शनिवार, 28 जनवरी 2012

राजकिशोर राजन

राजकिशोर राजन










पिता का नाम : स्व. राधाकृष्ण सिंह
जन्म तिथि : 25.08.1967
शिक्षा : एम.ए (हिंदी) एवं पत्रकारिता में डिप्लोमा



प्रकाशित कृतियाँ :
'बस क्षण भर के लिए', 'नूरानी बाग' एवं ‘ढील हेरती लड़की’ काव्य पुस्तकें प्रकाशित ।


आरसी प्रसाद सिंह साहित्य सम्मान ।
बिहार राष्ट्रभाषा परिषद द्वारा सम्मान एवं अन्य संगठनों द्वारा पुरस्कार ।
कुछ कविताओं का अंग्रेजी एवं अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद


आजीविका टयूशन से लेकर अखबार तक


अन्य : विगत डेढ़ दशक से देश के प्रतिष्ठ पत्र-पत्रिकाओं - माध्यम, अक्षर पर्व, दस्तावेज, पाखी, वसुधा, जनसत्ता, हिन्दुस्तान आदि में कविताएं प्रकाशित ।

आकाशवाणी एवं दूरदर्शन से कविताओं का प्रकाशन ।

रंगमंच के क्षेत्र में भी सक्रियता, कई नाटकों का लेखन व निर्देशन ।
कुछेक पत्रिकाओं का संपादन ।


संप्रति : राजभाषा विभाग, पूर्व मध्य रेल, हाजीपुर में कार्यरत ।


स्थायी निवास का पता :
ग्राम - चाँदपरना, पोस्ट - सिधवलिया, जिला - गोपालगंज,
बिहार - 841423


वर्तमान पता-  
59 एल आई सी कॉलोनी, कंकड़बाग,
पटना - 800020.


मोबाईल - 09905395614
ई-मेल – rajan.rajkishor56@gmail.com


 

सपने में रोटी




नींद में बच्चा
बच्चे के हाथ में रोटी



रोते-रोते सोया है बच्चा
लड़ते-झगड़ते उसे मिली थी रोटी



नींद में रह-रह, चिंहुक उठता
कभी करवट बदलता
पर हाथ से, छूटती नहीं रोटी



कौन समझाएगा उसे
तुम्हारी रोटी, धूल से सनी
उस पर बैठ रही मक्खियाँ
नहीं रही ये खाने लायक
फेंक दो यह रोटी



दिल्ली से बहुत दूर
हमारे चाँदपरना गाँव का वह बच्चा
नींद में बुदबुदाता



बच्चे के सपने में रोटी ।


ऊर्वरिस्तान से लौटते



जहाँ लोगों के स्वभाव में ही अभाव है
इन जगहों का नाम
अपने देश में ऊर्वरिस्तान है



आदमी मिलेगा तो किताब के पन्ने-सा
जिसके हर पन्ने पर दुख, अफसोस
और नफरत है
सियासत के किस्से, गफलत है
यहाँ आदमी हँसते-हँसते रूआँसा
और आखिरकार ईश्वर को सुमिर शांत हो जाएगा



औरतें मिलेंगी दुनिया भर की शिकायत
आँसू और गोद में नवजात शिशु के साथ
लड़कियाँ रंग-बिरंगे सपनों को
कज्जल आँखांे में लगाये
लड़के, दिल्ली-मुंबई-दुबई की ओर टकटकी लगाये
जूता सिलाई से लेकर चंडी पाठ तक का हुनर सीखते
बस्ती अलस उनींदे
मकान आसमान की तरफ देखते



अंतर्विरोध इतना, सब कुछ में
कि जो जाए सुलझाने, उलझ जाए खुद ही
मित्रो ! यही वह भू-भाग है
जहाँ मिलते उपन्यास के पात्र
कहानियों के प्लॉट
कविता के लिए आबो-हवा
मगर आज तक ऊर्वरिस्तान को नहीं ज्ञात
वे किताबों में जिन्दा लोग हैं
हैं, नायक-नायिका
और उन्हें सब कुछ भूल
बिसार दुख-दर्द
कुछ देर के लिए सही
हो जाना चाहिए प्रसन्न



और अपने ऊर्वरिस्तान के किस्मत पर
निसार होना चाहिए ।

 
उचर तो कागा




नहीं रही धनमातो काकी
इतवारी फुआ
कहाँ गई रूक्मिणी भौजी, सत्ती काकी
जो बुढ़ा रहे बेटे को भी
गोदी का लाल समझतीं
प्यार-दुलार-हुलास से डाँटती
जब तक अर्थी नहीं उठ जाती
बेटे को दुनियादारी समझातीं



हो बेटा पड़ोस के शहर में भी
उसे परदेशी मानतीं
डूबते सूरज देव के हाथ
आशीष रोज परदेश भिजवातीं



इन दिनों बेटा इतना समझदार
कि समझाता माँ को
और माँ इतनी जानकार
कि सात-समन्दर पार को भी
स्वदेश मानती



अब न उठती हूक न फूटती रूलाई
आधी रात को
न माएं उचरातीं
कि उचर तो कागा........
कब आयेगा मेरा, गोदी का लाल



माएं अब कर लेतीं फोन
या बेटे लैपटॉप पर
आमने-सामने कर लेते बात



कागा से छूट गये हम
कि हमसे छूट गया कागा ।




नरक



न प्यार
न घृणा



न दोस्ती
न दुश्मनी



न अपना
न पराया



न निकट
न दूर



फिर भी, साथ-साथ



तुम ही कहो दोस्त !
यह दुनिया कैसी है तुम्हारी !




एक संतुलित आदमी के नाम



वे न तो कभी क्रोधित होंगे
न भरेंगे कभी अँकवारी में
न देंगे कभी सीधा-सपाट उत्तर
न स्वीकारेंगे मन-प्राण से



वे जब भी मिलेंगे
चकित कर देंगे, रंग-ढंग से
आपको लगेगा
इस आदमी का साथ है
पिछले जन्मों से



उनका संतुलन
आपको अन्वेषक बना देगा
आपकी उम्र कट जायेगी
यह जानने में
कि वे दोस्त हैं या दुश्मन ।




विषाद



उसने तारीफ की
कलाईयों में जँचती कत्थई चूड़ियों
पाँवों में खिले महावर
दमकती लाल बिंदी
चंपई रंग की साड़ी
और जामुनी नेल पॉलिस की



उसने तारीफ की
नये फैशन के चप्पलों से लेकर
उँगलियों में पहनी सलीकेदार अँगूठियों तक की



कानों में झूलते झुमकों पर तो
वह मुग्ध ही हो गया



मगर यह नहीं कहा
कि तुम सुन्दर लगती हो ।




जंतर-मंतर



दिल्ली में जो है मंतर
उसके खिलाफ गणमान्य
जाना चाहते करने अनशन
दिल्ली के ही जंतर-मंतर



उनको भरोसा, वहीं से होगी
हर समस्या छू-मंतर
वहीं तप करने से
इन्द्रासन हिलेगा
देवराज आ पूछेंगे
तुम्हारी इच्छा क्या है ?
और तंत्र से लोक का
वहीं से किया जा सकता उद्धार



वाह रे दिल्ली
वाह रे तेरा मंतर ।




मिट्टी




जो कुछ था पास
उसे तुम्हें दिया



तुमने प्यार से मुझे
सूँघ लिया



हुआ रोम-रोम पुलकित
 देह झंकृत
मिट्टी का बना मैं
मिट्टीधर्मी हुआ ।



तारीख




एक तुम थी माँ
कि मुझे आज तक पता नहीं चला
अपने जन्म की सही तारीख



जब-जब तुमसे पूछा
तुम एक ही कथा दोहराती रही
कि उन दिनों महीनों से निकली नहीं थी धूप
हो रही थी रूक-रूक कर बारिश
खेतों में डूब गई थी फसलें
भात के साथ सब्जी देखने तक को
तरस गए थे लोग



मैं हर बार पछताता
आखिर किस लिए चाहिए?
मुझे जन्म की सही तारीख
बहुतों की तरह नामालुम रहे तो हर्ज क्या है !



एक हैं, हमारे समय की ऐश्वर्या राय बच्चन जैसी माएं
जिनके गर्भाधान की खबर
बन जाती, सबसे बड़ी खबर
बकायदा किया जाता ऐलान
कि जान ले दुनिया-जहान



पहले तो लगता था
दुनिया भर की माएं एक जैसी होती हैं
पर अब जा के जाना
माँ पहले होती है औरत
और दुनिया की हर औरत होती है, एक-दूसरे से कुछ अलग



एक तुम थी माँ
जिसको जब भी देखा, माँ देखा
भाई-बहनों को पालते-पोसते
हँसते देखा, रोते देखा
रात में चिंहुक चिहुँक कर जागते देखा
भरी दुपहर में बैठे-बैठे सोते देखा
महीने में एक-दो बार
बाबूजी के साथ हँसते-बोलते देखा
अपनी दुनिया में मग्न तुमने जरूरत नहीं समझी
कागज पर कहीं लिखा के रख लूँ
अपने बच्चों की जन्म की तारीख
अगर मृत्यु की निश्चित नहीं तारीख
क्या जरूरत, हो जन्म की तारीख
माँ, तुमने अनजाने दी बहुत बड़ी सीख



अब मैं खुश हूँ
चलो अच्छा है
नहीं, मेरे जन्म की तारीख



तुम कितनी जानकार थी माँ ।



लोकतंत्र का पहला पाठ




बाघ-बकरी
कुकुर-सियार
घोड़ा-हाथी
गाय और सांढ़



जीवन-मरण, हानि-लाभ
यश-अपयश का कर त्याग
बहती गंगा में करें स्नान
एक साथ



फिर करें, सूर्य नमस्कार
कि हमारा लोकतंत्र
न हो अम्लान ।


बेनीमाधोपुर




यहाँ दूर-दूर तक
आम, ताड़ और शीशम के पेड़
कहीं-कहीं बरसों से उम्मीद पर खड़े कुछ खपरैल के मकान



यहाँ की हर चीज
जस की तस
जैसे अनंत काल से



बस का हॉर्न सुन
दूर-दूर से टा-टा करते बच्चे
बेपरवाह, उड़ती धूल से



महिलाएं आँचल संभालती
विरक्त भाव से
जैसे कि कोई आ गया हो
सामने अपरिचित मर्द किसी दूसरे गाँव का
बूढ़े अलस भाव से देख
घुमा लेते उपेक्षा से सिर



बस के गुजरते, धूल छँटते
वीरानी फिर घिर जाती
कोई सूत्र ढूँढ़ने लग जाता
शेष दुनिया के साथ
बेनीमाधोपुर ।




तालसोनापुर



दुनिया के हर शहर में
एक गाँव होता
जिसका नाम तालसोनापुर होता



उस गाँव में
भागती हुई, बेचैन दुनिया से अलग
भाव का भूखा, प्यार में डूबा
एक देवदास होता



वहाँ एक पारो होती
अल्लड़ हवा-सी
ताल-तलैया, बाग-बगीचों में
प्रेम की रिमझिम बारिश में भीगते



होता चिड़ियों का कलरव
भरी दुपहरी में भी
रंग-बिरंगी तितलियाँ
करती फूलों से अठखेलियाँ



उस प्रेम कहानी पर
गाँव के सभी निसार होते



न जाने क्यों !
तालसोनापुर की बहुत याद आ रही है
कि हमारी दुनिया का नाम कभी
तालसोनापुर हो तो, कैसा हो !!

 

बुधवार, 18 जनवरी 2012

Dhruva Harsh

Dhruva Harsh






Writers for Change: Neelabh


"To be Marxist in Literature is not bad habit"



Neelabh’s Marxism is not like author-function. His marxism is a very wide field comprising a theory of economics, history, society and revolution. It might be abuse to have with this ideology only for those, who keeps mentality ‘To be self imposing democrat’. But it is often said that Marxist assign a structure to social reality, and they are interested system in examining the ways on which on socioeconomic system determines own life and experiences. This is reflected in his poems as discourse. His poetry unlike, “spontaneous overflow”, but asserts the intellectual phenomenology with his ‘deep felt’ expression about the condition of living people. How this is being bad to worse, shameful!


"इस दौर में
हत्यारे और भी नफीस होते जाते है
मारे जाने वाले और भी दयनीय"

In the very first line of this poem, If you fee down hearted. It seems to be melancholic in tone. When he was composing this one, probably he would have been in the fond of full remembrance with remote past, like Plato’s ‘utopia’ that’s why he could not stop himself to be connected with rich history, therefore he sings in very pessimistic view in the following lines-


"वह युग नहीं रहा जब बंदी कहता था
वैसा ही सलूक करो मेरे साथ
जैसा करता है राजा दूसरों के साथ"

His doctrines that humanity has doomed and world is full of follies and vices, where truth has lost his charm and there is no need of ‘Gandhianism’, because, Its only been cultural practice for intellectuals. Neither his philosophy can’t hand over down trodden to the grain of food nor ‘ return Romeo to Juliet’, then what means of this inert philosophy.

Now this is mere dark empire of Satan, where about, no one, who can have power to control the world, things like God!

Bad agents are standing everywhere, and helping to make corrupt the nations.


"शैतान को अब अपने निष्ठावान पिट्ठुओं को
बुलाना नहीं पड़ता
मौजूद है मनुष्य ही अब
यह फर्ज निभाने को
पहले से बढ़ती हुई तादाद में"

There is opposite similarity between Milton’s last quatrain of his self entitled famous sonnet “On His Blindness”, and Neelabh's last stanza of his above poem.


“His state
Is kingly: thousand at his bidding speed
And post over land and ocean without rest:
They also serve who only stand and wait”


"परधानमंत्री जी
बहुत दिनों से कोशिश कर रहा हूँ
आतंकवादी बनने की
मगर नाकाम रहा हूँ"

There is intention which made him much more connotative and he has been instigated to write impure Hindi words only for making political satire to the ruling system, which is being governed by the Prime-Minister. There is dual personality reflection in the word “I”. There is clash going over between “I” and existing body. The word “I” might be ‘base’ and thought to be a terrorist might be ‘Super structure’. Sometimes, it seems quite similar to Washington Allston’s coined term objective correlative which means “The only way of expressing emotion”. Eliot wrote, “Is by finding an objective Correlative”, in other words, a set of objects, a situation, a chain of events which shall be the formula of that particular emotion like Eliot’s Prufrock love song, a Hamlet-like interior monologue explores modern mind in conflict, cynical and afraid of certainties.


"कई बार कोशिश करने पर भी विफलता ही
जीवन की कथा रही।"


The poet is not talking about his attempt but all attempts which had been made by his predecessors have proved unsuccessful.


"शायद वजह यह हो कि जिस तरह
अपने टेके घुटने उसी हुकूमत के सामने
जिसे अपने मुल्क से निकालने में
हजा़रों-हजार कुर्वानियाँ दी थी
मेरे पुरखो ने"


In the very opening line of this stanza is made me stoppable "शायद वजह यह हो".  वजह means Ideas and education which is being taught to make us impotent barefoot like, Hegelian philosophy of idealism which maintains that the world is governed by thought Ideas, not men, rule the world. Material existence is the expression of an immaterial spiritual essence, but such philosophy is refuted by Marx.

The Colonial Ideas remain left and ruling over the nation, Now the Government would do the same that is what used to be in the Colonial India, at that time when we made revolt rewarded by death sentence and considered martyr but in recent times, when we take initiative against ruling government we are supposed to be Naxalites!


"हिन्दुस्तान के चमचा सरताजों
मैं एक अदना-सा चमचा
तुम्हारा इस्तक़बाल करता हूँ."

Being failed by attempting to be terrorist, It is said
"मैं एक अदना सा चमचा तुम्हारा इस्तकबाल करता हूँI"
 left mere slave and welcome you’. Even I attempted hard to be a RDX, TNT, but could not do.

In the last line of this poem patriotism is being mocked "आपको इस महान भारत भूमि पर". It seems quite ironical. To be patriotic might be only repressive bourgeoisie, because there is nothing to be patriotic. It is only meant by intellectuals for self security. This is mere Ideology which promotes false class consciousness Patriotism, religion, individualism, consumerism are all the different manifestations of repressive bourgeoisie ideology.

There is enlightened thought of ‘Leninism’ under the revolutionary carpet in the following lines:



"ओझल है हत्यारों की मांद
ओझल है संसद के नीचे जमा होते
किसानों के खूँन के तालाब
ओझल है देश के सबसे बड़े व्यापारी की टकसाल"

Here, poet is pleading for down-trodden especially for, proletariat, who have forgotten that the power structures can only be altered by the coming together of the proletariat, forgetting its division.

There is full shadow of symbolism by means of this, we are forced to go deep down and find suggestion of that word -

‘‘बिच्छुओं का पहरा है
कोबरा ताक लगाये बैठे है’’

Both words would have their connotations concerning with politics

‘‘क्यों खोयी पहचान साथी
पाया है धन मान साथी’’

The poem gives very satirical picture to the modern society which only cares about luxuries and consumptions. The poem ends on a note of bitterness awkward rhetorical questions like-

"क्यों खोयी पहचान साथी"

In this Poem discussions going over lost Identity. In the modern times men are not being recognized by their Identity but by their social status, that’s why they are in great doubt and fear which is reflected in this couple of lines-


"फिर क्यों तेरे मन में भय है
कैसा यह दिल में संशय है"


It also might be reason that they have applied shortcut method to accumulate money therefore they are feeling fearsome as if this following line shares-


"जनता तुझसे आस लगाये
तू धन दौलत में भरमाये"


In the other poem titled “Udeek”, Neelabh has coloured paper by giving abstract picture of sensuousness where olfactory sense giving perfume of sweat but suddenly it breaks when he introduces surrealistic imagery in his last couple of lines-


"नये खून के दिन
नये खून के दिनों की तरह"


Sometimes Urdu words written in Devnagri distorts the organic unity of thought, it is nothing more like Robert Frost's poem in which first he starts from point A and goes to point B, the xenith of full imagination and later comes to the real world and maintains triangle of thoughts.

Good dialogue written in metre is the quality of reciting lyrics as Sahir Ludhianvi used to pen for Bollywood ever. Here Marxism is being showcased in the last line of the revolutionary claimed poem-


"आओ साथी सुर मिलाओ
बारूदी राग गाओ"


There is dim ray for upcoming future but it remain left foot prints of 'Poor Leninism’ and he also made slogan shouting as ever shouted by Marx and Engel's.

" Labourers of the world unite"

Red blood is giving dead revolutionary encouragement to the soul. Lyrical charm seems to be fed up because it could not maintain rhythm yet it has been attempted well. When we come close to know the reality of his craft,then we get that somehow we are forced to accept the imposing laws of society, as well as accept to the canon 'mighty is right'. There is no humanity at all and society never bothers about individual instinct. "To make dialectic the individual by imposing laws upon them", but literature reflects and distorts social reality.

Hungarian Marxist George Luckas says that literature is knowledge of reality and not just a mirroring of it.

Finally Neelabh succeeded to leave his psychology over Hindi literature because he is not much more different than victim of society. He has been a poet who has been gifted with a prolific pen. He is the poet of victim and has got guts to raising war against conventional society. He attacks dogma of modernism. It represents individuals who are alienated from society. The literary work is not to be understood as the expression of the author-self or his individual genius (as the Romantics believed) but the expression of social class. A literary work is the collective product of a social community on which Neelabh has proven himself.





मंगलवार, 10 जनवरी 2012

"अनहद" समकालीन सृजन का समवेत नाद

"अनहद" समकालीन सृजन का समवेत नाद





रामजी तिवारी






साहित्य को गतिशील बनाये रखने और उसे समाज के बड़े तबके तक पहुँचाने में लघु पत्रिकाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है. हिंदी सहित भारत की अन्य भाषाओं में इनका स्वर्णिम इतिहास उपरोक्त तथ्य की गवाही देता है. इन पत्रिकाओं में एक तरफ जहाँ साहित्य कि मुख्य विधाएं फली-फूली और विकसित हुयी है, वही उसकी गौण विधाओं को भी पर्याप्त आदर और सम्मान मिला है. इनकी बहसों ने तो सदा ही रचनात्मकता के नए मानदंड और प्रतिमान स्थापित किये हैं. हिंदी में इन लघु पत्रिकाओं का लगभग सौ सालो का इतिहास हमें गर्व करने के बहुत सारे अवसर उपलब्ध करता है.



इन पत्रिकाओं का वर्तमान परिदृश्य दो विपरीत ध्रुवों पर खड़ा नजर आता है. एक तरफ तो इस पूरे आंदोलन पर प्रश्न-चिन्ह खड़ा किया जा रहा है, वहीँ दूसरी ओर इन पत्रिकाओं की भारी उपस्थिति और उनमे गुणवत्ता की दृष्टि से रचे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य को भी स्वीकार्यता मिल रही है. पत्रिकाएं प्रतिष्ठानों तक ही सीमित नहीं रही, वरन व्यक्तिगत एवम सामूहिक प्रयासों तक भी फैलती चली गयी हैं.  आज हिंदी में सौ से अधिक लघु पत्रिकाएं निकलती हैं.  मासिक, द्वी-मासिक, त्रय-मासिक और अनियतकालीन आवृत्ति के साथ उन्होंने साहित्यिक परिदृश्य की जीवंतता बरक़रार रखी हैं.  ‘अनहद’ ऐसी ही एक साहित्यिक लघु पत्रिका है.



युवा कवि संतोष चतुर्वेदी के संपादन में इलाहाबाद से निकलने वाली इस पत्रिका का दूसरा अंक हमारे सामने है. इस अंक को देखकर यह कहा जा सकता है कि “अनहद” ने प्रवेशांक की सफलता को चुनौती के रूप में स्वीकार करते हुए अपने ही प्रतिमानों को और ऊपर उठाया है. लगभग 350 पृष्ठों की इस पत्रिका का यह अंक वैसे तो एक साल के लंबे अंतराल पर प्रकाशित हुआ है, लेकिन उसकी भारी भरकम सामग्री (गुणवत्ता और मात्रा दोनों ही स्तरों पर) और संपादक के व्यक्तिगत प्रयासों को देखते हुए यह तनिक भी अखरता नहीं है.यह पत्रिका हर प्रकार से बहु-आयामी कही जा सकती है. इसमें एक तरफ नए-पुराने साहित्यकारों का संगम है , वही दूसरी ओर साहित्य की मुख्य और गौण विधाओं का विपुल साहित्य भंडार भी.



“अनहद” पत्रिका की एक बानगी को यहाँ पर देखना समीचीन होगा. “स्मरण” स्तंभ में दो महान विभूतियों –भीमसेन जोशी और कमला प्रसाद– को गहराई के साथ नए-पुराने साथियों ने याद किया है. भीमसेन जोशी पर जहाँ विश्वनाथ त्रिपाठी और मंगलेश डबराल ने लिखा है , वहीँ कमला प्रसाद पर भगवत रावत,  कुमार अम्बुज और उमाशंकर चौधरी ने अपनी लेखनी चलायी है. प.किशोरीलाल को याद करते हुए प्रदीप सक्सेना ने अदभुत स्मरण लेख लिखा है. हम चंद्रकांत देवताले की डायरी का आनंद उठाते है. फिर हमारे सामने राजेश जोशी अपनी पांच कविताओं के साथ उपस्थित होते हैं. आगे चल कर हमें भगवत रावत की झकझोर देने वाली कविता का दीदार होता है. इसी खंड में परमानन्द श्रीवास्तव, केशव तिवारी और सुबोध शुक्ल ने भगवत रावत की कविताओं से हमारा बेहतरीन परिचय भी कराया है. “हमारे समय के कवि” शीर्षक में पांच युवा कवियों – देवेन्द्र आर्य, अरुण देव, सुरेश सेन निशांत, अशोक कुमार पाण्डेय और शिरोमणि महतो – को स्थान मिला है.


पत्रिका इन महत्वपूर्ण रचनाओं के सहारे तब अपनी ऊँचाई पर पहुंचती है, जब ‘शताब्दी वर्ष’ शीर्षक के अन्तर्गत “नागार्जुन” के साहित्य और व्यक्तित्व को विभिन्न कोणों से जांचा-परखा जाता है. शेखर जोशी, शिवकुमार मिश्र, जवरीमल पारेख, राजेंद्र कुमार, बलराज पाण्डेय, कमलेश दत्त त्रिपाठी, प्रफुल्ल कोलख्यान, कृष्णमोहन झा, कर्मेंदु शिशिर, बलभद्र, वाचस्पति और उनके पुत्र शोभाकांत ने उस पर इतनी रोशनी डाली है कि “बाबा” का साहित्य और व्यक्तित्व हमारे सामने सम्पूर्णता में चमक उठा है. फिर ‘विशेष लेख’ शीर्षक के तहत चित्रकार-लेखक अशोक भौमिक ने महान चित्रकार जैनुल आबेदीन को जिस संजीदगी से जांचा-परखा है, वह कमाल का है. पत्रिका में जैनुल के बनाये 35 चित्र भी उकेरे गए है, जो हर तरह से विलक्षण है.  इसी ऊँचाई पर संजय जोशी और मनोज सिंह ने “प्रतिरोध के सिनेमा की आहटें” शीर्षक से एक लेख लिखा है. ज.स.म. की इकाई के रूप में 2005 गठित “प्रतिरोध का सिनेमा” आज किसी परिचय का मोहताज नहीं है.


पत्रिका में दिनेश कर्नाटक,  सुमन कुमार सिंह, विजय गौड़ और कविता की चार कहानियां भी पढ़ी जा सकती हैं. ‘नवलेखन विमर्श’ में खगेन्द्र ठाकुर ने समकालीन कविता की पड़ताल की है, तो सरयू प्रसाद मिश्र ने नयी पीढ़ी के नए उपन्यासों को जांचा-परखा है. राकेश बिहारी कहानियों में डूब कर सार्थक टटोल रहे हैं, तो भरत प्रसाद आलोचना के प्रतिमानों के बीच खड़े है. यहाँ प्रख्यात आलोचक मधुरेश द्वारा “शताब्दी के पहले दशक के उपन्यासों” का किया गया मूल्यांकन विशेष महत्व का बन पड़ा है. कसौटी शीर्षक में किताबों की समीक्षा है , जिसमे हरिश्चंद्र पाण्डेय, मधुरेश, वैभव सिंह, अमीर चंद वैश्य, अभिषेक शर्मा, अनामिका, रघुवंश मणि, महेश चंद्र पुनेठा, आत्मरंजन, विमल चंद्र पाण्डेय, अरुण आदित्य, और रामजी तिवारी ने अपने अंदाज में हमारे दौर की 12 महत्वपूर्ण पुस्तकों से हमारा परिचय कराया है.


इस परिचय को पाकर आप स्वयं यह तय कर सकते है कि बिना किसी प्रतिष्ठान से जुड़े संतोष चतुर्वेदी के अनथक प्रयास ने “अनहद” के दूसरे अंक को किस ऊँचाई पर स्थापित किया है. अब साहित्य प्रेमी मित्र/पाठक होने के नाते हम सबका यह कर्तव्य बनता है कि हम “अनहद” के इस गंभीर प्रयास को मुक्तकंठ से सराहें/स्वागत करें. जाहिर तौर पर लघु-पत्रिकाओ का भविष्य इन व्यक्तिगत प्रयासों को सामूहिक प्रयासों में तब्दील करके ही संवारा जा सकता है



प्रस्तुतकर्ता - रामजी तिवारी
“अनहद” बलिया,  उ.प्र.
वर्ष-2, अंक-2
मूल्य– रु-80

(रामजी तिवारी के ब्लाग 'सिताब  दियारा' से साभार)   

गुरुवार, 5 जनवरी 2012

शैलेय

शैलेय

 

जन्म - 6.6.1966 - ग्राम जैंती ;रानीखेत, जनपद-अल्मोड़ा, उत्तराखण्ड।
शिक्षा - पी एच.डी. ;(हिन्दी)।

- लम्बे समय से मजदूर आंदोलन-कुष्ठ रोगियों के मध्य कार्य-संस्कृति कर्म में सक्रिय। उत्तराखण्ड     आंदोलन के दौरान जेल यात्रा। किशोरावस्था से ही अनेक फुटकर नौकरियां एवं पत्रकारिता करते हुए

संप्रति-एसोसिएट प्रोफेसर।

प्रकाशन -

- या (कविता संग्रह)
- तो (कविता संग्रह)
- यहीं कहीं से (कहानी संग्रह)
- हाशिये का कोरस (उपन्यास) ;शीघ्र प्रकाश्य- (आधार प्रकाशन)
- नई कविताः एक मूल्यांकन (आलोचना पुस्तक)
- कुछेक पर्शियन कविताओं का हिन्दी अनुवाद






संपादन - ‘द्वार’ तथा ‘इन दिनों’-साहित्यिक सांस्कृतिक पत्रिकाएं।


सम्मान -

परम्परा सम्मान, शब्द साधक सम्मान, आचार्य निरंजननाथ सम्मान, परिवेश सम्मान
अंबिका प्रसाद दिव्य सम्मान, मलखान सिंह सिसौदिया पुरस्कार





पता - D2-1/14 मैट्रोपौलिस सिटी, रुद्रपुर; ऊधमसिंहनगर उत्तराखण्ड -263153.


मो. नं-  09760971225
            09410333840




अंग्रेज




अंग्रेज
स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को
जेलों में ठूंस देते थे
गोलियों से भून देते थे



क्या चाहते थे
ये
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी?



आजादी



यानी
एक सुखी
सुंदर
शोषणमुक्त समाज व्यवस्था...........



तो क्या
अंग्रेज
यहां आज भी हैं?.






मिर्च



हरी-भरी मिर्च के बिना भी
सलाद क्या?





सूख कर लाल भी हो जाय
तो भी इसे पीस कर मसाला बना लेते हैं
मसाला न हो
तो सब्जी ही कहां? और
सब्जी न हो
तो भोजन ही कहां??



तेल में भून कर
आलू-पूरी के साथ
इसकी कटकी के कहने ही क्या
जैसे कोई हंसते-हंसते
धीरे से अपनी आंख दबा दे



अचारों में
यह अकेली ही सबकी तोड़ है
डायबिटिक भी
‘गुड़-गुड़’ चिल्लाने लगता है



उन्माद हो या
अवसाद
मिर्च नींद तोड़ती है



सच
अनुपात सही हो
तीखापन जिंदगी को जायका ही देता है.





बुद्ध



करुणा की धार
बहुत सख्त हुआ करती है
आदमी को बुद्ध बना देती है



मैं
बुद्ध होने कोई दावा नहीं करता
पर
आदमी को इतना तो होना ही चाहिए कि
गिरते हुए एक निरीह आंसू में
वह
अपना गिरना भी देख सके साथ-साथ



आखिर कितने हैं
जो सहम-सहम जाते हैं
एक नवजात की स्मित देखते ही कि
कैसे यह
उम्र भर रह सकेगी यों ही



इसलिए
किसी भी इंसान को
बेहतर इंसान के साथ होना चाहिए
इतना कि
सबकी बेहतरी के लिए कुछ कर सके.






धब्बा



धब्बा
धब्बा ही हुआ
झक्क सफेद कमीज पर लगा तो
और भी भद्दा दिखाई देता है



इतना ही नहीं
कमीज का मूल्य तो गिरता ही है
आंखें भी
बरबस ही नीची हो जाती हैं



मैंने सोचा कि मैं
बच कर रहूं
गंदगी की ओर जाऊं ही नहीं
बाहर-भीतर हरदम रहूं साफ
जैसे हो सके तो सीधे-सीधे उजाला



मैंने सिर्फ सूरज के बारे में सोचा
इतना कि
कि धरती को मूलतः भूल ही गया



धरती को सिर्फ शव भूल सकता है
इस तरह
मुझे सड़ना ही था
सूखना ही था



सच
निखालिस सूरज में कहां कोई जीवन
पर
यहां भी कहां-कहां तक बचता
जब तक कि
दुनिया ही कीचड़ में सनी हुई है.






पॉप



ठीक है कि
चीजें बहुत गड्ड-मड्ड हो जहां
दूध का दूध-पानी का पानी
कहना बेमानी



पर
दूध में मलाई तो आनी ही चाहिए
जब कि पानी भी
आदमी देख कर ही पीता है



हांला कि
सब के सपने एक जैसे नहीं होते
एक जैसी
कैसे हो सकती है सबकी दरयाफ्त?



भाषा का एक पॉप उछाल कर
जो रचना का बाजार कर रहे हैं
वस्तुतः
इसके भी कई अभिप्रेत हैं



कविता की आंख
कभी नहीं चूकती
क्योंकि
युद्ध
महज ख्यालों में टहलना नहीं होता



इसलिए
दरअसल यह पॉप
एक भले कौशल का
निपुण
किंतु निकृष्टतम व्यापार है





मुलाजिम



एक मुलाजिम को
क्या-क्या नहीं करना पड़ जाता है



यहां तक कि
नफरत को दया
क्रोध को विनम्रता से पीने लगा
कविताएं उपनाम से लिखने लगा


और तो और
घर की बैठक में
अपने आदर्श के चित्र तक बदल दिये



बाल-बच्चों के खातिर
सरकार के आगे
आंखें नीची किये
मुख पर
मासूम मुस्कान चस्पा किये चलता हूं
फिर भी डर कि
कहीं कुछ ऐसा सच न बोल बैठूं
कि मेरे लिये ही खतरा हो जाय
क्या मुझे सरकारी नौकरी नहीं करनी चाहिए?
तो क्या
प्राईवेट में कहीं ज्यादा सुरक्षा है?



कम से कम
यह तो बता ही दीजिए कि
जब कि
पानी गले-गल तक आ चुका है
आप संतुलन कैसे बनाये हुए हैं?






स्याही



लाल-हरा-नीला
काला
कोई किसी भी रंग में लिखता हो
स्याही कहते ही
सदा नीला याद आता है



नीला रंग
यानी आसमान की ऊंचाई
गहराई अतल सागर की
यानी सब कुछ को
समो लेने के हौसले का रंग



शायद इसी लिए
स्याही के लिए
नीला रंग ही सबसे उपयुक्त समझा गया है
आदमी के सुख-दुःख
तीज-त्यौहार
स्मृतियां और योजनाएं
सभी कुछ को
बयां होने का स्पेस मिल सके



यह ब्रह्मांड में
दो पिडों के बीच सबसे पहला विस्फोट
पहला संवाद है
रौशनी के फूल खिलाता हुआ..................



शायद इसी लिए
नीली-नीली आंखों वाले अक्षरों से
बसंत के वे अनंत रास्ते खुलते हैं
कि हम
रह-रह कर चिटिठ्यों का इंतजार करते हैं



दूर
अगर कोई संत भी बैठा हो
तो भी इस रंग में
धवल नीली शांति की आभा मिलती रहती है.




सवाल



मैं बच्चों पर गुरर्राया
उतरो! उतरो!!
सीमेंट के कट्टों पर से उतरो
जानते हो कितना महंगा है यह?
वैसे भी नाक में घुस गया तो
फेफड़े फाड़ होता है



उतरो! उतरो!!
रेत के ढेर पर से उतरो
जानते हो कितनी दूर की नदी पर से लाया गया है?
मिट्टी में बिखरा तो
मिट्टी ही समझो



उतरो! उतरो!!
कोई झूला नहीं है यह सरियों का बीड़ा
लचका तो मकान को
चुभा तो
तुमको ही टिटनेस हो सकता है



एक भी ईंट छुई तो मैं मारुंगा
जल्द से जल्द दफा हो जाओ!



बच्चे तो बच्चे थे
बाजार के लिए कहां से लाऊं रुआब
जिसने
मेरी जेब ही नहीं
अरमान काट दिये हैं.






यह भी सही है



सही है कि
मूसलाधार बारिस में
कच्चे ढूहे ढह जाते हैं
बाढ़
घर हो या खेत
फंदे में जो आये
डसती चली जाती है



घहराते-गहराते काले आसमान तले
जान-माल की भारी तबाही



तब
आसमान को बहुत कोसते हैं लोग
कोसते हैं किस्मत को
अपनी सामर्थ्य को



अब
खोये हुए का गम किसे नहीं सताता
और बहुत सारी चीजें तो
दोबारा सरसब्ज होना ही मुश्किल
बस एक हार का नाम
जिंदगी रह जाता है
ताउम्र विसूरते रहने के लिए



किंतु
आसमान थमते ही
खोह-खड्डों-खाइयों में
फिर से दूब का हौले से गुनगुना उठना
ढही हुई छतों और पुलों की जड़ों से
गुलाबी पगडंडियां फिर से मुस्कुरा उठना
भी तो कुछ कहता है



फिर चाहे वह
प्रकृति ही हो या
दुनिया-समाज.




लोई



इस लोई में
वह भी बराबर शामिल है
गूंथी जाती हुई
पलथी जाती हुई
बेली जाती हुई
फिर
सब्जी-अचार जैसे स्वाद के साथ
टुकड़ा-टुकड़ा
खाती-निगली जाती हुई...................



अब चूंकि
एक स्त्री
एक लोई में ही समाप्त नहीं हो जाती
इसलिए
अपनी एक अदद उम्र में
जाने कितने-कितने हजार बार
लोर्इ्र-लोई बन जाने को विवश है वह
कि किसी तरह यह
जिंदगी
जिलाये रख सके.







मैं




कौरव अपने पूरे रोमांच पर हैं
जब कि
मैं
अभी अपनी पहली ही चाप पर



अब चूंकि
मेरे पिता अर्जुन नहीं हैं
न मां ही सुभद्रा
जाहिर है कि
मैं भी कोई अभिमन्यु नहीं हूं



इसलिए
इस महाभारत में
यही सच है कि
कुछ भी संभव है मेरे लिए-
पहले ही द्वार पर
गिराया जा सकता हूं और
सारे ही व्यूहों को
ध्वस्त भी कर सकता हूं.





चेहरा




कछुअे और खरगोश की दौड़
भला कौन नहीं जानता
लेकिन
यह तो नहीं कि
कछुआ भी जोर नहीं लगा रहा होगा



तेज
मध्यम
धीमी
या दौड़ ही सही
चेहरा न भी दिखे
तो भी
चाल बता देती है चरित्र



यही क्यों
बल्कि
कई बार सदाबहार गानों के बीच
एक रसभीना गीत
जब समाप्त हो रहा होता है
हम उदास और उदास हो आते हैं
प्रेम और युद्ध  में
डूबते-उतराते हुए...........



न दिखे चांद
न दिखे सूरज
अपना ही चलन अपने वक्त का
चेहरा है
इस चेहरे को
जरा ठीक से पढें तो
बढें भी.