बाइ जुई: कालजयी लोकधर्मी कवि




विश्व के लोकधर्मी कवियों की श्रृंखला' की पहली कड़ी में आपने वाल्ट व्हिटमैन के बारे में पढ़ा। इसकी दूसरी कड़ी में आज प्रस्तुत है चीन के मशहूर लोकधर्मी कवि  बाइ जुई के बारे में

विजेन्द्र
 
बाइ जुई : कालजयी लोकधर्मी कवि        


बाइ जुई की एक कविता है, बरखा। कवि कहते हैं -

धरती और लोग-बाग
सूखा में दोनों  ही झेलते हैं दुख
किसान भौचक्का है
खेत वह कैसे करेगा हरा भरा
शेष जन भी सोचते हैं
अपनी प्रिय वस्तुओं के बारे में
मैं चिंतित हूँ
अपने देवदार और बाँस के पौधों के लिये
दोनों दिखते हैं मुरझाये और मरे
हर दिन हूँ बेचैन उनके लिये
कमेरे उनकी पत्तियों और जड़ों को सींचते हैं
फिर पूरब से उठती है घनघोर काली घटा
ताज़गी भरा बरसने लगता है बादल
जैसे कि धुल गये हों धूल सने चेहरे और बाल
पेड़ अपनी हरी कौंपलें लहराते हैं स्वागत में
मैं कहता हूँ लोगों से
कि दस दिन की सिंचाई से
बेहतर है अच्छी घनी बरसात
अब खुद भी जान गया हूँ मैं
जब लोग होते हैं नेक दिल
और अपने चारों तरफ
बोते हैं नेकनियती और भलाई
तो वे अफसर हों चाहे पौध रोपने वाले
या बागवान
सब एक जैसे होते हैं

यहाँ कवि का संकेत है किसान की चिंता, प्रकृति का कृषि पर प्रभाव, कवि का प्रकृति प्रेम, श्रम से वर्गीय दूरियों का मिटना। बाइ जुई की ये चिंतायें उनकी पूरी कविता की केंद्रीय लय है। प्रमुख ध्वनि। बाइ जुई किसान चेतना के अप्रतिम कवि है। श्रम का सौंदर्य तथा औदात्य उनकी कविता की धमनियों में आद्यंत प्रवाहित है। हमारे अन्य लोकधर्मी कवियो -वाल्ट ह्विटमैंन,  ब्रेख्त, लोर्का, पाब्लो नेरूदा, नाज़िम हकिमत, माइकोव्स्की, वोले शोयिंका आदि से वे बहुत पुराने हैं। शैली, शिल्प-सौष्ठव, भाषा, लय, वर्णन तथा सांकेतिकता में अलग तथा भिन्न भी। वह चीनी टेंग राजवंश काल (618-907) के कालजयी कवि माने जाते हैं। एक उत्कृष्टतम तथा प्रभावी कवि। चीन में यह समय साहित्य की महान उपलब्धियों का भी समय है। जैसे हमारे यहाँ भक्ति कालीन लोक जागरणकाल। टेंग राजवंश चीनी कविता का यशस्वी गौरवपूर्ण काल है। बाइ जुई 772 में झिंगझेंग जनपद में पैदा हुये थे। यह जनपद झेंगझाओ के करीब है। इसे आज का आधुनिक हेनान प्रांत कहते हैं। उनका परिवार गरीब था। बारह साल की आयु में राजनीतिक उथल पुथल की वजह से उनका परिवार झेहजियांग प्रांत में आ बसा। उनका परिवार गरीब था पर विद्वान और पढ़ा लिखा जरूर था। वाइ जुई स्वयं भी सराकर में राज्यपाल के पद पर रहे थे। उन्होंने अपने इस पद पर रह कर अपने अनुभवों को कविता में व्यक्त किया है। एक प्रांत के ही नहीं वह तीन भिन्न भिन्न प्रांतों के राज्यपाल रहे थे। उन्होंने अपनी बहुत ही अलग तथा सरल-सहज लोकधर्मी काव्य शैली विकसित की है। बिल्कुल बोल चाल का लहज़ा। जैसे कोई थोड़ा पढ़ा लिखा किसान बोलता हो। उनकी कविता के शब्दार्थ सामान्य पाठक बहुत अच्छी तरह से समझ सकता है। चीन की जनता ने उनकी कविता को बहुत पसंद किया है। उनका देश उसे अपनी बहुत कीमती धरोहर भी मानता है। उनके देश में ही नहीं बल्कि बाहर भी चीनी कविता के पाठक उनकी कविता को बड़े आदर तथा महत्व से सराहते हैं। बाइ जुई की कविता का प्रभाव जापानी साहित्य पर भी बहुत पड़ा है। उन्होंने कवि रूप में अत्यंत ख्याति अर्जित की। साथ ही वह एक सफल राज्यपाल भी रहे हैं। यह बात जरूर है कि उनकी कविता के सामंतवाद विरोधी रुख की वजह से उन्हें बड़ी कठिनाइयाँ उठानी पड़ी थी। पर अंत तक उन्होंने अपना जनपक्ष नहीं बदला। वह किसानों, श्रमिको, गरीबों तथा अभावग्रस्त सामान्य जन के पक्ष में सदा बोलते रहे। लड़ते रहे। यही उनकी कविता की महाशक्ति है जो उन्हें आज बहुत ही प्रासंगिक बनाकर हमसे जोड़ती है। इस प्रक्रिया से हम अपनी प्राचीन काव्य परंपरा का आकलन कर उसकी प्रासगिंकता को रेखांकित कर सकते हैं। वाइ जुई की कविता एक आदर्श प्रतिमान है कि कैसे आखिर कविता अपने समय का अतिक्रम कर कालजयी बनती है। कैसे वह जनता के हृदय में अपनी अमिट जगह बनाती है।


वाइ जुई का प्रारंभिक जीवन एक प्रशासक के रूप में बहुत सफल रहा था। कवि के पिता का निधन हुआ 804 ई० में। कवि ने यान झेंन के विद्वान से प्रगाढ़ मित्रता स्थापित की। जुई हालनिल अकादमी के विद्वान सदस्य भी बनाये गये। 811ई० में उनकी माता का निधन हो गया। चीन की परंपरा के अनुसार उन्होंने तीन वर्ष तक अपने पिता तथा माता की मृत्यु पर शोक मनाया। दोनों बार वह वेइ नदी के किनारे पर ही रहे।
    कवि 814 ई० में सलजा के महल के बहुत ही सामान्य अधिकारी थे। उन्हें यहाँ आधिकारिक रूप से कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। राज दरबार में उनके कई लोग शत्रु बन गये। राजकीय अन्य पदों पर भी लोग उनसे वैर और ईर्ष्या करने लगे थे। असल में उनके लोकधर्मी लेखन ने ही उनके निजी शत्रु बना दिये थे। उन्होंने दो लंबे संस्मरण लिखे। उनका अनुवाद अंग्रेजी में आर्थर वैली ने  युद्ध को बंद करो नाम से किया है। वाइ जुई के विरुद्ध और भी शिकायतें थीं। उनके विरोधी उनके ऊपर तरह-तरह के अभियोग लगा रहे थे। कहा जाता है कि जुई की माता की कुँये में गिरने से मौत हुई थी। वे कुछ फूलों को तन्मयता से निहार रहीं थी। इस प्रसंग में जुई की दो कवितायें हैं- ‘In Praise Of Flowers’ तथा; The new well। इन दोनों कविताओं को जुई के खिलाफ इस्तेमाल किया गया था। इल्ज़ाम था कि जुई ने अपनी माता के प्रति पूरी निष्ठा और श्रद्धा नहीं रखी। चीन के महान दार्शनिक कन्फ्यूशियस की परंपरा के विरुद्ध है माता की उपेक्षा करना। इस का दुष्परिणाम हुआ जुई का अपने नगर से निर्वासन। यही नहीं उनकेा पदावनत भी किया गया। तीन साल बाद उन्हें चीन के दूरदराज प्रदेश साइचिन में राज्यपाल बनाकर भेज दिया गया। इस यात्रा के समय जुई को अपने निर्वासित मित्र यान झेन से मिलने की अनुमति मिल गई थी। उनका नया स्थान फूलो और वृक्षों से भरा पूरा था। यह कवि के लिये अधिक प्रसन्नता की बात थी। 818 ई० में उनका निर्वासन समाप्त  कर राजधानी वापस बुला लिया गया। उनको पदोन्नत भी किया गया। 821ई० में चीन में मुजोंग नया सम्राट आया। यह एक विलासी सम्राट था। उसने अपने दायित्वों को भुला कर विलासिता का जीवन जिया। इसी दौरान अस्थाई तौर पर दबे हुये सैनिक राज्यपालों ने टेंग की केंद्रीय सरकार को चुनौतियाँ दीं। दूसरे मुजोंग का प्रशासन भ्रष्टाचार से विघटित हो रहा था। वाइ जुई ने इसके विरोध में कवितायें लिखी। अतः एक बार फिर कवि को राजधानी तथा दरबार से दूर फेंक दिया गया। यह स्थान प्राकृतिक दृष्टि से मनोहारी था। वाइ जुई के मन पसंद। यहाँ का राज्यपाल होने के समय जुई ने अनुभव किया कि आस पास की खेती वाड़ी वैस्ट लेकपर निर्भर है। पर पिछले राज्यपालों की लापरवाही की वजह से पुराना बाँध ढह गया था। झील सूख चुकी थी। स्थानीय किसानों को भयानक सूखा झेलना पड़ता था। जुई ने एक मज़बूत तथा अधिक ऊँचे बाँध बनाने का आदेश दिया। इससे पानी का बहाव रुक सके। एकत्र पानी वहाँ के किसानों के लिये सिंचाई हेतु पर्याप्त हो। आगे आने वाले दिनों मे वहाँ के स्थानीय किसान खुशहाल हो सकें। उन्हें सूखा का कहर न झेलना पड़े। यह स्थान प्राकृतिक दृष्टि से बहुत सुंदर था। खाली समय में जुई ने इस स्थान का एक कवि की तरह आनंद लिया। बाद में जुई के सम्मान में उन्हीं के नाम से यह बाँध जाना गया। अकाल,  सूखा, अफसरों की संवेदनहीनता,  गरीब किसानों के प्रति उनकी बेरहमी के चित्र जुई की कविताओं में बार बार आते हैं। उनकी एक बहुत ही उत्कृष्ट कविता है, ‘तुलिंग का किसान -  कवि कहते हैं- 


तुलिंग का एक किसान था
सौ कित्ते जमीन थी उसकी
लेकिन वसंत में पड़ गया सूखा
तीन महीने तक लू चलती रही लगातार
मर गये गेंहूँ के पौदे सूख कर
और उसी बरस क्वार में
समय से पहले ही
गिरने लगा पाला
जनपद के अफसरों को इल्म था इसका
मगर उन्हें फिक्र थी
जल्दी जल्दी लगान वसूलने की
किसान को लगान की खातिर
बेचना पड़ा शहतूत का पेड़
न जाने कहाँ से आयेंगे रोटी कपड़े
अगले साल भी
इस समय भी लगान चुकाने को
उतर गये तन के कपड़े
छिन गया मुँह का कौर
लोगों का माँस नोचते अफसर
भूखे भेड़िये हैं
भले ही उनके वैसे दाँत और पंजे न हों
पर उनका मन भेड़िये का है।
     824 ई० में उनका राज्यपाल का कार्यकाल खत्म हुआ। उनको अब एक उन्नत पद दिया गया। वेतन भी अब अधिक था। सम्मान भी। उन्होंने अपना आवास पूर्वी राजधानी में लिया। एक प्रकार से यह सांस्कृतिक राजधानी समझे जाने वाला स्थान था। यहाँ अन्य राजधानियों की तरह राजनीतिक गहमागहमी कम थी। 


 825 ई० में जुई 53 साल के हुये। उन्हें फिर संपूर्ण राज्यपाल का पद दिया गया। यहाँ यांग्टीसी नदी तथा ताहू झील के किनारे उन्होंने अपना कार्य काल पूरा किया। तरह तरह की दावतें, पिकनिक तथा उत्सव उन्होंने आनंदपूर्वक मनाये। पर दुर्भाग्य से कुछ साल बाद जुई अस्वस्थ हो गये। उन्हें विवश होकर सेवा मुक्त होना पड़ा। 822 - 824 ई० तथा, 825 -827 ई० में जुई राजधानी लौट आये। बाद में उन्होंने राजधानी में कई महत्पूर्ण पदों पर कार्य किया। बाद में हैनान के राज्यपाल हुए। यहाँ उन्हें प्रथम पुत्र की प्राप्ति हुई। पर दूसरे साल उसकी मृत्यु हो गई। 831 ई० में यान शैन की मृत्यु के बाद से जुई नाम मात्र को विभिन पदों पर कार्यरत रहे। सच में तो वह सेवामुक्त हो चुके थे। 839 ई० में उन्हें पक्षाघात हुआ। उनके बाँये पाँव ने काम करना बंद कर दिया। अतः बिस्तर पर कई महीनों तक रहना पड़ा। जब उनकी तबियत कुछ सुधर गई तो उन्होंने अपनी चयनित कविताओं को व्यवस्थित किया। 846 ई० में जुई का निधन हुआ। उन्होंने मृत्यु पश्चात बहुत ही सामान्य ढंग से अपनी अंत्येष्टि करने के लिये संदेश छोड़ा था। यह भी कि मृत्यु के बाद उन्हें कोई उपाधि न दी जाये।
     जैसा कि मैं शुरू में कह चुका हूँ जुई अपनी सादगी, सरलता,  कवि कर्म निष्ठा तथा ईमानदारी के लिये प्रतीक चिन्ह जैसे बन गये थे। वे अपनी बहुत ही बोधगम्य काव्य शैली के लिये विश्व विख्यात हैं। साथ ही उनकी कविताओं में राजनीतिक तथा समाजिक आलोचना भी मुखर है। इस काव्यसुलभ प्रतिरोधी मुखरता के लिये जुई जीवन भर मूल्य चुकाते रहे। उन्होंने कविता के लिये कोई समझौता कभी नहीं किया। आज के लेखक को उनसे सीखना चाहिए कि एक कवि अपने समय को लाँघ कर बहुत समय तक प्रासंगिक तथा प्रेरक कैसे बना रहता है। उन्होंने कविताओं के अलावा लेख तथा पत्र आदि भी लिखे हैं। टाँग वंश के कवियों में जुई बहुसर्जक कवि हैं। कहा गया है कि उन्होंने लगभग 2800 कवितायें रची हैं। उन्होंने उनकी प्रतिलिपि तैयार कर उन्हें वितरित किया था। वे  चाहते थे कि उनकी कवितायें उन लोगों तक जायें जिन्हें वे संबोधित हैं। उनकी कवितायें सर्व बोधगम्य हैं। कहते हैं कि जुई का नौकर यदि उनकी कविता नहीं समझ पाता था तो वह उसे दोबारा लिखते थे। कविता को इस प्रकार ठेठ जनता के बीच ले जाने का कठिन कवि कर्म जुई जीवन भर निभाते रहे। कविता से जनता की सेवा का सही एक ही तरीका है जो हमें जुई से आज भी सीखना चाहिए। जुई की कविताओं तक किसी भी व्यक्ति की पहुँच बहुत ही सरल है। यही वजह है कि वह अपने जीवन काल में ही अत्यंत लोकप्रिय जन कवि माने जाने लगे। न केवल अपने देश चीन में बल्कि जापान आदि अन्य देशों में भी। आज भी उनकी जन कवि की लोकप्रियता बराबर बनी हुई है।


    
 उनकी कई लंबी वर्णनपरक कवितायें बहुत प्रसिद्ध हैं। उनका अनुवाद अभी हिंदी में कदाचित् उपलब्ध नहीं है। जुई की काव्य दृष्टि में सामाजिक दायित्व बोध अत्यंत प्रमुख है। उनकी अनेक कवितायें व्यंग्य प्रधान भी हैं। जैसे उनकी एक कविता है, ‘ एक वृद्ध कठ कोयला विक्रेता। यहाँ उसकी विपन्नता बयान कर कवि उस सामंती व्यवस्था पर तीखा व्यंग्य करते हैं जो गरीबों के दुख,  दर्द, उत्पीड़न, शोषण को नहीं देखती समझती। कवि ने बताया है-
एक था बूढ़ा कठकोयला विक्रेता
दक्खिनी पहाड़ों में
पेड़ों को काटता जलाता
धुँये और आँच से
उसका चेहरा हुआ था काला
कनपटियो पर थे उसके बाल भूरे
कठोर श्रम से उँगलियाँ हुई थी काली
खाने और कपड़ों भर को भी
नहीं जुटा पाता है रोटी
कोट था उसका बिना मोटे अस्तर का
करता था उम्मीद
जाड़े की ठिठुरन में
कोयला बिकेगा मँहगा
शहर के बाहर था वहाँ
वर्फ का दो फिट ऊँचा तलछट
लीकों में जमी वरफ पर
वह आता है अपनी बैलगाड़ी में
धचकोले खाता
ढोने को ईंधन
बैल हैं उसके मरियल
पूरे दिन रहा है वह भूखा
जैसे ही वह रुका दखिनी द्वार पर
कीचड़ में
जनखों के लिवास में
दो आदमी आये चढ़े उसकी तरफ
अपने उम्दा घोड़ों पर
उसकी बैलगाड़ी और उसे
मोड़ा उत्तर की तरफ
चीख कर हाँके उसके बैल
खूब खूब तेज तेज
पलट दी उसकी बैलगाड़ी
हथिया लिया उसका पूरा ईंधन
साथ में दस फिट लंबी हल्की रेशम भी
उस पर जुर्माने की एवज
कोयलेां की कीमत देने के बजाय
बैलों की गर्दनों पर
फेंक दी लाल पट्टी सी 


 
सरल सहज भाषा और सांकेतिक शैली में कैसा तीखा व्यंग्य सामंती व्यवस्था पर। जुई ने बड़ी दिलचस्प तथा आकर्षक रोमेंटिक कविताएँ भी लिखी हैं। जैसे-

इतनी सुंदर युवती
दो जूड़ों वाला इतना सुंदर
केश विन्यास
ऐसा मोहक सहज सौंदर्य
कभी जाती नहीं
घर के बाहर
रात को दीपक की चमक उजाले में
पुष्प की पँखुरियों पर
ओस बूँद जैसी रुचिर
बाँस पर हिम की उजली परत से
आती है याद उसकी
ऐसी सुंदरी तो
बना दी जाती है नृतकी सम्राट की
यहाँ रोमेंटिक स्वर होने पर भी व्यंग्य है सम्राट पर।
   जुई कविता के प्राचीन रूप यूफ्यू को पसंद करते हैं। 9वी सदी में उनकी कविता की समीक्षा
  को लेकर अनेक विवाद और बहसें वजूद में आई। जवकि अनेक महत्वपूर्ण कवि जुई की कविता का बहुत आदर करते थे। अनेक कवि तथा समीक्षक उनकी कविता का बहुत विरोध में भी थे। कुछेक का कहना है कि जुई की कविता में दबंगपन तो है। पर ऊर्जा उसमें नहीं है। कुछ भद्र जनों ने उनकी कविता को देसी भाषा की अति सामानय तथा गँवारू तथा अशिष्ट कविताकहा है। जैसे हिंदी में कुछ मुम्बइया काट के आधे अधूरे समीक्षक नागार्जुन की कविता को कींच में सनी पुती अशुद्धकविता कहने में नहीं हिचकते। कुछ ने कहा है कि उनकी कविता की वैषयकता ने कुलीन कविता के प्रतिमानों को तोड़ा है। पर दूसरी तरफ उनकी कविता जनता में प्रचारित प्रसारित होकर बहुत आदर पाती रही है। जुई की कविता चीन की जनता के चित्त में अंकित है। इससे बड़ी कोई और उपलब्धि कवि को क्या हो सकती है। हिंदी में नागार्जुन,  त्रिलोचन तथा केदार बाबू की कविता भी जनता के चित्त में अंकित हो रही है। बड़ी और चिरस्थाई कविता का सही लक्षण है। तुलसी, जायसी,  सूर तथा  मीरा भी तो आज हमारे चित्त में अंकित हैं। जुई की कविताओं को चीन की दीवारों पर लगा गया है। चीन में माता पिता उनकी कविताओं को अपने बच्चों को कंठ कराते हैं। जुई की कविता शीत में ठिठुर कर और ग्रीष्म के ताप में तप कर चीनी जनता के रक्त,  मांस,  मज्जा,  तथा हड्डियों का हिस्सा बन चुकी हैं। उन्हें कभी न तो भुलाया जा सकता है। न उनकी अवहेलना की जा सकती है। जुई के शिल्प सौष्ठव तथा कलात्मकता के प्रति लापरवाह होने की भी आलोचना हुई है। उनमें दोहराव भी है। खासतौर पर उनकी  बाद में रची गई कविताओं में। मेरा विचार है जुई अत्यंत शिल्प सजग कवि है। उनका शिल्प उनकी कविता के समग्र स्वभाव से अलग नहीं है। एक शिल्प होता है जिसे हम सजग होकर कविता में रचते हैं। पर सिद्ध कवि शिल्प को अलग से नहीं रचते। बल्कि वह कविता के कथ्य तथा रूप के जैविक हिस्से की तरह उसी से प्रस्फुटित होकर उसी में पल्लवित पुष्पित होता है। जुई एक सिद्ध कवि है। उनका शिल्प उनकी कविता के गर्भ है जन्मा शिल्पविहीन शिल्प है। जैसे हमारी ऋचाओं का शिल्प। या बाइबिल का। कहते हैं कि शेक्सपियर के अंतिम दौर के नाटकों में भी शिल्पविहीन शिल्प है। यानि जब एक सिद्ध कवि अपने शिल्प के बारे में सजग नहीं रहता तब यह स्थिति आती है। जुई अपने शिल्पविहीन शिल्प के जादू से ही अपनी जनता के कंठाभरण बन पाये हैं।



जुई ने कविता के रूप को लेकर जो प्रयोग किये वे भी कम महत्वपूर्ण नहीं। उन्होंने हेन राजवंश की शैली में नयी गीत गाथाओं तथा लोक गीतों को नया रूप दिया है। जुई ने कविता रचने के लिये एक बिल्कुल नया ढाँचा तैयार किया जिसे, कविता रचने के नौ सिद्धांतकी संज्ञा दी गई है। इसे चीनी साहित्य के समीक्षाशास्त्र की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। यहाँ तक कि इसे विद्वान लोग उत्कृष्ट कलाकृति, ग्रंथ रत्न अथवा श्रेष्ठ कृति मानते है। जुई ने विभिन्न काव्य रूपों में भी वरीयता हासिल की है। खासतौर पर प्रदीर्घ तथा वर्णनपरक कविताओं में। इस दृष्टि से उनकी दो कविताओं का उल्लेख अक्सर किया जाता है. एक है,  Song of eternal Sorrow’ । दूसरी है,  ‘Song Of The Pipsa Player’। पहली कविता में यांग -ग्यू -फे के सौंदर्य के उत्कर्ष तथा पतन के कथ्य को लेकर है। दूसरी है नाशपाती की आकृति की चीनी वीणा। कहते हैं कि पहली कविता को सदियों से कला समीक्षक उसे उत्कृष्ट कविता मानने को प्रेरित रहे हैं। हेन राजवंश के अन्य बड़े कवि जैसे हान यू तथा ड्यू फ्यू अपनी मृत्यु के समय तक अपनी कविता के लिये अपेक्षित प्रशंसा नहीं पा सके। जबकि जुई अपने जीवन काल से लेकर आज तक उतने ही लोकप्रिय, प्रासंगिक तथा अहम बने हुए हैं। उनकी काव्य कृतियों की तलाश चीन में ही नहीं बल्कि बाहर के देशों में भी बराबर बनी हुई है। उनकी मृत्यु के बाद उनकी कविता ने चीन के नये कवियों को बहुत प्रभावित किया है। जुई जब अपने रचना शिखर पर थे उस समय उनकी कवितायें चीन की दीवारों की शोभा बढ़ाती थी। कई मंदिरों में उन्हें सजाया गया था। वेदियों तथा समाधि स्थलों पर लगाया गया। पोस्टकार्डो पर उनकी पंक्तियाँ अंकित की गई। अचम्भे की बात है कि जुई की कविता को उच्च वर्ग से लेकर सामन्य जन तक पसंद करता था। सराहता था। यही नहीं किसान तथा युवा चरवाहे भी। स्त्री, वृद्ध, युवक और जो कोई भी जुई की कविता के लिये बेचैन रहते थे। अचंभित करने वाली बात है कि अधिक पैसा पाने के लिये ‘Song of everlasting Sorrow’ को तो वैश्याएँ तक गाती थी। क्योंकि जुई की कविताएँ गाने वाली स्त्रियों से वे अपने को अन्य तथा भिन्न गाने वाली चिड़ियायें समझती थीं। विदेशी प्रधान मंत्री अपने व्यापारियों को निर्देश देते थे कि जुई की प्रत्येक कविता को 100 स्वर्ण मुद्रायें दे कर उनके राज दरबार में ले आयें। विश्व के अन्य किसी कवि की कविताओं की इतनी माँग और लोकप्रियता शायद ही रही हो।


     
अपने जीवन काल में जुई बहुत ही तीखी व्यंग्य कवितायें लिखते रहे। अन्य किसी चीनी कवि ने इतनी व्यंग्य कवितायें नहीं लिखीं। एक उनकी बड़ी प्रसिद्ध और लोकप्रिय कविता है-‘फसल की कटनई देखते हुए

मेरी दुनिया बहुत छोटी सी है
मेरे लिये कोई चिंता नहीं है
आराम से दिन कटते हैं
मंद मंद सैर करता
मैं खेतों की तरफ जाता हूँ
देखता हूँ अन्न का बड़ा सा ढेर
आस पास उसके बहुत सी
छोटी छोटी चिड़ियाँ
मारती हैं खोंट अपनी चौंचों से
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जब एक वृद्ध किसान ने
मुझे वहाँ देखा
बेहद प्रसन्न हुआ
मेरे कहे बिना ही
उसने पकाया भोजन
मुझे अभिवादन कर
न्यौता दिया खाने के लिये
खाने में वन से तोड़ा गया साग पात था
घर पर खिची दारू
बड़े आदर से उसने मुझे दिया प्याला
अपने खाली प्याला को रखते हुए
उससे मैंने पूछा उसका बंज व्यापार
उसने बताया
खेतों की बुबाई वह स्वयं करता है
फसल पकने पर
उसकी बीबी और बच्चे सब
उसकी सहायता करते हैं
रात दिन के श्रम से हो जाते हैं
थक कर चूर चूर
फिर भी कहाँ होती है मनचाही
रोटी नसीब
उसकी बातें सुन कर
मेरा सिर हुआ नीचा
कहाँ उगाई मैंने कोई फसल आज तक
पर खाया पिया है खूब अघा कर
नहीं किया कोई श्रम
इन हाथों से
फिर भी ऐश किये हैं जीवन में
जितने कि बुई के राजा के सारस
(कहते हैं कि बुई का राजा सारस पालने में इतना खो जाता था कि उसे दुनिया के दुख दर्द का कोई ज्ञान नहीं रहता था)
बाइ जुई की ये कवितायें आज भी हमारे मन को कितनी अपील करती हैं!

  
वे गरीबों, उत्पीड़ितों, अभावग्रस्त जनों तथा श्रमियों के प्रति कितने संवेदनशील हैं। उनकी तकलीफों को देख कर अपने सुख सुविधा पूर्ण जीवन को धिक्कारते हैं। वह सदा सर्वहारा का पक्ष लेते हैं। साथ ही अपनी विलासिता पर गहरी चोट करते हैं। इस प्रकार उनकी कविता में सामंती समाज की आलोचना के साथ आत्मालोचन भी भरा पड़ा है। यही उनकी कविता की ताकत है। गरीबों के प्रति निरी करुणा दिखा कर कविता में वह ताकत और पैनापन न आता जो अपने और जनता के जीवन के अंतर्विरोध दिखाने में आया है। इससे उनकी सचाई भी झलकती है। उनकी एक कविता है, लामनी होते देख कर

आखिर किसानों को कहाँ है अवकाश
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रात तेज़ हवाएँ चली दक्षिण से
अब पक कर सुनहला हो गया है गेंहूँ
खेत में लाई करते हुए
गठे युवकों को
छाक लाई हैं उनकी पत्नियाँ
बँहगियाँ लटकाये
पीने का पानी है मटकियों में
तेज़ झुलसती धरती की वजह से
श्रमियों के तलवों पर उठते हैं फफोले
$         $        $
सब को एक बात की ही चिंता है
लामनी समाप्त होन से पहले ही
कही न हो जाये शाम
तभी मैंने देखा
एक गरीब स्त्री को आते
वह बच्चे को अपनी पीठ पर लादे थी
उसके सीधे हाथ में थी
गेंहूँ की कुछ बालियाँ
जो सिला में उसने बीनी थी
उसके बाँयें हाथ में थी छनी-टूटी टुकनिया
कान लगा के सुनी उसकी बातें
सब फसल तो चली जाती है लगान में
खेतों में सिला बीन-बान कर ही
होता है गुज़ारा रोटी का
मैं अपने आप को देखता हूँ
फिर विचार करता हूँ
मुझ में ऐसा क्या खास है कुछ
क्या हक है मेरा
जो दिये जाते हैं मुझे
तीन सौ मन धान
पेट भरने के लिये जरूरत से अधिक
बाकी बचाने के लिये बहुत ज्यादा
सुनता हूँ गरीब स्त्री की बातें
होता हूँ बेचैन
भूल नहीं पाऊँगा ये सब।


इस प्रकार के तीखे आर्थिक अन्तर्विरोध जुई की कविता में बराबर लक्ष्य किये जा सकते हैं। यह आत्मालोचन सिर्फ वाइ जुई का न होकर उस पूरी सामंती व्यवस्था पर प्रहार है जो दूसरों के श्रम पर पल कर गुलछर्रे उड़ाती है। उनकी एक कविता है,-  लगान वसूलना 

लगान उगाने वाले अफसर
आसामियों के दरवाज़े खटखटाते हैं
तुरंत लगान देने को धमकाते हैं
वे कल तक भी
नहीं कर सकते इंतज़ार
हम खलिहान में
दीपक और मौमबत्ती के उजाले में
श्रम में नधे रहते हैं रात रात भर
चलाते हैं दाँय
फटकते हैं दाने
जब तक वे चमकने न लगे
मोतियों की तरह
फिर तीन तीन सौ पसेरी
लादते हैं हर बैल गाढ़ी में
मुनीमों और मजूरों से
जल्दी जल्दी काम पूरा करने के लिए
मालिक जड़ते हैं उनको कोड़े -
बाद में कवि उस स्थिति से हमें परिचित कराते हैं जब वे स्वयं भी ऐसी सख्ती से पेश आते थे -
कभी मैं भी किया करता थी इसी तरह

पर उस किये पर
अब लज्जित हूँ
अब हृदय उतना पत्थर नहीं रहा
जो वैसी कठोरता दुहराऊँ
उन दिनों मैं एक अफसर था
पदोन्नत हुआ चार बार
अघाता रहा दस साल तक
चावलों से भर कर
$     $      $
उन दिनों में
जितना अन्न जमा किया मैंने
काश! वह सारा लौटा सकता आज।


ऐसे आत्मालोचन और स्वयं को कठघरे में खड़ा करना जुई की अपनी खूबी है। उनकी बेजोड़ शैली। ध्यान रहे उनकी मैं शैली उस सामंती तथा भद्र लोक को संकेत है जिसका वे स्वयं एक हिस्सा थे। जैसे मुक्तिबोध जब मध्यवर्ग की तीखी आलोचना करते हैं तो वे स्वयं को भी उसमें शामिल कर लेते हैं। जुई को अपने वर्ग की चेतना है। अतः वह आत्मालोचन से अपने को सर्वहारा के स्तर तक लाने का प्रयत्न करते हैं। लगता है जैसे वे गरीबों के दुख और अभावों से स्वयं बहुत दुखी है। अपने भद्र लोक की दुनिया में वे स्वयं को विघटित होते देखते हैं।
जुई की महानता इसी में है कि वह ऐसे सम्राटी-सामंती दौर में उस व्यवस्था की धज्जियाँ उड़ा रहे हैं जब कि उसके विरुद्ध कोई मुँह नहीं खोल सकता था। भारत में आज भी सामंतवाद है। उसकी गहरी साँठ गाँठ उत्तरोत्तर विकसित होते पूँजीवाद से है। दुनिया जानती है कि भारतीय लोकतंत्र में श्रमिक, बुनकर,  शिल्पी,  लकड़हारे,  छोटे किसान,  भूमिहीन खेत श्रमिक,  अन्य छोटे कर्मचारी तथा निम्नमध्यवर्ग सभी परेशान हैं। पर हमारी हिंदी कविता के लिये जैसे भारत भूमि पर सब कुछ सामान्य है। क्या हमारे कवि का यह सामाजिक दायित्व नहीं कि वह इन सामाजिक-आर्थिक अंतर्विरोधों को तल्खी के साथ व्यक्त कर स्वयं का आत्मालोचन करे! इसी प्रसंग में इतने प्राचीन कवि वाई जुई आज भी प्रासंगिक हैं। वह हमसे जुड़ते हैं। हमें दृष्टि देते हैं। उनकी कविता हमारे यहाँ की रूपवादी-कलावादी कविता पर तीखा व्यंग्य करती दिखती है। इससे लगता है कि यदि हमारी कविता समाज के तीखे अंतर्विरोधों को आत्मालोचन के साथ कहती है जो दीर्ध आयु भी होती है । उनकी एक कविता है तौज्यो के बौने। बहुत छोटे क़द के लोग। जिन में कुछ को प्रति वर्ष चुन कर गुलाम बनया जाता है। बड़े बड़े अधिकारी उन्हें उपहार की तरह स्वीकार करते हैं। जुई इस पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहते हैं -




बौने क्या कोई जिन्स है
क्या यह नैतिक है
आदमियों को दास बना कर रखना
कितने वृद्ध आँसू बहाते हैं
अपने नातियों को
रोती है कितनी माताएँ अपने शिशुओं को
मार्क्स की तरह,  पर मार्क्स से बहुत पहले जुई गरीबों के दुख तथा संताप की जड़ें अर्थनीति में मानते हैं। हर आदमी को मुद्रा बनाने की अनुमति तो होती नहीं। सम्राटों ने जनता पर करों का बोझ बहुत ज्यादा लाद रखा है। नकद कर बसूलने वाले बड़ी क्रूरता से जनता के प्रति व्यवहार करते हैं। मुद्रा की कमी की वजह से मंदी का दौर शुरू होता है। उससे गरीबी बढ़ती है। गरीबों को न अनाज न कपड़े। सामान्य जन भूखे मरने लगते है। जुई की एक कविता है,- मित्र के लिये सलाह-

हर आदमी को टकसाल की अनुमति नहीं है
फिर करों का कमर तोड़ बोझ क्यों हो
कर वसूली होती है जेठ और क्वार में
जनता को मजबूर किया जाता है
नकद कर देने के लिये
मुदा्र कम हो जाती है बाजार में
वस्तुओं के भाव गिरने लगते हैं
अतः गरीबी बढ़ती है
साल का अंत होते होते
अन्न और कपड़ों की होती है कमी
आम जनता मरने लगती है
भूख और शीत से।


जुई जीवन और श्रम के महत्व को कभी आँख ओट नहीं होने देते-

लिऔ का रेशम साधारण रेशम नहीं है
हज़ारों बार घुमानी पड़ती है तकली
तब जाकर एक फुट तैयार हो पाता है
जुलाहों के हाथ छिल जाते हैं
करघा चलाते चलाते -
बाद में कवि व्यंग्य की शैली में कहते हैं
अगर नर्तकियों को पता होता यह सब
तो वे जरूर ध्यान रखती
अपने परिधान पहनने का।
इसी तरह लाल कालीन कविता में अफसरों की विलासिता पर व्यंग्य है -

श्वांग्ज्यो के अफसरो
क्या तुम्हें मालूम है
ये सारी दिक्कतें
दस फ़ीट कालीन में भी
हज़ारों छटाँक रेशम लगता है
ज़मीन को हरगिज़ ठिठुरन नहीं लगती होगी
फर्श के ढकने की वजह से
लोगों के जिस्म से कपड़े न चुरायें
बेहतर है -
 
जुई की हर कविता में कोई न कोई ऐसा कथा सूत्र होता है जो हमें अन्त तक बाँधे रखता है। कई बार हम कविता को उसके अन्त तक पढ़ने के लिये इस वजह से उत्सुक होते हैं कि कहीं अन्त की एक पंक्ति ही सारी कविता का अर्थ खोलती है। कविता के मध्य में कवि के आत्म कथ्य भी होते हैं। कई बार जुई कई रूपकों का सहारा लेते हैं। कहीं कहीं लाक्षणिकता का। उनकी शैली अन्योक्तिपरक भर होती है। कहीं दृष्टांतपरक। कहीं प्रतीक कथा से युक्त। यही उनका काव्य कौशल तथा शिल्पविधान है जो उनकी सामान्य से सामान्य कहन को कविता में रूपांतरित करता है। मैंने अनुभव किया कि जुई पुरानेपन तथा वृद्धावस्था को बहुत ज्यादा यशस्वी तथा गौरव योग्य मानते हैं। उनकी अनेक कविताओं में यह बात लक्ष्य की जा सकती है जैसे वृद्ध संगीत वाद्ययंत्रवादक,  पुराना चोगा, शांगयांग महल की बुढ़िया, एक बूढ़ा कठकोयला विक्रेता,  तुलिंग का बूढा किसान, एक बुजुर्ग ने मुझे देखा,  पुराना घर,  ध्यान से इन बूढ़ों की कहानी सुनो, एक पुरानी कब्र,  एक सफेद बालों वाला बूढ़ा आदमी,  एक लंबा राजपथ सदियों पुराना,  पुराने समय में आदि। दूसरे,  बूढ़ों में वे संक्रिया तथा ऊर्जा के उमड़ते स्रोत भी दिखाते हैं। जुई कवि कर्म को दायित्वशील मानकर भी उसे अत्यंत कठिन कर्म मानते हैं - और अच्छी कविता अदमी की जरूरत हैयह बताते है -
.... कवि होना
बहुत ही जहरबुझा कर्म है
चाहों तो मुझे ही देखो
अभी चालीस भी पूरे नहीं किये
सारे बाल हो गये सफेद 


जुई यह भी मानते हैं कि कविता का बुनियादी प्रयोजन उपदेशपरक होना है। ऐसा उपदेश जो कविता में एक कालीन की बुनावट तथा पेंटिक के रंग संयोजन की तरह गुंथा बिंधा हो। वह कविता का एक जैविक अंतरग हिस्सा लगे। कोई थेापी हुई चीज़ नहीं। क्योंकि वह अपने समय के सामंती सम्राट शासकों को बताना चाहते थे कि उनके कारनामें जनता के दुखों के कारक हैं। सत्ता पक्ष कवियों को अपने नियंत्रण में रख उनसे ऐसे काव्य की रचना चाहता था जिनमें उनकी झूठी यशोगाथा हो। जिसे मंदिरों, सार्वजनिक स्थानों तथा सड़कों तथा दीवारों पर लगाया जा सके। जिसे पेशेवर गवैये जनता के सामने गा कर सत्ता के क्रूर काले कारनामों को ढक सकें। जिसे सत्ता की तरफ सें प्रकाशित करा के साम्राज्य के कोने कोने में वितरित किया जा सके। जुई से भी यही अपेक्षा की गई थी। पर जुई ने यह कभी स्वीकार नहीं किया। उन्होंने ऐसी कविताएँ ही रची जिनमें सत्ता की क्रूरताएं अफसरों की अमानवीयता तथा सर्वहारा के दुख दर्द व्यंजित हैं। कहा जाता है कि जुई ने एक किसान बुढ़िया पर एक कविता लिखी थी। उन्होंने उसे बुढ़िया को इसलिये सुनाया गोया कि वह उसे समझ सकती है या नहीं। इसीलिए जुई ने जन कवि होने का गौरव पाया है। चीन में जहाँ जहाँ वाइ जुई रहे वहाँ वहाँ उनकी स्मृति में शिलालेख हैं। उनके बारे में अनेक मिथक हैं। लोक कथाएँ हैं। इसके बावजूद उनका सबसे अधिक महत्वपूर्ण स्मारक उनकी कविता ही है। जो उनकी स्फटिक जैसी साफ स्वच्छ दृष्टि को बताती है। उनकी सामाजिक चिंताओं से अवगत कराती है। अपनी जनता को वे कितना प्यार करते हैं पूरी कविता में उसकी अनुगूजें व्याप्त हैं। आज इस बात की जरूरत है कि उनकी समग्र कविता हमें हमारी भाषा में उपलब्ध हो सके। उससे हम कविता के लिये त्याग,  तप,  कर्मनिष्ठा तथा जोखिम उठाना सीखें। उन्होंने कहा है एक जगह -

कठिन और शक्तिशाली वस्तुएँ अच्छी लगती हैं मुझे
नरम और गुदगुदी वस्तुओं की अपेक्षा 
  

   
बाइ जुई क्रमशः बुद्ध दर्शन की ओर आकर्षित होते गये। बहुत बाद में वह अपने को सुगंधित पर्वत का संतकहने लगे थे। उन्होंने एक किसान का जीवन अपना कर खेती बाड़ी करना शुरू किया। खेतीबाड़ी के अनुभव ने उन्हें बताया कि दुनिया एक कार्मिक संबंधों का ही प्रतिफल है। कर्म तथा संक्रिया उनके जीवन में सदा ही प्रमुख रहे हैं। यही वजह है कि उन्होंने कभी अवसाद या हताशा का अनुभव नहीं किया। उनके उदास और अवसादग्रस्त न होने का एक प्रमुख कारण है उनका अपनी जनता, जड़ों तथा ज़मीन से गहरा जुड़ाव। उनकी कोई भी कविता ऐसी नहीं है जहाँ सामाजिक चिंताएँ, जीवन के प्रति अनुराग तथा प्रकृति के प्रति उनकी गहरी ललक दिखायी न दे। उन्हीं की एक कविता शीत लहरकी पंक्तियों से बात खत्म करता हूँ -

राजा के शासन काल के आठवीं साल
पाँच दिन रहे भारी बर्फवारी के
बाँस और देवदार तक मर गये
फिर उन लोगों की क्या कहें
जिन्हे कपड़े तक नसीब नहीं
मैंने जायजा़ लिया
तो दस में आठ परिवार थे बेहद गरीब
एक के पास भी देह ढकने को
न था कपड़ा
उत्तर की कटखनी शीत लहर
तलवार की तरह उन्हें छेदती थी
गाँव वाले कूड़ा करकट इकट्ठा कर
अलाव पर तापते
सब बैठते सटे सिकुड़े बटुरे
अलाव के चारों ओर
सब उदास भौचक्के
ऐसी तल्ख़ ठण्ड में
किसान और श्रमी ही दुख उठाते है
मैं अपनी तरफ देखता हूँ-
दरवसज़र बंद होता चाता है चौमुंद
निहारता हूँ अपने लिबासों को
जो बनी हैं नरम रोंयेदार खाल से
दोहरी तिहरी रेशमी रजाइयाँ
चाहे बैठूँ या लेटूँ
हमेशा रहता हूँ बड़े आनंद में
न भूख परेशान करती है न ठण्ड
न जरूरी है मुझे बाहर निकलना
न खेतों में काम करना
इन तमाम पर ध्यान करता हूँ
तो आती है शर्म अपने ऊपर ही
तब अपने आप से ही पूछता हूँ
मैं आदमी हूँ कैसा ।
     --0--



(विजेन्द्र जी हिन्दी के वरिष्ठ कवि एवं 'कृतिओर' पत्रिका के संस्थापक सम्पादक हैं।)
(आलेख में प्रयुक्त सभी पेंटिंग्स मशहूर चित्रकार वान गॉग की  हैं, जिसे हमने गूगल से साभार लिया है।)


मोबाईल - 09928242515

टिप्पणियाँ

  1. बहुत ही उपोयोगी एवं संग्रहणीय आलेख , काफ़ी मेहनत से लिखी गई .
    विजेन्द्र जी की ऊर्जा को सलाम .
    इस आलेख में चित्रों का संयोजन भी बहुत बढ़िया किया है संतोष जी ने .
    साधुवाद ...

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  2. बहुत ही उपयोगी एवं संग्रहणीय आलेख . काफ़ी मेहनत से लिखी गई हैं . विजेन्द्र जी की ऊर्जा को सलाम .
    आलेख में चित्रों का संयोजन भी बहुत बढ़िया किया है संतोष जी ने .
    साधुवाद .
    नित्यानंद गायेन

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  3. पठनीय एवं संग्रहणीय आलेख............देर तक याद रखा जाने वाला. विजेन्द्र जी एवं संतोष जी को साधुवाद........
    सुबोध शुक्ल

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  4. Santos ji ye aap bada kam ker rahe han. Ki vijendra ji se ye aap likhwa le rahe han.vijendra ji k kahne per maine is kawi ko padha apne samay ka mahan kawi bai jui.
    keshav tiwari

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  5. Bahut badia aalekh.agle ka intzaar. Dhanyavaad. Abhaar. - Kamal jeet Choudhary ( j and k )

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  6. बाई जुई को ठीक से जानने का अवसर मिला ..विजेंद्र जी का आभार | यह श्रृंखला हम सबके लिए अत्यंत ज्ञानवर्धक है |

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