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सुनील कुमार शर्मा की बाल कविताएं

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  सुनील कुमार शर्मा आमतौर पर बच्चों की  कविताएं जितनी सहज दिखती हैं उतनी होती नहीं। बच्चों के लिए कविताएं लिखना सामान्यतया आसान नहीं होता। इसके लिए जरूरत होती है ऐसे कथ्य की जो बच्चों के मन को भा जाए। इसके लिए जरूरत होती है ऐसे शिल्प की जो मस्तिष्क पर टंकित हो जाए। और बच्चों के मन मस्तिष्क को समझ पाना उतना आसान कहां होता है। लेकिन कवि जो कल्पना में रवि तक पहुंच जाते हैं यह कठिन काम भी अपने हुनर से आसान बना डालते हैं। सुनील कुमार शर्मा एक जाने पहचाने कवि तो हैं ही, उन्होंने कुछ बाल कविताएं भी लिखी हैं। ये सहज तो हैं ही, इनका शिल्प भी बेहतरीन है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं  सुनील कुमार शर्मा की बाल कविताएं। सुनील कुमार शर्मा की बाल कविताएं अगर मैं जादूगर होता तो  अगर मैं जादूगर होता तो  बादल रंगों से भर देता  छड़ी घुमा कर एक मिनट में  सूरज को ठंडा कर देता  नदी उड़ाता आसमान में  बर्फ़ गिराता मैं रेतों पर  बारिश करवा देता कुल्फी   चॉकलेट की भी खेतों पर  डांस करा देता पेड़ों से  फूलों से मैं गीत सुनात...

खालिद जावेद के उपन्यास पर पवन करण की समीक्षा

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किताबें इस मायने में महत्त्वपूर्ण होती हैं कि यह पाठक के मन मस्तिष्क को मथ कर रख देती हैं और उसकी दृष्टि और जीवन को बदल कर रख देती हैं। कई किताबों का प्रभाव तो हमारे मानस पर लम्बे समय तक बना रहता है। खालिद जावेद का उपन्यास 'नेमत खाना' हाल ही में हिन्दी में अनुदित हो कर प्रकाशित हुआ है। इस महत्त्वपूर्ण उपन्यास को पढ़ते हुए कवि पवन करण लिखते हैं ' क्या आपको पता है कि आपके जीवन की सबसे नजदीकी, साफ और जरूरी जगहों पर कितनी गंदगी सांसे ले रही है। नहीं, तो हिम्मत जुटाइये और अपने भीतर के इस बजबजाते-बुलबुलाते कीचड़ बन कर ठहरे, सिकुड़ते-फैलते और लगातार सड़ते हुए उस पानी से मिलिए, जिसे आप खुद ही अपने भीतर बनाये रखते हैं। 'नेमत ख़ाना' पढ़े बिना खुद के इस रूप से मिल पाना संभव नहीं।' आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं खालिद जावेद के उपन्यास  'नेमत ख़ाना' पर पवन करण की समीक्षा। जीवन का रुदन भी नहीं, बस दृष्टि है ' नेमत ख़ाना' पवन करण  हर नींद एक कब्र है यह और बात है कि इसके पहिए बार-बार दलदल में फंस जाते हैं और सफर टल जाता है- खालिद जावेद का उर्दू से हिंदी में अनु...

कँवल भारती का आलेख 'संविधान, संविधानवाद और आंबेडकर'

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  कँवल भारती विगत 27 मार्च 2025 को इलाहाबाद में दलित आलोचक  कँवल भारती द्वारा  सत्यप्रकाश मिश्र स्मृति व्याख्यानमाला के अन्तर्गत एक महत्त्वपूर्ण  व्याख्यान  दिया गया। व्याख्यान का विषय था  "संविधान, संविधानवाद और डा. आंबेडकर"। इन तीनों बिंदुओं की तह में जाते हुए भारती जी ने उस लोकतन्त्र की चर्चा की जो संविधान का मूल उद्देश्य है। संविधानवाद सैद्धांतिकी का आधार बनाता है और अंबेडकर संविधान के उन पहलुओं की चर्चा करते हैं जिससे एक भेदभाव रहित समाज की स्थापना की जा सके।  कँवल भारती इस व्याख्यान में बताते हैं कि ' संविधान और संविधानवाद के बीच एक महीन सी नहीं, मोटी सी लकीर है। संविधान समाज का निर्माण नहीं करता। वह समाज को न नैतिक समाज बनाता है, और न अनैतिक। वह सिर्फ समाज को नियंत्रित करता है। लेकिन संविधानवाद में किसी ख़ास तरह के समाज का निर्माण करने की भावना निहित होती है। इसलिए अच्छे या बुरे संविधान का निर्माण करने के लिए जो चीज़ प्रेरित करती है, वह निस्संदेह संविधानवाद है। यह एक संवैधानिक धारणा, दर्शन या वैचारिकी का नाम है।' तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं...

अमित कुमार सिंह का संस्मरण 'मन का उदास कोना और पिता की तस्वीर'

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  अमित कुमार सिंह  पिता पुत्र का सम्बन्ध दुनिया का सबसे खूबसूरत सम्बन्ध होता है। इस सम्बन्ध की खुशबू बिल्कुल अपनी अलग तरह की और बिलकुल अपना अलग अंदाज लिए होती है। जब तक पिता होते हैं तब तक पुत्र अपने को उस वृक्ष की घनी छांव में महसूस करता है जो हमेशा बेहतर ही करता रहता है।  लेकिन एक दिन जब पिता अतीत हो जाते हैं पुत्र की दुनिया पूरी तरह सूनी हो जाती है। सब कुछ वीराना और खाली खाली लगने लगता है। उसे पहली बार महसूस होता है कि वह वाकई अकेला हो गया है। पिता के न होने से जो जगह रिक्त होती है उसे दुनिया का  कोई  सम्बन्ध और शब्द आजीवन भर नहीं पता।यानी वह जगह हमेशा के लिए रिक्त ही छूट जाती है।  अमित कुमार सिंह हाल में ही दुःख के इस दौर से गुजरे हैं। अपनी अकथनीय अनुभूतियों को उन्होंने संस्मरणबद्ध करने की कोशिश की है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं  अमित कुमार सिंह का संस्मरण 'मन का उदास कोना और पिता की तस्वीर'। 'मन का उदास कोना और पिता की तस्वीर' अमित कुमार सिंह गहन दुःख में अंततः मौन ही शेष बचता है। एक दिन पूर्व हुई पिता की मृत्यु से मानसिक स्तर पर अभी भी कि...