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पंकज पराशर

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अल्पना मिश्र

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हिन्दी कहानी के क्षेत्र में अल्पना मिश्र ने थोड़े ही समय में अपनी एक मुकम्मल पहचान बना ली है। अभी-अभी अल्पना ने अपना पहला उपन्यास लिख कर पूरा किया है। इस उपन्यास में इन्होंने उस समस्या को बड़ी खूबसूरती से उठाया है जो हमारे समय का सच तो है लेकिन जिस पर बात करना आम तौर पर वर्जित माना जाता है। अल्पना ने इस उपन्यास के माध्यम से यह दुस्साहस किया है और अपने तरीके से बखूबी किया है. कहीं पर भी लाउड हुए बिना अपनी बातें कह देना अल्पना की खूबी रही है, जिसका निर्वहन इस उपन्यास में भी इन्होने बखूबी किया है। शिल्प की छटा जो अल्पना की खूबी है वह तो आप इस उपन्यास में देखेंगे ही।

तो आइए पढ़ते हैं आधार प्रकाशन से शीघ्र प्रकाश्य अल्पना मिश्र के उपन्यास - ‘अन्हियारे तलछट में चमका’ का एक अंश। 

मनसेधू , तोरा नगर बासंती.....
(आत्मकथा -3)

एक बसंती पीला, खिलने खिलने को होता गुलाब मेरे हाथ में था। ओस कण की केवल एक झिलमिलाती बूंद उसकी हेम काया पर थिरक रही थी। जरा सा असावधान हुई कि यह खो जाएगी। मैं इस कण के खो जाने की संभावना को बचा ले जाना चाहती हूँ। कम से कम अभी या कम से कम जब तक मैं बचा पाती।
हथेली जैसे एक आँगन थी। …