रविवार, 31 मार्च 2013

अमीर चन्द वैश्य





गीतकार सुभाष वशिष्ठ का अभी हाल ही में एक नवगीत  संकलन बना रह ज़ख्म तू ताजा आया  है। वरिष्ठ आलोचक अमीर चन्द्र वैश्य ने इस संकलन पर एक समीक्षा लिखी है जिसे हम पहली बार के पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं।

 
निजी अनुभूतियों का साधारणीकरण
  
मेरे सामने एक नवगीत  संकलन है। ‘बना रह ज़ख्म तू ताजा‘। गीतकार हैं सुभाष वसिष्ठ। मेरे अंतरंग मित्र और परम आत्मीय। पारिवारिक सम्बन्धों से जुड़े हुए। अपने नाम के अनुरूप मधुर भाषी और निर्भीक वक्ता। महान् नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के समान। अपना जीवन-पथ स्वयं निर्मित करने वाले।

ऐसे सुभाष  वसिष्ठ से मेरा मौन साक्षात्कार  सन् 1974 में हुआ था, जब वह ने0मे0शि0 ना0 दास (पी0जी0) कालेज, बदायूँ में हिन्दी प्रवक्ता पद के लिए प्रत्याशी थे। उस समय विभाग में प्रवक्ता पद के लिए दो स्थान रिक्त थे। मैं भी प्रत्याशी था। विभिन्न वेश-भूषा में सजे हुए अनेक प्रत्याशी। मैं सबके चहरे पढ़ रहा था। उनकी बातें सुन रहा था। एक सुदर्शन युवक हँसमुख शैली में सभी से बतिया रहा था। बातें नई कहानी के बारे में हो रही थीं शायद। वह सुदर्शन युवक आकर्षक मुस्कान से सब को आकृष्ट करके चर्चा कर रहा था कि कुछ ऐसी नई कहानियाँ हैं, जिनमें प्रेमी-प्रेमिका टेलीफोन पर प्यार का इज़हार किया करते हैं। उन दिनों मोबाइल का प्रचलन नहीं था। मैं उसकी बातें और अन्य प्रत्याशियों की बातें ध्यान से सुन रहा था। अचानक अभास हुआ कि इस प्रत्याशी का चयन हो जाएगा। ऐसा ही हुआ। दोनों विशेषज्ञों ने अपने-अपने प्रत्याशी का चयन कर लिया।

तो दोनों  प्रत्याशियों में सुभाष  वसिष्ठ दिल्ली से पधारे थे और दूसरे श्रीकान्त मिश्र बिहार से। यदि वसिष्ठ जी अपने साथ दिल्ली की आधुनिक संस्कृति लेकर आए थे तो मिश्र  जी हिन्दी के साथ-साथ संस्कृत  का प्रचुर ज्ञान लेकर।  परम्परावादी ब्राह्मण के रूप में।

संयोग ऐसा  हुआ कि वसिष्ठ जी बदायूँ आने  के साथ-साथ एक प्रकाशित नवगीत  की ख्याति लेकर आए थे। नवगीत  तत्कालीन व्यावसायिक पत्रिका  ‘धर्मयुग‘ मे छपा था। उन दिनों डॉ0 उर्मिलेश गीतकार के रूप में ख्याति के सोपानों पर चढ़ रहे थे। गीतकार उर्मिलेश ने नवागत गीतकार सुभाष वसिष्ठ का स्वागत खुले दिल से स्वागत किया। परिचय की गाँठ बँध गई और परिचय प्रीति में परिवर्तित हो गया।



डॉ0 सुभाष  वसिष्ठ के बदायूँ आने से पूर्व  डॉ0 उर्मिलेश कवि विशेष  रूप से गीतकार के रूप में  ख्याति प्राप्त करने लगे  थे। उन दिनों ने0मे0शि0ना0 दास कालेज, बदायूँ के हिन्दी विभाग में डॉ0 ब्रजेन्द्र अवस्थी अध्यक्ष थे। वीर रस के प्रसिद्ध कवि, जो कवि-सम्मेलनों के मंच से श्रोताओं को प्रभावित करते थे। अपने ओजस्वी स्वर से। अपनी आशु कविता से। डॉ0 उर्मिलेश को डॉ0 अवस्थी का शिष्य समझा जाता था, कवि के रूप में भी। लेकिन वास्तविकता यह थी कि वह अपने पिता (स्व0) भूपराम शर्मा ‘भूप‘ से कविता के संस्कार ले कर आया था। वह नीरज के समान गीतकार के रूप में ‘भारत-प्रसिद्ध‘ होना चाहता था। संयोग से डॉ0 सुभाष वसिष्ठ जैसा गीतकार मित्र अनायास उस से जुड़ गया और उस ने अँग्रेजी विभाग में सेवारत डॉ0 मोहदत्त शर्मा ‘साथी‘ को भी स्वयं से जोड़ लिया। वह डॉ0 ब्रजेन्द्र अवस्थी से अच्छे कवि थे। बुलन्द आवाज में प्रभावपूर्ण काव्य-पाठ किया करते थे। कथा-आलोचक प्रो0 मधुरेश साथी जी की कविता की प्रशंसा मुक्त कण्ठ से किया करते थे, लेकिन डॉ0 अवस्थी की तुकबन्दी प्रधान कविता के कटु आलोचक थे। दोनों में 36 का आँकड़ा था।

डॉ0 उर्मिलेश ने अपनी महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए एक साहित्यिक  संस्था गठित की। उस का नाम  था शायद ‘अंचला‘। इसी संस्था की ओर से बदायूँ नगर पालिका के मैदान में विराट् कवि-सम्मेलन का आयोजन किया गया। कवि-सम्मेलन के संचालक डॉ0 उर्मिलेश ने पद्य में संचालन करते हुए सुभाष वसिष्ठ को गीत-प्रस्तुति के लिए मंच पर आमंत्रित किया। मुझे याद आ रहा है कि उस कवि-सम्मेलन में सुभाष वसिष्ठ नवगीत ‘धूप की गजल‘ का प्रभावपूर्ण पाठ सस्वर किया था। उस प्रस्तुति से मैं भी प्रभावित हुआ था।

दो-तीन  साल के बाद ही डॉ0 उर्मिलेश से डॉ0 सुभाष वसिष्ठ का मोह-भंग  हो गया। कवि-सम्मेलनी व्यावसायिकता के कारण। प्रो0 के0 वी0 सिंह के ‘योग्य शिष्य’ सुभाष वसिष्ठ ने अपनी अभिरूचि के अनुरूप ‘रंगायन‘ नामक नाट्य संस्था का गठन किया और नाटक प्रेमी शौकिया प्राध्यापकों एवं छात्रों को स्वयं से जोड़कर रंग-कर्म प्रारम्भ किया। प्रेमचन्द जन्म-शती के अवसर पर बदायूँ क्लब के खुले परिसार में ‘होरी‘ का मंचन किया गया। नाट्य रूपान्तरकार विष्णु प्रभाकर की उपस्थिति के समक्ष। यह अभूतपूर्व नाट्य मंचन था। सैट बनाए गए थे। अंधकार और प्रकाश का प्रयोग किया गया था। दृश्य परिवर्तन के लिए। इसी क्रम में प्रति वर्ष एक सोद्देश्य नाटक का मंचन किया जाने लगा। रंगायन की प्रस्तुतियों ने कवि-सम्मेलनों के मनोरंजन से मुक्त भी किया। 

समय समय  पर नुक्कड़ नाटक भी प्रस्तुत किए जाते थे। विना किसी दान के। बिना किसी सरकारी आर्थिक अनुदान के। टिकटों की विक्री से प्राप्त धनराशि से नाट्य-मंचन किया जाता था।  इसके अलावा ज0ले0सं0 की बदायूँ इकाई की ओर साहित्यिक गोष्ठियों  का आयोजन भी डॉ0 सुभाष वसिष्ठ द्वारा किया जाता था। प्रत्येक गोष्ठी में अन्य जनों के अलावा  प्रो0 मधुरेश सदैव उपस्थित  रहते थे और वह अध्यक्ष पद की गरिमा बढ़ाया करते थे।  इन गोष्ठियों में सुभाष  वसिष्ठ ने अपने गीतों का वाचन कभी नहीं किया लेकिन गीतकार वीरेन्द्र मिश्र पर गोष्ठी का आयोजन करवाया था। ‘अपर मानप्रद आप अमानी।‘ वह अपने संकलन के प्रकाशन के प्रति उदासीन रहे।

ऐेसे सुभाष  वसिष्ठ गीत-रचना निरन्तर  करते रहे। समय-समय पर आयोजित कवि-गोष्ठियों में वह गीतो का सस्वर वाचन और कविताओं  का पाठ भी किया करते थे।  उनका एक गीत श्रोतोओं द्वारा बहुत पसंद किया जाता था - “भूल गए/राग-रंग/भूल गए छिकड़ी/तीन चीजें याद रही/नोन-तेल लकड़ी।“



इन संस्मरणों  से यह बात स्पष्ट हो रही  है कि सुभाष वसिष्ठ ने अपनी गीत-सर्जना को बाजारू होने से बचाया। स्वयं को पूँजी  की विकृतियों से दूर रखने का प्रशंसनीय प्रयास किया।  आचरण की ऐसी संस्कृति की झलक  सुभाष वसिष्ठ के गीतों  में परिलक्षित होती है।  उनके नवगीत लोकोन्मुखी हैं, लेकिन अपने ढंग से। उनके गीतों में लोक-रंग भले ही कम हो, लेकिन लोक-विमुखता नहीं है। वह स्वयं स्वीकारते हैं -“वस्तुतः नवगीत जैसे-जैसे आगे बढ़ा है, वह केवल आंचलिकता अथवा निजी अनुभूतियों की रोमानी प्रवृत्ति तक ही सीमित नहीं रह गया, बल्कि वह पूर्णतः यथार्थ जीवन की त्रासदी और उत्पीड़न को अभिव्यक्त करने वाला आधुनिकतावादी गीत के रूप में स्थापित हुआ।“

(नवनीत: स्वांतत्रयोत्तर  हिन्दी गीति-काव्य का  एक विस्तृत आयाम) इस अप्रकाशित  आलेख से उद्धृत उपर्युक्त विशेषण पद ‘आधुनिकतावादी‘ का आशय ‘आधुनिकतावाद‘ न होकर वह प्रतिरोधमूलक भाव है, जो सच्ची आधुनिकता का उज्ज्वल लक्षण है।

समीक्ष्य संकलन  में डॉ0 वसिष्ठ ने लिखा है - “प्रस्तुत संग्रह के गीतों का रचनाकाल सन् 1970 से सन् 1990 तक का है। क्रम, काल-क्रमानुसार नहीं है, गीत की प्रकृति वस्तु के आधार पर है। एक बात मैं स्पष्ट कर दूँ कि इनमें से कुछ गीत विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में, सन् 1990 के बाद भी प्रकाशित हुए हैं, लेकिन पूरी जिम्मेदारी से कह रहा हूँ कि उनका रचनाकाल 1970 के बाद और 1990 से पूर्व का ही है।“ (पृ0 11)

यह नवगीत  संग्रह है। गीत काव्य  की लोकप्रिय विधा है। ग्राम-गीतों  से ही साहित्यिक गीतों  का विकास हुआ है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपने ‘इतिहास‘ में ठीक लिखा है कि ‘सूर-सागर‘ पहले से चली आ रही परम्परा का विकास प्रतीत होता है। भक्तिकालीन गीति-काव्य के बाद छायावादी कवियों - प्रसाद-निराला-पंत और महादेवी वर्मा ने गीत विधा को अभिनव का रूप प्रदान किया। निराला और महादेवी के गीतों की प्रशंसा प्रायः सभी आलोचकों ने की है। यदि निराला ने दुर्बोध गीत रचे हैं तो सहज बोधगम्य गीत भी। उनके परवर्ती लघु गीतों की अन्तर्वस्तु और ‘कथन-भंगिमा‘ दोनों पूर्ववर्ती गीतों भिन्न हैं। बच्चन ने सहज बोधगम्य गीत रच कर इस विधा को लोकप्रिय बनाया और नीरज ने भी। लेकिन नई कविता की ऊब से बचने और बचाने के लिए गीतकारों ने गीत का परम्परागत सांचा तोड़ कर उसे अभिनव रूप में ढालने का प्रयास किया।

‘गीत में अन्तर्मुखी प्रवृत्ति की प्रधानता होती है, लेकिन उसे बहिर्मुखी प्रवृत्ति से अलग नहीं किया जा सकता है। यह आकस्मिक नहीं है कि डॉ0 वसिष्ठ ने अपना यह ‘नवगीत संकलन महाकवि पं0 नाथूराम शर्मा ‘शंकर‘ नवगीत के सूत्रधार पं0 सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला‘ और दमदार नवगीतकार वीरेन्द्र मिश्र को सादर समर्पित किया है। यह समर्पण भाव गीतकार की सामाजिक चेतना और गीत की अभिनव कथन-भंगिमा का प्रमाण है।

‘दीपोत्सव 2001 हेतु शत शत शुभकामनाएँ‘ में डॉ0 वसिष्ठ विषमता के बारे में चिन्ता करते हुए कहते हैं- 

“क्या विषमता है जगत् की
तमिस्रा से प्यार!
युद्ध को तैयार क्षण में
नेह से तकरार।“

 उनकी यही अभिलाषा है कि

 “दीप ने ही
दी सभी को रोशनी
रोशनी बस रोशनी बस
रोशनी बस रोशनी!!/“

आजकल ने ही दीप की रोशनी की परम आवश्यकता है और यह तभी सम्भव है कि जब संगठित होकर आर्थिक विषमता को जड़ से उखाड़ा जाए। डॉ0 वसिष्ठ विषमता का प्रखर प्रतिरोध नाट्य-मंचन के माध्यम से करते हैं। लेकिन वह स्वयं को वामपंथी बताने के लिए  ढोल नहीं पीटते हैं। प्रकाश-प्रसार का उपर्युक्त भाव ‘रचना सा वर दे‘ में भी किया गया है -

 “वर दे माँ शुभ्रा, तू वर दे
मगन हृदय की तम घाटी में
आस किरन भर दे।“ (बना रह जख्म तू ताजा, पृ0 13)

ज्ञान का प्रकाश अज्ञान दूर करता है।  मनुष्य को निर्भय बनाता है और मानव-मूल्यों का संरक्षक  भी।

‘पारा कसमसाता है‘ में यदि एक ओर भयंकर ठंड की ओर संकेत किया गया है, तो दूसरी ओर ‘मुक्ति क्रम में‘ प्रयासरत एक नन्हा चिड़ा ‘मृत्युभोगी चीख लेकर‘ रह-रह कर पंख फड़फड़ाता है। अर्थात् वह प्रतिकूल मौसम से संघर्ष कर रहा है। बन्धन से जकड़े मनुष्य का स्वभाव भी ऐसा ही होता है। उसे जीवित रहने के लिए रात-दिन कठोर श्रम करना पड़ता है। तभी तो गीतकार कहता है -

 “शुरू हुई दिन की हलचल
गये सभी लोहे में ढल।“(वही, पृ0 17) 

‘धूप की गजल‘ महानगरीय परिवेश से साक्षात्कार कराती है। देश की राजधानी दिल्ली दिनारम्भ होते ही लाहे में ढल जाती है। आशय यह है कि जीविका के असंख्य जन कठोर श्रम करके स्वयं को लोहा जैसा सख्त बना लेते हैं।

‘जहरीला पूरा परिवेश हो गया‘ का कथ्य सुस्पष्ट है। गीतकार की प्रमुख वेदना यह है कि इस आपा-धापी के समय में सब ठगे जा रहे हैं। व्यक्ति अपने हक वंचित हो रहे है। यह जीवन का तीक्ष्ण त्रासदी है।

दिन खिसकते जा रहे हैं‘ अभीष्ट अभिलाषाओं की आपूर्ति होने की व्यथा अंकित की गयी है। प्रतिकूल परिस्थितियों में दिशाऐं प्रश्नित हैं। पंथ धूमिल है। चाल बेबस है। चारों ओर अग्नि-लहरें धार बनकर उड़ती हैं। साजिशें हैं। अनागत अनिश्चित है। ऐसी मनोदशा में व्यक्ति बड़ी आकांक्षाऐं कैसे पूरी हो सकती हैं। यह है महानगर में अकेले पन का बोध, जो व्यक्ति को व्यापक सक्रिय लोक से दूर कर देता है। शायद, ऐेसे ही गीतों के सन्दर्भ में डॉ0 आनन्द प्रकाश ने लिखा है कि “गीतकारों का ध्यान प्रायः इस तरफ से हटता गया कि श्रमिक जनता के शोषण पर केन्द्रित रहना सही रास्ता है। मूर्तता जिस प्रकार शोषित वर्ग की शत्रु है, अमूर्तता उसकी मित्र हो सकती है। “(समकालीन कविताः प्रश्न और जिज्ञासाएँ; पृ0 124)

इस संकलन  में कई गीत ऐसे हैं, जिनमें जीवन-यथार्थ की मात्र झलक है। उसकी मूर्तता विरल है। एक उदाहरण देखिए

 “बाँहों के आकाशी दायरें
सिमटें फिर उसी बिन्दु पर
जिसमें था स्याहिया ज़हर।“ (पृ0 22)

 ‘आकाशी दायरे‘ विराट बिम्ब प्रत्यक्ष कर रहा है। लेकिन यह बिम्ब ‘स्याहिया ज़हर‘ पर क्यों सिमट रहा है। क्या आकर्षण है। ऐसा घातक आकर्षण अभीष्ट भाव को सघन निराशा में परिवर्तित कर देता है- 

“छिद्रित घट से
क्रमशः रिसते रिसते
चुप्पी में डूब गये शोर भये दिन
सागर में ज्वारमयी मीन बहुत उछरी
सिर्फ रेत पाया लेकिन।“ (पृ0 22)

 तुलसी ने लिखा है - ‘सुखी मीन जँह नीर अगाधा।‘ यहाँ मीनों को रेत ही रेत प्राप्त हो रही है। वस्तुतः, यह महानगरीय भाव-बोध है, जो नवयुवकों की व्यथा-कथा व्यक्त कर रहा है।


और ऐसे  विवश व्यक्ति अन्य किसी को क्या दे सकते हैं। याचना उनकी नियति है। इसीलिए तो गीतकार कहता है-

 “हाथों का अर्थ हुआ क़र्ज़ मांगना
टूक-टूक स्वयं को सलीब टाँगना।“ (पृ0 23)

 यहाँ भी अकेलेपन की विवशता व्यक्त की गयी है। वास्तविकता से साक्षात्कार करके वह आगे कहता है-

“चमकदार सब उसूल स्याह हो गये
रोटी के चक्कर में सूर्य हो गये
झुका नहीं, टूट गया, जो रहा तना।“(पृ0 23) 

वर्तमान क्रूर व्यवस्था में पूँजी व्यक्ति की लाचारी का लाभ इसी प्रकार उठाया करती है। लाचार आदमी टूट कर बिखर जाता है। व्यक्ति की घातक और मारक लाचारी ऐसी मनोदशा भी उपस्थित कर देती है-

“बतियाती फ़र्ज़ांे से
रह-रह कर चमक-दमक
घहराकर उफन रही
भीतर की घुटी कसक
जीवन तो रीत गया
जुड़े रहे नाम से।“ (पृ0 25)

 वर्तमान परिवेश में जीवन का रीतापन स्वाभाविक है, लेकिन सुखद नहीं त्रासद है।
मानवीय सभ्यता और संस्कृति जांगलिकता से मांगलिकता  की ओर अग्रसर होती रही है।  लेकिन द्वन्दात्मक जगत् में जांगलिकता-मांगलिकता  का द्वन्द्व चलता रहता है।  नाखून बढ़ते रहते हैं। मनुष्य उन्हें काटता रहता है।  अन्ततोगत्वा विजय अहिंसा की होती है। लेकिन पूँजी  के क्रूर हाथों ने अपने नाखून बढ़ा लिये हैं। वह अब तो शूर्पणखा हो गयी है।  यह सब देखकर वसिष्ठ जी मन-ही-मन गाते हैं -

“फँस गया मन सभ्यता के जंगलीपन बीच।“......
 “आ गई संवेदना/उस बिन्दु पर चल के
 बस, कथा के रह गए हैं
 पत्र पीपल के
 मूल्य सारे ज़िन्दगी के संग्रहालय चीज़।“(पृ0 26)

संग्रहालय में पुरातात्विक  वस्तुएँ रखी जाती हैं। सजावट-दिखावट के लिए। आजकल की विषमताग्रस्त समाज ने उदात्त मानवीय मूल्य सजावट के लिए बातों के संग्रहालय  में रख दिए हैं। अर्थात्  ‘पर उपदेस कुशल बहुतेरे/ जे आचरहिं ते नर न घनेरे/‘ यही कारण है कि कथनी और करनी के अन्तर ने व्यक्तित्व खंडित कर दिया है। वह विकलांग हो गया है। उसके सामने एक नहीं कई-कई ‘प्रश्न चिह्न‘ खड़े हो गये हैं। परिणाम सामने यह है कि “हर दिन आ खड़ा हुआ/ मुँह बाए/ ले नया सवाल/ क्रिया निरत चर्या/ बिन क्रिया हुई/ क्षण-क्षण बेहाल/ थे रदीफ काफिया बा-अदब/ पर/ खिसक गये हाथों से/ सुरों के बहर।“ (पृ0 27) अब आप ही सोचिए कि बेसुरा व्यक्ति क्या गाएगा। कैसे गाएगा। यह है आज के महत्वाकांक्षी व्यक्ति की नियति। शायद इसी कारण गीतकार महसूसता है कि “गहमाऽगहम शहर और चुप कलम/साथ-साथ रोज़ सफ़र, वे-ताला-सम।“(पृ0 28)
 
बे-ताला-सम ने जिन्दगी  को संगीत की लय से वंचित  कर दिया है। गीत के नायक ने निराश हो कर मनोदशा इस प्रकार व्यक्त की है -

 “जन से होश सँभाला, तन से पाया कालापन
टलता रहा महज तारीखों में उजियार बदन।“(पृ0 31)

 यह ‘कालापन‘ चरित्रहीनता, मूल्य-विहीनता और काली कमाई का प्रतीक है, जो अपनी अलग समानान्तर व्यवस्था चला रहा है। गीतकार इतना निराश है कि उसे महसूस होता है कि

“स्याही ने
 हर सीढ़ी
 ऐसा रौव जमाया अपना
 सहमा छिपता सा फिरता है
 सूर्य उदय का सपना।“ 

लेकिन “तो भी, फाँक रोशनी थामें, तकता पागल मन।“ (पृ0 31) सवाल है कि ‘पागल मन‘ का सपना पूरा होगा? शायद नहीं। आजकल भ्रष्ट राजनीति ने अपरधीकरण का आश्रय सारे के सारे मानवीय मूल्य ध्वस्त कर दिए हैं। फिर भी लोक संर्घष कर रहा है। जनशक्ति ही उकी मनोकामना पूरी कर सकती है। जनशक्ति के अभाव में हर व्यक्ति विभाजित जिन्दगी जी रहा है। अब प्रश्न यह है कि “किस तरह आखिर गुजारे  ऋचा-सम्मत पल/ हर किसी ने, निरी कसकर, चढ़ा ली साँकल।“ (पृ0 34) यह है महानगरीय और नगरीय अजनबीपन, जो अपने व्यक्तित्व को परिसीमित करना श्रेयकर समझता है। वेदों की ऋचाएँ उसके लिए व्यर्थ हैं। साथ-साथ चलो। साथ-साथ बोलो। सब के मन को जानो। स्वाध्याय से प्रमाद मत करो। सत्य बोलो। सौ शरदों तक सूर्य देखो। महानगर में कितने प्रतिशत लोग नित्य सूर्योदय-सूर्यास्त आदि देखते हैं।
महानगरीय नगरीय  कस्बाई और ग्रामीण व्यक्ति  के सामने एक और समस्या खड़ी  है। खालीपन। बेरोजगारी  से जनमा हुआ। कर्म करना मानव का स्वभाव है। गुप्त जी ने लिखा है- “नर हो, न निराश करो मन को/कुछ काम करो/ जग में रह कर कुछ नाम करो।“ लेकिन गीतकार के सामने यह ज्वलंत प्रश्न है

“कब तक यों जिएँ लिये खालीपन
और, दूर, माथे से रहे शिकन।“ (पृ0 35)

लेकिन ऐसा सम्भव नहीं हो पाता है। चिन्ता माथे पर शिकन लेकर आती है। समस्या यह भी है कि

“दिशाहीन चौराहे चौराहे चौराहे
 जर्द हुए चेहरों पर/एक चमक मुस्काए
सच, कैसे मुस्काए
मिलती जब बर्फीली अग्नि-छुअन।“ (पृ0 35)

उद्धरण की अन्तिम पंक्ति में अन्तः विरोध  है। ‘छुअन‘ बर्फीली भी है और अग्नि से युक्त भी। अर्थात् आक्रोश से माथा तप रहा है, लेकिन असहाय होने का अहसास उसे ‘बर्फीला‘ कर देता है।

‘कब तक झेलूँ लावा मन में‘ सोच कर कवि व्यवस्था की घातक वास्तविकता इस प्रकार उजागर करता है -पुर्जा, एक व्यवस्था का, बस/ माना/ जोड़ा और चलाया/ शब्दों की अमृत वाणी से/ भूखी पीढ़ी को वहलाया/ मृत्यु चीख तेरी आँगन में।“ (पृ0 36) यह सब सोच-सोच कर के गीतकार आक्रोश से भर कर प्रश्नों की झड़ी लगा देता है-

“लीक, लीकिया, कब तक कब तक?
कब तक पीड़ा, कब तक शोषण?
कब तक प्रतिभा कुण्ठित  होगी?
कब तक मन मर्जी का दोहन?
होगा क्या अरण्य  रोदन में?

ये ज्वलंत प्रश्न सहृदय पाठक/पाठिका को आज भी परेशान करते रहते हैं असंख्य प्रातिभ युवक-युवतियों की आधी उम्र अच्छी नौकरी  की तलाश में बीत जाती है।  सरकारें आती हैं। जाती हैं। लेकिन व्यवस्था नहीं बदलती है। प्रत्येक बड़ी  कुर्सी स्वयं का बहुमल्य  घोषित करके अपने को बेचने  पर आमादा है। संविधान  का उल्लंघन खुले आम हो रहा  है।


डॉ0 वसिष्ठ ने गम्भीरता से महसूस किया है कि उन जैसे संवेदनशील जन ‘जड़धर्मा लोगो के बीच‘ में रह कर बेचैनी का अनुभव करते हैं। तभी तो गुनगुनाते हैं “मैं भी आ खड़ा हुआ आखिर को/जड़धर्मा लोगों के बीच।“ (पृ0 40) जड़धर्मा लोग लकीर के फकीर होते हैं। रूढ़ियों का अनुपालन अपना पवित्र धर्म समझते हैं। ऐसे लोग समाज की प्रगति में रोड़ा बन कर अड़े रहते हैं। परिणाम यह सामने आता है

“गड्ढा है ज्यों का त्यों
कीचड़ भी ठीक वही
 क्या है फिर जिसको मैं रहा था उलीच? 
जड़धर्मा लोगों के बीच।“ (पृ0 40) 

ऐसे लोग प्रतिक्रियावादी होते हैं। उन पर पुरातनता का निर्मोक चढ़ रहता है। वे समप्रदायवाद और जातिवाद से ग्रस्त होते हैं। साधारण जन तो ‘अपहरण भाईचारे का‘ समर्थन कदापि नहीं करते हैं। लेकिन जड़धर्मा लोग गणेश जी को दूध पिला कर शिशुओं को भूखा रख के अंधविश्वास को बढ़ावा देते हैं।
ऐसे जड़धर्मा जन ही क्रूर एवं शोषक व्यवस्था का समर्थन करते रहते हैं। यथास्थिति  बनाए रखते हैं। यह देखकर संवेदनशील  गीत कार का मन क्षोभ से भर जाता है। वह पूछता है - ‘यह व्यवस्था चक्र है य सानधर आरा। (पृ0 41) क्योंकि उसे अच्छी तरह मालूम है-“स्निग्ध फ़र्शों की इमारत/ रहन अति लकदक/ गुम्बदी सदनों गुँजाती/ नेतई बक-बक/दीन जीवन को लिखी, बस, कीच या गारा।“(पृ0 41)

‘नेतई बक-बक‘ और संसद में होने वाले हंगामें एवं हाथापाई से भारत का जन-गन-मन खूब परिचित हो गया है।
‘शुरू हुआ पहिया‘ में श्रमशील वर्ग की दैनिक क्रियाओं का आकर्षक वर्णन किया है- “सड़को पर निकल पड़ी घर से/ दिनचर्या रोज़ की/ एक अदद गठरी सिर पर लिये/ रोटी के बोझ की/चप्पू बिन आसमान नाप रही नैया। (पृ0 43)

वास्तविकता  यह है कि जीवन के कर्तव्य  श्रम से पूर्ण होते हैं। लेकिन  इस विषमताग्रस्त समाज में  सम्पन्न उच्च वर्ग और उसके साथ-साथ मध्य वर्ग भी निम्न  वर्ग के अकूत श्रम का उपभोग  करता है। वह पूँजी से सब कुछ खरीद सकता है। ऐसी  व्यवस्था में धनवान् ही धन्य हैं और धन्यवाद का समुचित पात्र भी। अपना स्वार्थ  साधने के लिए निम्न वर्गीय जन उच्च एवं मध्य वर्ग के सामने विनम्र रहते हैं। तभी  तो गीतकार कहता है कि “स्वार्थमयी मिट्टी में उगते हैं/ आज के प्रणाम/ बिन लगाम मृग मरीचिकाओं के फन्दों में/ फँसे रहें कब तक हम अन्धो में?/ अर्थ के लिए होते सैकड़ो गुलाम/ सुबह-शाम।“ (पृ0 48)

मध्य वर्ग की समस्या यह है कि वह स्वयं  को निम्न वर्ग से दूर रहना चाहता है; लेकिन उच्च वर्ग से मधुर सम्बन्ध जोड़ने के लिए उसके पास रहना चाहता है और उच्च वर्ग तो मध्य वर्ग को हेय दृष्टि से देखता है। यही सब सोचकर सहृदय गीतकार प्रश्न पूछता है - “कब तक दिक्कालो से थर्राएँ/ आदेशों पर हरदम गुन गाएँ/ हिय उबाल ठण्डा वत हुआ बहुत आम/ बिना काम।“ (पृ0 48)

गीतकार  का प्रतिरोध सार्थक है, जो उसकी विवश मनोदशा की अभिव्यक्ति कर रहा है। लेकिन उसका प्रतिरोध पूरा तरह सफल नहीं हो पाता है, क्योंकि वह अचानक महसूस करता है-

“रेशमी सुझावों के घेरे में/ 
मेरा अपना मत काफूर हुआ/
 विद्रोही आसमान/ सिर्फ शून्य-सा हो कर/ 
जीवन नासूर हुआ/ एक आग खँडहर के शरण हुई/
 लपटों के शीश लगे कटने।“ (पृ0 50)

उद्धरण  की अन्तिम पंक्ति ‘लपटों के शीश लगे कटने‘ भयावह बिम्ब प्रत्यक्ष कर रही है।
गीतकार वसिष्ठ अपने आस-पास के जनों का आचरण अवधानपूर्वक  देख कर उनका स्वभाव समझने का प्रयास करते हैं। समाज में कुछ सज्जन ऐसे भी होते हैं, जो सम्पन्नों की प्रशंसा करके सुर्खियाँ बटोर लेते हैं। मंच के कवियों की मनोकामना होती है कि वे किसी तरह सुर्खियों में छाए रहें। इसीलिए वह लिखता है - “सुर्खियों के ही सहारे जो/ आकाश में बेवक्त हैं उछले/ गुम्बदी अस्तित्व के पोषक/ तनिक झोंके से बहुत दहले।“ (पृ0 60)

‘गुम्बदी अस्तित्व‘ जोरदार एवं दमदार आवाज सुन कर दहल जाता है। अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए वह हमेशा चिन्तित रहता है। अतः उसका स्वभाव चाटुकारी हो जाता है। लेकिन नई पीढ़ी ऐसे चाटुकारों का प्रतिरोध प्रतिपल करती है। अतः गीतकार ने आगे ठीक लिखा है-“हर लहर प्रति निकट का ही काटती/ धुन्ध के टुकड़े महज़ है बाँटती/ धीर होता वो/ आलाप हो कर/ राग जल की ‘गूँज‘ को सह ले।“


 यह है नई पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी का वैचारिक द्वन्द्व, जो चाटुकारी पुरानी पीढ़ी को परास्त करता है। इसके लिए उसे प्रबल टकराहट की चोट झेलनी पड़ती है। प्रतिरोध के लिए तैयार रहना पड़ता है और त्याग के लिए भी। वास्तव में चाटुकारी जन ‘मेघ नामधारी‘ तो होते हैं, लेकिन उनमें बरसने वाले भापकन नहीं होते हैं। तभी तो गीतकार ने गुनगुनाया है - “मेघ-नामधारी वे भापकन/ रहे भ्रम/ और हम प्यासे रहे/ जैसे रहे पहले/ सूखा पड़ी जमीन से, कौन, क्या, गह ले।“ “घूम कर हर ओर आए/ दरकता मन, शर्त क्यों सह ले।“ (पृ0 61) यह है गीतकार का प्रतिरोध, जो सतही दृष्टिकोण की उपेक्षा करता है।

आइए, अब संकलन के शीर्षक गीत ‘बना रह जख्म/ तू/ ताजा‘ पर विचार करें।
जिस ‘जख्म‘ का अनुभव गीतकार ने किया है, वह प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति प्रतिदिन महसूस करता है। व्यवस्था ने जो जख्म दिया है, वह इसलिए ताजा बना रहे कि जिससे प्रतिरोध का आग शान्त न हो जाए। दुष्यंत कुमार ने भी कहा है - “मेरे सीने में नही तो तेरे सीने में सही/ हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।“ गीतकार सुभाष वसिष्ठ की भी अभिलाषा है कि

 “टूट कर गिर न जाएँ/ 
सहीपन के बिन्दु आकाशी/ 
महज़ कुछ वक्त के टुकड़े/ 
न कर दें गन्ध को बासी/ 
खुली आबादियों के मूल स्वर! छा जा।“(पृ0 64)

‘खुली आबादियो के मूल स्वर‘ से आशय भारत की कोटि-कोटि निरन्न-निर्वस्त्र जन-गण से है, जो महानगरीय झुग्गी झोपड़ियों में निवास करते है। ‘ताजा जख्म‘ सदैव प्रेरित करता रहेगा कि इस त्रासद व्यवस्था को बदलने के लिए प्रयास करो। एक-जुट हो कर। संगठन बना कर। जनशक्ति पर भरोसा बनाए रखो। गीतकार ने यह अभिलाषा भी व्यक्त की है- “प्रतिबद्धित गीत नहीं टूटेंगे/ कितने ही ठीठ कदम बढ़ जाएँ/ काले काले अक्षर हाथ में लिये।“ (पृ0 53)

आजकल अधिकांश हिन्दी कविता गद्यात्मक होने के कारण नितान्त अपठनीय है।  गिने-चुने कवि ही अपनी कविता  को जीवन से जोड़ कर लयात्मक बनाने का प्रयास कर रहे हैं। दूसरी ओर परम्परागत तुकबन्दी भी कविता की गरिमा का क्षरण कर रही है। ऐसे माहौल में डॉ0 सुभाष वसिष्ठ ने धैर्य धारण करके अपने गीतों में कथ्य के अनुरूप कथन-भंगिमा अपनाई है। मुक्त लय का सधा प्रयोग किया है। प्रत्येक गीत के आवयविक गठन पर पूरा ध्यान केन्द्रित किया है। भाषिक संरचना में प्रतीकों के साथ-साथ आकर्षक एवं गतिशील बिम्बों का समावेश करके व्यक्ति की निजी व्यथा-कथा को सार्वजनिक रूप प्रदान किया है। संकलन के गीतों में डाल पर पके हुए बेल की मधुरता है। ताजा खिले गुलाबों की सुगंध है। अर्थ-गौरव की दृष्टि से संकलन एक बार नहीं अनेक बार पठनीय है। संकलित गीत सच्चे और अच्छे नवगीत हैं। अपनी अलग पहचान लिए हुए।

गीतकार को अच्छी  तरह मालूम है कि वर्तमान  अन्यायी व्यवस्था ने अँधेरों  ने अनखुल जाल बाँधे हैं, लेकन उसे यह विश्वास भी है कि “टूट जाएँगे/ जिनसे/ इन्हें जो मिले काँधें हैं!/ बन्धु! अनखुल जाल बाँधे हैं!!“ (पृ0 62) इस के लिए वह यह सोचता है - “क्या करें (कि)/चटका हुआ मन/ फिर लबालब आस-भर गाए/ क्या करें(कि)/ लँगड़ा मुसाफिर/ लक्ष्य तक/ नित शक्ति-भर धाए/ शुरू जन कर दें सफर तो ध्येय ही हो अन्त।“(पृ0 57)

इस उद्धरण की अन्तिम पंक्ति में उत्तम  पुरूष सर्वनाम ‘हम‘ समाहित है। ‘हम‘ उत्तम पुरूष इसलिए है कि वह अपने साथ सभी को ले कर चलता है। हम कह सकते हैं कि सुभाष वसिष्ठ ने अपनी निजी अनुभूतियों का साधारणीकरण किया है। यह रचनात्मक प्रयास श्लाघनीय है।

प्रसंगवश  यहाँ एक और महत्त्वपूर्ण बात  उल्लेखनीय है और वह यह है कि अन्य मध्यवर्गीय नवगीतकारों के समान सुभाष वसष्ठि के गीतों  में न तो ग्रामीण परिवेश के प्रति मोह है और न ही पलायन की भावना। प्रमाण के लिए प्रख्यात गीतकार कैलाश  गौतम के एक गीत की अधोलिखित पंक्तियों पर विचार कीजिए।

“गाँव गया था/ गाँव से भागा/ रामराज का हाल देख कर/ पंचायत की चाल देख कर/ आँगन की दीवाल देख कर/ सिर पर आती डाल देख कर/ नदी का पानी लाल देख कर/ और आँख में बाल देखकर।“
विचारणीय बात यह है कि अपने गाँव का शायद यथार्थ देख कर कवि ‘गाँव से भागा‘ क्यों? क्या वह रूक नहीं सकता था? गाँव की सूरत बदलने की योजना उसने क्यों नहीं बनाई। क्या जनशक्ति के प्रति उसकी आस्था में कमी थी। जनशक्ति संगठन के बल से असम्भव को सम्भव कर सकती है और आजकल जहाँ भी अन्याय, अनाचार, शोषण-उत्पीड़न है, वहाँ जनशक्ति सगठित हो रही है।

सुभाष वसिष्ठ ने नाटकों के माध्यम से जनशक्ति  को जगाया है और शोषण का प्रखर  प्रतिरोध गीतों के माध्यम से किया है। इस दृष्टि से उनके नवगीत अन्य गीतकारों से भिन्न हैं। वह ‘ओ पिता‘ शीर्षक गीत में अपना जुझारू व्यक्तित्व इस प्रकार व्यक्त करते हैं - “यह सही है/ पुत्र नामक खून का कतरा/ तुम्हारे हम/ पर, कहाँ यह सिद्ध होता/ खिड़कियों को बन्द कर/ जीतें रहें संभ्रम?/ओ पिता!/ तुमने सदा ही ऋचा बांची है मसीहों की/ और मेरी जिन्दगी व्यामोह हन्ता को रही मरती।“ (पृ0 55) यह ‘व्यामोह‘ क्रूर सत्ता के प्रति अवसरवादी लोग का ‘मोह‘ है जिसे कवि समाप्त करना चाहता है।

और अब यह बात सुनिश्चित है कि इस कुरूप् और क्रूर दुनिया को सुन्दर से सुन्दरतर और सुन्दरतम बनाने के लिए कोई मसीहा  नहीं आएगा; बल्कि दुनिया दो बड़े वर्गों-श्रमिकों एवं कृषकों के त्यागी-तपस्वी एवं विवेकशील नेता ही संगठित लोक-शक्ति से लोकतन्त्र का कल्याणकारी रूप उजागर करेंगे।

यह संकलन  पढ़ने-समझने के बाद हम यह कह सकते हैं कि गीतकार सुभाष  वसिष्ठ ने वर्तमान क्रूर  व्यवस्था का प्रतिरोध करके नवगीत की विधा को एक अभिनव  आयाम प्रदान किया है। जो प्रभावपूर्ण  कथ्य एवं कथन की नई भंगिमा ने भी गीतकार की अद्वितीय छवि  प्रत्यक्ष की है।
संकलन का आवरण गीतों  की अन्तर्वस्तु के अनुरूप है। त्रिआयामी आवरण पर ऊपरी भाग पर रोशनी के पास  मामूली-सा दरवाजा है। मध्य भाग में पुरानी इमारत  की दीवार के साथ गीतकार की वेदना संवलित गम्भीर छवि  है। ऐसा आभास होता है कि वह चिन्ता और चिन्तन दोनों  में मग्न है। और आवरण के निचले भाग महानगरीय कुतुबमीनारी  इमारतें दिखाई पड़ रही  हैं।


वितरकः 
हिन्दी बुक सेन्टर
4/5, आसफअली रोड़, नई दिल्ली- 110002
फोन 011-23274874







(अमीर चन्द्र वैश्य वरिष्ठ आलोचक हैं )
 

संपर्क-
मोबाईल- 09897482597

रविवार, 24 मार्च 2013

कैलाश बनवासी


      
 
जन्म- 10 मार्च 1965, दुर्ग

शिक्षा- बी0एस-सी0(गणित),एम0ए0(अँग्रेजी साहित्य)

1984 के आसपास लिखना शुरू किया। आरंभ में बच्चों और किशोरों के लिए लेखन।

कृतियाँ-

सत्तर से भी अधिक कहानियाँ देश की विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। बहुतेरी कहानियाँ चर्चित,किंतु कहानी ‘बाजार में रामधन’ सर्वाधिक चर्चित।

अब तक तीन कहानी संग्रह प्रकाशित-‘लक्ष्य तथा अन्य कहानियाँ’(1993),‘बाजार में रामधन’(2004) तथा ‘पीले कागज की उजली इबारत’(2008)

कहानियाँ गुजराती,पंजाबी,मराठी,बांग्ला तथा अँग्रेजी में अनूदित।

पहला उपन्यास ‘लौटना नहीं है’ शीघ्र प्रकाश्य।

 सम-सामयिक घटनाओं तथा सिनेमा पर भी जब-तब लेखन।

पुरस्कार- कहानी ‘कुकरा-कथा’ को पत्रिका ‘कहानियाँ मासिक चयन’(संपादक-सत्येन कुमार) द्वारा 1987 का सर्वश्रेष्ठ युवा लेखन पुरस्कार। कहानी संग्रह ‘लक्ष्य तथा अन्य कहानियाँ’ को 1997 में श्याम व्यास पुरस्कार। दैनिक भास्कर द्वारा आयोजित कथा प्रतियोगिता ‘रचना पर्व’ में कहानी ‘एक गाँव फूलझर’ को तृतीय पुरस्कार। संग्रह‘पीले कागज की उजली इबारत’ के लिए 2010 में प्रेमचंद स्मृति कथा सम्मान।


संप्रति- अध्यापन। 

कैलाश बनवासी की वाक् के नए अंक में एक कहानी 'जादू टूटता है' प्रकाशित हुई है। एक अरसे बाद किसी कहानी ने मुझे इतनी शिद्दत से प्रभावित किया।  इस कहानी को पढ़ कर मैंने तुरंत ही कैलाश जी को फोन लगाया और कहानी को पहलीबार के पाठकों के लिए उपलब्ध कराने का आग्रह किया जिसे कैलाश जी ने विनम्रता से स्वीकार कर लिया। बिना किसी टिप्पणी के मैं आपको इस महत्वपूर्ण कहानी से रूबरू कराता हूँ। तो लीजिये प्रस्तुत है यह कहानी जिसके जादू में आप खुद-ब-खुद बंधते चले जायेंगे।
 
जादू टूटता है                                 
                                                 
 ‘‘सर,क्या मैं अंदर आ सकता हूँ ?’’

 प्रिंसिपल ने स्कूल के फंड से पैसे बैंक जाकर निकलवाने के लिए मुझे अपने कक्ष में बुलवाया था।प्राचार्य चेक साइन कर चूके थे।तभी कमरे का परदा जरा-सा हटाकर भीतर आने की इजाजत चाहता वह खड़ा था।

   प्राचार्य ने इशारे से उसे आने की अनुमति  दी।वह भीतर आ गया, आभर में केवल मुस्कुराते ही नहीं,  हाथ जोड़े हुए।

   ‘‘ हाँ,कहो...?’’

   मैं भी समझ रहा था,शायद अनाथ आश्रम के लिए चंदा मांगने आया हो। स्कूल में अक्सर ऐसे लोग आते रहते हैं सहयोग मांगने।सबूत के तौर पर अपने पास किसी अधिकारी द्वारा प्रमाणित पत्र को जिलेटिन कवर में रखे हुए। और प्रिंसिपल आर. के सिंह जो बहुत होशियार प्रिंसिपल माने जाते हैं, ऐसे लोगों को तुरंत चलता कर देते है,‘अरे, जाओ यार किसी सेठ-साहूकार को पकड़ो!ये सरकारी संस्था है कोई धर्मार्थ संस्था नहीं!’पर ये ऐसे ढीठ होते हैं कि उनका दो टूक जवाब सुनकर भी वे चिरौरी करना नहीं छोड़ते और रेल्वे स्टेशन के भिखारियों की तरह एकदम पीछे पड़ जाते हैं।पर उनके सामने दाल आखिर तक नहीं गलती। मैं माने बैठा था, इसका भी यही हाल होगा। बैरंग वापस।

‘‘सर..मैं स्कूल-स्कूल जाकर अपना खेल दिखाता हूँ।’’ ऐसे मौके पर शायद सबसे कठिन होता है पहला वाक्य कहना और उसने अपने अभ्यास के चलते इस बाड़ को पार कर लिया था।‘‘सर, इससे बच्चों का मनोरंजन हो जाता है। सर, मैं पिछले कई साल से ये कर रहा हूँ। आपके स्कूल में भी बच्चों को दिखाना चाहता हूँ।सर,कृपा करके मुझे अनुमति दीजिए...।’’ वह अब तक हाथ जोड़े खड़ा था,उसी तरह याचक भाव से मुस्कुराते।

   वह एक निहायत दुबला-पतला आदमी था।पिचके हुए गाल में कटोरे जैसे गड्ढे थे।रंग कभी गोरा रहा होगा पर अब तो उसका हल्का आभास ही बाकी है।वह कब का रंग छोड़ चुका एक ढीला शर्ट पहने था।  कंधे पर एक थैला लटकाए। उमर पैंतीस-चालीस के बीच रही होगी लेकिन दिखता अड़तालिस-पचास का था।गरीबी और अभाव समय से पहले आदमी को कैसे बूढ़ा कर देता है,वह इसका जीता-जागता नमूना था।देश के लाखों अभावग्रस्त लोगों की मानिंद।

  मुझे तो बिलकुल उम्मीद नहीं थी,पर प्रिंसिपल को न जाने क्या सूझा कि आगे पूछ दिया,‘‘अच्छा, क्या-क्या करतब दिखाते हो?’’

    ‘‘अरे,बहुत कुछ सर।’’ वह सर की सहमति से एकदम बच्चों की तरह उत्साहित हुआ और अपने थैले से निकालकर एक पुरानी-सी फाइल दिखाने लगा,जिसमें अखबारों की कतरनें चिपकायी गयी थीं।प्राचार्य के साथ मैं भी उसकी फाइल देखने लगा। उसी से मालूम हुआ उसका नाम लक्ष्मण सिंह है,पिथौरा निवासी।फाइल में ज्यादातर स्कूलों से उसे मिले प्रशस्ति पत्र  थे।कुछ प्रशस्तिपत्र विधायकों और मंत्रियों के भी थे।प्रायः सभी में उसके करतबों को अच्छा, मनोरंजक और आकर्षक बताते हुए उसके उज्जवल भविष्य की कामना की गई थी।

   ‘‘आज कौन-सा दिन है...?’’प्रिंसिपल ने मुझसे यों ही पूछने के लिए पूछा।यह तो वे अपने सामने रखे टेबल कैलेण्डर देख के भी जान सकते थे,किंतु जब आपका कोई अधीनस्थ साथ हो तो काम ऐसे भी किया जाता है।  

   ‘‘सर, शुक्रवार।’’ मैने बताया।

      ‘‘यानी कल शनिवार है। तो आप कल दोपहर बारह बजे के आसपास आ जाइये।पर एक बात है, तुम अपने करतब की आड़ में कोई चीज तो नहीं बेचोंगे?...ताबीज या और कुछ...?’’

    ‘‘नहीं सर। बिल्कुल नहीं।’’ उसने एकदम यकीन दिलाया,‘‘अपना ऐसा कोई धंधा नहीं है, सर।अपन खाली अपना सरकस दिखाते है।’’

      प्रिंसिपल ने उसे अनुमति दे दी।

    

लक्ष्मण सिंह कृतज्ञता से एकदम झुक-झुक गया,‘‘बहुत-बहुत धन्यवाद सर!...बहुत बहुत धन्यवाद! मैं कल टाइम पे आ जाऊँगा, सर...।’’

      वह हाथ जोड़े-जोड़े कमरे से चला गया।


      मैं बाद में देर तक इस बारे में सोचता रहा-लक्ष्मण सिंह आखिर इतना दीन-हीन क्यों रहा हमारे सामने?वह अपना खेल दिखाएगा,बच्चों का मनोरंजन करेगा,इसके बदले में कुछ पैसे बच्चों से या देखनेवालों से पा जाएगा।प्रिंसिपल की सहमति जरूरी है। पर इस छोटी-सी बात के लिए इतनी कृतज्ञता?जैसे इसी हाँ पर उसका भविष्य टिका हो! वह भी एक कलाकार होकर! या फिर उसकी कला में कहीं कोई कमी है जिसे वह कृतज्ञता से ढँकने की कोशिश कर रहा है? लेकिन लगा कि मैं कितना गलत और एकांगी सोच रहा हूँ!लगा,वह इस सिस्टम को मुझसे कहीं ज्यादा बेहतर जानता है जहाँ बैठा हुआ हर अधिकारी अपने ‘इगो’ को लेकर बीमार की हद तक ग्रसित रहता है और उन्हें कुछ ऐसी ही तरकीबों से खुश किया जा सकता है,क्योंकि बदले में आप उसको कुछ पैकेज या गिफ्ट तो नहीं दे रहे हो जो आज काम करवाने का नियम ही बन चुका है। उनके इगो को संतुष्ट करके ही आप उनसे काम ले सकते हैं। स्कूल-स्कूल घूमने के बाद लक्ष्मण सिंह को यही अनुभव हुआ हो और उन अनुभवों ने ही उसे नाजुक डाली के समान नचीला बना दिया हो।लेकिन एक मन कहता था कि नहीं,वह कलाकार है और उसे अपनी और अपने कला की गरिमा बना के रखना चाहिए,जितना भी हो सके।वह कोई सड़कछाप भिखारी नहीं है।वह अपनी कला दिखलाकर बदले में कुछ पाता है।पर उसका सलूक मैं पचा नहीं रहा था जो मुझे रेल डिब्बों में झाड़ू लेकर फर्श बुहारने वाले अधनंगे भिखारी लड़कों की तरह का लगा था,जिनके चेहरे,हाव-भाव सब में एक स्थायी दयनीयता चस्पां होती है,जो हर मुसाफिर के पास घिसटते हुए पहुँचते हैं-रूपए-दो रूपए के लिए हाथ फैलाते।

   पर मैं बेवकूफ भूल बैठा था कि वह इस दुनिया में अकेला नहीं है,कि उसका परिवार है जिनके पेट भरने की रोज की जिम्मेदारी उसके सर पर है, और महज कला जान भर लेने से पेट नहीं भर जाता। उस कला को सबके सामने लाने का और उससे कमा लेने का हुनर भी चाहिए होता है। और जरूरी नहीं कि हर कलाकार को यह हुनर आता ही हो।

        दूसरे दिन वह समय पर आ गया था।अपने परिवार के साथ।पत्नी और तीन बच्चे, जो उसकी खेल दिखानेवाली टीम के सदस्य भी हैं।और एक पुरानी साइकिल जिसमें उसके खेल के सामान बंधे थे।

        यह जुलाई के आखिरी दिन थे, इसके बावजूद आज बारिश के आसार नहीं थे,हालांकि आकाश में सलेटी बादल छाए हुए थे और दिन कबूतर के पंख की तरह सुरमई और कोमल था । मौसम का यह रूप हमारे स्कूल के लिए बहुत अच्छा था।इसलिए कि यह छोटे-से गाँव का एक छोटा स्कूल है,जहाँ छठवीं से दसवीं तक की कक्षाएँ लगती है।गिने-चुने कमरे हैं।बच्चों के बैठने के लिए अलग से कोई हाॅल नहीं है। स्कूल के सारे कार्यक्रम लाल बजरीवाले खुले प्रांगण में ही होते हैं।बरसात होने पर कार्यक्रम रद्द।

     भगवान का शुक्र था कि बरसात के दिन होने के बावजूद मौसम खुला था।

स्कूल के बच्चे और स्टाॅफ प्रतीक्षा कर हे थे कार्यक्रम शुरू होने की। बच्चे इसलिए खुश थे कि आज पढ़ाई नहीं होगी और खेल देखने को मिलेगा,वहीं स्टाॅफ इसलिए कि आज पढ़ाना नहीं पड़ेगा। और अधिकांश शिक्षक ऐसे हैं जिनके लिए नहीं पढ़ाना इस पेशे का सबसे बड़ा सुख है। 

        स्टाॅफ-रूम में लक्ष्मण सिंह हमसे मिलने वहाँ आया। आते ही उसने सभी शिक्षकों को प्रणाम किया।उसके साथ पाँचेक बरस का एक नन्हा और सुंदर बच्चा था,जिसकी आँखों में काजल की मोटी रेखा थी,गालों में रूज की लाली के दो गोले और माथे पे लाल टीका।

     ‘‘अरे,सर-मैडम लोगों को नमस्ते करो!’’उसने बच्चे से कहा।

      बच्चे ने नमस्ते में हाथ जोड़ लिए।

      मैने उसे अपने पास बुलाया,पूछा,‘‘क्या नाम है तुम्हारा ?’’

      ‘‘रामू जोकर।’’उसने सपाट भाव से कहा।

   
सुन कर मुझे एक धक्का लगा। पाँच-छह बरस की नन्हीं उम्र। नाम रामू जोकर।जोकर। जैसे अभी से उसका भाग्य तय हो गया हो आगे क्या बनना है।वह इतनी छोटी उम्र में अपने पिता के साथ काम कर रहा हैं।अभी शायद उसे काम शब्द का मतलब भी नहीं मालूम।उसके लिए अभी काम भी बस एक खेल है। वह खेल की तरह यह काम कर लेता होगा।उसके चेहरे पर कातरता नहीं,अपनी उप्र की स्वाभाविक मासूमियत थी और यही बात गनीमत लगी मुझे।पर जैसे-जैसे वह दुनिया को जानने लगेगा,सीखने लगेगा जीने के एक जरूरी गुण के रूप में।कला के साथ-साथ इस ‘गुण’ का विरासत में मिलना उसके प्रति एक घोर अन्याय लगा था मुझे। साथ ही यह भी लगा  िकइस अपराध में लक्ष्मण सिंह के साथ हमस ब शामिल हैं उसके बालपन की हत्या कर के उसे सिर्फ एक पालतू और उपयोगी जानवर बनाने में। वह कल इसका अभ्यस्त हो जाएगा और इसी निरीहता के साथ जीता रहेगा,यह जाने बगैर कि उसके भी कुछ अधिकार हैं,कि दुनिया के करोड़ों लोग इन अधिकारों के साथ जीते हैं।

मुझे गुस्सा आया था लक्ष्मण सिंह पर।लेकिन अंततः मैं कर ही क्या सकता था? मेरे सोचने भर से क्या होता है?घर-परिवार चलाने का भार लक्ष्मण सिंह को ही ढोना है।कैसे?यह उसे ही तय करना है।मेरे भावनात्मक रूप से यो पसीजने का कोई अर्थ नहीं था।

   बीच मैदान में लक्ष्मण सिंह ने अपना डेरा जमाया। उनके चारों ओर बच्चे जमा हो गए। एक अपेक्षाकृत छाँवदार जगह में प्रिसिपल और शिक्षक-शिक्षिकाएँ कुर्सियों पर।

    उसकी सूखी मरियल देह वाली पत्नी ढोलक बजाती थी और जोर-जोर से कुछ गाती जाती थी। अपनी किसी भाषा में जो हम सबकी समझ से परे थी।पता नहीं वह उडि़या गाती थी कि तेलुगु या फिर असमिया।कभी लगता यह मराठी है तो कभी लगता कन्नड़।शायद यह संथाली थी या शायद गोंडी या हल्बी या ऐसी ही कोई आदिवासी भाषा जो इस दुनिया से बहुत जल्द खो जाने वाली है।ढोलक की थाप के साथ उसके रूखे भूरे बाल बार-बार सामने आ जाते थे। पता नहीं वह क्या तो गा रही थी पर लगता था जैसे अपनी आत्मा को झिंझोड़ कर गाते हुए वह लगातार हमसे कुछ कहने की कोशिश कर रही है, किंतु हम जो उसकी भाषा से सर्वथा अनजान थे, कुछ नहीं समझ पा रहे थे सिवा उसकी ढोलक के चीखते-से धपड़-धपड़ के।बीच-बीच में उसकी आठ साल की बेटी अपनी पतली आवाज में कुछ अजीब लय में औ ओऽ ओऽ ओऽऽअ करके अपनी माँ के सुर में सुर मिलाती थी मानो उसके कहे का समर्थन करती हो।इस दौरान नन्हा रामू जोकर जमीन पर बार-बार गुलाटियाँ खाता रहा और बच्चे हँसते रहे।सबको नमस्कार करके लक्ष्मण सिंह ने अपना खेल आरंभ किया। उसने अपनी ढीली कमीज उतार कर वहीं गड़ाए डंडे पर लटका दिया। बनियान मे वह दुबला-पतला जरूर नजर आ रहा था लेकिन कमजोर या कातर कतई नहीं। ।बल्कि कमीज के उतारते ही एक गजब की चुस्ती और फूर्ति न जाने कहाँ से उसकी देह में आ गई थी,जैसे कमीज ने  जाने किन कारणों से उसकी क्षमता को अब तक दबा के रक्खा हो। अब वह हमारी आँखों के सामने एक के बाद एक करतब-दर-करतब दिखलाता जा रहा था। सबसे पहले एक रस्सी में उसने कुछ गठान लगाए और दूसरों से उसे खोलने को कहा,जब हममें से कोई उसे नहीं खोल सका तब उसने उसे पलक झपकते खोल दिया।उसके पास एक काठ की चिडि़या थी जिसे वह बांस की एक कमची में फंसाकर जैसा चाहे वैसा उड़ा सकता था। उसके हाथ में आते ही हम काठ की चिडि़या को सचमुच की चिडि़या की तरह अपने सामने उड़ता देख रहे थे और उसके पंखों की फड़फड़ाहट हमारे कानांे में गूँज रही थी।यहाँ तक कि उसकी चिंव-चिंव की मीठी आवाज भी हम सुन सकते थे। बच्चों ने एकदम खुश होकर तालियाँ बजायीं। लक्ष्मण सिंह ने इसके बाद अपनी छाती पर एक साथ चार ट्यूब लाइट्स फोडे़।उसकी छाती जैसे बिल्कुल पत्थर की थीजिससे टकराने के बाद जोर-से फटाक् की आवाज के साथ ट्यूब के गैस और काँच के चूरे बिखर गए।बच्चों ने फिर ताली बजाई।इसके बाद उसने अपने दस साल के दुबले बेटे को जमीन पर लिटा दिया और उसकी छाती पर एक के बाद एक तीन बोल्डर अपने सब्बल से फोड़ता चला गया। उसका बेटा करतब के बाद एक झटके से यों उठ खड़ा हुआ मानो अपनी नींद से अभी-अभी जागा हो। फिर जोरदार तालियाँ बजीं। इसके बाद लक्ष्मण सिंह ने अपने सीने पर रखकर दीवाली वाला एक बड़ा एटम बम फोड़ा। धमाके से पूरा स्कूल गूँज उठा और चारों तरफ धुआँ ही धुआँ भर गया। धुआँ छँटने के दौरान लोगों ने देखा लक्ष्मण सिंह अपनी देह की धूल-मिट्टी झाड़ता हुआ उठ खड़ा हुआ है और उसे एक मामूली खरोंच तक नहीं आयी है। बच्चों ने इस बार भी ताली बजायी। उसे सचमुच कुछ नहीं हुआ था और अब सबको यकीन हो गया था कि लक्ष्मण सिंह को कुछ नहीं हो सकता,भले ही उसके शरीर पर घावों के जाने कितने ही निशान थे जो उसे इन खेलों के दौरान ही मिले हैं।घावों के ये काले नीले निशान सबको काफी दूर से भी साफ नजर आते थे।इसके बाद लक्ष्मण सिंह ने अपना एक और ‘पेशल’ आयटम पेश किया। उसने 10 उउ की एक बड़ी छड़ हमको देकर इसे मोड़ने को कहा।यह हम सबके बूते से बाहर की बात थी।मैडम लोग तो शरमाके हँसने लगी थीं। सबने उसे छूकर,उलट-पलटकर देखा कि कहीं किसी जगह से बेण्ड तो नहीं या कोई और चालाकी की बात तो नहीं।लेकिन हम उस राड में कुछ भी खराबी नहीं ढूँढ सके।वह लोहे एक सीधी-सपाट और किसी आदिम चट्टान की तरह सख्त मजबूत छड़ थी। लक्ष्मण सिंह ने जब इस मजबूत राड-जिसे हम चार लोग मिलकर भी जरा-सा नहीं मोड़ पाते-को केवल अपने गले की हड्डी के बल पर मोड़ देने का असंभव-सा दावा पेश किया, तो उसके बहुत शक्तिशाली लगने के बावजूद हमने उसके इस हैरतनाक दावे पर भरोसा नही किया। राड का एक सिरा उसने जमीन में थोड़ा गड्ढा करके गड़ाया और उसके दूसरे सिरे को रखा अपने गले पर।चोट न लगे इस एहतियात से उसने गले के सामने कुछ मोड़ तहाकर अपना रूमाल रखा।उसने अपने शरीर से जोर लगाना शुरू किया।पैर के पंजों को बेहद सख्ती से जमीन पर गाड़ लिया।इस अत्यधिक बल से उसकी देह की तमाम नसें एकबारगी यों फूल ईं जैसे अभी-अभी किसी ने उनमें हवा भर दी हो।खासतौर पर उसके गले, भुजाओं और माथे की उभरीं नीली नसों के जाल को हम साफ-साफ देख पा रहे थे। और वह अपने गले की हड्डी से,पैरों से जोर पे जोर लगाता जाता था। एक पल को लगा, राॅड उसके गले को भेदकर पार निकल जाएगा। लक्ष्मण सिंह अपनी देह की समूची ताकत से जूझ रहा था।वह जैसे अपने सामने के किसी पहाड़ को ठेल रहा हो।देह से पसीने की धार छूट रही थी। उसकी मटमैली बनियान कब की पसीने से बिल्कुल तर हो चली थी।और अचानक ही,जाने कैसे इस बमुश्किल पाँच फुट हाइट वाले आदमी का कद हमारे सामने बढ़ता ही जा रहा था और अब उसकी ऊँचाई स्कूल के छज्जे को छू रही थी। उसके गले के उस हिस्से में, जहाँ राड धंसा था, पहले लाल चकते पड़े फिर ये निशान गहरे हुए, फिर खून की कुछ बूँदें सब लोगों ने छलछलाती देखीं।लक्ष्मण सिंह मानो अपनी जिंदगी दाँव पे लगाकर पूरी ताकत झाोंके हुए था, इधर उसकी पत्नी द्वारा बजाए जा रहे ढोलक पर थाप की गति एकदम बढ़ गई थी और इसी के साथ उसके गाने की लय भी तेज हो गई थी जिसे समझ पाने में हम अब भी सर्वथा असमर्थ थे।...और फिर कुछ देर तक सांस रोक देने वाले भय,रोमांच तनाव और सन्नाटे के बाद सबने देखा कि राॅड मुड़ रहा है...बीच से... धीरे-धीरे..,फिर वह क्रमशः मुड़ता चला गया, और इसी के साथ बच्चों की तालियों का शोर बढ़ता गया। फिर कुछ ही पल बाद बाद हमने देखा कि राॅड बीच से मुड़कर अँग्रेजी के ‘व्ही’ आकार का हो गया है! भले ही लक्ष्मण सिंह के गले में खून छलछला आया था, लेकिन हमने पाया स्कूल का पूरा आकाश उस के इस अचंभित विजय पर तालियों की गड़गड़ाहट और खुशी के शोर से भर उठा है!और बहुत देर तक गूँज रहा है!



   खेल खतम!

   जादू टूटता है।

   अब जो हो रहा है वह कोई करतब या कमाल नहीं है।

   रामू जोकर के हाथ में एक खंजड़ी है जिसे उसने उल्टा पकड़ा हुआ है- दिए जाने वाले पैसों के लिए कटोरा बनाकर। उसके संग उसका बड़ा भाई भी धूम रहा है।गाँव के बच्चों और एकत्रित लागों से दान मांगा जा रहा है।गाँव के सरकारी स्कूल में गरीबों के ही बच्चे पढ़ते हैं। बहुत से माँ-बाप अपने बच्चों को स्कूल भेजते ही इसलिए हैं क्योंकि यहाँ मध्यान्ह भेजन मिलता है,जिससे उनके एक समय का भोजन बच जाता है।फिर भी जिससे जो बन पड़ा वे दे रहे थे खुशी-खुशी।

  स्कूल की आज की छुट्टी हो गई थी।बच्चे अपना बस्ता लिए घर लौटने लगे।प्रिंसिपल सहित हम सभी टीचर्स स्टाफ-रूम में थे।सभी टीचर्स यहाँ शहर से आते हैं जो गाँव से पच्चीस किलोमीटर दूर है। सो सबको घर जाने की जल्दी थी।

  लक्ष्मण सिंह स्टाफ-रूम में हाथ जोड़े-जोड़े मुस्कुराते हुए आया।सबसे दान या सहयोग जो कह लें माँगने।एक पल के लिए वह आज मुझे बिलकुल नया आदमी जान पड़ा था, अभी-अभी खतम हुए उसके खेल के कारएा। पर जरा- सी देर में जान गया कि अ बवह फिर कल वाला लक्ष्मण सिंह है,कृतज्ञता से भरा और इसी के बोझ से मुस्कुराता।प्राचार्य आर. के सिंह ने उसे जब बीस रूपये दिए तो वह दबे स्वर में लगभग गिड़गिड़ाने लगा,‘सर बच्चों से भी यहाँ  कुछ खास नहीं मिला,कम से कम आप तो...।सर पचास रूपया कर दीजिए...।प्रिंसिपल ने उससे कहा, ‘अरे, हमने तुमको तुम्हारा खेल करने दिया यही बहुत है।बलिक तुमको स्कूल को ही कुछ दे के जाना चाहिए...जैसे दूसरे लोग दे के जाते हैं।खैर। मैं अभी इससे ज्यादा नहीं दे सकता।’’ प्राचार्य सिंह ठीक ही कह रहे थे,इसलिए कि अभी-अभी उनका काफी खर्चा हो गया है मकान बनवाने में,यही कोई बीस लाख। उन्होंने कुछ दिन पहले ही हमको ये बताया था। कि बिल्डंग मटेरियल्स के रेट आसमान छू रहे हैं।तिस पर करप्शन! थ्क दस हजार तो उनको खाली मकान का नक्शा पास करवाने निगम के इंजीनियर को देना पड़ा था।फिर अभी भवन पूर्णता प्रमाण पत्र के लिए पाँच हजार की डिमांड है...।पर लक्ष्मण सिंह उनसे बहुत आग्रह कर रहा था,‘सर आप इतने बड़े आदमी हैं,कम से कम पचास तो...?’ लेकिन प्रिंसिपल आर. के. सिंह बहुत होशियार प्रिंसिपल यों ही नहीं माने जाते। वे टस से मस नहीं हुए।

   लक्ष्मण सिंह अब मैडमों की तरफ बढ़ा।मैडम लोगों के लिए यह जैसे एक संकट की घड़ी थी।यहाँ चार मैडम हैं।उन्होंने मिलकर उसे बीस रूपये दिये।अब यह कहने की कोई बात ही नहीं है कि सबकी आमदनी अच्छी है और पति-पत्नी दोनों कमा रहे हैं। पर कोई क्या करे जब सब चीजों का खर्चा इतना बढ़ गया है।बच्चों के पब्लिक स्कूलों की पढ़ाई-लिखाई, सब्जेक्टवाइज ट्यूशन्स या डांस क्लासेज..कितने तो खर्चे हैं। लक्ष्मण सिंह को निपटाकर वे अपनी-अपनी स्कूटी से निकल लीं।

  लक्ष्मण सिंह मेरे पास आया तो मैंने उसकी मुट्ठी में तीस रूपये रख दिए।उसने मुस्कुराकर धन्यवाद दिया और बाहर निकल गया।

  अब वहाँ पिंसिपल और मैं ही रह गए थे।



  अभी हम कुछ बात कर पाते इससे पहले लक्ष्मण सिंह का बड़ा लड़का अपने छोटे भाई रामू जोकर के साथ अंदर आ गया। बड़े भाई ने शायद धंधे की कुछ चालाकी सीख ली है। उसने प्रिंसिपल के पैर पकड़ लिए एकदम...,‘सर, हम आपके पैर पड़ते हैं, दस रूपया तो और दे दीजिए सर...।हम माँ बच्चों के कुछ खाने के लिए दे दीजिए, सर...।’ वह सर के पैर से जोंक की तरह चिपट गया।उसने अपने छोटे भाई से भी साहब के पैर पकड़ने को बोला। नन्हा रामू जोकर भी टेबल के नीचे से कैसे भी तो घुस कर उनके दूसरे पैर से वैसे ही चिपक गया। अब कमरे में विचित्र दृश्य था, दोनों लड़के प्रिंसिपल के पैर पकड़े गिड़गिड़ा रहे हैं...सर...सर...।

    प्राचार्य उनको झिड़क रहे हैं,‘अरे छोड़ो...!ये क्या लगा रक्खा है? अबे छोड़ो!

    इधर ये दोनों थे कि उनके पैर छोड़ ही नहीं रहे थे-‘‘बहुत भूख लग रही है,सर... भजिया खाने को दस रूपया दे दो!’’ इधर प्राचार्य ने भी जैसे ठान लिया था कि इनको एक नया पैसा नहीं देना है। दोनों भाइयों ने जब कुछ नहीं मिलता देखा तो बोलने लगे...सर,पाँच रूपया ही दे दो...!सर,पाँच रूपया...!सर...! छानों बच्चे अब बिल्कुल ऐसे भिखारी बन चुके थे जिनकों देखने से पहले तो मन में अजीब-सी ग्लानि भर जाती है, फिर तीव्र घृणा।

    प्रिंसिपल ने उन्हें काफी गुस्से से देह में चढ़ आए किसी कीड़े के समान झटक दिया-‘चलो हटो साले! पीछे ही पड़ गए हैं!’ और वे तेजी से कुर्सी से उठ खड़े हुए।मुझसे कहते हुए निकल गए कि स्कूल बंद करवा देना।मैं जा रहा हूँ। और वे बाहर खड़ी अपनी कार स्टार्ट करके उसी तेजी से निकल गए।

    हमारे स्कूल में चपरासी नियुक्त नहीं है,इसकी विवशता में बच्चों से ही दरवाजे-खिड़कियाँ बंद करवा के ताला लगवाना होता है। मैं बाहर आया तो लक्ष्मण सिंह और उसकी पत्नी अपना माल-असबाब बहुत धीरे-धीरे समेट रहे थे।तीनों बच्चे भी वहीं बैठे थे। वे सभी बहुत थके हुए लग रहे थे।

   मैंने कहा,लक्ष्मण सिंह,तुम सब अंदर स्टाफरूम में बैठो।मैं तुम लोगों के लिए नाश्ता बुलवा रहा हूँ।

   स्कूल के वे दो-चार बच्चे जो स्कूल बंद करते हैं,रूके हुए थे। उनको नाश्ता लाने मैंने होटल भेज दिया।

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शनिवार, 23 मार्च 2013

अरुणाभ सौरभ



युवा कवि अरुणाभ सौरभ को मैथिली में बेहतर रचनाधर्मिता के लिए इस वर्ष का साहित्य अकादमी युवा लेखक पुरस्कार प्रदान किया गया है। सम्मान गुवाहाटी में 22 मार्च 2013 को प्रदान किया  गया । इस अवसर के लिए अरुणाभ ने अपना जो वक्तव्य तैयार किया वह पहली बार के लिए पाठकों के लिए प्रस्तुत है। एक बार फिर हम अपने युवा साथी अरुणाभ को इस महत्वपूर्ण पुरस्कार के लिए बधाई देते हुए उनके रचनात्मक जीवन के लिए शुभकामनाएं व्यक्त कर रहे हैं। एक युवा कवि किस तरह अपनी बोली-बानी से जुड़ कर महत्वपूर्ण रचनाएँ लिख सकता है, वह इस आलेख को पढ़ने से स्पष्ट होता है।  तो आईये रूबरू होते हैं सीधे-सीधे अरुणाभ के वक्तव्य से।  

अपनी रचनाशीलता के विषय में
                                                
अपने लिखने को ले कर हर रचनाकार को एक संशय एक द्वंद्व हमेशा बना रहता है। मेरे साथ भी यह गंभीर सवाल है,पर जिसके एवज मे मैं इतना ही कह सकता हूँ कि लिखना मेरे लिए एक चुनौती की तरह है। हर युग मे जितनी चुनौतियाँ गंभीर होंगी उतनी ही रचनात्मक जिम्मेदारियाँ भी बढ़ती जाएंगी। मैं अपनी मातृभाषा मैथिली और हिन्दी मे समान रूप से लिखता हूँ। स्पष्ट है कि यहाँ मुझे मेरी मातृभाषा के लिए सम्मान मिला है जो मेरे लिए बहुत गौरवपूर्ण है। मैं उस भाषा की रचनाशीलता से जुड़ा हूँ जो जनकवि विद्यापति की रचनात्मक भाषा है। जिसमे विद्यापति ने अपना सर्वोत्तम दिया है।जिसको कालांतर मे भी आधुनिक काल मे नवजागरण के बाद हरिमोहन झा, मणिपद्म, यात्री, राजकमल चौधरी, फणीश्वर नाथ रेणु आदि ना जाने कितने महत्वपूर्ण रचनाकारों ने अपनी भाषिक अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया है।

                  मैथिली एक जनभाषा है। जो अपनी विशिष्ट क्षेत्रीय संस्कारों, विशिष्ट संस्कृतियों के कारण मशहूर है। मैं उस क्षेत्र से हूँ जो क्षेत्र प्रतिवर्ष प्रलयंकारी बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं का साक्षी रहा है, जिस क्षेत्र ने न जाने कितने संताप को अपने अंदर समाहित किया है। अविकास की पीड़ा, उद्योग धंधों का अभाव,बढ़ते हुए पलायन, और उन सब के बीच गाँव और देहात के प्रति बार-बार मोह, आस्था, मुझे अपने उस क्षेत्र की तरफ खींच ले जाती हैं जो दुख-दर्द मे भी गीत गाने का  अभ्यस्त है। मिथिलाञ्चल के भी अत्यंत हाशिये के क्षेत्र कोसी अंचल का मैं हूँ जो मेरी जन्मभूमि भी है और रचनाभूमि भी। वही बाढ़, उससे उपजे विस्थापन की पीड़ा और उस सबके बीच पनपे गरीबी का मैं भुक्तभोगी हूँ जाहिर सी बात है कि मेरी रचनाओं मे वही बातें आएंगी जिसका मैं प्रत्यक्षदर्शी हूँ। इसीलिए मैथिली मेरे लिए सिर्फ अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं है, मैथिली मेरे लिए उस जीवन की तरह है जिसके जीने का मैं आदी रह चुका हूँ। जो जीवन अपनी उपलब्धियों और सीमाओं मे एक पहचान है।


         आज भूमंडलीकरण के बढ़ते प्रभाव ने समस्त भारतीय जीवन को एकांगी बनाने पर मजबूर कर दिया है। इसीलिए आज इस युग मे ग्लोबल बनाम लोकल का संघर्ष भी तेज़ हुआ है।इस ग्लोबल बनाम लोकल के संघर्ष मे लोकल की जीत हो स्थानीय संघर्षों की जीत हो ,जीत हो उस विराट सामासिक संस्कृति की जो अपनी प्रचुरता मे ना जाने कितने लोक की पीड़ा को आत्मसात कर रही है। इसीलिए मेरी कवितायें उस लोक-जीवन का हिस्सा है,जो हर स्तर पर उस वैश्वीकृत ग्राम की अवधारणाओं को चुनौती दे रहा है, स्थानीय संघर्षों को अभिव्यक्ति देने की मुहिम मे शामिल है।उस लोक गीत की तरह है जिसे जीवन गा रहा है।

        ग्लोबल हस्तक्षेप मे लोकल को बचाना मेरी नैतिक ज़िम्मेदारी है, अपने विचार संस्कृति, कला, दर्शन को बचाना भी मेरी रचनाशीलता का अनिवार्य हिस्सा है। जाति, धर्म, लिंग, नस्ल, संप्रदाय से ऊपर उठ कर विराट सामासिक संस्कृति का हिस्सा होना ही मेरी रचनात्मक पहचान है। इसके साथ-साथ प्रगतिशील कला मूल्यों की सर्जना करना एक रचनात्मक कार्य है। यह सब कुछ मेरी ज़िंदगी और कविताई दोनों का हिस्सा है। उस भाषा मे जहां अभिव्यक्ति का स्थानीय स्वरूप वही है जो मेरे आस-पास की बनती-बिगड़ती दुनिया है। उस दुनिया मे हम सब जी रहे होते हैं,पल-बढ़ रहे होते हैं। इसीलिए उस दुनिया मे प्रवेश करने, उसकी विसंगतियों से जूझने, उसके अंदर पसर रही विद्रूपताओं की पहचान करने, उसमे उठ रहे सवालों से जूझने, और उसकी बारीक समझ रखने की जब-जब कोशिश करता हूँ कविता बनती जाती है। इसीलिए मैथिली मेरे लिए प्रतिरोध की ही भाषा है। जो मिथिला के संघर्षशील आमजन की भाषा है, जिस भाषा मे पला-बढ़ा और शिक्षा-रोजगार हेतु उस क्षेत्र से पलायन को अपनी नियति मान लिया पर दिल के कोने मे पल रही भाषा मुझे लिखने पर विवश करती रही। जब-जब मैथिली मे लिखता हूँ अपने आस-पास के लोगों से जुड़ता हूँ। अपने गाँव को जीता हूँ, बार-बार विस्थापित होकर भी अपना गाँव जाता हूँ। वहाँ के लोकगीतों मे, लोककथाओं मे, और अपने गाँव के खेतों मे, खलिहानों मे बगीचों मे खो जाता हूँ। किसानी जीवन मे पाला गया हूँ और आज गाँव मे भी शहरी जीवन के ताम-झाम पसर रहे हैं। उस गाँव की संवेदना को बचाने की पूरी कोशिश मे ताक़त के साथ जुट जाता हूँ। फणीश्वर नाथ रेणु का ‘मैला आँचल’ हिन्दी उपन्यास मेरे लिए प्रेरणा स्रोत की तरह है, जिसमे आज़ादी के बाद अभाव मे पल रहे ग्रामीण जन की पीड़ा को सार्थक, और कलात्मक अभिव्यक्ति दी गयी है। इतना ही नही गाँव की कलाओं, लोकगीतों, लोककथाओं और संघर्षों का जीवंत दस्तावेज़ है- मैला आँचल’. फिर हरिमोहन झा, यात्री,राजकमल चौधरी और आज के मैथिली के लेखकों की रचनाओं से जुड़ना सुखद अनुभूति की तरह रहा। इसके अलावा अंग्रेजी, और रूसी साहित्य को गंभीरता से पढ़ते हुए मैंने अपने साहित्यिक ज्ञान का परिष्कार किया।



                  शुरुआती दौर में यानि इंटरमीडिएट तक मैं विज्ञान का विद्यार्थी रहा, जिस विज्ञान ने चीजों को समझने की वैज्ञानिक दृष्टि दी। मैं हिन्दी साहित्य का विद्यार्थी रहा हूँ, अभी भी हूँ पर हिन्दी और अंग्रेजी नहीं पढ़ा होता तो शायद मैथिली भी नही लिख पाता। इसीलिए मेरा हिन्दी और अंग्रेजी से कोई विरोध नहीं है, बशर्ते भाषिक राजनीति में प्रवृत्तियाँ साम्राज्यवादी नहीं हो। साथ ही आरंभिक दौर मे छात्र आंदोलन, वैकल्पिक समाजवाद मे आस्था आदि मेरे लिए जीवन जीने का तरीक़ा बन गया। इसी सब के बल पर आज निर्भ्रांत होकर आपके सामने हूँ।

                इसके अलावा साहित्य को पढ़ने की एक आदत  बचपन से ही रही। बी.ए करते-करते पत्र-पत्रिकाओं से नियमित रूप से जुड़ गया। हिन्दी की साहित्यिक पत्रिकाओं को पढ़कर मेरी चेतना की निर्मिति हुई है। इसीलिए बी.ए करते समय ही मैथिली की पत्रिकाओं को पुस्तकों को पहली बार देखा, एक आकर्षण अपनी मातृभाषा के प्रति हो गया सोचा क्यूँ ना इस अपनी भाषा को भी अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बानाऊ। और फिर हिन्दी और मैथिली मे समान रूप से रचने लगा। पर शुरू से ही मैं स्पष्ट था कि जो चीज़ हिन्दी मे लिखूँ वो सिर्फ हिन्दी मे लिखूँ पर जो मैथिली मे लिखूँ वो भी सिर्फ मैथिली मे ही हो। जिस चीज़ को मैथिली मे नहीं लिख सकता उसे ही हिन्दी मे लिखता हूँ और जिसको हिन्दी मे नहीं लिख सकता उसे मैथिली मे लिखता हूँ। मैथिली मेरी उस माँ की तरह है जिसने मुझे अपना दूध पिला कर पाला है, तो हिन्दी मुझे दो वक़्त की रोटी खिलाने तैयार होने और जिम्मेदारियाँ सिखलाने वाली माँ की तरह है। दोनों ही भाषाएँ मेरी अभिव्यक्ति का माध्यम इसीलिए है। पर अपनी मौलिकता मे पूरी ऊर्जा के साथ मैथिली मेरे संस्कार की भाषा है।

              जब से मैथिली में लिखना शुरू किया उस समय मैथिली मे पत्र-पत्रिकाओं का अभाव तो था ही, वैसे यह अभाव आज भी है। मैथिली मे लिखने वालों की कमी नहीं है, कमी है पत्रिकाओं की, प्रकाशकों की, पाठकों तक पहुचाने वाले नेटवर्क की। मैथिली मे हर युग मे अच्छी रचनाएँ लिखी गयी है, पर व्यापक पाठक वर्ग का अभाव, उचित प्रकाशन तंत्र के अभाव मे और वहाँ के लोगों के अंदर मैथिली को लेकर, मिथिला की संस्कृतियों को ले कर निष्क्रियता ने मैथिली मे काम करने के विश्वाश को बढ़ा दिया। एम.ए करने के दौरान 2008 मे बी.एच.यू से ही ‘नवतुरिया’ नामक मैथिली पत्रिका की शुरुआत किया अपने मित्रों से चंदा ले-ले कर और अपने खर्च के पैसों से जैसे-तैसे। मित्रों को छोड़ दिया जाय तो आम पाठकों तक पहुँचाने मे असफल रहा। पर इससे मित्रों का एक नेटवर्क ज़रूर तैयार हुआ बी.एच.यू में। ये वे मैथिली भाषी थे जो पढ़ने के लिए बनारस आए थे। उन्हें लिखना और मैथिली मे लिखी हुई चीजों को देखने का बहुत शौक था।


     सवाल मेरे लिए लिखने और मातृभाषा मे लिखने को लेकर है तो मैं स्पष्ट कर दूँ कि पूरी समझदारी और विवेक से लिया गया यह व्यक्तिगत निर्णय है, ताकि मैं लोकल होकर अपने आपको बचाए रखूँ। हमेशा बड़ी-बड़ी लड़ाइयाँ ही निर्णायक नहीं होती है कभी-कभी गुरिल्ला वार से भी कई लड़ाइयाँ जीती गईं हैं। साहित्य-संस्कृति का काम ही जीवन को बचाना और बेहतर बनाना है इसीलिए। आज उपनिवेशवादी ताक़तें जीवन को बेचने की मुहिम मे शामिल है,और साहित्य बचाने का संकल्प लेकर चलता है, इसी विसंगतियों से लड़ने मे एक छोटा सा हस्तक्षेप मैं लिख कर, नाटकों में अभिनय कर, बेहतर मानुषी प्रवृत्तियों को आत्मसात कर पूरा करना चाहता हूँ। मेरी मातृभाषा मे लिखने की प्रक्रिया भी यही है, मेरी मंशा भी यही है। विश्व के महान लेखक रसूल हमज़ातोंव ने ‘मेरा दागिस्तान’ मे अपनी मातृभाषा आवार के संदर्भ मे एक कविता लिखी है जिसकी ये पंक्तियाँ मुझे बहुत प्रभावित करती हैं-

‘’मैंने तो अपनी भाषा को, सदा हृदय से प्यार किया है
बेशक लोग कहे कहने दो, मेरी यह भाषा दुर्बल है,
बड़े समारोहों मे इसका, हम उपयोग नहीं सुनते हैं
मगर मुझे तो मिली दूध में, माँ के, वह तो बड़ी सबल है।‘’


अंततः मैं यही कहना चाहता हूँ कि मेरी मैथिली मेरे संघर्षशील आम-जन की, अंतिम जन की भाषा है जो अपनी मिठास मे कोयल की कूक की तरह, मिश्री की तरह मीठी है जिसमे लिखना उस जीवन मे शामिल होना है जिस जीवन का साक्षी हूँ, भोक्ता हूँ और जो जीवन मुझे मिला है उसे पूरी गंभीरता से जीते हुए अपना हिस्सा तय कर रहा हूँ। अपने लोकजीवन में गहराई से जुड़ना ही अब मेरी रचनात्मकता भी है और रचनात्मक पहचान भी।
        

(इस वक्तव्य में प्रयुक्त पेंटिंग्स 'मधुबनी पेंटिंग्स' हैं जिसे हमने गूगल से साभार लिया है।)

संपर्क-
ई-मेल: arunabhsaurabh@gmail.com
मोबाईल:  09957833171

गुरुवार, 21 मार्च 2013

रमाकान्त राय



मार्कंडेय जी की पुण्यतिथि विशेष के क्रम में प्रस्तुत है रमाकांत की मार्कंडेय जी के नाम पाती। अपनी इस पाती में रमाकांत ने मार्कंडेय जी की रचनाओं को आधार बनाकर कई ज्वलंत मुद्दों की ओर इशारा किया है, जो सहज ही हमारा ध्यान आकृष्ट करता है। तो लीजिये आप भी पढ़िए रमाकांत की यह पाती। 

आदरणीय श्री मार्कंडेय  जी,

सोस्ती  श्री उपमा योग्य पत्र लिखा इलाहाबाद के एक अदना से पाठक की ओर से आपके चरणों में  सादर प्रणाम पहुंचे. कैसे हैं? आने वाले १८ मार्च को तीन साल हो जायेंगे, जब आप यहाँ अपना पार्थिव शरीर छोड़ कर चले गए. हम सब बहुत रोये, आपके जाने के बाद! सारा इलाहाबाद शोक में डूब गया था. हम सब आपकी याददाश्त के मुरीद थे. सबको हमेशा इल्म रहता था कि आप नए और अपरिचित पाठकों का भी हमेशा ख्याल रखते हैं, छोटी-छोटी बातें भी ध्यान में रखते हैं. फिर आप अपनी लम्बी छरहरी, गौर वर्ण की काया पर सदैव सुशोभित सफ़ेद कुरता-पायजामा वाला शरीर कैसे भूल गए!! सबलोग बहुत निराश हुए और हताशा और निराशा में ही सबने उस शरीर को पंचतत्व में मिला दिया. आप चले गए तो सबको बहुत दुःख हुआ ! सबने अपने-अपने तरीके से आपको याद किया. देश भर में श्रद्धांजलि सभाएं हुईं, कई पत्रिकाओं में आपके विषय में चर्चा हुई, सबने याद किया कि आप कैसे थे. मैंने उन दिनों को याद किया, जब आप तमाम साहित्यिक गोष्ठियों के आकर्षण हुआ करते थे और हमलोग तर्जनी दिखा कर इशारा करते हुए, फुसफुसाया करते थे कि वही हैं, मार्कंडेय जी! अग्निबीज वाले, गुलरा के बाबा! और धीरे-धीरे खिसकते-खिसकते उस गोल में शामिल हो जाते जो आपके केंद्र के साथ बढ़ती-घटती रहती थी. हम लोग बस आपके सफ़ेद बालों की ओर देखते और कई बार यह भी देखते कि इनमें कितने सफ़ेद हैं. आश्चर्यजनक रूप से सारे के सारे बाल सफ़ेद होते थे जो आपके गोरे रंग पर बहुत फबते थे. कान, आपकी बात सुनते और नजर आपके सौम्य व्यक्तित्व पर रहा करती थी. ऐसे ही एक दिन हम लोगों ने आपको इलाहाबाद के संग्रहालय में देखा और हिम्मत करके आपके पास सिमट आये. हमने आपका उपन्यास ‘अग्निबीज’ पढ़ा था और उसके कई पात्र हमें जब-तब परेशान करते थे. आपसे आदरभाव से शुरू हुई बात-चीत जल्दी ही उत्तेजना में बदल गई और आप बहुत खुश हुए कि किशोरवय के उन पात्रों ने हमें बहुत प्रभावित किया था. आपने हमारे कई प्रश्नों को टाल दिया था और कहा था कि आप जल्दी ही अग्निबीज का अगला भाग लिखेंगे! हम वहां से टरक लिए. यह जानते हुए भी कि आप दूसरा भाग नहीं लिखने वाले. उस मुलाकात ने हमें बहुत प्रभावित किया था. और सबसे बड़ी बात तो यह कि हम इस बड़े विश्वास के साथ लौटे थे कि बड़े लोग अपने कद के अनुरूप सहज भी होते हैं.

आपको बताना  चाहता हूँ कि एक दिन मैं आपकी कहानियों का एक संग्रह पढ़ रहा था. यह नया संग्रह लोकभारती प्रकाशन से आया है. “हलयोग. मार्कंडेय की असंकलित कहानियां.” वैसे आपकी कहानियों का समग्र भी लोकभारती वालों ने छाप दिया है. मैंने असंकलित कहानियों वाला संग्रह खरीदा था. उस संग्रह में पहली ही कहानी है –हलयोग! सुना था कि यह आपकी चर्चित कहानियों में से एक है! मैंने इसे पहले भी पढ़ रखा था. कई साल के बाद फिर से यह पढ़ते हुए मैं कई दिन तक उस सूली के विषय में सोचता रहा, जिस पर चौथी माट्साहब को चढ़ा दिया गया था. मुझे बार-बार ईसामसीह की याद आती रही. हम अभी भी बर्बर समाज में रह रहे हैं न ! चौथी माट्साहब की दुर्गति ने बहुत परेशान किया. मैंने आपकी कहानी का ट्रीटमेंट देखा. जिस निस्संगता से कथावाचक कहानी कहता है और अपनी बेबसी रखता है वह हृदयविदारक है. हलयोग में जाति व्यवस्था पर आपने जिस तरह बात की है, वह बहुत सहजता से संप्रेषित हो जाती है. चौथी का मुंशी बनना जैसे पूरे गाँव के लिए चुनौतीपूर्ण है. चौथी सहज ही बच्चों के विश्वासपात्र बन जाते हैं. उनका पढ़ने, समझाने का तरीका बच्चों को बहुत सही लगता है. इस बात को बताने के लिए आपने जिस युक्ति का उपयोग किया है वही आपको अन्य से विशिष्ट बनाता है. पंडित मूलचंद दिनभर भांग घोटवाते रहते थे या छड़ी से पीटते रहते थे. उसमें भी खासकर दलित बच्चों को. उस दिन वैसे तो पंडित मूलचंद सभी बच्चों को एक गलती पर एक छड़ी मार रहे थे लेकिन “एक चमार लड़के के हाथ पर छड़ी इस तरह लग गई कि उसके नाखून से खून बहने लगा.” मैं यहाँ आकर रूक जाता हूँ, पंडित जी ने कैसे मारा होगा कि “इस तरह लग गई”, उनका मारना जरूर अपनी उस खुन्नस को उतारना रहा होगा न, जिसमें यह मानसिकता काम कर रही थी कि अगर चमारों के बच्चे पढ़ने-लिखने लगे तो, “सारा काम-धाम ही बंद हो जायेगा. भला जानवरों का क्या होगा. उन्हें चराने और गोबर-पानी के लिए आदमी कहाँ से आयेंगे.” पंडित जी ने मारा और बच्चे के ऊँगली से खून टपकने लगा तो बच्चा “रोता हुआ मुंशी जी के पास भागा. उन्होंने उसकी ऊँगली साफ की और अपनी धोती के सिरे से एक चिट फाड़ कर पट्टी बाँध दी.” मैं लगातार सोचता रहा कि आप अपनी कहानी में जिस सहजता से यह अंतर पैदा कर सके हैं वह आपकी ही खासियत है. सब यह कहते भी हैं कि आप अपनी कहानी में संकेतों से बेजोड़ काम लेते हैं. हलयोग भी एक संकेत ही है न !!

कहानी में  मैं लगातार देखता रहा  कि वह कौन सी जगह है जहाँ चौथी माट्साहब के लिए तमाम षड्यंत्र शुरू होते हैं. यह आपकी विशिष्टता ही है कि यह षड्यंत्र बहुत सहज तरीके से आगे बढ़ता है. आप तो जानते ही हैं कि कहानी में कहन की बड़ी भूमिका है. आजकल की कहानियों में यह दुर्लभ होता जा रहा है. लोग कथावस्तु और कला में इस कदर उलझे हुए हैं कि यह भूल जाते हैं कि कहन बड़ी चीज है. कोई भी कहानी बिना कहन के बोझिल गद्य ही है. हलयोग में विवेक अभी बच्चा तो है, लेकिन उसके कहने का अंदाज आकर्षक है. वह अपने देखे और समझे के हिसाब से ही बात कहता है. जब चौथी के खिलाफ पूरा गाँव साजिश करता है, वह एक छोटी सी, मासूम परेशानी में उलझा हुआ है कि तबादला हो जाने के बाद “क्या मुंशीजी अब हमें कभी नहीं पढ़ा सकेंगे. क्या वे कहीं और चले जायेंगे, क्या उन्हें गाँव छोड़ देना पड़ेगा..” तो यह भी कहना है कि आपकी कहानियों में गजब की किस्सागोई है. यह मैंने ‘हंसा जाई अकेला’ पढ़ते हुए भी महसूस की और इस संग्रह की अधिकाँश कहानियों में भी.

अच्छा, ये बताइए कि आपने कैसे यह महसूस  किया? सब कहा करते हैं कि नयी कहानी के कथाकार भोगे हुए यथार्थ की कथा कहते हैं. मैं उनकी बात मान  लेता हूँ. आपने भी यह जरूर देखा होगा. जौनपुर, जहाँ की यह कहानी है, वहां यह मानसिकता तो है ही. मैं इस कहानी लिखे जाने के कई वर्ष बाद लिखे गए मैत्रेयी पुष्पा का उपन्यास ‘अल्मा कबूतरी’ पढ़ रहा था. देखा कि दलित बच्चों के पढ़ने पर अक्सर सभ्य कहे जाने वाले समाज में दिक्कत शुरू हो जाती है. वहां राणा नाम का कबूतरा पढ़ने की कई कीमतें चुकाता है. उससे पहले एक और कबूतरा रामसिंह भी पढ़-लिखकर मास्टर तो बन जाता है पर व्यवस्था का शिकार बन जाता है. उसे सत्ता और पुलिस की दुरभिसंधियां मार डालती हैं. तो यह भी कहना है कि यह जो आपने हलयोग में लिखा है यह स्थानीय कहानी नहीं है, यह बड़े फलक को छूती हुई कहानी है. यह प्रेमचंद की कहानी सद्गति का विस्तार है.

मैं कहानी  में देख रहा था कि कैसे चौथी माट्साहब के ऊपर भूत-प्रेत  का साया है, यह दिखाने के लिए  महाराज के पौत्र श्रीकांत तफसील से बताते हैं कि उनपर बरम बाबा का साया है तभी उनकी आँखे लाल-लाल हैं. यह भी गढ़ा जाता है कि “बचपन में उसने बरम बाबा के चबूतरे पर पेशाब कर दिया था.” स्कूल  इंस्पेक्टर के तीन शिकायतों पर जब मुंशी जी से सफाई मांगी जाती है तो वे उस पर्चे को फाड़ देते हैं. आखिर ऐसे वाहियात पर्चे पर सफाई कैसे दी जा सकती है, जो बच्चों में भेद करता है, जो जाति और वर्ण का अंतर करता है और इसे मिटाने के प्रयास पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है. उनके इस व्यवहार को उनपर बरम के साए का प्रकोप माना जाता है. उनकी तबियत कई तनावों और शारीरिक अस्वस्थता से बहुत नाजुक हो गई है लेकिन उनका इलाज करने के बजाय उन पर बरम का साया बताया जाता है और यह ठीक भी समझ लिया जाता, लेकिन आप बताते हैं और संकेत दे देते हैं कि ऐसी ही स्थितियों में स्वयं विवेक के लिए दूर दूर से राजवैद्य बुलाये जाते हैं और चंडी पाठ एक विकल्प की तरह होता है जबकि मुंशीजी की कोई बात नहीं सुनना चाहता. उन्हें पहले बरम उतारने के लिए ओझा सोखा के हवाले किया जाता है और बाद में हलयोग.. यह अंतर ही बताने के लिए काफी है कि यह क्या था, षड्यंत्र ही न !! हलयोग तो एक तरह से सूली पर चढ़ाना ही न है!

मैं यह कहानी  पढता हूँ और मुझे उदय प्रकाश की कहानी ‘तिरिछ’ की याद  आती है. मुझे उन्हीं की कहानी  ‘मोहनदास’ की याद आती है. यह सब आपके प्लाट का विस्तार  हैं. मुझे शिवमूर्ति की भी एक कहानी याद आई, और भी कई कहानियां, जो ऐसे ही किसी अंश या प्लाट पर आधारित हैं. आप जानते हैं, कि ये लोग  आज के दौर के बड़े कहानीकार हैं. मैंने पढ़ा था कि एक सफल और बड़ी कहानी वह है जो अपनी बात समग्रता में कहती है और अपने कहन के बाद उससे जुड़ा कुछ नहीं शेष रखती. बाद की कहानियों को पढ़ कर देखा तो लगा कि आपकी यह कहानी ‘समग्र’ को ऐसे कहती है कि आज के बड़े कहानीकार उससे अंश लेकर (जाने-अनजाने) ही सफल कहानी रच देते हैं. इस नाते से आपके लिए मैं कह ही सकता हूँ कि आप बड़े कहानीकार हैं. वैसे मेरे जैसे अदने पाठक से यह सुनना आपके लिए कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन जब मैं आपको यह पत्र लिख रहा हूँ तो यह मेरा अनुभूत है.

आपने अपनी कहानियों में गाँव के जीवन का बहुत प्रामाणिक वर्णन किया है. और मैंने यह भी महसूस किया कि आप अपनी कहानियों में विषय का दोहराव नहीं करते. संग्रह में जितनी भी कहानियां हैं वे यद्यपि प्रारम्भिक दौर की हैं लेकिन उनके प्लाट भिन्न हैं. यह आपके व्यापक अनुभव का परिचायक हैं. यह बड़ी बात है जो अन्य कहानी लिखने वालों को सोचनी चाहिए. 

आखिर में, एक बात और कहना चाहता हूँ कि आपकी कहानियां पढ़ते हुए मुझे शब्द की ताकत का अहसास भी हुआ और यह भी समझ में आया कि शब्द को फिजूल नष्ट नहीं किया जाना चाहिए. कहीं भी कहानी में अनावश्यक वर्णन या विस्तार नहीं, सटीक शब्द और व्यंजित करने वाले सधे हुए प्रयोग. जरूरी हुआ तो तत्सम रूप रखा और अगर लगा कि ‘यश’ की जगह ‘जस’ कहने से ज्यादा अर्थ व्यंजक होगा तो वही प्रयोग किया. शब्द की ताकत बड़ी होती है, यह मुझे प्राथमिक कक्षाओं में ही सिखा दिया गया था. आपकी कहानियों ने उसका समुचित प्रयोग करके दिखाया.

अंत में, यह भी कहना है कि आपकी कहानी  वाली किताब ने हमलोगों  को कई बार कहानी पढने की तमीज सिखाई है.

मैं, अब यह चिट्ठी समाप्त करना चाह रहा  हूँ. यह सोचते हुए कि आप हमेशा नए और उदीयमान लोगों  को सराहते आये हैं और प्रोत्साहित  करते रहे हैं, चिट्ठी पढ़कर एक नए पाठक की बात समझेंगे  और यह अधिकार भी देंगे कि फिर, जब मन चाहे आपको याद कर सकूं.

आपको प्रणाम!
आपका ही-- 
रमाकान्त  राय 
प्रवक्ता, हिंदी
राजकीय  इन्टर कालेज, कोन  
सोनभद्र, उ. प्र., २३१२२६

सम्पर्क

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बुधवार, 20 मार्च 2013

दुर्गा प्रसाद सिंह






मार्कण्डेय जी की पुण्यतिथि पर विशेष प्रस्तुति के क्रम में आज प्रस्तुत है दुर्गाप्रसाद सिंह का आलेख 'प्रेमचंद की परम्परा के विस्तार हैं कहानीकार मार्कण्डेय.' दुर्गाप्रसाद मार्कण्डेय जी के आत्मीय रहे हैं और इन दिनों उनके अप्रकाशित कार्यों के प्रकाशन का दायित्व निभा रहे हैं.  
 
प्रेमचंद की परम्परा के विस्तार हैं कहानीकार मार्कण्डेय

आज जबकि गाँव और किसान दोनों बाजारवादी प्रसार के बीच बेतरह पीछे छूटते जा रहे हैं और विकास की वेदी पर उनको होम किया जा रहा है मार्कण्डेय को याद करना ज्यादा मार्के का काम लगता है। क्योंकि मार्कण्डेय की कहानियों के केन्द्र में यही गाँव और किसान हैं। मार्कण्डेय का जन्म खुद एक किसान परिवार में १९३० ईस्वी में हुआ था। जो जौनपुर जिले के बराई गाँव में पड़ता है। छठवीं कक्षा के बाद वे अपनी बुआ के यहाँ प्रतापगढ़ चले गये जहाँ इण्टर तक की पढ़ाई के बाद उच्चशिक्षा के लिए इलाहाबाद पहुँचे और वहीं जीवनपर्यन्त रहे। इस किताबी ज्ञानशालाओं की यात्रा के साथ-साथ मार्कण्डेय एक और ज्ञानशाला में बचपन से ही अपने बाबा की अँगुली पकड़ कर दाखिल हो चुके थे जो देश और समाज की थी। यानी, ब्रिटिश सामाजी हुकूमत के खिलाफ कांग्रेस की किसान सभाओं में जाना। किसानों से शुरू हुआ वह जुड़ाव प्रतापगढ़ में जा कर और गहरा हुआ जब वे वहाँ आचार्य नरेन्द्र देव और किसान आन्दोलनों के सीधे सम्पर्क में आये। यहीं पर नरेन्द्र देव द्वारा चलवायी जाने वाली कक्षाओं में मार्क्सवाद से परिचय हुआ और यही उनका विश्व दर्शन बना। मार्कण्डेय ने इन्हीं जीवन अनुभवों और विचारों की सम्पदा के साथ साहित्य में प्रवेश किया। मार्कण्डेय के लेखन की शुरुआत प्रतापगढ़ में ही हो गयी थी। उन्होंने अपनी पहली कहानी १९४८ में साम्प्रदायिक दंगों परगरीबों की बस्तीनाम से लिखी। तेलंगाना के किसान संघर्ष १९४८ में हीरक्तदान कहानी लिखी, इसके अलावाखोया स्वर्ग’, ‘आम का बागीचा’, ‘शहीद की माँ’, नामक कहानियाँ लिखी थी लेकिन साहित्य जगत् में एक कहानीकार के रूप में उनकी चर्चागुलरा के बाबा  नामक कहानी से हुई यह कहानी १९५१ . में तब की महत्त्वपूर्ण पत्रिकाकल्पनामें छपी। १९५४ . में उनका पहला कहानी संग्रहपान फूनवहिन्द प्रकाशन हैदराबाद से आया। १९६० . तक उनके नाम सेहंसा जाई अकेला’, ‘महुए का पेड़’, ‘सहज और शुभ’, ‘भूदानकहानी-संग्रह, ‘सेमल के फूउपन्यास, ‘सपने तुम्हारे थेकविता-संग्रह, ‘पत्थर और परछाइयाँएकांकी-संग्रह और एक खुद का प्रकाशन नया साहित्य नाम से जुड़ चुके थे। इसके बाद उनके अन्य कहानी-संग्रहमाही’, ‘बीच के लोगतथा उपन्यासअग्निबीजआते हैं। मार्कण्डेय नेकहानी की बातनाम से एक आलोचनात्मक किताब भी लिखी। कल्पना पत्रिका में १९५४ से १९५९ . के बीचचक्रधरनाम सेसाहित्य-धारास्तम्भ भी लिखा। १९६९ . मेंकथानाम की पत्रिका का सम्पादन शुरू किया। उनका एक कहानी संग्रहहलयोगकहानी-आलोचना की किताब, नयी कहानी : यथार्थवादी नजरिया, काव्य-संग्रहयह पृथ्वी तुम्हें देता हूँतथा चक्रधर के नाम से लिखी टिप्पणियों का संकलनसाहित्य-धाराप्रकाशित हो चुका है। इसके अतिरिक्त उनके बहुत सारे लेख अभी संकलित होने बाकी हैं।


  मार्कण्डेय ने अपनी कहानियों में आ़जादी के बाद के बदलते गाँव को चित्रित किया है। ये गाँव कोई रोमानी गाँव नहीं हैं बल्कि विविध स्तरों में विभाजित अपने माहौल में पहचाने जाने वाले ठोस गाँव हैं। इन गाँवों में व्याप्त पिछड़ेपन, विषमता, शोषण, गरीबी को वे अपनी कहानियों का केन्द्रीय तत्त्व बनाते हैं और इसी के इर्द-गिर्द चरित्र र्निमित करते हैं। कुछ लोग गाँव का नाम आते ही अहा..भाव से भर जाते हैं। मार्कण्डेय के यहाँ गाँव इस अहा...भाव से अलग हैं इसके उन्हीं की कहानी कल्यानमन में मंगी के इस कथन ‘‘जानता नहीं है कि यहाँ भूंय के लिए मूंडी काट लें लोगसे समझा जा सकता है। अर्थात् ऐसे जो जीवनगत स्वार्थ, छल, प्रपंच, लालच से भरे हुए हैं। लेकिन ऐसे गाँव में ही मार्कण्डेय उन चरित्रों की शिनाख्त भी करते हैं जो मानवीय मूल्यों तथा जिजीविषा की भावभूमि पर अडिग अपराजेय खड़े हैं। इसे उनकी कहानी प्रलय और मनुष्य में बखूबी देखा जा सकता है जहाँ लोभ, लालच में डूबे हुए सारे मनुष्य जलजीवों में रूपान्तरित हैं तो मनुष्य के रूप में सिर्फ बसता राउत है जो नदी की हरहराती लोभ लालच की धारा से संघर्ष करता है। कुल मिला कर उनकी कहानियों में तमाम निराशाजनक स्थितियों के बावजूद प्रतिरोध की चेतना मिलती है। 
मार्कण्डेय की कहानियों में सचेत वर्ग विभाजित गाँव नहीं है सिर्फ बीच के लोग कहानी में ही वह है लेकिन अधिक विश्वसनीय नहीं क्योंकि हिन्दी प्रदेशों में सचेत वर्ग विभाजित गाँव अपनी पूरी विशेषताओं के साथ तब तक अस्तित्व में नहीं आये थे इसीलिए मार्कण्डेय के यहाँ भूमि समस्या से जुड़ी हुई कहानियाँ तो हैं लेकिन उसका राजनीतिक स्वरूप स्पष्ट नहीं है या दबा-सा है। ऐसा इसलिए भी है कि चूंकि नयी कहानी अपने पीछे की बनावटी या झूठे परिवेश की कहानियों से विद्रोह करके ही अस्तित्व में आयी थी अर्थात् परिवेश की प्रामाणिकता उसका एक प्रमुख तत्त्व था। इसलिए वे अपनी कहानियों का केन्द्रीय तत्त्व ग्रामीण समाज की विषमता और अंतर्विरोध को बनाते हैं जो आजादी के बाद की सत्ता की नयी र्निमितियों के सम्पर्क और द्वन्द्व से उभर रही थी। परिवेश की प्रामाणिकता के साथ-साथ मार्कण्डेय अपनी कहानियों में घटना के बजाय चरित्रों पर अधिक ध्यान देते हैं। एक प्रमुख चरित्र के सहारे वे कहानी में प्रवेश करते हैं और उसी के सहारे घटनाओं तक पहुँचते हैं और उनका यह चरित्र अन्त में कोई ऐसा निर्णय लेता है जिसका आभास पहले से नहीं रहता। गुलरा के बाबा, कल्यानमन, महुए का पेड़, हंसा जाई अकेला, कहानी के लिए नारी पात्र चाहिए, प्रिया सैनी, माही, सूर्या, मधुपुर के सीवान का एक कोना, बीच के लोग-जैसी कई कहानियों में इसे देखा जा सकता है। उनके समकालीनों में एक प्रमुख चरित्र के साथ कथा तत्त्व विकसित करने की खूबी निर्मल वर्मा में अधिक है लेकिन उनके चरित्र मनोजगत् से गहरे सम्पृक्त रहते हैं इसलिए एक अनिर्णय और रहस्य की स्थिति वहाँ रहती है। अन्य लगभग सभी उनके समकालीनों में घुटनाओं और प्रसंगों के सहारे कथा बुनने की खासियत अधिक मिलेगी। मार्कण्डेय के यहाँ ऐसा इसलिए भी है क्योंकि वे जीवन स्थितियाँ, घटनाओं, प्रसंगों के साथ तटस्थता का रिश्ता रखने की बजाय पक्ष लेते हैं, हंसा, गुलरा के बाबा, दुखना, मंगी, बसंता, वचन, फौदी दादा, बुझावन और हलयोग का दलित मास्टर इसकी ताकीद करते हैं।

मार्कण्डेय अपनी कहानी गुलरा के बाबा से पहली बार चर्चा में आते हैं यह कहानी १९५१ में कल्पना में छपी थी जो हैदराबाद जैसे गैर हिन्दीभाषी जगह से निकलती थी और जहाँ उसी वक्त तेलंगाना का किसान संघर्ष नये-नये आजाद भारत के नेहरू सरकार द्वारा बर्बर दमन का शिकार हुआ था और कम्युनिस्ट पार्टी हथियारबन्द किसान संघर्ष से सिद्धान्तत: पीछे हट गयी थी कल्पना बदरीबिसाल पित्ती निकालते थे जो लोहिया के घनिष्ठ मित्र थे और समाजवादी भी समाजवादियों ने बाद में हालाँकि  जो जमीन सरकारी है वो जमीन हमारी है का नारा दिया जरूर लेकिन अपनी रणनीति में वे वर्ग सहयोग के सिद्धान्त को ही मानते थे यह सब इसलिए कि यह कहानी इन सब बातों से गहरे जुड़ी है। १९४८ में मार्कण्डेय एक कहानी लिखते हैं रक्तदान यह कहानी तेलंगाना के किसान संघर्ष को केन्द्र में रखकर लिखी गयी है और सिद्धान्तत: हथियारबन्द किसान संघर्ष को मानती हुई कहानी है यह कहानी कहीं छपी नहीं और कहानी के रूप में यह एक प्रारम्भिक प्रयास है लेकिन मार्कण्डेय की चेतना में किसान समस्या को लेकर जो चल रहा था वह इस कहानी में है तब वे प्रतापगढ़ में थे जहाँ जमीन का पूरा संकेन्द्रण था तालुकेदारी प्रथा थी विषमता बहुत ज्यादा थी और किसान आन्दोलन भी था नरेन्द्र देव इस आन्दोलन के विचारक और अगुवा थे। थे तो कांग्रेस के वाम धड़े के नेता लेकिन मार्क्सवाद की कक्षाएँ प्रतापगढ़ में चलवाया करते थे। मार्कण्डेय इन कक्षाओं को अटेण्ड करते थे और उन्होंने रियलाइज कर लिया था कि किसान समस्या का हल नरेन्द्र देव के पास नहीं तेलंगाना के रास्ते ही है और रक्तदान कहानी इसी की अभिव्यक्ति है। लेकिन १९५१ तक बहुत कुछ बदल चुका था वे इलाहाबाद गये और प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़ गये बाकी ऊपर बताया जा चुका है। प्रगतिशील लेखक संघ में भी यह बहस थी क्रान्ति कैसे  होगी और कौन करेगा मार्कण्डेय इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे और इस बात पर जोर देने लगे थे कि हमें किसान और जमींदार के सम्बन्ध को समझने की जरूरत है। उनका मानना था कि जो भूमिहीन गाँव के जमींदारों के आतंक और शोषण से भाग कर मिल, फैक्ट्री कारखाने में काम करने जाता है वह वापस आता है तो उसी जमींदार के लिए गिफ्ट भी लाता है अर्थात् भूमि से जुड़े उत्पादन सम्बन्ध मिल के मजदूर मालिक सम्बन्ध से जटिल होते हैं। गुलरा के बाबा मार्कण्डेय के इस नये रियलाइजेसन की कहानी है और आगे मार्वâण्डेय भूमि उत्पादन सम्बन्ध की इसी जटिलता को कई कोनों से अलग-अलग कहानियों में देखते हैं। जैसे कल्यानमन घुन घूरा सवरइया महुए का पेड़ बादलों के टुकड़े मधुपुर के सिवान का एक कोना आदि। लेकिन यह जटिलता किसान संघर्षों के रास्ते का रोड़ा नहीं है इसे तो तेलंगाना की लड़ाई ने सिद्ध ही कर दिया था बल्कि इसका भी हल उसी में निहित था। फिर आता है १९६९ का नक्सलबाड़ी किसान संघर्ष और मार्कण्डेय वापस रक्तदान वाली पोजीशन में पहुँच जाते हैं और बीच के लोग कहानी १९७२ में लिखते हैं जिसमें वर्ग सहयोग की धारणा को वे त्याग देते हैं।
बीच के लोग कहानी में फउदी दादा कहते हैंहम लोग चलते हैं, अब से मोर्चे पर कभी नहीं आयेंगे, शरीर बहुत थक गया है।

इस पर लाल झण्डा पाल्टी का मेम्बर और फउदी दादा के हलवाहे रहे बुझावन का बेटा मनरा कहता हैजरूरत तो ऐसी ही है। अच्छा हो कि दुनिया को जस-की-तस बनाये रहने वाले लोग अगर हमारा साथ नहीं दे सकते तो बीच से हट जायें, नहीं तो सबसे पहले उन्हीं को हटाना होगा, क्योंकि जिस बदलाव के लिए हम रण रोपे हुए हैं, वे उसी को रोके रहना चाहते हैं।


भूमि संघर्ष जितना तीखा होता है उतना ही उसका वर्गीय रूप स्पष्ट और पहचान में आता जाता है। बीच के लोग कहानी में भूमि संघर्ष का वह रूप नहीं है। वह है उन्हीं की कहानीबवण्डरमें जो अबहलयोगसंग्रह में संकलित है। इसे उपन्यास के रूप में ड्राफ्ट किये थे लेकिन लिख नहीं पाये फिर भी जितना है उसमें स्पष्ट है कि अपने अन्तर्वस्तु और विचार में वह बीच के लोग से आगे बढ़ी हुई कहानी है। उसमें भूमि संघर्ष का तीखा रूप मिलता है। वहाँ किसी केआने-जानेऔरहटानेकी गुंजाइश नहीं है। इस कहानी में जमींदारों द्वारा खेत मजदूरों की बस्ती जला दी जाती है, औरतों के साथ बलात्कार किया जाता है। जमींदारों की क्रूरता और अमानवीयता का जो रूप इस कहानी में मार्कण्डेय ने उपस्थित किया है वह संभवत: मैला आँचल में भी नहीं है।

'बीच के लोग' के प्लाट और 'बवण्डर' के प्लाट में इतना अन्तर अचानक नहीं था बल्कि उसकी पृष्ठभूमि थी।बीच के लोगकहानी भूमि संघर्ष के सचेतन वर्ग-विचार के सिद्धान्त के प्रभाव में लिखी गयी है जबकिबवण्डरउस विचार के व्यावहारिक परिणति के रूप में लिखी गयी है अर्थात् बिहार के प्रसिद्ध बेलछी नरसंहार काण्ड (1977) की छाया इस पर है। भोजपुर के किसान आन्दोलन ने बहुत सारे अब तक के अनचीन्ही वास्तविकता को लेखकों के सामने उपस्थित किया। विचार और सिद्धान्त के जो रूप साहित्य में रहे थे वह जब वास्तविकता के रूप में जमीन पर उपस्थित हुआ तो वह साहित्य के उपस्थिति से बहुत भिन्न था। भूमि सम्बन्धों के पितृवत् आधार और उसकी रूमानियत जो खुद मार्कण्डेय की कहानियों में थी वह छिन्न-भिन्न हो चुका था। 'बवण्डर' कहानी इसी की वास्तविक तस्वीर प्रस्तुत करती है।बीच के लोगकहानी में भूमि-संघर्ष केन्द्रीय विचार (सेण्ट्रल आइडिया) के रूप में तो है लेकिनप्लाटबहुत कुछ केन्द्रीय विचार के सापेक्ष प्रामाणिक नहीं है। यह प्रमाणिकता तो हिन्दी पट्टी में भोजपुर किसान आन्दोलन से ही आती है नागार्जुन की कविता हरिजन गाथा की जो ऊर्जा और ताप है वह कविता के सिद्धान्त से सम्भव होती तो पहले ही लिखी जा चुकी होती।बवण्डरकहानी के साथ भी वही है जहाँ 'बीच के लोग' की तरह सिर्फ परिवेश ही प्रामाणिक नहीं है बल्कि घटना, पात्र सब प्रमाणिक हैं। मार्कण्डेय चूँकि यह मानते हैं कि ग्रामीण यथार्थ बिना भूमि समस्या को समझे पूरा नहीं होता। और ग्रामीण यथार्थ बिना आम किसान के जीवन की समस्या के बिना पूरा नहीं होता। प्रेमचन्द इसीलिए ग्रामीण यथार्थ में बड़े कथाकार हुए हालाँकि उनके यहाँ भूमि-समस्या उतनी नहीं है जितनी भूमि-सम्बन्धों पर लिखी ग्रामीण सांस्कृतिक स्थिति सिर्फ 'पूस की रात' ही भूमि समस्या के रूप में देखी जा सकती है। या मुक्तिधन या मुक्तिमार्ग। बाकी 'सवा सेर गेहूँ', 'सद्गति' आदि ग्रामीण यथार्थ के सांस्कृतिक पक्ष से ज्यादा जुड़ी हैं। फिर भी उसकी जो प्रामाणिकता है वह आम किसान-जीवन से ही आती है। मार्कण्डेय निरन्तर इसी तरफ बढ़ते  हैं।महुए का पेड़’, ‘सवरइया’, 'घुन', 'कल्यानमन', 'मधुपर के सिवान का एक कोना', 'दौने की पत्तियाँ' आदि ऐसी ही कहानियाँ हैं जो भूमि-सम्बन्धों, भूमि-समस्या और आम किसान-जीवन की सांस्कृतिक स्थिति को लेकर बुनी गयी हैं लेकिन बवण्डर या बीच के लोग जैसी कहानी समय की एक खास स्थिति में ही सम्भव हो पायी। वह प्रेमचन्द के समय में नहीं लिखी जा सकती थी। मार्कण्डेय इसीलिए प्रेमचन्द की परम्परा के विस्तार हैं और नये आयाम भी हैं।

दुर्गा प्रसाद सिंह इलाहाबाद विश्वविद्यालय से 'मार्कण्डेय और शिवप्रसाद की कहानियों का तुलनात्मक मूल्यांकन' विषय पर शोध कार्य पूरा कर चुके हैं. आजकल जन संस्कृति मंच की 
इलाहाबाद इकाई के संयोजक हैं.

 

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   (मार्कण्डेय जी के साथ दुर्गाप्रसाद सिंह)