वीरेन्द्र यादव का स्मृति-आलेख ‘दूधनाथ सिंह :‘आखिरी कलाम’ तो अभी बाकी था’।




विगत 12 जनवरी को प्रख्यात साहित्यकार दूधनाथ सिंह का इक्यासी वर्ष की उम्र में इलाहाबाद में निधन हो गया। अपने अन्तिम कुछ दिनों को छोड़ कर वे आजीवन रचनाशील रहे। लीक से हट कर अलग चलना और नई लीक बनाना उनके स्वभाव में शामिल था। वे नए से नए रचनाकारों के सम्पर्क में भी रहते थे और उन्हें अपने अमूल्य सुझाव देते रहते थे। ‘आख़िरी कलाम’ दूधनाथ जी का अत्यन्त महत्वपूर्ण काम है जिसे कुछ आलोचक ‘क्लासिक उपन्यास’ की संज्ञा भी देते हैं। आलोचक वीरेन्द्र यादव ने अपने एक आलेख के जरिए दूधनाथ जी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर एक नजर डाली है। कथादेश के हालिया अंक में प्रकाशित इस आलेख में वीरेन्द्र जी ने दूधनाथ जी को शिद्दत के साथ याद किया है। दूधनाथ जी को नमन करते हुए आज पहली बार पर प्रस्तुत है वीरेन्द्र यादव का स्मृति-आलेख ‘दूधनाथ सिंह :‘आखिरी कलाम’ तो अभी बाकी था’।  
        

दूधनाथ सिंह :‘आखिरी कलाम’ तो अभी बाकी था


वीरेन्द्र यादव  



प्रख्यात कथाकार और कथेतर गद्य के अनूठे सर्जक दूधनाथ सिंह का असमय न रहना साहित्य और समूचे हिन्दी समाज के लिए स्तब्धकारी है। इक्यासी वर्ष की परिपक्व वय के बावजूद रचनात्मक धरातल पर वे अपनी पीढी के सर्वाधिक सक्रिय, बहुपठित और कुशाग्र लेखक थे। कई अर्थों में वे एक जीनियस लेखक भी  थे। अभी तीन माह पूर्व प्रकाशित इलाहाबाद के दिवंगत मित्रों के संस्मरणों पर केन्द्रित ‘सबको अमर देखना चाहता हूँ’ शीर्षक पुस्तक उनकी अंतिम प्रकाशित कृति थी। यह विडंबनात्मक है कि सबको अमर देखने की इच्छा रखते हुए दूधनाथ जी स्वयं उस पांत में जा बैठे जिन्हें वे अमर देखना चाहते थे। इस पुस्तक की भूमिका में शामिल उनके शब्द थे कि ‘जीवन एक आश्चर्य की तरह बचा है और शायद आश्चर्य की तरह ही नष्ट हो जायेगा। संतोष यही है कि अपना काम, अपने ढंग और अपनी कमजोरी के साथ बखूबी निभाया। कोई कोताही नहीं की।’ सचमुच उनका सृजनात्मक मुहावरा उनका अपना था और वे तीक्ष्ण मेधा के परिश्रमी लेखक थे। उन्होंने साहित्य की हर विधा में लिखा लेकिन पारम्परिक ढांचे को तोड़ते हुए। उन्होंने विधागत आवाजाही और तोड़फोड़ का जो रचनात्मक मुहावरा गढ़ा वह उनकी मौलिकता थी। ‘आखिरी कलाम’ उपन्यास हो, संस्मरणात्मक पुस्तक ‘लौट आ ओ धार’ हो, ‘महादेवी’ हो या कि आलोचनात्मक पुस्तक ‘निराला एक आत्महंता आस्था’ हर कहीं विधाओं की तोड़-फोड़ एक नवीनता लिए हुए है। साठ के दशक में कहानी से शुरू हुई अपनी रचनात्मक यात्रा में उहोने उपन्यास, नाटक, कविता, संस्मरण से ले कर आलोचना तक का जो लम्बा सफ़र तय किया, वह कई दृष्टियों से विस्मयकारी है। यह इसलिए भी कि साठ के दशक में शुरू हुई उनकी साहित्यिक यात्रा में दो दशक से अधिक का मौन भी शामिल रहा है।

चार यारों में से एक यार काशी नाथ सिंह के साथ

दूधनाथ सिंह उस साठोत्तरी पीढ़ी के कथाकार थे, जो काशी नाथ सिंह के अपवाद को छोड़कर ज्ञानरंजन, रवींद्र कालिया, महेंद्र भल्ला, गंगा प्रसाद विमल, विजय मोहन सिंह आदि के साथ हिन्दी कहानी के प्रचलित मुहावरे को तोड़ते हुए नए बनते मध्य-वर्ग में संबंधों के विघटन की जमीन पर टिकी थी। ’सपाट चेहरे वाला आदमी’, ‘रीछ’, ’रक्तपात’, ‘बिस्तर’,’ ‘सपाट चेहरे वाला आदमी’ सरीखी दूधनाथ सिंह की कहानियां इसी दौर की हैं। लेकिन बाद के दौर की उनकी ‘माई का शोक गीत’, ‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे’, ‘काशी नरेश से पूछो’ आदि कहानियां उनके कथाकार का पुनराविष्कार है। एक तरह से ये कहानियां उनका मूल रचनात्मक धरातल है जहाँ वे राज कमल चौधरी और कलकत्ता के प्रभाव से मुक्त दिखते हैं। कहा जा सकता है कि बाद के दौर की इन कहानियों के द्वारा उनकी अपनी जड़ों की ओर वापसी भी हुई थी। दरअसल वे उ. प्र. के बलिया जिले के एक गाँव में जन्मे और पले-बढ़े थे और उनके भीतर कहीं गहरे एक ग्रामीण चेतना कुण्डली जमाये बैठे थी। यूं तो दूधनाथ सिंह के कथाकार की निर्मिति इलाहबाद से ले कर कलकत्ता तक के जिस साहित्यिक–सांस्कृतिक परिवेश में हुई थी, उसमें भिन्न प्रभावों की गिरफ्त में होना स्वाभाविक ही था। डा. धर्मवीर भारती उनके शिक्षक और पहली कहानी के संपादक थे तो सुमित्रा नंदन पन्त उनके सरपरस्त और महादेवी वर्मा उनकी मदगार थीं। दूधनाथ सिंह की स्वीकारोक्ति है- सुमित्रानंदन पन्त, महादेवी वर्मा, और निराला ने मुझे लेखक बनाया। पन्त, महादेवी और निराला पर मैंने आलोचना इसलिए लिखी कि मेरे निर्माण में निराला का प्रकारांतर से और पन्त व महादेवी का सीधे-सीधे हाथ था।’ उस दौर के इलाहाबाद में शमशेर, मलयज, अज्ञेय और पन्त की उपस्थिति और संगत ने दूधनाथ सिंह को जिस तरह अपने जादुई प्रभामंडल में लिया, इसका वर्णन ‘लौट आ ओ धार’ में उन्होंने भाषा और संवेदना की जिस अद्भुत लय के साथ अभिव्यक्त किया है उसे पढ़ कर ही समझा जा सकता है।

पत्नी श्रीमती निर्मला ठाकुर के साथ
बाबरी मस्जिद ध्वंस की पृष्ठभूमि पर केन्द्रित दूधनाथ सिंह का उपन्यास ‘आखिरी कलाम’ उनकी रचनात्मकता का शिखर है। औपन्यासिक कलेवर में यह कथाकृति साम्प्रदायिक फासीवाद के विरोध में एक जीवंत जिरह है, जो धर्म, धर्मनिरपेक्षता, जनतंत्र, मीडिया, मुसलमान व वामपंथ से ले कर लोहियावादी राजनीति तक का विस्तार लिए हुए है। लेकिन इस उपन्यास की कथा-वस्तु में वे सर्वाधिक मुखर हुए हिन्दू धर्म की मनुष्यविरोधी वर्णाश्रमी-जातिगत संरचना को बेपर्दा करने तथा धर्मनिरपेक्ष शक्तियों के उस पोले आधार को उजागर करने में, जो उसकी विफलता के लिए जिम्मेदार है। उपन्यास के केन्द्रीय पात्र तत्सत पांडे के माध्यम से दूधनाथ सिंह वैज्ञानिक चेतना, आधुनिक दृष्टि व गहरे नैतिक विवेक से लैस नेहरू की समकालीन उस पीढी की पराजय गाथा को दर्ज करते हैं, जिसके राष्ट्रीय आदर्श व राजनीतिक मूल्य चेतना 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद ध्वंस के साथ कहीं गहरे दफन हो गए थे। बाबरी मस्जिद ध्वंस के तीन दिन पूर्व से ले कर तीन दिन बाद तक के अयोध्या प्रवास के दौरान, तत्सत पांडे की मृत्युपूर्व का यह ‘आखिरी कलाम’ भारतीय सत्ता तंत्र  तथा सामजिक संरचना के विविध पहलुओं का जो विवेचन करता है, वह मौलिक होने के साथ-साथ अत्यंत साहसपूर्ण तथा बेलाग है। ‘रामचरितमानस’ व तुलसीदास को इस उपन्यास में जिस तार्किकता और तीखेपन के साथ प्रश्नांकित किया गया है, वह इसे जोखिम के लेखन की कोटि में शामिल करता है। इन दिनों जब हिन्दी की मुख्य धारा के अधिकांश लेखक तुलसीदास के कवित्व को ले कर अतिरिक्त रूप से आग्रहशील हैं और जब प्रगतिशील दौर की तुलसी और रामचरितमानस के प्रतिगामी मूल्यों को प्रश्नांकित करने का दौर तिरोहित हो चुका है तब ‘आखिरी कलाम’ का यह विमर्श बौद्धिक और नैतिक साहस का ही द्योतक है। कुफ्र सरीखा जोखिम उठाते हुए दूधनाथ सिंह ने ‘रामचरितमानस’ को लक्षित करते हुए उपन्यास के मुख्य पात्र तत्सत पांडे से यह तक कहला डाला कि ‘किताबों और जनता के बीच कौन खड़ा है? धर्म-ग्रन्थ और तुलसीदास। ...जो किताब तुम्हें जेहाद के लिए ,धर्मयुद्ध के लिए उकसाए वह तुम्हारी दुश्मन है। जो किताब अपने को ज्ञान की अंतिम सीढ़ी कहे, जो परम-तत्व की ओर इशारा करे वह किताब एक चुका हुआ विचार है। ...जो किताब तुम्हारी जिज्ञासा का वध करे वह एक दु:स्वप्न है, जीवित मृत्यु है। ...अतः तैयार रहो –एक वृद्ध और बंजर और अपाहिज और दैत्याकार किताब से लड़ने के लिए सदा तैयार रहो। ...अपनी जीवित मृत्यु से बचो। ...अपनी अंतर्मेधा को साधो।’

'आखिरी कलाम' के एक पात्र उस्मान मियाँ से बात करते हुए दूधनाथ जी
दरअसल दूधनाथ सिंह ने अपने उपन्यास ‘आख़िरी कलाम’ को वैचारिक हस्तक्षेप का अस्त्र बनाया था। संरचनात्मक और वैचारिक तोड़फोड़ की जुगलबंदी को जिस दक्षता के साथ उन्होंने इस उपन्यास में साधा है वह विरल है। यह करते हुए उन्होंने बहुत सी स्वीकृत मान्यताएं और निर्मितियां ध्वस्त की थीं। वे धर्मनिरपेक्षता को प्रश्नांकित करते हुए जहाँ धर्म को ही निशाने पर लेते हैं वहीं प्रतिरोध की वाम धारा से भी उपन्यास की अंतर्वस्तु में यह प्रश्न करते हैं कि ‘विचार, रणनीति और जनता की सोच-समझ में तालमेल क्यों नहीं बैठता?’ उनका आक्रोश उस अर्थहीन बौद्धिक जुगाली पर भी है, ‘जहाँ अल्पसंख्यक भी एक अंतर्वस्तु थी और लोग इसे लेकर बहुत भावुक हो रहे थे। धर्मनिरपेक्ष शब्द की बड़ी छानबीन हो रही थी।’ कहना न होगा कि आज जब बाबरी मस्जिद ध्वंस और ‘गुजरात 2002’ के बाद साम्प्रदायिक फासीवाद एक दु:स्वप्न नहीं वास्तविकता में तब्दील होने को है, तब उन कारकों की पहचान जरूरी है जिनसे यह मानस बनता है। ‘आखिरी कलाम’ जहाँ धर्मोन्मादी फासीवाद की निर्माण प्रक्रिया से साक्षात् कराता है वहीं इसके उत्स पर प्रहार का भी आह्वान करता है। सच तो यह है कि औपन्यासिक सरचना में ‘आखिरी कलाम’ एक ऐसा वैचारिक अस्त्र है जो अपनी सम्पूर्ण बौद्धिक आक्रामकता के साथ हिन्दी में पहली बार है।



दूधनाथ सिंह की बौद्धिक संरचना व्यापक रूप से संवादधर्मी थी, लेकिन विवाद की कीमत पर भी वे अपनी रचनात्मकता से समझौता नहीं करते थे। उनकी लम्बी कहानी ‘नमो अन्धकारम’ और ‘निष्कासन’ को लेकर खासा विवाद हुआ था। इन दोनों ही कहानियों में वास्तविक जीवन की छाया दूर तक देखी पहचानी जा सकती है, यहाँ तक कि इसके पात्र भी। ‘नमो अन्धकारम’ ने जहाँ इलाहाबाद के साहित्य समाज में हलचल मचाई, वहीं ‘निष्कासन’ दलित विमर्शकारों के निशाने पर रही। इस सम्बन्ध में दूधनाथ सिंह का स्वयं का कहना था कि वे अपनी रचनाओं में ‘वास्तविक चरित्र का पीछा नहीं करते, भले ही जहाँ तहां पात्र जीवन की प्रतिछाया अवश्य होते हैं।’ यह सच है कि उन्होंने अपनी रचनाओं में सत्य और यथार्थ के निकट रहते हुए इतिहास को फलांगा नहीं। उनकी स्पष्ट मान्यता थी कि ‘निजी और कल्पित यथार्थ से कभी भी बड़ा लेखन नहीं हो सकता।’ उनके अंतिम दौर के  कहानी संग्रह ‘तू फू’, और ‘जलमुर्गियों का शिकार’ इसके साक्ष्य भी हैं। यह अनायास नहीं है कि अपने जीवन के अंतिम डेढ़ दो दशकों में लिखित इन संग्रहों की अधिकांश कहानियों में कुलीनता की कालिमा, जनतंत्र का अपराधीकरण, सफेदपोश मध्य-वर्ग का पाखंड और हाशिये के समाज की त्रासदी विषयवस्तु के रूप में समाहित रही है।



दूधनाथ सिंह यूं तो शुरुआती दौर में इलाहाबाद के परिमल ग्रुप के निकट रहे थे लेकिन बाद में वे कार्डहोल्डर कम्युनिस्ट रहे। इन दिनों वे जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी थे। मार्क्सवाद और संगठन के प्रति प्रतिबद्धता के बावजूद उन में वैचारिक कट्टरता नहीं थी। वे आजीवन संवादधर्मी बौद्धिक रहे। यही कारण था कि अपने अस्सीवें वर्ष में भी उन्होंने विजय मोहन सिंह द्वारा सम्पादित अनुपलब्ध कहानी संग्रह ‘साठ के दशक की कहानियां’ का अपनी पहलकदमी पर पुनर्प्रकाशन किया और उस पर इलाहाबाद में एक आयोजन भी कराया। दरअसल वे वामपंथ को विस्तृत अर्थों में लेने के कायल थे और आवश्यकता होने पर उसके प्रति मैत्रीपूर्ण आलोचनात्मक रुख भी अपनाते थे। ‘आखिरी कलाम’ में भी साम्प्रदायिक फासीवाद के खतरे की चुनौती के बरक्स वामपंथ की कमजोरी को रेखांकित करने में वे नहीं चूकते। उनकी स्पष्ट सोच थी कि ‘दक्षिणपंथी विचारधारा से अप्रतिबद्ध होना अनिवार्य है। आर. एस. एस. या जमाते इस्लामी में रह कर कोई बड़ा रचनाकार कभी नहीं हो सकता। दुनिया के कला के क्षेत्र में हमेशा वामपंथियों ने ही महान रचनाओं का सृजन किया और वामपंथ का यहाँ अर्थ है जनता और उसकी वास्तविक चेतना से, उसके दुःख-दर्द से रचनाकार का जुडाव।’ इसी सोच के अनुरूप वे जनता और समाज के मुद्दों पर हस्तक्षेप करते हुए जलसे, जुलूसों, धरनों, गोष्ठियों आदि में शिरकत करते इलाहाबाद के जन-जीवन में अपनी सक्रिय उपस्थिति दर्ज कराते रहते थे।



इक्यासी वर्ष की आयु के बावजूद बीमारी के अंतिम कुछ महीनों को छोड़ कर वे न केवल लेखकीय मंसूबों से भरे-पूरे रहते थे, बल्कि इसे क्रियान्वित भी करते रहते थे। शमशेर, भुवनेश्वर और मुक्तिबोध पर पुस्तकों के बाद उन्होंने अपने गुरु डॉ. धीरेन्द्र वर्मा की पांच खण्डों में प्रकाश्य रचनावली के संपादन का कार्य भी पूरा कर लिया था। इन्ही दिनों उन्होंने ‘सात नदी बेटियां’ शीर्षक से एक उपन्यासिका भी लिख कर समाप्त कर डाली थी जिसके कुछ अंश एक पत्रिका में प्रकाशित भी हुए थे। दुर्गम अभेद्य ‘अबूझमाड़’ पर भी उपन्यास लिखने के इरादे से कुछ नोट्स उन्होंने ले रखे थे लेकिन अफ़सोस कि उनके ये काम उनके जीवन में अधूरे और अप्रकाशित रह गए। वे लम्बे समय तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में अध्यापन से सम्बद्ध रहे लेकिन खुद को वे एक लेखक ही ज्यादा मानते थे अकेडमिक कम। यह भी दिलचस्प तथ्य है कि वे बज़रिये उर्दू हिन्दी की पठन-पाठन की दुनिया में आए थे। इसलिए ग़ालिब, मीर और दूसरे उर्दू शायर उनकी जुबान पर चढ़े हुए थे। वे लम्बे समय तक अपने समकालीनों के साथ इलाहाबादी साहित्य समाज की धड़कन थे आखिर के दौर में जब उनके समकालीन एक एक कर इलाहाबाद और कुछ ने दुनिया से विदाई ले ली तो उन्हें शहर का सन्नाटा अभिशाप लगने लगा था। दो वर्ष पूर्व जब उनकी पत्नी कवयित्री निर्मला ठाकुर भी उनको छोड़ गयीं तो वे नितांत अकेले हो गए थे। ऐसे में वे दूर शहरों में छिटके मित्रों और शुभचिंतकों से फोन पर जब तब संवाद करते रहते थे। मुझसे भी अंत तक उनका यह संवाद बना रहा था। उनकी अस्सीवीं जयन्ती पर इलाहाबाद में आयोजित समारोह में उनकी जीवन्तता, फुर्तीलेपन और उत्साह को देख कर लगता था कि अभी उन्हें रचनात्मकता के नए शिखर छूने हैं। विगत 29 अप्रैल 2017 को  जब वे जनवादी लेखक संघ के मुक्तिबोध समारोह में अंतिम बार दिल्ली में मिले थे तब भी नहीं लगा था कि वे कैंसर सरीखी गंभीर बीमारी की गिरफ्त में हैं।

कवि केदार नाथ अग्रवाल के संभवतः ७८ वें जन्मदिन पर बाँदा में उनके घर पर सम्मानित करते हुए
दूधनाथ सिंह जी ने एक बार किसी प्रसंग में कहा था कि ‘एक लेखक के लिए सन्नाटा अभिशाप है’, अफ़सोस कि अब वह सन्नाटा अकेला एक लेखक का न हो कर समूचे इलाहाबाद शहर और साहित्य समाज का है। जो इलाहाबाद एक समय में साहित्य की राजधानी हुआ करता था आज दूधनाथ सिंह के न रहने पर वह सचमुच उजाड़ है। दूधनाथ सिंह मेरे प्रिय लेखक थे उनके उपन्यास ‘आखिरी कलाम’ को मैं अपने समय का श्रेष्ठतम उपन्यास मानता हूँ। उस पर मैंने लम्बा आलोचनात्मक लेख भी लिखा था। और उसके लिए साहित्य समाज के कुछ वाचालों के कुबोल भी सहे थे। यहाँ मैं यह लिखने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूँ कि उनकी अस्सीवीं वर्षगांठ (17 अक्टूबर 2016) पर जब मेरा एक लेख प्रकाशित हुआ था तो लेख की प्रशंसा करते हुए अपने खास अंदाज़ में स्केच पेन से अपनी हस्तलिपि में स्कैन कर जो सन्देश उन्होंने सोशल मीडिया पर मेरे लिए सार्वजनिक किया, उसका अन्तिम वाक्य था कि हर लेखक को उसे समझने वाला एक न एक दिन मिलता ही है। उसके जीते जी मिल जाय, यह उसका सौभाग्य है। 


मेरे लेखन के प्रति उनका यह अनुमोदन मेरे लिए किसी बड़े सम्मान से कम नहीं था। अफ़सोस कि अब वे अचानक इस तरह असमय हमारे बीच नहीं रहे। अपने प्रिय लेखक को आख़िरी सलाम।

वीरेन्द्र यादव



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(चित्र सौजन्य : सुधीर सिंह)           

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