जीतेन्द्र कुमार की कहानी 'जकड़न'
जातिवादी जकडन से घिरे प्यारे लाल चौबे खेती कराने का जब उपक्रम करते हैं तो उनके सामने एक-एक कर तमाम समस्याएं आती हैं। इस कहानी के माध्यम से जीतेन्द्र कुमार न केवल जातिवादी जकड़न बल्कि कृषिगत जकड़नों की भी बात करते हैं। आधुनिकता की मार झेल रहा किसान किन द्वंदों से गुजर रहा है इसकी भी पड़ताल जीतेंद्र जी ने इस कहानी में की है। तो आईये पढ़ते हैं जीतेंद्र जी की यह कहानी।
जकड़न
उस दिन जनक मिस्त्री प्यारे लाल चौबे से
रामचंदर बाबा के बारे में ओरहन देने आरा आये। चौबे जी के आवास पर आये तो पता चला
कि वे गाँव गये हैं, कृषि वैज्ञानिक भवेश जी और पत्रकार अमन भार्गव
के साथ। जनक मिस्त्री मोहल्ले से बाहर होने वाले थे कि डॉ0 अशोक सान्याल के
क्लीनिक के निकट चौबे जी गाँव से लौटते दिखे उनको। औपचारिक दुआ-सलाम के बाद चौबे
जी ने जनक मिस्त्री से पूछा, ‘‘किधर चले जनक, हम तो गाँव हीं से आ रहे
हैं? कोई समस्या है?’’
प्यारे लाल चौबे के साथ दो अन्य शहरियों को
देख कर जनक मिस्त्री संकोच में पड़ गये। बात भी ऐसी थी कि सरे-आम चौक-चौराहे पर कहने
में उनको हिचकिचाहट हो रही थी। वे चौबे जी के मुखर स्वभाव से परिचित थे, वे जोर-जोर से
हँकड़ने लगते। चौबे जी ने ही उन्हें उत्साहित किया, ‘‘बोलिये, बोलिये, क्या बात है, कोई दाम-कौड़ी चाहिए’’?
जनक मिस्त्री ने साहस बटोरते हुए दुःखपूर्ण
शब्दों में चौबे जी को उत्साहना दी, ‘‘रामचंदर बाबा मेरी परित्यक्ता साली सुमंती को
परेशान किये हुए हैं; रऊआ गाँव-घर के मतबर! तनी उनको समझा बुझा
दीजिये।’’
लगा कि प्यारे लाल चौबे चक्कर खा कर गिर
पड़ेंगे। गाँव के कमिया, परजा-पवनी लोग उनके सामने दाँत निपोर कर खड़ा
रहते थे, तनिका-सा चऊल-चुमाटी को नजरअंदाज कर देते थे, वही लोग अपनी
शिकायत लेकर शहर तक पहुँचने लगे। रामचंदर बाबा चौबे जी के बड़े पुत्र। कुँवारे छबीस
वर्षीय रामचंदर बाबा का बी0ए0 फाइनल का रिजल्ट खराब हो गया है। दंडस्वरूप चौबे जी
ने उन्हें परवलपुर खेती-बारी देखने-भालने के लिए भेजा है।
रामचंदर बाबा को लगता है जैसे रूस की
जारशाही ने साइबेरिया के हिम प्रदेश में गलने के लिए निष्कासित कर दिया हो उनको।
चौबे जी बेटे के व्यवहार से बहुत आहत हुए।
उनके मन में आया कि जनक मिस्त्री को कह दें औरत को परदा में रखा जाता है कि मर्द
को? लेकिन कह नहीं पाये। उनके सिर में चक्कर आने लगा, वे वहीं गिर गये।
भवेश, अमन भार्गव और जनक मिस्त्री उनको टांग-टुंगकर घर पहुँचाये।
उस दिन सुबह टहलते समय वीर कुँवर सिंह पार्क
के पोखरे के पार्श्व में तय हुआ था कि भोजन के बाद कृषि वैज्ञानिक भवेश और पत्रकार
अमन भार्गव, प्यारे लाल चौबे की आलू की खेती देखने उनके गाँव परवलपुर
जायेंगे। कृषि वैज्ञानिक भवेश के निर्देशन में ही चौबे जी ने तीन बीघे में आलू की
खेती की थी। भवेश जी ने आलू के बिचड़ों की आपूर्त्ति से ले कर खेत की जोताई, बिचड़ों की रोपाई, घासों की सोहनी, पौधों के पटवन और
खाद की छिंटाई आदि हर कदम पर चौबे जी को वैचारिक सहयोग दिया था।
प्यारे लाल चौबे तीन बीघे में लहलहाते आलू
के पौधों को देख कर हुलसित थे। बतौर कृषि वैज्ञानिक कम प्रसन्न नहीं थे भवेश।
उन्होंने आलू के पौधों की तस्वीर अपने कैमरे में कैद की। पत्रकार अमन भार्गव
समाजशास्त्र में स्नात्तकोत्तर हैं, वे चौबे जी द्वारा आलू की खेती में रूचि को
समाजशास्त्रीय दृष्टि से परखने गये हैं। वे प्यारे लाल चौबे को इक्कसवीं सदी में
एक अजूबा ब्राह्मण की तरह देखते हैं जो तमाम रूढ़ियों के साथ जीते हुए खेत और खेती
से चिपका रहना चाहता है। कृषि वैज्ञानिक भवेश चौबे जी को प्रगतिशील किसान का
पुरस्कार दिलवायेंगे। चौबे जी अपनी कृषि को उद्योग में बदल देने का सपना देखते
हैं। कई मित्रों ने सुझाव दिया कि कोई कुटीर उद्योग आरंभ कीजिये, मसलन मोमबत्ती, अगरबत्ती या
दियासलाई या कलम, पेंसिल बनाने का उद्योग, टमाटर का सॉस भी
बना सकते हैं। टमाटर का सिर्फ एसेंस रहेगा, बाकी आधार माल तो कोंहड़ा
ही रहेगा। पापड़, अदौरी, तिलौरी भी बना सकते हैं। एक से बढ़ कर एक मोरब्बा
का उत्पादन कुटीर उद्योग में कर सकते हैं: आँवला, परवल, सेव, नासपाती, कटहल, बड़हल, बरवटी तक। ये सभी
उद्योग कृषि से संबद्ध हैं।
उत्पाद को बाजार चाहिए। बाजार को तंत्र और
प्रचार चाहिए। चौबे जी बाजार और प्रचार से घबराते हैं। वे कम से कम जोखित उठाना
चाहते हैं। कृषिजन्य अन्य उत्पादनों के संदर्भ में उनकी अनुभवहीनता उन्हें
अँधेरे में छलाँग लगाने से रोकती है।
परवलपुर की जमीन नीची हैं। कहते हैं कि
सैकड़ों वर्ष पूर्व गंगा का बहाव यहीं से था। गंगा मइया उत्तर की ओर सरकती गईं।
प्रत्येक वर्ष धारा के दक्षिण बालू सनी मिट्टी फेंकती गईं। गाँव गंगा के दक्षिणी
तट के निकट बसते गये। परवलपुर के आस-पास के बधार में मिट्टी खोदने पर पाँच से दस
फीट की गहराई में बालू की परत मिल जाती है। इस इलाके में कुआँ खोदना बहुत आसान है।
दस फीट नीचे पानी का स्रोत मिल जाता है। आज परवलपुर का रकबा पाँच सौ बीघे जमीन की
है। बड़ा किसान कोई नहीं है, अधिकतर मझोले और सीमांत किसान हैं। गंगा मइया
उत्तर की ओर सरकती गई, लेकिन अपने पीछे अपनी सेविका गंगिया को पीछे
छोड़ गई। आज गंगिया आरा शहर को उत्तर दिशा में स्पर्श करते हुए बहती है और
गाँव-देहात से ले कर आरा शहर के बरसात के पानी को स्वीकार कर लेती है और इसे गंगा
मईया को हस्तांतरित कर देती है। जब गंगा में बाढ़ का पानी खतरे के निशान को पार कर
जाता है तो गंगिया में पानी के प्रवाह की दिशा उलट जाती है। बाढ़ का पानी परवलपुर
और इसके इर्द-गिर्द के गाँवों के बधार में फैल जाता है। बरसात का मौसम जुलाई से
अक्टूबर तक और यही सीजन धान की खेती का है। नीची जमीन में पानी डूबे खेतों में धान
की खेती संभव नहीं। बरसात का पानी जब धीरे-धीरे गंगा में उतर जाता है तब किसान
गेहूँ, चना, मटर, तीसी, तोरी, आलू, प्याज, मिरचाई, कोबी, नेनुआ, झींगी, बैंगन, टमाटर आदि की
खेती करते हैं। बरसात कम हो तो मकई की खेती भी किसान जम कर करते हैं। मकई के पौधे
जब परवान चढ़ते हैं और कसकर बारिश हो जाती है और बाढ़ आ जाती है तो मकई की खेती का
लागत मूल्य लौटना भी मुश्किल होता है। प्यारे लाल चौबे को परवलपुर मौजे में बारह
बीघे खेती की जमीन है। धान की खेती लायक मात्र दो बीघे जमीन है। वह भी गारंटी नहीं
है। सरकारी सेवा में रहते हुए वे खेती में रूचि लेते हैं। पुश्तैनी जमीन के रकबे
में उनके पिता एक धुर जमीन का इजाफा नहीं कर सकें; इस बात के लिए वे पिता की
आलोचना करते हैं। सरकारी सेवा में आने पर उनका पहला सपना यही था कि गाँव की खेती
की जमीन दुगुना करेंगे। बाद में एक सपना और अँखुआया, शहर में अपना एक मकान हो।
उनके अक्खड़ स्वभाव ने उनके सपनों को भी प्रभावित किया। सरकारी सेवा में भी वे
भारतीय किसान का लिबास धारण करते रहे। लंबे छरहरे बदन पर मिल वाली खादी की महीन
झकाझक धोती और कुरता खूब फबता, पाँवों में प्रायः चप्पल या हाफ जूता। जाड़े में
बिना बाँहों वाला जवाहर जैकेट। उनका रंग भारतीय किसान का रंग है, न ज्यादा गोरा, न ज्यादा काला।
चन्द्रगुप्त के गुरू विष्णुगुप्त काले थे। प्यारे लाल चौबे का रंग विष्णुगुप्त के
वंश से मिलता जुलता है। द्रविड़ आर्येतर रंग पता नहीं उनकी वंशावली में कब आकर घुल
गया। वे खाने और पहनने के शौकीन हैं। किसान का आभररा अवश्य है, लेकिन उनका मन
किसान-सा कृपण कभी नहीं रहा। दूध दही का सेवन प्रति दिन करते हैं। उनके खर्चीलेपन
के बारे में पत्रकार अमन भार्गव हमेशा सोचते रहते हैं। दूध-दही के लिए शहर में भी
निजी गाय पालते हैं। गो-सेवा के लिए कोई-न-कोई नाबालिग टहलुआ रखते हैं। उनकी कड़क
किसानी बोली का ताप सहना किसी टहलुआ के लिए आसान नहीं होता। कितने टहलुआ आये और
गये। अमन भार्गव इन्हें बाल मजदूर कहते हैं, तब चौबे जी की
प्रतिक्रिया सुनने लायक होती है: ‘‘जे केहू चो..... बने लोग वोट के लिए बाल मजदूर
और बँधुवा मजदूर की मुक्ति की बात करते हैं, ये मुक्त हो जायेंगे तो
इन्हें खिलायेगा कौन?’’
अमन भार्गव को चौबे जी सामंतवाद और पूँजीवाद
के मिश्रण का दिलचस्प नमूना मालूम पड़ते हैं। नमूने को वे सिर्फ परखते हैं, क्योंकि नमूना
परखने की चीज होती है।
प्यारे लाल चौबे जब पहली बार कृषि वैज्ञानिक
भवेश से मिले थे तो अपने गाँव की जमीन की विशेषता विस्तार में बताये थे। बाद में
चौबे जी भवेश से कई प्रकार की खेती के विकल्पों पर विमर्श करते रहे। उनके सपनों को
पंख लगते गये। कभी वे अपने खेतों में लेमन ग्रास लगाने के बारे में सोचते, कभी पोपुलर के
पौधे लगाने के बारे में, लंबे विमर्श के बाद आलू की खेती पर उनका मन टिका। लेकिन वे
पाँच-दस कट्ठा में मात्र जीने के लिए आलू की खेती करना नहीं चाहते थे, बल्कि कम-से-कम
चार पाँच बीघे में यह खेती करना चाहते थे।
भवेश ने आशंका जाहिर की, ‘‘इस तरह की नगदी
खेती के लिए पूँजी, श्रम, श्रमिक एवं सतत्
पर्यवेक्षण की आवश्यकता होती है। पूँजी की व्यवस्था कर लेंगे, खेत अपना है, बिचड़ों की
व्यवस्था हो जायेगी, जल की व्यवस्था हो जायेगी, खेतिहर मजदूर कहाँ
से लायेंगे। खेतिहर मजदूरों के पास श्रम हैं।’’
प्यारे लाल ने जानना चाहा, ‘‘आखिर कितने
खेतिहर मजदूरों की आवश्यकता होगी?’’
‘‘जितनी अधिक खेती होगी, उसी अनुपात में
खेतिहर मजदूरों की आवश्यकता होगी’’ कृषि वैज्ञानिक भवेश ने संक्षेप में संकेत
किया।
प्यारे लाल के सामने समस्या है कि परवलपुर
में किसी जोतदार के पास खेतों में काम करने के लिए नियमित बनिहार नहीं है। भूमिहीन
बनिहारों के जवान लड़के ट्रैक्टर का ड्राइबर बनने को तैयार हैं लेकिन हल
जोतने के लिए नहीं। बाप बटाई पर खेती करने के लिए तैयार है, लेकिन दैनिक मजूरी
पर हल जोतने को नहीं।
अमन भार्गव परवलपुर के ऐसे कई युवकों को
जानते हैं जो गरीबी के कारण मीडिल स्कूल के आगे पढ़ाई जारी नहीं रख सके और आरा शहर
में रिक्शा चला कर अपनी आजीविका अर्जित करते हैं या भवन निर्माण मजदूर बन कर। भवन
निर्माण में नियमित काम मिलने की संभावनाएँ अभी बनी हुईं हैं। दस हजार रूपये महीना
ये मजदूर कमा ले रहे हैं जो नियोजित शिक्षकों को भी सरकार नहीं दे रही है। गुजरात
महाराष्ट्र में उद्योग-धंधों का तेजी से विकास हो रहा है, वहाँ दैनिक
मजूरों की माँग बढ़ी है। परवलपुर के नाई और धोबी तक राजकोट, कोटा और पूना में
पलायन कर गये हैं। उद्योग-धंधों के मामले में कोलकता सुस्त पड़ गया है और जो भी
थोड़ा बहुत अवसर है उस पर स्थानीय गरीब युवक नजर गड़ाये हैं।
भवेश जब आलू के लहलहाते पौधों वाले खेतों की
तस्वीर अपने कैमरे में उतार रहे हैं, प्यारे लाल को खेतिहर मजूरों की कमी वाली बात
याद आ रही है। ऐसे संभावित मजूरों को खोजने वे बस्ती में गये, कई दरवाजे
खटखटाये। हर घर से स्त्री कंठ से प्रत्योतर मिला, ‘‘बेटा सूरत चला गया है
बाबा या राजकोट चला गया है चाचा या दिल्ली चला गया है पंडित जी।’’
चौबे जी उम्मीद नहीं छोड़ते हैं, आगे पूछते हैं, ‘‘बेटा न चला गया
है दिल्ली, बाप कहाँ चले गये?’’
‘‘बापो चला गया राजकोटा
बेटा संगे’’, जवाब मिला।
अंततः गणेश महतो का परिवार राजी हुआ अपना
अतिरिक्त श्रम प्यारे लाल की आलू की खेती में लगाने के लिए। गणेश महतो ने कुछ
मुसहर जाति के खेतिहर मजूरों से संपर्क साधा। नट जाति के कुछ युवक मिले। कुछ अन्य
गरीब जो स्वतंत्र रूप से खेती करने में असमर्थ थे।
भवेश ने अनुमान लगाया था कि औसतन चार सौ मन
प्रति बीघे की दर से तीन बीघे में कम से कम बारह सौ मन आलू की पैदावार की गारंटी
है। सौ रूपये प्रति मन खेत में बिक जाये आलू तो एक लाख बीस हजार रूपये की आमदनी
कहीं नहीं गई। अन्य खेतों में मकई, बैगन, मिरचाई, भिंड़ी की खेती से
अतिरिक्त्त आय होगी। सपने बहुत सुहावने थे।
प्यारे लाल ने कहा, ‘‘व्यापारियों के
हाथ खेत में आलू नहीं बेचेंगे।’’
‘‘तब इतना आलू कहाँ रखेंगे? क्या करेंगे?’’ भवेश ने जिज्ञासा
प्रकट की।
यही सोच रहे हैं कि कहाँ रखें’’, प्यारे लाल ने
दिमाग पर जोर डाला।
‘‘शीतगृह में रख सकते हैं’’, भवेश ने संभावना
प्रकट की,’’ लेकिन इस शहर में शीतगृह का निर्माण अभी तक नहीं हुआ।’’
‘‘शीतगृह!’’ शीतगृह का नाम
सुनकर प्यारे लाल के पुराने घाव हरे हो गये.......
सुमन सहाय प्यारे लाल चौबे के पुराने मित्र
हैं। दोनों की फितरत में कई समानताएँ हैं। दोनों
बहुधंधी हैं। दोनों प्रयोगशील हैं। दोनों जीवन में नये-नये प्रयोग करते
रहते हैं। दोनों साहसी और निर्भीक हैं। शहर के लोगों की दृष्टि में दोनों का जीवन
असफलताओं से घायल हैं। फिर भी एक बिहार के मुख्यमंत्री की आमसभा में मंच संचालन
करते दिखता है तो दूसरा चन्द्रकांत देवताले का एकल काव्य पाठ अपने आवास की छत पर
जनवरी की गुनगुनी धूप में आयोजित करते दिखता है। देश-प्रदेश के कई राजनेताओं को वे
जानते हैं और राजनेता उन्हें जानते हैं। लेकिन दोनों मित्रों में से किसी को अब तक
लोकसभा, विधानसभा तो क्या मुखिया पद का टिकट भी नहीं मिला। दोनों
सरकारी सेवा में किरानी बन कर रह गये।
हाँ, तो प्यारे लाल के पुराने घाव हरे हो गये......
प्यारे लाल ने सुमन सहाय के साथ मिल कर
आरा-जगदीशपुर पथ पर एक किसान की दस बीघे उसर जमीन किराये पर ली। एक नया प्रयोग
आरंभ हुआ। जमीन की घेराबंदी कंटीले तार से की गई। बीच-बीच में पत्थर के खंभे गाड़े
गये। जमीन में बोरिंग किया गया। खेत में पौधों की रखवाली के लिए कुटिया बनाई गई।
जमीन की सफाई की गई, कंकड-पत्थर बिने-बिछे गये। लगभग ढाई लाख रूपये
खर्च हो गये। दोनों ने भविष्य निधि से रकम निकाले। बैंक से ऋण लिया गया। पपीता की
खेती की योजना बनी। पूसा से पपीता का बीज आया। भवेश के पर्यवेक्षण में कृषि फार्म
में पपीते के बिचड़े तैयार हुए। पपीते के पौधे बाड़बंद खेत में रोपे गये। पौधे बढ़ कर शीघ्र ही ढाई-तीन फीट के हो गये। दोनों
मित्र पपीते के पौधों को देख कर बहुत आह्लादित होते थे। एक दिन, दिन भर उमस रहा, शाम को जोरों की
आँधी आई। कंटीले तारों की घेराबंदी का पत्थर का एक खंभा, पता नहीं हवा के
दबाव से कि क्या, एक ओर झुक गया। शायद बलुआही मिट्टी में खंभे का
गड़ान पुख्ता नहीं था, वह जमीन की ओर इस प्रकार झुका था मानो जमीन को
चुमने के लिए बेताब हो। और कंटीले तार उसे जीमन को चूमने से मना कर रहे हों। खंभा
एक तरह से कंटीले तारों की बाहों में झुलता
नजर आता था। तारों ने झुक कर पशुओं को खेत में घुसने का पथ प्रशस्त कर दिया।
दूसरी रात, नीलगायों का झुंड, पपीते के हरे-हरे पौधों
से आकर्षित हो कर, झुके हुए खंभों के पास से छलांग लगा कर, खेत में प्रवेश
कर गया। शीघ्र ही वे घेरे से बाहर जाने की कोशिश करने लगे। वे जिधर जायें उधर
कंटीले तार मिले। हदस कर वे इधर-उधर दौड़ने लगे। इस अफरातफरी में पौधे बर्बाद हो
गये। पपीते के कोमल पौधे नीलगायों के खुरों के आघात से लहुलुहान हो धराशायी हो
गये। सुबह सुमन और प्यारे लाल पहुँचे। पपीते के पौधे सैन्य शिविर में वीरगति को
प्राप्त निहत्थे सैनिकों की भाँति धरती पर बेजान पड़े थे। उनकी अकल्पनीय दुर्गति
देख कर किसान नायक प्यारे लाल चौबे और सुमन सहाय काँप गये। लगता था उनके पाँवों में
भारी शील बाँध दिये गये हों। किसानों के सपने मिट्टी में मिल गये थे। प्रकृति ने
भयानक अत्याचार किया था। प्यारे लाल ज्यादा मर्माहत हुए। लगा अगर वे अधिक देर तक
धराशायी पौधों को देखते रहे तो वहीं उनका कलेजा फट जायेगा। सुमन ने साहस का परिचय
दिया और कहा कि किसान कहाँ कभी हारता है, ईश्वर पर सबसे अधिक भरोसा
वही करता है और उसकी निर्मिति को सबसे अधिक नकारता भी वही है। प्रकृति के सामने
हम हथियार नहीं डालेंगे।
दोनों फिर उठ खड़े हुए। दोनों ने मिल कर कंटीले तार की घेरेबंदी दुरूस्त करायी। झुके हुए पत्थर का खंभा सीधा किया गया। अब की बार प्लान बदल दिया गया। पपीते की जगह आलू और प्याज रोपने की परिकल्पना की गयी। आस पास के अन्य किसानों को भी आलू प्याज लहसुन आदि की खेती के लिए उत्साहित किया गया। एक चकले में एक समान खेती करने से सामुहिक रूप से फसल की देख रेख में सुविधा होती है। किसान एक दूसरे के अनुभवों से लाभ उठाते हैं। कृषि वैज्ञानिकों से राय-मशविरा कर समुचित खाद पानी का प्रयोग किया गया। आलू की अच्छी पैदावार हुई। पैदावार का बढ़िया हिस्सा इर्द-गिर्द के किसानों ने अगले मौसम में बीज के रूप में इस्तेमाल के लिए खरीद लिया। दोनों मित्रों का लागत मूल्य वसूल हो गया। दोनों ने चार-चार सौ क्विंटल आलू निजामुद्यीन शीतगृह पटना में रखवा दिया। शीतगृह के मालिक आफताब आलम की बेईमानी देखिये, उसने बिना सूचना के उनका आठ सौ क्विंटल आलू खूले बाजार में व्यापारियों के हाथों बेंच दिया। प्यारे लाल और सुमन चिरकुट (रसीद) के आधार पर जिला उपभोक्ता फोरम में मुकदमा ठोक दिये। जिला उपभोक्ता फोरम में प्रतिदिन पाँच नये मुकदमों की सुनवाई होती थी और पाँच पुराने की। आरंभ में दोनों मुकदमों का ट्रायल नंबर 541 और 542 था। तीन साल के बाद ट्रायल नंबर ऊपर खिसक कर क्रमशः सतरह-अठारह पर आया। एक दिन सुमन सहाय के मुकदमा नंबर सतरह का निष्पादन हो गया। जज ने शीतगृह के मालिक आफताब आलम के खिलाफ आदेश पारित किया कि वह सुमन सहाय को आठ लाख रूपये का भुगतान बतौर आलू की कीमत करें। प्यारे लाल के मुकदमे की तिथि आगे पड़ गई। सुमन सहाय ने आफताब आलम से तसफीया कर लिया और जिला उपभोक्ता फोरम में मुकदमे की पैरवी शिथिल पड़ गई। इस बीच संसद ने उपभोक्ता फोरम का अधिकार पाँच लाख रूपये तक के मामले के निष्पादन के लिए सीमित कर दिया। आफताब आलम ने प्यारे लाल के मुकदमे में पैरवी कर जिला उपभोक्त फोरम से आदेश पारित करा दिया कि वे उचित न्यायालय का दरवाजा खटखटायें। प्यारे लाल का मामला लटक गया। और एक दिन जिला उपभोक्ता फोरम से उनके मुकदमे वाली संचिका गायब हो गई जिसमें वह चिरकुट था।
दोनों फिर उठ खड़े हुए। दोनों ने मिल कर कंटीले तार की घेरेबंदी दुरूस्त करायी। झुके हुए पत्थर का खंभा सीधा किया गया। अब की बार प्लान बदल दिया गया। पपीते की जगह आलू और प्याज रोपने की परिकल्पना की गयी। आस पास के अन्य किसानों को भी आलू प्याज लहसुन आदि की खेती के लिए उत्साहित किया गया। एक चकले में एक समान खेती करने से सामुहिक रूप से फसल की देख रेख में सुविधा होती है। किसान एक दूसरे के अनुभवों से लाभ उठाते हैं। कृषि वैज्ञानिकों से राय-मशविरा कर समुचित खाद पानी का प्रयोग किया गया। आलू की अच्छी पैदावार हुई। पैदावार का बढ़िया हिस्सा इर्द-गिर्द के किसानों ने अगले मौसम में बीज के रूप में इस्तेमाल के लिए खरीद लिया। दोनों मित्रों का लागत मूल्य वसूल हो गया। दोनों ने चार-चार सौ क्विंटल आलू निजामुद्यीन शीतगृह पटना में रखवा दिया। शीतगृह के मालिक आफताब आलम की बेईमानी देखिये, उसने बिना सूचना के उनका आठ सौ क्विंटल आलू खूले बाजार में व्यापारियों के हाथों बेंच दिया। प्यारे लाल और सुमन चिरकुट (रसीद) के आधार पर जिला उपभोक्ता फोरम में मुकदमा ठोक दिये। जिला उपभोक्ता फोरम में प्रतिदिन पाँच नये मुकदमों की सुनवाई होती थी और पाँच पुराने की। आरंभ में दोनों मुकदमों का ट्रायल नंबर 541 और 542 था। तीन साल के बाद ट्रायल नंबर ऊपर खिसक कर क्रमशः सतरह-अठारह पर आया। एक दिन सुमन सहाय के मुकदमा नंबर सतरह का निष्पादन हो गया। जज ने शीतगृह के मालिक आफताब आलम के खिलाफ आदेश पारित किया कि वह सुमन सहाय को आठ लाख रूपये का भुगतान बतौर आलू की कीमत करें। प्यारे लाल के मुकदमे की तिथि आगे पड़ गई। सुमन सहाय ने आफताब आलम से तसफीया कर लिया और जिला उपभोक्ता फोरम में मुकदमे की पैरवी शिथिल पड़ गई। इस बीच संसद ने उपभोक्ता फोरम का अधिकार पाँच लाख रूपये तक के मामले के निष्पादन के लिए सीमित कर दिया। आफताब आलम ने प्यारे लाल के मुकदमे में पैरवी कर जिला उपभोक्त फोरम से आदेश पारित करा दिया कि वे उचित न्यायालय का दरवाजा खटखटायें। प्यारे लाल का मामला लटक गया। और एक दिन जिला उपभोक्ता फोरम से उनके मुकदमे वाली संचिका गायब हो गई जिसमें वह चिरकुट था।
प्यारे लाल को लगने लगा कि उनकी अनुपस्थिति
में सुमन सहाय सिर्फ अपने मुकदमे की सिफारिश करते रहे। अन्य मित्र मंडलियों में वे
सुमन को धूर्त्त और स्वार्थी बताने लगे। हवा ने उनकी टिप्पणियों को सुमन के कानों
तक पहुँचाया। सझिया की खेती और बैल अधिक दिन जीवित नहीं रहते। दोनों साझीदार अलग
हो गये। पहले साल पपीते के पाधों को नील गायों ने बर्बाद कर दिया, दूसरे साल आलू की
पैदावार अच्छी हुई तो शीत गृह के मालिक आफताब आलम ने धोखा दिया। नहीं, प्यारे लाल अब
शीत गृह के चक्कर में नहीं पड़ेंगे। ...................
प्यारे लाल ने कृषि वैज्ञानिक भवेश को उत्तर
दिया, ‘‘ नहीं, भवेश जी, अब मैं किसी शीतगृह में
आलू प्याज नहीं रखूँगा, शीतगृह के चक्कर में पड़ चुका हूँ। दोबारा उधर
नहीं जाऊँगा। मैं अपनी परंपरागत शीतगृह का निर्माण अपने मकान के एक हिस्से में
करूँगा। चार महीना आलू को गर्मी से बचाना है। जुलाई के बाद बारिश से तापमान स्वतः
कम हो जायेगा। हवा में आर्द्रता होगी। कुछ आलू निश्चित सड़ेगा, लेकिन शेष आलू
खुचरा व्यापारियों के हाथ बेचूँगा, अच्छी कीमत मिलेगी।’’
कृषि वैज्ञानिक भवेश और पत्रकार अमन भार्गव
ने चेताया, ‘‘बहुत जोखिम है चौबे जी इतना आलू घर में गर्मी के मौसम में
रखना।’’
प्यारे लाल जी अपनी योजना पर काम करने लगे।
कार्यालय में भी इन प्रश्नों पर सहकमिर्यों के बीच चर्चा करते। उनके कुछ हितैषी
उनकी उद्यमिता की प्रशंसा करते, लेकिन उनके जिद्दी स्वभाव को जानते हुए यह
मशविरा भी देते कि जब तक सरकारी सेवा में हैं, तब तक सामान्य ढंग से
खेती कराइये जिससे कि खेतों पर आपकी मिल्कियत बनी रहे। क्योंकि सरकारी सेवा में
इतना अवकाश कहाँ मिलता है कि आप खेती सुचारू रूप से करा सकेंगे।
शुभेंदु पांडे ने हँसते हुए कहा, ‘‘भइया, ब्राह्मण हो के खेत
बचा के तूं रखले बाड़ ( इहे कम नइखे। आपन हाथ-गोड़ जब लेटावे के नइखे त
हई क्विंटल के क्विंटल आलू ऊपजाव ताड़; भईया तोहार जतना प्रशंसा कइल जाऊ, ऊ कम होई; तूं भाग के सांढ़ बाड़)।’’
प्यारे लाल जी समझ नहीं पाये कि शुभेंदु
पांडे की बातो को क्या समझें-उत्साहित करना कि निरूत्साहित करना या दोनों।
चर्चा में बने रहने की ख्वाहिश प्यारे लाल
की फितरत है। धन और पुत्र से किसका मन भरा है। आधुनिक लोगों का मन पुत्रों की
संख्या से तृप्त हो गया, लेकिन धन की लिप्सा उनकी भी नहीं गई। उत्तर
आधुनिक जीवन शैली में परिवार नामक संस्था ही दिनातीत हो गयी। वे कई मामलों में
रूढ़िवादी हैं। भारतीय वर्णव्यवस्था में उनकी परम आस्था है। ब्राह्मण रक्त को वे
शुद्तम मानते हैं। ब्राह्मणेतर जातियों को वे दोगला कहते और समझते हैं।
प्रगतिशीलमित्र उन्हें ढ़ोंगी कहते हैं। पत्रकार अमन भार्गव उनसे तीखे प्रश्न करने
से बाज नहीं आते। समाजशास्त्रीय दृष्टि से वे उनसे पूछते हैं कि द्रविड़ ब्राह्मणों, कान्यकुब्जों, सरयूपारिणों, शाकलद्विपियों, मैथिलों, गौड ब्राह्मणों, गोसाईयों एवं
अन्य दर्जनों प्रकार के ब्राह्मणों के रंगरूप, भाषा में इतना अंतर क्यों
है? उनका उद्गम एक नहीं लगता। लगता है जैसे लंबे कालखंड में
ब्राह्मण वर्ण या जाति का निर्माण हुआ। कुछ अनार्यों या विदेशी लोगों को भी
ब्राह्मण वर्ण में समाहित किया गया।
एक बार अमन भार्गव प्यारे लाल जी की बेटी की
शादी के सिलसिले में गंगा पार शेखपुरा ले गये। साहित्यप्रेमी श्रीमन नारायण मिश्र
का लड़का बैंक में प्रोबेशनरी ऑफिसर था। अमन ने श्रीमन नारायण जी को प्यारे लाल
चौबे से मिलवाया और मिलने का उद्देश्य बताया।
श्रीमन् नारायण जी ने प्यारे लाल जी से
जानना चाहा कि वे कान्यकुब्ज हैं कि सरयूपारीण? प्यारे लाल जी ने अपने
आपको कान्यकुब्ज बताया। तब श्रीमन् जी ने साबित किया कि वे कान्यकुब्ज नहीं, सरयूपारीण हैं
क्योंकि शंकराचार्य के आह्वान पर आठवीं सदी में डेढ़ सौ कान्यकुब्ज कन्नौज से बिहार
आये थे और वे यहाँ-यहाँ बसे थे। प्यारे लाल जी की हवा गुम हो गई। श्रीमन् जी ने
उनके परिवार से वैवाहिक संबंद्ध करने से मना कर दिया।
इसलिए प्यारे लाल चौबे पत्रकार अमन भार्गव
से खार खाये रहते हैं। पीठ पीछे उनकी निंदा आरंभ कर देते हैं।
गाँव में जिसके पास जमीन है, उसकी सामाजिक
प्रतिष्ठा है। इस परंपरागत सामाजिक प्रतिष्ठा से प्यारे लाल बेदखल होना नहीं
चाहते। ग्रामीण समाज में ब्राह्मण विशेषाधिकार प्राप्त जाति है। अमन भार्गव चौबे
जी की तुलना फ्रांस के उन विशेषाधिकार प्राप्त पादरियों से करते हैं जिन्हें देख कर
फ्रांसीसी जनता मुँह बा देती थी और पादरी उनके मुँह में थूक देता था और जनता
गौरवान्वित महसूस करती थी। प्यारे लाल इस अतिरिक्त प्रतिष्ठा से बेदखल होना नहीं
चाहते। खेती अब उनसे हो नहीं पाती, लेकिन खेती उनकी अतिरिक्त आय का स्त्रोत है।
इसलिए जब सरकार ने स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति योजना की घोषणा उनके विभाग के लिए की
तो उनकी सेवा पाँच वर्ष बच रही थी। पाँच वर्ष का अग्रिम वेतन सरकार एक मुश्त दे
रही थी। और ढ़ेर सारे पेंशनगत लाभ थे। प्यारे लाल जी सेवा निवृत हो गये। खेत दोगुना
करने का सपना पूरा होता दिखा। उन्होंने शहर के मकान में परंपरागत शीतगृह निर्माण
कराना आरंभ किया। बड़ा सा हौलनुमा कमरा
बनना आरंभ हुआ। दिवालों की जोड़ाई पूरी हुई। सात फीट की ऊँचाई पर बाँस की
फट्टियों से छत बिटवा दिया गया। मिट्टी में भूँसी मिला कर बाँस के बीट पर फैला दिया
गया और सीमेंट-छड़-बालू-गिट्टी के गारा से छत की ढ़लाई की गई। सात फीट के ऊपर उठी
आमने-सामने की दीवारों में ईंट की जालीदार दीवार बनाई गई, जिससे आर-पार हवा
बह सके। यही देहाती शीतगृह तैयार हुआ।
जब कृषि वैज्ञानिक भवेश, पत्रकार अमन
भार्गव और प्यारे लाल चौबे शीतगृह में आलू के रख रखाव पर बात कर रहे थे, बगल के खेत में
परवलपुर के अन्य किसान गणेश महतो सपरिवार काम कर रहे थे। भवेश जी और बाबा प्यारे
लाल का विमर्श सुन कर वे निकट आ गये। वे आपात काल लागू होने के पाँच साल पूर्व
मैट्रिक पास किये हैं। कुछ दिन कालेज गये। जे0पी0 आंदोलन में सक्रिय रहे। अब
राजनीति से संन्यास लेकर कृषि कर्म में एकाग्रचित्त हैं। उनके पास अपनी पुश्तैनी जमीन मात्र एक
बीघा है। पिछले वर्ष इसी एक बीघे में सिर्फ फूलगोभी बेच कर पच्चीस हजार रूपये कमाये
हैं। लेकिन वे सामंतो की तरह खेत के आर पार खड़ा होकर फसल का सिर्फ पर्यवेक्षण नहीं
करते। वे परिवार के साथ स्वयं खेत में खटते हैं। पत्रकार अमन भार्गव को गणेश महतो
के परिवार में विशेष रूचि हैं। गणेश महतो का पूरा परिवार खेत में हैं। उन्होंने
अपने परिवार के हर सदस्य का संक्षिप्त परिचय अमन भार्गव को दिया। दरअसल, गणेश महतो प्यारे
लाल जी का एक बीघा खेत बटाई पर लिये हैं। एक बीघा खेत मौरूसी है ही। इस तरह दो
बीघे की खेती करते हैं। इससे अधिक श्रमशक्ति नहीं है उनके पास।
अमन भार्गव गणेश महतो और प्यारे लाल चौबे का
मिलान मन ही मन कर रहे हैं। अमन गणेश से जानना चाहते हैं; ‘‘आप की नजर में
प्यारे लाल चौबे की खेती में कठिनाइयाँ क्या है?’’
गणेश महतो अपने हिसाब से कृषि संकट को
समझाते हैं; ‘‘ सवर्ण किसान खेती में स्वयं बिचौलिये की भूमिका में हैं।
खेत में काम करना सांस्कृतिक रूप से उनके लिए कठिन है। संयुक्त परिवार टूटने के
बाद अधिकांश एकल परिवारों के पास खेती की जमीन का छोटा टुकड़ा ही बचा है। आर्थिक
रूप से कमजोर परिवार मजूर रख कर खेती नहीं करा सकता। खेतों में उसे सपरिवार खटना
होगा। बिहार में जिन्हें अगड़ी जाति का कहा जाता है, खेतों में काम करना उनकी
विरासत में नहीं है। कृषि में एक संकट यह भी है।’’
‘‘प्यारे लाल चौबे तो आपके
गाँव में खेती करा रहे हैं।’’ अमन भार्गव ने कहा।
‘‘चौबे जी खेती करा नहीं
रहे हैं, ढो रहे हैं। उनको हिसिका (आदत) पड़ गया है। ये तो सप्ताह में
एक-दो बार आ भी जाते हैं, इनके बड़े पुत्र रामचंदर बाबा खेत की ओर आना ही
नहीं चाहते। शाम-सबेरे खेतों की हरियाली देखने आते हैं। प्यारे बाबा के बाद
परवलपुर की खेती कौन देखेगा?’’ गणेश चौबे ने प्रश्न उठाया।
कृषि वैज्ञानिक भवेश के कानों में गणेश महतो
के कुछ शब्द पड़े। वे स्वयं धनी किसान के पुत्र है। उन्होंने अमन भार्गव और गणेश
महतो की बातचीत में हस्तक्षेप किया, ‘‘खेत या कार्यालय कही भी श्रम किया जाये, वह श्रम ही
है। दरअसल मामला साधन, पूँजी और श्रम की
व्यवस्था का है। अब बड़ी-बड़ी कंपनियाँ कृषि-फार्म स्थापित कर रही हैं। तो क्या इन
कृषि-फार्मों के मालिक और मालिकिन स्वयं खेतों में खटेंगे?’’
गणेश महतो ने कहा, ‘‘मेरा मतलब बड़ी
कंपनियों या बड़े जमीदारों द्वारा खेती की व्यवस्था करने से नहीं है। मैं मझोले, छोटे और सीमांत
किसानों की बात कर रहा हूँ।’’
इस तरह उस दिन अमन भार्गव, भवेश जी और
प्यारे लाल चौबे की कृषि-यात्रा का एक राउंड पूरा हुआ। तीनों शहर लौट आये।
कुछ दिन बाद आलू के पौधे पक कर मुरझा गये।
अब मेड़ों से आलू कोड़ कर निकालना है। हल्के हाथों से कुदाल के फाल को मिट्टी के
मेड़ों में लगाना है। अंदर आलू के झोंप हैं। प्यारे लाल जी, अमन भार्गव और
भवेश परवलपुर आलू का उत्पादन देखने पहुँचे हैं। आलू ट्रैक्टर पर लाद कर आरा जायेगा।
अपने शीतगृह में इन्हें रखा जायेगा। चौबे जी के बड़े पुत्र रामचंदर बाबा भाडे़ का
ट्रैक्टर लेकर खेत पर पहुँच गये। ट्रैक्टर पर लादकर आलू शहर के आवास पर आया। घरेलू
शीतगृह में रखा गया।
उस दिन व्यापारी चार सौ क्विंटल आलू के लिए
तीन सौ रूपये प्रति क्विंटल की दर से पाँच हजार रूपये पेशगी दे रहा था। सप्ताह भर
के अंदर पूरी कीमत अदा करने को तैयार। प्यारे लाल जी पाँच सौ रूपये प्रति क्विंटल
की दर से एक मुश्त दो लाख रूपये चाहते थे। बहुत रगड़ा और मान-मनौबल के बाद एक लाख
साठ हजार रूपये तक उतरे। एक सौ रूपये प्रति क्विंटल का अंतर रह गया, बात नहीं बनी।
लेकिन व्यापारी को रामचंदर बाबा ने बुलाया था और बतौर अग्रिम पाँच हजार रूपये ले
चुके थे। बात सिर्फ हाई कमान की सहमति प्राप्त करने की थी। हाई कमान की सहमति नहीं
मिली।
व्यापारी से सौदा नहीं पटने से रामचंदर बाबा
साँसत में पड़े। वे पिता की जिद और सामंती अक्खड़पन के शिकार बार-बार होते हैं। वे
छब्बीस वर्ष के नवयुवक हैं, कुछ न कुछ उनके निजी खर्च होते हैं। पिछले वर्ष
स्नातक अंतिम वर्ष का रिजल्ट खराब होने से प्यारे लाल उनसे चिढ़े रहते हैं। उनसे
पाई-पाई का हिसाब लेते हैं। ब्राह्मण कुल दीपक का मन पढ़ने में नहीं लगता। रामचंदर
बाबा शहर आधारित कोई धंधा करना चाहते हैं क्योंकि शहर में एक टिकान है उनके लिए।
गाँव के युवा शहर की ओर पलायन कर रहे हैं और प्यारे लाल जी की जिद दंडस्वरूप
उन्हें परवलपुर की खेती में लगाना चाहती है। पिता-पुत्र का यही द्वंद्व है। जब
व्यापारी से बात नहीं बनी तो उसने रामचंदर बाबा से पेशगी वापस करने को कहा। खैर
कहिये कि व्यापारी से बात नहीं बनी तो प्यारे लाल जी कृषि वैज्ञानिक भवेश जी के
स्कूटर पर बैठ कर शीघ्र ही शहर की ओर प्रस्थान कर गये। रामचंदर बाबा ने व्यापारी की
पेशगी लौटाने का रास्ता निकाला और सतरह क्विंटल आलू ट्रैक्टर पर लदवा दिया। हाँ, गणेश महतो उर्फ
गणेश चाचा का आशीर्वाद प्राप्त कर लिया, ‘‘चाचा! ध्यान रखियेगा पैसे
तो हमसे खर्च हो गये हैं।’’
उस दिन प्यारे लाल जी आरा लौट गये।
दिन भर वे कहीं रहे, शाम को वे शहर के आवास में वापस हो जाते हैं।
परवलपुर के पुश्तैनी मकान के एक हिस्से पर उनका एकाधिकार है, लेकिन उस
पुश्तैनी मकान में संझउत दिखाने वाला कोई नहीं है। एक बार जब गृहस्थी उजड़ जाती है
तो पुनः उसे जमाना दुष्कर होता है। पिता चाहते हैं कि पुत्र गाँव की गृहस्थी को
पुनः आबाद करे और पुत्र को यह पुश्तैनी मकान शाम ढलते ही भूतहा खंडहर लगता है।
चौबे जी शाम को गांजा का सेवन करते है। गांजा शिव की बूटी है। बाबा इसे शिव के प्रसाद
स्वरूप ग्रहण करते हैं। शिव की बूटी में जो मस्ती है, उसकी तुलना अन्य
किसी चीज से नहीं की जा सकती। शिवबूटी आज्ञाकारिणी भार्या तैयार करती हैं। वह
प्यारे लाल जी की पार्वती हैं। छोटी दुबली पतली काया। श्रृंगार पटार से सुशोभित
उनको कभी किसी ने नहीं देखा। वे बाबा की अनुचरी हैं, सदा दास्य भाव में
आज्ञापालन हेतु प्रतीक्षारत रहती हैं, बाबा उनके बिना अर्द्धनर हैं। शिवबूटी की आग
वही सुलगाती हैं। जलते टाट के गोले को चिलम के मुँह में शिवबूटी के उपर रख कर
सहधर्मिणी दासी भाव से बाबा को सुपुर्द करतीं। दोर-चार फूँक मार कर बाबा तृप्त हो
जाते। इस बीच परवलपुर के खेत के आलू या मकई या नेनुआ-झींगी की कीमत मन में जोड़ते
रहते। तब तक रामचंदर बाबा का लखैरपन याद आता और अंदर कहीं कुछ चुभ जाता। गांजा का
धुआँ नाक और मुँह से निकल कर आकाश में उपर उठता और प्यारे लाल जी का मन राजनीति के
आकाश में सब फिक्र को धुआँ-धुआँ करते हुए उड़ता...... बिहार-उतर प्रदेश
झारखंड-हरियाणा-पंजाब-गुजरात-राजस्थान तक सवर्ण सत्ता-समीकरण से सदा-सदा के लिए
बाहर हो गये.... तमिलनाडु में अन्ना दोरै ने बहुत पहले ब्राह्मणों को सता से
विस्थापित कर दिया.... उतर प्रदेश में ब्राह्मण मायावती और मुलायम के पिछलग्गु हो
गये..... बिहार में लालू ने पिछलग्गू बनाने से भी इंकार कर दिया...... क्या जमाना
आ गया..... प्यारे लाल जी दुःस्वप्न से गुजर रहे हैं कि गांजा के धुँआ ने असर
दिखाया और उन्हें शौच की अनुभूति हुई। बाबा शौच जायेंगे। पार्वती दासी ने शौचालय
के डिब्बे में पानी भर दिया है। बाबा शौचालय में प्रवेश कर गये। बाहर अनुचरी सहचरी
एक हाथ में जग में जल और दूसरे हाथ में साबुन का टिकीया लेकर खड़ी है। शौच के बाद
बाबा हस्त प्रक्षालन करेंगे।
रामचंदर बाबा का मन न खेती में लगता है, न परवलपुर में।
लेकिन एक दिन उन्हें आकर्षण का केन्द्र मिल गया। वे परवलपुर में सोहनी के लिए जन
की तलाश में घूम रहे थे। कम से कम दस औरत मर्द मिल जायें। सात जन पचास पार के बूढ़े
मिले, उनमें दो साठ वर्ष की दहलीज पार करनेवाले थे। तीन जनों की
और आवश्यकता थी। दो औरतें मिल गई। एक औरत ने बताया कि जनक मिस्त्री की साली ससुराल
से भाग कर आई है। उसका मर्द साल भर से राजकोट गया है, न मनिआर्डर भेजता है न
स्वयं आता है। गाँव में चर्चा है कि वह किसी स्थानीय स्त्री को रख लिया है। ससुराल
वालों का ताना सुनते-सहते सुमंती आजिज आकर बहनोई के घर परवलपुर आ गई है। उस स्त्री
के मार्फत रामचंदर बाबा ने सुमंती से संपर्क किया। बाईस वर्षीय सुमंती का बिंदास
शरीर रामचंदर बाबा देखते ही रह गये। बातचीत के बाद सुमंती सोहनी के लिए राजी हो गई, वह जनक मिस्त्री
के चौके में बैठ कर खाना नहीं चाहती। उसे तो सिर्फ अपनों की सुरक्षा का अड़ान चाहिए, बरना जांगर
ठेठाने से आजीविका अर्जित कहाँ नहीं की जा सकती।
रामचंदर बाबा की चौड़ी छाती और दोहरे छरहरे
शरीर को भरटक निहार कर सुमंती ने नजरें झुका ली। उस दिन बाबा सोहनी करती झुकी हुई
सुमंती को देखते रहे। रात में करवटे बदलते रहे। देर तक नींद नहीं आई। बीच-बीच में
अपने को कोसते हैं। यह क्या हो गया उन्हें? ऐसे तो पागल हो जायेंगे
वे!
दूसरे दिन सूर्योदय के पूर्व रामचंदर बाबा
जनक मिस्त्री के घर पहुँच गये, हालाँकि बीते शाम सोहनी-कार्य खतम होने पर अगले
दिन आने के लिए सुमंती सहित अन्य जनों की सहमति प्राप्त कर लिये थे। पता नहीं
उन्हें कौन खींच रहा था और वे खींचा रहे थे।
रामचंदर बाबा नेक युवा हैं। किसी जाति के
बड़े-बुजुर्ग को चाचा-भइया बोलते हैं। उन्होंने जनक मिस्त्री को भइया कहकर पुकारा।
अब सुमंती के बहनोई के वे भाई बन गये। सुमंती साली हो गई। अब मामला आगे बढ़ेगा। यह
रिश्ता परवान-चढ़ता गया। बैर और प्रीत की बातें कहां छिपती हैं!
सारा आलू ट्रैक्टर से ढो कर आरा आ गया। घर
में बने हवादार कोठे पर पसार कर रखा गया। कोठे के नीचे का फर्श कच्चा है, उस पर भी आलू
पसार दिया गया। टेबुल फैन चला दिया प्यारे लाल जी ने। आधा मार्च के बाद गर्मी
एकाएक बढ़ने लगी। मकान की छत तपने लगी। पता नहीं प्यारे लाल जी को औरों की अपेक्षा
अधिक गर्मी महसूस होती। वे हमेशा बेचैन रहने लगे। गरमी से आलू सड़ने लगा। घर और
कोठा से सड़े आलू की गंध आने लगी। रामचंदर बाबा बीच-बीच में परवलपुर से आते हैं, सड़ते आलू की गंध
से घबराकर बाहर भागते हैं। माँ के सामने पिता पर भनभनाते हैं।
व्यापारी खेत में नगद दाम दे रहा था, ये सब ढोआ कर घर में सड़ाने के लिए लाये। सड़ाएं! सड़ा कर भी देख लें! अपनी जिद के आगे कुछ समझते ही नहीं! शीतगृह बेकार न बनाया है लोग! पुराना राग अलापते रहते हैं। लेकिन माँ की हस्ती कहाँ है घर में। लीजिए! दूसरे क्या कहेंगे? प्यारे लाल जी ही चिल्लाने लगे, आलू से गंध आ रही है। उसको उलटता-पलटता नहीं है कोई। हमेशा उसको उलटना-पलटना चाहिए। कभी पत्नी पर झल्लाते हैं, कभी बेटों पर, कभी बेटियों पर! सब हरामखोर है।
व्यापारी खेत में नगद दाम दे रहा था, ये सब ढोआ कर घर में सड़ाने के लिए लाये। सड़ाएं! सड़ा कर भी देख लें! अपनी जिद के आगे कुछ समझते ही नहीं! शीतगृह बेकार न बनाया है लोग! पुराना राग अलापते रहते हैं। लेकिन माँ की हस्ती कहाँ है घर में। लीजिए! दूसरे क्या कहेंगे? प्यारे लाल जी ही चिल्लाने लगे, आलू से गंध आ रही है। उसको उलटता-पलटता नहीं है कोई। हमेशा उसको उलटना-पलटना चाहिए। कभी पत्नी पर झल्लाते हैं, कभी बेटों पर, कभी बेटियों पर! सब हरामखोर है।
इसी बीच अमन भार्गव आ जाते हैं। प्यारे लाल
जी की बोलती बंद, लेकिन चेहरे पर अभी भी आवेश है। अमन नू पूछा, ‘‘क्या बात है बाबा? बहुत उद्विग्न
लगते हैं?’’
‘‘अरे! आप तो जानते ही हैं
अमन जी, किसान का जीवन झंझट और संकट से परिपूर्ण है, हर पल उसे लड़ना
है। आदमी और पशु-पक्षी के अतिरिक्त प्रकृति भी उसका दुश्मन।’’ प्यारे लाल जी ने
सामान्य होने की कोशिश की।
‘‘आखिर बात क्या है? दार्शनिक भूमिका
छोड़िए न! जमीनी यथार्थ क्या है? आपके सामने कौन संकट है?’’ अमन भार्गव ने
बाबा की बेचैनी का तात्कालिक कारण जानना चाहा।
प्यारे लाल जी जमीन पर उतर आये, ‘‘जमीनी यथार्थ यही
है अमन जी कि मेरा चार सौ क्विंटल आलू मार्च में सड़ना शुरू हो गया और लगता है दो
लाख रूपये की फसल बर्बाद हो जायेगा।
‘‘सिंडीकेट के आढ़तियों से
संपर्क कीजिये और सब्जी गोला में आलू सप्लाई कीजिए,’’ अमन भार्ग ने सुझाया।
प्यारे लाल जी हँकड़ें, ‘‘साले आढ़तिये! पूरा माल एक साथ लेने को तैयार नहीं।
दस-बीस बोरा माल भाड़ा लगाकर स्वयं पहुँचाइये, उनके पास इतना माल रखने
का स्पेस नहीं है।’’
प्यारे लाल जी के सामंती संस्कार में
प्रतिवाद और संवाद के लिए कोई जगह नहीं है। वे पागल हाथी की तरह चिघाड़ते रहते हैं, प्रतिदिन सड़ा आलू
बिन-बिछ कर सड़क पर फेंका जाता रहा। बाजार भाव चढने के इंतजार में आधा आलू सड़ गया।
बाजार भाव दोगुना हो गया है। अंत में कम दाम पर ही आलू बेचना पड़ा, जितना मूल्य खेत
में व्यापारी दे रहा था, वह भी नहीं मिला, खेत से ट्रैक्टर द्वारा आवास
तक लाने में अतिरिक्त खर्च हुआ और मानव-श्रम बर्बाद हुआ। सूखने से आलू का वजन भी
कम गया। किसान बाजार को नियंत्रित नहीं कर सकता।
इस बीच रामचंदर बाबा आजकल इश्क में गिरफ्तार
हैं। कई जरूरी बातें भूल जाते हैं। कृषि वैज्ञानिक भवेश ने कृषि फार्म में फूलगोभी
के बिचड़े की नर्सरी तैयार कराई। प्यारे लाल जी ने एक बीघे खेत में फूलगोभी के
बिचड़े लगवाये। बगल का खेत गणेश महतो का है। गणेश भी फूलगोभी के बिचड़े लगाये। आरंभ
में प्रतिदिन शाम-सबेरे बिचड़ों की जड़ों को पानी से भिगोना जरूरी है। जानवरों से भी
बचाना है। दिन रात अगोरिया करना है। रामचंदर बाबा के लिए दिन-दिन भर अकेले खेत में
रहना संभव नहीं। गणेश महतो सपरिवार घर में रहते हैं। कभी पत्नी घर जाती है तो बेटी
आ जाती है। बेटी जाती है तो बेटा खेत में आ जाता है, तो कभी गणेश घर चले जाते
हैं। इस तरह घर और खेत की देखभाल पारापारी करते रहते हैं। यहाँ रामचन्दर बाबा
अकेले! गाँव में लौटते हैं तो घर में अकेले! खेत में लौटते हैं तो अकेले! रात में
कभी साढ़ का डर, कभी भैंसे का, कभी नीलगायों का। गणेश महतो ने बाजाप्ता मचान
पूरा लिया है खेत के एक कोने में बीच में पुराना कोट पहने बिजूका खड़ा है। बिजूका
तो रामचंदर बाबा के भी खेत में खड़ा है। लेकिन स्वयं उनका जीवन बिजूका बन कर रहा
गया है। सामंती बरगद की छत्र छाया में उनका विकास अवरूद्ध है। बरगद की जड़ें धरती
में जकड़ी हुई हैं। वे कब मुक्त होंगे इस सामंती जकड़न से। अभी तो उनके मानस पर
सुमंती छायी है। सुमंती शाम ढ़लने पर शौच के बहाने जनक मिस्त्री के घर से बाहर निकल
आती हैं। जबतक दोनों मिल नहीं लेते, तब तक बेचैन रहते हैं। रामचंदर बाबा इस
आँख-मिचौनी के खेल में शीत की चपेट में आ गये। सर्दी-बुखार से ग्रस्त हो गये। वे
भाग कर आरा आ गये, माँ की शरण में। कोबी के छोटे-छोटे पौधे बिन
मउआर के हो गये। उनकी कोमल जड़ों को भिगोने वाला कोई नहीं रहा। देखरेख के अभाव में
कोबी के पौधे मुरझा गये।
रामचंदर बाबा पर प्रेम की मस्ती छायी है।
प्यारे लाल चौबे पर किसी नामी गरामी हिन्दी कवि की कविताओं का एकल काव्य-पाठ अपने
आवास पर कराने का धुन सवार है। चर्चा में रहना उनकी फितरत है। राजनीतिक बहसों में
उलझे रहते हैं। वीर कुवँर सिंह स्टेडियम में जिला प्रशासन प्रति वर्ष कृषि विकास
प्रदर्शनी आयोजित करता है। केबिननुमा स्टालों पर कृषक अपनी फसल की नुमाइश करते
हैं: पाँच फीट लंबा कद्दू, पाँ पसेरी का कोहड़ा, कद्दू के आकार का
बैगन और डेढ फीट लम्बी मूली, एक-एक किलो के टमाटर आदि-आदि। बैंक में कृषि-ऋण
की सुविधा। उन्नत बीजों के स्टॉल। प्यारे लाल कृषि मेला प्रत्येक दिन जाते हैं।
स्टॉल वालों से मिलते हैं, जानकारी प्राप्त करते हैं। उधर उनका अपना कोबी
का पौधा खेत में सूख रहा है। कृषि विकास मेले के बाद पुस्तक मेला। प्यारे लाल जी
साहित्य प्रेमी हैं। आजकल मैत्रयी पुष्पा का उपन्यास अल्मा कबूतरी पढ़ रहे हैं।
पुस्तक मेले से कई अच्छी किताबें खरीदते हैं। एक किसाननुमा बुद्धिजीवी मुक्त्तिबोध
की कविताओं, मैत्रेयी पुष्पा के उपन्यासों और डॉ0 राम विलास शर्मा की
आलोचना पुस्तकें पढ़ता है: हिन्दी रचनाकारों के लिए यह शुभ समाचार है कि उनकी
पुस्तकों की पाठकीयता बढ़ रही है, लेकिन पाठक बेचारे के खेत में कोबी के
छोटे-छोटे पौधे पटवन के अभाव में सूख रहे हैं।
कृषि वैज्ञानिक भवेश जी एकवारी गाँव के दौरे
से लौट आये हैं। उनका प्रस्ताव है कि परवलपुर चला जाये और कोबी के पौधों की हालत
अपनी आँखों से देखा जाये। साथ में कैमरा भी रहेगा।
प्यारे लाल जी परवलपुर जायेंगे, बरिष्ठ कवि
चन्द्रकांत देवताले के एकल काव्य-पाठ के बाद। कवि देवताले पटना पुस्तक मेले में
एकल काव्य पाठ के लिए आमंत्रित थे। आरा के साहित्य प्रेमियों ने उन्हें एक मंच
दिया। कवि चन्द्रकांत देवताले सहित स्थानीय साहित्यानुरागियों के लिए स्मरणीय दिन
रहा। उपस्थित लोगों ने छक कर काव्य-पाठ का रसास्वादन किया।
उधर कोबी के कोमल पौधे सूखते रहे। रामचंदर बाबा
सर्दी-बुखार से मुक्त्त होकर परवलपुर भागे।
भवेश और प्यारे लाल स्कूटर से परवलपुर गये।
कोबी के खेत को देखकर दोनों भौंचक रह गये। लगता था जैसे कोबी के पौधों की जड़ों में युरिया का घोल-डालकर किसी ने उन्हें गला दिया है।
एक बार फिर प्यारे लाल के सपने बिखर गये।
बगल के खेत में गणेश महतो का परिवार कोबी के बित्ता भर के पौधों की जड़ों को
भूर-भूरी मिट्टी से ढँक रहा था। प्यारे लाल जी ने गणेश से पूछा, ‘‘ऐसा कैसे हुआ
गणेश’’?
गणेश महतो ने दुःखी स्वर में कहा, ‘‘खेती इंतजार नहीं
करती किसान का। किसान इंतजार करता है खेती का। रामचंदर बाबा सप्ताह भर से नहीं है।
शायद सर्दी-बुखार से ग्रस्त हैं। आप महीना दिन बाद दर्शन दे रहे हैं।’’
प्यारे लाल जी ने अवसाद भरे स्वर में कहा, ‘‘अरे भाई गणेश, तुम पड़ोसी हो, कम से कम एक बार
खबर तो करते?’’
‘‘कीटनाशक खरीदने गया था, तो अपके आवास पर
खबर देने गया था। पता चला, आप पटना पुस्तक-मेला गये हैं किसी कवि को लाने।
रामचंदर बाबा से भेंट हुई थी, उनसे कोबी पटाने की बात कहा था। उन्होंने आने
के लिए कहा, लेकिन कहाँ लौटे।’’
प्यारे लाल जी किंकर्त्तव्य विमूढ़ हो गये।
उनके मन में अवसाद भर गया। लगा छाती जकड़ गई हैं, उसमें कुछ फँस गया है। वे
न शहर में रह पा रहे हैं, न देहात में।
वे कृषि वैज्ञानिक भवेश के साथ आरा लौट आये।
आज भवेश जी खेतों का कोई द्दश्य कैमरा में कैद नहीं कर पाये। डॉ0 अशोक सान्याल के
क्लीनिक के निकट उन लोगों की भेंट जनक मिस्त्री से हुई।
जनक मिस्त्री ने चौबे जी को सूचित किया कि
रामचंदर बाबा उसकी साली सुमंती को ले कर परवलपुर से कहीं चले गये। यह सुनकर चौबे जी
का दिमाग चकरा गया। वे छाती पकड़ कर वहीं बैठ गये। जनक मिस्त्री बड़े असमंजस में पड़े।
भवेश जी ने उन्हें डाँटा भी, ‘‘इस तरह की बातें हठात् माता-पिता को नहीं बताई
जाती।’’ जनक मिस्त्री ने अफसोस जारी किया और दोनों मिलकर किसी तरह
उनको घर ले गये।
भवेश जी डॉक्टर बुलाने चले गये। जब वे डॉ0
तुषार कांत सिन्हा को लेकर प्यारे लाल चौबे के आवास पर लौटे, उस वक्त चौबे जी
छाती पकड़कर पलंग पर लेटे थे। उनकी आँखें बंद थीं। सीलिंग फैन चल रहा था। उनके सिर
की ओर उनकी सदासेविका धर्मभीरू धर्मपत्नी पलंग पर बैठी सिर सहला रही थी। दूसरी ओर
गोड़तारी छोटी बेटी कृष्णा पैर चांप रही थी।
डॉक्टर सिन्हा को देख कर पत्नी और बेटी खड़ी
हो गई। डॉक्टर ने स्टेथोस्कोप से हृदय की गति का परिश्रवण किया, फिर रक्त्तचाप
नापा। चौबे जी से पूछा कि क्या कष्ट है? चौबे जी ने बुदबुदाते हुए
कहा, ‘‘छाती जकड़ गई है। माथा भारी लग रहा है। दम फूल रहा है।’’
डॉक्टर सिन्हा ने आश्वस्त किया, ‘‘सामान्य सदमा लगा
है। चिंता करने की जरूरत नहीं है। आराम से सोने के लिए इंजेक्शन लगा दे रहा हूँ।
अच्छी नींद के बाद ताजगी महसूस करेंगे।’’
डॉक्टर सिन्हा और कृषि वैज्ञानिक भवेश चले
गये। प्यारे लाल चौबे संस्कारगत जकड़न से लड़ रहे हैं। जब-जब वे पुरानी रूढ़ियों को
तोड़ने के लिए संकल्प लेते हैं, सामाजिक विशेषाधिकार प्राप्त उनका मन हिंसक हो
उठता है। वे सहम जाते हैं। उनका संकल्प टूट जाता है।
संपर्क
मदन जी का हाता
मदन जी का हाता
आरा-802301, बिहार
मो0
09931171611
(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स वरिष्ठ कवि विजेंद्र जी की हैं।)
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jitendra kr ji ki kahani jakaran ki jakaran koi aisee vaisee jakaran nahi hai.Yah purane samanti sanskaron aur usake aadhunik pratiroopon ki gatishilata ki jakaran hai.Goan se shahar aur kheti se behatar vyavasay ya vyavasayik kheti jaisi aadhunikata ka shigufa sarkari shigufa hai.Kahani ke patra aaspas ke jivan ke hain aur ye vyakti se adhik mansikta ke prateek hain.
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