अनिल राय का आलेख 'अक्टूबर क्रान्ति की आरम्भिक प्रेरणाएँ और हिन्दी के कुछ वैचारिक पृष्ठ'




दुनिया हमेशा एक क्रमिक विकास के चरण से गुजरती रहती है। मानव ने अपने विकास के क्रम में सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक से ले कर राजनीतिक विकास की नयी अवधारणाएं विकसित कीं और इस दुनिया को कुछ और बेहतर बनाने का प्रयास किया। राजनीतिक तौर पर हम राजतंत्रात्मक शासन, सामन्तवादी शासन से हो कर लोकतान्त्रिक शासन की व्यवस्थाओं से रु-बरु हुए। इन सबमें कुछ न कुछ खामियाँ दिखाई पडीं और जनता का शोषण चक्र अबाध चलता रहा। लोकतान्त्रिक शासन को पूंजीवादियों ने अपनी तरह से नियन्त्रित करने का न केवल प्रयास किया बल्कि वे इसमें सफल भी रहे। उन्नीसवीं सदी के महान विचारक कार्ल मार्क्स ने इसी क्रम में समाजवादी शासन की अवधारणा सामने प्रस्तुत की। इस अवधारणा में राज्य का शासन सर्वहारा वर्ग द्वारा परिचालित होने की परिकल्पना की गयी थी। 1917 की बोल्शेविक क्रांति ने इसे यथार्थ रूप दिया और इस क्रांति का नेतृत्व करते हुए महान क्रान्तिकारी लेनिन ने दुनिया के सबसे बड़े देश रूस में ज़ार के अत्याचारी शासन का ख़ात्मा कर मजदूरों के शासन की नीव रखी। इसी नीव पर सोवियत संघ का आगे चल कर निर्माण हुआ जिसने इस दुनिया को मानवीय बनाने के वैश्विक प्रयास किए। इस क्रान्ति ने दुनिया भर को न केवल प्रभावित किया अपितु बदलाव की वह लहर ला दी जिसने दुनिया भर के कई-एक देशों में इस शासन व्यवस्था की शुरुआत कर दी। सही मायनों में यह ऐसा शासन था जो ‘जनता का, जनता द्वारा और जनता के लिए’, संचालित हो रहा था। दुनिया भर के युवा लोग इस क्रान्ति से प्रभावित हुए और इसके प्रचार-प्रसार में अपने पूरे जीवन को समर्पित कर दिए। लोकतन्त्र का असल मकसद भी तो यही था। अलग बात है कि पूँजीवादी ताक़तें हमेशा ही इस व्यवस्था को नष्ट करने में लगी रही क्योंकि समाजवादी व्यवस्था निरन्तर उसे हर क्षेत्र में कड़ी चुनौती प्रस्तुत कर रही थी।


वर्ष 2017 में बोल्शेविक क्रांति के सौ वर्ष पूरे हो गए हैं। इस अवसर पर इस क्रान्ति की उपादेयता, इसके महत्व और इसकी ख़ामियों के बारे में विभिन्न माध्यमों के जरिए सार्थक चर्चा हो रही है। इसी क्रम में प्रोफ़ेसर अनिल राय ने भारतीय संदर्भ को रेखांकित करते हुए एक अत्यन्त महत्वपूर्ण आलेख लिखा है जो पक्षधर के हालिया अंक में प्रकाशित हुआ है। आज ‘पहली बार’ पर अनिल राय के इस महत्वपूर्ण आलेख को हम प्रस्तुत कर रहे हैं।  

                 

अक्टूबर क्रान्ति की आरम्भिक प्रेरणाएँ और हिन्दी के कुछ वैचारिक

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अनिल राय
                      
     
अक्टूबर क्रान्ति के शताब्दी–वर्ष में दुनिया की शोषित-पीड़ित मुक्तिकामी जनता के लिए यह स्मरणीय है कि मनुष्यता की समूची विकास-यात्रा में यह क्रान्ति अपनी प्रगतिशील उपलब्धियों और भूमिकाओं के कारण अनुपमेय और अपूर्व थी। इस क्रान्ति को इसलिए भी स्मरण किया जाना चाहिए कि इसने वर्ग-विभाजित समाज में मनुष्य की स्वाधीनता और समानता को नये समाजवादी अर्थ दिए हैं, दुनिया-भर के राष्ट्रीय मुक्ति-आंदोलनों को प्रेरित-विकसित करने का वातावरण बनाया है, पूँजी की सत्ता और उसके भीतर से पैदा होने वाले दमनकारी जन-विरोधी मूल्यों के प्रति प्रतिरोध और विजय के सर्वथा नये इतिहास के आरम्भ की प्रस्तावना लिखी है।                                               

अक्टूबर क्रान्ति इतिहास की वह युगांतरकारी परिघटना है, जिसने न केवल रूस की सामाजिक-राजनीतिक–आर्थिक संरचना में एक आधारभूत बदलाव और निर्माण सम्भव किया था, बल्कि पूरी दुनिया में शोषण-मुक्त समाज की रचना के प्रति एक उम्मीद और भरोसा पैदा किया था। इसने दुनिया को बताया था कि साधारण गरीब-दुखी लोगों के सपने सच हो सकते हैं और आकांक्षाएं यथार्थ में बदल सकती हैं। इस समाजवादी क्रान्ति और उसके राजनीतिक विचारों के पहले दुनिया में यह कल्पना असम्भव-सी थी कि वर्ग-संघर्ष का कोई ऐसा भी परिणाम सामने आ सकता है, जिसमें पूर्व वर्चस्वी सामाजिक संरचना के मूलोच्छेदन के बाद किसानों और श्रमिकों का अपना राज्य भी स्थापित हो सकता है और वे एक नये समाज की रचना के सूत्रधार भी हो सकते हैं। यह केवल और केवल अक्टूबर क्रान्ति से और बोल्शेविक क्रान्ति से ही सम्भव हो सकता था। इसीलिए इस क्रान्ति को मानव–सभ्यता के इतिहास में परिवर्तन और सृजन, दोनों के अविभाज्य दायित्व से सम्बद्ध एक नये वैज्ञानिक विचार-दर्शन की प्रथम व्यावहारिक निष्पत्ति कहा जाना चाहिए। इसे केवल सत्ता–परिवर्तन सम्भव करने वाली परिघटना के तर्कों से नहीं व्याख्यायित किया जा सकता।  इसके महत्व और भूमिका को उन बड़े कार्य-भारों के साथ जोड कर ही परिभाषित किया जा सकता है, जिनका सम्बन्ध एक सर्वथा नयी और अभूतपूर्व समाज-व्यवस्था के निर्माण से है। 

      
अक्टूबर क्रान्ति के बाद के बदले हुए सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य ने व्यापक पैमाने पर दुनिया–भर के किसानों-मजदूरों, उनके समर्थक चिंतकों-विचारकों के भीतर इसके प्रति गहरे आकर्षण का भाव पैदा किया था और उन्हें इसके आकलन-मूल्यांकन की दिशा में प्रवृत्त किया था। 1917 की इस ऐतिहासिक परिघटना के क्रान्तिकारी तत्वों और उसके समाजार्थिक प्रभावों के बारे में विचारों और राजनीतिक संघर्षों के वातावरण  में एक अभूतपूर्व हलचल पैदा हुई थी। दुनिया के अनेक देशों में उपनिवेशवाद-साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्ष को इससे एक नयी शक्ति और दिशा प्राप्त हुई। संघर्षशील जन-शक्तियों ने अक्टूबर क्रान्ति से वैचारिक और व्यावहारिक स्तर पर अनेक सन्दर्भ लिए, उसकी रोशनी में अपने संगठन, दृष्टिकोण और पद्धतियों की समीक्षा की तथा नये क्रन्तिकारी कार्य-भार निर्धारित किये। यह विश्व-इतिहास की पहली क्रान्ति थी, जिसने अपने प्रयोग और परिणाम के देश-काल-वातावरण की सीमाओं को अतिक्रांत किया और एक सार्वदेशिक चरित्र ग्रहण करते हुए सामन्तवाद–पूँजीवाद–साम्राज्यवाद के विरुद्ध निर्णायक युद्ध की वैश्विक पृष्ठभूमि का निर्माण किया। समाजवाद के स्वप्नदर्शियों ने साधारण मेहनतकश जनता के स्वाधीन होने और उनके भौतिक-आर्थिक सम्पदाओं के नियंता होने की जो कल्पना की थी, इस क्रान्ति  ने उसे यथार्थ में बदल दिया था। अब वह सपना सोवियत समाजवादी समाज के वस्तुगत यथार्थ के रूप में पूरी दुनिया के लिए क्रान्तिकारी परिवर्तन की आकांक्षा का तार्किक आधार बन चुका था। पराधीनता से मुक्त, समानता तथा न्याय पर आधारित, एक नये समाज के उदय और विकास के दर्शन पर अटूट विश्वास के वैश्विक वातावरण ने तत्कालीन साम्राज्यवाद-विरोधी जन-आंदोलनों और उसकी संघर्ष-चेतना को गहराई से प्रभावित किया था। सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन के अनेक अनुत्तरित प्रश्नों पर यहाँ न केवल चिन्ताएं व्यक्त की गयीं, बल्कि उनके समाधान की व्यावहारिक कोशिशों के चमत्कारिक परिणाम भी सामने आये। किसानो-मजदूरों के शोषण-उत्पीडन, बच्चों-बूढ़ों-स्त्रियों और समाज के दूसरे कमजोर वर्गों तथा समुदायों की गरिमापूर्ण प्रतिष्ठा के मुद्दों पर अक्टूबर क्रान्ति की भूमिकाएँ विश्व-इतिहास की अनोखी प्रेरणाएँ प्रमाणित हुईं। अक्टूबर क्रान्ति ने वर्ग-समाज के इतिहास में अपने अभूतपूर्व क्रान्तिकारी हस्तक्षेप से पूँजी और श्रम के अन्तर्विरोध से ले कर व्यक्तिगत सम्पत्ति की शोषणकारी व्यवस्था के उन्मूलन से होते हुए औद्योगिक पूँजीवादी परिणतियों के संकटों के बीच वर्ग-संघर्ष के रास्ते समाजवाद की स्थापना की सैद्धान्तिक और व्यावहारिक दिशा में दुनिया के अन्य देशों के लिए भी आगे बढ़ने की जमीन तैयार कर दी। उसकी इस भूमिका, प्रेरणा और प्रभाव का ही परिणाम था कि भारत के उपनिवेशवाद–विरोधी मुक्ति-संघर्ष में भी एक नयी शक्ति और नये उत्साह का संचार होता हुआ अनुभव किया गया। समाज की भौतिक–आर्थिक संरचनाओं के साथ सांस्कृतिक अधिरचना की समस्याओं के समाधान की राजनीतिक-वैचारिक दिशा और उसकी व्यावहारिक कार्यनीतियों के सन्दर्भ में अक्टूबर क्रान्ति की प्रेरणाएँ दुनिया के अन्य देशों की तरह भारत के लिए भी बहुत  महत्व की प्रमाणित हुईं। भारत के अनेक क्षेत्रों और उसकी अन्य भाषाओँ की तरह ही हिन्दी के तद्युगीन राजनीतिक जन-जागरण में भी अक्टूबर क्रान्ति की इन आरम्भिक प्रेरणाओं की अनुगूंजें स्पष्ट सुनी जा सकती हैं। 



 
                                                           
                             [एक]                                                                                   

अक्टूबर 1917 की सोवियत समाजवादी क्रान्ति के प्रभाव और उसके ऐतिहासिक महत्व की आरम्भिक प्रेरणाओं के आकलन के पहले यह उल्लेख्य है कि उन्नीसवीं शताब्दी के हिन्दी नवजागरण में वर्ग–आधारित समाज-व्यवस्था के अन्तर्विरोधों और समस्याओं के विश्लेषण के समाजवादी परिप्रेक्ष्य के प्रति किसी तरह के वैचारिक आकर्षण के साक्ष्य नहीं दिखते हैं। यह प्रश्न अप्रासंगिक नहीं है कि हिन्दी क्षेत्र में आधुनिकता तथा नवजागरण के प्रभाव और प्रसार के इन शुरूआती कई दशकों में मार्क्सवादी विचारधारा या पूँजीवाद विरोधी इस नई सामाजिक-राजनीतिक चेतना के प्रति किसी प्रकार के विमर्श का कोई वातावरण बनता आखिर क्यों नहीं दिखता? सम्प्रेषण और संचार की सीमाओं के बावजूद हिन्दी का बौद्धिक अन्य वैश्विक सन्दर्भों से देर-सवेर परिचित हो रहा था और अपनी प्रतिक्रियाएं भी व्यक्त कर रहा था, पर दुनिया के मजदूरों को एक करने का नारा देने और दुनिया की व्याख्या से ज्यादा दुनिया को बदलने की जरूरत की घोषणा करने वाली इस बिलकुल नई सामाजिक–राजनीतिक दृष्टि पर, यहाँ चकित करने वाला सन्नाटा दिखता है।



पर, यह उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम दशकों के हिन्दी के वैचारिक परिदृश्य का सन्नाटा है। दूसरे  हिन्दीतर क्षेत्रों का परिदृश्य अलग है। कर्मेंदु शिशिर ने अपनी पुस्तक ‘डॉ. राम विलास शर्मा : नवजागरण एवं इतिहास लेखन’ में राम विलास जी की पुस्तक ‘भारत में अंग्रेजी राज और मार्क्सवाद’ के बारे में बात करते हुए इतिहासकार अयोध्या सिंह की एक टिप्पणी का सन्दर्भ दिया है। उनका कहना है –‘अयोध्या सिंह ने अन्य भारतीय भाषाओँ में हुए कार्यों का हवाला दे कर काफी मूल्यवान संकेत दिए हैं। उनके अनुसार भारत में लगभग मार्क्स के समय से ही समाजवादी चेतना का प्रसार प्रारम्भ हो चुका था।’ वह फिर कहते हैं –‘अयोध्या सिंह के दिए सूत्रों से पूरे देश में समाजवादी चेतना के व्यापक प्रसार का अनुमान होता है।’  ‘समाजवाद : भारतीय जनता का संघर्ष’ में भारत में समाजवादी विचारों के प्रवेश का अध्ययन करते हुए अयोध्या सिंह ने यह मानने के बावजूद कि अक्टूबर क्रान्ति के बाद ही भारत में समाजवादी विचार आन्दोलन का रूप ग्रहण कर सके थे, यह  स्पष्ट कर दिया है कि यूरोप में समाजवादी विचारधारा के विकास के साथ ही भारतीय भी उसके सम्पर्क में आने लगे थे। ब्रिटेन के ईस्टर्न पोस्ट नामक पत्र के 19 अगस्त 1871 के समाचार के हवाले से उन्होंने बताया है कि मार्क्स की मौजूदगी में इंटरनेशनल वर्किंग मेंस एसोसिएशन में कलकत्ता से आए एक पत्र में भारत में उक्त एसोसिएशन की शाखा के गठन के लिए अनुरोध करते हुए कहा गया था कि जनता में ब्रिटिश सरकार के प्रति तीव्र असंतोष है, यहाँ के मजदूर अपने शोषण से दुखी हैं, इसलिए हम एक शाखा के माध्यम से इंटरनेशनल से जुड़ना चाहते हैं। मार्क्स और उनके इस संगठन से जुड़ने का भाव और शोषण से मुक्ति का यह भरोसा यूँ ही नहीं पैदा हो गया था। 1853 से ले कर 1857 तक मार्क्स के भारतविषयक कई महत्वपूर्ण विचार प्रकाश में आ चुके थे। उनकी चिन्ताएं तथा भारतीय जनता के पक्ष में खड़े उनके विचार किसी भी जागृत भारतीय के मन में भरोसे का ऐसा भाव भरने के लिए पर्याप्त थे। इतिहासकार इरफ़ान हबीब ने अपनी पुस्तक ‘राष्ट्रीय आन्दोलन : विचारधारा और इतिहास’ में एक अमेरिकी अख़बार ‘ न्यूयार्क डेली ट्रिब्यून’ में 1853 में प्रकाशित मार्क्स के लेख का एक अंश उद्धृत किया है – ‘भारत के लोग ब्रिटिश बुर्जुआ द्वारा उनके बीच बिखेरे गये समाज के नये तत्वों का लाभ तब तक नहीं उठा सकेंगे, जब तक कि स्वयं ग्रेट ब्रिटेन में नये शासक वर्गों को औद्योगिक सर्वहारा द्वारा उखाड़ फेंक नहीं दिया जाता या जब तक कि स्वयं हिन्दू (भारतीय) अंग्रेज शासन को उखाड़ फेंकने में सक्षम नहीं हो जाते।’ इरफ़ान हबीब पुनः कहते हैं कि जब 1857 का महान विद्रोह शुरू हुआ तो इसी समाचार पत्र में अपने लेखन में मार्क्स और एंगेल्स ने विद्रोहियों का समर्थन किया और ब्रिटिश ज्यादतियों की आलोचना की। स्पष्ट है कि भारत के अनेक बुद्धिजीवियों की नजर मार्क्स–एंगेल्स और उनके समाजवादी विचारों पर थी और वे उनके प्रति आकर्षित थे। अयोध्या सिंह अपनी पुस्तक में थोड़े विस्तार के साथ भारत के मजदूर आंदोलनों और उनके संगठनों की गतिविधियों से समाजवादी पृष्ठभूमि के निर्माण की परिस्थितियों को जोड़ते हैं और इसमें यूरोप के समाजवादी प्रभाव की भूमिका रेखांकित करते हैं। इस क्रम में वह मार्क्स के इंटरनेशनल के समर्थन में कलकत्ते के साप्ताहिक ‘सोमप्रकाश’ के सम्पादकीय, 1870 में केशव चन्द्र सेन की इंग्लैंड यात्रा और वहाँ से लौटने के बाद कलकत्ते में मजदूरों की शिक्षा के लिए संस्था की स्थापना, ब्रह्म समाज के शाशिप्रद बनर्जी का 1870-71 में यूरोप से सम्पर्क, यात्रा और फिर मजदूरों के संगठन और अखबार का संचालन, 1871 के पेरिस कम्यून के बाद भारत में मजदूर आंदोलनों में वृध्दि जैसे कई तथ्यों और सन्दर्भों का उल्लेख करते हैं । 1876-77 में कलकत्ता के शिवनाथ शास्त्री द्वारा ‘समदर्शी’ के साम्यवादी लक्ष्यों को स्पष्ट करने के लिए अयोध्या सिंह ने इस पुस्तक में शास्त्री जी के मित्र विपिन चन्द्र पाल को उद्धृत किया है – ‘जिस कम्युनिज्म के आदर्श से हम लोगों ने इस दल को बांधना चाहा था, उस आदर्श को हम पूरा नहीं कर सके, लेकिन अन्य सब प्रतिज्ञाओं को हमने पूरा किया था।’ अक्टूबर क्रान्ति के बहुत पहले 10 मई 1893 के एक पत्र में रवीन्द्र नाथ ठाकुर ने समाजवादी व्यवस्था में व्यक्तिगत सम्पदा के खात्मे और उसके समान सार्वजनिक वितरण के सिद्धान्तों की सार्थकता और महत्व के बारे में लिखा कि इस व्यवस्था के पैरोकार सभी लोगों के बीच धन और सम्पत्ति को बाँट देना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि वह नहीं जानते कि यह हो पाएगा या नहीं, पर यदि ऐसा नहीं हुआ तो इसे मैं मानव-जाति का दुर्भाग्य ही कहूँगा। दादा भाई नौरोजी के भी मार्क्स और उनके इंटरनेशनल के बीच के सम्पर्कों की जानकारी मिलती है। नौरोजी इंटरनेशनल की सम्भावित भूमिका को भारत में हो रही साम्राज्यवादी लूट के प्रभावी विरोध के संबन्ध में बहुत महत्वपूर्ण मानते थे और उसके सहयोग के प्रति आशान्वित थे। सुमित सरकार ने ‘आधुनिक भारत’ में नौरोजी की राष्ट्रवादी आर्थिक समीक्षा को भारतीय जनता पर भू-राजस्व के अत्यधिक भार के साथ कई अन्य माध्यमों से उसके साम्राज्यवादी आर्थिक दोहन के आकलन की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण बताया है। एन. वाई. डेनियलसेन को 19 फरवरी 1881को लिखे गये मार्क्स के पत्र का हवाला देते हुए इरफ़ान हबीब का  कहना है कि उस पत्र में मार्क्स ने भारत पर कर के भारी बोझ के बारे में जो बातें लिखी हैं, उन पर नौरोजी के भारत सम्बन्धी आर्थिक विश्लेषण का प्रभाव है। यह सन्दर्भ विचार और विश्लेषण के क्षेत्र में उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम दशकों में मार्क्सवाद और भारत के बीच बनते सम्बन्धों पर प्रकाश डालता है। ऐसे अनेक सन्दर्भों, विचार-सूत्रों और तद्युगीन सामाजिक-राजनीतिक गतिविधियों के प्रकाश में भारत के हिन्दीतर क्षेत्रों में समाजवाद की बनती हुई वैचारिक-व्यावहारिक पृष्ठभूमि का तो अनुमान किया जा सकता है, पर हिन्दी क्षेत्र और उसके इस  समय के नवजागरणकालीन चिन्तन में मार्क्सवाद और समाजवाद के परिप्रेक्ष्य में किसी प्रकार के वैचारिक उद्यम का कोई वातावरण नहीं दिखता। शिवदान सिंह चौहान ने अपने एक लेख ‘समाजवादी विचारधारा का हिन्दी साहित्य पर प्रभाव’ में इस स्थिति पर सवाल उठाते हुए लिखा है कि वैज्ञानिक समाजवाद की विचारधारा ने उन्नीसवीं सदी के भारतीय बुद्धिजीवियों की कल्पना में हलचल क्यों नहीं पैदा की, जब कि उसने प्रायः हर यूरोपीय देश के मजदूर वर्ग को प्रेरित कर के संघर्ष की ओर उन्मुख कर दिया था? अपने इस सवाल का खुद जवाब देते हुए वे कहते हैं कि इस बारे में केवल इतना ही कहा जा सकता है कि उस समय तक भारतीय बुद्धिजीवी वर्ग की तादाद नगण्य थी और शायद वैज्ञानिक समाजवाद के दर्शन का अध्ययन करने की उसके पास सुविधाएँ उपलब्ध नही थीं। लेख की विषय-वस्तु से स्पष्ट है कि यहाँ ‘भारतीय बुद्धिजीवी’ से उनका आशय ‘हिन्दी बुद्धिजीवी’ से है।  

 
                           
                              [दो]

बीसवीं शताब्दी के आरम्भिक दशक में हिन्दी जनजागरण में यह स्थिति बदलती हुई दिखती है। हिन्दी क्षेत्र के उन्नीसवीं शताब्दी के जिस गैरमार्क्सवादी वैचारिक वातावरण की चर्चा की गयी है, उसमें  परिवर्तन होता है और इस विचार-दर्शन का धीरे-धीरे बहुत मंद स्वर में इसमें प्रवेश होता है। पर यहाँ भी यह प्रभाव कुछ इक्के-दुक्के वैचारिक प्रयत्नों में ही दिखता है। इस काल-खंड के ज्यादातर राजनीतिक हिन्दी चिन्तन में उन प्रश्नों और विचारों की उपस्थिति है, जो जनता के शोषण, उसकी दुरवस्था और स्वाधीनता से जुड़े हुए हैं। अपनी अन्तिम परिणतियों में ये चिन्ताएं समाजवाद-विरोधी तो नहीं हैं, पर पारिभाषिक अर्थों में समाजवादी भी नहीं हैं। हाँ, इनका इस अर्थ में गम्भीर महत्व स्वीकार किया जाना चाहिए कि इनसे पूँजीवाद और साम्राज्यवाद के विरोध का एक ऐसा राजनीतिक-आर्थिक वातावरण बनना शुरू हो गया, जिसने आगे चल कर हिन्दी नवजागरण में समाजवादी चेतना के विकास के लिए ठोस जमीन का काम किया। इसमें सीधे-सीधे मार्क्सवाद या कम्युनिज्म के प्रभाव और प्रेरणाओं के उदाहरण तो बहुत कम हैं, पर जो हैं वे काफी महत्वपूर्ण हैं। राम विलास शर्मा ने इस अवधि के लेखन के महत्व को स्पष्ट करते हुए अपनी पुस्तक ‘भारत में अंग्रेजी राज और मार्क्सवाद’ की भूमिका में लिखा है – ‘इसका ऐतिहासिक महत्व किसी की निगाह से छिपा न रहेगा। समाजवादी चेतना भारतीय जनता की साम्राज्यवाद-विरोधी चेतना का ही प्रसार है।’ राम विलास शर्मा की यह पुस्तक हिन्दी प्रदेश में समाजवादी चेतना के प्रसार का विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत करती है। यह हिन्दी नवजागरण का अपनी तरह का कदाचित पहला और व्यापक अध्ययन होगा, जो रूसी क्रान्ति  के बाद के और पहले के हिन्दी क्षेत्र के समाजवादी परिप्रेक्ष्य पर केन्द्रित है। इसलिए आगे कुछ भी विचार करने के पूर्व इसे संक्षेप में एक  बार जरूर स्मरण कर लिया जाना चाहिए।



डॉ. शर्मा ने उक्त पुस्तक के लेख ‘हिन्दी प्रदेश में समाजवादी चेतना का प्रसार’ के पहले हिस्से में रूसी क्रान्ति के पूर्व की हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तकों में प्रकाशित सामग्री का गहरा और व्यापक अध्ययन किया है। सन 1908 में प्रकाशित राधा मोहन दास गोकुल की पुस्तक ‘देश का धन’ और महावीर प्रसाद द्विवेदी की पुस्तक ‘सम्पत्तिशास्त्र’ की लम्बी समीक्षा करते हुए वे यह बताते हैं कि इन दोनों पुस्तकों में भारत की सामाजिक–आर्थिक दुरवस्था का विश्लेषण किया गया है। वह यह भी बताते हैं कि इन लेखकों ने इस दशा के लिए औपनिवेशिक व्यवस्था को ज़िम्मेदार ठहराया है। उद्योग-धंधों, पूँजी-श्रम, उत्पादन, मूल्य और अमीरी-गरीबी के अनेक प्रश्नों पर गोकुल जी के विचारों से परिचित कराते हुए उसके समाजवादी महत्व की वह चर्चा करते हैं। डॉ. शर्मा गोकुल जी के बारे में कहते हैं – ‘देश का धन’ का लेखक अभी समाजवादी नहीं है, भौतिकवादी तो और भी नहीं है’। पर वह यह भी कहते हैं – ‘समाजवादी विचारधारा की अनेक आधारभूत बातें 1908 में प्रकाशित ‘देश का धन’ पुस्तिका में विद्यमान हैं। और भी महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि ये बातें भारत के तत्कालीन सन्दर्भ में सार्थक हैं।’ ‘सम्पत्तिशास्त्र’ में वर्णित आर्थिक महत्व के अनेक विषयों की चर्चा करते हुए वह बताते हैं कि द्विवेदी की दृष्टि में देश की पराधीनता ही सारी समस्याओं का कारण है। द्विवेदी जी मार्क्सवादी या समाजवादी नहीं हैं, पर उनके इन विचारों को डॉ.शर्मा महत्वपूर्ण मानते  हैं – ‘कारखानों के मालिक यही चाहते हैं कि काम बहुत लें पर मजदूरी कम दें।’ शर्मा जी इसके बाद द्विवेदी जी को फिर उद्धृत करते हैं –‘ऐसे मौकों पर हड़ताल करना अनुचित नहीं है।’ यही वे विचार हैं, जिन्हें नवजागरण के दौर में समाजवाद की दृष्टि से उन्होंने बहुत महत्वपूर्ण माना है। इसी क्रम में इस अवधि में प्रकाशित होने वाली सरस्वती, अभ्युदय, मर्यादा, विक्रम,  प्रताप आदि पत्र-पत्रिकाओं के कुछ लेखों की वे चर्चा करते हैं। माधव राव सप्रे के लेख ‘हड़ताल’ के उस विचार का उल्लेख करते हैं, जिसके अनुसार मजदूरों की दयनीय दशा का कारण पूँजीपतियों द्वारा उनका आर्थिक शोषण है। सप्रे की दृष्टि में इससे मुक्ति का रास्ता राजनीतिक संघर्षों से हो कर जाता है। इसी सन्दर्भ  में वे जनार्दन भट्ट के लेख  ‘हमारे गरीब किसान और मजदूर’ में अमीर और गरीब जैसी दो जातियों में विभाजित समाज की चर्चा करते हैं। स्पष्ट है कि उनकी दृष्टि यहाँ उस वर्ग-विभाजन पर टिकी है, जिसका समाजवाद के लिए गंभीर विचारधारात्मक महत्व है। डॉ. शर्मा इस दौर में प्रकाशित ‘मर्यादा’ की सम्पादकीय टिप्पणियों और लेखों का साम्राज्यवाद-विरोधी राजनीतिक चेतना के प्रचार-प्रसार की दिशा में बहुत बड़ा योगदान मानते हैं। इस पत्रिका की राजनीतिक दृष्टि पर टिप्पणी करते हुए उनका कहना है कि यह प्रथम महायुद्ध के दौर में पैदा हुए भारतीय जनजागरण को एशियाई जनजागरण से जोड़ कर देखती है। समाजवादी चेतना की प्रतिष्ठा की दृष्टि से ‘विक्रम’ और ‘प्रताप’ के योगदान को स्मरण करते हुए गणेश शंकर विद्यार्थी के लेखों और टिप्पणियों के अनेक साक्ष्यों के हवाले से उन्होंने यह स्पष्ट करने की कोशिश की है कि इनकी दृष्टि में भी भारत का राष्ट्रीय आन्दोलन एशिया के स्वाधीनता आन्दोलन का ही एक रूप था। उन्होंने विद्यार्थी जी के राष्ट्र और राष्ट्रीयता सम्बन्धी एक बिलकुल धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण की ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए उसे इतिहास का एक जरूरी वैचारिक पक्ष बताया है। इन प्रश्नों और समस्याओं से टकराए बिना साम्राज्यवाद-विरोधी समाजवादी चेतना के प्रसार का कोई रास्ता नहीं निकल सकता था। इस क्रम में ‘मर्यादा’ के अप्रैल 1917 अंक की चर्चा के बगैर यह परिदृश्य अधूरा रह जाएगा। रूस की राजनीतिक परिस्थितियों पर केन्द्रित पहली व्यवस्थित टिप्पणी का श्रेय ‘मर्यादा’ के इसी अंक को जाता है। यह हिन्दी पत्रकारिता और राजनैतिक विमर्श के क्षेत्र में रूस और उसके क्रान्तिकारी घटनाक्रम का प्रवेश है। इस अंक के सम्पादकीय में रूस की फरवरी क्रान्ति के महत्व पर प्रकाश डाला गया है। यह सम्पादकीय काफी लम्बा है और बहुत विस्तार से इसमें रूस की परिस्थितियों, उसके संघर्षों और क्रान्ति के परिणामों की चर्चा की गयी है। सम्पादकीय के आरम्भ में ही स्वीकार कर लिया गया है कि संसार के आज तक के इतिहास में इतना बड़ा परिवर्तन नहीं हुआ है। यह परिवर्तन किन सामाजिक-आर्थिक सन्दर्भों में अद्वितीय और प्रथम है - इसे स्पष्ट करते हुए कहा गया है कि राजा की जगह प्रजा-शक्ति की महिमा मानव इतिहास में पहली बार स्थापित हुई है और अब पूरी दुनिया में इसका विस्तार होगा तथा राजाओं के अधिकार अब धीरे-धीरे प्रजा के हाथ में आ जाएँगे। रूस की आतंरिक और बाह्य परिस्थितियों के एक लम्बे विवेचन के बाद सम्पादक ने इस परिवर्तन का भावपूर्ण स्वागत करते हुए पूरे संसार के लिए उसकी क्रान्ति कारी भूमिका की एक अत्यंत सुंदर और काव्यात्मक कामना की है – ‘रूस में सार्वजानिक प्रकाश स्वतन्त्रता का लाल-सूर्य उदित हुआ है, हम इसका स्वागत करते हैं और आशा करते हैं कि संसार के घोर अंधकार को यह शीघ्र ही छिन्न-भिन्न करेगा।’  इस दौर का यह लेखन हिन्दी नवजागरण की तत्कालीन राजनीति को समझने में एक बुनियादी महत्व का काम करता है। इससे उस समय का पूरा वैचारिक परिदृश्य खुल कर सामने आ जाता है। 

 
यहाँ एक बात और! अक्टूबर क्रान्ति  के पूर्व के बीसवीं शताब्दी के इन पन्द्रह-सत्रह वर्षों में यूरोप के मार्क्सवादियों-समाजवादियों से अनेक भारतीयों के सम्पर्क का ठीक-ठाक सिलसिला बन चुका था। दादा भाई नौरोजी, श्यामजी कृष्ण वर्मा, भीका जी रूस्तम कामा, वीरेंद्र नाथ चट्टोपाध्याय, सरदार सिंह जी रेवाभाई राना, अवनींद्र नाथ मुखर्जी, भूपेन्द्र नाथ दत्त, लाला हरदयाल आदि के सम्पर्क यूरोप और अमेरिका से थे या बन रहे थे और उनके विचारों पर कहीं कम तो कहीं ज्यादा समाजवाद का प्रभाव भी दिख रहा था। इनमें से कुछ के बारे में अयोध्या सिंह (समाजवाद : भारतीय जनता का संघर्ष ) का कहना है कि वे रूसी क्रान्ति के बाद पूरी तरह समाजवादी हो गये थे। इनमे से लाला हरदयाल के क्रान्ति कारी प्रयत्नों की अलग से चर्चा की जा सकती है। उन्होंने मार्च 1913 में सैन फ्रांसिस्को, अमेरिका से पहले ‘गदर’ नाम का पत्र निकाला और फिर इसी नाम की एक पार्टी बनाई, जिसकी भारत के क्रान्तिकारी आन्दोलन के विकास में ऐतिहासिक भूमिका है। मार्क्स को आधुनिक ऋषि कहने वाले उनके एक लेख की भी बहुत चर्चा की जाती है। ऐतिहासिक अध्ययनों से स्पष्ट है कि अमेरिका में गदर पार्टी से जुड़े हुए क्रान्तिकारियों के भीतर भारतीय स्वाधीनता संघर्ष और उसके भविष्य के प्रति एक स्पष्ट समझ थी। उस दौर में यह असाधारण राजनीतिक समझ का प्रमाण था कि उन क्रान्तिकारियों की दृष्टि में भारत ही नहीं दुनिया के अनेक देशों की पराधीनता की समस्या थी और उन्होंने इसे एक जरूरी कार्यभार के तौर पर देखना शुरू कर दिया था। वे दुनिया के सभी उपनिवेशों और पराधीन देशों को एक वैश्विक मुक्ति-संघर्ष में शामिल करना चाहते थे। अक्टूबर क्रान्ति के कई वर्ष पूर्व गदर पार्टी ने मजदूर संगठनों के नेताओं से सम्पर्क करना शुरू कर दिया था उनसे साफ तौर पर कह दिया था कि गरीब और शोषित-पीड़ित जनता के साथ मिल कर इस मुक्ति-संघर्ष को आगे बढ़ाने के अलावा और कोई रास्ता उनके पास नहीं है। 


यूरोप–अमेरिका के सम्पर्क और समाजवादी विचारों के प्रभाव वाले जिन लोगों की अभी चर्चा की गयी है, प्रायः ये सभी हिन्दी क्षेत्र के बाहर के लोग थे और इस कारण हिन्दी नवजागरण के समाजवादी संस्कार में इनकी कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं बन सकी थी। पर, इससे इतना तो पता चलता ही है कि व्यापक भारतीय बौद्धिक समुदाय में समाजवाद के प्रति आकर्षण और समर्थन का अच्छा माहौल बनना शुरू हो गया था और ऐसे माहौल में हिन्दी नवजागरण के राजनीतिक विचारों का इससे अप्रभावित रह जाना कहीं से भी सम्भव नहीं था।


          
                         
                             [तीन]


हिन्दी नवजागरण के राजनीतिक विचारों पर अक्टूबर क्रान्ति के प्रभावों के अध्ययन के क्रम में  शिवदान सिंह चौहान के लेख ‘समाजवादी विचारधारा का हिन्दी साहित्य पर प्रभाव’ में एक टिप्पणी देखें - ‘हिन्दी लेखक की आम मनोदशा और बौद्धिक मानसिकता की जानकारी के बगैर यह समझना या समझाना मुश्किल है कि आखिर क्यों 1917 की महान अक्टूबर समाजवादी क्रान्ति के बावजूद, जिसने भारत समेत संसार के हर देश में लोगों के दिमाग पर इतना गहरा असर डाला था, हिन्दी लेखकों ने प्रेमचंद और निराला को छोड कर इस महान क्रान्तिकारी घटना के प्रति करीब अगले पन्द्रह साल तक अपनी कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की, अर्थात उस समय तक जब कि हमारी अपनी आज़ादी की लड़ाई ने एक क्रान्तिकारी दौर में प्रवेश करके असहयोग और सिविल ना-फ़रमानी के आंदोलनों के जरिए, किसानों और मजदूरों के संगठित संघर्ष के जरिए देश में व्यापक उथल-पुथल पैदा नहीं कर दी।’ चौहान जी ने समाजवाद के बारे में उदासीनता या उससे अपरिचय का जो आरोप उन्नीसवीं सदी के बुद्धिजीवियों पर लगाया था, वही आरोप यहाँ बीसवीं सदी के हिन्दी लेखकों पर भी लगा दिया गया है। सन 1917 से 1932-33 के बीच की हिन्दी की अभिव्यक्तियों पर नजर डालें, तो परिदृश्य बिलकुल भिन्न दिखता है। जैसे उन्नीसवीं सदी के ‘हिन्दी बुद्धिजीवी’ की जगह चौहान जी ने ‘भारतीय बुद्धिजीवी’ कह दिया था, लगता है यहाँ भी ‘हिन्दी लेखकों’ का अर्थ केवल ‘कविता ,कहानी लिखने वालों’ तक सीमित कर दिया है, वरना अक्टूबर क्रान्ति  के बाद से प्रगतिशील आन्दोलन के आरम्भ होने के पहले तक ,यानी 1917 से 1935-36 तक मार्क्सवाद, समाजवाद, अक्टूबर क्रान्ति, बोल्शेविज्म आदि पर जो लिखा गया है, वह इतना कुछ है कि उसे ले कर संतोष और प्रसन्नता का अनुभव किया जा सकता है। प्रगतिशील आन्दोलन आरम्भ होने के पहले तक की सीमा का तर्क इसलिए कि उस आन्दोलन का आरम्भ खुद एक बड़ी अन्तर्राष्ट्रीय परिघटना से संबद्ध है, वहाँ से उसकी खुद की प्रेरणाओं का इतिहास आरम्भ हो जाता है। अतः अक्टूबर क्रान्ति  की तात्कालिक या आरम्भिक प्रेरणाओं के आकलन के लिए इन पन्द्रह–बीस वर्षों के काल-खंड का निर्धारण असंगत नहीं होगा। इस अवधि में प्रकाशित होने वाली पत्र-पत्रिकाओं में हिन्दी नवजागरण की वैचारिक सामग्री भरी पड़ी है और उसमें वह भी है, जिसको चौहान जी नहीं देख पाए हैं। कविता–कहानी के बाहर भी हिन्दी का लेखन-संसार मौजूद है। वैचारिक गद्य-लेखन में, लेखों –निबन्धों और सम्पादकीय टिप्पणियों में अक्टूबर क्रान्ति के प्रभाव के खूब प्रमाण तलाश किए जा सकते हैं।



यहाँ एक बार फिर ‘भारत में अंग्रेजी राज और मार्क्सवाद’ में डॉ. राम विलास शर्मा के अध्ययन का स्मरण जरूरी लग रहा है। अक्टूबर क्रान्ति  के बाद से भारत में कम्युनिस्ट पार्टी के गठन तक के लगभग सात-आठ वर्षों के हिन्दी लेखन पर पड़े समाजवादी विचारों के प्रभाव का उन्होंने विस्तार से विश्लेषण किया है। इस अध्ययन में डॉ. शर्मा हिन्दी में समाजवादी चेतना के प्रसार की दृष्टि से सैकड़ों लेखों-टिप्पणियों और अनेक पुस्तकों-पुस्तिकाओं की चर्चा करते हैं और उनके उद्धरणों  की व्याख्या और विश्लेषण से हिन्दी नवजागरण में समाजवादी विचारों का एक व्यापक परिदृश्य उद्घाटित करते हैं। मर्यादा, सरस्वती, विक्रम, प्रताप, मतवाला आदि पत्र-पत्रिकाओं के लेखों–सम्पादकीय टिप्पणियों में रूस की समाजवादी क्रान्ति के प्रभावों को यहाँ देखने की कोशिश की गयी है। इस क्रम में कृष्णकांत मालवीय, सत्येन्द्र, बुखारिन, रमाशंकर अवस्थी, श्यामाचरण राय, गणेश शंकर विद्यार्थी के लेखों के अलावा गया प्रसाद शुक्ल के काव्य –संग्रह - ‘राष्ट्रीय मन्त्र’ और ‘त्रिशूल तरंग’, एक ग्रेजुएट की ‘साम्यवाद’, राम चंद्र वर्मा की पुस्तक ‘साम्यवाद’, रमाशंकर अवस्थी की ‘रूस की राज्य क्रान्ति’, सत्यभक्त की पुस्तिका ‘भारतीय श्रमजीवियों को संदेश’, सत्यभक्त की ही पुस्तक ‘बोल्शेविज्म क्या है’, राधामोहन गोकुल की पुस्तक ‘कम्युनिज्म क्या है’ आदि के बारे में उन्होंने विस्तारपूर्वक चर्चा की है और हिन्दी प्रदेश में समाजवाद की प्रतिष्ठा में इनकी भूमिकाओं को सम्मान के साथ याद किया है। इसके साथ अयोध्या सिंह की पुस्तक ‘समाजवाद :भारतीय जनता का संघर्ष’ में प्रकाशित अक्टूबर क्रान्ति के बाद के समाजवाद-केन्द्रित हिन्दी लेखन के व्यौरे को जोड कर देखें, तो हिन्दी नवजागरण में बनते हुए इस नये वैचारिक वातावरण की सघनता और विस्तार का पता चलता है। अक्टूबर क्रान्ति और कम्युनिस्ट पार्टी के गठन के बीच के सात-आठ वर्षों के भीतर छपी इन पुस्तकों का समाजवादी चेतना के निर्माण की दृष्टि से बुनियादी महत्व है - साम्यवाद (शिव नारायण वैद्य), साम्यवाद (रामचन्द्र वर्मा), बोल्शेविक जादूगर लेनिन, रूस में राज्यक्रान्ति (रमाशंकर अवस्थी), कम्युनिज्म क्या है (राधामोहन गोकुल ), रूस का पुनर्जन्म (सोमदत्त विद्यालंकार)  बोल्शेविज्म क्या है, भारतीय श्रमजीवियों को संदेश (सत्य भक्त ), रूस में युगांतर (विश्वंभर नाथ जिज्जा), रूस का पंचायती राज्य (प्राणनाथ विद्यालंकार)। अक्टूबर क्रान्ति के बाद उसकी प्रेरणाओं और प्रभाव में हिन्दी में जो कुछ सोचा-लिखा जा रहा था, उनका विषय अत्यंत वैविध्यपूर्ण है। इसमें युद्ध-विरोध, मजदूर –किसान, कम्युनिज्म या साम्यवाद, समाजवाद, बोल्शेविज्म, मार्क्स –लेनिन, दास कैपिटल, कम्युनिस्ट घोषणापत्र, रूसी क्रान्ति आदि के साथ भारत के अपने समाजवादी महत्व के विषय स्वाधीनता, जनतन्त्र, क्रान्ति, आर्थिक संकट, भारतीय क्रान्ति और क्रान्तिकारी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और आन्दोलन आदि अनेक विषयों पर चिन्तन किया गया है।



यह चितन और लेखन अक्टूबर क्रान्ति  की उपलब्धियों का सिर्फ महिमा-गान नहीं है, भारत की अपनी सामाजिक–राजनीतिक परिस्थितियों में उसका आकलन-मूल्यांकन भी है। इस दौर के हिन्दी के वैचारिक लेखन के इस दृष्टिकोण का यही ऐतिहासिक महत्व भी है। वह अक्टूबर क्रान्ति  की भारतीय प्रेरणाओं के महत्व और उपयोग के प्रति सचेत है और इतिहास को केवल व्यतीत कालखंड न मान कर उसे अपनी समकालीनता की व्याख्या और व्यवहार का एक महत्वपूर्ण सन्दर्भ मानता है। इसीलिए इस दौर के इस लेखन में अक्टूबर क्रान्ति और सोवियत समाजवादी व्यवस्था के सन्दर्भ में  भारतीय परिस्थितियों और उनके प्रश्नों-संकटों के उत्तर तलाश करने की बेचैनी भी बराबर बनी हुई दिखती है। यदि कहीं केवल इतिहास-निरूपण है भी तो लेखक का प्रच्छन्न उद्देश्य यही है कि इससे अपने देश के लिए आदर्श या अनुकरणीय उदाहरण बना कर प्रस्तुत कर दिया जाय।  

  
 
अक्टूबर 1917 में क्रान्ति हुई और हिन्दी में बस कुछ महीनों बाद से ही उसकी चर्चा शुरू हो गयी। अक्टूबर क्रान्ति के कई महीने पहले ही ‘मर्यादा’ ने रूस में जारशाही के खिलाफ हुई फरवरी क्रान्ति का विस्तार से उल्लेख करके इस वैचारिक लेखन की एक तरह हिन्दी में विधिवत शुरुआत कर ही दी थी। ‘मर्यादा’ के 1918 के अंकों से समाजवाद विषयक लेखन दिखने लगता है और 1919 तक अन्य दूसरे लेखकीय –प्रकाशकीय प्रयास ध्यान खींचने लगते हैं। जनवरी 1919 की ‘मर्यादा’ में प्रकाशित सत्येन्द्र (बेनी प्रसाद) के लेख ‘मजदूरों के आन्दोलन’ में शोषण और पूँजीवादी लूट के लम्बे अर्थशास्त्रीय विवेचन के माध्यम से मजदूरों के संघर्ष के पक्ष में जनता को शिक्षित करने की कोशिश नजर आती है। किसानों के प्रश्न मजदूरों के प्रश्नों के साथ ही अक्टूबर क्रान्ति के कार्यभारों में शामिल रहे हैं, सितम्बर 1919 की ‘मर्यादा’ में रमा शंकर अवस्थी रूस के बदले हुए इतिहास में किसानों की स्वाधीनता की चर्चा करते हैं और बताते हैं कि अब किसानों की ज़िन्दगी पूरी तरह बदल गयी है। हिन्दी की पत्र-पत्रिकाओं में मजदूरों–किसानों पर लगातार लेख आ रहे थे और उनके माध्यम से ब्रिटिश औपनिवेशिक व्यवस्था में उत्पीडित इस वर्ग की चेतना को विकसित करने का प्रयास किया जा रहा था। ऐसे कई प्रकाशन दिखते हैं, जिनमे सीधे-सीधे अपने देश के मजदूरों को सम्बोधित करते हुए उनसे उन्हीं की बेहतरी के लिए आगे बढने की अपील की गयी है। भारतीय कम्युनिस्ट राजनीति के चर्चित व्यक्तित्व सत्यभक्त ने, जिन्हें अपने देश में सबसे पहले कम्युनिस्ट पार्टी बनाने का श्रेय प्राप्त है, मजदूरों-किसानो के संघर्षों को अपने लेखन में बहुत ठीक ढंग से रेखांकित किया है। 1923 में प्रकाशित  ‘भारतीय श्रमजीवियों को संदेश’ नामक पुस्तिका में रूस के मजदूरों के क्रान्तिकारों संघर्ष को याद करते हुए यहाँ के मजदूरों से भी कुछ ऐसा ही किए जाने की वह उम्मीद करते हैं और इसके लिए सबसे पहले वे मजदूरों को अपना संगठन बनाने की प्रेरणा देते हैं। इसके तीन वर्ष बाद हिन्दी नवजागरण के एक प्रमुख साम्यवादी स्वर राधामोहन गोकुल का एक लेख ‘साम्यवादी’ के 1 जनवरी 1926 के अंक में ‘श्रमजीवियों को संदेश’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ। गोकुल जी ने मजदूरों को सम्बोधित अपनी इस अपील में भाग्यवाद और ईश्वरवाद से सावधान हो जाने की बात की है। उन्होंने कहा है कि आपके दुःख का कारण ईश्वर नहीं, ये पूँजीपति हैं और इनके शोषण से मुक्ति का केवल एक रास्ता है कि आप संगठन बनाएं। गोकुल जी ‘साम्यवादी’ के २६ जनवरी १९२६ के अंक में ‘किसान-मजदूर से निवेदन’ करते हुए कहते हैं – ‘प्यारे किसान और मजदूरों, आज हम कम्युनिस्ट, साम्यवादी आपके पास आए हैं और आपकी आँखें खोलना चाहते हैं। हम चाहते है कि आपकी लुटती हुई सम्पत्ति बचाई जाए। बड़े-बड़े मनुष्य और बाजे-गाजे वाले शौक़ीन तथा धनवान नेता आपका उद्धार नहीं कर सकते। आपकी भलाई आपके जैसे गरीब और अपने हाथ से मेहनत-मजूरी करने वाले साम्यवादियों से ही होगी।’ उस दौर के सामजिक–राजनीतिक जागरण का यह प्रयास ध्यान खींचने वाला है और बताता है कि सारे लेखन–चिन्तन की सार्थकता यही है कि वह व्यवहार में रूपांतरित हो। कहना न होगा कि सत्यभक्त और राधा मोहन गोकुल द्वारा दी जाने वाली इस प्रेरणाओं का सम्बन्ध अक्टूबर क्रान्ति से ही है । ‘मर्यादा’ के 1920 के अंकों में रमा शंकर अवस्थी के तीन लेखों की एक पूरी श्रंखला प्रकाशित हुई है। रूसी सैनिक, रूसी किसान और रूसी मजदूर इन लेखों के विषय हैं। इन तीनों विषयों को मिला कर देखें और इन्हें एक साथ मिला कर पढ़ें, तो इस श्रृंखला का नवजागरणकालीन महत्व समझ में आता है। मजदूरों और किसानों के जागरण पर इतना जोर देने का कारण स्पष्ट है कि ये लेखक –विचारक मानते हैं कि यही वह क्रान्तिकारी वर्ग है, जिसकी व्यवस्था-परिवर्तन में निर्णायक भूमिका बनती है।
                                                                     इस काल-खंड में ‘बोल्शेविज्म’ पर बहुत लिखा गया है। ‘सरस्वती, ‘मर्यादा’, ‘प्रताप’, ‘मतवाला’ के अंकों में सम्पादकीय से ले कर लेखों तक में इस विषय पर पर्याप्त चर्चा हुई  है। कृष्णकांत मालवीय, सत्य भक्त, रमाशंकर अवस्थी, एक साम्यवादी (राधा मोहन गोकुलका छद्म नाम) बुखारिन, श्यामाचरण राय, गणेश शंकर विद्यार्थी आदि ने उपर्युक्त पत्रों में 1919 से 1924-25 के बीच इस पर इतनी चर्चा की है कि ’बोल्शेविज्म’ एक अलग ही अध्ययन का विषय बन कर विचारों की दुनिया में छा गया था। सत्यभक्त ने तो इस विषय को चर्चा के लिए इतना महत्वपूर्ण अनुभव किया कि ‘मतवाला’ के 9 सितम्बर 1924 के अंक में  इस पर प्रकाश डाल देने के बावजूद, ‘बोल्शेविज्म क्या है’ शीर्षक पुस्तक लिख कर इसके आशय और क्रान्तिकारी भूमिका को लोगों के सामने प्रस्तुत कर देना मुनासिब समझा। यह वही ‘बोल्शेविज्म’ है, जिसके बारे में प्रेमचंद ने दया नारायण निगम को लिखे गये अपने एक पत्र में बताया था कि अब वे बोल्शेविक उसूलों के कायल हो गये हैं। लेनिन के नेतृत्व में अक्टूबर क्रान्ति करने वाली पार्टी के क्रान्ति कारी कार्यकर्ताओं, समाजवाद के सर्वहारा योद्धाओं, उनकी पूरी कार्य-प्रणाली, समर्पण, संघर्ष-चेतना और लक्ष्यों के प्रति उनकी सर्वहारा-एकनिष्ठता के लिए प्रयुक्त होने वाले ‘बोल्शेविज्म’ और ‘बोल्शेविक’ जैसे आशयों के बारे में इन लेखों–पुस्तकों में बताया गया है कि ‘बोल्शेविज्म कम्युनिज्म से कोई अलग चीज़ नहीं है। बोल्शेविज्म का सिद्धान्त है कि संसार सबके लिए है न कि उन थोड़े से व्यक्तियों के लिए जो सबके मालिक बने हुए हैं। इसके शत्रु इसे राक्षस बताते हैं, ऐसा कहने वाले वही लोग है, जो शासक, मालिक, पूँजीपति और भिन्न–भिन्न धर्मों के प्रचारक हैं।’ इनमें बताया गया है कि ‘बोल्शेविज्म साम्यवाद का व्यावहारिक और क्रियात्मक रूप है, जिसे लेनिन ने सम्भव कर दिखाया है’। इन व्याख्याओं में बोल्शेविकों का जो चित्र बनता है, वह उन्हें कर्मठ, ईमानदार, अन्याय-विरोधी, किसानो-मजदूरों के पक्ष में लड़ने-काम करने वाला, समाजवादी लक्ष्य के प्रति समर्पित सर्वहारा पार्टी कार्यकर्ता और जनमुक्ति योद्धा प्रमाणित करने वाला है तथा ‘बोल्शेविज्म’ और कुछ नहीं, उनका पार्टी- सिद्धान्त और कार्यक्रम है। इस पार्टी सिद्धान्त और कार्यक्रमों का खौफ बुर्जुआ वर्ग के सर चढ़ कर बोलता दिखता है। बोल्शेविज्म के प्रति दुनिया के पैमाने पर योजनाबद्ध ढंग से कुत्साप्रचार चलाया गया था, इसलिए अक्टूबर क्रान्ति की यह भी एक प्रेरणा ही रही है कि जनता को उसके बारे में जाग्रत किया जाय और भारतीय बोल्शेविज्म के लिए उन्हें तैयार किया जाय। शाहिद अमीन और ज्ञानेंद्र पांडे द्वारा सम्पादित ‘निम्न वर्गीय प्रसंग’ में संकलित ज्ञानेंद्र पांडे के एक लेख में 1919-22 के बीच चले अवध-क्षेत्र के किसान आन्दोलन की व्यापक पड़ताल की गयी है। इस आन्दोलन के मुद्दों, स्वरूप और घटनाओं के विश्लेषण में आन्दोलन की प्रेरणाओं और वैचारिक स्रोतों की चर्चा में मार्क्सवाद, समाजवाद या अक्टूबर क्रान्ति या बोल्शेविज्म की कोई चर्चा नहीं है। कालखंड देखते हुए थोडा आश्चर्यजनक लगता है कि कम्युनिज्म की सक्रियता और प्रचार वाले उस काल में आखिर यह कैसे हो सकता है कि इतना बड़ा आन्दोलन हो और किसानों-मजदूरों की बात करने वाले कम्युनिस्टों की उसपर नजर न हो। ज्ञानेंद्र पांडे ने इस दृष्टि से इसका आकलन नहीं किया है। पर, परिशिष्ट में छपे वीर भारत तलवार के छः-सात पृष्ठों के एक अनुवाद ‘इलाहबाद में किसान सभा’ से उपर्युक्त प्रश्न का उत्तर मिल जाता है। यह अनुवाद वस्तुतः संयुक्त प्रान्त के सी. आई. डी. –विशेष शाखा के डी आई जी के कार्यालय में 7 जनवरी 1921 को प्रस्तुत की गयी जाँच अधिकारी पी. बिग्गान के हस्ताक्षर वाली एक रिपोर्ट है, जो इस किसान आन्दोलन और बोल्शेविज्म के सम्बन्धों पर रोशनी डालती है। इस अंग्रेज अफसर ने अपनी रिपोर्ट में कहा है- ‘युद्ध के बारे में हिन्दुस्तानी किसानों की मुख्य धारणा यह है कि उन्होंने इसके लिए आदमी दिए, पैसे दिए और बदले में सरकार ने उन्हें सिर्फ कागज़ का एक टुकड़ा (रसीद) थमा दिया। यह काबिले-गौर है कि इन धारणाओं में बोल्शेविज्म का स्पष्ट पुट है। यह जानकारी अर्थपूर्ण होगी कि ये किस हद तक बोल्शेविज्म प्रचार का अप्रत्यक्ष परिणाम हैं या फिर जिन कारणों ने दूसरे देशों में बोल्शेविज्म को जन्म दिया क्या वही कारण यहाँ भी इन्हें जन्म दे रहे हैं?’ इसके आगे वह फिर लिखता है कि जिन इलाकों में किसानों का आन्दोलन उग्र है, उनमें यह बोल्शेविक विचार तेजी से फैल रहे हैं कि जो किसान हल चलाता है, रोपता, सिंचाई करता, फसल काटता है, वही खेत की उपज का मालिक है, जमींदारों जैसे किसी वर्ग जरूरत नहीं, न उनका कोई अधिकार हो सकता है। भारत में बोल्शेविज्म के बढ़ते प्रभाव के कारण इस पर रोक लगाने के लिए 1919 में ही एक ‘बोल्शेविक विभाग’ खोल दिया गया था। इस प्रसंग में यह उल्लेखनीय है कि 1924 में कानपुर बोल्शेविक कांस्पिरेसी केस में एस. ए. डांगे, मुजफ्फर अहमद, शौकत उस्मानी और नलिनी गुप्ता को जेल भेज दिया गया था। इसे भी अक्टूबर क्रान्ति के प्रभाव के रूप में देखा जाना चाहिए।


रूसी क्रान्ति , कम्युनिज्म, युद्ध-विरोध पर भी इस दौर में खूब लिखा जा रहा था। यह सारा लेखन हिन्दी नवजागरण के राजनीतिक पक्ष में समाजवाद के विचारों की प्रतिष्ठा की दृष्टि से बहुत मूल्यवान है। युद्ध को मानव-विरोधी बताते हुए रूस के हवाले यह कहा जा रहा कि अब दुनिया के लोग युद्ध नहीं चाहते हैं। भूख और गरीबी को असली समस्या मानते हुए इससे युद्ध चलाए जाने की जरूरत पर बल दिया जा रहा था। वे सारे प्रश्न जो गरीबों –किसानों –मजदूरों के जीवन से जुड़े हुए हैं और जिन्हें ले कर यह वर्ग दुखी और संतप्त रहता है, हिन्दी नवजागरण के इन समाजवादी चिंतकों के विचार के विषय बनते रहे हैं। अक्टूबर क्रान्ति  की प्रेरणाओं से इन्होने जन-केन्द्रित मुद्दों पर लोगों की चेतना के परिष्कार की शक्ति अर्जित की थी। इस प्रकार के लेखन में राधा मोहन गोकुल, सत्यभक्त और रमाशंकर  अवस्थी की एक बड़ी भूमिका है। कम्युनिज्म के एक आरम्भिक शिक्षक और प्रयोगकर्ता के रूप में इन्होंने जीवन-भर जिस बड़ी ज़िम्मेदारी का निर्वाह किया है,  वह अतुलनीय है। उनके पूरे लेखन में जनजागरण की साधना का स्वर है। कर्मेंदु शिशिर ने तो गोकुल जी की विशेष भूमिका को स्मरण करते हुए उन्हें ‘भारत का लेनिन’ तक कहा है। भगत सिंह के साथी और क्रान्ति कारी शिव वर्मा अपनी पुस्तिका ‘क्रान्ति कारी आन्दोलन का विकास’ में गोकुल जी को अपना शिक्षक कहते हैं और यह भी बताते हैं कि प्रेमचंद ने उन्हें ‘आधुनिक चार्वाक’ कहा था। इनके लेखन का एक बड़ा भाग कम्युनिज्म, कम्युनिज्म क्या है, रूस की अतिक्रान्ति, ईश्वर और साम्यवाद,आर्थिक पूँजी जैसे विषयों के गंभीर किन्तु रोचक विवेचन से जुडा हुआ है।

                     
हिन्दी के नवजागरणकालीन राजनीतिक परिदृश्य में भारत के क्रान्ति कारियों की एक प्रभावी भूमिका रही है। अपनी क्रान्तिकारी राजनीतिक गतिविधियों और योजनाओं के कारण भारत के अपनिवेश–विरोधी संघर्षों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका तो है ही, एक स्पष्ट वैचारिक दृष्टिकोण और उसकी व्यापक अभिव्यक्तियों के कारण भी वे हमारे राजनीतिक जागरण के अग्रदूतों में शामिल हैं। शिव वर्मा ‘क्रान्ति कारी आन्दोलन का विकास’ में शचीन्द्र नाथ सान्याल द्वारा 1923 में गठित हिंदुस्तान रिपब्लिकन असोसिएशन के घोषणापत्र का ज़िक्र करते हैं। इस घोषणा पत्र में उन मूल्यों और क्रन्तिकारी तत्वों की मौजूदगी देखी जा सकती है, जिनका सम्बन्ध समाजवादी व्यवस्था उसके विचार-दर्शन से है। इसमें बोल्शेविक रूस और उसके आदर्शों की चर्चा की गयी थी। इस पत्र को जनवरी 1925 में पूरे उत्तर भारत के हिन्दी क्षेत्रों में बांटा गया था। यह हिन्दी क्षेत्र के सामाजिक-राजनीतिक जागरण में अक्टूबर क्रान्ति और उसकी समाजवादी चेतना के प्रसार की दृष्टि से एक नई घटना थी। अक्टूबर क्रान्ति की आरम्भिक प्रेरणाओं में आ कर ग्रहण करती हुई भारत की नई क्रान्ति कारी राजनीति की दृष्टि से 1928-29 का दौर बहुत ही महत्वपूर्ण रहा है। यहाँ तक आकर भगत सिंह एक मार्क्सवादी के रूप में अपनी राजनीतिक–वैचारिक प्रतिबद्धताओं की घोषणा कर देते हैं और भगवती चरण वोहरा के साथ मिलकर ‘हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातान्त्रिक संघ’ का गठन करते हैं। संघ के घोषणा-पत्र में वोहरा की दृष्टि समाजवाद की ओर है – ‘मेहनतकश की तमाम आशाएं अब समाजवाद पर टिकी हैं।’ ‘भगत सिंह के सम्पूर्ण दस्तावेज़’ के सम्पादक चमन लाल ने भगत सिंह के एक लेख ‘नवयुवक राजनीतिक कार्यकर्ताओं के नाम’ को संकलित करते हुए बताया है कि इसके कुछ अंश लाहौर के ‘पीपुल्स’ में और कुछ अंश इलाहाबाद के ‘अभ्युदय’ में प्रकाशित हुए थे। इस लेख में भगत सिंह बोल्शेविक संघर्ष-पद्धति और लेनिन के हवाले से नौजवान राजनीतिक कार्यकर्ताओं को यह बताने की कोशिश करते नजर आते हैं कि अनेक बार अपनी परिस्थितियों के मद्देनजर अपनी रणनीति में संशोधन कर लेना गलत नहीं होता। इसी लेख में वे ‘इन्कलाब’ का अर्थ बताते हुए कहते हैं –‘मौजूदा सामाजिक ढांचे में पूर्ण परिवर्तन और समाजवाद की स्थापना।’ भगत सिंह और उनके साथी हमारे राजनीतिक जनजागरण के वे क्रान्तिकारी व्यक्तित्व हैं, जिनके योगदान के स्मरण के  बगैर भारत में या हिन्दी क्षेत्र में अक्टूबर क्रान्ति की प्रेरणाओं की कोई भी चर्चा पूरी नहीं मानी जा सकती । राम प्रसाद बिस्मिल ने अपनी आत्मकथा में रूस और उसके समाजवादी आदर्शों के प्रति स्वीकृति और सम्मान का भाव व्यक्त किया है। उन्होंने ‘कैथराइन की जीवनी’ और ‘बोल्शेविकों की करतूत’ जैसी किताबें भी लिखीं। बिस्मिल के एक अध्येता समीर कुमार पाठक ने अपने लेख ‘राम प्रसाद बिस्मिल : उपनिवेशवाद विरोध और क्रान्तिकारी आन्दोलन’ (संवेद – 60)में एक बहुत महत्वपूर्ण बात की ओर संकेत किया है -‘बिस्मिल का पूरा जोर केवल राजनीतिक परिवर्तन मात्र पर नहीं, बल्कि सांस्कृतिक परिवर्तन पर है और इस सांस्कृतिक परिवर्तन का का एक मात्र लक्ष्य है उपनिवेशवाद विरोध और क्रान्तिकारी आन्दोलन का उभार।’ ये क्रान्तिकारी हिन्दी के पूर्णकालिक लेखक और विचारक के रूप में तो नहीं प्रतिष्ठित हैं, पर इनके विचार इनके जीवन-काल में ही प्रकाशित हो कर लोगों के बीच पहुँचते रहे हैं और हिन्दी क्षेत्र के जागरण में अपनी वैचारिक भूमिका का निर्वाह करते रहे हैं।


प्रेमचंद और गणेश शंकर विद्यार्थी भी हिन्दी क्षेत्र के ऐसे विचारक–लेखक हैं, जिनकी चिन्तन-दृष्टि पर रूस की समाजवादी क्रान्ति के स्पष्ट प्रभाव दिखते हैं। प्रेमचंद ‘पुराना जमाना; नया जमाना’ में कहते हैं – ‘आने वाला जमाना अब किसानों और मजदूरों का है। दुनिया की रफ्तार इसका साफ सबूत दे रही है।’ वह पुराने ज़माने को बनाए रखने की कोशिश करने वाली शक्तियों को चेतावनी देते हुए कहते हैं – ‘जनता की इस ठहरी हुई हालत से धोखे में न आइए। इन्कलाब के पहले कौन जानता था कि रूस की पीड़ित जनता में इतनी ताकत छिपी हुई है?’ प्रेमचन्द का यह लेख अक्टूबर क्रान्ति  के गहरे प्रभाव के दिनों में, फरवरी 1919 में प्रकाशित हुआ था। यही समय है जब उनके उपन्यास ‘प्रेमाश्रम’ का एक पात्र बलराज किसानों-मजदूरों के नये जमाने की बात करता हुआ जमींदारों की बेगारी का विरोध करता है। प्रेमचन्द के लेखन में सामन्तवाद, पूँजीवाद और साम्राज्यवाद के विरोध के अनेक ऐसे सन्दर्भ मौजूद हैं, जो उन्हें इस दौर के समाजवादी  जनजागरण का लेखक प्रमाणित करते हैं। गणेश शंकर विद्यार्थी का लेखन तो इस प्रसंग में चकित करता है कि कांग्रेसी विचारों के होने के बाद भी उनका राजनीतिक आचरण और बोल्शेविज्म में उनकी आस्था उन्हें लगभग कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों के आस-पास खड़ा करती है। उनके लेखों से दर्जनों साक्ष्य दिए जा सकते हैं, जिनमें अक्टूबर क्रान्ति से निकले हुए मूल्यों और उनकी वैचारिक प्रेरणाओं को सुना जा सकता है। अक्टूबर क्रान्ति के पहले के लेखन में भी उनका सामन्तवाद-साम्राज्यवाद विरोधी दृष्टिकोण मुखर था। पर यदि बाद के दिनों में अन्तर्राष्ट्रीय सन्दर्भों के साथ समाजवादी विचार-तत्व उनके चिन्तन में दिखने लगे थे, तो यह यूँ ही नहीं था। यह कानपुर के क्रान्तिकारियों के सम्पर्क का भी परिणाम हो सकता है और उनकी जाग्रत मनीषा पर पड़ने वाले तत्कालीन अन्तर्राष्ट्रीय वातावरण की क्रान्तिकारी प्रेरणाओं का भी। पर प्रभाव तो था। इनके किसी एक लेख में ही एकसाथ यदि पूँजीवादी लूट, देशों द्वारा देशों के शोषण और किसानों-मजदूरों के जीवन के सन्दर्भ आरहे हों, तो समझा जा सकता है कि लेखक अपनी विचार-यात्रा की किन दिशाओं में आगे बढ़ रहा है। बोल्शेविज्म की रक्षा करने वाली  ताबड़तोड़ दो लम्बी टिप्पणियां और लेनिन की मृत्यु पर लिखा अत्यंत भावनापूर्ण शोक-लेख आखिर कुछ तो ‘विशेष’ का संकेत करता ही है! 

           
अक्टूबर क्रान्ति के बाद के इस दौर में हिन्दी समाज का एक बड़ा हिस्सा राष्ट्रीय आन्दोलन और उन्नीसवीं – बीसवीं शताब्दी के नवजागरण की पृष्ठभूमि के बावजूद जाति-धर्म-संस्कृति की पुरानी धारणाओं, ईश्वर, नियति और भाग्य के बद्धमूल संस्कारों और अनेक तरह की पुनरुत्थानवादी आकांक्षाओं में फंसा हुआ दिखता है। जिस समय पूरी दुनिया में इस नये समाज-दर्शन और विचार के आलोक में अपने यथार्थ को व्यख्यायित करने और बदलने की कोशिशें चल रही थीं, उस समय हिन्दी समाज कुछ दूसरी तरह की जड़ताओं में उलझा हुआ दिखता है। इस विषय के अध्येताओं ने इस तथ्य को रेखांकित किया है कि प्रायः विदेशियों के विचारों को यहाँ विदेशी या अभारतीय या भारतीय संस्कृति का विरोधी विचार कह कर निषिद्ध घोषित कर देने की प्रवृत्ति भी मौजूद रही है। हिन्दी की चर्चित पत्रिका ‘माधुरी’ के नवम्बर १९३२ के अंक में पं. राम सेवक त्रिपाठी का ‘रूस में नास्तिकता की बाढ़’ शीर्षक सम्पादकीय विचार देखें – ‘यों तो संसार में नास्तिकों का अस्तित्व सदैव से रहा है। लेकिन रूस में सुसंगठित रूप से इस समय जो कुछ हो रहा है, उसका प्रभाव विश्व के अन्य देशों पर भी पड़े बिना नहीं रहेगा। **** हिन्दी पत्रों में भी इसके नमूने आ चुके हैं। वह नमूने आत्म अनुभव या सिद्धान्तों के बल पर नहीं, बल्कि पाश्चात्य प्रवाह से प्रभावित होने के हैं। ईश्वर न करे कि भारतीय संगठनों में इस प्रकार की छूत घुस कर आदर्श भारत को तबाह कर दे। ईश्वर और धर्म पर ही भारतीय आदर्श का अस्तित्व अवलम्बित है। अक्टूबर क्रान्ति की प्रेरणाओं को ऐसे मूल्यांकनों से बनने वाले मानसिक अवरोधों से भी टकराना पड़ रहा था।  इस प्रभाव का आकलन करते हुए यह भी नहीं भूलना चाहिए कि भारतीय इतिहास में यह गाँधी के सम्मोहनकारी प्रभावों का दौर है।  इस दृष्टि से देखें तो गांधीवाद और मार्क्सवाद के बीच के तीव्र वैचारिक विरोधों के मद्देनजर नवजागरण के इस काल-खंड में कम्युनिज्म और बोल्शेविज्म के पक्ष में उठने वाली आवाज़ों की इस गूँज का महत्व साधारण नहीं है। हिन्दी के प्रगतिशील आन्दोलन में मार्क्सवाद की अन्तर्राष्ट्रीय प्रेरणाओं की भूमिका का इतिहास बहुत जाना-पहचाना है। हिन्दी नवजागरण के दौर में यह आन्दोलन अपनी खुद की व्यापक प्रेरणाओं और भूमिकाओं के प्रभावशाली इतिहास के लिए अलग से उल्लेखनीय है। पर, ध्यान दें, तो इसके भारतीय स्रोत के रूप में अक्टूबर क्रान्ति की प्रेरणाएँ भी देखी जा सकती हैं। प्रगतिशील आन्दोलन की अन्तर्वस्तु और उसके ऐतिहासिक स्रोतों का अध्ययन करें, तो यह बात बिलकुल स्पष्ट नजर आ सकती है कि यह केवल मार्क्सवाद के दार्शनिक-विचारधारात्मक या सौन्दर्यशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य और उसके प्रभावों का ही नहीं, सोवियत समाजवाद की राजनीतिक अन्तर्वस्तु और उसके प्रति वैश्विक आकर्षण का भी परिणाम था। अक्टूबर क्रान्ति के बाद पहली बार कोई दर्शन ठोस वस्तुगत यथार्थ में, एक बदलती हुई समाजार्थिक संरचना में मूर्त हो रहा था। अपने समकालीन इतिहास की इस मूर्त सचाई ने न केवल अपनी सम्भाव्यता के प्रति दुनिया के अनेक देशों में अनुकूल चेतना पैदा की, बल्कि उसके लिए किए जाने वाले प्रयत्नों का एक घनीभूत वातावरण भी तैयार किया। प्रगतिशील आन्दोलन को भी अक्टूबर क्रान्ति की अन्तर्राष्ट्रीय और हिन्दी की नवजागरणकालीन, दोनों प्रेरणाओं के साथ जोड़ कर ही देखा जाना चाहिए।

गणेश शंकर विद्यार्थी 
                                      
          
                            [चार]


अक्टूबर क्रान्ति की आरम्भिक प्रेरणाओं के इन लगभग डेढ़ दशकों में साम्राज्यवाद –उपनिवेशवाद विरोधी हिन्दी की वैचारिक अभिव्यक्ति में ऐसा बहुत कुछ था, जिसे तत्कालीन अंग्रेजी राज में आपत्तिजनक माना गया और इस अपराध में लेखक-सम्पादक–प्रकाशक–मुद्रक को या तो अर्थदंड लगाया गया, मुकदमा चलाया गया या पुस्तकों, पत्र-पत्रिकाओं और प्रेस को प्रतिबंधित कर दिया गया। अनेक प्रकाशनों को उनके संचालकों द्वारा अर्थदंड का प्रबंध न हो पाने की दशा में बंद कर देना पड़ा था। इससे एक तरफ तो अभिव्यक्ति की आज़ादी के प्रश्न पर औपनिवेशिक सत्ता के नज़रिए का पता चलता है और दूसरी तरफ कम्युनिज्म के विचारों के प्रति उसकी भयग्रस्त सतर्कता का। इसी साल तीन मूर्ति, नई दिल्ली के शोध एवं प्रकाशन विभाग के अध्यक्ष नरेंद्र शुक्ल की एक पुस्तक आई है – ‘उपनिवेश, अभिव्यक्ति और प्रतिबन्ध’। इसमें 1858 से 1947 के बीच ब्रिटिशकालीन उत्तर प्रदेश में प्रतिबंधित साहित्य का विस्तृत विवरण दिया गया है। जिन मुद्रणों-प्रकाशनों, पुस्तकों, पत्र-पत्रिकाओं के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाइयों और प्रतिबंधों की इसमें चर्चा की गयी है, उनमें कमुनिज्म और बोल्शेविज्म से जुडी हुई सामग्रियों का भी ब्यौरा है। ‘स्वदेश’ का विजयदशमी अंक, ‘चाँद’ का फांसी अंक, शिवनारायण टंडन की पुस्तक ‘बोल्शेविक रूस’, सत्यभक्त का पत्रक ‘भारतीय साम्यवादी दल’ (कमुनिस्ट पार्टी) और ‘कमुनिस्ट पार्टी क्या चाहती है’, कामरेड रामचंद्र शर्मा की पुस्तिका ‘किसान क्या करें’, अयोध्या प्रसाद द्वारा प्रकाशित ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो अर्थात समष्टिवाद का असली सिद्धान्त’ आदि को दण्डित–प्रतिबंधित कर दिया गया। 1917 की अक्टूबर क्रान्ति के बाद साम्राज्यवादी –उपनिवेशवादी शासन-तन्त्र  के विरोध के कम्युनिस्ट प्रयासों और उसके नये राजनीतिक उभार के प्रति अंग्रेज सरकार के कड़े निर्णयों का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि उसने  साम्यवादी प्रकाशनों पर प्रतिबन्ध लगाने की औपचारिक घोषणा कर दी। नरेंद्र शुक्ल की पुस्तक के अनुसार ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन ने साम्यवादी साहित्य विशेषकर कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के प्रकाशनों एवं समाचारपत्रों पर 22 अप्रैल 1922 को एक अधिसूचना जारी करके भारत में आने अथवा आ चुके साहित्य के डाक विभाग से अन्तरण पर रोक लगा दी थी। पर बाद में इसे अपर्याप्त समझ कर एक नयी अधिसूचना के द्वारा कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के साथ उसके अन्य संगठनों के प्रकाशनों पर भी प्रतिबन्ध लगा दिया गया। प्रतिबन्ध की इस अधिसूचना के बाद का एक बड़ा प्रकरण गोरखपुर से प्रकाशित 7 अक्टूबर 1924 के ‘स्वदेश’ के विजयादशमी अंक से जुड़ा है। कांग्रेसी विचारों के सम्पादक दशरथ प्रसाद द्विवेदी के पत्र ‘स्वदेश’ के  इस अंक का सम्पादन पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ ने किया था। इसमें प्रकाशित सामग्री सरकार की दृष्टि में आपत्तिजनक थी। सम्पादक–प्रकाशक के इस अपराध को राज-द्रोह मानते हुए उन पर मुकदमा कायम किया गया और उन्हें सश्रम कारावास की सज़ा दी गयी। उक्त पुस्तक इसमें प्रकाशित जिन चार रचनाओं को सरकार की दृष्टि में अपराध बताती है, उनसे अक्टूबर क्रान्ति या कम्युनिज्म से कोई स्पष्ट सम्बन्ध बनता नहीं दिखता। पर, डॉ. प्रत्यूष दुबे के सम्पादन में संकलित-प्रकाशित पुस्तक ‘स्वदेश का साहित्य एवं समाज’ के भाग–एक में उपलब्ध उक्त अंक की रचनाओं के शीर्षकों की सूची पर नजर डालें, तो अंग्रेज सरकार के कोप का पूरा कारण समझा जा सकता है। इस अंक में रमाशंकर अवस्थी का लेख ‘बोल्शेविकों की विश्वविजय’, विश्वम्भर नाथ जिज्जा का ‘पूँजीवाद के अन्धकार में साम्यवाद का दिव्यप्रकाश’, कृष्णदेव प्रसाद गौड़ का ‘मजदूर दल और भारत वर्ष’ भी प्रकाशित हुआ था। राजद्रोह की रही-सही कसर पूरी कर दी थी खुद सम्पादक ‘उग्र’ की रचना ‘लाल क्रान्ति के पंजे में’ के उन वैचारिक गद्यांशों ने, जिसमें अक्टूबर क्रान्ति और बोल्शेविकों की उपलब्धियों की रोचक प्रशंसा की गयी है। आचार्य चतुरसेन शास्त्री के सम्पादन में प्रकाशित नवम्बर 1928 के ‘चाँद’ के ‘फांसी अंक’ को भी ऐसे ही प्रतिबंध का शिकार बनाया गया था । इसमें फांसी और क्रान्ति जैसे विषयों पर कई लेख प्रकाशित किए गये थे। भगत सिंह के साथ उनके कई क्रान्तिकारी मित्रों के लेख भी उसमे शामिल किए गये थे। यह वह दौर था, जब भगत सिंह ‘हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र संघ’ का गठन कर मार्क्सवादी विचारों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की घोषणा कर चुके थे। भगत सिंह के साथी शिव वर्मा ‘क्रान्तिकारी आन्दोलन का वैचारिक विकास’ बताते हुए कहते हैं – ‘1928 तक आते-आते हम लोगों ने समाजवाद को सिद्धान्त के रूप में स्वीकार कर लिया था’। ऐसी स्थिति में ‘चाँद’ के इस विशेष अंक की क्रान्तिकारी विषय-वस्तु का सहज ही अनुमान लग जाता है। अंग्रजों में मार्क्सवादी विचारों के प्रति इतना जबर्दस्त विरोध-भाव था कि राष्ट्रीय अभिलेखागार लखनऊ की पुलिस पत्रावली की मानें, तो कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यक्रमों और सिद्धान्तों की सामान्य सूचना देने वाले कई पर्चों तक को प्रतिबंधित कर दिया गया था। उस दौर के चर्चित कम्युनिस्ट विचारक और राजनीतिज्ञ कामरेड सत्यभक्त के हिन्दी पत्रक ‘भारतीय साम्यवादी दल’ और पुस्तक  ‘कम्युनिस्ट पार्टी क्या चाहती है’ पर रोक की कार्रवाई को भी इसी से जोड कर देखा जा सकता है। ‘उपनिवेश, अभिव्यक्ति और प्रतिबन्ध’ से उद्धृत इस टिप्पणी को देखें, तो अक्टूबर क्रान्ति के सम्बन्ध में या उसके प्रभाव में लिखे-छपे साहित्य के लिए ज़िम्मेदार लेखक-प्रकाशक के प्रति की जाने वाली कानूनी कार्रवाइयों और प्रतिबंधों का दमनकारी रूप पूर्णतः प्रत्यक्ष हो उठेगा –‘बालकृष्ण शर्मा, जो प्रताप प्रेस कानपुर का कार्यभार एवं समाचार-पत्र ‘दैनिक प्रताप’ का सम्पादकत्व संभाल रहे थे, उन्होंने 1932 में प्रताप प्रेस कानपुर से शिव नारायण टंडन द्वारा लिखित पुस्तक ‘बोल्शेविक रूस’ मुद्रित एवं प्रकाशित की। इस पुस्तक में रूस और भारत की परिस्थितियों में साम्यता दिखाते हुए भारत में भी रूस की भांति क्रान्ति की अपेक्षा की गयी थी। प्रशासन को इस पुस्तक के बारे में जानकारी होने में लगभग दो वर्ष लग गये। 1934 में इस पुस्तक के बारे में पता चलते ही इसे प्रतिबंधित करने की संस्तुति की गयी। 23 फरवरी 1934 को ‘बोल्शेविक रूस’ की सभी प्रतियों को जब्त करने का आदेश अधिसूचित कर दिया गया’। अक्टूबर क्रान्ति  और बोल्शेविज्म के प्रभाव का एक रूप यह भी था। 

प्रेमचंद 

                       
                        [पांच]

इतिहास का महत्व समकालीनता के साथ उसका आलोचनात्मक संवाद है। इतिहास-विरोधी प्रतिगामी शक्तियां इस सम्बन्ध का या तो निषेध करती हैं या अतार्किक पाठ बनाती हैं। किन्तु समाज की प्रगतिशील-क्रान्तिकारी शक्तियों के लिए इतिहास का ज्ञान या इतिहास–बोध इतिहास के निर्माण के लिए होता है। अक्टूबर क्रान्ति ऐसी क्रान्तिकारी शक्तियों के लिए इतिहास का वह प्रेरक और  मार्गदर्शक सन्दर्भ है, जो हमारी समकालीनता की न केवल व्याख्या में मदद कर  सकता है, बल्कि पूँजीवाद-साम्राज्यवाद के विरुद्ध निर्णायक संघर्ष की समझ पैदा करते हुए हमारे समाजवादी इतिहास के निर्माण की भूमिका निभा सकता है।


समाज वर्गों में विभाजित है। यह विभाजन लगातार बढ़ता जा रहा है। पूँजीवादी सत्ता-तन्त्र की बेशुमार लूट और शोषण की नीतियों, कार्यक्रमों और योजनाओं ने यह अन्यायकारी विभेद पैदा किया है। ऐश्वर्य और वैभव के द्वीपों के सापेक्ष करोड़ों-करोड़ भूखी-नंगी जिंदगियों के त्रासद दृश्यों में इस भयावह वर्गीय यथार्थ की करुण कहानी पढ़ी जा सकती है।


पूरी दुनिया के पैमाने पर साम्राज्यवाद की जन-विरोधी नीतियों और वैश्विक कार्यक्रमों ने विनाश के जो दृश रचे हैं, उसे देखते हुए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर एक प्रतिरोध का वातावरण बनाने की ज़िम्मेदारी सामने आ खडी हुई है। समाजवादी समाज के निर्माण के लक्ष्य की दिशा में सोचने-समझने और कुछ ठोस कदम उठाने वाले चाहे जितने असंगठित और बिखरे हुए हों, पर उनके भीतर यह संकल्प-भाव अब और ज्यादा दृढ़ तथा निश्चित होने लगा है कि क्रान्तिकारी संघर्ष के रास्ते ही मौजूदा पूँजीवादी-साम्राज्यवादी भूमंडलीकृत तन्त्र का मुकाबला किया जा सकता है और इसी रास्ते आगे बढ़ कर उसकी जगह किसानों-मजदूरों की, शोषित-पीड़ित जनता की व्यवस्था बनाई जा सकती है।


अक्टूबर क्रान्ति  के अनुभवों ने सिखाया है कि क्रान्तिकारी परिवर्तनकामी शक्तियों के लिए साहस और संकल्प का सबसे बड़ा स्रोत जनता है। जनता की संघर्ष–चेतना और उसके भौतिक-आत्मिक समर्थन तथा सहयोग से ही क्रान्तिकारी शक्तियां परिवर्तन और नये के सृजन की जरूरी पीठिका का निर्माण करती हैं। इसलिए जन-चेतना को निरन्तर ऊर्जस्वित और विकासमान बनाए रखने की ज़िम्मेदारी भी उन्हें स्वीकार करनी पड़ती है। इतिहास इन्हीं अर्थों में वर्तमान को समझने और फिर उसे बदलने के एक उपयोगी साधन के तौर पर महत्वपूर्ण होता है। इस प्रक्रिया में आलोचनात्मक विवेक सक्रिय होता है तथा वर्तमान के लिए उपयोगी तत्वों का संग्रह और परीक्षण का दौर चलता रहता है।


इस परिप्रेक्ष्य में इस देश के समाजवादी निर्माण की ऐतिहासिक क्रान्तिकारी परियोजना में लगे व्यक्तियों, समूहों, संगठनों की जन-संलग्नता के अध्ययन के निष्कर्ष बहुत उत्साहजनक नहीं हैं। अक्टूबर क्रान्ति का इतिहास बताता है कि नेतृत्वकारी शक्तियों को अपनी वस्तुगत–मनोगत चेतना के विकास, संवर्द्धन तथा परिष्कार के लिए जनता के बीच लगातार मौजूद और सक्रिय बने रहना होता है। यह परस्पर प्रभाव की एक ऐसी राजनीतिक अन्तःप्रक्रिया रही है, जिसमें जनता ने इन्हें शक्ति दी है, साहस और संकल्प दिया है और इन्होने जन-चेतना का क्रान्तिकारी रूपांतरण करते हुए वर्ग-संघर्ष को उसकी मंजिल तक ले जाने का कार्यभार पूरा किया है। इसलिए भारत के समाजवादी आन्दोलन से जुड़े हुए लोगों के लिए यह निर्विकल्प–सा है कि एक नये उत्साह और उम्मीद के साथ जनता के बुनियादी वर्गों में जा कर उन्हें उनके साथ विश्वास और भरोसे का सम्बन्ध बनाते हुए अपनी दिशा-गति के निर्धारण में उनकी भूमिका के लिए जगह बनानी चाहिए।


अक्टूबर क्रान्ति की राजनीतिक प्रेरणाओं के ऐतिहासिक महत्व की इस स्वीकृति के बाद कि इसने इतिहास के एक विशेष दौर में भारत सहित दुनिया के अनेक स्वाधीनता-संघर्षों को एक दिशा, परिप्रेक्ष्य और ऊर्जा देने का काम किया था, आज उसके पुनर्मूल्यांकन की जरूरत अनुभव की जा सकती है। भारत में राष्ट्रीय आन्दोलन के परिणाम के रूप में प्राप्त स्वाधीनता का कुल सच यह है कि हमारे सपनों के साथ, हमारी आकांक्षाओं और हमारे पूर्वजों के असंख्य बलिदानों के साथ, हमारे भविष्य और सम्भावनाओं के साथ भारी छल किया गया है। नव निर्माण की सामाजिक-सांस्कृतिक–राजनीतिक– आर्थिक परियोजनाओं को नई पूँजीवादी–साम्राज्यवादी व्यवस्था और उसके दर्शन ने निरस्त ही नहीं, अप्रासंगिक तक घोषित कर दिया है। मुक्तिकामी संघर्षों के गौरवशाली जनेतिहास की शिक्षा और उसके सार-संकलन को भारत ही नहीं, पूरे समकालीन विश्व के लिए अवांछनीय बता दिया गया है। हिन्दी नवजागरण ने अपनी शताब्दियों की लम्बी संघर्ष-यात्रा जो स्वप्न और मूल्य निर्मित किए थे, उदात्त सांस्कृतिक तत्वों से रचे-बसे एक स्वाधीन मानवीय समाज की संरचना के जो लक्ष्य निर्धारित किए थे, आज भूमंडलीकरण की वैचारिकी और उसकी भौतिक-आर्थिक प्रक्रिया ने व्यावहारिक स्तर पर उसे पुराना, फालतू, अनुपयोगी और त्याज्य बना दिया है। इस नये साम्राज्यवाद ने पूरी दुनिया में तबाही और बर्बादी के जो दृश्य रचे हैं, वह  अभूतपूर्व है। इसने मनुष्य के जीवन के सभी क्षेत्रों को अपना निशाना बनाया है, बेरहमी से हमला किया है और अबतक अर्जित सभी मानवीय सांस्कृतिक सम्पदाओं को तहस-नहस कर दिया है। मनुष्य के अंतःकरण से लेकर वैयक्तिक और सामाजिक सम्बन्धों तक व्याप्त समस्त मूल्य-प्रणाली को क्षति पहुंचाते हुए इसने इतिहास को एक बड़े संकट में डाल दिया है।


इतिहास के इस अभूतपूर्व संकट के दौर में महान अक्टूबर क्रान्ति की स्मृतियों , उसकी वैचारिकी, कर्म-संस्कृति के तत्वों, साहस–संकल्प और संघर्ष-चेतना की रोशनी में हम अपने समय-समाज की न केवल व्याख्या की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं, बल्कि उसके प्रयोगों के मूलभूत निष्कर्षों की समकालीन वैधता और सार्थकता पर विचार करते हुए एक नई अक्टूबर क्रान्ति की सम्भावनाओं के निर्माण का उद्यम कर सकते हैं। इस उद्यम में यह ध्यान रखना बेहद जरूरी है कि इस नये साम्राज्यवादी विस्तार और वर्चस्व के नये दौर ने अपने पुराने तौर-तरीके बदल लिए हैं और अब नये जमाने के नये हथियारों के साथ अधिक बर्बर और आक्रामक ढंग से अपनी नई विध्वंसक भूमिका में वह दुनिया के सामने है। वैश्विक पूँजी के आक्रामक विस्तार वाले इस सर्वग्रासी भूमंडलीकृत परियोजना में उसने हमारे सामने - श्रमजीवी दुनिया के सामने - अस्तित्व के संकट की एक नई परिघटना पैदा कर दी है। इसने इस बीच सामाजिक सरोकारों से कटे हुए नितांत आत्मजीवी नागरिकों की एक नयी दुनिया बना ली है, जिसके लिए भूमंडलीकरण का उत्तरआधुनिक यथार्थ ही विश्व-इतिहास का अब तक का सबसे बड़ा क्रान्तिकारी प्रतिफलन है।  इस नई पूँजीवादी व्यवस्था ने अपने दर्शन के सहारे खुद को मनुष्य की अनिवार्य नियति बना दिया है। यह समाजवाद के मूल्यों–आदर्शों को बीते हुए युगों के निरर्थक स्मृति–तत्वों के रूप में व्याख्यायित करता हुआ, मनुष्य की मुक्ति और स्वाधीन सृजन की किसी भी सम्भावना में समाजवाद भूमिका और महत्व को खारिज करता हुआ पूँजी के भूमंडलीकरण को एकमात्र युगांतरकारी विकल्प के रूप में पेश करता है। इसने अपनी योजनाओं के पक्ष में तर्क गढ़े हैं, उसका राजनीतिक अर्थशास्त्र विकसित किया है और एक नयी ज्ञान-मीमांसा से अपने पक्ष में  समर्थन का एक अपूर्व उत्तेजक माहौल तैयार किया है। पूँजीवाद और साम्राज्यवाद की इस दार्शनिक व्यूह-रचना तथा उसकी रक्षात्मक और आक्रामक तैयारी के मद्देनजर समाजवाद की शक्तियों को अक्टूबर क्रान्ति के नये भाष्य करने और उसके ज्ञान-व्यवहार के उपकरणों के नवीनतम उपयोग की अपनी नई रणनीति बनाने के लिए मुस्तैद होना पड़ेगा। विचारधारा और व्यवहार की असहमतियों और विरोधों पर अनेक समूहों और संगठनों में बंटे हुए कम्युनिस्टों को एक रचनात्मक संवाद के रास्ते अपने को पुनस्संगठित करना होगा। नयी बनती हुई परिस्थितियों में वे विभाजित शक्ति से न तो पूँजीवाद–साम्राज्यवाद की वैश्विक चुनौतियों का सामना कर सकते हैं और न ही देश के भीतर की प्रतिगामी राजनीतिक शक्तियों और उनके जनविरोधी कार्यक्रमों का। भीतर और बाहर के इस संघर्ष के लिए उन्हें संयुक्त कार्यक्रमों से ले कर एकीकृत कम्युनिस्ट राजनीति के लिए काम शुरू करना होगा। भारत के कम्युनिस्ट चिंतकों को इस प्रश्न पर जरुर विचार करना चाहिए कि लगातार बदतर होती जा रही समाजार्थिक परिस्थितियों के बावजूद पूँजीवाद और साम्राज्यवाद के पक्ष में खड़ी भारत की वर्तमान राजनीतिक सत्ताओं और उनकी विचारधारा का प्रभावी विरोध आखिर क्यों नहीं खड़ा हो पा रहा है!

अक्टूबर क्रान्ति की आरम्भिक प्रेरणाओं से निकलने वाले जरूरी कार्यभारों, कार्यक्रमों तथा योजनाओं के साथ अपने समाजवादी लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ने के लिए कम्युनिस्ट राजनीति को अनेक नये आविष्कारों की राह पकड़नी पड़ेगी। अब पुराने दौर के सूत्रों के सहारे वर्ग-चेतना और वर्ग-संघर्ष के नये अन्तरविरोधों और द्वंद्वों की व्याख्या नहीं की जा सकती। किसान और मजदूर, कृषि और उद्योग, नई वर्गीय संरचना और उत्पादन सम्बन्ध, क्रान्ति  के नये स्वरुप आदि मुद्दों पर आज के पूँजीवाद की नई चारित्रिक विशेषताओं की रोशनी में विचार करना होगा।  मार्क्सवादी दर्शन और उसकी विश्लेषण-पद्धति के सहारे नये बनते हुए समय-समाज और राजनीति को नये सन्दर्भों में व्याख्यायित करना होगा। आज का पूँजीवाद अपने निरंकुश प्रसार और वर्चस्व के नये ऐतिहासिक दौर में स्वयं अनेक परिवर्तनों-परिवर्धनों से गुजरता हुआ एक नवीनतम संशोधित चरित्र में दुनिया के सामने है। इसलिए अक्टूबर क्रान्ति या बोल्शेविक क्रान्ति या समाजवाद की विरासत संभालने वाली शक्तियां पुराने उपकरणों से यह युद्ध नहीं जीत सकतीं। उन्हें भी एक नई अक्टूबर क्रान्ति के नये संशोधित उपकरण तैयार करने होंगे।

                                          
सपनों का टूट जाना और उनका पूरा न हो पाना एक त्रासद यथार्थ है। पर इसके आगे की राह भी सपनों से ही होकर जाती है - जीवित सपनों से। त्रासद यथार्थ का विकल्प तो सपना नहीं है। पर सपने से यथार्थ की वर्तमान त्रासदी का विकल्प तलाश किया जा सकता है। प्रतिकूलताओं के बीच अपने सपनों को जीवित रखना सपनों को सच करने की जरूरी शर्त है। इतिहास में ऐसे अनेक दौर आए हैं, जो मनुष्यता के लिए बेहद निराशाजनक और विनाशकारी प्रमाणित हुए हैं, पर उसी दौर में प्रतिरोध और संघर्ष का इतिहास भी सबसे ज्यादा रचा गया है। इन्हीं अर्थों में चार्ल्स डिकेंस को ए टेल ऑफ़ टू सिटीज’ में सबसे बुरे समय में सबसे अच्छा समय, अज्ञानताओं के युग में विवेक का युग, अविश्वास के काल में श्रध्दा और भरोसे का काल, अँधेरे के मौसम में उजाले का मौसम, नाउम्मीदियों के शीत-काल में उम्मीदों का बसंत दिखा होगा और तब उसने कहा होगा कि जब हमारे सामने कुछ भी नहीं था, तो हमारे सामने सब कुछ था!


महान अक्टूबर क्रान्ति की प्रेरणाएँ हमें सपना भी देती हैं, संघर्ष करने का हौसला भी और कभी न खत्म होने वाली उम्मीद भी।


अनिल राय 





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(इस पोस्ट में प्रयुक्त सभी चित्र गूगल के सौजन्य से लिए गए हैं.)              


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