सुशील कुमार का आलेख 'कविता की आलोचना का अर्थ और कवि की आत्ममुग्धता के खतरे'


सुशील कुमार

 

 

कोई रचना कभी भी आलोचना से परे नहीं होती लेकिन यह भी आज आसान नहीं समय की जटिलताओं के साथ-साथ मन-मस्तिष्क की जटिलता भी बढी है हमें अपनी रचना की बड़ाई तो बढ़िया लगती है लेकिन हम किसी की आलोचना के एक शब्द तक को पचा नहीं पाते आत्म-मुग्धता हममें इतना अहमकपना भर देती है कि अपने लेखन के अलावा सारा कुछ दोयम दर्जे का लगता है यह स्थिति उस रचनाकार के लिए अत्यन्त खतरनाक होती है वस्तुतः यह मनोरोग की तरह की स्थिति होती है जिसमें कवि किसी की बात को सुनने-समझने के लिए तैयार ही नहीं होता, आत्मालोचन की बात ही अलग है मुझे लगता है कि हर रचनाकार के लिए समय-समय पर अपने लिखे पढ़े को खुद आत्मालोचित करने का प्रयास करना चाहिए इसके लिए खुद के प्रति निर्मम होना पड़ेगा बहरहाल कवि-आलोचक सुशील कुमार ने इन्हीं मुद्दों को ले कर ‘कविता की आलोचना का अर्थ और कवि की आत्म-मुग्धता के खतरे’ विषय पर एक सुचिन्तित आलेख ‘पहली बार’ के पाठकों के लिए लिख भेजा है आज हम प्रस्तुत कर रहे हैं सुशील कुमार का यह आलेख            

कविता की आलोचना का अर्थ और कवि की आत्ममुग्धता के खतरे

सुशील कुमार

इस बात से हर कोई सहमत होगा कि साहित्य के साथ-साथ साहित्यालोचना भी ज़रूरी है। दीगर है कि एक अच्छी आलोचना रचना से कमतर नहीं होती जिसे पढ़ कर सृजन-प्रेमी न केवल अघाते और फूले नहीं समाते बल्कि उससे बेहतर सृजन के गुर भी सीखते हैं। वस्तुत: ये ही वे आँखें हैं जो राह दिखाती हैं कि हमें किधर जाना है, वर्ना हमारे लिये अमूर्तन के अँधेरे में गुम हो जाना बहुत आसान है। इससे कवि की जड़ता टूटती है, उसे अपने सृजन के दौरान हो रहे चूक का पता चलता है हालाकि यह बात भी सही है कि अपनी रचना का व्यामोह और आत्ममुग्धता तो बड़े से बड़े कवियों में भी समूल नष्ट नहीं हो पाती, उनमें से कुछ तो अपने सिवाय किसी को सुकवि मानते ही नहीं, फिर भी कवि की आत्ममुग्धता के बरअक्स उसकी कविता के मूल्यांकन के जो अंत:संघर्ष हैं, उससे समालोचक को दो-चार होना पड़ता है।

      जब कवि की आत्ममुग्धता पर कुछ सुधिजनों से युवा लेखक उमाशंकर सिंह परमार से राय जानना चाहा तो उन्होंने कुछ इस तरह व्यक्त किया –

      आत्ममुग्धता किसी को भी फर्जी श्रेष्ठताबोध से ग्रसित कर देती है और श्रेष्ठताबोध अहंकार मे बदल जाता है...। -उमाशंकर सिंह परमार की 05 फरवरी, 2016 की फेसबुक पर पोस्ट और प्रतिक्रियाएँ :

·         बात बोलेगी...और बात ही बोलेगी... बेबात को नष्ट होना ही है भाई– अनवर सुहैल

·         हर कवि को अपनी आलोचना सुनने को तैयार रहना चाहिए, भले ही आलोचना प्रायोजित या पूर्वाग्रह-ग्रस्त हो कविता प्रकाशित होने के बाद सार्वजनिक वस्तु में बदल जाती है उस पर राय कोई भी दे सकता हैपर राय देना कविता का वस्तुपरक मूल्यांकन नहीं होता कविता का मूल्यांकन वही कर सकता है जिसने कविता को गहरी दृष्टि से समझा होसिर्फ राय देने को मूल्यांकन नहीं समझ लेना चाहिए देखना यह है कि जो कविता पर राय दे रहा है उसकी पहुँच कहाँ तक हैआलोचना भी एक कठिन रचना-कर्म है उसे सब कोई नहीं निभा पाते आत्म- मुग्धता एक रोग है जो लेखक को जीवन और समाज के बड़े सामाजिक सरोकारों से दूर ले जाता है आत्ममुग्ध हम तभी होते हैं जब अपने सामाजिक यथार्थ से दूर जाते हैं यह एक प्रकार से लेखक की आत्म-रिक्तता का लक्षण है इससे बचना चाहिए- विजेंद्र

·         यह आत्ममुग्धता ही अहंकार की जड़ है और अहंकार ही अधोगति का जनक है। ज़मीन से जुड़ा व्यक्ति ऊंचाई की ओर और आसमान में उड़ता व्यक्ति ज़मीन की र ही आता है। इस तथ्य को समझना सभी के लिए आवश्यक है।- रामकृष्ण शर्मा


उपर्युक्त बातों से यह तो साफ है कि रचना के प्रकाशन के उपरांत उस पर कॉपीराइट भले ही लेखक-प्रकाशक का हो, पर वह सार्वजनिक हो जाने के कारण उस पर राय देने से किसी को रोका नहीं जा सकता किन्तु वह राय कवितालोचना में मान्यता तब पाती है जब वह समालोचना के दायरे में आए समग्र रूप में सृजन को परखने को आलोचना या समालोचना कहते हैं। अतः हम किसी भी रचना के मूल्यांकन को आलोचना कह सकते हैं। आलोचना कवि और पाठक के बीच की एक महत्वपूर्ण कड़ी होती  है। कोई भी रचना अच्छी है या बुरी, यह निर्णय देना आलोचना नहीं है। लोचना का उद्देश्य तो रचना का प्रत्येक दृष्टि से मूल्यांकन कर पाठक के समक्ष प्रस्तुत करना होता है। साथ ही पाठक की रुचि का  भी परिष्कार करना इसका धर्म होता है, ताकि उसकी साहित्यिक समझ का विकास हो। व्यक्तिगत रुचि के आधार पर किसी कृति की निन्दा या प्रशंसा करना आलोचना का धर्म नहीं है। कृति की व्याख्या और विश्लेषण के लिए आलोचना में पद्धति और प्रणाली का महत्त्व होता है। आलोचना करते समय आलोचक अपने व्यक्तिगत राग-द्वेष, रुचि-अरुचि से तभी बच सकता है जब पद्धति का अनुसरण करे वह तभी वस्तुनिष्ठ हो कर साहित्य के प्रति न्याय कर सकता है। पर इस दृष्टि से समालोचना कवि की आत्ममुग्धता का विपर्यय भी बन सकता है

अहम सवाल यह है कि कवि में आत्ममुग्धता का बीज-वपन होता कैसे है अंतर्जाल पर रोज सैकड़ों कविताएं पढ़ी-लिखी जाती हैं आजकल फेसबुक भी इसका एक सशक्त माध्यम बन गया है जिस पर गंभीर कवि भी लगातार जुड़ रहे हैं पर जैसे-जैसे लेखक सामाजिक यथार्थ से दूर जाता हैं, उसमें एक आत्म-रिक्तता आती चली जाती है उसके लेखन के कार्य-कारण और उद्देश्य स्पष्ट नहीं रहने के कारण वह अपने निर्रथक कर्म को भी सार्थक मान बैठता है और जब कोई उसे उसकी यथास्थिति से उबारना चाहता है, तो वह उसके विरोधियों में शुमार हो जाता है अतएव कवि की आत्ममुग्धता समालोचना के आत्म-संघर्ष से जुड़ा विषय है जिसके खतरे उठाना एक समालोचक के साहित्यिक साहस, उसके उत्कट लगन, गहन-गंभीर अध्ययन और चरित्र-निष्ठा का भी प्रमाण है इसी कारण यह कार्य जटिल हो जाता है और हिन्दी साहित्य में समालोचकों की कमी खलती है फलत: कवि की आत्ममुग्धता पर अंकुश रखने वाला कोई होता नहीं और कवि अपनी रचनाओं का निर्णायक स्वंय बन बैठता हैदूसरी ओर, कटाक्ष करने के बजाय निस्पृह हो कर कविता की समीक्षा करना भी कम कठिन कार्य नहीं।

जहाँ तक सृजनात्मक और रचनाधारित आलोचना का प्रश्न है, सामान्यतया हमारे आलोचकों की अध्ययन-परम्परा भी गहन-गंभीर और संदर्भमूलक नहीं रही है, इतिहास इसका गवाह है, जिनकी रही भी है तो उनके द्वारा नए रचनाकारों के व्यक्तित्व-कृतित्व को माँजने और गुनने के बजाय उनके संबंध में अपनी नकारात्मक टिप्पणियाँ और निष्कर्ष ही अधिक दिये जाते रहे हैं। जो काव्य के पारखी-आलोचक हैं, उनमें से भी कई अपने यशस्वी मायालोक से इतने ग्रस्त होते हैं कि उनका आलोचना-विवेक लगभग आलोचना-अहंकार का पर्याय बन जाता है और वे भी आत्ममुग्धता के शिकार हो जाते हैं। अपने-अपने पूर्वाग्रह, विवाद, सुविधाओं के लालच और दुराग्रहों के कारण वे आलोचना की खास ज़मीन और वज़ह खोजते हैं, इस कारण तटस्थ नहीं रह पाते। संभवत: इन्हीं कारणों से हिन्दी काव्य-संसार का अब तक न तो समग्र मूल्यांकन हो पाया है,   कवियों की प्रतिष्ठा ही हिंदी साहित्य में उस तरह से हो पायी है जिसके वे सही मानो में हक़दार थे या हैं। यह अभिलक्षण अन्य भाषा-साहित्य की तुलना में हिन्दी में अधिक दृष्टिगत होता है जो इस साहित्य का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा। पर अब शायद आज़ादी के छ: दशकों के बाद समालोचकों की नींद शनै:-शनै: खुल रही हैं। पुराने धाक़ वाले आलोचक की जगह नये आलोचक ले रहे हैं, इस क्षेत्र में संप्रति कई प्रतिष्ठित हस्ताक्षरों का अभ्युदय हुआ हैं (संख्या की दृष्टि से यहाँ नाम गिनाना उचित न होगा) जिनकी समीक्षा-कृति न तो कहीं से यांत्रिक है, न उबाऊ। लोक में इनकी गहरी आस्था है, इसलिए जीवन और साहित्य को बेहतर बनाने की दिशा में इनकी समालोचनाएँ सतत क्रियाशील दिखती हैं। इन सबकी अपनीअपनी ज़मीन हैं पर बहुत उर्वर, जहाँ हम कुछ सीख सकते हैं, समझ सकते हैं और उससे लाभ उठा कर अपनी रचना का प्रसन्न विकास भी कर सकते हैं। कई कवि भी ऐसे हैं जिन्होंने अपने आलेखों के माध्यम से कविता का समुचित मार्गदर्शन किया है अथवा कहें, इनके आलेख क्लासिक आलोचकों की तुलना में अधिक ग्राह्य और पठनीय भी बन पड़े हैं जिन्होंने जीवन-पर्यन्त कवि-कर्म का निर्वाह करते हुए अपने विचारों में कविता के सौंदर्य-शास्त्र और उसके आत्म-पक्ष पर गहरी और बुनियादी बातें कही हैं।


इन कवि-लेखकों में सार्वजनीन अभिलक्षण है - लोकधर्मिता और जनपदीय चेतना, जो रूपवादी नव्य समीक्षा की तुलना में हमारे आभ्यांतर को बाह्य-जगत से मात्र मन-बुद्धि के स्तर पर ही नहीं जोड़ता बल्कि क्रियाशील जीवन के ऐन्द्रिक बिम्ब, विचार-खनिज और जीवन-द्रव को ठीक से आत्मसात करने के लिये हमारे इन्द्रिय-बोध को ज्यादा प्रखर बनाये रखने के लिये सदैव सचेष्ट रहने के उपाय पर भी बल देता है। साथ ही हमें आशान्वित करता है कि आने वाले समय में प्रतिबद्ध कवियों के साथ न्याय हो सकेगा।

              हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए  कि कविता की कोई एकोअहम  द्वितीयोनास्ति आलोचना पद्धति नहीं होती। नामवर सिंह ने जवाहरलाल विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के प्रथम पुनर्नवा पाठ्यक्रम में दि. 14 अक्तूबर, 1993 को उन्होंने भाषण देते हुए कहा था कि –

      "किसी सिद्धांत का सहारा ले कर यदि कविता को जाँचेगे तो खतरे हैं। चूक हो सकती है। गलतियाँ हो सकती हैं। .... निष्कर्ष के रुप में मैं यही कहूँगा कि कुल मिला कर मैंने आपको कोई निष्कर्ष नहीं दिया है। आपको कोई  'केनन' नहीं दिया है। मैंने सिर्फ़ यह कहना चाहा है कि कविता के परख के जो निकष हैं, वह चाबी नहीं है कि हम आपको दे दें कि ताला खोल लीजिएगा। यह हस्तांतरित नहीं किया जाता। अर्जित किया जाता है। हर पाठक अर्जित करता है। यह टिकट  'नॉन ट्रांसफरेबल' है। फिर भी हमलोग ट्रांसफर कर दिया करते हैं। कविता का निकष  'नॉन ट्रांसफरेबल  होता है। हर पाठक, हर सहृदय पाठक स्वयं अर्जित करता है। और वह जजमेंट अपना हुआ करता है। दूसरों की दी हुई चाबी से खोले जाने वाले कमरे और होते हैं और ताले भी और हुआ करते हैं। कविता वह ताला है जिस ताले में हर आदमी किसी दूसरे की दी हुई चाबी नहीं लगाता है। बल्कि खुद अपने-आप खोलता है। अर्थ, रस, भाव-बोध प्राप्त कर के और अपना जजमेंट देता है कि मुझे ऐसा लगता है कि हर जजमेंट इस मामले में निहायत इंडीविजुअल (व्यक्तिगत) होता है। और उस जजमेंट में, अपनी साधना में जितनी ताकत होती है उतनी ही उसको सामाजिक स्वीकृति प्राप्त होगी। 
         
      नामवर सिंह के उक्त विचार-वीथियों पर अगर हम गौर करें तो कविता का कोई निकष नहीं होता, पर इतिहास इसका साक्षी है कि रीतिकालीन कवियों की काव्य-साधना में भी ताकत कम न थी। न उनके शब्दों में जादू, लर्जिश और खनक ही कम थे पर उनकी रचना को कभी सामाजिक स्वीकृति नहीं मिली। कभी वे जनप्रिय नहीं हो पाए क्योंकि यह कहने की जरूरत नहीं कि उनकी रचना के केंद्र में कौन था और साहित्य का उनका यह तप-साधना-श्रम किनको समर्पित था। हिन्दी कविता-काल की विपुल विरासत में हम कविता की जिन-जिन प्रवृतियों यथा; रीति, भक्ति, छायावाद, प्रगतिशीलता, प्रयोगधर्मिता, रूपवाद आदि-आदि से रु-ब-रु होते हैं, हम उनके सामयिक महत्व को तो नहीं नकार सकते पर जनपक्षधरता ही कविताओं का सर्वाधिक लोकप्रिय अभिलक्षण रहा। दूसरे शब्दों में, कहा जा सकता है कि सभी प्रतिमानों में लोकधर्मिता अब तक कविता की सबसे सशक्त और समय-सिद्ध प्रतिमान है क्योंकि कविता जब अपने खनिज, सत्व और जल जनपद से ग्रहण करती है तो वहाँ लोक का सौंदर्य उद्भासित होता है। तब कवि के सारे शब्द, शैली, शिल्प, मुहावरे कविता में लोक से ही आते है और जन के पक्ष में रूप का सृजन करते हैं। रामचरित-मानस के राम के लोकमंगलकारी रूप की छवि जब रामचन्द्र शुक्ल जी ने आलोचना के माध्यम से जनोन्मुख किया, तभी तुलसीदास संत से महाकवि बन पाए। अतएव कविता का रूप-संभार चाहे जितना ही अनगढ़ क्यों न हो, कविता जब जन को रचती है, अभिजन को नहीं, तो वह सार्वजनिक, सार्वदेशिक और सार्वकालिक हो जाती है। अब तक की कवितालोचना में यही बात दीगर है जो हमें जनता का साहित्य रचने की प्रेरणा देती है। पर इस बात की कद्र तभी होगी जब समालोचक जैसा कहते हैं वैसा करें भी। यानि उनकी कथनी और करनी में भेद न हो। पर होता यह आया है कि स्वार्थपरता और अन्यथा कारणों (जिनका जिक्र लाज़िमी न होगा) से हमारे कुछ समालोचक संवाद की ज़गह विवाद को ही प्रश्रय दे जाते हैं। इस कारण बड़े-बड़े कवि भी गुमनामी के अँधेरे में चले जाते हैं।  मसला यह है कि अगर हमारे नामचीन आलोचक-गण (जिन्हें हम जानते हैं,) कविता के विषय में इतने ईमानदार, सहृदय और उदार रहे हैं तो फिर उनके द्वारा  त्रिलोचन, नागार्जुन, विजेन्द्र, कुमारेन्द्र, केदार नाथ अग्रवाल, गोरख पाण्डेय, धूमिल, पंजाबी कवि अवतार सिंह संधु `पाश' जैसे बड़े कवियों को समीक्षा के केन्द्र में क्यों लाना भूला दिया गया? उनके काव्य-सौष्ठव की व्याख्या से क्यों परहेज किया गया और सिर्फ़ भूलाया ही नहीं, बल्कि रुपवाद और उपभोक्तावाद को प्रश्रय देने और अपने किये को उचित ठहराने के लिये उनके द्वारा निरंतर विचलित करने वाले स्पष्टीकरण भी दिया जाता रहा है, जिससे उनके आलोचना-कर्म के प्रति हिंदी-प्रेमियों में‍ आशंकायें दिनानुदिन गहनतर होती चली गयी क्योंकि छोटे और मँझोले कवियों को जो दर्ज़ा उनके द्वारा हासिल हुआ, वह बड़े और कालजयी रचना के रचनाकारों को नहीं। हिंदी के आधुनिक काल में उनके रुपवादी झुकाव की त्रासद स्थिति यह रही कि कविता की एक धारा सहज और संश्लिष्ट न हो कर दु्र्बोध और जटिल हो गयी। निश्चय ही हमारे लब्ध-प्रतिष्ठ समालोचकों के द्वारा भी कवितालोचना के क्षेत्र में जाने-अनजाने कहीं-न-कहीं चूक बरती गयी है जिसे वे भी अब स्वीकारते हैं पर इसका मतलब यह नहीं कि उनका हिंदी साहित्य को अवदान कम है। उनके व्यापक अध्ययन और समालोचना-दृष्टि से अवश्य ही कवियों को आगे आने में सहायता मिली है। पर समालोचना आज साहित्य के जिस चौराहे पर खड़ी है वहाँ कविता और कवि-कर्म को बहुत गंभीर होने की जरुरत है। इस पर बहस हमेशा अपने भारतीय परिवेश में ही होनी चाहिए।

उत्तर-आधुनिक और ग्लोबल होती दुनिया में कविता को सबसे बड़ा खतरा आज आयातित रूपवाद और नव-रीतिवाद से है क्योंकि यहाँ चमत्कार-प्रदर्शन, वाकपटुता और सपाटबयानी का आधिक्य होता है जो कविता को सरस बनाने के बजाय बोझिल बनाते हैं और उसकी लय और उसके बुनावट को बिगाड़ते हैं जिससे कविता के पाठक एक ओर जहाँ  बिदकने लगते हैं, वहीं दूसरी ओर जीवन-तत्व का सांगोपांग समाहार नहीं होने एवं सृजन का जनाकीर्ण नहीं होने के कारण कविता अन्यतम होने से चुक जाती है और काव्य-तत्वों की अनुभवहीनता का शिकार होकर कवि नकली और किताबी कविता को ही लिखकर अपने कवि-कर्म की इतिश्री मान लेता है, फलत: परिदृश्य में फालतू कविताओं की बाढ़-सी आ जाती है। आज रोज़ थोक में लिखी जा रही कविताएँ इसका प्रमाण है जो साहित्यिक पत्रिकाओं के पृष्ठ बरबाद करती हैं, और पाठकों का समय भी। कई ब्लॉगों और सोशल-नेटवर्किंग वेबसाईटों पर भी ऐसी फालतू किस्म की कविताएँ क्षण-क्षण छपती रहती हैं। 
              
उपर्युक्त बातों से यह स्पष्ट है कि समालोचना और समीक्षा अब पुनर्नवा होने की जरूरत है। कविता पर कोई जजमेन्ट नहीं थोपा जाना चाहिए। समालोचना कोई तुला या निकष नहीं कि अमूक रचना ठीक है या अमूक ख़राब और कमजो़र। समालोचक किसी दूसरे उपग्रह का वासी नहीं, इसी रचे-बसे लोक का हिस्सा है, इसलिए समालोचकों का मूल मक़सद अपने कवियों से सार्थक संवाद करना होना चाहिए, उनका उत्साह-वर्द्धन करना होना चाहिए। न कि विवाद और बहस खड़ा कर उनका हौसला कम करना। अर्थात उनसे हम कवियों को कुछ सीखना है, आगे बढ़ना है।

अगर समालोचक कविता की दुनिया पर आसीन होकर उसका सामंत बन जाय और बिना कारण बताये ही कवियों की रचना पर अपनी लेखनी के चाबुक जड़ें तो कवियों को भी यह समझने की जरुरत है कि ऐसे राजसी-तामसी-सामंती-उपभोक्तावादी-पाश्चात्यवादी समालोचकों को नकार कर उन अध्ययनशील-श्रमशील भारतीय चित्त और माटी की गंध से जुड़े समालोचकों से अपने तार जोड़ें जो कविता को सही ज़मीन देने की दिशा में कारगर काम कर रहे हैं। कविता में आलोचना के निष्पक्ष और प्रसन्न विकास के लिये नये और विकासशील कवियों के मन में यह विचार फलित होना चाहिए ताकि नकारात्मकता का प्रकटीकरण भी समालोचना में संतुलित और सकारण युक्ति के साथ ही गोचर हो जिससे कवितालोचना की स्वस्थ और आदर्श परम्परा एवं दशा-दिशा तय की जा सके।

मैं समझता हूँ, इस तरीके को अपना कर संप्रति कविता पर किये जा रहे निगेटिव आलोचना-कर्म के खतरे से युक्तियुक्त रीति से निपटा जा सकता है।

मसलन, लोकतंत्र में पुलिस अपराध पर नियंत्रण रखने की एक संस्था मानी जाती है, पर पुलिस कितनी ईमानदार है, इसे देखने का जितना हक़ शासन और न्यायपालिका को है उतनी ही जनता को भी। बंदिशें तो सब पर लागू करनी होगी ताकि सब अपने अनुशासन के दायरे में रहें और अपना काम नि:शंक करें। तभी साहित्य या कहें, कविता की समालोचना की सही संकल्पना विकसित हो पायेंगी।

      आह-आह, वाह-वाह, बेहरतरीन, मर्मस्पर्शी, मनभावन, इत्यादि शब्द पाठकों के होते हैं। कविताओं को पढ़ कर उनके दिल में भावनाओं का जो गुबार उठता है, उन्हें वे व्यक्त करने की कोशिश करते हैं। हालाकि वे समीक्षक की तरह नहीं कह पाते, पर उनकी ही प्रतिक्रियाओं का ही महत्व अहम होता है क्योंकि उनकी अभिव्यक्तियाँ प्रायोजित नहीं होतीं। समीक्षा में तो कविता के कारण-विधान किये जाते हैं कि अमूक रचना की श्रेष्ठता और लोकप्रियता के कौन-कौन से कारक व तत्व विद्यमान हैं। पर समीक्षक ही संप्रभु नहीं है, वे मात्र साहित्य के जनतन्त्र में उस सरकार की तरह हैं जिसे प्रबुद्ध पाठक का मत हासिल होता है क्योंकि कविता उनके खातिर ही रची जाती है।•

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टिप्पणियाँ

  1. आलोचना और रचना के पारस्परिक द्वन्द को रेखांकित करता हुआ बेहतरीन आलेख । इस आलेख को नये कवियों के साथ साथ पुराने लेखको भी पढना बेहद जरूरी है

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (20-0122016) को "अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का माहौल बहाल करें " (चर्चा अंक-2258) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. Sushil, aese vishion par tum jaese sajag kavion ko brabar likhna chahiye. is se kavi kii pahchan ubharti hai. aur aatmsanghrash ko bal milta hai. nai dishayen saamne aati hai.

    vijendra

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  4. नामवर जी का यह भाषण मैंने ही जे. एन. यू. में टेपांकित किया था। जिसका हवाला आपने दिया है, सुशील जी, मेरी 'प्रतिमानों की प्रासंगिकता' में वह संग्रहीत है। आपका आलेख अच्छा है। बधाई!

    रमाकान्त शर्मा

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  5. बहुत अच्छा आलेख

    रणेन्द्र

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  6. सुंदर सुशील भाई.. बेहतरीन आलेख!

    अरविन्द श्रीवास्तव

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  7. Vijendra Kriti Oar

    susheel ka yah alekh bahut hi vicharsheel, drishtisampann aur agargami hai.

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  8. Neerja Kujur

    Nice and healthy criticism

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  9. प्रिय सुशील, तुम्हारा आलेख कविओं की आत्म मुग्धता ........ पूरा पढ़ गया. मेरी अपेक्षाओं से यह आलेख बहुत आगे गया है तुम्हारी समझ, विश्लेषण और समर्पण के प्रति मै नतमस्तक हूँ. मुझे बहुत भरोसा हुआ है तुम्हारे लेखन पर. तुम्हारा समूचा आलेख कवि और लोचक दोनों को नै नई रौशनी देता है. तुमने पूरी रचनात्मकता से विषय का निर्वाह किया है. अगर इसे कहीं नहीं भेजा हो तो कृतिओर को भेज कर हमें उपकृत करो. मै तुम्हारा आभार मानूंगा.

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  12. सभी अग्रजों और बंधुवर का आभार । कवि की आत्ममुग्धता आज एक बहुत ही ज्वलंत इस्यू है जिसपर ध्यान जाना जरुरी है वर्ना बाजारवाद कविता पर अपने डोरे डालने से बाज नहीं आएगा । यह आलेख "कृति ओर" के आगामी अंक के लिए बुक है। विजेंद्र सर ने आग्रह किया है । धन्यवाद मित्रों ।

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  13. सभी अग्रजों और बंधुवर का आभार । कवि की आत्ममुग्धता आज एक बहुत ही ज्वलंत इस्यू है जिसपर ध्यान जाना जरुरी है वर्ना बाजारवाद कविता पर अपने डोरे डालने से बाज नहीं आएगा । यह आलेख "कृति ओर" के आगामी अंक के लिए बुक है। विजेंद्र सर ने आग्रह किया है । धन्यवाद मित्रों ।

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  14. आलोचकों और कवियों के लिए बेहद प्रासंगिक और ज़रूरी आलेख। ऐसा विश्लेषण जो एक समर्थ कवि ही कर सकता है। कोई समर्थ कवि जब समालोचन में उतरता है तो ऐसी घटनाएं घटती हैं।

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