सुशील कुमार का आलेख ‘“पोएट्री मैनेजमेंट” – कविता की मदारी भाषा और नवरीतिवाद के काव्य-सौंदर्य का अन्यतम नमूना,


शुभम श्री


हाल ही में कवयित्री शुभम श्री को इस वर्ष का भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार मिला है। शुभम श्री को यह पुरस्कार जलसा – 4 में छपी उनकी कविता ‘पोइट्री मैनेजमेंट’ के लिए दिया गया है। इस बार के निर्णायक हैं कवि-कहानीकार उदय प्रकाश। पुरस्कार जिस कविता पर दिया गया उस पर साहित्यिक खेमे में सहमति-असहमति दर्ज करायी जाने लगी। पहले भी ऐसा हुआ है जब पुरस्कृत कवि को ले कर लोग सहमत-असहमत रहे हैं। सबको अपनी अपनी प्रतिक्रिया दर्ज कराने का अधिकार भी है। बड़े-बड़े कवियों तक ने शुभम श्री की इस कविता और उस पर पुरस्कार दिए जाने के निर्णय से सहमति जताई और अपनी बातें खुल कर रखीं तो कुछ युवा साहित्यकारों ने इस कविता के चयन पर ही प्रश्न-चिह्न उठाए। कवि मंगलेश डबराल ने अपनी फेसबुक पोस्ट में लिखा है – ‘शुभम श्री की कविता 'पोएट्री मैनेजमेंट' ऐसी कविता है जो प्रत्यक्ष तौर पर  कविता और कवि-कर्म का उपहास करते हुए कविता की रचना करती है और आज के  कैरियरपरस्त सामाजिक-राजनीतिक संसार की आलोचना पेश करती है कविता में जिस विरूप-विद्रूप की निर्मिति है, उसके नीचे करुणा की रेखाएं साफ़ देखी जा सकती हैं उदय प्रकाश द्वारा इस कविता को पुरस्कार के लिए चुने जाने पर जो प्रतिक्रियाएं दिख रही हैं, वे हैरतनाक हैं लगता है लोग कविता में कुछ भी  नया या अवागार्द देखते ही भड़क उठाते हैं यह हमारी काव्य-रूचि की जकडबंदी ही है या फिर कविता से रूमानी वाहवाही की चालू उम्मीद’ 

कवि असद जैदी ने अपनी प्रतिक्रिया में लिखा है – ‘अव्वल तो मुझे लगता है हमारे मित्र उदय प्रकाश के हाथ से कभी कोई अच्छा काम अंजाम हो ही नहीं सकता! कि उन्हें और कुछ न सूझा तो शुभम श्री ही को  भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार दे दिया! अब प्रतिक्रिया में पिछले तीन रोज़ से सोशल मीडिया पर, बक़ौल कवि मनमोहन, नया ज़माना  दहाड़ रहा है! शुभम श्री तो पता नहीं कहाँ हैं (और कौन हैं) पर उनके तुफ़ैल से हिन्दी जगत का एक हिस्सा अचानक अपने अभ्यंतर का तेज़ी से बाह्यकरण करने  में लगा है। अजीब सी हुंकारें कई तरफ़ से आ रही हैं। लगता है  हिन्दी-सेवकों का एक दल संस्कृति की खाल ओढ़ करसमकालीन कविता को बचाने (और सुधारने) उठ खड़ा हुआ है! दूसरे, क्या ऐसा संभव था कि हमारे समाज में, राष्ट्रीय जीवन में हर जगह अच्छे दिनोंकी आमद हो और समकालीन हिन्दी काव्य-विमर्श उनसे सर्वथा अछूता बना रहे? आसार तो पहले ही से नज़र आ रहे थे, बरसों से, पर अब तो कोई महीना कोई हफ़्ता नहीं गुज़रता  जब साहित्य और संस्कृति जगत में नए ज़मानेकी लाइव झाँकी न दिखाई देती  हो।

तसल्ली की बात यही है कि शुभम श्री अपने समकालीन  औसत से गिरे काव्य रसिकऔर लम्पेन आलोचक का मुँह देख कर नहीं लिखतीं, उसके प्रतिगामी संस्कारों को पुचकारती हैं। उनके काम को जानने के मानदंड  उन्हीं के कृतित्व और उनकी वैचारिकता में मौजूद हैं। यह उनकी मुश्किल भी है  और एक प्रकार का सौभाग्य भी कि वह फ़ासीवाद के गहरे होते दौर में अपनी कविता लिखने का काम कर रही हैं, बिना अपने मन को अधिक भारी किए। 

युवा कवि रामजी तिवारी ने इस कविता की एक तथ्यात्मक भूल की तरफ इशारा करते हुए लिखा हैं ‘आज मेरे एक कवि-मित्र ने इधर की एक चर्चित और पुरस्कृत कविता को पढ़ने के बाद कहा कि हम कवियों के पास लिखने की गजब छूट हासिल है। ऐसी छूट, जो आम लोगों के नसीब में कत्तई नहीं ....।
जैसे .....?
जैसे यही कि हमारा कोई साथी अपनी कविता में लिख सकता है कि भारत ने आज एक कविता मैच में वेस्टइंडीज को 11 विकेट से हरा दिया। या कि श्रीलंका ने आस्ट्रेलिया को एक कविता मैच में साढ़े छियालीस रन से हरा दिया। या कि ब्राजील ने अर्जेंटीना को काव्य अंताक्षरी में ढाई गोल से हरा दिया।
जैसे कि इस कविता में ही कहा गया है कि भारत ने काव्य अंताक्षरी के मैच में 6-5, 6-4, 7-2 से सीधे सेटों में जीत दर्ज की। बिना यह जाने कि टेनिस के खेल में 6-5 और 7-2 का अंतिम स्कोर होता ही नहीं।‘
 
सहमति-असहमति की बात अपनी जगह लेकिन शुभम श्री इस पुरस्कार के लिए बधाई की हकदार तो हैं ही। सोशल मीडिया पर इस पुरस्कार के बहाने ही सही, जो बात हुई है वह कम लोगों को नसीब हो पाती है।  
  
साहित्य इसीलिए औरों से विशिष्ट है कि इस में असहमतियों के लिए भी पर्याप्त जगह होती है बाकी समय तो अपना काम निर्मम तरीके से करता ही है बहरहाल, इस पुरस्कार और कविता पर असहमति की एक आवाज कवि-आलोचक सुशील कुमार की भी है। पहली बार आइए पढ़ते हैं सुशील कुमार का यह आलेख “पोएट्री मैनेजमेंट” – कविता की मदारी भाषा और नवरीतिवाद के काव्य-सौंदर्य का अन्यतम नमूना
   

“पोएट्री मैनेजमेंट” – कविता की मदारी भाषा और नवरीतिवाद के काव्य-सौंदर्य का अन्यतम नमूना

सुशील कुमार

कविता जब चरित्र चमकाने और चर्चा में आने की लत और शौक बन जाती है तो मुझे धूमिल की ये पंक्तियाँ बरबसयाद आती हैं जिसे ध्यान से पढ़ने की जरूरत है :

कविता क्या है?
कोई पहनावा है?
कुर्ता-पाजामा है?'
ना, भाई ना,
कविता-
शब्दों की अदालत में
मुजरिम के कटघरे में खड़े बेकसूर आदमी का
हलफ़नामा है।'
'क्या यह व्यक्तित्व बनाने की
चरित्र चमकाने की --
खाने-कमाने की--
चीज़ है ?'
'ना, भाई ना,
कविता
भाषा में
आदमी होने की तमीज़ है।'

भाषा उस तिकड़मी दरिंदे का कौर है
जो सड़क पर और है
संसद में और है
इसलिये बाहर आ!
संसद के अंधेरे से निकल कर
सड़क पर आ!
भाषा को ठीक करने से पहले आदमी को ठीक कर।“

      हाल में ही वर्ष-2016 के लिए भारत भूषण अग्रवाल कविता पुरस्कार के लिए चयनित युवा कवयित्री शुभम श्री की कविता पोएट्री मैनेजमेंट पत्रिका जलसा में प्रकाशित हुई थी पुरस्कार समिति के निर्णायक मंडल में सर्वश्री अशोक वायपेयी, अरुण कमल, उदय प्रकाश, अनामिका और पुरुषोत्तम अग्रवाल शामिल हैं जो बारी-बारी वर्ष की सर्वश्रेष्ठ कविता का चयन करते हैं। इस बार निर्णायक उदय प्रकाश जी हैंसाहित्य-जगत में जब इस प्रकरण को लेकर हो-हल्ला होने लगा तो वरिष्ठ लोकधर्मी कवि विजेंद्र मौन रह गए (जो स्वस्थ परंपरा का परिचायक नहीं) पर ख्यात आलोचक डा. जीवन सिंह ने कवयित्री शुभम श्री के बचाव में फेसबुक पर आज 08 अगस्त, 2016  और गत 04 अगस्त, 2016 को अपनी पोस्ट डाल दी तो यह जानना अनिवार्य हो गया कि डा. जीवन सिंह ने इस 25 वर्षीय युवा कवयित्री की अब तक कितनी कविताएँ पढ़ी है। कविवर विजेंद्र और समालोचक जीवन सिंह कविता में लोकधर्मिता की वकालत करते हैं  (अभी-अभी जीवन सिंह जी ने शहीद लोकधर्मी कवि मान बहादुर सिंह पर संचयन का सम्पादन भी किया), शहरी मध्यमवर्गीय सोच और सौंदर्य-चिंतन से कविताओं की लानत-मलामत करते हैं, श्रम-सौंदर्य के कविता-निकष को ही मार्क्सवादी हलकों में लेकर युवा कवियों का विश्लेषण करते हैं पर साहित्य की इस कुत्सित प्रवृति पर विजेंद्र जी का मौन रह जाना और डा. जीवन सिंह का इस कवयित्री के प्रति पक्षधरता इनके सारे किए-धरे पर प्रश्न-चिन्ह खड़ा करता है। शुभम श्री की कविताओं को आज की रूढ़िग्रस्त कविता से अलग तरह की कविता बताते हुए जीवन सिंह जी कहते हैं कि “वे वस्तु और रूप दोनों स्तरों पर काव्य-रूढ़ि को कितने प्रभावी तरीके से तोड़ना जानती हैं। उनकी प्रतिबद्धता भाषा के किसी बाहरी रूप से नहीं ,बल्कि उसकी आन्तरिक चारित्रिक स्थितियों में झाँकती है।“ साथ ही, कवयित्री की काव्यभाषा और शैली के संबंध में इनका तर्क है कि “जहाँ तक मौजूदा जीवन-यथार्थ का सवाल है वह बहुत प्रभावी और आज के मध्य वर्ग की शैली में शुभम श्री की कविता में आता हैः यही उसकी ताकत है।“ मैं इन दोनों महान जनों से यह पूछना चाहता हूँ कि धूमिल की कविता की भाषा और उनके रचनात्मक यथार्थ को लेकर आज तक उन्होंने एक भी स्वतंत्र लेख या समालोचना नहीं लिखा बल्कि जब भी फोन पर, फेसबुक पर या अन्य माध्यमों से मैंने इनसे संवाद किया तो धूमिल को मात्र चुटकुलेबाज़ी और मुहावरेबाजी का कवि कह कर टाल गए और सपाटबयानी कवि की संज्ञा से नवाज कर उनकी महत्ता पर अपने विचारों के धूल रख दिए। आखिर इतना विचलन क्यों? इसकी कोई खास वजह तो होगी ! शुभम श्री की 31 कविताएं कविताकोश पर उपलब्ध हैं जिसे कोई भी पढ़ सकता है, मुझे इन सारी कविताओं को पढ़ कर कोई यह बताए कि इन कविताओं में इनकी किस कविता में लोकजीवन का अंतर्द्वंद्व और वर्ग-संघर्ष मौजूद है। मैं समझता हूँ कि कविता कम से कम वही होती है जिसमें जनलोक की प्रतिबद्धता और उसका श्रम-सौंदर्य उद्भासित होता हो और जो पढ़ने में मानवीय चेतना को स्पर्श -झंकृत करे। ऐसा क्या है “पोएट्री मैंनेजमेंट” में? अगर अराजक हो कर बिना नृत्य के नियम के नाचना, बिना राग-लय के चीख-चिल्लाहट को गीत-संगीत मानना और सियारों की पंचायत को कानूनी जामा पहना कर उसकी वकालत करना ही कला-साहित्य का अब ध्येय रह गया है तो फिर पोएट्री मैनेज करते रहें और सूअर की आँख की बाल बनते रहैं शुभंश्री के पक्षधर, रीढ़विहीन और कविता के कुजात- कुसंस्कारी, ग्लोब्लाइजेशन की आकंठ महिमा गान करने वाले साहित्य-च्युत लोग! आइए अपनी राय जाहिर करने से पहले हम शुभम श्री की कुछ कविताओं से बावस्ता हों और यह जानें कि आखिर इस कवयित्री के क्या काव्यगत गुण हैं जिनपर हमारे मठाधीश और पुरोधा इतने लट्टू हो रहे। इनकी एक कविता है –

बूबू-1,देखिए :

दूदू पिएगी बूबू
ना
बिकिट खाएगी
डॉगी देखेगी
ना
अच्छा बूबू गुड गर्ल है
निन्नी निन्नी करेगी
ना
रोना बन्द कर शैतान, क्या करेगी फिर?
मम्मा पास।

समय का कौन सा आंतरिक यथार्थ प्रच्छन्न है इस कविता में जो हमें दिखाई नहीं देता? शुभम श्री का रोता हुआ बच्चा चुप तो नहीं हुआ पर मन में गुदगुदी जरूर पैदा कर गया! क्या आपको बुर्जूआ सौंदर्य के परिहास का एक अन्यतम नमूना भर नहीं लगती यह कविता? इसी प्रकार इनकी एक कविता है - मेरा बॉयफ्रेंड। यह एक निबंध-शैली की कविता है। कवयित्री“अनमैच्युर सेक्स” के आकर्षण से बिंधी हुई इस कविता में कहना क्या चाहती है, यह हमारे विज्ञ आलोचक ही बताएँगे-

मेरा बॉयफ्रेण्ड एक दोपाया लड़का इन्सान है
उसके दो हाथ, दो पैर और एक पूँछ है...
मैं एक अच्छी गर्लफ्रेण्ड हूँ
मैं उसके मुंह में घुस रही मक्खियाँ भगा देती हूँ
मैंने उसके पेट पर मच्छर भी मारा है
मुझे उसे देख कर हमेशा हँसी आती है
उसके गाल बहुत अच्छे हैं
खींचने पर 5 सेण्टीमीटर फैल जाते हैं
उसने मुझे एक बिल्लू नाम का टेडी दिया है
हम दुनिया के बेस्ट कपल हैं


       इसी तरह, मध्यवर्गीय सोच और तर्जूबा  के पाठकों के बीच सराही गई इनकी एक अन्य कविता का जिक्र करना चाहूँगा –मेरे हॉस्टल के सफ़ाई कर्मचारी ने सेनिटरी नैपकिन फेंकने से इनकार कर दिया है।“ कविता को गौर से पढ़ें तो यह समाज के पुरुष वर्चस्ववाद को इंगित करने वाली बेहद घटिया और कुसंस्कारी सोच से पगी हुई कविता लगती है। कवयित्री के “गूँज रहे हैं कानों में वीर्य की स्तुति में लिखे श्लोक...” पर,

“हॉस्टल के सफ़ाई कर्मचारी ने सेनिटरी नैपकिन
फेंकने से कर दिया है इनकार
बौद्धिक बहस चल रही है
कि अख़बार में अच्छी तरह लपेटा जाए उन्हें
ढँका जाए ताकि दिखे नहीं ज़रा भी उनकी सूरत
करीने से डाला जाए कूड़ेदान में”
कि छोड़ दिया जाए
'जहाँ-तहाँ' अनावृत ...
पता नहीं क्यों?

यहाँ सवाल है कि मासिक धर्म तो स्त्रियों की प्राकृतिक कुदरती क्रिया है, वह भी हर महीने। पर जिस प्रसंग को उठा कर पुरुषवादी सोच और वर्चस्व को कविता में रूपाकार देने की कोशिश की गई है, उसकी अंतर्वस्तु इतनी उच्छृखलित है कि कविता का गहन अर्थ हमें यहाँ तक पहुंचा देता है कि स्त्रियॉं को समान दर्जा देने के लिए उनके मासिक धर्म के लत्ते से भी हमें प्यार होना चाहिए, चाहे वह करीने से डस्टबिन में न भी रखी गई हो और अनावृत भी क्यों न हो! यही सौंदर्य है शुभम श्री की कविताओं का जिस पर हमारे विद्वान आलोचकगण फिदा हो रहे हैं! लेकिन जब धूमिल लिखते है कि –

औरतें
योनि की सफलता के बाद
गंगा का गीत गा रही है
देह के अंधेरे में
उड़द और अजवाईन के सपनों का पौधा
उग रहा है” 

तो धूमिल की कविताओं का स्त्री-विरोधी ब्रह्म-ज्ञान हिन्दी के आलोचकों में जागृत हो उठता है। लोग पूछेंगे कि शुभम श्री की कविताओं की तुलना यहाँ धूमिल की कविताओं से क्यों की जा रही है? तो मैं पूछूंगा कि धूमिल की भाषा को इन आलोचकों ने कैसे नजरंदाज किया। धूमिल ने  जिस वक्त यह सब लिखा, शुभम श्री के ही लगभग समवयस्क थे! इसलिए यहाँ इनका यह तर्क नहीं ठहर सकता कि शुभम अभी बच्ची है कविता में। यहाँ यह बात शिद्दत से गौर की जानी चाहिए कि मैं शुभम श्री की काव्य-प्रतिभा को “चैलेंज” नहीं कर रहा, मैं तो उन महान समालोचकों, पुरस्कार के चयनकर्ता(ओं), इस कवयित्री के समर्थक-पाठकों और उस संभावना को चैलेंज कर रहा हूँ जिसे डॉ. जीवन सिंह का पराज्ञान उनको इस कवयित्री में कविता के भविष्य की अनुभूति से सिक्त कर रहा है। मुझे मजबूरन कहना पड़ता है कि इस विद्रूप समय में कविता को खराब करने का काम केवल रूपवादियों और सुविधाभोगियों ने ही नहीं किया है, बल्कि कई मार्क्सवादियों और लोकवादियों ने भी अपनी आलोचकीय मिथक, हठ और स्वार्थपरता के कारण उसकी अस्मिता-हरण करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी-सभ्यता की संयत-नकली भाषा में। इसलिए अब कविता की दशा-दिशा मात्र उसके सौन्दर्य-शास्त्र और चिंतन से नहीं तय जा सकती! इससे प्रबल चुक होने की सम्भावना बनती है। बदलते समय में पूँजी और उदारीकरण से ही हमारा सामना और विरोध नहीं, इनके विरोधियों के उस सियार-चाल से भी है जो मौका पा कर कभी भी अवसर भुनाने से नहीं चुकते और सामान्य कवियों को भी अपने कैरियर व यशोलाभ के लिए महान बना कर प्रस्तुत करते हैं जिससे उनका पूरा कविता-समय ही सवालों के घेरे में आ जाता है। नयी सदी की कविता की दशा-दिशा का यह पाठ बहुत रुचिकर, किन्तु सचमुच कविता का बेहद कठिन और अत्यन्तं सचेत हो कर चलने का समय है। पता नहीं आप मेरी बात से कितना इत्तेफ़ाक रखते हैं! पर इसका सबसे टटका उदाहरण शुभमश्री की 'पोएट्री मैनेजमेंट'कविता को लब्धप्रतिष्ठित कवि (....!) के द्वारा  'भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार' से सम्मानित करने की घोषणा है। हिन्दी भाषा और साहित्य को विरूपित करती यह कविता भाषा के स्तर पर हिन्दी के बजाय *हिंगलिश* भाषा की कविता है जिसका आविष्कार विज्ञापनवादियों ने अपने मतलब से किया। कम से कम हर सजग पाठक को एक बार पूरे ध्यान से भारत भूषण अग्रवाल कविता पुरस्कार के लिए चयनित कवयित्री शुभम श्री की कविता पोएट्री मैनेजमेंट को एक बार जरूर पढ़ लेना चाहिए ताकि उनके विचार पूरी खालिस तरीके से सामने आ सकें – यह रही पूरी कविता :

कविता लिखना बोगस काम है!
अरे फालतू है!
एकदम

बेधन्धा का धन्धा!
पार्ट टाइम!
साला कुछ जुगाड़ लगता एमबीए-सैमबीए टाइप
मज्जा आ जाता गुरु!
मने इधर कविता लिखी उधर सेंसेक्स गिरा
कवि ढिमकाना जी ने लिखी पूंजीवाद विरोधी कविता
सेंसेक्स लुढ़का
चैनल पर चर्चा
यह अमेरिकी साम्राज्यवाद के गिरने का नमूना है
क्या अमेरिका कर पाएगा वेनेजुएला से प्रेरित हो रहे कवियों पर काबू?
वित्त मंत्री का बयान
छोटे निवेशक भरोसा रखें!

आरबीआई फटाक रेपो रेट बढ़ा देगी
मीडिया में हलचल
समकालीन कविता पर संग्रह छप रहा है
आपको क्या लगता है, आम आदमी कैसे करेगा सामना इस संग्रह का?
अपने जवाब हमें एसएमएस करे
अबे, सीपीओ (चीफ पोएट्री ऑफिसर) की तो शान पट्टी हो जाएगी!
हर प्रोग्राम में ऐड आएगा
रिलायंस डिजिटल पोएट्री
लाइफ बनाए पोएटिक
टाटा कविता
हर शब्द सिर्फ़ आपके लिए
लोग ड्राईंग रूम में कविता टाँगेंगे
अरे वाह बहुत शानदार है
किसी साहित्य अकादमी वाले की लगती है
नहीं जी, इम्पोर्टेड है
असली तो करोड़ों डॉलर की थी
हमने डुप्लीकेट ले ली
बच्चे निबन्ध लिखेंगे
मैं बड़ी होकर एमपीए करना चाहती हूँ
एलआईसी पोएट्री इंश्योरेंस
आपका सपना हमारा भी है
डीयू पोएट्री ऑनर्स, आसमान पर कटऑफ
पैट (पोएट्री एप्टित्युड टेस्ट) की परीक्षाओं में
फिर लडकियाँ अव्वल
पैट आरक्षण में धांधली के खिलाफ
विद्यार्थियों ने फूँका वीसी का पुतला
देश में आठ ने काव्य संस्थानों पर मुहर
तीन साल की उम्र में तीन हज़ार कविताएँ याद
भारत का नन्हा अजूबा
ईरान के रुख से चिंतित अमेरिका
फ़ारसी कविता की परम्परा से किया परास्त!

ये है ऑल इण्डिया रेडिओ
अब आप सुनें सीमा आनंद से हिंदी में समाचार
नमस्कार!!
आज प्रधानमन्त्री तीन दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय काव्य सम्मेलन के लिए रवाना
इसमें देश के सभी कविता गुटों के कवि शामिल हैं
विदेश मंत्री ने स्पष्ट किया है कि भारत किसी भी कीमत पर काव्य नीति नहीं बदलेगा
भारत पाकिस्तान काव्य वार्ता आज फिर विफल हो गई
पाकिस्तान का कहना है कि इक़बाल, मंटो, और फ़ैज़ से भारत अपना दावा वापस ले
चीन ने आज फिर ने काव्यलंकारों का परीक्षण किया
सूत्रों का कहना है कि यह अलंकार फ़िलहाल दुनिया के सबसे शक्तिशाली
काव्य संकलन पैदा करेंगे
भारत के प्रमुख काव्य निर्माता आशिक़ आवारा जी का आज तड़के निधन हो गया
उत्तर प्रदेश में आज फिर दलित कवियों पर हमला
उधर खेलों में भारत में लगातार तीसरी बार
कविता अंत्याक्षरी का स्वर्ण पदक जीत लिया है
भारत ने सीधे सेटों में ६-५, ६-४, ७-२ से यह मैच जीता
समाचार समाप्त हुए!

आ गया आज का हिंदू, हिंदुस्तान टाइम्स, दैनिक जागरण, प्रभात ख़बर
युवाओं पर चढ़ा पोएट हेयर स्टाइल का बुख़ार
कवयित्रियों से सीखें ह्रस्व दीर्घ के राज़
३० वर्षीय एमपीए युवक के लिए घरेलू, कान्वेंट एजुकेटेड, संस्कारी वधू चाहिए
२५ वर्षीय एमपीए गोरी, स्लिम, लम्बी कन्या के लिए योग्य वर सम्पर्क करें

गुरु मज़ा आ रहा है
सुनाते रहो
अपन तो हीरो हो जाएँगे
जहाँ निकलेंगे वहीं ऑटोग्राफ़
जुल्म हो जाएगा गुरु
चुप बे
थर्ड डिविज़न एम ए
एमपीए की फ़ीस कौन देगा?
प्रूफ़ कर बैठ के
ख़ाली पीली बकवास करता है!

      कविता में भाषा का यह नवाचार नहीं, कवयित्री बाबूषा कोहली की भाषा की तरह महज एक खिलंदरीपन है जो साहित्य के बाहर की और टपोरी किस्म की भाषा है। यह बात अब पूरी तरह समझने के लायक है कि काव्यभाषा के प्रति नवाधुनिकतावादी दृष्टिकोण को डा. जीवन सिंह द्वारा प्रतिबद्धता की भाषा कहना इसकी सच्चाई को जानबूझ कर नकारना है। यह कविता कितनी मूर्त है या कितनी वायवीय, कितनी सपाट है या बिम्बात्मक, कितना जनवादी है, कितना अभिजनवादी या कला-उन्मुख, कितनी मध्यमवर्गीय संचेतना और कितना रचनात्मक आत्मसंघर्ष से युक्त है, कितना भाषाई सच हैं और कितनी वंचनाएँ, कितना आत्मगत है और कितना बाह्यगत ...इन सब उपादानों और जरूरी सवालों तक इस कविता में मात्र प्रयुक्त भाषा से ही हम प्रथमतः पहुँच सकते हैं जो यह सिद्ध करती है कि यह किसी कवि की भाषा हो ही नहीं सकती, यह तो मदारी या विज्ञापन की बेहद चलताऊ भाषा है जो हर तरह से गैर-साहित्यिक बोली-वाणी की श्रेणी मे आती है। कवयित्री की रचना के इस भाषाई जेनेटिक लक्षण की तारीफ करना कविता की भाषा का फौरी तौर पर बेड़ा-गर्क ही करना माना जाएगा । पोएट्री मैनेजमेंट जैसी अकेली कविता मे पचासों अँग्रेजी शब्दों को जबरन घुसेड़ कर और हिन्दी के साथ उसका घालमेल कर, न केवल हिन्दी भाषा को बदसूरत और अपमानित करने की कोशिश की गई है बल्कि यह भी कहने में कोई संकोच नहीं कि कविता के रूप और व्यंग्य की भाषाई चालबाजियों में डूबी कविताओं की अंतर्वस्तु और उसका रूप-सौंदर्य किसी भी तरह से जनवाद के दायरे में नहीं आता, न लोक की रूपाभा ही कहीं से प्रतिकृत होता दिखता है। यह पूरी तरह बुर्जुआ मानसिकता और सुविधाभोगी संस्कार से उपजी भाषा-कविता का अन्यतम नमूना है। युवा आलोचक उमाशंकर सिंह परमार ने इस पूरे पुरस्कार प्रकरण से दुखी होकर लिखा है कि उन्हे क्षमा कर दो भारतभूषण अग्रवाल। वो जानते हैं वे क्या कर रहे हैं। जिस हिंसक ईमानदारी के बूते वो आज बन बैठे हैं उसी हिंसक ईमानदारी से समझदारी का खतरनाक खेल रचा जा रहा है। हे भारत भूषण तुम नहीं हो लेकिन तुम्हारी यह दुर्दशा कविता खत्म करने का कलंक बन कर इतिहास मे चीखती रहेगी। इसी प्रकार युवाकवि और आलोचक भरत प्रसाद ने जीवन सिंह के विचारों का प्रतिवाद करते हुए उनसे कहा कि –आपके प्रति सम्मान रखते हुए, आपके इस निष्कर्ष का पुरजोर विरोध करना आवश्यक हो गया है। शुभम् की कविता में कविता है कहाँ? बस बेतरतीब, खिलंदड़ी सोच के वशीभूत फैली हुई मनमानी।शब्दों औऱ भावों की इस अराजकता को यदि आप नयापन कहते हैं, तब तो हर युवा कवि ऐसी महान कविता रचने में परम समर्थ है। नएपन के नाम पर मनोहर कहानियां टाइप कविता का समर्थन करना, साहित्य को संकट में डालना है।“ लेकिन जीवन सिंह जी ने उसका बहुत हल्के में जवाब दिया है कि “उसमें इस समय के यथार्थ की बुनियादी और गहरी समझ प्रकट हुई है जो प्रचलित ढर्रे से बहुत भिन्न है, इसलिए अटपटी लगती है।

      डॉ. जीवन सिंह का तर्क निराधार है क्योंकि इनकी यह समझ अन्य मेधावी कवियों के विषय में  भी आनी चाहिए थी जो कभी नहीं आई, इसलिए इसे प्रायोजित सोच की कुंठित मानसिकता मानने से कतई इनकार नहीं किया जा सकता !खैर... यही शुभंश्री की कविता और उसके भाषा की स्वायत्तता है जो कविता को काव्य-जगत की अंधेरी गली में ले जाती है –

साथ देगा मन
असंख्य कल्पनाएँ करूँगी
अपनी क्षमता को
आख़िरी बून्द तक निचोड़ कर
प्यार करूँगी तुमसे
कोई भी बन्धन हो
भाषा है जब तक
पूरी आज़ादी है
(जब तक भाषा देती रहेगी शब्द / शुभम श्री)

सुशील कुमार


सम्पर्क-

सुशील कुमार 
संपर्क :  सहायक निदेशक, प्राथमिक शिक्षा निदेशालय,
स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग,
एम डी आई भवन, धुर्वा, रांची 834004


मोबाईल –
0 90067 40311
0 94313 10216

टिप्पणियाँ

  1. सबसे पहले शुभम को बधाई. शुभम की कविता किसे पसंद नहीं आ रही और क्यों नहीं आ रही, इसको समझना मुश्किल है. भरत प्रसाद सर तो बहुत संवेदनशील कवि हैं. उमाशंकर जी को मैं ज्यादा नहीं जानता. लेकिन भरत सर, इस कविता में एक वैचारिक उत्तेजना तो है ही. घिसे पिटे बिम्ब-विधान का अतिक्रमण तो कर ही रही है. रामजी सर की पैनी नज़र की दाद देता हूँ. उन्होंने जो तथ्यात्मक भूल दिखाई है, उसे कविता के नए संस्करण में हटा लेना बेहतर होगा शुभम.

    जहाँ तक मेरी निजी राय है, ये कविता पसंद आई, लेकिन शुभम के पास इससे बहुत ही बेहतरीन कवितायेँ भी थीं, जिन पर पुरस्कार का हक़ शायद ज्यादा बनता था.

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  2. मुझे उदय प्रकाश जी से कोई शिक़ायत नहीं है. सबकी अपनी पसंद होती है. और भा भू अ पुरस्कार तो विवादों के लिए ही अब जाना जाने लगा है.

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  3. अच्छा लगा पक्ष विपक्ष विवादों की बहस के बीच पहली बार आपने शुभम की कविता पर विस्तार से न केवल बात की है बल्कि तर्क सहित कुछ सवाल भी उठाएं है। भाषा के साथ खिलवाड़ का अनुपम उदाहरण है यह कविता जिसे इसके पैरोकार एक क्रन्तिकारी तोड़फोड़ कह मदमा रहे हैं और उसे भविष्य की हिन्दी कविता का प्रमाण पत्र बाँट रहे हैं। आपने सही कहा हमारे लोक के ये कैसे चितेरे अग्रज हैं जो इस ध्वंस पर मुदित हो ताली बजा रहे हैं - नवनीत पाण्डेय

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    1. कविता के प्रजातंत्र में शुभम् श्री को अपनी आवाज बुलंद करने और प्रयोग करने का पूरा हक है।पर सवाल यहाँ शुभम् श्री की उस कविता को पुरस्कृत करने का है जो स्वयं
      कविता का माखौल है।किसी भी दृष्टि से आप इसे पढ़ और समझ लें।यह कविता निराश और हताश करती है।उदय प्रकाश जी को सार्वजनिक करना चाहिए की देश भर की पत्रिकाओं में प्रकाशित कितनी कविताओं को उन्होंने पढ़ा है।जिन कविताओं को पुरस्कार योग्य नहीं समझा गया उनमें क्या कमियां थीं।और पोएट्री मैनेजमेंट को किन उद्दात्त गुणों के कारण पुरस्कृत किया गया।अगर आप ये नहीं बता पा रहे हैं तो यकीनन आपने हिंदी कविता के साथ नाइंसाफी की है।उसका बड़ा नुकसान किया है।इस प्रकार का फासिस्ट रवैया साहित्य में अब बंद होना चाहिए।आप शुभम् श्री को पुरस्कार दीजिये और सैकड़ों दीजिये पर जरा सोचिये ये भारतभूषण अग्रवाल के नाम पर आप दे रहे हैं।शर्म,हया क्या हम बेंच खाएंगे।इस कविता को भारतभूषण जी के नाम पर पुरस्कृत कर हिंदी कविता की परम्परा की तौहीनी की है।वर्तमान को मूर्ख बनाया है और भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लगाने का काम किया है।

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  5. अनिल जनविजय जी ने इसे सस्ता ब्लाग और सस्ता लेख कह दिया है। हमें भी कविता अच्छी नहीं लगी। पर इस तरह का बयान वो भी साहित्यकारों का। गजब है। कविता के नाम ये जोड़ तोड़ चल रहा है। कविता की भाषा ऐसी है सामान्य लोगों ग समझ न पायें।

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  6. ये प्रयोगों का युग है | कोई नई बात नहीं ..हर युग में उसकी सोच, समकालीनता आदि के मद्दे नज़र बदलाव होते हैं, होने चाहिए | कहा जाता है बदलाव हमेशा अच्छा होता है लेकिन ( यदि कालगत प्रयोगधर्मिता बनाम बदलाव का हवाला दे इस वाक्य की मीमांसा करें तो ) ऐसा होना ज़रूरी नहीं |संगीत में रेमो फर्नांडीज़ ने रैप सोंग्स की शुरुवात की |ज़ाहिर है वो एक नई टेक्नीक थी नया प्रयोग था जमकर सराहा गया , तब से शंकर महादेवन के ‘’ब्रीथ्लैस’’ सोंग तक आते वो प्रयोग फेल हो गया और उसके स्थान पर लोक संगीत के आधुनिक वर्शन और सूफी बेस्ड गीतों ने लोगों का दिल जीता लेकिन अब....| पारसी थियेटर या नाट्यशास्त्र पर आधारित नाटक जो प्रायः भरत मुनि के शास्त्र पर बेस्ड होते थे ,वो परम्परा टूटते टूटते अब नुक्कड़ नाटक, एकल अभिनय, या कबीर के गीतों का नाट्यरूपांतरण तक पहुँच गयी |ज़ाहिर हैं प्रयोग आगे भी होते रहेंगे |प्रयोगवादिता तो हर काल की स्वाभाविक प्रक्रिया है लेकिन क्या इन प्रयोगों का कोई दीर्घगामी प्रभाव भी होगा ? ज़रूरी ये हैं | कह सकते हैं कि किसी भी विधा में बदलाव काल और रूचि सापेक्ष होता है |ये एक सतत प्रक्रिया है |अर्थात ‘’तोड़ फोड़ में तोड़ फोड़ ‘’|शुभम श्री की पुरस्कार समेत कुछ कवितायें पढ़ीं | पिछले दिनों कहानी विधा में ‘’बोल्ड कहानियों’’ की धूम रही ज्ञातत्व है कि जो स्वीकार्य/ अस्वीकार्य के तर्क झेलती रही | पुरस्कृत कवियत्री की कवितायें इसी ‘’बोल्ड परम्परा’’ का काव्यात्मक संस्करण कही जा सकती हैं |ये सही है कि ये ‘’बोल्ड बनाम क्रांतिकारी’’ कवितायें हिन्दी साहित्य के स्थापित कवियों को तुलनात्मक रूप से अधिक पसंद आईं |लेकिन शेष पाठकों की नापसंदगी को खारिज नहीं किया जा सकता | आदरनीय अर्चना वर्मा के लेख जिसमे वो पुरस्कृत कवयित्री के कविताओं की विशेषताओं के सन्दर्भ में ‘’नए’’ शिक्षार्थियों को संबोधित कर रही हैं|पाठक पूछना चाहेंगे ... क्या इसीलिये इसे कविता माना जाए क्यूँ कि....
    (1)-‘’कवयित्री ऐसा कुछ कर के दिखा रही है जैसा और कोई कर नहीं सका है। यानी कविता के बने बनाये ढाँचे में तोड़-फोड़। तो यह तो अप-टू-डेट वाला सन्दर्भ हुआ?‘’
    (पुनश्च)
    (2)-‘’कविता का बना बनाया ढाँचा और तोड़ फोड़?‘’
    (3)-यहाँ कविता से सम्बन्धित सुर्खियों में अप्रत्याशित दूरारूढ़ तुलनाएँ विस्मित करती हैँ?
    (4)-कविता की तरह पेश की गयी चीज़ को कविता न मानने का सवाल नहीं उठता?
    (5)- बने बनाये ढाँचे तो बीसवीं सदी में घुसने के साथ ही टूट फूट रहे हैँ लगातार?
    (6)-क्या ऐसा मानने का वक्त आ गया है कि साहित्य नामक सांस्कृतिक संरचना अपने संभावित विनाश का सामना कर रही है?
    (7)- ‘’(यदि)मान्यता एक "दी हुई" हुई चीज़ होती है, कोई अन्तरंग गुण नहीं ?’’क्या ये मान्यता (दी हुई चीज़) सिर्फ उनकी विरासत है जो इसे अनेकानेक उदाहरणों/ तर्कों में इसे ‘’श्रेष्ठतम ‘’ सिद्ध करने पर आमादा हैं ?



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  7. एक बेकार कही जाने वाली कविता जब इतना चर्चित हो रही है , तो वाक़ई कविता पर संकट के बादल दिखाई दे रहे हैं. :-)

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  8. बहुत ही उम्दा और गंभीर लेख! पुरस्कृत कविता व्हाट्स एप लायक चुटकुलेबाजी है।

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  9. अनवर सुहैल भाई की टिप्पणी :
    जबसे फेसबुक के माध्यम से हिंदी कविता ने संवाद के नए आयाम बनाये हैं. मैं जाने कब से ऐसी कविताएँ खोजा करता था जो पाठकों से संवाद करती हों. एक गैंग था हिंदी में जो कविता को दुरूह बनाता था और तर्कों से उन कविताओं को पुस्तकालयों में कैद हो जाने की सज़ाएँ दिया करता था. सोशल मीडिया और बोधि प्रकाशन जैसी संस्थाओं ने हिंदी कविता में परिमार्जन किया है. हुआ ये कि इन माध्यमों के ज़रिये कवि इस्लाह की परम्परा से जुड़े. उन्हें अपने विचारों को नापने का बैरोमीटर सोशल साइट्स में मिला. धडाधड कविता की किताबें छपने लगीं. कवि गोष्ठियों में कविता पढ़ी जाने लगीं. कवि एक ऐसी शैली विकसित कर रहे हैं जो पाठकों/श्रोताओं से संवाद करती है. इन कवियों ने भाषा को बिगाड़ा नहीं बल्कि एक ऎसी भाषा की वकालत की जो आम फहम हो और क्लिष्ट तोकतई न हो. इससे पूर्व कविता को समझाने के लिए अध्यापक लगाये जाते थे और फिर भी कविता समझ से बाहर हो जाती थी. तो कविता के इस रूप को हमारे पुरोधाओं ने मजाक बनाने के लिए किसी शुभाम्श्री की खोज की है...ये लोग कविता का विखंडन करना चाह रहे हैं और हम अब रात में हारमोनियम जैसे प्रतीकों से निजात चाहते हैं भाई...आपका आलेख सर आँखों पर...

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  10. अनवर सुहैल भाई की टिप्पणी :
    जबसे फेसबुक के माध्यम से हिंदी कविता ने संवाद के नए आयाम बनाये हैं. मैं जाने कब से ऐसी कविताएँ खोजा करता था जो पाठकों से संवाद करती हों. एक गैंग था हिंदी में जो कविता को दुरूह बनाता था और तर्कों से उन कविताओं को पुस्तकालयों में कैद हो जाने की सज़ाएँ दिया करता था. सोशल मीडिया और बोधि प्रकाशन जैसी संस्थाओं ने हिंदी कविता में परिमार्जन किया है. हुआ ये कि इन माध्यमों के ज़रिये कवि इस्लाह की परम्परा से जुड़े. उन्हें अपने विचारों को नापने का बैरोमीटर सोशल साइट्स में मिला. धडाधड कविता की किताबें छपने लगीं. कवि गोष्ठियों में कविता पढ़ी जाने लगीं. कवि एक ऐसी शैली विकसित कर रहे हैं जो पाठकों/श्रोताओं से संवाद करती है. इन कवियों ने भाषा को बिगाड़ा नहीं बल्कि एक ऎसी भाषा की वकालत की जो आम फहम हो और क्लिष्ट तोकतई न हो. इससे पूर्व कविता को समझाने के लिए अध्यापक लगाये जाते थे और फिर भी कविता समझ से बाहर हो जाती थी. तो कविता के इस रूप को हमारे पुरोधाओं ने मजाक बनाने के लिए किसी शुभाम्श्री की खोज की है...ये लोग कविता का विखंडन करना चाह रहे हैं और हम अब रात में हारमोनियम जैसे प्रतीकों से निजात चाहते हैं भाई...आपका आलेख सर आँखों पर...

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  11. डा. जीवन सिंह के टाइम लाइन से साभार :
    युवा कवि आलोचक सुशील कुमार से पुरानी दोस्ती है।हम दोनो एक दूसरे के विचारों को पसंद भी करते रहे हैं।लेकिन भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार जब से कवयित्री शुभम श्री को मिला है और मैंने उनकी कविता"पोएट्री मैनेजमेंट"की काव्य कला की तारीफ की तब.से वे मेरी स्थापनाओं से घनघोर असहमति ही नहीं जता रहे हैं वरन इसे मेरा विचलन भी बतला रहे है।संतोष चतुर्वेदी जी के ब्लॉग "पहली बार" पर उन्होंने मेरी स्थापनाओं को आधार बनाकर एक आलेख लिखा है।मैं उनका तहे दिल से स्वागत करता हूँ किन्तु उनके द्वारा शुभमश्री की कविताओं के बारे में की गई स्थापनाओं के प्रति अपनी विनम्र असहमति फिर से जाहिर करता हूँ।
    मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि कवयित्री ने जो बात व्यंजना में कहीं हैं उनको अभिधा में ही समझने का प्रयास क्यों चल रहा है ?शब्दों के अर्थ व्यक्त करने की एक प्रमुख शक्ति व्यंजना भी होती है जिसके आधार पर हमारे यहाँ एक पूरा ध्वनि सम्प्रदाय कायम हुआ, जिसकी कई मामलों में आज भी प्रतिष्ठा है।जब द्विवेदी युग में ज्यादातर अभिधा में लिखा गया तो छायावादियों ने लक्षणा का प्रयोग करके हिन्दी भाषा में एक नया शक्ति संचार किया।यह हर युग की जरूरतों के तहत हुआ है। आज जब मानवता ,नैतिकता, जातीयता,और सामान्य जन पर मुसीबतों का पहाड़ टूटा हुआ है तथा जीवन में मैनेजमेंट के अलावा कुछ बचा नहीं रह गया है।लगभग सभी लोगों को आवारा पूँजी और उसकी अपसंस्कृति की जद में ले लिया गया है।लोगों की भाषा... संस्कृति सब संकट के दौर से गुजर रहे है।हिंदी के सहज विकसित रूप को हिंग्लिश बना दिया जा रहा है।मीडिया, राजनीति, चुनाव, लोकतंत्र ,शादी, विवाह ,उत्सव सभी कुछ ठेकेदारों और दलालों के हाथों में लगभग चले गये हैं और कविता तक को इन बातों से नहीं बख्शा जा रहा है।एक जबरदस्त दुर्गति का शिकार है मानवता, तब उस पर बहुत सघन प्रहार की जरूरत है।एक विडम्बनपरक शैली और आज के नकलची मध्य वर्ग की भाषा और जीवन शैली पर चौतरफा तंज कसती हुई एक प्रहारक भाषा का इस्तेमाल कवयित्री करती है जिसमें खिल्ली उड़ाने के साथ उनका क्रोध भी शामिल है।उनकी कविताएं विदग्धतापूर्ण है और वक्र गति में चलने वाली हैं।वे अभिधा में विडम्बना की जो नकल उतारती हैं ,वह मुझे तो लाजवाब लगती हैंःअपने जमाने में निराला ने भी "कुकुरमुत्ता"कविता में कम नकल नहीं उतारी थी और उस समय हिंदी में जितना अँग्रेजी शब्दों का प्रयोग होता था वह भी मजाक उड़ाने के उद्देश्य से किया थाःतब से अब तक गंगा में बहुत पानी बह चुका है और दुनिया पैरों के बल चलने के बजाय और ज्यादा सिर के बल चलने लगी है।जहाँ तक धूमिल की कविता की भूमिका है ।अपने जमाने की जरूरत के अनुसार उन्होंने भी सीधे सीधे अभिधा में मोहभंग की भाषा शैली का प्रयोग किया है।उनकी इस भूमिका को कौन नकार सकता है।इस संदर्भ में सुशील जी से शायद ही मेरी कोई बातचीत हुई हो।जहाँ तक उनकी कविता पर लिखने का सवाल है,बहुतों ने उन पर लिखा है।किसी पर लिखना या न लिखना मनमर्जी का सवाल भी तो है।जहाँ तक लोक का सवाल है उसके जरूरी पझों को आज भी मानता हूँ। लोकदृष्टि में आज भी. मेरा विश्वास है लेकिन लोक के खूँटे से बँधा हुआ नहीं ह़ूँ।
    हाँ अन्त में अपना एक अनुभव और।कुछ समय पहले की बात है एक दिन अलवर से जयपुर किसी निजी काम से जा रहा था।रास्ते में बस को सरिस्का बाघ अभयारण्य से गुजरना पड़ता है।रास्ते में लाल,काले बन्दर यात्रियों द्वारा फैंके गए केले खाते दिखाई दे जाते हैं ।मेरे आगे वाली सीट पर एक दम्पत्ति अपने बेटे के साथ यात्रा कर रहा था।बच्चे ने बन्दर को केला खाते देखकर सहज भाव से कहा कि पापा देखो बन्दर केला खा रहा है। पिता ने उसे लगभग डाँटते हुए कहा कि नहीं सन , मंकी बनाना खा रहे हैं ऐसे बोलो।देखने में वह निम्न मध्य वर्गीय परिवार से रहे होंगे।कहने का मतलब यह है कि अब हमारी बोलचाल की यह भाषा होती जा रही है। अखबार तक इसी भाषा में लिखे जा रहे हैं।कुछ लोग ऐसा मानते भी हैं कि कविता बोलचाल की भाषा में लिखी जानी चाहिए।

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  12. इस विद्रूप समय में कविता को खराब करने का काम केवल रूपवादियों और सुविधाभोगियों ने ही नहीं किया है, बल्कि कई मार्क्सवादियों और लोकवादियों ने भी अपनी आलोचकीय मिथक, हठ और स्वार्थपरता के कारण उसकी अस्मिता-हरण करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी-‘सभ्यता की संयत-नकली भाषा में’।

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  13. ऊपर inside india ने मेरे आलेख के अंश को ही अपनी टिप्पणी के बतौर डाली है । धन्यवाद ।

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  15. मेरा उत्तर डा जीवन सिंह को  : डा जीवन सिंह का कहना मूल में यह है कि कवयित्री ने जो बात व्यंजना में कही है, उनको अमिधा में समझने का प्रयास चल रहा है अर्थात  कथ्य के वक्र भाव को सीधे सपाट रूप में ग्रहण किया जा रहा है , उसके निहितार्थ को समझने की चेष्टा नहीं की गई है । कोई भी कविता का सजग पाठक शुभम की कविताओं को पढ़कर डा सिंह के इस स्पष्टीकरण से शायद ही सहमत हो। उनकी कविताओं के भावार्थ और भाषाई कमजोरियों पर मेरे आलेख ही नहीं , विज्ञ पाठको की अनेक टिप्पणियों में इसका पूरा खुलासा किया गया जिसे यहाँ दोहराने की आवश्यकता प्रतीत नहीं होती। विचलन का आरोप इसलिए लगाया गया है क्योंकि ये कवितायेँ साहित्य के बाहर की चीज है , न केवल काव्यभाषा के स्तर पर बल्कि रूप और वस्तु के स्तर पर भी जिसमें जनवाद और लोक-प्रकृति मौजूद नहीं जिसकी डा सिंह ने अब तक की समालोचना में वकालत की है।  बोल चाल की भाषा का अर्थ भी यहाँ यह कतई नहीं माना जा सकता कि काव्यानुशासन बन्धनों से मुक्त होकर कविता किसी मदारी या टपोरी भाषा हो जाए । बिलकुल असहमत हूँ ।
                Jeevan Singh सर, आप। लोक के खूंटे से बंधे न हैं तो आजाद हैं आप.../अच्छा हुआ आपने खुद ही अपना स्टैंड क्लियर कर दिया । साहित्य जिन अनुशासनों से आबद्ध है वही उसकी मूल्यवत्ता है। अगर आप उन मूल्यों के बाहर जाना चाहते तो आपकी मर्जी। आप स्वतंत्र हैं। - सुशील कुमार

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  16. आपका आलेख भी पढ़ा और टिप्परणियाँ भी देखीं…
    पहली बात कि सन्तुलित और बेहतरीन लिखा है आपने…‘पोएट्री मैनेजमेंट’ जैसी लोक विरोधी कविता पर पूरी वैज्ञानिकता के साथ जो अकाट्य तर्क दिए हैं आपने, उन लोगों के पास इसका कोई जवाब नहीं होगा जिनकी कविता से लोक और उसका संघर्ष अस्सी के दशक में ‘कविता की वापसी’ के दौरान से ही ग़ायब था…और किसी के पास उसके होने का भ्रम था भी तो ‘घर का रास्ता’ या ‘अबूतर कबूतर’ तक या किसी के पास हद है कि जन-संघर्ष के साथ होने के बजाय एक कमरे में ही ‘उर्वर प्रदेश’ की तरह था…!

    दूसरी बात कि शुभम श्री की ‘पोएट्री मैनेजमेंट’ कविता पर पुरस्कार देने के पीछे मैं वह षड्यंत्र देख रहा हूँ, जो इनके द्वारा अपने वर्तमान में लोक को जीने और जी गई कलात्मकता के साथ कविता में रचने की क्षमता तो ग़ायब है ही, स्थिति भी ग़ायब है, के कारण इनके ‘गुबड़ी’ अस्तिव के ख़तरे में पड़ने के भय से उपजा है…कि लोक कविता की ताक़त इन्हें अच्छी तरह पता है क्या होती है…इसलिए ‘पोएट्री मैनेजमेंट’ जैसी भाषा की आवारा चाल में चटखारे लेती भोगवादी कविता के संरक्षण की आड़ में ये लोग, अपनी वृक्षता के साथ अपनी ज़मीन पर खड़ी, लोक कविता न रच पाने की अपनी कमज़ोरी ही छिपाने में सफल होना चाहते हैं…ताकि लोक कवि केन्द्र में न आएँ और इनकी मठाधीशी बरक़रार रहे…!

    तीसरी बात कि 1990 तक का समय देखिए…और इनकी कविताओं में ढूँढ़िए कि जब तक दुनिया दो ध्रुवीय थी तब इनकी कविताओं में सोवियत संघ के विघटन की आशंका और आनेवाले ख़तरे के प्रति आगाह कहीं है ? …उसके नाम पर धूर्तई है…अब सोचने की बात यह है कि तब ये बहुत बड़े ख़तरे से अनजान किस क्रान्ति के मॉडल के साथ जाग-सो रहे थे…ऐसे में स्पष्ट है कि जो ख़ुद क्रान्ति-स्वप्न में नहीं, बल्कि क्रान्ति-सुख में जीते रहे हों, उनसे गुम्फन में ‘घुरघुरवा-चाल’ के सिवाय और क्या उम्मीद की जा सकती है…यही कारण है कि सोवियत विघटन के बाद हमने कई प्रगतिशीलों को भयानक रूप से विचलित होते हुए देखा और आज भी देख रहे हैं, जिसके एक उदाहरण के रूप में ‘पोएट्री मैनेजमेंट’ जैसी कविता पर निर्णय लेने और उसमें नए मानदण्ड् ढूँढ़नेवाले धुरन्धार कवि-आलोचक हमारे सामने हैं…!

    यह निर्णय पूरी तरह, किसानों-मज़दूरों के श्रम-सौन्दर्य, सरोकारों और रोज़ घुट-घुट कर मरने-जीने की हाशिए की कविता से विमुख हो, पेटभरू लोगों और उनकी दुनिया की कविता रचने के लिए एक लालच की तरह है…जो पूरी तरह आधुनिक नहीं, उस देश में शर्मनाक ही नहीं, बल्कि एक निहायत ही नीच कर्म की तरह है…!

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  17. Yogendra Krishna

    सहमत हूं। भाषा की अराजकता में कथ्य ने भी दम तोड़ दिया है। लोगों ने पक्ष में यह भी मत व्यक्त किया है कि पुरस्कृत कविता कविता के रूढ़ प्रतिमानों और सौन्दर्यशास्त्र में अपेक्षित तोड़-फोड़ के साथ उपस्थित हुई है। लेकिन प्रश्न यह भी है कि क्या इस तोड़-फोड़ के बाद कोई नई निर्मिति भी दिखती है। इस तोड़-फोड़ में मुझे कोई निर्मिति नहीं, केवल मलवे दिख रहे हैं...

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  18. Suneet Mishra

    शुभम श्री की कुछ कविताएँ पढ़ी हैं मैंने। उनकी सभी कविताओं को ख़ारिज नहीं किया जा सकता, लेकिन जिस कविता पर पुरस्कार दिया गया है और जिससे काव्य सौन्दर्य के बदलाव को चिह्नित किया जा रहा है, मुझे तो वह किसी भी कोण से कविता ही नहीं लगती। कविता के स्टाइल बदलने से सौन्दर्यबोध नहीं बदल जाते, उसके कंटेन्ट भी मायने रखते हैं। निराला ने नए प्रयोग किये थे, तो उनके कंटेन्ट भी बहुत प्रभावी थे। निराला का उदाहरण देकर शुभम श्री के पक्ष में खड़े लोगों को यह ध्यान देना चाहिए कि व्यक्ति के द्वारा अभिव्यक्त हर वाक्य कविता नहीं हो सकती।

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  19. राजकिशोर राजन

    कविता के प्रजातंत्र में शुभम् श्री को अपनी आवाज बुलंद करने और प्रयोग करने का पूरा हक है।पर सवाल यहाँ शुभम् श्री की उस कविता को पुरस्कृत करने का है जो स्वयं
    कविता का माखौल है।किसी भी दृष्टि से आप इसे पढ़ और समझ लें।यह कविता निराश और हताश करती है।उदय प्रकाश जी को सार्वजनिक करना चाहिए की देश भर की पत्रिकाओं में प्रकाशित कितनी कविताओं को उन्होंने पढ़ा है।जिन कविताओं को पुरस्कार योग्य नहीं समझा गया उनमें क्या कमियां थीं।और पोएट्री मैनेजमेंट को किन उद्दात्त गुणों के कारण पुरस्कृत किया गया।अगर आप ये नहीं बता पा रहे हैं तो यकीनन आपने हिंदी कविता के साथ नाइंसाफी की है।उसका बड़ा नुकसान किया है।इस प्रकार का फासिस्ट रवैया साहित्य में अब बंद होना चाहिए।आप शुभम् श्री को पुरस्कार दीजिये और सैकड़ों दीजिये पर जरा सोचिये ये भारतभूषण अग्रवाल के नाम पर आप दे रहे हैं।शर्म,हया क्या हम बेंच खाएंगे।इस कविता को भारतभूषण जी के नाम पर पुरस्कृत कर हिंदी कविता की परम्परा की तौहीनी की है।वर्तमान को मूर्ख बनाया है और भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लगाने का काम किया है।

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  20. नासिर अहमद सिकन्दर

    लेख अच्छा लगा। धूमिल के उद्धरण काबिले गौर हैं क्यों की उस वक़्त सबसे ज़ियादा एतराज़ इसी भाषा पर हुआ था जबकि वहाँ सत्ता के खिलाफ सबसे ज़्यादा गुस्सा था।यहां तो ऐसा कुछ भी नही। हमारी कविता के आंदोलन धर्मी सरोकार ऐसे न थे।अभी तो2साल सरकार के पुरे हुए हैं अगले 5 साल और आ गयी तो क्या होगा सोचकर घबराता हूँ कवियों निर्णायकों आलोचकों।


    Sushil Kumar

    सही सर। मैंने धूमिल जी का पूरा साहित्य और उनकी आलोचना भी पढ़ी है । जिस कवि अशोक बाजपेयी साहब ने *संसद से सड़क तक* किताब पर आमुख लिखा था उन्होंने ने ही अपनी आलोचना पुस्तक *पूर्वग्रह* में कवि धूमिल के काव्य भाषा की घोर निंदा की, अराजक कहा बहुत लोगों ने और धूमिल की चेतनामयी काव्य भाषा को नजरअंदाज किया गया ।आज उन्हीं लोगों के द्वारा छिछले लिखने वाले कवि- कवयित्री को आगे किया जा रहा है /यह क्या राजनीति नहीं तो और क्या है?

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  21. नासिर अहमद सिकन्दर लेख अच्छा लगा।धूमिल के उद्धरण काबिले गौर हैं क्यों की उस वक़्त सबसे ज़ियादा एतराज़ इसी भाषा पर हुआ था जबकि वहाँ सत्ता के खिलाफ सबसे ज़्यादा गुस्सा था।यहां तो ऐसा कुछ भी नही।हमारी कविता के आंदोलन धर्मी सरोकार ऐसे न थे।अभी तो2साल सरकार के पुरे हुए हैं अगले 5 साल और आ गयी तो क्या होगा सोचकर घबराता हूँ कवियों निर्णायकों आलोचकों।
    Unlike · Reply · 9 · August 6 at 11:21pm
    Sushil Kumar


    सही सर। मैंने धूमिल जी का पूरा साहित्य और उनकी आलोचना भी पढ़ी है। जिस कवि अशोक बाजपेयी साहब ने *संसद से सड़क तक* किताब पर आमुख लिखा था उन्होंने ने ही अपनी आलोचना पुस्तक *पूर्वग्रह* में कवि धूमिल के काव्य भाषा की घोर निंदा की, अराजक कहा बहुत लोगों ने और धूमिल की चेतनामयी काव्य भाषा को नजरअंदाज किया गया ।आज उन्हीं लोगों के द्वारा छिछले लिखने वाले कवि- कवयित्री को आगे किया जा रहा है /यह क्या राजनीति नहीं तो और क्या है?

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  22. राजन 'विरूप'

    पहले सब कुछ छोड़िए, ये बताया जाए कि सरकार से पुरस्कार लेने का क्या मतलब है। शुभम् श्री से लेकर काशी बाबा तक स्टेट से पुरस्कार लेते है और जनता की बात करते हैं। दलाली का कारखाना खुल गया है। मुजफ्फरनगर दंगों में सपा की भूमिका सबने देखी है। पुरस्कारू लोग बड़े जल्दी भूल जाते हैं इन सब बातों को। दरअसल सरकार पुरस्कार देकर साहित्यकारों को बधिया करती है।

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  23. संजना तिवारी

    मजाक नही है ऐसी बकवास लिखना ,, और एक हम लोग हैं जो समझ ही नही पा रहे हैं �� बाकि उदाहरण के लिये दी हुई कविताओं में तो कवियत्री ने कविता का ब्रह्माण्ड रच दिया है .... दूदू पिएगी बूबू

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  24. Vijendra Kriti Oar

    मुझे अपने लेखक साथिओं की इस बहस पर आश्चर्य है. इतनी कमजोर, बेमानी और अनर्गल कविता पर इतनी चर्चा ! इस से बेहतर होता हम किसी अच्छी कविता को सामने रख बात करते. ऐसा कचरा हिंदी कविता के नाम से चलन में खूब है. पर उसपर इस तरह की चर्चा उसे महत्व पूर्ण बना देती है . Let us ignore such rubbish . i यह कविता नहीं बल्कि उसका मजाक है. मेरा खासतौर से गंभीर और लोकधर्मी समीक्षक सुशील से विनम्र निवेदन है कि ऐसी अनर्गल कविता पर इतनी गंभीरता से न बात करें . उत्कृष्ट कविता ऐसे कचरे में दबी जारही है / उसे बचाएं / यह कामअधिक मूल्यवान होगा और इतिहास में याद किया जायेगा. आज खराब कविता से उत्कृष्ट कविता को अलगाना कठिन होता जा रहा है/ खराब कविता पर लिखी अच्छी समीक्षा भी खराब होती है जो अधिक खतरनाक है. हिंदी समीक्षा के इस अंध समय में समीक्षक का फ़र्ज़ बहुत अधिक हो गया है.

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  25. Sawai Singh Shekhawat

    धूमिल वाला आपका तर्क बहुत वज़नदार है। रही बात रीतिवाद के आधुनिक संस्करण की तो ऐसा कहना स्वयं रीतिकाल का अपमान है। यह कविता निरा और निरर्थक वितंडा है।

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  26. Ravi Ranjan

    Sushil भाई!
    आपका आलेख आद्यंत पढ़ा...पढ़ते वक्त बस यही लगता रहा कि शुभम श्री की इतनी घटिया "पंक्तियों" (कविता नहीं) के लिए इतनी गंभीर समीक्षा...!
    आदरणीय कवि Vijendra जी ने बहुत बढ़िया सलाह दिया है कि इस बहस के जंजाल में बढ़िया कविता चर्चा पाने से बेखबर रह जाती है...इन उदय प्रकाशों की यही मैनेजमेंट बन गयी है....

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  27. Shambhu Badal

    (2)कवयित्री शुभम श्री की 'पोएट्री मैनेजमेंट' को पुरस्कृत कर इसे चर्चित बनाना भी एक तरह का प्रबन्धन है। यहाँ छिपा उद्देश्य है,नवीनता के मुखौटे में ऐसी रचनाओं को बढ़ावा दे कर रचनाकर्मियों को दिशा-विशेष में ले जाने की चेष्टा करना,उन्हें व्यस्त रखना ताकि पूँजी- संचय, भोगवाद के विरुद्ध आवाज तेज न हो सके ,बडी पूँजी, भोग को आकर्षक रूप में कविता के केन्द्र में लाकर उसके प्रति जन-मानस में ललक उत्पन्न की जा सके, शोषण को सह्य बनाया जा सके।कला के क्षेत्र में पूँजी का यह बडा़ अौर बारीक हमला है। यहाँ पूँजी ,भोग के विरुद्ध लेखन को मजाक का विषय बनाया जाता है;परम्परा, लीक,खूँटा-जैसे शब्दों के प्रयोग द्वारा उपहास किया जाता है। जबकि सचाई है कि वैसे लोग पूँजी,भोग ,उच्छृंखलता की परम्परा,लीक, खूँटे से स्वयं बन्धे होते हैं। वैचारिक शक्ति का मखौल उडा़ना उनकी नियति है।रचनाकार जाने-अनजाने इसके शिकार हो रहे हैं।इस तरह की कविता का बीज-वपन अौर उसका पोषण भारतीय समाज की रचनात्मक सुदृढ़ता को उच्छृंखलता की अोर ठेल कर इसे जनपक्षधर ' 'विचारों 'से अलग करना है।कवि-कथाकार उदय प्रकाश का निर्णय कहाँ से, कैसे, किस विवेक से प्रभावित है,उदय प्रकाश का मन इसे अच्छी तरह जानता है।जनपक्षधर आलोचकों ,रचनाकारों को विशेष रूप से सचेष्ट रहने की जरूरत है।'युवा चिड़िया' फँसे नहीं,भ्रम-जाल को काटते हुए इसे तेज आवाज के साथ तेजी से आगे बढ़ना है।तेज आवाज कविता के अन्दर की चुम्बकीय, विद्युत - ध्वनि होती है।कवि-आलोचक सुशील कुमार ने यहाँ अपने आलेख में सही मुद्दे उठाये हैं,जिन्हें उन्होंने उत्तेजक भाषा-शैली में रखा है।इस उत्तेजना के मूल में जन,हिन्दी भाषा,कविता के प्रति उनका सघन प्रेम है।

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  28. Shambhu Badal ��

    (1) कविता मूलत: अौर अन्तत: अनुभूति अौर शब्दों का प्रबन्धन है।बात, या कहें भाव ,विचार,कल्पना या सोच जब प्रबन्धित शब्दों के द्वारा अपनी खास लय में व्यक्त किये जाते हैं तो कविता बनती है।सफल,महान कवि वस्तुत: सफल,महान प्रबन्धक होता है।यहाँ कवि का,प्रबन्धक का संचालन उसके भावना-विवेक करते हैं,जिसमें भाव ,बुद्धि, प्रतिभा के तत्व प्रधान होते हैं।इस तरह कविता प्रबन्धन न होकर प्रबन्धन का परिणाम होती है।भावना-विवेक जब जन, लोक से प्रभावित होकर कवि का संचालन करते हैं तो कविता जन,लोक के साथ होती है अौर ये ही जब पूँजी, सम्भ्रान्तता से प्रभावित होकर कवि का संचालन करते हैं तो कविता पूँजी,सम्भ्रान्तता के साथ होती है। यहाँ एक तरह का चातुर्य होता है,जो जन,लोक,इनके साथ की कविता को चेतन-अचेतन रूप से दिग्भ्रमित करने का प्रयत्न करता है।उनकी प्रभावकारी भोगवादी प्रवृत्तियों, शक्तियों के कारण नयेपन के नाम पर ड्रम,डी. जे. खूब बजाये जाते हैं ताकि सामान्य जन की आवाज साफ-साफ, खुल कर सामने न आ पाये,सुनाई न दे,दब कर रह जाये।यहाँ ऊर्जस्वित रचनाकारों ,युवा रचनाकारों को प्रभावित करने,फाँसने के लिए तरह-तरह के प्रबन्ध किये जाते हैं।

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