है। पर निराला के घर पहुंच कर जहां एक ओर भावनात्मक सुकून मिलता है वहीं घर की हालत देख कर मायूसी के सिवाय मन में कोई दूसरा भाव नहीं पैदा होता। गत सदी के सबसे महान हिंदी कवि का टूटा-फूटा घर निराशा पैदा करता है। जहां निराला का घर था, वहां उनकी मूर्ति लगी है। वह मूर्ति परिवेश में बिखरी बेचारगी को मूक भाव से निहारती हुई प्रतीत होती है। मूर्ति की उन खुली हुई आंखों में संत्रास का भाव झांकता लगता है। निराला का उदास चेहरा जैसे कहीं दूर से हमें देख रहा था। उन्हीं की कविता सरोज स्मृति की पंक्तियां गूंज रही थीं-
  
दुःख ही जीवन की कथा रही 

क्या कहूं आज जो नहीं कही? ’
  
आसपास खालिस ईंटों वाले गंवई मकान हैं और गांव के स्थानीय जीवन के अनुरूप भैंसे और गायों के तबेले। खाकी स्कूल ड्रेस पहन कर साइकिल पर भागते बच्चे भी दिखा जाते हैं। उस घर में उनके वंशजों के नाम पर राजकुमार त्रिपाठी का परिवार रहता है जो निराला के चचेरे भाई के प्रपौत्र हैं। उनके परिवार से ही जानकारी मिली कि गांव में वसंत पंचमी के दिन यानी निराला जी के जन्म दिन कुछ अधिकारी या साहित्य प्रशंसक आते हैं और वे निराला जी के नाम पर कुछ विशेष स्मारक या भ्रमण योग्य स्थल के निर्माण का वादा करते हैं, पर बाद में कुछ नहीं होता है। निराला जी जिस कमरे में बैठते थे वह या तो बंद रहता है या त्रिपाठी जी की मां का सामान उसमें रखा होने के कारण वह कभी-कभी खुलता है। गांव में निराला जी के नाम पर स्कूल, कालेज और पुस्तकालय हैं पर वे निराला के केवल नाम को ढोते प्रतीत होते हैं। राज कुमार त्रिपाठी के परिवार ने अपने डेढ़ एकड़ जमीन निराला के नाम पर पार्क बनाने के लिए स्वेच्छा से प्रदान की थी पर उन्हें आज अपने इस निर्णय पर थोड़ा पछतावा होता है। कारण यह है कि वह पार्क किसी उजाड़, असमतल मैदान में तब्दील हो गया है। पार्क के चारो ओर लगी लोहे की बाड़ टूटी-फूटी है। घास की हरियाली जगह मिट्टी-धूल का भूरापन चारो ओर फैला है। निराला की कुछ कविताएं पार्क में लगे काले चमकते पत्थरों पर अंकित की गई हैं। उन्हीं में उनकी अमर लंबी कविता राम की शक्तिपूजा की ये पंक्तियां भी अंकित हैं- 

हे पुरुष सिंह तुम भी करो यह शक्ति धारण
आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर
तुम वरो विजय संयत प्राणों से प्राणों पर। 

विडंबना यह है कि शक्ति की मौलिक कल्पना का आह्वान करने वाले कवि का पैतृक-स्थल बड़ा निस्तेज और शक्तिहीन प्रतीत हो रहा था। एक सुखद बात यह लगी कि निराला की कविताओं के साथ ही निराला के मित्र और उनके ऊपर निराला की साहित्य साधना जैसी चर्चित पुस्तक लिखने वाले रामविलास शर्मा की काव्य पंक्तियां भी पत्थरों पर अंकित हैं। निराला के नाम पर स्थापित पार्क में दिन में सर्दियों की धूप में कुछ जुंआरी एकत्र होते हैं जो ताश के पत्ते फेंटते रहते हैं। जब उनकी फोटो लेने की कोशिश की गई तो वे डर के भागने लगे। कुछ ने तो मुंह पर रुमाल रख लिया। पार्क से सटे निराला वाचनालय की हालत पर तो कुछ लिखना ही बेकार लगता है। टूटे दरवाजे और उखड़े प्लास्तर वाले उस वाचनालय में किताबें वैसे ही गायब है जैसे देश के पढ़े-लिखे लोगों के मन से विवेक। गांव में प्रायः लोग निराला मूर्ति का पता तो बता देते हैं, पर निराला के बारे में उन्हें ज्यादा पता नहीं है। उनके मन में निराला की छवि किसी देवी-देवता जैसी है जिसकी मूर्तियां गढ़ी जा रही हैं और जिसे लोग मालाएं चढ़ाने कभी-कभार आ जाते हैं। गांव में एक युवक से पूछा कि कवि किस कहते हैं तो वह सकपका गया। उसे यह नहीं पता था कि कवि होना क्या होता है। यह उसे शब्दज्ञान की परीक्षा लेने वाला प्रश्न लगा जिसका निराला से कोई संबंध नहीं था। गांव में भारत के सामान्य गांवों जैसी ही स्वाभाविक ढंग की जीवंतता और उतनी ही स्वाभाविक ढंग की पस्तहाली भी। वहां सरकारी कृषि मंडी है और ब्यूटी पार्लर भी। ब्यूटी पार्लर में लड़कियों को फैशन व ब्यूटी के कोर्स कराने के विज्ञापन लगे थे। जाहिर है कि देश में ब्यूटी-पार्लर ईश्वर की तरह अनादि भले न हो पर उन्हीं की तरह सर्वव्यापी हो चुके हैं। गढाकोला से ही करीब तीन किलोमीटर दूर निराला के नाम पर डिग्री कालेज स्थापित हो चुका है। स्थानीय लोगों का मानना है कि निराला के नाम पर अनुदान लेने, स्थानीय लोगों की जमीनें हड़पने या ख्याति बटोरने के लालच से कुछ संस्थान खोले गए हैं जो वास्तव में निराला या उनके लेखन से लोगों के मन में लगाव पैदा करने के स्थान पर उनके नाम का प्रयोग करने वालों की जेबें भरने का काम कर रहे हैं। निराला के पैतृक घर में रहने वाले राज कुमार त्रिपाठी निराला के नाम पर बने डिग्री कालेज में चपरासी की नौकरी करते हैं। उन्हें सात हजार रुपया मिलता है। यह भी किंचित विडंबना बोध पैदा करने वाली खबर थी कि निराला के वंशज निराला के नाम पर स्थापित लाभप्रद व्यवसायों में चपरासी की नौकरी कर रहे हैं। यह यथार्थ का सुररियलिज्म यानी अति यथार्थवाद में बदल जाना है। जैसे अवचेतन में मनुष्य की बहुत सारी गहन भावनाएं परस्पर किसी तर्क से बंधी हुई नहीं होती हैं, वैसे ही यह बाहरी जीवन भी है जिसमें दृश्य, स्वप्न, विचार किसी तार्किक शैली में बंधने से इनकार कर चुके हैं।


इस कालेज के प्रबंधक कमला शंकर अवस्थी ने बताया – सरकार पर हम निराला जी के पैतृक निवास स्थल के लिए विशेष अनुदान जारी कराने में कभी-कभी सफल हो जाते हैं पर वह इतना कम होता है कि उतने पैसे से साल भर के लिए एक सफाईकर्मी या चौकीदार तक नहीं रखा जा सकता है। कुछ साल पहले एक शासकीय आदेश से निराला के कमरों को पक्का कर दिया गया था लेकिन वे पक्के कमरे बस बाहरी दीवार की तरह हैं क्योंकि भौगोलिक रूप से एक देहाती क्षेत्र होने के कारण कमरे या उनकी शैय्या को स्थायी ढंग से दर्शनीय रूप प्रदान करना मुश्किल हो जाता है। निराला जी के घर में रजिस्टर भी रखा है जिसमें हर आगंतुक का नाम, पता तथा फोन नंबर दर्ज किया जाता है। पर निराला के पैतृक आवास की तरह की वह रजिस्टर भी था जिसके पन्ने और कवर जीर्णशीर्ण थे। लगता था जैसे परिवेश से संगति स्थापित करने के लिए उस रजिस्टर को भी थोड़ा दयनीय बना दिया गया था। निराला के गांव से वापस चलते हुए उनकी धर्मपत्नी मनोहरा देवी के नाम पर भी एक कालेज दिखा जिस पर मोटा सा ताला लगा हुआ था।


देश में लेखकों व विचारकों की धरोहरों की उपेक्षा ही यथार्थ नहीं है बल्कि उस उपेक्षा को जारी रखने के लिए गढ़े जाने वाले बहाने भी उतना ही बड़ा यथार्थ हैं। किसी देश के विकास का सूचकांक केवल भौतिक समृद्धि से नहीं निर्धारित होता बल्कि वह अपनी संस्कृति, कला तथा परंपरा के प्रति कितना सचेत है, इससे भी निर्मित होता है। इसलिए अनिवार्य है कि निराला जैसे लेखकों के आवास व जन्मस्थलों से भी हम नई पीढ़ी को परिचित कराएं और इसके लिए उन स्थलों के संरक्षण का प्रयास केवल सरकारी लीपापोती के ढंग से नहीं बल्कि पूरी ईमानदारी से करें।


वैभव सिंह




सम्पर्क - 
मोबाईल - 09711312374

टिप्पणियाँ

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (14-02-2016) को "आजाद कलम" (चर्चा अंक-2252) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. बहुत सार्थक विषय उठाया गया।

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