शुक्रवार, 30 अगस्त 2013

पंकज पराशर




हमारे समय के कुछ युवा आलोचकों ने समकालीन कहानी पर बेहतर काम किया है। युवा आलोचकों में पंकज पराशर एक ऐसा ही नाम है जिन्होंने शिद्दत से इस काम को शुरू किया है। इसी क्रम में पंकज ने हमारे समय की चर्चित कहानीकार अल्पना मिश्र की कहानी 'स्याही में सुरखाब के पंख' पर यह विस्तृत पड़ताल की है. पिछली पोस्ट में आपने अल्पना के उपन्यास अंश पढ़े। इस पोस्ट में  पहली बार पर पढ़िए पंकज पराशर का आलेख 'पितृसत्ता, स्त्री और समकालीन जीवन यथार्थ      
पितृसत्ता, स्त्री और समकालीन जीवन-यथार्थ
(संदर्भः अल्पना मिश्र की कहानी स्याही में सुर्खाब के पंख)


समकालीन कहानी पर यदि हिंदी आलोचना की गुरु-गंभीर और पारंपरिक भाषा में (जिसे उपहास में प्रायः प्राध्यापकीय आलोचना कहा जाता है और संयोग से यह लेखक भी प्राध्यापक नामक जीव ही है) बात शुरू की जाए, तो कुछ इस तरह शुरू कर सकते हैं-बीसवीं सदी के अंतिम दशक के उत्तरार्द्ध से हिंदी कहानी में जिन कथाकारों का प्रवेश होता है, उन्होंने उदारीकरण के बाद पैदा हुए नए जीवन-यथार्थ की संशिलष्टता को न केवल पूरी गहराई और संवेदनशीलता से पकड़ा, बल्कि हिंदी कहानी में नई कथा-भाषा की रचना भी संभव की। बीसवीं सदी के अंतिम दशक के पूर्वार्द्ध में अर्थव्यवस्था की पारंपरिक व्यवस्था को तिलांजलि, नई-नई तकनीकों के आमद और मुक्त बाजारवादी व्यवस्था ने अचानक शहरी और कस्बाई भारतीय मध्यवर्ग के जीवन और मानस दोनों को कंपायमान कर दिया। परिवर्तन की गति पहले के मुकाबले अधिक हो गई। राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक ही नहीं, नैतिक और मानवीय मूल्यों की कसौटी और दृष्टि में भी परिवर्तन आया। यही वह दौर है जब हिंदी में दलित और स्त्री-विमर्श की शुरुआत होती है। जिसके बाद साहित्य के प्रतिमान और सौंदर्यबोध दोनों में बदलाव आने लगते हैं। नये जीवन-यथार्थ और संघर्ष की जैसी प्रामाणिक और ठोस अभिव्यक्ति उस दौर से शुरू हुई, वैसी पहले की रचनाओं में कम मिलती है। स्त्री और दलित-विमर्श की शुरुआत के साथ ही स्वानुभूति और सहानुभूति की कसौटी पर रचना के यथार्थ की प्रामाणिकता और अनुभूति की शुद्धता दोनों की आलोचनात्मक जांच-परख शुरू हुई। 
       

स्वानुभूति और सहानुभूति के मुद्दे को लेकर हिंदी आलोचना में थोड़ी तल्ख चर्चाएं भी हुई हैं, मगर यह बात अपनी जगह आज भी बदस्तूर कायम है कि दलितों के जीवन-यथार्थ और जीवन-संघर्ष की जैसी प्रामाणिक अभिव्यक्ति दलित कथाकारों के यहां मिलती है, वैसी ग़ैर दलित कथाकारों के यहां नहीं मिलती। क्योंकि मानवीय उदारता और साहित्यिक संवेदनशीलता के बावजूद वर्ण-व्यवस्था से संचालित समाज में हाशिये के दर्द को मुख्यधारा के लोग उस रूप में नहीं समझ सकते, जिसे उन्होंने सिर्फ बाहर से देखा है। लोहे का स्वाद लोहार नहीं, वह घोड़ा जानता है जिसके मुंह में लगाम है। बाढ़ग्रस्त गांव का जैसा चित्रण फणीश्वरनाथ रेणु ने ऋणजल-धनजल में किया है, वैसा प्रामाणिक चित्रण बाढ़ग्रस्त गांवों का हवाई सर्वेक्षण करके कोई शायद नहीं लिख सकता। वह उस संवेदना को पकड़ ही नहीं सकता कि नाव पर मेरा कुत्ता नहीं जाएगा, तो मैं भी नहीं जाऊंगा। मुसीबत में घनिष्ठतम सगे-संबंधियों और सहयोगियों तक का साथ छोड़ देने वाले आत्मकेंद्रित शहरी मानस में यह बात आ ही नहीं सकती कि मनुष्य तो मनुष्य, मुसीबत में ग्रामीण लोग पशु-पक्षियों तक का साथ नहीं छोड़ते हैं।


वेश्याओं के जीवन को केंद्र में रखकर लिखे गए उपन्यास मुर्दाघर में बंबई (अब मुंबई) के जीवन-संघर्ष, पुलिसिया तंत्र, पितृसत्तात्मक मानसिकता और स्थानीय भाषा को उपन्यासकार जगदंबा प्रसाद दीक्षित ने अच्छी तरह पकड़ा है। पर जब हम देह-व्यापार में धकेली गई महिला नलिनी जमीला की मलयालम में लिखित एक सैक्स वर्कर की आत्मकथा पढ़ते हैं, तो जगदंबा प्रसाद दीक्षित की वेश्याओं के साथ तमाम सहानुभूति के बावजदू वह फांक साफ दीख जाती है, जो नलिनी जमीला की स्वानुभूति में सहज ही दृष्टिगत होती है।[1] इसी प्रकार दलितों को हरिजन कहकर दलितोत्थान की बात महात्मा गांधी ने भी थी, लेकिन दलितों के यथार्थ और संघर्ष की जैसी पहचान बाबासाहब अंबेडकर को थी, वह गांधीजी की दृष्टि से सर्वथा भिन्न थी। क्योंकि दलितों के जीवन को महात्मा गांधी बाहर से देख-समझ रहे थे, जबकि बाबासाहब अंबेडकर दलितों के दारुण जीवन-यथार्थ को न केवल अंदर से जानते थे, बल्कि वह उनका भोगा हुआ यथार्थ था। इसलिए यह आकस्मिक नहीं है कि बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक से लेकर बिल्कुल आज लिखी गई कहानियों में मोहक भाषा, आकर्षक शैली और सुगठित शिल्प के बावजूद सहानुभूति और स्वानुभूति की फांक साफ नज़र आती है-दलित और स्त्री-विमर्श दोनों नजरिये से। दलित जीवन से अनभिज्ञता के कारण गैर दलित कथाकार उनके जीवन-यथार्थ को ठीक से नहीं जानते, पर स्त्रियों के साथ पले-बढ़े और प्रेम (?) के बावजूद क्या वे स्त्री जीवन के यथार्थ से उसी तरह परिचित हैं, जिससे सहज ही महिला कथाकार  परिचित हैं? कहना न होगा कि अनुभूति की शुद्धता के सामने यहीं शिल्प-सिद्धता की दरार दिखाई देने लगती है, जिसे कहन और गढ़न की कुशलता से बहुत अधिक पाटा नहीं जा सकता।


समकालीन हिंदी कहानी में जिन युवा कथाकारों ने अपनी रचनाओं से ध्यान आकृष्ट किया है और एक मुकम्मल पहचान बनाई है, उनमें से कुछ कथाकारों ने बीसवीं सदी के अंतिम दशक में लिखना शुरू किया था, तो कुछ कथाकारों ने इस शताब्दी के पहले दशक की शुरुआत से। सामाजिक स्तर पर इन कथाकारों का अयोध्या-विवाद के कारण हुए सांप्रदायिक उभार, मंडल कमीशन के बाद बने जातिगत समीकरण और नव साम्राज्यवाद के नये रूपों से सामना हुआ। मुक्त बाजारवादी व्यवस्था के पैरोकारों की ट्रिकिल डाउन थियरी से भारतीय ग्रामीण यथार्थ में कोई विशेष परिवर्तन नहीं आया। एक तरफ धन के पहाड़ की ऊंचाई बढ़ती चली गई, तो दूसरी तरफ किसानों की आत्महत्याएं, मजदूरों का पलायन और भुखमरी/कुपोषण के शिकार मनुष्यों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है। धन-पहाड़ों से कोई झरना, कोई सोता नहीं फूटा, जिसका लाभ हाशिये के लोगों को होता। हिंदी कहानी से मुसलमान ही नहीं, गांव के जीवन-यथार्थ की समझ और उपस्थिति दोनों कम होती जा रही है। यह अनायास नहीं है कि हिंदी फिल्मों और धारावाहिकों के साथ ही समकालीन हिंदी कहानी में शाइनिंग इंडिया की चमक में फीलगुड करने वाले किरदार अधिक नजर आते हैं। यह भी भारतीय समाज का एक यथार्थ है, लेकिन इस सच के आवरण में बड़े और अप्रिय सच से किनाराकशी करना नैतिकता और सामाजिक दायित्वबोध ही नहीं, साहित्यिक ईमानदारी के भी विपरीत है। मगर व्यवहारिकता और समझदारी को सफलता का मूलमंत्र मान लेने के बाद ईमानदारी को भला कौन महत्व देता है! ये सब मूल्य अब पुराने हुए। 


पिछले दो दशकों की कहानियों को देखें तो पुरुष और महिला कथाकारों की स्त्री अलग-अलग दिखती है। सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक बदलावों के बाद आए परिवर्तनों ने स्त्री के जीवन-यथार्थ को किस प्रकार प्रभाववित किया है-इसकी समझ के मामले में जो फांक नजर आती है, वह शायद इसलिए भी कि दोनों के सच अलग-अलग हैं। क्योंकि शिल्प-सिद्ध भाषा में सहानुभूति का सच अनगढ़ शिल्प और अटपटी भाषा के बावजूद स्वानुभूति के सच के समक्ष प्रभावहीन हो जाता है। इतिहास गवाह है कि प्रगतिशीलता, संवेदनशीलता और बाकी अन्य तमाम शीलताओं के बाद भी पुरुष स्त्री-जीवन को ठीक से नहीं समझ पाता। तमाम बंधनों और पाखंडों पर चोट करने के बावजूद कबीर स्त्री को कितना समझ पाए? स्त्री-जीवन के दारुण यथार्थ को मीराँबाई ने जिस तरह देखा, उस तरह मीराँ के समकालीन पुरुष-संतगण तमाम संतत्व के बावजूद देख पाए? यहां तक कि छायावाद में भी अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी के द्रष्टा प्रसाद हों, श्याम तन के तत्काल बाद भर बंधा यौवनको लक्षित करने वाले निराला हों या स्त्रियों को सखी, सहचरि, प्राणका दर्जा देने वाले पंत हों-क्या वे महादेवी वर्मा की तरह स्त्रियों के पराधीनता के यथार्थ और इतिहास को समझ पाए?


पिछले दो दशक में दलित कथाकारों ने अपने भयावह जीवन-यथार्थ को स्वानुभूति की प्रामाणिकता के साथ लिखकर द्रष्टा और भोक्ता के अंतर को बेहतर ढंग से दिखाया। लेकिन दलित लेखिका कौशल्या वैसंत्री ने दोहरा अभिशाप में सामाजिक और पारिवारिक दोनों मोर्चे पर जीवन और अस्मिता के लिए संघर्षरत दलित स्त्रियों के जिस जीवन-यथार्थ को अभिव्यक्त किया, उस तरह कोई पुरुष दलित लेखक देख/लिख पाए? दलित लेखक शायद इसलिए भी कौशल्या वैसंत्री की तरह स्त्री-मन की पीड़ा को नहीं देख/लिख पाए कि पुरुषों ने वर्ण-व्यवस्था की क्रूरताओं को तो झेला था, लेकिन पितृसत्ता की क्रूरताओं और दमन से उनका कभी कोई साबका नहीं पड़ा। इसे एक स्त्री ही जान सकती है कि पितृसत्ता की बेड़ियों ने कहां-कहां और किस तरह अपनी जकड़बंदियों में स्त्रियों को बांध रखा है।


बीसवीं सदी के अंतिम दशक से हिंदी कहानी में अपनी पहचान बनाने वाली युवा कथाकार अल्पना मिश्र की कहानी स्याही में सुर्खाब के पंख में पितृसत्ता की क्रूरताओं और कुलीनता की हिंसा की नृशंसता को लक्षित किया जा सकता है। पूर्वजन्म के पाप-पुण्य को ध्यान में रखकर विधाता मनुष्य का भाल लिखते हों या नहीं, इसे परम आस्तिकजन भी आज ठीक-ठीक नहीं बता सकते। मगर सदियों से स्त्रियों को अपनी ऑक्टोपसी जकड़ में जिस पितृसत्ता ने मजबूती से जकड़ रखा है, वह अवश्य स्त्रियों के जीवन-मरण, घृणा-प्रेम, पाप-पुण्य और उदय-अस्त को तय करता है। सुप्रसिद्ध कथाकार यशपाल ने अपने उपन्यास दिव्या में बेहद मार्मिकता से दिखाया है कि दिव्या के जीवन की हर सांस को कैसे समाज और परिवार के अलग-अलग पुरुष तय करते हैं। स्त्रियों की कुलीनता और अकुलीनता का पैमाना पितृसत्ता की सुविधा और सत्ता से निर्मित होता है, जिसमें कई सदियां गुजर जाने के बाद भी बेहद कम रद्दोबदल मुमकिन हो सका है। इसलिए यह आकस्मिक नहीं है कि अल्पना मिश्र सुर्खाब के पंख को स्याही में डुबोकर धर्म-ज्ञान और साहित्य लिखने वाली सभ्यता की उस क्रूरता और असभ्यता को अनावृत्त करती हैं, जो आज भी उसी तरह स्त्रियों की जीवन-कथा लिख रही है। पितृसत्ता की परतों को जाने बगैर प्रत्यक्ष सत्ता के व्यवहारों का विश्लेषण भी ठीक-ठीक संभव नहीं है।


अल्पना मिश्र की इस कहानी में मुख्य कथा के बीच कुछ उपकथाएं आती हैं-कुछ वैसे ही जैसे फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी तीसरी कसम उर्फ मारे गए गुलफाम की मुख्य कथा के बीच महुवा घटवारिन की छोटी-सी उपकथा। छोट-छोटे उपशीर्षकों के प्रयोग से वे इस कहानी में और अधिक अर्थवत्ता भर देती हैं। सोनपती बहन जी और उनकी चारों लड़कियों की मुख्य-कथा के बीच में वैशाली सारस्वत और निरुपमा दी की छोटी-छोटी उपकथाएं हैं। जिनमें से हर कथा की स्त्री का भाग्य दमन और शोषण की स्याही से पितृसत्ता ने लिखा है। इस संदर्भ में याद आया कि युवा कहानीकार पंकज सुबीर ने महुवा घटवारिन की उस छोटी-सी उपकथा को अपनी कल्पना शक्ति से अद्भुत विस्तार देकर एक नई मार्मिक कहानी की रचना संभव की है। कहानी की नैरेटर द्रष्टा और भोक्ता के साथ कई जगह अपने घर-परिवार और अपनी मां के साथ होती बहसों का जिक्र भी करती है।


नैरेटर के माध्यम से यह भी पता चलता है कि इस कथा-उपकथा से अलग जो दुनिया है उसमें एक तरफ जहां पितृसत्तात्मक व्यवस्था के प्रति आक्रोश है, वहीं दूसरी तरफ उन लड़कियों से सहानुभूति भी है। जिन घरों से लड़कियां नहीं भागती हैं, उन घरों में यह भय पलता रहता है कि भागी हुई लड़कियों के प्रति उनके घर की लड़कियों के मन में जो सहानुभूति है वह कहीं विद्रोह में न रुपांतरित हो जाए। नैरेटर सोनपती बहन जी का जिक्र आते ही तत्काल उन्हें एक जरूरी पाठ इसलिए बताती हैं कि सोनपती बहन जी लड़कियों को पितृसत्ता के टैंक में अच्छी तरह बंद करके रखना जानती हैं। सोनपती बहन जी के व्यवहार की सामाजिक स्वीकार्यता का आलम यह है कि इसके बाकी घरों में उनकी तारीफ होती है और अपनी लड़कियों को अनुशासित रखने में उनकी मिसाल दी जाती है,वे लड़कियों को कितनी अच्छी तरह नियंत्रित करती थीं, यह आदर्श मेरी मां पर छाया रहता था। वह हमें डांटते-डपटते याद दिलाती रहती थीं कि अगर हम बातों से नहीं माने तो उन्हें लातों का इस्तेमाल सोनपती बहनजी की तरह करना पड़ जायेगा। वे यह भी याद दिलाती रहतीं कि वह कितनी महान हैं, क्योंकि वे सोनपती बहनजी की तरह छाते को छड़ी में नहीं बदलतीं। यह भी कि वे सोनपती बहनजी से एक दर्जा आगे तक पढ़ी हैं, इसलिए हमें आदर्श लड़की बना देने के मामले में भी वे एक दर्जा पीछे नहीं होना चाहती थीं। घरों में बात-बात पर सोनपती बहन जी की मिसाल उन्हें जरूरी पाठ बना देती है-जिसका नैरेटर बार-बार जिक्र करती हैं।
  

कहानी की शुरुआत बेहद दिलचस्प तरीके से नैरेटर करती हैं, सोनपती बहनजी को भूला नहीं जा सकता था। वे शिक्षा के सबसे जरूरी पाठ की तरह याद रखने के लिए थीं। वे बहुत पहले निकली थीं नौकरी करने, जब औरतें किन्हीं मजबूरियों में निकलती थीं। वे भी मजबूरी में निकली थीं, ऐसी जनश्रुति थी। सोनपती बहन जी में ऐसा क्या है कि उन्हें शिक्षा के सबसे जरूरी पाठ की तरह याद किया जाए? इस सवाल का जवाब नैरेटर को देने की जरूरत ही नहीं पड़ती, कहानी अपने-आप दे देती है। सोनपती बहिन जी ही नहीं, अल्पना जिस क्षेत्र की कहानी बयान करती हैं, आम तौर पर उस क्षेत्र की औरतें किन्हीं मजबूरियों में ही नौकरी करने के लिए घर से बाहर निकलती हैं।[2] पर सोनपती बहन जी जिन मजबूरियों के कारण नौकरी करने के लिए घर से बाहर निकलती हैं, वह देखिए, उनके पति की मृत्यु के बाद चार लड़कियों की जिम्मेदारी और रिश्तेदारों की हृदयहीनता ने उन्हें नौकरी करने के लिए प्रेरित किया था। यह आम भारतीय जीवन का सच जैसा था और इसी रूप में स्वीकृत सच की तरह भी था। यानी पति की मृत्यु न हुई होती और सिर पर चार लड़कियों की जिम्मेदारी न होती तो ऐसा कोई सामाजिक उत्प्रेरक तत्व न था, जिसके कारण सोनपती बहन जी नौकरी के लिए घर से बाहर निकलतीं।  


सोनपती बहन जी हों या उस समाज की कोई भी बहन जी, वे बिना किसी मजबूरी के इसलिए घर से बाहर नहीं निकलती हैं कि समाज की जड़ता, सामंती मानसिकता और पितृसत्ता पग-पग पर उनकी राहों में अवरोध उत्पन्न करती है। अपने पास हरदम माचिस रखने वाली सोनपती बहन जी जिस क्षेत्र और जिस दौर की पैदावार हैं, उस दौर में लड़कियों के जीवन-यथार्थ और संघर्ष की एक झलक देखिए, जहां लड़कियां शिक्षा के उजाले से दूर अंधेरे कोने में खड़ी अपने से छोटे बच्चों की नाक पोंछ रही थीं,  टट्टी धो रही थीं, बरतन मांज रही थीं, रोटी थाप रही थीं। कहीं कहीं घास काटने गई थीं, कहीं गोबर पाथ रही थीं। ऐसे में उन्होंने समझाया कि शिक्षा के उजाले से कैसे घास और गोबर की गंहाती दुनिया से निकल कर बल्ब की धवल रोशनी में आया जा सकता है? सोनपती, जो आगे चल कर बहन जी बनीं, स्कूल नहीं जाना चाहती थीं। मजबूरी की यह शिक्षा उन्हें बहन जी तो बना देती है, लेकिन पितृसत्ता से अनुकूलित मानसिकता शिक्षित होने के बाद भी उन्हें पितृसत्ता के प्रतिनिधि में रूपांतरित कर देती है।


सोनपती बहन जी का चरित्र-चित्रण लेखिका ने जिस खिलंदड़े अंदाज़ में किया है, उससे पता चलता है कि पितृसत्ता की इस प्रतिनिधि स्त्री-चरित्र के प्रति उनकी कोई सहानुभूति नहीं है। शायद इसलिए कि अपनी चारों लड़कियों सहित स्कूल की लड़कियों को जिस हृदयहीनता से वह प्रताड़ित करती हैं और अंत में जिस लोमहर्षक तरीके से उनकी चारों लड़कियों की मौत होती है, उसके कारण नैरेटर का यह भाव स्वाभाविक है। लेकिन इस प्रत्यक्ष यथार्थ को भेदकर जब आगे बढ़ें, तो पता चलता है कि सोनपती बहन जी खुद पितृसत्ता की मानसिक कंडीशनिंग की शिकार एक मोहरा-भर हैं। किसी व्यक्ति के व्यवहार की पड़ताल करते समय उसके पालन-पोषण की पृष्ठभूमि और उसकी सोच की निर्मिति की जब हम पड़ताल करते हैं, तब उसके व्यवहार और गुनाह की असलियत कुछ अलग रूप में ही सामने आती है। बहरहाल, सोनपती बहन जी के बारे में कुछ सूचनाएं देखते चलें, 


‘‘वे अक्सर नीले सफेद प्रिंट की साड़ी पहनतीं। हाथ में एक छोटा झोला होता, जिसमें उनका बटुआ खूब अंदर धंसा कर रखा रहता। उसी में एक माचिस की डिबिया पन्नी में लपेट कर धरी होती। गाहे-बगाहे काम आ जाने की उम्मीद इस डिबिया में छिपी होती।’’


‘‘एक लम्बा काला छाता रहता, जो कई वक्तों पर कई तरह से काम आता। मक्खी भगाने, पंखा झलने, रास्ता बनाने, रास्ता दिखाने, मेज थपथपाने, किसी विद्यार्थी को प्वाइंट करने, ठेले वाले को बुलाने, चपरासी को डांटने आदि आदि से लेकर दुर्वासा की छड़ी के रूप तक यह छाता डटा रहता। इस तरह हाथ का छाता अपने से कुछ गज आगे बढ़ातीं, कंधे पर झोला टांगे, बाजार हाट निपटाती, ग्वाले से दूध लिए सोनपती बहन जी घर पहुंचतीं।’’ और इस तरह सोनपती बहिन जी जब घर पहुंचती हैं तो घर में हिलती-डुलती लड़कियां उन्हें देखते ही सावधान की मुद्रा में खड़ी हो जातीं। रात में सोते समय सोनपती को लोहे की कढ़ाई में औंटा हुआ दूध पीने को मिलता है। पितृसत्ता के प्रतिनिधि उत्तर भारत के किसी पुरुष को याद करें, तो सोनपती बहन जी विशुद्ध रूप से उसका महिला संस्करण नजर आती हैं। पितृसत्ता की पारंपरिक व्यवस्था को याद करें तो घर के कमाऊ पुरुष के घर लौटते ही बाकी तमाम सदस्य एक अघोषित अनुशासन से अनुशासित होने लगते हैं और भोजन में सुस्वादु भोजन की अधिकता और परोसने की मुलामियत प्रायः उन्हीं तक सीमित होकर रह जाती है। इसलिए हमने शुरू में उल्लेख किया है कि सोनपती की मानसिकता की निर्मिति को बेहद ध्यान से देखने की जरूरत है।


घर से निकलने के बाद बाहरी दुनिया में स्त्रियों को पितृसत्ता के साथ-साथ व्यवस्था के अवरोधकों से भी दो-चार होना पड़ता है। जो सोनपती बहन जी बचपन में स्कूल नहीं जाना चाहती थीं और नौकरी में भी मजबूरियों के कारण ही आई थीं, उनका व्यवस्था के दाव-पेंच से किसी भी रूप में कभी साबका नहीं पड़ा था। इसलिए वे सीधी, सरल भाषा तो समझती हैं, लेकिन व्यवस्था के व्यंगार्थऔर अन्यार्थ नहीं समझ पाती हैं। कामयाबी की भाषा में शामिल चढ़ावा, सुविधा शुल्क, पान-पत्ते के लिए, डाली जैसे शब्दों से अपरिचय के कारण बेसिक शिक्षा अधिकारी के अन्यार्थ का अर्थ वे यह समझती हैं कि उनकी कर्मठता पर शक किया जा रहा है। यही नहीं, दोबारा जब दूसरे तरीके से उन्हें कहा जाता है, बहनजी, चपरासी का तो ख्याल रखा करिए। बेचारा इसी नौकरी के भरोसे है। कुछ खिला-पिला दिया करिए। तो भी वे इस वाक्य के सही अर्थ तक पहुंचने में सफल नहीं हो पाती हैं और द्विवेदीयुगीन कवि गुरुभक्त सिंह भक्त की नायिका की तरह पहला कबूतर कैसे उड़ा, इसे बताने के लिए बाकी बचे एक कबूतर को भी उड़ाकर पहले कबूतर के उड़ने का उदाहरण देती हैं। बेसिक शिक्षा अधिकारी के अन्यार्थ को समझने की जगह वे अभिधा में इसे लेती हैं और उन्हें लगता है कि चपरासी भूखा है। सो सोनपती बहन जी ने तुरंत अपने झोले के अंदर से टिफिन निकाला और चपरासी को दे दिया। चपरासी ने हाथ में पकड़ा टिफिन साहब की मेज पर पटक कर रखा और बाहर चला गया। बाद में पीछा करती हुई व्यंग्यार्थ भरी भाषा वे समझती हैं, औरतों को लेकर की गई उपहास और मखौल वाली टिप्पणियों को भी समझ जाती हैं।

बाहरी दुनिया और व्यवस्था के दाव-पेंच को जानने के बाद उत्पन्न अवसाद के कारण उनके व्यवहार में क्या-क्या तब्दीलियां आती हैं, इसे देखने के बाद सोनपती बहन जी के मानस को और अच्छी तरह समझा जा सकता है। लड़कियां इस थकान और परेशानी से बेखबर होतीं। घर में हिलती हुई डोलती फिरतीं। तब सोनपती बहनजी को छाते को छड़ी में बदलना पड़ता। लड़कियां अनुशासित थीं। तुरत-फुरत लाइन लगा कर खड़ी हो जातीं। सोनपती बहनजी सट्ट-सट्ट पीटती जातीं और बताती जातीं कि किसे क्या क्या नहीं आता है? किसी को दाल में नमक ठीक से डालने नहीं आता था, कोई उनके घर आने पर तुरंत पानी ले कर नहीं आया था, कोई अब तक चाय ठीक नहीं बना पाता था, किसी से आलू एकदम वैसा नहीं कटता था, जैसा कटना चाहिए था। इस तरह बहुत कमियां थीं, जिनकी सजा एक दिन तय थी। सोनपती बहन जी के इस व्यवहार से पीड़ित उनकी लड़कियों इस बात से पूरी तरह बेखबर हैं कि उनकी मां का यह व्यवहार किस अपमान और आहत दर्प से संचालित है। इसलिए यदि मनोवैज्ञानिक दृष्टि से से इस स्थिति की व्याख्या नहीं करने पर स्थिति एक होते हुए लड़कियों और पाठकों की दृष्टि में सोनपती बहन जी बेहद क्रूर और संवेदनहीन नजर आती हैं। जबकि व्यवस्था की शिकार सोनपती घर से बाहर स्कूल और ऑफिस की दुनिया में स्वयं लड़कियों वाली स्थिति में जीने को विवश हैं। स्त्रियों के प्रति समाज की मानसिकता, नौकरी की मजबूरी और बाहर की दुनिया से लड़ न पाने के कारण उपजे आक्रोश के कारण पैदा हुई कुंठाओं का विस्फोट कहीं और होता है।


लेखिका ने कहानी की शुरुआत में उपशीर्षक दिया है- सोनपती बहन जी माचिस लिए रहती हैं। कहानी की शुरुआत में इस उपशीर्षक से पाठकों के मन में जिज्ञासा और आश्चर्य दोनों एक साथ पैदा होता है कि सोनपती बहन जी आखिर माचिस क्यों लिए रहती हैं? पितृसत्ता की प्रताड़ना के तमाम तौर-तरीके और कुलीनता की हिंसा की क्रूरता भी इस सवाल के जवाब में अंतर्निहित है। माचिस लिए रहने की वजह देख लीजिए, सोनपती बहन जी की लड़कियां किसी लड़के को खिड़की से देख रही थीं, कि उनकी लड़कियां खिलखिला कर बड़ी जोर से हँसी थीं, कि बड़ी लड़की का दुपट्टा किसी बड़े बुजुर्ग के सामने खिसक कर नीचे गिर गया था...ऐसे ही किसी घोर अपराध पर सोनपती बहनजी ने अपने झोले से माचिस की डिबिया निकाली थी और लड़कियों के पैरों पर छुआ-छुआ कर उसका महत्व असंदिग्ध किया था। ऐसा नहीं है कि माचिस साथ में लिए रहने और वक्तन-बेवक्तन उसका महत्व असंदिग्ध करते रहने का सोनपती बहन जी यह कोई व्यक्तिगत आइडिया हो, वे जिस समाज और पितृसत्ता की एक प्रतिनिधि के रूप में यह कार्य करती हैं, उस समाज का यह एक स्वीकार्य और आम सच है। वैशाली सारस्वत उसी रोज भाग गयी थीं। भागने के बाद वे चड्ढा हो गयी थीं। नगर के, घर के घर अपनी लड़कियों को ले कर सतर्क हो उठे थे। कोई लड़का कहीं था, जिसके साथ भागने की संभावना छिपी हुई थी। कई और तरह के लोग इस संभावना का लाभ अपनी अपनी तरह उठा लेना चाहते थे। लोग इससे और भी डर रहे थे। क्या पता मेरी मां भी अब अपने झोले में माचिस की डिबिया रखें! अपनी मां को लेकर नैरेटर का यह भय उस समाज की तमाम लड़कियों का सामूहिक भय है।


हमने शुरू में इस बात का जिक्र किया था कि इस मुख्य कथा में कुछ उपकथाएं हैं, जिसके कारण मुख्य कथा की मार्मिकता और अधिक उभरकर सामने आती है। सोनपती बहन जी की माचिस-कथा के साथ जिस वैशाली सारस्वत की उपकथा का मुख्य कथा में प्रवेश होता है, उस वैशाली सारस्वत के पिता सुनयनधीर सारस्वत के व्यक्तित्व, कार्य-शैली और पैथालॉजी सेंटर का खाका जिस भाषा और अंदाज में लेखिका अल्पना मिश्र खींचती हैं, वह अद्भुत है। उनके पास भाषा का विशाल रेंज है, जिसके अनेक स्तर हैं और भाषा को बरतने का जो उनका व्यक्तिगत कौशल है, उसके कारण वह समकालीन महिला कथाकारों में अलग से रेखांकित की जा सकती हैं। उनकी भाषा इस्पात की तरह ठोस, लेकिन लचीली है, जिसके कारण चरित्र और कथा-संदर्भ बदलते ही उनकी भाषा बदल जाती हैं और कमाल यह कि कथा-प्रवाह में कोई अवरोध पैदा नहीं होता। तो यहां यह देखते चलें कि पैथालॉजी सेंटर वाले डॉक्टर सुनयनधीर सारस्वत को अल्पना किस दिलचस्प अंदाज में कहानी में प्रवेश कराती हैं, उनके निकलने के पहले खुशबू का झोंका आता। इंतजार करता आदमी बिना उन्हें देखे ही उठ कर खड़ा हो जाता। डॉक्टर सारस्वत आ कर दरवाजा खोलते, अपने टेबल, जिस पर शीशे का कवच उन्होंने लगा रखा था, उसके पीछे की कुर्सी पर बैठ जाते। बिना उनके बोले ही बारामदे का उठ कर खड़ा हुआ आदमी अंदर चला आता और आ कर उनके पास रखे स्टील के स्टूल पर बैठते हुए माचिस की डिबिया या शीशी, जो भी वह ले कर बैठने को था, बैठने की क्रिया के बीच में ही डॉक्टर साहब की तरफ बढ़ा देता।
 

वैशाली इन्हीं डॉक्टर सारस्वत की लड़की थी जो, सगाई की अंगूठी पहने-पहने चली गयी थीं। और उनके घर में एक उनका लड़का था। जिसकी अपनी कोई व्यक्तिगत नहीं पहचान थी और न उसके व्यक्तित्व को देखकर इसकी कोई संभावना ही नज़र आती थी। डॉक्टर सारस्वत का लड़का है, इसी से सब उसे पहचानते थे। लेखिका ने सोनपती बहन जी के घर और उनके व्यवहार के संदर्भ में अनेक बार जनश्रुति शब्द का इस्तेमाल किया है। शायद इसलिए कि नैरेटर कई चीजों की द्रष्टा होने के बावजूद अपने सच के साथ-साथ उस समाज का सच भी बेहद कुशलता से गूंथती जाती हैं। डॉक्टर सारस्वत के लड़के के संदर्भ में भी वे जनश्रुति का शब्द को किस रोचक तरीके से लाती हैं, देखिए, जनश्रुति इस मामले में यह थी कि वह हमारी सीनियर निरूपमा दी को प्रेमपत्र भेजता है। रोज। स्कूल के इसी पते पर। तेल-फुलेल लगाकर पैथालॉजी सेंटर में प्रवेश करने वाले सुनयनधीर सारस्वत (ख़ुदा जाने सुनयन के नयन सुनयन थे भी कि नहीं) की भागी हुई लड़की वैशाली तो चड्ढा बनकर भाग जाती हैं। अपनी जिंदगी को अपने तरीके से जीने का साहस उसमें है, जिसके कारण वह भाग जाती है, लेकिन लड़के के मामले में बड़ा व्यंग्यार्थ यह है कि सूरज कुमार अपने प्रकाश का इस्तेमाल खुद को प्रकाशित करने में भी नहीं कर पाता।


इस कहानी में एक तरफ सोनपती बहन जी की लड़कियां हैं, जो मां के व्याकरण से जरा भी हटने पर माचिस से दग्ध होती हैं, निरुपमा दी हैं जो निरुपमा से ख़राब और बुरी लड़की की उपमा बन जाती हैं। दूसरी तरफ वैशाली जैसी लड़की है, जो अपने आगत भविष्य के लिए भाग सकती हैं! सचमुच की भागी लड़कियों से उन लड़कियों की संख्या बड़ी है, जो भागती है अपनी डायरी में, अपने रतजगे में। जो समाज लड़कियों को दग्ध करने की मानसिकता पैदा करता है, भाग जाने की सूरत में तरह-तरह की जनश्रुतियों को गढ़ता है, प्रेम को व्यभिचार में तब्दील कर देने में एक प्रकार का खल-सुख पाता है, वही समाज शक्ति की उपासना का वार्षिक, अर्द्ध-वार्षिक स्वांग भी करता है! इस पितृसत्तात्मक समाज में ग्रामीण और कस्बाई मानसिकता के कारण मां-बाप सिर्फ इसीलिए लड़कियों को उच्च शिक्षा के लिए बाहर भेजने से नहीं डरते कि लड़की किसी के साथ भाग सकती है, बल्कि उनके मन में डर इस बात को लेकर भी होता है कि इस शक्ति-उपासक समाज का आंतरिक सच भयावह है। कॉलेज आती-जाती लड़कियों को प्रतिदिन लगभग वैतरणी को पार करना पड़ता है, गोरकी पतरकी रे, मारे गुलेलवा जियरा उड़ि उड़ि जाय...कोई न कोई, कहीं न कहीं से यही गाता और उसकी कंठ ध्वनि से निकला यह गीत लड़कियों के कान से जरूर टकराता। और कई मनचले उनके पीछे मद्धिम स्वर में यह भी कहते-चमक रहा है तेज तुम्हारा बन कर लाल सूर्य मंडलया फिर सजनी हमहूं राजकुमारया फिर इक नजर तेरी मेरे मसीहा काफी है उम्र भर के लिए...। जिस समाज में लड़कियां पराई अमानत मानी जाती हैं, उस समाज में ऐसे माहौल में भला कौन मां-बाप अमानत में ख़यानत और अपनी पगड़ी से बेपरवाह रहने की सोच सकता है?


अल्पना मिश्र के भीतर करुणा ही नहीं, सामाजिक विद्रूपता, हास्य-व्यंग्य और सेंस ऑफ ह्यूमर भी गजब का है। लोगों की उथलेपन, काइयांपन के अलावा जब वे गऊ-सी लड़कियों को सर्कसिया घोड़े में तब्दील कर देने के आकांक्षी मां-बाप की हरकतों का वर्णन करती हैं, तो उनके भीतर का खिलंदड़ापन देखते ही बनता है। मसलन, लड़की ने सा...रे...ग...म.... बजा कर दिखाया। कोई भी गीत चलता, वह सा....रे....ग...म...बजाती रहती। इस हास्य में करुणा का गजब पुट है कि बेचारी निरीह लड़की आधुनिक और होशियार दिखने की होड़ में कैसे हास्यास्पद होती चली जाती है। एक और प्रसंग देखें, सोनपती बहन जी को छोड़ कर न्यौता लिखने वाले आदमी के पास अपना अपना न्यौता लिखवाने दौड़े। जो लोग पहले ही अपना न्यौता सोनपती बहन जी को सौंप चुके थे, वे भी कॉपी में अपना नाम लिखवाने दौड़े। लिखवा देना एक पक्का सबूत था। लोग दिए न्यौते का सबूत रखना चाहते थे। ताकि सनद रहे! पुरबिया लोग जिस तरह लहककर खाने पर टूटते हैं और खाते समय जिस परमानंद में डूबते-उतराते हैं, उसका वर्णन तो और भी दिलचस्प है। कोहड़े की सब्जी क्या सिझा-सिझा कर बनाया है, खटाई डाल कर। खाना इतना स्वादिष्ट की अंगुलियां चाटते रह जाओ। साग कितना बढ़िया बना है। कोई कोफ्ते पर फिदा है। रायता अलग बड़ा स्वादिष्ट है।
 

हालांकि कॉलेज आते-जाते वक्त फब्तियां कसने और छेड़छाड़ करने वाल लड़कों के प्रति निरुपमा सख्ती भी दिखाती है, मगर उन लड़कों पर इसका कोई ख़ास असर नहीं होता। एक दिन निरुपमा को जब लड़के छेड़ रहे थे, तभी उस नामुराद वक्त में निरूपमा दी का बड़ा भाई उधर से गुजरा। उसने दौड़ कर एक लड़के को खींचा। किसी की कॉलर पकड़ी, किसी को थप्पड़ मारा। लड़के भी बेल्ट, जूता, बैग...जो मिला लेकर युद्ध में उतर गए। निरूपमा दी को थोड़ा-सा मौका मिला, तो वे अपना तोड़ कर गिरा दिया गया रैकेट लेकर भाई की तरफ से भांजने लगीं। तभी उनमें से किसी लड़के ने सड़क पर पड़ा ईंटे का अद्धा उठाकर निरूपमा दी के भाई पर उछाल दिया। अद्धा उछल कर उसके कपाल के बीचों-बीच लगा। निरूपमा दी का भाई बिना चक्कर खाये एकदम धड़ाम से नीचे गिर गया। कहानी में इसके बाद समाज का जो चेहरा सामने आता है, उससे स्त्रियों के प्रति समाज, कानून-व्यवस्था और पितृसत्ता के दृष्टिकोण की क्रूरता, भयावहता और सामंती तौर-तरीकों को भी स्पष्ट लक्षित किया जा सकता है।


16 दिसंबर, 2012 की रात देश की राजधानी दिल्ली में अपराधियों ने एक लड़की के साथ बलात्कार करके उसके दोस्त सहित उसे सुनसान सड़क पर फेंक दिया, मगर पुलिस और कोर्ट-कचहरी के डर से बुरी तरह घायल और निर्वस्त्र युवक-युवती की मदद किसी राहगीर ने नहीं की। यही सच इस कहानी में भी सामने आता है जब निरुपमा के भाई लड़कों की मारपीट से घायल होते हैं। उन्होंने चिल्ला कर कहा-कोई अस्पताल ले चलो रे! ऐ, हटो हटो, जाओ सामने वाली दुकान से पुलिस को बुलाओ! मुझे पुलिस के चक्कर में न फंसाओ! एक तो समाज में आत्मकेंद्रित लोगों की बढ़ती हुई संख्या, ऊपर से घायल की मदद करने के बाद सहायता करने वाले व्यक्ति से पुलिस का सवाल-जवाब-ऐसी बाधा है जिसके कारण लोग मदद करने से डरते हैं। पुलिस में जब इस घटना की रिपोर्ट दर्ज़ होती है, तो पुलिस के काम करने का अपना ही अंदाज़ है, हवलदार ने सारे मनचले लड़कों को पकड़ कर थाने में पीटने का अभियान चला दिया। पुलिस की गाड़ी, पुलिस की ट्रक धड़धड़ाते हुए सड़कों पर घूमने लगी। जिसकी भी मोटरसाइकिल दुकानों के आगे खड़ी मिली, लाद ली गयी, स्कूटर उठा ली गयी। लाठी भांजते पुलिस वाले पान की दुकानों, एस.टी.डी. बूथों, मोबाइल फोन की दुकानों पर से लड़कों को उठा-उठा कर ट्रक में ठूंसा जाने लगा। इसी क्रम में अद्धा फेंक कर मारने वाले लड़के भी पकड़े गए। वे बड़े इत्मीनान से पान की दुकान पर खड़े पान मसाला चबा रहे थे और किसी ब्लू फिल्म की कहानी पर बहस छेड़े थे।
 

इन मनचले लड़कों को पुलिस पकड़कर जब ले जाती है, तो नगरपालिका के चेयरमैन ठाकुर बलवान सिंह, निरुपमा या उनके घायल भाई के प्रति कुछ नहीं कहते। इसके उलट वे उन मनचले लड़कों को पकड़ने वाली पुलिस के रवैये के प्रति उग्र हो जाते हैं और उल्टे पुलिस को ही सबक सिखाते हैं, जीप से सबसे आखिर में ठाकुर बलवान सिंह उतरे। उतर कर खड़े हो गए। तब नाटक शुरू हुआ। हथियार बंद लोग कूद-कूद कर, उछल-उछल कर हवलदार को तरह तरह से पीटने लगे। जब हवलदार जमीन पर पूरा चित्त गिर कर तड़पने लगा, तब चेयरमैन ठाकुर बलवान सिंह ने अपनी तोंद पर हाथ फेर कर अपनी बेल्ट उतारी और हँस कर कहा, हमारे लल्ला को छूने चले थे। तेरा क्या बिगाड़ रहा था बे? चलो, अब हम तोहें नाटक का रिहर्सल करा देते हैं।इसके बाद सटासट आठ दस बेल्ट मारा और मुड़ कर गाड़ी में आ कर बैठते हुए चिल्लाए, उठाओ साले को। थाने छोड़ आओ। बोल देना सबेरे चार बजे से पहले नगर छोड़ के चला जावे। दिन में इसका मुंह न दिखाई पड़े। इस कार्रवाई के बाद पुलिस के मनोबल और आत्मविश्वास की स्थिति क्या हो सकती है, इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। 


सरकारी अस्पताल की सुविधाहीनता और संवेदनहीनता से परेशान निरुपमा को जब अपने प्रेमी सूरज कुमार की कायरता का पता चलता है, तो वह टूट जाती है। कस्बाई माहौल में पली-बढ़ी, भावुकता और रुमानी दुनिया में जीनेवाली निरुपमा सूरज कुमार को ख़ून से ख़त लिखती है और सूरज कुमार से यह इसरार करती है कि महीने भर के भीतर हम लोग यहां से भाग चलें। मगर यह पत्र लड़के के पिता के हाथ लग जाता है, जिसे कुपित डॉक्टर सारस्वत सार्वजनिक दर्शन के लिए अपने गेट पर बाकायदा चिपकवा देते हैं। उधर इस कार्रवाई और सूरज कुमार की बेवफाई से बेख़बर निरुपमा अपने किसी फोन का जवाब न देने वाले प्रेमी से सीधे मुखामुखम के लिए पहुंच जाती है, तो प्रेमी सूरज कुमार, जिसकी बहन वैशाली सारस्वत किसी चड्ढा लड़के के साथ घर से भाग चुकी है, निरुपमा को टका-सा जवाब देता है, मैं अब माता पिता को और मुसीबत में नहीं डाल सकता। इसका जो भी अर्थ लगाना है, लगाओ। नौटंकी जा कर कहीं और करो जाओ, यहां से!

भाई की हालत, परिवार की स्थिति और खुद के साथ हुए छलावों से निरुपमा बिल्कुल हताश हो जाती है। लेकिन उनके साथ पितृसत्ता की दरिंदगी यहीं नहीं रुकती। आखिर उसी के कारण उन मनचले लड़कों की पुलिस के हाथों पिटाई हुई थी। सो सूरज कुमार के यहां से लौटते हुए रास्ते में वही मनचले लड़के दोबारा सरेराह उसका दुपट्टा खींचते हैं, कपड़े फाड़ डालते हैं और उन लड़कों में से एक ठाकुर बलवान सिंह का लड़का उसकी मांग में सिंदूर डाल देता है। उसके बाद हिंस्र पशु की तरह निरुपमा को चींथने लगते हैं, मांग में सिंदूर डालने का का उत्सव शुरू हो गया। लड़के हाथ, पैर, नाक, मुंह छू-छू कर देखने लगे। उनका दुपट्टा किसी ने खींच कर दो टुकड़े कर दिए, फिर दो लोगों ने उसे अपने अपने सिर पर बांध लिया। जब कपड़े फट गए। कुर्ते के अंदर से ब्रा झांकने लगी। फिर ब्रा के अंदर से शरीर झांकने लगा। सलवार का नाड़ा खींच लिया गया।


यह इस कहानी की उपकथा है, जिसमें निरुपमा की मुखरता और साहसिकता की हिकमत की यह परिणति होती है। वैशाली घर से भागने को विवश होती है। लेकिन मुख्य कथा की सोनपती बहन जी, जिन्हें जरूरी पाठ की तरह याद रखने की जरूरत है, उनकी बेटियां बचपन से सामूहिक रूप से दग्ध होकर बड़ी होते हुए एक दिन पूरी तरह दग्ध होकर जीवन का किस्सा ही तमाम करने का कदम उठा लेती है। कौमार्य-प्रिय पितृसत्ता को शीघ्रातिशीघ्र पराई अमानत सौंपने को बेचैन सोनपती बहन जी की लड़कियां जिस पारिवारिक और सामाजिक माहौल में बड़ी होती हैं, उसमें एक स्त्री का पूरा जीवन अर्थहीन है। शायद इन वजहों से भी सोनपती बहन जी की लड़कियों को अपने जीवन का कोई अर्थ नहीं नजर आता और परिणति सामूहिक दाह तक पहुंच जाती है।


उपकथाओं की नदियां आगे चलकर जब मुख्यधारा में मिलती है, तो कथांत पाठकों को गहरी बेचैनी और स्त्री-अश्रु के वर्तमान और इतिहास के समुद्र में डूबो देती है। सोनपती बहन जी की लड़कियां आत्मदाह को प्रेरित होती हैं, पर निरुपमा और वैशाली जैसी लड़कियां जीना चाहती हैं-कहीं भी। निरुपमा भी भागती है, लेकिन स्टेशन की तरफ अकेले-यथार्थ में। इस विंदु पर आकर लेखिका अल्पना मिश्र ने फैंटेसी का इस्तेमाल करके कथांत को बेहद मार्मिक बना दिया है। जिसमें यथार्थ और स्वप्न एक-दूसरे में मिलकर यथार्थ की दारुणता को और बढ़ा देते हैं। सचमुच की भागी निरुपमा के यथार्थ में दर्जनों वे लड़कियां शामिल हो जाती हैं, जो भागी हैं अपने स्वप्न, अपनी डायरी, अपनी कुंठा और अपनी असफलताओं में। पितृसत्ता और समाज की हिंसा के सामने खड़े होने की हिम्मत करने वाला निरुपमा का भाई एक आम भाई और आम पुरुष से उस वक्त ख़ास पुरुष में रूपांतरित हो जाता है, जब कथांत की फैंटेसी में निरुपमा और निरुपमा जैसी अन्य लड़कियों के रक्षक और सच्चे सहायक के रूप में एकमात्र वही दिखाई देता है।


कई लेखिकाओं में स्त्री-विमर्शवादी उत्साह का अतिरेक इतना होता है कि उनकी कहानियों में तमाम पुरुष पितृसत्ता के संरक्षक ही नजर आते हैं। जबकि अल्पना मिश्र की कहानियों में तमाम पुरुषों के बीच ऐसे पुरुष भी हैं, जो वाकई स्त्री के सच्चे सहायक और सच्चे मित्र साबित होते हैं। वे पुरुषवादी मानसिकता के विरोध में तो हैं, लेकिन तमाम पुरुषों को स्त्रियों का दुश्मन मान लेने वाली मानसिकता से असहमत भी-जिस सच को सीधे न बोलकर भी वह अपनी रचना में अनुस्यूत सत्य के रूप में कह जाती हैं।
***




[1] नलिनी जमीला एक पूर्व सैक्स वर्कर होने के साथ-साथ एक बेटी, पत्नी, मां, व्यावसायिक महिला और सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं। राजपाल एंड संस से हाल ही में हिंदी में प्रकाशित उनकी पुस्तक 'एक सैक्स वर्कर की आत्मकथा'  के मलयालम में अब तक छह संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं।
[2] अल्पना मिश्र के दूसरे कहानी-संग्रह क़ब्र भी क़ैद औ ज़ंजीरें भी की पहली कहानी ग़ैरहाज़िरी में हाज़िर की नायिका जिन स्थितियों में नौकरी के लिए घर से निकली है और अपने पीछे की पारिवारिक स्थितियों को याद करके जिस तरह नौकरी करती है-वह बेहद हौलनाक है। 


सम्पर्क-
असिस्टेंट प्रोफेसर, हिंदी विभाग,

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय,

अलीगढ़-202002 (उ.प्र.),
फोन- 096342 82886

बुधवार, 28 अगस्त 2013

अल्पना मिश्र


  
हिन्दी कहानी के क्षेत्र में अल्पना मिश्र ने थोड़े ही समय में अपनी एक मुकम्मल पहचान बना ली है। अभी-अभी अल्पना ने अपना पहला उपन्यास लिख कर पूरा किया है। इस उपन्यास में इन्होंने उस समस्या को बड़ी खूबसूरती से उठाया है जो हमारे समय का सच तो है लेकिन जिस पर बात करना आम तौर पर वर्जित माना जाता है। अल्पना ने इस उपन्यास के माध्यम से यह दुस्साहस किया है और अपने तरीके से बखूबी किया है. कहीं पर भी लाउड हुए बिना अपनी बातें कह देना अल्पना की खूबी रही है, जिसका निर्वहन इस उपन्यास में भी इन्होने बखूबी किया है। शिल्प की छटा जो अल्पना की खूबी है वह तो आप इस उपन्यास में देखेंगे ही 

तो आइए पढ़ते हैं आधार प्रकाशन से शीघ्र प्रकाश्य अल्पना मिश्र के उपन्यास - ‘अन्हियारे तलछट में चमका’ का एक अंश। 

मनसेधू , तोरा नगर बासंती.....
(आत्मकथा -3)

  
एक बसंती पीला, खिलने खिलने को होता गुलाब मेरे हाथ में था। ओस कण की केवल एक झिलमिलाती बूंद उसकी हेम काया पर थिरक रही थी। जरा सा असावधान हुई कि यह खो जाएगी। मैं इस कण के खो जाने की संभावना को बचा ले जाना चाहती हूँ। कम से कम अभी या कम से कम जब तक मैं बचा पाती।
हथेली जैसे एक आँगन थी। मिट्टी की किनारे बनी क्यारियों में जैसे यह पीला फूल खिलने को आया था। इसे प्यार दुलार के जल से नहलाना था। हवा, मिट्टी के साथ थोड़ी उष्मा जीवन की, इसमें डालनी थी। फिर यह फूलता, निखरता। जीवन का खिलना ऐसा, कोई देखता!
मैंने बहुत आहिस्ता से, बहुत संभाल कर पूरा आँगन उसके सामने रख दिया।
‘‘सौंदर्य की वस्तुगत सत्ता को तुम नहीं समझती! पढ़ो, वह किताब। जो पिछले दिनों तुम्हें दिया था।’’ उसने हॅस कर कहा था।


‘‘कोई कोई अहसास बचाने का मन होता है। तुम इसे समझते ही नहीं। कुछ बहुत कोमल, कुछ बहुत महीन बुना होता है, उसे उतनी ही कोमलता से बरतना होता है। टूट न जाए, इसका ख्याल रखना होता है।’’
यह मैंने सोचा। कहा नहीं। अचानक ही कहना व्यर्थ लगने लगा। कभी अचानक ही हम कितनी चीजों से छूट जाते हैं। बिना किसी प्रयास के, बिना किसी हिम्मत की कोशिश के। ऐसे ही अकस्मात मैं छूट निकली हॅू और अपने शब्दों को बहा देना चाहती हूँ अनन्त की ओर। कहते हैं कि शब्द नहीं मरते। तो ये भी नहीं मरेंगे। कहीं पॅहुच जायेंगे। किसी जगह, किसी छोर तक। वहाँ,  कोई इन्हें जान ले शायद। कोई इन्हें समझ ले। शायद। समझ ही ले।


‘‘तुमने पढ़ा ही नहीं होगा। अब कहोगी अंग्रेजी में है। तो अभ्यास करो अंग्रेजी में पढ़ने का। और ये क्या बचपना है?’’ वह हॅसा। वही अपनी गंभीर सी हॅसी।
मेरे आँगन में खिला फूल उसने किनारे रख दिया।    
बचपने का बहुत कुछ किनारे रख दिया!
किनारे रख दिया कि उसे, उसकी जल, मिट्टी, वायु और उष्मा से किनारे कर दिया!



ओस-कण की बूंद - एकमात्र ठिठकी सी बूंद जाने कब हिली और लुढ़क कर विलीन हो गई। कहाँ विलीन हुई होगी? एक दूसरी वस्तुसत्ता में! फूल की वस्तुगत सत्ता थी। एक वस्तु और क्या ? बस, वस्तु-भर! वस्तु की सत्ता भी वस्तुभर है या उपयोग भर? उससे बहस कर के क्या होगा,? वह अंत तक हार नहीं मानेगा। हार जाने के बाद भी नहीं ! मैं यह नहीं देखना चाहती। अपने प्रिय को हारता और हार कर, हार न मानता हुआ देख कर कौन खुश होगा?
लेकिन करेक्शन तो लगाना ही होगा।
करेक्शन जरूरी सच है। इसे भी वह समझ पायेगा ?


मैंने किताब अब तक नहीं पढ़ी थी। किताब से वह छांट छांट कर उद्धहरण दे सकता था। मैं किताब की बात टाल रही थी। असल में किताब बोरिंग थी। बहुत उबाऊ। जीवन उसमें था ही नहीं। रंगों छंदों में बिखरा जीवन। यह बात भी मैं उससे कई तरह से कहना चाहती थी। पर वह अपनी रौ से बाहर ही नहीं आता था। जीनियस रौ। जीनियस झक।
‘‘मैं अपनी झक को बहुत प्यार करता हॅू।’’ वह गर्व के साथ ऐलान कर सकता था।
मैं नहीं कर सकती थी। मैं इस पर ठहर कर विचार करने लगती थी। मेरी झक है क्या? और अगर है भी तो मैं उसे कितना प्यार करती हॅू? करती भी हॅू या कि नहीं कर पाती? या कि अपनी झक से डरती हॅू कि इसी डर से पार जाने की कोशिश है सारी।
यह भी कि अगर दुनिया का हर आदमी अपनी अपनी झक से प्यार करे, सबसे ज्यादा, तो कैसी अनोखी बन जाएगी यह दुनिया?
‘‘हम अब बच्चे नहीं रहे। तुम भी कुछ बड़ी हो जाओ।’’


हॅसी तुम्हारी मुझे चीरती हुई निकलती चली गई। क्या सचमुच मुझे बड़ा हो जाना चाहिए? जीवन की यह खूबसूरती क्या बचपना भर है? या कि बचपना ही है जो समेटे हुए है अब तक थोड़ी सी कोमलता, थोड़ा सा प्यार, थोड़ा सा भरोसा, थोड़ी सी निश्छल हॅसी.... आदमी हर पल एक गंभीर मुद्रा ओढ़े रहे तो जीवन कितना बोझिल होने लगे।
 ‘‘मेरे पास मेरा फूल हो तो मुझे दूसरे फूलों का क्या?’’ कुछ सोचते हुए तुमने कहा था। हो सकता है कि तुम्हें लगा हो कि मुझे हर्ट कर चुके हो या शायद अब कुछ मेरी निकटता की इच्छा हो आई हो ? क्या पता? फिर तुमने अपने परिचित से अंदाज में मुझे अपनी तरफ खींच लिया। मैं खिंच आई।


मेरा आँगन छूट गया। हथेली चली आई।
फूल छूट गया। खुशबू नहीं छूटी।
क्या था इस खिंच आने में? अब तक सोचती हॅू। मेरी अपनी झक तो नहीं थी! या कि मैं कुछ खोज रही थी, जिसकी कोई गंध तुम्हारे भीतर से उठने की संभावना लगती थी। लगती रहती थी, यह मैं जानने लगी थी। इस संभावना को पकड़ लेना चाहती थी।


तुम हॅसे हो। जीनियस हो, हॅस सकते हो। जीनियस दुनिया पर हॅस सकता है। ऐसा मानते हैं। जो मानते हैं, उनसे मैं कभी मिल नहीं पाई। कुछ मर भी गए होंगे। काल कवलित कहना चाहिए था। एक बहुत ब्लंट भाषा आ जाती है बार बार। चाहने न चाहने की बात नहीं है, जीवन की खरोंचे भाषा भी बदलती ही हैं। तो जीनियस दुनिया से उपर उठ कर दुनिया को देखता है और उसे छोटा, बहुत छोटा, एक गोलाकार भर मान सकता है! गोले को अपने पैर के नाखून से ठेल देने की बात भी कह सकता है! इसी गोले को उधाड़ उधाड़ कर उसके वस्तुगत यथार्थ को खोल भी सकता है! जिगरा है भई, उसी का-!- ?


मैं तो इसी ग्लोब के भीतर, इसी में लुढ़कती हुई, अपने को स्थिर करने के लिए कितना बल लगाती हॅू। दम साधे, जी जान से जुटी हूँ कि कोई हिला दे तो न हिलने की हिम्मत में रहॅू, पैर न डिगें, मन के झील की हिलोरें फेन उगलती सिंधु की प्रलयंकारी लहरों की तरह पछाड़ खा खा कर गिरने को न हो जायें! मेरी संभाल से बाहर। मेरी मुट्ठी से फिसलती हुई।

‘‘शचीन्द्र। शचीन्द्र। ओह शचीन्द्र।’’
मैंने कैसे बार बार तुम्हारी छाती के भीतर तक मुँह गड़ा कर कहा है। किस गहरे समंदर से उफन कर यह स्वर उपर उठ आया है।
कितने पहले की बात है ये। लगता नहीं! लगता है बस, अभी सब होता हुआ गुजरा है। एकदम अभी।
तुम्हारे साथ का यह थोड़ा सा वक्त, बस, खत्म हो जाने के लिए था। घड़ी की सुई मेरे लिए नहीं रूक सकती थी।
‘‘बिट्टो! बिट्टो, तुम हो ही ऐसी। मक्खन की तरह।’’
यह क्या! किसी खाने की चीज से तुलना? कोई और वक्त होता तो मैं बहुत धक्का खा जाती। मुझे यह हद दर्जे नापसंद है। लेकिन अभी जब तुमने कहा, ऐसे सघन क्षण में कहा, तो इसे मैंने कुछ और तरह से पढ़ लिया। मानो यह सिर्फ मिठास का, मन की अतल गहराइयों में खो जाने का पर्याय भर हो। इसका कोई दूसरा अर्थ हो ही नहीं सकता।
‘‘मुझे किसी रजिस्ट्रेशन की जरूरत नहीं है।’’
तुमने कह दिया था।
मैंने मान लिया था।
इससे ज्यादा और क्या कहा जाता!
इससे ज्यादा और क्या सुनने को बेचैन हुआ जाता!
‘‘जो सुनना है, बोलो, मैं कह दूं।’’ तुमने पूरा का पूरा ढक दिया था। मैं अलग से कुछ रह ही नहीं गई। तुम भी नहीं रह गए होगे। कम से कम उस क्षण तो बिल्कुल नहीं। अपनी सारी तर्क शक्ति के बावजूद उस क्षण तो बिल्कुल नहीं।



तुम्हें तो ध्यान भी नहीं होगा। कैसे मैं तुम्हें अपलक रात भर देखती रहती हॅू! तुम आँख बंद कर लेते हो। सोने लगते हो। मैं नहीं सो पाती। जाने कौन से अचरज से मेरी आँखें खुली रहती हैं। तुम्हें ताकती, निहारती, तुम्हें छूती। आँखों की इस छुअन को तुम जान पाते होगे ? जैसे लगता है कि जान कर ही अचानक अपनी बाँह उठा कर मुझे लपेट लेते हो। मुड़ते हो जरा सा और मुझे एकदम सीने में चिपका लेते हो। जान जाते होगे तभी तो बीच में कह देते हो -‘‘ सोओ। सो जाओ।’’ मैं फिर भी नहीं सो पाती। ऐसा पल सो जाने के लिए नहीं है। सो कर बिता देने के लिए नहीं है। ऐसा पल जीती जागती आँखों में भर लेने के लिए, रोम रोम में समा लेने के लिए है। पता नहीं किस जन्म में मिलेगा ऐसा पल। और तुम हो कि सो रहे हो आँख बंद किए। 


‘‘आज न सोओ।’’ मन करता है कि तुम्हें कह दूँ। जगा दूँ। एक रात न सोओ। एक रात अपनी नींद की रातों में से कम कर दो। एक रात कम कर देने से तमाम तुम्हारी नींद की रातों का ऐसा क्या घाटा हो जाएगा?
‘‘आज की रात न सोओ।’’ नहीं कह पाती।
तुम्हें जगाने के लिए उठा हाथ तुम्हें थपकने लगता है, सहलाने लगता है।
दुलरा कर चूम चूम लेती हॅू तुम्हें।
चूमती हॅू इतने धीरे से कि तुम्हारी नींद को पता भी न चले।
तुम्हें छू लूं और तुम जागने भी न पाओ।
नींद से किसी को जगाना पाप है, ऐसा सुना था। पता नहीं किससे? ऐसी सुंदर सी नींद आती ही किसे होगी ! ऐसे जमाने में ऐसी नींद। सचमुच पाप ही लग जाए जो ऐसी नींद वाले को जगा दे कोई। नहीं, नहीं जगाउंगी। तुम्हें सोते हुए देखूंगी। ‘आज मत सोओ।’ यह कहना बचा लूंगी। किसी और रात के लिए सजो लूंगी। तब कहूँगी। इस आस में कहॅूगी कि तुम मान लोगे मेरी बात। कौन से प्रेमी ने अपनी प्रेमिका की ऐसी बात नहीं मानी, बताओ। इतिहास उठा कर दिखाओ। 


चलो छोड़ो! ये दुनीयाबी बातें! यही कहोगे न! यही कह कर हॅसोगे न! अभी तो सो लो। और ऐसे सोता है कोई, मुस्कराते हुए। स्वर्ग का राज मिल गया हो जैसे। कोई गड़ा खजाना हाथ आ गया हो। ऐसे, इस अभिमान से मुस्करा रहे हो। आँखें बंद हैं और चेहरा प्रसन्नता से भरा है। तुम्हारे इन मुस्कराते होंठों को चूमने का दिल कर आता है। बार बार। नींद में डॅूबे किसी आदमी की मुस्कराहट को ऐसे चाहना में छलक कर चूमा है कभी किसी ने! मैंने कहीं नहीं पढ़ा। सुना भी नहीं।
मैं तुम्हारे सीने में लिपटी हुई अपनी चाहना में छलक पड़ी हॅू।
थोड़ा सा हिल कर इतनी जगह बना लेती हॅू कि एकदम से इस क्षण को पकड़ लूँ। तुम्हारी मुस्कान को भर लूँ अपनी सासों में, धमनियों में, रक्त में......
छलकती हुई मैं तुम्हारे होंठों पर बिखर गई हूँ।
आखिर छलका हुआ जल कहीं तो गिरेगा।
कोई तो उसकी इच्छित भूमि होगी।
मेरी यही है। तुम्हारी जगर मगर करती मुस्कराहट.....
सोते हुए तुम कुनमुना कर जग गए हो। अपनी विशाल देह की एक चादर ओढा दी है मुझे। मैं छिप गयी हॅू इसमें। समा गयी हॅू इसमें। एकाकार हो गयी हॅू इसमें। कुछ दूसरा बचा ही नहीं है। न अलग, न थलग। कुछ भी नहीं। 


ऐसे जब तुम छिपा लेते हो मुझे, तो मैं खुद को कितना कितना सुरक्षित महसूस करती हॅू। तुम्हारा हाथ, हथेलियाँ - बड़ी, चौड़ी, मेरा हाथ, हथेलियाँ- छोटी, पतली, तुम्हारी हथेलियों में समा जाती हैं। जैसे मेरी छोटी सी देह तुम्हारी देह में छिप जाती है।
प्रेम की अगर सचमुच कोई अलग सी भाषा होती होगी तो वह ऐसी ही होगी - तुम्हारी मुस्कराहट जैसी। कोई रंग होता होगा तो ऐसा ही होगा - इस समय तुम्हारे चेहरे पर पसरा है जो.....
‘‘तुम्हारी छाती पर चढ़ कर कहा रहा हॅू आई लव यू। कभी किसी ने कहा है ऐसे - दुनिया में किसी को? बताओ।’’ तुम दुलरा कर कहते हो।




पता नहीं कौन कौन से फूलों के पराग महक उठते हैं। पता नहीं कौन कौन से रंग खिल उठते हैं।
तुमने कह दिया था। मैंने मान लिया था।
इतना ही सच था।
इसके आर पार मैं नहीं गई।
कोशिश भी नहीं किया।
तुमने कह दिया, इतना जो कह दिया तो भला कौन सी मुझे ही परवाह रह गई इस दुनिया के नियमों, बंधनों की। मैं तो बिल्कुल नहीं जाना चाहती थी रीति रिवाजों के क्रूर संसार में। जहाँ सजा धजा कर औरत को बलिबेदी पर बैठा दिया जाता है। मैं झेल चुकी थी यह सब। मेरी झोली में ऐसे अनुभव अपनी पूरी तीव्रता का अहसास कराते ठूंसे पड़े थे। पूरी सदी भर अनुभव। 


पता नहीं वह कौन सा क्षण होता है जहाँ मैं रूक जाती हूँ और कुछ और ही तरह से देखने लगती हॅू। शंका करने लगती हॅू। कुछ और हो जाती हूँ। तुम्हें नहीं बता पाती। हर बार जब तुम तक आती हॅू तो अपने साथ एक भारी भरकम पिटारा लिए आती हूँ। वही, मेरी अनुभवों की झोली, दुख, अपमान, तिरस्कार, पीड़ा या और जो भी शब्द दिए गए हों इसके लिए, वे सब के सब इसमें भरे पड़े हैं। उपर तक ठूंसे। हर बार सोचती हॅू कि तुम्हारे आगे खोल दूंगी इसे। हर बार रह जाता है। वापस, वैसा ही। जानते हो इतनी भारी भरकम गठरी ढो कर लाने और फिर ढो कर वापस ले जाने में मैं कितना थक जाती हूँ। बड़ी भारी थकान है यह। एक सदी से भी भारी। युग कल्प से भी भारी। अब तुम्हें क्या बताउं कि हर बार की तरह इस बार भी तुम इसे अगली बार सुनने को कह दोगे। फिर ऐसी अलमस्त नींद तुम्हारी। यह बोझ वाला पिटारा खलल ही तो होगा।
छोड़ो, सचमुच फिर कभी।
फिर ले जाती हॅू वापस।


तो जो मैं नहीं कह पायी, पर तुम्हीं से जो कहने को आकुल व्याकुल होती रही, वही मैं आज अपने आप से कहती हॅू कि अगर कोई दिन और रात में गिनती करने बैठे तो कह सकता है कि मैं कोई डेढ़ साल रही उस संसार में, जिसे शादी शुदा जिंदगी कहते हैं। मैं इसे डेढ़ साल में अटा नहीं पाती हॅू। मुझे यह बड़ा लगता है। बहुत बड़ा। जिंदगी की सारी गिनतियों से बड़ा। सौ, हजार, लाख, करोड़, शंख, महाशंख........  मतलब कुल मिला कर तब तक, जब तक कि वहाँ मैं रहती चली गई। तब तक, जब तक कि इस हद तक मुझमें भय नहीं भर गया कि अब नहीं भागी तो आगे नहीं बच पाउंगी! जीने की इच्छा से फूटी आखिरी हद पार कर जाने वाली हिम्मत भी इसे कहा जा सकता है। 


मैं कोई पहली लड़की तो थी नहीं, जो ससुराल से भाग आई थी। मुझसे पहले जो लड़कियाँ भागी थीं, उनका कोई उपलब्ध रिकार्ड भी मेरे पास नहीं था। पर एक नाम मेरे पास था। अपनी ही बड़ी बहन का। दीदी। हाँ, दीदी मुझसे पहले भाग आई थीं। मुझसे पहले वे लड़ कर, भिड़ कर, चीख कर देख चुकी थीं। मुझसे पहले उन्होंने मायके वाले परिवार को अपना परिवार कहने की जुर्रत कर डाली थी। मुझसे पहले उन्हें मायके के लोग बेगाने दिखाई पड़े थे। मुझसे पहले वे माँ की तरफ उम्मीद भरी नजरों  से देख चुकी थीं। मुझसे पहले वे माँ की समझाइश की सारी चालाकियाँ, सारे ताने और अवमानना के सारे दंश तहा तहा कर रख चुकी थीं। मुझसे पहले वे माँ पर सामंती मानसिकता की पुतली होने का आरोप लगा चुकी थीं। मुझसे पहले माँ से उनकी ठन चुकी थी। दुनिया से भी। मेरे सामने वे हार रही थीं। मेरे सामने उनके हथियार भोथरे हो रहे थे। मेरा काम उनके अजमाये तरीके से नहीं चल सकता था। ‘वित्त विहीन आदमी हार जाता है’ यह पाठ मेरे आगे खुल रहा था। रोज ऐसे अनुभवों का कुएं भर जल आता और मेरे आगे पसर कर नदी की तरह रास्ता बना लेने की जिद करने लगता। मैं रोज इसे पढ़ती, बाँचती, गुनती। मैं रोज निर्णय करती कि उन दिशाओं को जानना है, जिधर से वित्त आता है। उसी तरफ जाना है। लेकिन समस्या सम्मानित वित्त की थी। माने क्वालिटी धन। इसके लिए पढ़ना और नौकरी करना ही सूझा था। मैं दीदी की तरह नहीं लड़ सकती थी। मैं कुछ और तरह से लड़ना चाहती थी। इस लड़ाई की पूरी सामरिकी स्पष्ट नहीं हो पाती थी तो बड़ी बेचैनी होती थी। तमाम किताबों की तरफ इसीलिए जाती थी, चाहे वे कितनी ही बोरिंग हों, मैं पूरी कोशिश करती थी। तमाम लोगों से, जो दूसरों के हक की बात करते थे, इसलिए मिलने को उतावली हो उठती थी। इसी क्रम में लोगों के हक की बात करने वाले शचीन्द्र से भी मिली थी। शचीन्द्र से मिल कर बहुत राहत मिली थी। उसकी बातें मुझे सारे दिन याद रहतीं। सारी रात मैं उन पर सोचती। तमाम प्रश्न उठते तो मैं उन्हें तब तक संभाले रखती, जब तक कि शचीन्द्र से दुबारा मुलाकात न हो जाए। शचीन्द्र मेरे तहाए प्रश्नों को बड़ी गंभीरता से उठा लेता, फिर भारतीय पारिवारिक ढाँचे को समझाता, बेहद सैद्धान्तिक तरीके से। व्यावहारिक अनुभव से वह नहीं बोलता था। सिद्धांतों को कभी परखता भी नहीं था। यह भी मैंने कितने बाद में जाना। सिद्धांतों पर अंधविश्वास करना, अंध श्रद्धा ही उसके लिए पहली और आखिरी शर्त थी। मैं चकित सी उसका मुँह  देखती। देखती इस तरह कि उसका मुँह देखते देखते बहुत प्यारा लगने लगता। मैं भूल जाती कि वह जो कह रहा है, वह किस विषय पर है? पता चलता कि उसका प्रवचन था शिक्षा व्यवस्था पर और मैं बता बैठी कुछ और। वह नाराज हो जाता।
‘‘तुममें लगन तो है। पर ध्यान भटकाती रहती हो। ये लो दो किताबें। ध्यान से पढ़ना।’’



किताबें मैं ले लेती। मैं भी समझना चाहती थी कि आखिर यह सब परिवार, समाज, वर्ग, जाति, लिंग और अंततः इन सब में स्त्री की स्थिति क्या है? लेकिन प्रवचन रूक जाता। शचीन्द्र का भाषण देता चेहरा दूसरी तरफ मुड़ जाता। वह उठ खड़ा होता। यह मुझे अच्छा नहीं लगता। लेकिन यह भी ठीक न लगता कि मैं उसे बोलते रहने के लिए रोक लूं। फिर सब दोस्त मित्र इधर उधर घूमते। इधर उधर घूमते जोर जोर से बतियाते, बहसते, चाय पीते। किसी के पास कुछ पैसे होते तो पकौड़े खा लेते। और ज्यादा होते तो दारू पी लेते। मैं इससे बाहर हो जाती। अॅधेरा होते मुझे लौटना होता। इसके लिए तुम्हीं सब मुझे डरपोक, कायर, स्वतंत्रता के हसीन सपनें देखने वाली शेखचिल्ली आदि आदि कहते और यह भी कि ‘ऐसे दुनिया नहीं बदलती ’ जैसे जुमले सुना का टांट कसते। दुखी करते। पहले मुझे लगता था कि मैं बेहद कमजोर और डरपोक हॅू। थी ही। लेकिन मुझे तुम सबका यह तरीका, इससे भी दुनिया बदल जाएगी, यकीन करने लायक न लगता। पर मैं यकीन करती। बाकी कोई तो इतना भी नहीं बोल रहा था। यहाँ इतना तो था। लड़कियाँ इनके गोल में बोल बतिया पाती थीं। ढाबे पर चाय पी लेती थीं। थोड़ा हॅस भी लेती ही थीं। इससे ज्यादा नहीं। पर इतना तो था ही। 
‘‘अपने हक की लड़ाई को ऐसे सबके हक की लड़ाई में बदल कर लड़ना, बड़ा लड़ना है।’’
शचीन्द्र ने यही कहा था। पहली ही मुलाकात में। बात एकदम पते की थी। किसे इंकार हो सकता था भला! मैंने भी इसे ही पकड़ा था। अपनी तरफ से एक बड़ी लड़ाई की तरफ जाने की कोशिश भी की थी।


‘‘शचीन्द्र , आज मैंने एक फासला तय कर लिया। नौकरी। नौकरी मिल गई आखिरकार।’’ मैंने सबसे पहले शचीन्द्र को ही यह खबर दी थी। हाथ में कागज पकड़े दौड़ी चली आई थी। सोचा ही नहीं था कि जरा थिर हो लूं। बस, दौड़ पड़ी। कागज आगे कर दिया। मन हुआ आज पहली बार कि शचीन्द्र के गले लग कर रो पड़ूं। बस, डर से गले नहीं लगी और रोई भी नहीं। कहीं हॅस न पड़े, मजाक न उड़ा दे, यही सोच कर रूक गई।
‘‘वाह! वाह! यह तो गजब की खबर है। अरे मेरी बिट्टो! बिट्टो।’’
फिर कुछ और बल दे कर कहा-‘‘ बिट्टो रे, जीत की तरफ है तू तो। गुड, वेरीगुड।’’ और न जाने किस पल में उसने मुझे गले से लगा लिया। उसी आवेश में भींच लिया।
मैं खड़ी रह गयी। अपने को भूली हुई। रोना, हॅसना सब इस अपनेपन में बहने लगा।
‘‘तुझे नौकरी मिल गयी तो जैसे मुझे मिल गयी। मैं बहुत खुश हूँ। बहुत। बहुत। सच में।’’ यह उद्गार हृदय से ऐसे फूटे थे, जैसे कहीं कोई झरना गड़ा था, जिसका पता किसी को नहीं था। पर जो था ही। वही, आज उमग कर बह निकला था। वह मुझे थामे कितने चक्कर मुड़ मुड़ कर कहता रहा। न जाने क्या क्या कहता रहा। मैं चकित खिचीं उसी के बहाव में बहती रही।


‘‘आज निश्चिंत हो गया मैं। खर्चा तो अब चल ही जायेगा हमारा। दोनों में से एक के पास खर्चा उठाने का रास्ता होना चाहिए। लो अब हो गया। हो गया न। बोलो। बोलो।’’ वह मुझे हिला हिला कर कहता रहा।
‘‘मैं यौन शुचिता को नहीं मानता। तू पवित्र है मेरे लिए। उतनी ही पवित्र जितनी हमेशा से थी।’’ उसने मुझे कंधे से पकड़ कर धीरे से कहा।
‘‘क्या कह रहे हो? कहने की क्या जरूरत है? मैं जानती हॅू तभी तो तुम पर भरोसा कर रही हॅू। और मुझे कभी लगा ही नहीं कि मैं कहीं से अपवित्र भी हो सकती हॅू? मैं हमेशा से पवित्र हॅू। बोलो। है न?’’ मैंने आवाज में बहुत भरोसा भर कर कहा। मानो उसके इस उद्गार में जो कुछ ऐसा था, जो कुछ मुझे ठीक सा नहीं लगा था, उसे भरोसे के इस जल से धो कर निर्मल कर दूंगी।
वह मेरे कंधे पर झुक आया। कितनी ही रात तक हम बैठे रहे। सरिता का सैकत कूल हमारा गवाह रहा। नदी का तट हमें दुलराता रहा। नदी का जल हमें शीतल करता रहा। नदी तट के पल्लव - पाखी हमारे लिए मंगल गान गाते रहे। मंद सुगंधित हवाएं श्रृंगार करती टहलती रही।
वह कहता रहा। मैं न जाने क्या सुनती रही! न जाने किस रस में भीगती रही! न जाने कौन से समंदर की अतल गहराई में तैरने लगी! मैं कुछ भी न समझने की तरह सिर हिलाती रही! भूली, भूली, ठहरी ठहरी, चुपचाप! जब तक कि शचीन्द्र ने मेरा पूरा चेहरा अपने हाथों में भर न लिया। मैं थोड़ा सा कुनमुनाई थी। मुझे याद है। तुमने थपका था। कोई मीटी, गुलगुले सी लोरी थी जैसे, मैं बेहोश सी थी। किसी जादू के वशीभूत। जादू ही था।
‘‘बोल कि लव आजाद हैं तेरे, बोल कि जुबाँ अब तक तेरी है........’’
किस बात का कौल भरवा रहा था वह मुझसे ? मैं तो कब की थकी, आज उसी की बाहों में लम्बा आराम पाना चाहती थी। 


मैंने आँखें बंद कर लीं। अपना सिर तुम्हारे कंधे पर टिका दिया। तुम्हारी हथेलियों में अपनी हथेली रख दी।
‘‘हाँ। तुम्हीं हो। तुम्हीं रहोगे। और कोई नहीं।’’ मैंने कहा था। पूरे मन, वचन, कर्म से।
इससे अधिक भी क्या कहा जाता!
इससे अधिक सुनने को भी क्या होना था!
हमारी गवाह नदी थी। पेड़ पल्लव थे। पाखी के मंगल गान थे। हवाएं भी थीं ही।
तुमने माना था। प्रकृति को साक्षी रख कर। मैंने माना था। बाकी सब आडम्बर था। 
‘‘तो चलो, सालाना चंदा भरो पहले।’’ तुमने हॅस कर मुझे खींचा था।
मैं भी हॅसी थी। ऐसे समय ऐसी बात! तुम्हें सूझ सकती थी! तुम हो ही ऐसे!
छात्र हित के लिए चंदा मांग सकते हो, कभी भी!
‘‘चंदा। हाँ, हाँ, क्यों नहीं।’’ मैंने एक दूसरी दुनिया से निकल कर कहा।


मुझे थोड़ा वक्त लगा था। मैं चेत गई थी। लजा उठी थी। यह क्या कर रही थी। इतने खुले आम। तुम मेरे लजा जाने पर हॅसे थे। हॅस कर मुझे खींचा था। मैं खिंच आई थी। तुम्हारे माथे की सलवटें कितनी सुंदर, मनोहर, भव्य, रमणीय.... या जो भी शब्द सटीक बैठता हो, बस, वैसी लग रही थीं। तुम्हें देख कर मुझे यकीन होने लगता था कि यह दुनिया बदल जाएगी एक दिन जरूर। एक दिन औरतें खुली हवा में सांस लेने लगेंगी। एक दिन मेरी माँ भी डरना भूल जाएगी। बहुत डरती है मेरी माँ, मैं तुम्हें एक दिन कहूंगी। डरती है इसलिए लड़कियों को और भी ज्यादा कड़ाई से चारदीवारी के अंदर रखना चाहती है। वह सबको खुश देखना चाहती है। सबको, मतलब जो घर में ताकतवर हैं, उन सबको। बाकी सब खुश रहने के दायरे से बहुत पीछे हैं, बहुत पीछे। हाशिए के कोर पर लटके हुए। उसके पास सहानुभूति से नहीं जाया जा सकता। वह इसे सहानुभति की बजाय अपना काम कुछ पूरा हुआ सा मान कर कब्जे की स्थिति को और बढ़ा देती है। हे प्रभु! सचमुच यह दुनिया बदले और सारी माएं भय मुक्त हो जाएं। मैं दुआ करती हॅू। किसी ईश्वर को नहीं जानती मैं। बस, दुआ जानती हूँ।



मैं तुमसे अपना सब सपना सांझा करना चाहती हॅू।
मैं तुम्हारे साथ मिल कर अपनी पुरानी, वही सदियों पुरानी लड़ाई में मजबूत होना चाहती हॅू।
दुनिया की मरम्मत करना चाहती हॅू।
चाहती हॅू कि मेरा यह सब तुम जान लो।
मेरा वह सब, जो अतीत से टूट टूट कर वर्तमान में भर भर आता है, वह सब।
कोई सुंदर शब्द आएं और छलछला कर तुम्हारे आगे बिखर जाएं। तुम उन्हें समेटो, सहेजो, रख लो अपने अन्तरमन की संदूकची में।
मैं कुछ न कहॅूं। सीधे शब्दों में कहना जितना मुश्किल है, यह बताना भी उतना ही। अब ऐसा क्या रह गया कि शब्दों की एक अलग छतरी तानी जाएं, तब कहीं हम भावनाओं के ताप, शीत और बरसात से बच जाएं।  अंधड़ हमें बहा न ले जाएं, इसके जतन में लगे रहें? अरे नहीं, मैं हाथ तुम्हारी तरफ बढ़ाउं तो सब बढ़ आएगा तुम्हारी ही ओर। पूरा का पूरा जीवन।
 


‘‘चाय।’’ तुमने धीरे से चाय का कुल्हड़ मुझे थमाया है।
कब ले आए मुझे इस ढाबे तक?
देखो, कैसे नींद में चली जा रही हॅू !
बादलों में तैरती सतरंगी पंखों वाली परी हो गयी हूँ!
‘‘संभालो अपने को। माथे का टेंशन पोंछो। नौकरी की खुशी में चाय का तो पेमेंट करो।’’
मैं शर्मिन्दा हो उठी। सचमुच कैसे भूल बैठी हूँ जग - अग सब!
तुम्हारा हाथ थामें चली आई हॅू निणर्य की इस डगर पर।
एक भविष्य भरा- पूरा, मेरे आगे आगे चल रहा है।


तुम्हारा पैनापन पानी की तरह बह रहा है। तुम्हारे तर्क चमचमाते हुए खिल रहे हैं। सूरज का ताप जैसे शीतल हो उठा है। मैं हूँ  तुम्हारे अहसास के समंदर में बिछलती और तुम हो अपनी बलिष्ठ देह में चमचमाते सुनहरे। अपने स्पर्श से दुलराते, सहलाते, झुकते, चूमते, छाते हुए.......
फिर, फिर, यह क्या ? इतने परेशान हो उठे हो? इतना संघर्ष कर रहे हो अपने आप से! अपने छोटे से अंग को इतना रगड़ रहे हो, पर वह है कि अपनी सुप्तावस्था से बाहर ही नहीं आता। भय से सिकुड़ कर बैठे किसी केचुए सा.... या शायद छिपकली के छू जाने से पैदा हुए अहसास जैसा.... या शायद..... मुझे सूझ नहीं रहा कि क्या कहूँ? कि क्या करूं?


सारा आलोड़न विलोड़न रूक गया है!
सारा शोर थम गया है!
तुम अपनी असमर्थता में काँप रहे हो!
अपनी जान भर जूझ रहे हो। आखिरकार थक कर गिर गए हो। हारे हुए भी और पस्त भी।
मैं न हारी, न थकी। फिर क्यो लग रहा है कि जैसे ढह गयी हॅू!
कोई रेत का टीला अभी अभी भरभरा कर गिर गया है!
कितनी ही देर तक कोई शब्द नहीं आया। आ ही नहीं पाया!
कुछ कहने को होती तो कहना रह जाता।
कैसे कहा जाए? यही संकट था।
कैसे सुना जाएगा? यही चिंता थी।


‘‘कब से?’’ बड़ी मुश्किल से मेरे मुंह से निकला है।
‘‘कुछ दिन से, कुछ महीनों से.... पता नहीं.....’’ तुम कह नहीं पा रहे हो। शब्द किसी अज्ञात लोक से चल कर आए लग रहे हैं। थके, परेशान, बेचारे शब्द।
‘‘तुमने बताया क्यों नहीं? अपना नहीं माना मुझे?’’ मैं इतनी कमजोर सी आवाज में कह रही हॅू जैसे दूर किसी खाई में खड़ी हॅू। जहाँ से बोलूंगी तो आवाज गूंज कर कई टुकड़ों में बिखर जाएगी। पता नहीं उस तक पहुँचेगी   भी कि नहीं, जिसे सुनाना था?



तुम्हारे कंधे पर सिर रख कर सो रही हॅू। सो रही हॅू या केवल सोने का अभिनय कर रही हॅू। तुम भी, शायद तुम भी सोने का अभिनय कर रहे हो। मुझे ऐसा ही लग रहा है। पता नहीं किस सागर तट पर तूफान तट बंध तोड़ आया था, पता नहीं किस नदी ने करवट ली थी कि सारा जल उमड़ा चला आ रहा था। इधर, इधर, मेरी आॅखों की खाली पड़ी जगह में। तुम्हारी आँखों की खाली पड़ी जगह में।
‘‘रो क्यो रही हो?’’ तुमने कहा नहीं था। बस, मैंने जान लिया था।
‘‘सब ठीक हो जाएगा।’’ यह भी नहीं कहा गया था।


कहीं हमारा आप, दूसरे में इस तरह मिल जाता है कि बहुत अनकहा भी कहा हो जाता है। बहुत कुछ हम जान लेते हैं। बिना किसी प्रयत्न के हम तक कितना कुछ पॅहुच जाता है। तुम तक भी पॅहुचता होगा?
तुमने मुझे खींच कर अपनी तरफ कर लिया है। अपने सीने में दुबका लिया है। सारी दुनिया से अलग कर के छिपा लिया है। तुम्हारे नयनों के नीर को मैंने स्नेह से पोंछा है। तुम्हें दुलराया है। यह कोई इतनी बड़ी बात नहीं है। देह के छोटे से सुख के लिए आदमी का इतना बड़ा प्रेम ठुकराया नहीं जा सकता।
मैंने उस रात, जितनी जितनी गहराई से तुम्हें प्यार कर सकती थी, किया था।


पूरी नदी कल कल छल छल बह रही थी और तुम किनारे खड़े थे।
मैं दया से, सहानुभूति से भर उठी हूँ।
‘‘ठीक हो जाएगा। आजकल इतना तो इलाज है। दुनिया भर के तेल और दवाएं....’’ यह भी मैंने मुश्किल से कहा था। डरते हुए कि कहीं तुम्हें हर्ट न कर दूँ।
‘‘तुम्हें कैसे पता?’’ अचानक तुम नींद से जागे थे। चकित से, हैरान से!
‘‘पढ़ा था कहीं?’’
‘‘कहाँ?’’
‘‘शायद किसी अखबार में।’’
‘‘ये सब पढ़ने की क्या जरूरत है?’’


यह मुझे अच्छा नहीं लग रहा है। इसमें इतना क्या चौंकना! रोज अखबार ऐसे विज्ञापनों से भरे रहते हैं। कोई भी पढ़ सकता है। मुझे कभी नहीं लगा कि इस पर नजर जाए तो नजर बचा ली जाए। जीवन की असलियत से तो नजर मिलाना होता है। बचाना नहीं। यही जानती थी। यही जीवन ने सिखाया था। सो पढ़ा हुआ जब तब का, अभी याद आ गया था और कह दिया गया था। शायद तुम्हें अच्छा नहीं लगा था। शायद तुम यह सुनना नहीं चाहते थे कि कोई लड़की यह सब भी पढ़ लेती है और पढ़ ही ली है, तो इस पर ज्ञान बघारे, यह तो अशोभन है, यही सोचा होगा। एकदम मेरी माँ की तरह। 
मैंने करवट कर लिया।
‘‘ऐसे ही कह दिया था।’’
तुमने समझ लिया कि कुछ है जो मुझे नहीं भाया है।
पर इतने बुझे हुए! तुम्हारी चहक! मैं उसे वापस पाना चाहती हॅू।

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स्वर्णमृग और झील मन की हलचल
(आत्मकथा - 4)  

(आधार प्रकाशन से शीघ्र प्रकाश्य अल्पना मिश्र के उपन्यास - ‘अन्हियारे तलछट में चमका’ का एक अंश)
       
 
शचीन्द्र! हर दिन तुम लौटते हो। तुम नहीं लौटते! तुम्हारा साया लौटता है। तुम्हारा हमशक्ल कोई! तुम्हारी तरह मुस्काराने की कोशिश करता। तुम्हारी तरह बहस करने का मूड बनाता। पर तुम्हारी तरह नहीं, कुछ छूटा हुआ, कुछ रूका हुआ, कुछ बीता हुआ सा.... उस साये से कुछ छूटा हुआ ......! मैं इंतजार में रूकी, इंतजार में ही रह जाती हॅू। मेरा इंतजार नहीं टूटता, खत्म ही नहीं होता!

तुम लौटते हो। थके हुए से! लौटते ही मुझ पर टूट पड़ते हो। अपने को अजमाते, अपने से संघर्ष करते। अपने से निराश होते। अपने से खीजते। अशक्त और कमजोर। पहले से ज्यादा। किसी भी तर्क से अलग। अपना तर्क गढ़ते। अपने बचाव का तर्क गढ़ते।
‘‘कमजोर हो गया हॅू। शायद इसी से। अब से फल फूल, दूध दही नियम से खाउंगा तो देखना सब ठीक हो जाएगा।’’

तुम्हारा ध्यान अपने पुरूषार्थ पर केन्द्रित हो कर रह गया है! तुम कुछ और सोच ही नहीं पाते। जब मन करता है, रहते हो, जब मन करता है, कहीं के लिए निकल पड़ते हो। कहाँ के लिए? कोई बता नहीं सकता। ठीक ठीक दोस्त मित्र भी नहीं बता पाते!
मैं ‘‘हाँ। ठीक है।‘‘ कहती हॅू और फल फूल के इंतजाम के लिए बैंक से पैसे निकालने लगती हॅू।
‘‘फिर भी एक बार डॉक्टर के पास चले जाते। मैं भी चलूंगी तुम्हारे साथ।‘‘ मैं सोचती हॅू कि तुम झिझक रहे होगे। मुझे भी साथ चलना चाहिए।
‘‘अच्छा, चला जाऊँगा।’’ तुम टालते हुए कहते हो।
‘‘कब? क्यों टाल रहे हो?’’ मैं सचमुच पीछे पड़ती हॅू।

‘‘क्यों मेरी जान खा रही हो! खा तो रहा हूँ फल, सब्जियाँ। थोड़ी कमजोरी है, कह तो दिया। थोड़ा इंतजार नहीं कर सकती।’’ तुमने झल्ला कर कहा है। और भी बहुत कुछ कहा है। मुझे सेक्स के लिए तड़पती औरत की तरह व्याख्यायित कर दिया है। मुझे किस हद तक हर्ट करना चाहते हो? समझ में नहीं आता। जानती हॅू, तुम नाराज हो। मुझसे नाराज हो। अपने आप से नाराज हो।
हाँ, मुझमें भी अतृप्ति की सागरिकाएं हिलोरे लेती हैं। देह जगती है मेरी भी। तुम्हारा छूना, सहलाना, चूमना बेचैन बनाता है मुझे भी। हाड़ मांस की बनी हॅू मैं भी। प्रेम के नाम पर कुर्बान होती हॅू। सहती हॅू। तुम्हें भी सहती हॅू। तुम यह जानते ही कहाँ  हो! तुम इसे जानना चाहते ही कहाँ हो?


एक दिन और लौटते हो तुम। हाथ में थैला लिए। इससे पहले कभी कुछ लाए नहीं। कुछ तुम अपने लिए ही लाए होगे। थैला मेरी ओर फेंक कर मुँह हाथ धोने चले गए हो। थैला मेरी ओर आया है तो मैं उसे खोल देती हॅू। बीयर कैन! नमकीन!
हैरानी मेरी आँखों में उतर आती है! हो सकता है दोस्तों के लिए हो।
‘‘क्या पार्टी का इरादा है?’’ हैरानी मेरे शब्दों से झर रही है।

‘‘कुछ बना सकोगी? पकौड़े या और कुछ तल लेती, जो आसानी से बन जाए।’’ मेरी बात पर तुम्हारा ध्यान नहीं है। तुम मॅुह हाथ धो कर निकल आए हो।
‘‘कोई आएगा? मतलब कुछ मित्रगण?’’
‘‘नहीं बाबा, ये मेरे और तुम्हारे लिए। आज हमारा दिन होगा।’’ तुम दुलरा कर कहते हो। खुश दिखने की कोशिश कर रहे हो। जल्दी जल्दी बिस्तर की चादर ठीक कर रहे हो।
‘‘तुम्हारी यह कंचन काया! किसी जादूगरनी की तरह बांधती है! उफ! मैं इसे पूरा.....’’
‘‘बहुत रोमांटिक हो रहे हो। इस सबसे कुछ नहीं होता। यह ठीक तरीका नहीं है। अपने को भूल कर अपने को पाने का यह तरीका ठीक नहीं लग रहा है।’’

‘‘तुम भी! हर समय बहस करती हो। लेकिन बहस करती हो तो भी कितनी अच्छी लगती हो। छोटी सी फुदकती, चंचल सी, हिरनी सी। कौन इस मर न मिटेगा मेरी जान!’’ तुम्हारा ध्यान मेरी बातों पर नहीं है। 
‘‘लेकिन मैं तो नहीं पीती हॅू। तुम जानते हो।’’ मैं अब तक हैरान हॅू। अब तक परेशान हॅू। अब तक समझ में ठीक ठीक नहीं आ रहा कि क्या होने होने को है?
‘‘तो आज पी लेना। मेरे साथ।’’ तुम हतोत्साहित नहीं हो रहे हो।
‘‘आज क्यो? जब मैंने कहा कि....’’
‘‘हर बात का बतंगड़ बनाना जरूरी है? अपने तर्क बाद में देना। अभी तो इधर आओ। आज तुम्हें सजा कर यहाँ बैठाऊँगा। मैं करूंगा सब कुछ आज। समझी मेरी सोने की हिरनी।’’
तुमने तकिए किनारे रख दिए हैं। एक अखबार बीच में रखा है। अपने हाथ से दो स्टील की गिलास उठा लाए हो। शीशे की होती तो शीशे की लाते। जो है, उससे काम चला रहे हो। 
‘‘तुम अकेले ही करो यह सब। प्लीज मुझे छोड़ दो।’’ मैं डर गयी हॅू। डर गयी हॅू कि अब आगे न जाने क्या झेलना पड़े?

‘‘तुम्हारे नखरे से मैं तंग आ गया हॅू। हर बात में तमाशा करती हो।’’ तुम गुस्सा गए हो।
‘‘किसी ने बताया है कि ड्रिंक करने से एकदम असर पड़ता है। आज देखना तुम।’’ तुम मेरे पास आ कर खड़े हो। तुम नहीं कहते यह, शैतान की आवाज आती है! कहीं और से! दूर से! मुझसे कोसों दूर! 
‘‘नहीं।’’ मैं डर जाती हॅू। कितने हिंसक होते जा रहे हो तुम! और अब यह ड्रिंक कर के तो न जाने कितने पाशविक हो उठोगे? मैं यह नहीं झेल सकती। मेरी देह पर उभरी नीली चित्रकारी मुझे भय से हिला रही है।
‘‘चलो आओ।’’ तुम मुझे बांहों से घेर कर ले जाना चाहते हो। उधर, जिधर तुमने अपना कामना महल सजाया है।

तुम्हारा बाँहों से घेरना अच्छा लगता है। हर बार इसी भूल में चली जाती हॅू तुम्हारे लाक्षा गृह में। वहाँ से जली हुई मेरी लाश निकलती है। न जाने कितने दिन तक काँपती मैं काम धाम कर पाने में असमर्थ अपने आप पर रोती हॅू और तुम अपने आप में त्रस्त- पस्त। मुझसे नजरें बचाते, छिपते, जाने कहाँ के लिए निकल पड़ते हो।
‘नहीं, मृगतृष्णा है। मैं इससे अधिक में नहीं जा सकती। प्रयोगों के लिए मेरी देह नहीं बनी है। मैं अपने आप में कितनी छोटी होती जा रही हॅू।’



‘‘क्या सोचने लगी? आज तुम्हें निराश नहीं करूंगा।’’ तुम खींच रहे हो। मैं हिल भी नहीं रही।
‘‘नहीं। रहने दो। मेरा मन नहीं है। इतना तो समझो।’’ मैं अपने को छुड़ाने की कोशिश करती हॅू। 
‘‘नहीं क्या? एक मौका इसके लिए भी सही। तुम सपोर्ट नहीं करती, यही दिक्कत है।’’
तुम बहुत दयनीय हो उठे हो। इस दयनीयता के बावजूद मुझे कह रहे हो कि मैं सपोर्ट नहीं करती। मरती हॅू हर रात एक अलग मौत, जीने की किसी उम्मीद में ही तो।
‘‘तुम्हारे अनुभवों का लाभ नहीं ले पा रहा हॅू। आज बताओ? कैसा था पहलेवाला? बोलो? ’’    तुमने मुझे धक्का दे कर गिरा दिया है।
‘‘तुम बैठोगी यहाँ तब तक, जब तक कि मैं पीउंगा। समझी।’’

तुम किसी पाषाण से भी ज्यादा मिर्मम हो उठे हो। इस क्षण, तुम वो हो ही नहीं, जिसे मैंने चाहा था। तुम कुछ और हो। मेरे पिछले अनुभवों को जानने की भयानक इच्छा रखने वाले। यह तुम्हारा मनोरंजन हो सकता है! यह तुम्हें उकसा सकता है! पर क्या सचमुच ही तुम जानना चाहते हो कि कैसा था मेरा पति? कब से मैं तुम्हें बताना चाहती थी, पर अब इसलिए, बिल्कुल नहीं। मेरा दुख इस काम आए, मैं मर ही न जाउं, इससे पहले। मेरा प्रिय यह कह दे कि...... तो जीते जी मर जाउं मैं! हे प्रभु! मैं यह दिन देखने के लिए बची ही क्यों रह गयी? इसीलिए इतना जोखिम उठा कर भाग आई थी? इसीलिए एक नई जिंदगी जीने का साहस कर रही थी?
नहीं, मेरी आँखों से एक भी मोती नहीं टपकेगा! नहीं रोउंगी मैं! नहीं। जीऊँगी मैं। नहीं करूंगी, जो मैं नहीं चाहती। मैं उठ कर बैठ गयी हूँ। 

 ‘‘मुझसे नहीं हो सकेगा।’’ मैंने अपनी तरह की निरीहता में कहा है। आखिरी प्रार्थना की तरह।
‘‘मैं तुम्हें जिबह तो करने जा नहीं रहा। ऐसे कह रही हो।’’ तुम मुझे खींच कर अपनी जाँघों पर लिटाना चाहते हो।
तुम्हारी गोद, जिसमें चैन से सोने का सपना मेरा, बस, सपना ही है। इसे अब मैं पूरा नहीं करना चाहती।
‘‘उठो, गुड गर्ल। लो, नमकीन लो। मूड ठीक करो।’’
नमकीन की प्लेट उठा कर तुम मेरी तरफ करते हो। तुम्हारा इस तरह बीयर पीना मुझे बड़ा बेशर्म सा लगता है। इससे पहले कभी जब तुम्हें दोस्तों के साथ पीते देखा तो ऐसा खराब नहीं लगा था।
‘‘अच्छा, छोड़ो तो। लाती हॅू।’’ बचने का कोई उपाय सोचते हुए मैं कहती हॅू।


मैं छूटती हॅू तुमसे। कुछ लाने के लिए रसोई तक जाती हॅू। कोई डिब्बा उठा कर खोलती रखती हॅू।  कुछ सोचती हॅू पल भर। फिर एकाएक अपना पर्स उठाती हॅू और निकल जाती हॅू घर से, पता नहीं कहाँ के लिए!
तुम मुझे ढूंढ लोगे, मुझे पता था। लेने आ जाओगे, मुझे पता था। वही हुआ। वही किया तुमने। मेरी सहेली सुरभि के घर चले आए। रात के दो बजे, बदहवास से जैसे तुम्हारा कोई जिगर का टुकड़ा खो गया हो। आँखों से गंगा जमुना उमड़ी चली आ रही हैं। सुरभि की आँखों में तुम नहीं, मैं दोषी बन गयी हॅू। निष्ठुर, निर्मम। तुम भावुक प्रेमी के प्रतीक हो! तुम हो ही ऐसे! सारे सिक्के अपने हक में भुनाने की कला वाले।
‘‘तुम शचीन्द्र को समझने की कोशिश करो बिट्टो। भागने से समस्या हल नहीं होती।’’ सुरभि मुझे समझा रही है। मैंने सोचा था वह शचीन्द्र को समझायेगी!

‘‘तुम उसके साथ जाओ, उसे प्यार दो। मेरा पति अगर भूल कर भी मेरे लिए एक आॅसू टपका देता तो समझो मैं तो बिना मोल बिक जाती। मगर कमबख्त, उसने आज तक प्यार का इजहार तक न किया। तुम तो भाग्य शाली हो। ऐसा प्यार करने वाला मिला है।’’ सुरभि मुझ पर नाराज हो रही है। मुझे शचीन्द्र के साथ जाने के लिए समझा रही है।
‘‘अगर मुझसे परेशान हो तो मुझे छोड़ क्यों नहीं देते।’’ मैं दुखी हो कर कहती हॅू।

तुम तड़प उठे हो। तुम्हारी आँखें कह रही हैं। मैं इसके आगे हारती हॅू हर बार। तुम्हें मनाती हूँ। सोचती थी कि तुम मनाओगे। पर अब सोचती हॅू कि यह मनाना भी एक कोशिश ही थी। जीवन के मरम्मत की। मनाती हूँ और जैसे -तैसे प्रयत्नपूर्वक डॉक्टर के पास ले जाती हॅू। देखो, मैंने खुद को ही कैसे एक और खर्चे में झोंक दिया है! प्रेम के नाम पर। जीने की इच्छा के नाम पर।


मैं तुम्हें वापस जीवन में देखना चाहती हॅू। इसीलिए बार बार कोशिश करती हॅू। प्यार से तुम्हारे कंधे पर टिक कर कहती हॅू कि ‘‘ जीवन भर भागते रहे हो, दौड़ते रहे हो, लड़ते की कोशिश में लगे रहे हो, पर लड़ाई वैसी नहीं बनी, जैसा कि तुम चाहते थे। है न!’’

तुम आकाश को देख रहे हो। मुझसे इतने अलग होते हुए। दूर होते हुए। देखो कि मैं फिर कोशिश करती हूँ।
कहना जहाँ छोड़ा था, वहीं से पकड़ती हॅू-‘‘ तुम सोचते हो कि आज तक जो भी कोशिश तुमने किया, उसका कुछ भी हासिल नहीं। छात्र राजनीति के साथ जुड़े तो वहाँ भी बहुत कुछ कर पाना संभव आज नहीं रह गया। लेकिन जीवन को ऐसे देखना ठीक तो नहीं है। जो सही काम होते हैं, उनका असर कहीं न कहीं तक जाता है। वह एकदम खत्म नहीं होता। आज जरूर देश में ऐसे हालात बन गए हैं कि बड़ी लड़ाइयाँ नहीं बन पा रही हैं पर लगातार चलती छोटी लड़ाइयाँ भी बड़ी लड़ाई की संभावना को बचाए रखती हैं। और तुम, सुनो, उस अपने छात्र हित वाले काम से क्यों विरत हो रहे हो? वहीं तो तुम हो! कुछ बदलने, कुछ ठीक ठाक कर पाने की कोशिश के साथ हो! तुम उससे अलग नहीं हो सकते। तुम फिर जाओ! फिर से ठीक करो। फिर से शुरू करो। फिर से संगठित करो। यही एक तरीका है हमारे पास, तुम्हारे पास.....’’

मेरी आवाज, मेरी सब ध्वनियाँ किसी बंद दरवाजे से टकरा कर लौट रही हैं।
‘‘हो गया उपदेश! परेशान कर के रख दिया है। चैन से दो घड़ी बैठ भी नहीं सकता!’’
तुमने मुझे जोर का धक्का दिया। मैं गिरते गिरते बची।

‘‘क्या समझ रही हो अपने को? हाँ! पैसा कमा रही हो तो जो मर्जी बोलोगी? हाँ ! मैं कुछ नहीं हॅू न! यही साबित करना चाहती हो!’’ तुम तैश में खुद को भूल गए हो। एक साथ मुझे हिलाते हुए, न जाने कितने झापड़, घूसे, लात जमा रहे हो। मैं बैठी हुई, गिरती हुई, रोकती हुई, रोती हुई......
तुम गुस्से में चले गए हो। कहीं, उस जगह की तलाश में शायद, जहाँ सुकून हो!
मुझे इसका भरोसा नहीं है। सुकून का भरोसा!
सचमुच मैं यह कहाँ आ पहुँची हॅू! नरक क्या यही है?
नरक! जिसके लिए मेरी माँ हर वक्त चेताती रहती थी! जिसका एक हिस्सा झेल कर मैं भाग आई थी। जिसका दूसरा हिस्सा झेलती मैं यहाँ बैठी हॅू! जिसका कोई तीसरा, चौथा हिस्सा भी होगा!


मैं भय से काँप रही हॅू।
मैं चोट से काँप रही हॅू।
धीरे धीरे उठती हॅू और कभी एक हाथ से अपना बाल ठीक करते, कभी एक हाथ से अपना पेट, बाँह, छाती सहलाते, डॉक्टर के पास चली गयी हॅू।
डॉक्टर से कहूंगी कि सीढि़यों से फिर आज गिर गयी हॅू।
.....................
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शचीन्द्र! तुम लौटते हो। फल खाते हो। अपनी दवा समयानुसार लेते हो। तमाम चेकअप कराते हो। फिर प्रयोग करते हो।
डॉक्टर, दवा, प्रयोग.... यही रह गया है तुम्हारे जीवन का केन्द्र!
मित्रता का हल्का सा तंतु भी नहीं बचा!
यह क्या, मशीन बनते जा रहे हो तुम!
यही, इतना भर तो जीवन नहीं होता। तुम्हें समझा नहीं पाती हॅू।
ठीक है मैंने कहा था कि तुम मुझे संपूर्णता में चाहिए। पर यही इतना भर छूट जाए तो ..... देह के पार भी चाह लेती तुम्हें। पर तुम! तुम हो कि इस देह से पार जाना ही नहीं चाहते! यहीं अटक गए हो! यहीं साबित करना है तुम्हें अपने आप को!

मैं सुखी हॅू कि दुखी हूँ? बीमार हॅू कि आराम में हॅू? मेरे पास पैसा है कि नहीं है? एक छोटी सी स्टेनो की नौकरी में पैसा होता ही कितना है? मैं अपने लिए कपड़े, किताबें खरीद पाती हॅू कि नहीं? मैं फल फूल, दूध, दही खाती हॅू कि नहीं?
मैं तुम्हारे मायने के किसी दायरे में हॅू भी ?

एक बार फिर मेरी लड़ाई मेरी माँ से ठन गई है। उनसे कहूंगी तो हॅसेंगी, मजाक उड़ायेंगी।
‘‘गई थी न मनमानी करने, अब भोगो।’’ ऐसा कुछ कह सकती थीं। पर भीतर से कहीं कराह उठेंगी। आखिर जो वे नहीं चाहती थीं, वही हुआ। उन्होंने ही कहा था कि औरत कमाए तो क्या? पैसा तो उसी के अधिकार में चला जाता है, जिसके कब्जे में औरत होती है। तो क्या मैं....?
नहीं, कब्जा नहीं, मैं वश में नहीं हूँ किसी के।
अरे, मैं मान क्यों नहीं रही कि मैं वश में हो गयी हॅू।
शचीन्द्र के वश में! - ?
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