चंद्रेश्वर




30 मार्च 1960 को बिहार के बक्सर जनपद के एक गाँव आशा पड़री में जन्म।
पहला कविता संग्रह 'अब भी' सन् 2010 में प्रकाशित। एक पुस्तक 'भारत में जन नाट्य आन्दोलन' 1994 में प्रकाशित।
'इप्टा आन्दोलन : कुछ साक्षात्कार' नाम से एक मोनोग्राफ 'कथ्यरूप' की ओर से 1998 में प्रकाशित।
वर्तमान में बलरामपुर, उत्तर प्रदेश में एम.एल.के. पी.जी. कॉलेज में हिंदी के एसोसिएट प्रोफेसर।
चंद्रेश्वर पाण्डेय की कविता में एक गँवई मन दिखाई पड़ता है। ऐसा मन जो किसी वक्त दुश्मन पर भी यकीन कर लेना चाहता  है. यहाँ मुझे आस्ट्रियाई रचनाकार स्टीफ़न ज्विग की वह पंक्ति याद आ रही है जिसमें वे कहते हैं कि किसी भी प्रकार की शक्ति हिंसक होती है। यहाँ यह कवि भी कहता है कि 'चाहे जैसा भी हो/ लक्ष्य-भेद/ हिंसा तो होगी ही!' पहली बार पर हम चंद्रेश्वर की कुछ इसी तरह की कविताओं से रू-ब-रू होते हैं।

 



दुश्मनी में  प्यार


ऐसा तो आया नहीं कोई
मेरे जीवन में
अब तक
जो पिघला न हो
मेरे अनुनय-विनय
मेरी दुनियादारी से
थोड़ा भी


बिलकुल लौह कपाट की तरह
आपका ह्रदय 
सुना है प्यार 
छुपा रहता है
दुश्मनी में भी कभी  दुश्मन भी चाहते हैं
होना रू-ब-रू
आसपास होना


यकीन.... ....
सच में 
यकीन कर लेने का चाहता  है
जी 
किसी वक्त दुश्मन पर भी  


पर, आप तो एकदम ठोस
ठस्स एकदम


थोड़ा भी!
पता नहीं, कितनी ऊर्जा 
कितना ताप चाहिए 
कि पिघल सकें आप
थोड़ा भी!



हिंसा  

अर्जुन की निगाह  थी टिकी
मछली की आँख पर
था जिसे भेदना उसे
दिखाना था करतब
पुरुषार्थ का  

चाहे जैसा भी हो
लक्ष्य-भेद
हिंसा तो होगी ही!



पहलवान चाचा

कौन नहीं जानता गाँव-जवार में
नासिर मियाँ को
मशहूर जो पहलवान चाचा के नाम से
हैं अस्सी-पिचासी के
दिखती उनकी मांसपेशियाँ  कसी-कसी
उनका कद दरमियाना है
उनकी 'सहज विलंबित मंथर गति' के तो
कहने ही क्या
उन्होंने सीखे नहीं सिर्फ दाँव-पेंच
पहलवानी के ही
उनके पास हुनर कई एक से बढ़ कर एक
वे पलक झपकते बैठा देते
कैसी भी मोच खायी हड्डियाँ
सही कर देते कोई दबी  नस
हँसा देते रोते आदमी को
मर्सिया के साथ गाते सोहर भी
मुहर्रम में 'बाना-बनैठी' 'गदका' खेलते
तो बनते दशहरे की रामलीला में
हनुमान भी
देने पर इनाम किसी काम के बदले
कहते इतना भर की 'मना  किया है
कुच्छो लेने से मेरे उस्ताद ने!' 

आज पहलवान चाचा जान  पड़ते पात्र
किसी काल्पनिक दुनिया के
जाने किस मिट्टी या धातु के बने हैं
जो टस से मस नहीं होते
मेरे वक्त में
अपने वक्त में
नेक इरादे से!

 
साथी कमला प्रसाद  

साथी कमला प्रसाद से मिला था
मैं भी
दो-चार बार  

उनके मिलने-जुलने
बात करने के
याराना ढब में ही
था वो जादू
कि जादू विचार की गर्माहट का
कि हम बन जाते थे
उनके करीबी!



थोड़ी-सी जगह  

रेल की इस जनरल बोगी में चाहिए मुझे
थोड़ी-सी जगह
जहाँ रोप सकूँ मैं
अपने पैर  

किस कदर भरी है बोगी
ठसाठस
खिड़कियाँ तक ढँकी हैं
भीड़ से  

कहीं कोई सुराख़  नहीं
कि आ सके इसमें
ताज़ा हवा
मौसम भी उमस भरा
चिपचिपा
कोई गुंजाइश नहीं
जरा भी
कोन चाहेगा होना बेदखल
अपनी जगह से
ऐसे में हो रहा दूभर
साँस लेना  

अब मैं एकदम नाउम्मीद
कि पाना जगह बोगी में
थोड़ी-सी भी
नामुनकिन  

यूँ ही काटना होगा सफ़र
किसी तरह टिकाये पैर
उँगलियों पर...
कि  खिड़की के पास
सीट पर बैठा आदमी सिकुड़ते  हुए
तनिक बनाता है मेरे लिए
थोड़ी-सी जगह !




संपर्क-
मोबाईल: 09236183787
ई-मेल: cpandey227@gmail.com

टिप्पणियाँ

  1. पहली कविता तो लाजबाब है भाई ...दिल को छू गयी | बहुत बधाई

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  2. अच्छी लगी सभी कविताएँ एवं चित्र ....सादर

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  3. Saral abhivayakti! Bahut badhai. Abhaar. - kamal jeet choudhary ( j and k )

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  4. ek khaas andaazein bayan, khaas deshaj si shaili mein kahi gayi, kuch kavitayein, rail ki bogi wali, bheed mein bus thodi jagah ki baat, bahut umda, aur dushamani ki nazaqat pakadti, kai kai nabz uski, sundar kavitayein

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