हारुकी मुराकामी की अनुदित जापानी कहानी 'आईना', अनुवाद - सुशांत सुप्रिय



हारुकी मुराकामी

सुशान्त सुप्रिय न केवल एक कवि हैं बल्कि वे एक बेहतर अनुवादक भी हैं। सुशान्त जी ने विश्व के अनेक साहित्यकारों की रचनाओं को हिन्दी में अनुदित कर हिन्दी के पाठकों को उससे परिचित करने का एक बड़ा काम किया हैआज हम उनकी एक जापानी अनुदित कहानी प्रस्तुत कर रहे हैं जो मूलतः हारुकी मुराकामी की है। तो आइए पढ़ते हैं हारुकी मुराकामी की जापानी कहानी 'आईना', जिसे पहली बार के पाठकों के लिए अनुदित किया है सुशान्त सुप्रिय ने।       

(अनूदित जापानी कहानी)
 
आइना
 
मूल लेखक : हारुकी मुराकामी
अनुवाद : सुशांत सुप्रिय


आज रात आप सब जो कहानियाँ सुना रहे हैं, उन्हें दो श्रेणियों में रखा जा सकता है। एक तो वे कहानियाँ हैं जिन में एक ओर जीवित लोगों की दुनिया है, दूसरी ओर मृत्यु की दुनिया है, और कोई शक्ति है जो एक दुनिया से दूसरी दुनिया में आना-जाना सम्भव बना रही है। भूत-प्रेत आदि भी इसी श्रेणी में आते हैं। दूसरी तरह की कहानियों में परा-भौतिक क्षमता, पूर्वाभास और भविष्यवाणी करने की क्षमता शामिल है। आप सब की सारी कहानियाँ इन्हीं दो श्रेणियों से सम्बंधित हैं।
 
असल में आप लोगों के सारे अनुभव भी लगभग इन्हीं दो श्रेणियों में रखे जा सकते हैं। मेरे कहने का अर्थ है, जिन लोगों को भूत दिखते हैं, उन्हें केवल भूत ही दिखते हैं। उन्हें कभी किसी अनहोनी का पूर्वाभास नहीं होता। दूसरी ओर, जिन्हें ऐसा पूर्वाभास होता है, उन्हें कभी भूत नहीं दिखते। मुझे नहीं पता, ऐसा क्यों है।
 
शायद यह पहली या दूसरी बात के प्रति आपके व्यक्तिगत झुकाव की वजह से हो। कम से कम मुझे तो यही लगता है।
 
पर कुछ लोग इन दोनो में से किसी श्रेणी में नहीं आते। उदाहरण के लिए मुझे ही ले लें। अपने तीस बरस की उम्र में मैंने कभी कोई भूत नहीं देखा, न ही मुझे कभी कोई पूर्वाभास हुआ, या भविष्यवाणी करने वाला कोई सपना ही आया। एक बार मैं एक लिफ़्ट में कुछ मित्रों के साथ था। उन्होंने क़सम खा कर कहा कि लिफ़्ट में हमारे साथ एक भुतही परछाईं भी थी। पर मुझे कुछ भी नहीं दिखा। उन्होंने दावा किया कि मेरे ठीक बगल में सलेटी वस्त्र पहने एक महिला की धुँधली आकृति मौजूद थी। पर हमारे साथ कोई महिला उस लिफ़्ट में थी ही नहीं। कम-से-कम मुझे तो कोई आकृति नहीं दिखी। मैं, और मेरे दो अन्य मित्र -- हम तीन ही उस लिफ़्ट में मौजूद थे। मैं मज़ाक नहीं कर रहा। और मेरे ये दोनो मित्र ऐसे लोग नहीं थे जो मुझे डरा कर बेवक़ूफ़ बनाने के लिए झूठ बोलें। तो यह सारा मामला बेहद असामान्य था, पर असली बात यही है कि मुझे आज तक कोई भूत दिखाई ही नहीं दिया।
 
पर एक बार की बात है -- केवल एक बार -- जब मुझे ऐसा डरावना अनुभव हुआ था कि मेरी घिग्घी बँध गई थी। इस भयावह घटना को घटे दस बरस से भी ज़्यादा अरसा हो गया, पर मैंने कभी किसी को इसके बारे में कुछ नहीं बताया। मैं इस घटना का ज़िक्र करने के ख़्याल से भी डरता था। मुझे लगता था कि उल्लेख मात्र से यह घटना दोबारा घटित होने लगेगी। इसलिए मैं इतने साल चुप रहा। लेकिन आज रात आप सभी ने अपना-अपना कोई भयावह अनुभव सुनाया है, और मेज़बान होने के नाते मेरा भी यह फ़र्ज़ है कि मैं अपना ऐसा ही कोई अनुभव आप सबको सुनाऊँ। तो प्रस्तुत है मेरे उस डरावने अनुभव की कहानी :

1960 के दशक के अंत में छात्र-आंदोलन अपने पूरे शबाब पर था। यही वह समय था जब मैंने विद्यालय की शिक्षा पूरी कर ली। मैं ' हिप्पी पीढ़ी ' का हिस्सा था, इसलिए मैंने आगे की पढ़ाई के लिए विश्वविद्यालय में दाख़िला लेने से इंकार कर दिया। इसकी बजाए मैं जापान भर में घूम-घूम कर जगह-जगह श्रमिकों के लिए उपयुक्त नौकरियाँ करता रहा। मुझे पक्का यक़ीन हो गया  था कि जीवन जीने का सबसे सही तरीका मेहनत-मज़दूरी करना ही था। मेरे ख़्याल से आप मुझे युवा और अधीर कहेंगे। आज पीछे मुड़ कर देखने पर मुझे लगता है कि उस समय मैं एक मज़ेदार जीवन जी रहा था। ऐसे जीवन का मेरा चुनाव चाहे सही था या ग़लत, यदि मुझे फिर से चयन का मौक़ा मिलता तो मुझे पूरा यक़ीन है कि मैं दोबारा वही जीवन चुनता।
 
पूरे देश में घूमते रहने के मेरे दूसरे बरस के पतझर के दौरान मुझे कुछ महीने के लिए एक विद्यालय में रात के चौकीदार की नौकरी मिली। यह विद्यालय निगाता क्षेत्र के एक छोटे-से शहर में था। गर्मियों में लगातार मेहनत-मज़दूरी वाला काम करने की वजह से मैं बेहद थकान महसूस कर रहा था। इसलिए मैं कुछ समय के लिए थोड़ी आसान-सी नौकरी चाहता था। रात के समय चौकीदार का काम करने के लिए विशेष कुछ नहीं करना पड़ता। दिन के समय मैं स्कूल के परिचारक के दफ़्तर के एक कमरे में सो जाता था। रात में मुझे केवल दो बार पूरे विद्यालय का चक्कर लगा कर यह सुनिश्चित करना होता था कि सब कुछ ठीक है। बाक़ी बचे समय में मैं संगीत सुनता, पुस्तकालय में जा कर किताबें पढ़ता और जिम में जा कर अकेले ही बास्केटबॉल खेलता। किसी स्कूल में पूरी रात अकेले रहना इतना बुरा भी नहीं होता। क्या मैं भयभीत था? बिलकुल नहीं। जब आप अठारह या उन्नीस साल के होते हैं तो आपको किसी चीज़ की परवाह नहीं होती।
 
मुझे नहीं लगता कि आप में से किसी ने रात में चौकीदार के रूप में काम किया होगा, इसलिए मुझे आपको चौकीदार के काम-काज के बारे में बता देना चाहिए। आपको रात में रखवाली करते हुए दो चक्कर लगाने होते हैं -- एक नौ बजे और दूसरा तीन बजे। यही आपका कार्यक्रम होता है। जिस विद्यालय में मुझे नौकरी मिली थी, उसकी एक पुख़्ता तिमंज़िला इमारत थी। उसमें लगभग बीस कमरे थे। यह एक बहुत बड़ा स्कूल नहीं था। कक्षा के कमरों के अलावा संगीत-शिक्षण के लिए एक कमरा था, कला-शिक्षण के लिए एक स्टूडियो था और एक विज्ञान-प्रयोगशाला थी। इसके अतिरिक्त शिक्षकों के बैठने के लिए एक बड़ा कमरा था और प्रधानाचार्य का दफ़्तर था। कॉफ़ी पीने की एक दुकान, एक तरण-ताल, एक व्यायामशाला और एक नाट्यशाला भी विद्यालय का हिस्सा थे। रात में दो बार इन सब का चक्कर लगाना मेरे काम में शामिल था।
 
जब मैं रात में रखवाली करते हुए स्कूल में चक्कर लगा रहा होता, तो मैं साथ-साथ एक बीस-सूत्री जाँच-सूची पर भी निशान लगाता चलता। शिक्षकों के बैठने का कमरा -- सही ... विज्ञान-प्रयोगशाला -- सही ... मुझे लगता है, मैं परिचारक के कमरे के बिस्तर पर बैठे-बैठे भी सही के निशान लगा सकता था। तब मैं रात में विद्यालय का चक्कर लगाने की ज़हमत से बच जाता। लेकिन मैं इतना ग़ैर-ज़िम्मेदार व्यक्ति नहीं था। यूँ भी विद्यालय का चक्कर लगाने में ज़्यादा समय नहीं लगता था। इसके अलावा, यदि कोई रात में चोरी के इरादे से स्कूल में घुस आता तो जवाबदेही तो मेरी ही बनती।
 
जो भी हो, हर रात मैं दो बार -- नौ बजे और तीन बजे, रखवाली करते हुए पूरे विद्यालय का चक्कर लगाता था। मेरे बाएँ हाथ में टॉर्च होती, जबकि दाएँ हाथ में लकड़ी की एक पारम्परिक तलवार होती। मैंने अपने स्कूल के दिनों में पारम्परिक तलवारबाज़ी सीखी थी, इसलिए मुझे किसी भी हमलावर को भगा देने की अपनी योग्यता पर पूरा भरोसा था। यदि कोई हमलावर पेशेवर नहीं होता और उसके पास असली तलवार होती, तो भी मैं उससे नहीं घबराता। याद रखिए, उस समय मैं युवा था। अगर आज की तारीख़ में ऐसी कोई बात हो जाए, तो मैं ज़रूर वहाँ से भाग जाऊँगा। 

ख़ैर! यह घटना अक्टूबर महीने की एक तूफ़ानी रात में घटी। असल में, साल के इस माह के हिसाब से मौसम बेहद उमस भरा था। शाम से ही मच्छरों के झुंड मँडराने लगे। मुझे याद है, मैंने मच्छरों को भगाने वाली कई टिकिया जलाई ताकि इन बदमाशों को दूर रखा जा सके। बाहर आँधी का कर्ण-भेदी शोर था। तरण-ताल का दरवाज़ा टूटा हुआ था और तेज़ हवा में खटाखट बज रहा था। मैंने सोचा कि कील ठोक कर दरवाज़े को दुरुस्त कर दूँ, लेकिन बाहर घुप्प अँधेरा था। इसलिए वह दरवाज़ा सारी रात यूँ ही बजता रहा।

 
उस रात नौ बजे रखवाली के लिए लगाए गए स्कूल के चक्कर में सब ठीक-ठाक रहा। मैंने जाँच-सूची के सभी बीस मदों पर सही का साफ़ निशान लगा दिया। सभी कमरों के दरवाज़ों पर ताला लगा था और हर चीज़ अपनी जगह पर थी। कहीं कुछ भी अजीब नहीं लगा। मैं वापस परिचारक के कमरे में गया, जहाँ मैंने घड़ी में तीन बजे उठने के लिए अलार्म लगाया। बिस्तर पर लेटते ही मुझे नींद आ गई।
 
तीन बजे अलार्म बजने पर मैं जग तो गया लेकिन मुझे कुछ अजीब महसूस हो रहा था। मैं आप को ठीक से यह समझा नहीं सकता, लेकिन मुझे कहीं कुछ अलग-सा लगा। मेरा उठने का मन भी नहीं हो रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे कोई चीज़ बिस्तर से उठने की मेरी इच्छा को दबा रही थी। आम तौर पर मैं उछल कर बिस्तर से उठ खड़ा होता हूँ, इसलिए मैं भी कुछ नहीं समझ पा रहा था। मुझे जैसे खुद को धक्का दे कर बिस्तर से उठाना पड़ा, ताकि मैं स्कूल की रखवाली वाला तीन बजे का चक्कर लगाने जा सकूँ। बाहर तरण-ताल का टूटा दरवाज़ा अब भी तेज़ हवा में बज रहा था, पर उसके बजने की आवाज़ अब पहले से अलग लग रही थी। कहीं-न-कहीं कुछ तो ज़रूर अजीब है -- बाहर जाने के प्रति अनिच्छुक होते हुए मैंने सोचा। किंतु फिर मैंने अपना मन बना लिया कि चाहे कुछ भी हो जाए, मुझे अपना काम करने जाना ही है। यदि आप एक बार अपने कर्तव्य से विमुख हो गए, तो आप बार-बार अपने कर्तव्य से विमुख होंगे, और मैं इस झमेले में नहीं पड़ना चाहता था। इसलिए मैंने अपनी टॉर्च और अपनी लकड़ी की तलवार उठाई और विद्यालय का चक्कर लगाने के लिए निकल पड़ा।
 
यह वाकई बहुत अजीब-सी रात थी। जैसे-जैसे रात गहरी हो रही थी, हवा की रफ़्तार बेहद तूफ़ानी होती जा रही थी, और हवा में नमी भी बढ़ती जा रही थी। मेरे शरीर में जगह-जगह खुजली होने लगी, और किसी भी चीज़ पर अपना ध्यान केंद्रित कर पाना मेरे लिए मुश्किल होने लगा। मैंने पहले व्यायामशाला, नाट्यशाला और तरण-ताल का चक्कर लगाने का निश्चय किया। वहाँ सब कुछ ठीक-ठाक था। तरण-ताल का अध-टूटा दरवाज़ा तूफ़ानी हवा में इस तरह लयहीन-सा बज रहा था जैसे उसे पागलपन का दौरा पड़ा हो। उसके बजने की आवाज़ डरावनी और अजीब लग रही थी।
 
स्कूल की इमारत के भीतर स्थिति सामान्य थी। मैं हर ओर देखते हुए अपनी बीस-सूत्री जाँच-सूची पर सही का निशान लगाता जा रहा था। हालाँकि मुझे कहीं कुछ अजीब लग रहा था, लेकिन वास्तव में अब तक ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था जिसे अजीब कहा जाता। चैन की साँस ले कर मैं परिचारक के कमरे की ओर लौटने लगा। मेरी जाँच-सूची में अब केवल अंतिम जगह 'विज्ञान-प्रयोगशाला' बच गई थी। यह प्रयोगशाला इमारत के पूर्वी हिस्से में कॉफ़ी पीने की दुकान के बगल में स्थित थी। परिचारक का कमरा यहाँ से ठीक उलटी दिशा में पड़ता था। इसका मतलब था कि लौटते हुए मुझे पहली मंज़िल के लम्बे गलियारे को पार करना था। वहाँ घुप्प अँधेरा था। जब आकाश में चाँद निकला होता, तो उस गलियारे में हल्की रोशनी होती थी। पर जब ऐसा नहीं होता, तो वहाँ कुछ भी दिखाई नहीं देता। उस रात भी घुप्प अँधेरे में आगे का रास्ता देखने के लिए मुझे टॉर्च की रोशनी का सहारा लेना पड़ रहा था। दरअसल मौसम विभाग के अनुसार उस इलाक़े में एक चक्रवात के आने का अंदेशा था। इसलिए चाँद दिखाई नहीं दे रहा था। बाहर आकाश में केवल बादलों की भीषण गड़गड़ाहट थी और नीचे ज़मीन पर तूफानी हवा का भयावह शोर था।
 
मैं और दिनों की अपेक्षा तेज़ी से उस गलियारे को पार करने लगा। मेरे जूतों में लगे रबड़ के फ़र्श पर हो रहे घर्षण से उस सन्नाटे में एक अजीब-सी आवाज़ पैदा हो रही थी। वह फ़र्श काई के रंग का था। मुझे आज भी याद है।
 
स्कूल का प्रवेश-द्वार आधा गलियारा पार करने के बाद आता था, और जब मैं वहाँ से गुज़रा तो मुझे लगा ... वह क्या था --? मुझे लगा जैसे मुझे अँधेरे में कोई चीज़ दिखी। मैं बुरी तरह घबरा गया। मेरे माथे और कनपटियों से पसीने की धारा बह निकली। तलवार की मूठ पर अपनी पकड़ मज़बूत करते हुए मैं उस ओर मुड़ा जिधर मुझे कुछ दिखा था। मैंने अपनी टॉर्च की रोशनी जूते रखने के खाने के बगल वाली दीवार पर डाली।
 
ओह! तो यह बात थी। दरअसल वहाँ एक आदमकद आइना रखा था जिसमें मेरा प्रतिबिम्ब नज़र आ रहा था। लेकिन पिछली रात तो यहाँ कोई आइना नहीं रखा था।  यानी कल दिन में ही किसी ने यह आइना यहाँ डाल दिया होगा। हे भगवान, मैं कितना घबरा गया था।
 
जैसा कि मैंने बताया, वह एक आदमकद आइना था। आइने में वह महज़ मेरा प्रतिबिम्ब था, यह देख कर मुझे थोड़ी राहत महसूस हुई। लेकिन साथ ही मुझे अपने बुरी तरह घबरा जाने की बात बेहद बेवक़ूफ़ाना लगी। तो सिर्फ़ यह बात थी -- मैंने खुद से कहा। क्या बेवक़ूफ़ी है! मैंने अपनी टॉर्च नीचे रख कर जेब से एक सिगरेट निकाली और सुलगा ली। मैंने एक गहरा कश ले कर उस आइने में अपने प्रतिबिम्ब की ओर निगाह डाली। बाहर सड़क से एक मद्धिम रोशनी खिडकी के रास्ते उस आइने तक पहुँच रही थी। मेरे पीछे स्थित तरण-ताल का अध-टूटा दरवाज़ा तूफ़ानी हवा में अब भी लयहीन-सा बज रहा था।
 
सिगरेट के कुछ गहरे कश लेने के बाद मुझे अचानक एक अजीब बात नज़र आई -- आइने में दिख रहा मेरा प्रतिबिम्ब दरअसल मैं नहीं था। बाहर से वह बिलकुल मेरी तरह लग रहा था, लेकिन यक़ीनन वह मैं नहीं था। नहीं, यह बात नहीं थी। वह 'मैं' तो था लेकिन कोई 'दूसरा' ही मैं था। कोई दूसरा मैं, जिसे नहीं होना चाहिए था। मुझे नहीं पता, मैं इसे आपको कैसे समझाऊँ। मुझे उस समय कैसा महसूस हो रहा था, यह बयान कर पाना कठिन है।
 
जो बात मैं समझ पाया वह यह थी कि आइने में मौजूद वह प्रतिबिम्ब मुझसे बेइंतहा नफ़रत करता था। उसके भीतर भरी घृणा अँधेरे समुद्र में तैर रहे किसी हिम-खंड-सी थी। एक ऐसी नफ़रत जिसे कोई कभी मिटा न सके।
 
मैं कुछ देर वहाँ हक्का-बक्का-सा खड़ा रह गया। मेरी सिगरेट मेरी उँगलियों से फिसल कर फ़र्श पर गिर पड़ी। आइने में मौजूद सिगरेट भी फ़र्श पर गिर पड़ी। एक-दूसरे को घूरते हुए हम वहाँ खड़े रहे। मुझे लगा जैसे किसी ने मेरे हाथ-पैर बाँध दिए हों। मैं हिल भी नहीं पा रहा था।
 
आख़िर उसका हाथ हिला। उसके दाएँ हाथ की उँगलियों ने उसकी ठोड़ी को छुआ, और फिर एक कीड़े की तरह धीरे-धीरे वे उँगलियाँ उसके चेहरे की ओर बढ़ीं। अचानक मैंने महसूस किया कि मेरी उँगलियाँ भी ठीक वैसी ही हरकतें कर रही थीं। गोया मैं आइने में बैठे व्यक्ति का प्रतिबिम्ब था और वह मेरी हरकतों पर कब्ज़ा करने की कोशिश कर रहा था।
 
भीतर से अपनी अंतिम शक्ति एकत्र कर के मैं ज़ोर से चीख़ा, और मुझे अपनी जगह पर जकड़ कर रखने वाले बंधन जैसे टूट गए। मैंने अपने हाथ में पकड़ी लकड़ी की तलवार ऊपर उठाई और उस आदमकद आइने पर ज़ोर से दे मारी।  मैंने काँच के चटख कर चूर-चूर होने की आवाज़ सुनी, पर अपने कमरे की ओर बेतहाशा भागते हुए मैंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा। कमरे में पहुँचते ही मैंने दरवाज़ा भीतर से बंद किया और बिस्तर पर पड़ी रज़ाई में घुस गया। हालाँकि मुझे अपनी जलती सिगरेट के वहाँ फ़र्श पर गिर जाने की चिंता हुई, पर अब मैं वहाँ वापस तो किसी हालत में नहीं जाने वाला था। बाहर तूफ़ानी हवा प्रचण्ड वेग से शोर मचाती रही। तरण-ताल का अधटूटा दरवाज़ा भी सुबह तक बौराया और लयहीन-सा उसी तरह बजता रहा ...
 
मुझे पूरा विश्वास है, आपने मेरी कहानी का अंत जान लिया होगा। दरअसल वहाँ कभी कोई आइना था ही नहीं।
 
सूर्योदय होने से पहले ही चक्रवात का क़हर ख़त्म हो चुका था। तूफ़ानी हवा चलनी बंद हो गई थी, और बाहर एक धुपहला दिन निकल आया था । मैं स्कूल के मुख्य द्वार पर गया। मेरी उँगलियों से फिसल कर गिर गई सिगरेट का टुकड़ा अब भी वहीं था। मेरी टूटी हुई तलवार भी वहीं पड़ी थी। लेकिन वहाँ कोई आइना नहीं था। टूटे हुए काँच के टुकड़े भी नहीं थे। बाद में पूछताछ करने पर मुझे पता चला कि वहाँ कभी किसी ने कोई आइना रखा ही नहीं था।
 
मैंने वहाँ जो देखा, वह भूत नहीं था। वह तो मैं ही था। मैं इस बात को कभी नहीं भूल पाता कि मैं उस रात कितना डर गया था । जब भी मुझे वह रात याद आती है, मेरे ज़हन में यही विचार कौंधता है : कि विश्व में सबसे डरावनी चीज़ हमारा अपना ही रूप है। आप इस के बारे में क्या सोचते हैं?

आपने पाया होगा कि यहाँ मेरे इस घर में एक भी आइना नहीं है। मेरी बात पर विश्वास कीजिए -- बिना आइने के दाढ़ी बनाना सीखना कोई आसान काम नहीं था।


सुशांत सुप्रिय

सम्पर्क

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वैभव खंड, इंदिरापुरम,
ग़ाज़ियाबाद - 201014

मोबाईल - 8512070086

ई-मेल : sushant1968@gmail.com

(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग वरिष्ठ कवि विजेन्द्र जी की है.)  

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