कठफूला बाँस: करुणा और प्रतिरोध का सौन्दर्य

विजेन्द्र जी की लम्बी एक कविता है 'कठफूला बाँस।' यह कविता श्रीराम तिवारी की पत्रिका 'पक्ष' में १९७७ ई में छपी थी। अनेक दृष्टियों से महत्वपूर्ण इस कविता की तरफ आलोचकों का लम्बे अरसे तक ध्यान नहीं गया। तिवारी जी ने अपनी सम्पादकीय टिप्पणी में लिखा था - 'इस कविता से एक मुकम्मिल रचनात्मक स्थिति सामने आती है, जिसकी रचना सामग्री में खेतिहर जीवन, वस्तु संवेदना, चेतना, पदार्थ, लय, इतिहास, घटना, दृश्य, स्थिति, भाषा, विचारधारा के विकास की संगति कवि के निजी शिल्प में हमें ऐतिहासिक मोड़ के बिन्दुओं की पहचान कराती है। इन विन्दुओं में दो हैं : "संगठन और रचनात्मकता।" अपनी  मिट्टी से इतना सहज लगाव दूसरे कवियों में कम है। हमें दुःख है कि विजेन्द्र की इस कविता का प्रकाशन पक्ष के लिए १९७४ के साल से ही रुका रहा। फिर भी पानी बहा नहीं है। हम इस कविता से आज की स्थिति में वस्तुगत यथार्थ का साक्षात्कार कर  सकते हैं।' इस लम्बी कविता की एक महत्वपूर्ण आलोचना की है हमारे समय के वरिष्ठ आलोचक अमीर चन्द्र वैश्य ने, जो पहली बार के पाठकों के लिए प्रस्तुत है।         

अमीर चन्द वैश्य

    मेरे सामने ‘कठफूला बाँस’ है। समालोचना के लिए। चार लम्बी कविताओं का संकलन है। कठफूला बाँस (1977), संवाद: स्वयं से (2011) ओ एशिया (2012) और कौतूहल (2012)। सर्जक का नाम जाना-पहचाना है। वरिष्ठ कवि विजेन्द्र। मूल रूप से बदायूँ जनपद के निवासी हैं। यह संकलन उनका बीसवाँ संग्रह है। लम्बी कविताओं का तीसरा। प्रकाशन वर्ष है सन् 2013.

    आधुनिक हिन्दी कविता में अनेक काव्य-रूप सामने आए हैं। लेकिन यह तथ्य स्मरणीय है कि ‘महाकाव्य’ का स्थान अब लम्बी कविता के रूप ने ग्रहण कर लिया है। ‘कामायनी’ जैसे महान काव्य ने महाकाव्य के परम्परागत प्रतिमान और उसके साँचे दोनों खंडित कर दिए हैं।

    यहाँ यह भी याद रखना चाहिए कि छायावादी कवियों- प्रसाद-निराला-पंत ने लम्बी कविताएँ रची हैं। ये कम महान नहीं हैं। प्रलय की छाया, तुलसीदास, सरोज-स्मृति, राम की शक्ति पूजा,  कुकुरमुत्ता, परिवर्तन शीर्षक लम्बी कविताएँ आधुनिक हिन्दी कविता की उपलब्धियाँ हैं।

    सवाल यह है कि लम्बी कविता की रचना अनिवार्य क्यों है। काव्य-गोष्ठियों और कवि-सम्मेलनों के मंच पर अथवा मुशायरों में कवि और शायर मुक्तक-रुबाई-गीत-ग़ज़ल और फूहड़ हास्य की कविताएँ ही अधिक सुनाते हैं। मात्र मनोरंजन के लिए। उनका कोई बड़ा प्रयोजन सामने नहीं होता है। आचार्य मम्मट ने काव्य-प्रयोजनों की व्याख्या करते हुए ‘शिवेतरक्षतये’ को सर्वोपरि प्रयोजन माना है। सीमित फलक वाले काव्य-रूप इस महत्त्वपूर्ण प्रयोजन की समयक् पूर्ति नहीं कर सकते हैं।

    वर्तमान काल का वैश्विक घटनाक्रम इतनी जल्दी-जल्दी बदला है कि वह गीत-ग़ज़ल में पूरी शिद्दत से व्यक्त नहीं किया जा सकता है। तात्पर्य यह है कि सामाजिक-राजनैतिक-आर्थिक-धार्मिक परिघटनाएँ इतनी त्रासद हो गई हैं कि आम आदमी का जीना मुश्किल हो गया है। लगभग असम्भव। इसीलिए समाज में घनघोर विषमता है। खाए-अघाए सम्भ्रान्त जन उल्टी करते हैं। और दाने-दाने को तरसने वाले उसी उल्टी में से अन्न के दाने बटोरते लगते हैं। ऐसा क्यों हो रहा है। कब से हो रहा है। ऐसा समाज कब बदलेगा। कैसे बदलेगा। अमरीका का साम्राज्यवादी विराट् पंजा कैसे मरोड़ा जाएगा।

    ऐसे बेचैन सवालों के जवाबों के लिए ही लम्बी कविता का रूप विकसित हुआ है। अपनी महत्त्वपूर्ण लम्बी कविताओं के कारण ही मुक्तिबोध की विशेष पहचान निर्मित हुई है। उनकी प्रसिद्ध कविता ‘अँधेरे में’ का महत्त्व बताते हुए कविश्री शमशेर ने ठीक लिखा है-

    ‘‘यह कविता देश के आधुनिक जन-इतिहास का, स्वतंत्रतापूर्व और पश्चात् का एक दहकता इस्पाती दस्तावेज़ है। इसमें अजब और अद्भुत रूप से व्यक्ति और जन का एकीकरण है।’’ (एक विलक्षण प्रतिभा; चाँद का मुँह टेढ़ा है’, पृ0 27, 28। तृ0सं0, (1971)

    सन् सत्तर के दशक में अनेक युवा कवियों ने मुक्तिबोध से प्रेरित होकर अनेक लम्बी कविताएँ लिखी थीं। कुछ के नाम उल्लेखनीय हैं। असाध्य वीणा, प्रमथ्यु गाथा, दो चट्टानें, आत्महत्या के विरूद्ध, मुक्ति प्रसंग, पटकथा, उपनगर में वापसी, घास का घराना, बलदेव खटिक। इत्यादि।

    उपर्युक्त कविताओं में लोकधर्मी वरिष्ठ कवि विजेन्द्र की एक भी लम्बी कविता का नाम शामिल नहीं किया गया है। हकीकत यह है कि भरतपुर के ग्रामीण परिवेश-परिदृश्यों एवं वहाँ के निवासी श्रमिकों-कृषकों को केन्द्र में रखकर विजेन्द्र ने पहले ‘जन-शक्ति’ की रचना की थी। सन् 1977 में ‘कठफूला बाँस’ की। डॉ0 जीवन सिंह ने ही इन दोनों कविताओं का महत्त्व रेखांकित किया है। लेकिन ‘कठफूला बाँस’ का विवेचन-मूल्यांकन अभी तक सम्भव नहीं हो सका है। शायद, आलोचकों की उपेक्षा के कारण लेकिन सत्य तो यह है कि ‘हुआ कब सुरभि के लिए फूल बंधन।’

    अपनी सीमित जानकारी के आधार पर लिख रहा हूँ कि मुक्तिबोध के बाद जितनी अधिक वैविध्यपूर्ण लम्बी कविताएँ विजेन्द्र ने रची हैं, उतनी अन्य किसी तथाकथित महान कवि ने नहीं। यथा- केदारनाथ सिंह, कुँवर नारायण, विनोद कुमार शुक्ल ने। लेकिन दिल्ली के साहित्यिक सामंतों ने विजेन्द्र की सदैव उपेक्षा की है।

    उनकी लम्बी कविताओं के सन्दर्भ में मैंने एक पत्र उन्हें लिखा था। उसमें मेरी कुछ जिज्ञासाएँ थीं। विजेन्द्र ने अपने पत्र दिनांक 05.08.1993 में मुझे संबांधित करते हुए लिखा था-

    ‘‘प्रिय भाई,
        लम्बा पत्र।
        दरअसल लंबी कविता के लिए, मुझे नहीं पता (कि) मैं किसी बड़े कवि से अनुप्राणित भी रहा हूँ। पर त्रिलोचन से तो कतई नहीं। त्रिलोचन के लिए लंबी कविता ‘नगई महरा’ मात्र अपवाद है। वह प्रगीत और सॉनेट के कवि हैं। $ $ $ मेरे दिमाग में सर्वाधिक निराला और मुक्तिबोध रहे होंगे। बहरहाल।’’

    कविश्री विजेन्द्र निराला को तो अपना आदर्श कवि मानते हैं। उनके ‘नये पत्ते’ की कविताओं ने उनहें प्रेरित-प्रभावित किया है। लेकिन वह मुक्तिबोध के फैंटेसी शिल्प पूरी तरह सहमत नहीं हैं। वह अक्सर कहते हैं कि मुक्तिबोध के काव्य में आत्म-संघर्ष तो है, जीवन-संघर्ष नहीं। उनमें सक्रिय किसानों के चित्रों का अभाव है। हाँ, साँवले गुलाब जैसे मजदूरों के चित्र अवश्य हैं। फैंटेसी के कारण मुक्तिबोध की भाषा लोक-जीवन से असम्पृक्त हो गई है। अतः मुक्तिबोध सहज बोधगम्य कवि नहीं हैं।

    विजेन्द्र यहीं नहीं रूकते हैं। वह आगे यह भी कहते हैं- पहले आप मुक्तिबोध के पत्र पढ़िए, जो नेमिचन्द्र के नाम से लिखे गए हैं। पत्र पढ़कर मालूम हो जाएगा कि मुक्तिबोध में क्या कमियाँ थीं।

    विषयान्तर हो रहा है। मुद्दे की बात यह है कि भारतीय पूँजीवादी लोकतंत्र की दुरवस्था बदलनी है तो किसानों-मजदूरों की ‘जनशक्ति’ को सुदृढ़ करना होगा। विजेन्द्र के कर्मशील के सर्वाधिक वर्ष भरतपुर में बीते थे। वह नित्य आस-पास के गामों के कर्मठ लोगों से मिलते थे। बतियाते थे। उनकी बोली-बानी आत्मसात करते थे। उनके ब्रज-भाषा-प्रेमी होने का यही कारण है।

    प्रसंगवश यहाँ अपनी एक मूर्खतापूर्ण भूल की ओर संकेत करना जरूरी है। सच्चाई बताने के लिए। ‘कृति ओर’ के ‘लोकधर्मी काव्यालोचन विशेषांक’ में छपे अपने आलेख में एक स्थान पर लिखा है-‘‘मुक्तिबोध अपनी महत्त्वपूर्ण लम्बी रचनाओं के लिए प्रसिद्ध हैं। आज़ादी के बाद भारतीय पूँजीवादी लोकतांत्रिक व्यवस्था के घनघोर अँधेरे को व्यक्त करके उन्होंने यथास्थिति को ध्वस्त करने के लिए प्रकाश की अगणित किरणें विकीर्ण की हैं। उनकी सफलता से प्रभावित होकर मन्द बुद्धि वाले कवियों ने यश-प्राप्ति के लिए लम्बी कविताओं की ऐसी रचना की है, जिन्हें आद्यंत पढ़ना और समझना हिमालय की चोटी पर चढ़ना है।’’ (पृ0 46, 47) मेरे इस कथन का आशय केवल देवी प्रसाद मिश्र की लम्बी कविताओं से है। ‘पहल’ 90 में छपी उनकी लम्बी कविता ‘वह कोई एक दिन तो ज़रूर था से वरिष्ठ कवि विजेन्द्र एवं अन्य कवियों पर मेरा कथन लागू नहीं होता है। अपनी भूल के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ।

    आइए, ‘कठफूला बाँस’ की पाठ-यात्रा प्रारम्भ करें। संकलन के प्रारम्भ में ‘बात अपनी’ समझाते हुए विजेन्द्र ने कुछ महत्त्वपूर्ण बातें लिखी हैं- ‘‘जनशक्ति’ और ‘कठफूला बाँस’ दोनों कविताएँ 1970 के दशक की हैं। $ $ इस दौर में ‘नई’ तथा ‘कविता’ का जोर था। मुझे उसमें व्यक्त मध्यवर्गीय कुण्ठा, निराशा, अत्यधिक निजबद्धता तथा जीवन की रूग्ण मनोवृत्तियाँ आकर्षित नहीं कर पा रही थीं। $ $ $ $ श्रमिक संगठनों से करीबी रिश्तों का बढ़ना। लेखक संगठन में सक्रिय भागीदारी। जन-संगठनों में सक्रियता। $ $ $ इसी दौर में मार्क्सवादी दर्शन का अध्ययन वैचारिक पृष्ठभूमि तैयार कर रहा था। $ $ $ मुझे डॉ0 रामविलास शर्मा के दस आलेख ने बड़ा बल दिया, जिसमें ‘कविता के नए प्रतिमान’ पुस्तक को प्रगतिशील कविता के विरोध में खड़ी पुस्तक बताया गया था। $ $ $ $ चन्द्रबली सिंह ने 1956 में अपनी पुस्तक ‘लोकदृष्टि और साहित्य’ की भूमिका में लिखा है कि ‘‘साहित्य की महाप्राणता लोकजीवन में हैं। हिन्दी साहित्य का इतिहास इसका अपवाद नहीं है।’’ लेकिन चन्द्रबली सिंह ने अपनी स्थापना की व्याख्या लगभग नहीं की है।

    विजेन्द्र ने अपने सम्पूर्ण काव्य और गद्य-लेखन में ‘लोक’ के ‘उत्सवधर्मी रूप’ की उपेक्षा करके उसके ‘संघर्षधर्मी’रूप’ को वरीयता प्रदान की है। समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुरूप उनके काव्य में श्रमशील जन, उनके सम्पूर्ण परिवेश के साथ-साथ क्षिति-जल-गगन-समीर अनेक रूपों में, रूपायित किये गए हैं। विजेन्द्र के लिए अभिजात वर्ग के समान ‘लोक’ आरामगाह न होकर अग्रगामी जनशक्ति का प्रत्यक्ष रूप है। अतः वह ‘लोक’ को वर्गीय दृष्टि से देखकर उसके और उत्तरआधुनिकता के प्रखर आलोचक हैं। संक्षेप में उनकी उदात्त लोकदृष्टि गाँव से कस्बे तक, कस्बे से नगर तक, नगर से महानगर तक और भारतीय महानगरों से वैश्विक महानगरों तक व्याप्त है। तभी तो वह अपनी जन्म-भूमि ग्राम धरमपुर (बदायूँ) के शिल्पी अल्लादी और घोड़े वाले साबिर से रागात्मक सम्बन्ध जोड़ते हैं। अमरीका के महान अश्वेत गायक पॉल रॉब्सन पर आत्मीय भाव से कविता रचकर श्रम और स्वतंत्रता जैसे मानव-मूल्यों की रक्षा करते हैं। ‘पॉल रॉब्सन’ उनकी नवीनतम कविता है। रचना-समय है: जुलाई, 1913। (देखिए- ब्लाग: पहली बार;)

    सुधी समालेचक आनन्द प्रकाश ने सन् 1970 के दशक हिन्दी कविता का विश्लेषण करने के बाद विजेन्द्र के बारे में ठीक लिखा है कि ग्रामीण और अशिक्षित लोगों की कठोर जीवन क्रियाएँ और उनसे ‘पैदा होने वाली स्वस्थ मानवीय संवेदनाएँ’ विजेन्द्र की कविता के प्रेरणा-स्रोत हैं। ‘निश्चित ही यह एक ऐसा पक्ष है, जिसको रेखांकित करना चाहिए। विजेन्द्र इस पक्ष को कविता में प्रस्तुत करके एक आवश्यक रचनात्मक धर्म निभाया है और सामान्य कविता-लेखन को ठीक आगाह किया है कि वह अपनी संकुचित दुनिया के हानिकारक तत्त्त्वों को पहचानें।’’ (समकालीन कविता: प्रश्न और जिज्ञासाएँ, पृ0 43)

    ‘पक्ष’ नामक पत्रिका के सुधी संपादक श्रीराम तिवारी ने ‘कठफूला बाँस’ का महत्त्व बताते हुए लिखा है कि ‘कठफूला बाँस’ वास्तविक यथार्थ की सार्थक जनवादी परिणति और प्रयाण की राम-कथा है। (प्रवर्तन: परिप्रेक्ष्य की परख और वर्तमान स्थिति, कवर पृ. सं0 03)

    आशय यह है कि किसानों की दुख-भरी राम-कथा तभी समाप्त होगी जब उत्पीड़क-शोषक व्यवस्था का नायक दशानन मारा जाएगा। उसका अमृतत्व सोखा जाएगा। जनता-जनार्दन ही यह महान कार्य सम्पन्न करेगी। उल्लेखनीय है कि उपर्युक्त लम्बी कविता सर्वप्रथम ‘पक्ष’ में प्रकाशित हुई थी।

    भरतपुर के जन-जीवन और उसके मनोरम परिवेश, विशेष रूप से घना के पक्षी-विहार- के परम अनुरागी कवि विजेन्द्र 15.01.1974 की डायरी में लिखते हैं- ‘‘आज हवा तेज हे। शीत कट रहा है, धूल भी उड़ती है। पर आदमी हे, जो उसके समकक्ष खड़े हैं।’’

    ‘‘मैं आज भोर में फिर मलाह गाँव की तरफ गया। सुबह घूमने का यही क्रम है। वहाँ देखा, लोग चारपाइयों पर बैठे घाम में घमिया रहे हैं। हाथ में चिलम है। कुछ के हुक्का .........ग ग ग हवाएँ सदा प्रतिकूल ही रहें, ऐसा निसर्ग का विधान नहीं है न जीवन में न प्रकृति में। एक कभी रहता ही नहीं।’’ (चिन्तन दिशा, अंक-2; 2011, पृ0 71)

    प्रसंगवश यह बात ध्यातत्वय है कि लम्बी कविता ‘कठफूला बाँस’ का प्रारम्भ मलाह गाँव और जाड़े के वर्णन से होता है। यह गाँव भरतपुर के पास है, जहाँ मल्लाह रहते हैं। और जिसका अपना खास इतिहास और भूगोल है। विजेन्द्र अपनी बात प्रारम्भ करते हुए लिखते हैं-

‘‘मैं गया तब वहाँ जाड़ा था, जाड़ा हड्ड फोड़
मलाह गाँव में
वे देखते ही सकुचे
सिमटे
मेरे साथ उनके गुरु थे
खाट से उठ जैराम किया
आवभगत में मुस्काने
बड़ा जाड़ा था
निखरी धूप के दिन थे
गर्दन तोड़ हवा थी, नकसूद बर्फाँद
ठर्र....ऽ.....ठर्र......ऽ.......साँस देखते ही बोले, ओ, अहो भाग्य
आओ जी आओ पधारौ गुरु जी
इधर आओ इधर सिरहाने।’’ (पृ0 01, टंकित प्रति)


    उपर्युक्त अंश राजस्थानी जन-संस्कृति और भीषण जाड़े की मार से साक्षात्कार करा रहा है। सम्पूर्ण कविता में जाड़े की भीषणता का उल्लेख पद या गीत की टेक के समान अनेक बार हुआ हे। कवि ने ‘देखना’ क्रिया का अनेक बार प्रयोग किया है। वहाँ के परिदृश्य का, गरीबी का, श्रम का, संवादों का, इतिहास के क्रम का, अनेक स्थानों का वास्तविक वर्णन किया है। अनेक संज्ञाएँ प्रयुक्त हुई हैं। व्यक्तियों के नामों के रूप में। यथा- कुँवर सेन, धन्नू, तिरमल, वाल्मीक, सुकदेव, मटरुआ, गयासी, रमफला, चौधीरी, राधिका, रामधैन आदि। ये व्यक्तिवाचक संज्ञाएँ निष्क्रिय नहीं हैं। इस कविता का रचना-विधान नाटकीय है। अतएव कविता में आगत व्यक्तिवाचक संज्ञाएँ अर्थात् विशेष ग्रामीण जन सक्रिय रूप में रूपायित किए गए हैं। श्रम करते हुए। संवाद करते हुए। आक्रोश व्यक्त करते हुए। भूख-गरीबी से पीड़ित दयनीय रूप में। अधोलिखत शब्द-चित्र देखते हुए-

‘‘यह आए कुँवर सेन हार तैं/कसकर करब का भरौंटा धरे सिर पै।’’ (पृ0 02)
‘‘यह आए कुम्मैत बछेड़ा की तरह हिनहिनाते/ कल्लू खाँ/ कुट्टी का ढेर लगाय गबर-गबर/ कच्ची मटरा भखते/ और लाँची मछरिया सी आबारी चौड़ाए/ ओह..... बड़ा जाड़ा है।’’ (पृ0 02)
‘‘विदेशी आक्रमणों के शोक गीत/ अँग्रेजों ने सुगठ इकाइयों को तोड़ा यहाँ/ यहाँ की लड़ाकू जनता ने बीड़ा उठाया/ गोकुला, खुमी की तरह काठ से, फूटकर बोला/ ललकारा फिरंगियों को/ राजाराम सेंहुड़ा जैसा तर्राया धरती पर/ मुट्ठी भर ने छक्के छुड़ाए/ मुक्ति-युद्ध लड़कर।’’ (पृ0 06)
‘‘अब पंडित सुकराम जी से/ बात चौधरी ने गपच ली..... बोले/ क्यों गपोड़ी बने हो यार/ क्या तुम्हें बुढ़ापा रास नाँय आवै।’’ (पृ0 07)
‘‘कहाँ थे झम्मन भाई इतनी देर से/ सगरी राम कथा खतम होने को है/ क्यों एँड़ते हो गैंड़ मछरिया से ऐसी निखरी धूप में/ तुम्हें बाजरा खूब लगा दीखे है/ पेट निकाल आया है देसी तरबूज सा।’’ (पृ0 37)
‘‘अरे चौधरी कान बाँधो/ अपने कान/ यह चिल्ला है हड्ड फोड़/ सीधे उघरी पसलियों पर वार करता है/ ग ग ग  कितने दिन हुए नरसिंहा को/ पीलिया नहीं छोड़ता/ तुलसिया सूजी धरी है/ पेट तक/ खेमराज की अंतड़ियों में गलाव है।’’ (45/46)

    उपर्युक्त कवितांश साक्षी हैं कि ‘भाखा’ बोलने वाले हिन्दुस्तान का असली रूप कैसा है। सहज एवं बोधगम्य खड़ी बोली की भाषाई संरचना में ब्रज की बोली-बानी दूध में मिसरी की तरह घुल गई है।

    प्रायः कहा जाता है कि कृषक वर्ग सीधा-सादा होता है। भोला-भाला भी। यह पूरा सत्य नहीं है। पानी सिर से उतरने लगता है तो यह वर्ग अधिकारों के साथ अपनी जीवन रक्षा के लिए कमर कस लेता है। अतएव विजेन्द्र लिखते हैं,

‘‘कब तक करूँगा प्रतीक्षा
शिव का त्रिनेत्र खुलने की * * *
माँगे थे इन्होंने अधिकार अपने
फसलों को पानी
अकाल राहत
हाँ, ये वहीं हैं
जिन्होंने तोड़ी शलाकें
खुली छाती पर खाँईं
गोलियाँ बेहाल
अग्नि-दाह
इन्होंने खड़ी फसलें उजाड़ने से
बड़ों को रोका।’’ (पृ0 17)


लड़ाकू कृषक वर्ग का यह जुझारू आज भी देखा-सुना जा रहा है। जगह-जगह प्रदर्शन हो रहे हैं। प्रतिरोध हो रहा है। बुन्देलखण्ड के किसान इसका सबूत हैं, जहाँ मुनाफाखोर माफिया वर्ग खनन से भू-सम्पदा लूट रहा है। किसान भूख से लड़ रहा है। सुदृढ़ कृषक संगठन और एकता के अभाव से प्रतिरोध सबल नहीं है। अतएव कवि प्रश्न उपस्थित करता है-

‘‘किसानों का कोई एका नाँय
कोई अगुआ नाँय/ कैसे खड़े हों।’’ (वही, पृ0 20)


    वह किसानों के पक्ष का समर्थन करते हुए वर्तमान व्यवस्था की क्रूरता उजागर करता है-

 ‘‘अन्दर से उठती है आवाज़ पूरे गाँव की
जिसने जोती धरती वो है उसी की/’’


लेकिन यह काम आसान नहीं है, क्योंकि

‘‘अभी पुलिस उनकी है
यंत्र-तंत्र उनके हैं
बड़ों-बड़ों का रूतवा है
संसद में हमारे नाम पर झप्पी आती है
बौहरा कर्ज देकर हरबार बट्टता है
यहाँ किससे कैसे लड़ें
किसके बल लड़ें।’’ (वही, पृ0 20)


    कविता का उपर्युक्त अंश और अधिक सार्थक है आज के सामाजिक-राजनैतिक परिवेश में। आजकल सरकार बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को लाभ पहुँचाने के लिए किसानों की भूमि का अधिग्रहण कर रही हे। ब्रिटिशकालीन कानून के बल से। लाखों किसान आत्म-हत्या कर चुके हैं। ऋण न चुकाने के कारण। उन्हें बैंक से लान तो मिलता है, लेकिन मुश्किल से। अतः साहूकार से ऋण लेना पड़ता है। किसान की हालत प्रेमचन्द के होरी से भी बुरी है। इस कविता में विजेन्द्र ने किसानों के जीवन को निकट से देखकर उसका वास्तविक वर्णन किया है। एक वर्णन इस प्रकार है-

‘‘यह जाटौली का खेरा है पुरानखंडी
अघासुर का टीला
अघासुर का रहा होगा कभी धाम
महावट के अभाव में
गेहूँ चना गुर्चनी
सब बौने रह जाते हैं
इस इलाके का किसान मस्तक रेखाएँ
गिनता है
आकाश निहारता है
भूरा-भक्क कपड़े पहन के आए जो पारसाल
अब कहाँ है।’’ (वही पृ0 25)


 ‘भूरा-भक्क कपड़े’ नेताओं की ओर संकेत कर रहे हैं, जिनके विश्वासघात जन-गण-मन सुपरिचित हो गया है। तभी तो अदम गोंडवी ने लिखा है-

‘‘पक्के समाजवादी हैं तस्कर हों या डकैत
इतना असर है खादी के उजले लिबास में।’’


    लेकिन विजेन्द्र अपने ब्रज जनपद के प्रति आशावादी हैं। द्वन्द्वात्मकता के समर्थक होने के नाते वह परिवर्तन के प्रति आस्थावान् हैं। तभी तो वह उद्घोष करते हैं-

‘‘हर रोज़ होते हैं चीरहरण
आँखें खोलो
जागना बड़ी क्रिया है
जो कर्ता को सोता हुआ नहीं देख सकती
फूटता है युग का ललौंहा नोकदार कल्ला
फोड़ कर धरती का सीना
कहाँ है रसातल
जो छुपा सके अग्नि-दाह को
बड़ी डरावनी शक्ल है कालदेव की
इसी जगह बानासुर पिटे हैं
खण्डव दहल हुआ है
देवों को हराया अग्नि ने
* * * अब सिर्फ जली उल्काओं के
ढेर हैं राख के
वहाँ है चिनगारी का खिला पलाश।’’ (वही, पृ0 27)


    ‘चिनगारी का खिला पलाश’ प्रतिरोध की अग्नि प्रज्वलित कर सकता है। उपर्युक्त अंश में विजेन्द्र ने अपने सम्यक् इतिहास-बोध की अभिव्यक्ति की है। ‘कालदेव’ अर्थात् इतिहास, का सुदर्शन चक्र ही अमंगल का विनाश करता है। महादेव शंकर को ‘महाकाल’ कहा जाता है। आशय यह है कि कवि ने पौराणिक सन्दर्भों का प्रयोग तार्किक रूप में किया है।

    कवि का प्रतिरोध एवं आशावाद चिन्ता के साथ अन्यत्र भी व्यक्त हुआ है-

‘‘भूख की ज्वालाएँ जीता हूँ पचा के
कैसे जगे भूमिहीनों की महासेना
कैसे बिछी फसल उठकर
खड़ी हो

कैसे बनें किसानों-श्रमिकों के संगठन अटूट
सन्नाटा है चारों ओर
तनिक दहक हुई गोलियाँ दागीं
फिर भी वे लड़ते रहे
ऐसे में दिखा वसंत का पहला बौर
* * * उठो तुम जागो
मत बनने दो बूचड़खाना देश को
इतना घना तमस

इतना खून
जैसे कल्लन कसाई का वार
* * * आन्ध्रा में सुगबुगाहट है
सुना है वेणु कवि है
इस अँधेरे का सफर लम्बा है
सुना है झूठी भाषा की छूट पट्टी है
सुना है विष्णुचन्द्र ने अपने घर में
अंगूर-लतर बचा ली

त्रिलोचन चुप हैं
बाबा क्रुद्ध।’’


लेकिन

‘अस्मिता सजग हैं नामवर
लगता है गिरगिटों का जुलूस मेरी ओर आया
* * * पंक्तिबद्ध लोग कहाँ हैं।’’ (वही, पृ0 28, 29)


        आजकल अनेक अस्मिताएँ समाज के लिए खतरा बन गई हैं। ‘अस्मिता’ स्वयं समाज से काटकर अपना हित सर्वोपरि समझती हैं।

        विजेन्द्र ने भरतपुर के मल्लाह गाँव के जन-जीवन के साथ-साथ उस समय के भारत का प्रतिरोधी चरित्र भी व्यक्त किया है। उस समय इन्दिरा गाँधी प्रधानमंत्री थीं। जे0पी0 अर्थात् जयप्रकाश नारायण उनकी नीतियों का विरोध कर रहे थे। उनके द्वारा ‘सम्पूर्ण क्रान्ति’ का उद्घोष किया गया। बाबा नागार्जुन भी जे0पी0 के आन्दोलन में शामिल हुए थे। लेकिन आन्दोलन की असलियत जानकर उन्होंने उसे ‘खिचड़ी विप्लव’ कहा। उन्होंने आपात् काल में इन्दिरा गाँधी की तानाशाही का प्रखर विरोध किया था। लेकिन मार्क्सवादी आलोचक डॉ0 नामवर सिंह ‘कविता के नए प्रतिमान’ (1968) रच रहे थे। आधुनिकतावादी कवियों- साही, रघुवीर सहाय, श्रीकान्त वर्मा, कुँवर नारायण, केदारनाथ सिंह के काव्य को प्रतिमानों का आधार बनाया, लेकिन घोषित यह किया कि नए प्रतिमानों के केन्द्र में मुक्तिबोध हैं; काव्य में अस्मिता-बोध की चर्चा की गई। उनके नए प्रतिमानों ने नागार्जुन-केदारनाथ अग्रवाल- त्रिलोचन की लोकोन्मुखी कविता की उपेक्षा कर दी, लेकिन समय के सूप ने फटककर ‘अस्मिताबोधी’ कवियों को किनारे कर दिया। केवल मुक्तिबोध आत्मसंघर्ष करते हुए नई पीढ़ी के लिए आदर्श बने। विजेन्द्र ने इस कविता में इशारा किया है कि उस समय अनेक अवसरवादी कवि गिरगिट के समान रंग बदलकर लोकोन्मुख होने से बच रहे थे। व्यवस्था ने ऐसे ही कवियों का सम्मान किया। अतएव विजेन्द्र ने गिरगिट कवियों की ठीक आलोचना की है।

    इसके विपरीत अपने काव्य-गुरु लोकोन्मुखी कवि त्रिलोचन जब भरतपुर पधारे और घना के पक्षी विहार को निकट से देखा, तब विजेन्द्र ने उनके आचरण की प्रशंसा करते हुए लिखा है कि उन्हें भरतपुर अवध के किसानों का धड़कता दिल लगा। उन्होंने एक चरवाहे को ‘फगुला’ अर्थात् कमल की माला पहनाई और भरतपुर के जन-कवि को प्रणाम किया। विजेन्द्र लिखते हैं-

‘‘यही वह श्याम खण्ड है
वही, वही जहाँ के पुष्प अनाम तुमने जाने
जहाँ तुमने मित्र को गुरु कहा
उनके पाँव छुए
जहाँ तुमने ब्रज बोलकर अवधी को सँवारा।’’ (पृ0 42)


    विजेन्द्र वनस्पतियों को देखना-परखना-जानना अपने काव्य-गुरु त्रिलोचन से सीखा हे। उन्हें अपने ब्रजजनपद का परिवेश और वहाँ की भाखा-बोली ‘चोखी’ लगती है, जिसमें गाँव का कुछ ठाड़ापन है।

    इस लम्बी कविता की भाषिक संरचना में कवि के जनपद की बदायूँनी बोली के अनेक शब्द जनपदीय-अनुराग के प्रमाण हैं।

    अपनी कहन के समर्थन के लिए कुछ वाक्य उद्धृत हैं-

(1) अँटा पड़ा कबाड़, भूसा भरे दालान/ खसी- अधखसी चौपालें बरसा में।’’ (पृ0 01)
 (2) ‘‘पछादिया फोरे डालता है।’’ (पृ0 02 
(3) ‘‘नई नवेली बहुएँ/ स्यानी समानी लड़कियाँ, जौ की गद्दर बालियाँ।’’ (पृ0 02),
(4)‘‘बड़े-बड़े छल कपट/ सुखश्री अभी कारे कोसन दूर है।’’ (पृ0 04),
(5) ‘‘भूखे भैराए बाघ बने फिरते हैं/ आदमी के भेस में।’’ (पृ0 07) 
(6)‘‘ये भाखा बड़ी चरपरी है/ बड़ी बेदहल।’’ (पृ0 08), ‘‘दिन लचने को हुआ/ इस गाँव की राम-कथा का/ कोई पार नहीं।’’ (पृ0 25),
(7) ‘‘यह अगहन पूस का चैंटा अघियाना नहीं।’’ (पृ0 12),
(8) ‘‘रमचन्नू घाँई मारे खड़े हैं धूप में।’’ (पृ0 34),
(9) ‘‘पेट निकल आया है देसी तरबूज सा।’’ (पृ0 37,
(10) ‘‘यह हार रब्बी से भरा है।’’ (पृ0 40)

    उद्धृत वाक्यों में रेखांकित पद बदायूँनी बोली से ग्रहण किए गए हैं मूल शब्द पर जनपद का स्थानीय प्रभाव कैसे पड़ता है। यह जवाब विजेन्द्र से सुनिए- ‘‘बदायूँ जिले में किसान रबी को रब्बी कहता है। यहाँ खड़ी बोली अपने तेवर में है। उसने अरबी को खड़ी बोली में ढाला है।’’ (डायरी, 19,12,1982, चिन्तन दिशा, अंक-02, 2011)

    विजेन्द्र ने इस नाटकीय लम्बी कविता का भाषिक संरचना ब्रजभाषा के वाक्यों का यथोचित समावेश करके काव्य-भाषा के वाक्यों का यथोचित समावेश करके काव्य-भाषा को नई भंगिमा से अन्वित किया है। अधोलिखित वाक्य पढ़िए-

‘‘लटूरी भाई चौं हिलावौ हौ
डमरू सौ मूँड़ अपनौ यह खेमकरन उसारता है मुक्का
लाल आँखें किए
इसे रोको
यह खूँखार होता दिखता है
अभी वो बरवत नाँय।’’ (पृ0 16)


    उपरोक्त कवितांश में रेखांकित वाक्य और ‘नाँय’ पद ब्रजभाषा के हैं। ब्रजभाषा में -‘क्यों’ को ‘चौं’ बोला जाता है। ‘मूँड़’ पद के प्रयोग में ग्राम्यत्व दोष माना जा सकता है, लेकिन लोकोन्मुखी कवि विजेन्द्र ने इसे औचित्यपूर्ण सिद्ध किया है। ब्रजभाषा में क्रियापद ओकारन्त होते हैं; यथा- ‘मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो।’ खड़ी बोली में ‘खाया’ ओर ब्रज की बोली में ‘खायो’ बोला जाता है।

    समर्थ कवि के समान विजेन्द्र ने ब्रजभाषा की भाषिक संरचना में ब्रजभाषा और खड़ी बोली का मिश्रण किया है। दोहा- संकलन ‘दूब के तिनके’ की भाषिक संरचना ऐसी ही हे। समीक्ष्य लम्बी कविता में आगत विभिन्न भाषिक रचनाएँ विजेन्द्र के भाषा-सामर्थ्य का प्रमाण हैं।

    बोली के तद्भव शब्दों के साथ तत्सम पदों का सार्थक प्रयोग किया गया है-
 
‘‘मैंने देखा उस खन वे आँखें
करवा घूँघट में इजौं-बिजौं
जो मिलते ही दोबर-तेबर
फिर भ्रू सघनता में गायब
अँधेरे घने में जैसे दूर-दूर तक
धूप-छाँव
गायब...... कायब जैसे अर्थ से कई बार
बिम्ब-ध्वनि, राग से रस।’’ (पृ0 01)


    वाक्यों में क्रियाओं के सिपर्यय द्वारा अर्थ-गम्भीरता व्यक्त की गई है- ‘‘उन्होंने कानों से देखा/ आँखों से सुना।’’ (पृ0 02)

    वाक्यों में सार्थक विशेषणों एवं क्रियाओं का प्रयोग किया गया है-  

‘‘बच्चे ऐसे नहीं होते/ उनकके माथे चमकते हैं/ गाल सुर्ख टमाटर/ उनके बदल से सुगन्ध उड़ती है।’’ (पृ0 05)
 ‘‘पेट जब खाली/ तो आँखों ने खून पिया।’’ (पृ0 04)
 ‘‘नक्सीन चली है/ चेचक के गहरे गड्ढे बने हैं/ जब पीठ दहकी ठन्नाया पछादिया।’’


    आक्रोश-भरी भाषा में प्रभावपूर्ण लघु वाक्यों का प्रयोग किया गया है-

    ‘‘किसी ने पूछा, क्यों थाने जला दिए/ जबाव मिला, हाँ-हाँ जला दिए/ हाँ, बाँस के ठाठ जला दिए/ कठमूसल जला दिए।’’ (पृ0 05)

    भावों की अभिव्यक्ति के लिए मुहावरेदार भाषा का प्रयोग प्रशंसनीय है-

    ‘‘मुठ्ठी भर ने छक्के छुड़ाए मुक्ति-युद्ध लड़कर/ इतिहास गूँगा बहरा नहीं होता/ उसके होते हैं सहस्र कान, सहस्र भुज, सहस्र जीभें।’’ (पृ0 06)

    ‘सहस्र’ विशेषण पद की आवृत्ति पर वैदिक भाषा का प्रभाव लक्षित होता है।
    परिदृश्य का अंकन चित्रात्मक भाषा में किया गया है-

‘‘कँगूरे रँगे धूप-छाँव से
आधा घना लगता श्याम-हरित
आधा पंख सुर्खाबी
काले-काले बबूरों की पाँतें, भीलों के दंगल
कल्लर, गड्डे, डिग्गी, डाँगर
फैले-फूटे खेत-पात दूर तक
फैली धरती, कींच काँद
फौजदारी बलवे
खून-खच्चर यहाँ से वहाँ तक।’’ (पृ0 08)

    वस्तु-वर्णन अथवा घटना-वर्णन की भाषिक संरचना प्रायः निरलंकृत हे। यथा अधोलिखित उद्धरण पठनीय है-

‘‘पर साल यहाँ किसानों ने जत्थे निकाले
अफसरों की थोपी दफै चवालीस तोड़ी
चुनौतियाँ देकर हथकड़ियाँ पहनीं
कारावास की शलाकें काली
और सख्त
यह व्यवस्था खून पीती है
जन आन्दोलनों से कान पर जूँ नहीं रेंगती
पत्ता नहीं हिलता
क्या धरती इसी तरह बंजर होती रहेगी।’’


    कवि की प्रश्नात्मक शैली उसकी हार्दिक संवेदना के अनुरूप है।

    प्राकृतिक व्यापारों का वर्णन अनलंकृत है, क्रियाओं के समावेश से उसमें चित्रात्मकता का समावेश अनायास हुआ है-

‘‘चलती है दखिनी हवा छोड़ती कनपटियाँ
तू रूक-थक
गिरता है धरती पर, बालियों पर
मढ़ा फूल

किसान होगा बेदम, तू रूक
देख तू, देख उन्हें जो अपने ही अन्नमय बोझ से
नब गए सहज-सरल
यह रामकथा बड़ी पुरानी है
इसकी जड़ें गहरी हैं
इसे सुनने को ही मैं यहाँ आया हूँ।’’


    उपर्युक्त अंश में विजेन्द्र की चिन्ता किसानों के प्रति सच्ची संवेदना है। किसानों की राम-कथा अर्थात् दुखपूर्ण गाथा पुरातन है, जिसमें नित नए आयाम जुड़ते रहते हैं। सभ्यता और समाज के विकास के साथ-साथ किसानों की समस्याएँ और अनिवार्य आवश्यकताएँ बढ़ती जाती हैं। उनके उत्पादन का अधिकतम लाभ परोपजीवी वर्ग यानी पूँजीपति वर्ग प्राप्त करता है। किसानों की राम-कथा का रावण यही वर्ग है। राम-लीला में प्रति वर्ष रावण का वध किया जाता है। विजयपर्व मनाया जाता है। लेकिन प्रश्न यह है कि किसानों के रावण का वध कैसे हो। विजेन्द्र ने इसका समाधान जनशक्ति को अनिवार्य बताया है। अतएव वह कहते हैं कि समूहबद्ध होना किसानों के लिए अनिवार्य है-

‘‘अपने जनपद को सरसब्ज़ देखना
उनका सपना है
उनका हक़ है
लोहे को गला के उसे इच्छित शक्ल देना
उनके इस हक़ को हड़पने वाले कौन हैं
जो हमें चुप रहने को कहता है
वही पीता है लहू भी
समूहबद्ध होना उनका हक़ है
कविता समूहबद्ध को उजास देने की संहिता है।’’ (पृ0 45)


इस कवितांश में कवि ने किसानों के जीवन की असलियत उजागर करके अपनी कविता का प्रयोजन भी बता दिया हे। ओजपूर्ण भाषा कवि के सामर्थ्य का प्रमाण है।

विजेन्द्र ने अपनी विचारधारा की अभिव्यक्ति रूपकात्मक भाषा में की है। मार्क्सवाद के अनुसार पदार्थ से चेतना की उत्पत्ति हुई है। पदार्थ में द्वन्द्वात्मकता है। अतएव जीवन और जगत् भी द्वन्द्वात्मक हैं। सुख-दुख सनातन हैं। पतझर और वसंत भी। इसीलिए विजेन्द्र ने लिखा है-

‘‘पदार्थ से ही हुआ है ललौंहा अंकुरण चेतना का।’’ (पृ022)

और वह लिखते हैं-

‘‘मूर्त हुई देखता हूँ ऊर्जा
फूलों के मकरन्द में
दिक्काल रूप गतिमय रजत कण का
पूरा विश्व हतप्रभ है
देखकर विनाश लीलाएँ
असहाय हो गया हूँ इतना
कैसे रोक पाऊँगा इस ध्वंस को।’’ (पृ0 22)


इस उद्धरण से कवि की विश्व-दृष्टि की अभिव्यक्ति हो रही है। विषमता से स्पंदित विश्व को समता की अनिवार्य आवश्यकता है। समता के लिए सतत संघर्ष ज़रूरी है। इसीलिए विजेन्द्र ने कृषक वर्ग के सन्दर्भ में लिखा है-

‘‘ओह ..... यह वो रामलीला नहीं
रावण को हर साल जलाकर खुश हो लें
यह मुक्ति-युद्ध का पूर्वाभ्यास है
बड़े-बड़े मुच्छन्दरों के विरूद्ध मुहिम
बोलते क्यों नहीं रामहेत
कहते-कहते मुँह थक गया
सुनते-सुनते कान पके।’’ (पृ0 50)


इस उद्धरण में भाषा की संरचना संबोधनात्मक है, व्यंग्य और मुहावरों से अन्वित। कवि ने ऐतिहासिक भौतिकवादी दृष्टि से परम्परागत मिथकीय घटनाओं और चरित्रों के अनास्था व्यक्त करके संघर्षशील वर्गों के प्रति प्रबल विश्वास व्यक्त किया है। राम के चरण-स्पर्श से शिलाएँ नारी रूपा हो गई थी, लेकिन अब ऐसा सम्भव नहीं है।

विजेन्द्र ऐसे समर्थ कवि हैं, जो अपनी कविता में अभिनव विविधता लाने के लिए अन्य शास्त्रों- इतिहास, राजनीति, भूगर्भशास्त्र, विज्ञान की अनेक विद्याओं का गम्भीर अध्ययन करते रहते हैं। काव्यशास्त्रियों कवि-प्रतिभा का प्राथमिक सम्मान करके अध्ययन और अभ्यास को भी अनिवार्य बताया है। ‘कंठफूला बाँस’ में उन्होंने इस स्वभाव का अलंकृत उल्लेख किया है। कवि यह भी मानता है कि श्रमशील वर्गों के सम्मान के अभाव में ज्ञान की अनेक शाखाएँ महत्त्वहीन हैं। श्रम से सौन्दर्य की सृष्टि हुई है। इसे हम सभी कलाओं और शास्त्रों में देख सकते हैं। इसे हम सभी कलाओं और शास्त्रों में देख सकते हैं। ‘ताजमहल’ का मनभावन सौन्दर्य मानवीय श्रम का ही तो शुभ परिणाम है। अतएव वह कहता है-

‘‘खनिज कर्म को बखानते शिल्पविद्
कहाँ है इन सब की जड़ें रंगनाथन
पुस्तकालय विज्ञान अधूरा है
कहाँ हैं इनके स्रोत
इनके उद्गम

सतत प्रवाह कहाँ हैं
निचोड़ना पड़ेगा प्राविधिक ज्ञान का भरा छत्ता
इन देसी बबूलों से अभी अभी गोंद छुड़ाया है।’’


यह है श्रम की सत्ता का सम्मान, जिसे विजेन्द्र दैनिक क्रियाओं के प्रयोग से किया है।

विजेन्द्र आर्यों के आगमन और उनके द्वारा किए गए आक्रमण पर प्रश्न उठाते हैं। साम्राज्यवादी मानते हैं कि गोरे घुड़सवार आर्यों ने श्यामल अनार्यों को उत्तर भारत से खदेड़ दिया था। लेकिन वास्तविकता तो यह है कि

‘हमारी जन्मभूमि थी यही
कहीं हम आए थे नहीं।’


भगवान सिंह और रामविलास शर्मा ने आर्यों के आक्रमण को मिथ्या सिद्ध किया है। इसी संदर्भ में विजेन्द्र अपनी बोधगम्य भाषा में लिखते हैं-

‘‘इनकी जड़ें कहाँ हैं
कहाँ के हैं ये मूल निवासी
क्या ये यहाँ बाहर से आए थे
यह तो ब्रज है मेरा बहुत अनौखा जनपद
इनके चित्त में छिपी है सरस्वती की अटूट धार
कौन हैं वे
काले रंग की चपटी नाक वाले
गोरे सिडौल लम्बी नाकवालों के शत्रु (पृ0 23)


 और कवि रंग-भेद का विरोध करते हुए उद्घोष करता है-

‘‘आदिवासी की सफेद बत्तीसी चमकी है अँधेरे में।’’ (पृ0 23)

उपरोक्त अंश में ‘ब्रज’ को ‘अनौखा जनपद’ कहकर विजेन्द्र ने रागात्मक सम्बन्ध व्यक्त किया है। ‘अनोखा’ के स्थान पर ‘अनौखा’ विशेषण पद-प्रयोग करके कवि ने निजता व्यक्त की है।

विजेन्द्र ने अपनी काव्य-भाषा में इन्द्रिय-बोध का आश्रय लेकर वास्तविक जीवन-जगत् के क्रियाशील बिम्ब रचने में समर्थ हैं उने बिम्ब-विधान में अलंकारों का प्रयोग बहुत कम होता है। ऐसा एक अंश ध्यातव्य है-

‘‘एक धन्य बीहड़ है
आगे बड़े चक्कर हैं
पैंच हैं
ऊबड़-खाबड़ खम हैं
नकसूद कुछ नहीं
सोचता हूँ क्या करूँ
क्या सीधी-सादी पगडंडी पर
चला चलूँ आगे तक
खेत-खेत चौगिर्द छाती-छाती गेहूँ, जौ और मटरा
जहाँ-तहाँ श्रमरत ग्राम बालाएँ
बथुआ चौंटती हैं
चटकीली छींट लाल सुर्ख ओढ़नी
पीला लहँगा
काली कुर्ती
वे कजरौटा आँजे देखती हैं जब-तब
मेरी तरफ कोरो से बिना देखे ही
देखे बे-ऋतु खंजन उड़ते धूप में
कुछ सहमी कुछ सकुची बता रहीं जैसे
कोई नाता नहीं है उनका मुझ से।’’ (पृ0 26)


उपरोक्त कवितांश अनलंकृत है। ऐसा संश्लिष्ट वर्णन है कि चित्रकार कवि विजेन्द्र इस पर आकर्षक और मूर्त चित्र अंकित कर सकते हैं। यहाँ भाषिक संरचना भी कथ्य के अनुरूप है। रंग-बोधक विशेषण पद भी औचित्यपूर्ण हैं। ऐसी भाषिक संरचना विजेन्द्र के कवि व्यक्तित्व का सहज रूप है।

विजेन्द्र ने संस्कृत भाषा और उसके साहित्य का गम्भीर अध्ययन किया है। अतः उनकी काव्य-भाषा पर संस्कृत की तत्सम पदावली का प्रभाव लक्षित होता है। ‘कठफूला बाँस’ में तद्भवों के साथ तत्सम प्रधान पदावली का सार्थक प्रयोग हुआ है। पदार्थ से जगत् की उत्पत्ति और चेतना का विकास हुआ है। विजेन्द्र ने विकास का वर्णन तत्सम प्रधान पदावली में किया है-

‘‘यह राम कथा बहुत पुरानी है
समुद्र, पर्वत और चट्टानें
धरती में छिपे उनके उद्गम
कितना घना है
कितना प्राचीन
इसके मरोड़ पर है तपता मरुस्थल
ये पहाड़ जल से निकल कर जाने कब खड़ा हुआ
कब बने काले विवर चट्टानों में
धूमकेतु, आकाश अंगाएँ, सौर-ध्वनि, वक्र संवेग

 ग्रह दल, नीलारूण....
ज्योतिर्मय प्रकाश पुंज वृत्ताकार
ओ मेरे सूर्य किरीट
जान सकूँ तेरी दुहिता का छिपा तल।’’ (पृ0 24)


कविता के उपरोक्त अंश में कवि ने सूर्य की दुहिता धरित्री के रहस्य जानने की जिज्ञासा व्यक्त की है। धरती की रक्षा से मानव-जीवन की सुरक्षा सम्भव है। पर्यावरण प्रतिकूल होने से मानव-अस्तित्व संकट में पड़ गया है। जिज्ञासु कवि विश्व का अनुशीलन गम्भीरता से करने का प्रयास करता है, जो समर्थ कवि के लिए अनिवार्य है। काव्य-शास्त्र की भाषा में समर्थ कवि के संसार में पूर्ववर्ती परम्परा और वर्तमान की अन्यच्छाया झलकती हे। शास्त्रमूलक अन्यच्छाया की दृष्टि से विजेन्द्र की यह प्रदीर्घ कविता पर मार्क्सवाद का प्रभाव हे। मुक्तिबोध के काव्य पर भी मार्क्सवादी चिन्तन की अन्यच्छाया है। (देखिए, नया साहित्यः नया साहित्यशास्त्र, पृ0 108)
मार्क्सवादी चिन्तन के अनुसार सभ्यता, समाज और संस्कृति की प्रगति इतिहास चक्र के कारण होती है। पदार्थ की द्वन्द्वात्मकता से पुराने का विनाश होता है और नए का विकास। इतिहास-चक्र के कारण राजतन्त्र समाप्त हो गया है। राजा-रानी अब शक्ति-हीन हैं। अब लोकतन्त्र का युग है। अतएव कविता का नायक श्रमशील वर्ग का प्रतिनिधि होता है। यही वर्ग निर्माण करता है और मध्य वर्ग एवं उच्च वर्ग उससे लाभान्वित होते हैं। इस सन्दर्भ में कविवर रहीम ने अनुभव-प्रसूत बात कही है-

‘‘रहिमन देख बड़ेन कौ लघु न दीजिए डारि
जहाँ काम आवै सुई कहा करै तलवारि।’’


कहने की आवश्यकता नहीं है कि मांगलिक भविष्य की रचना मानवीय श्रम ही करता है। आप्त ज्ञान को साकार कौन करता है। मानवीय श्रम। नक्शे के अनुसार भव्य भवन कौन बनाता है। निपुण कारीगर और मजदूर। लोहे को मोम कोन बनाता है। लोहार। वही उसे मनचाहा आकार देता है। इस लम्बी कविता में ‘कठफूला बाँस’ पदों का प्रयोग एक बार किया गया है-

‘‘तुम इतिहास को अब तक
कठफूला बाँस समझते रहे हो।’’ (पृ0 45) 

वाक्य रूपाकात्मक है।

कवि किसे सम्बोधित करता रहा है। शायद भाववादी लेखकों-चिन्तकों को ।यानी इतिहास कठफूले बाँस के समान व्यर्थ हे। आजकल तो लोग इतिहास के अन्त की घोषणा कर चुके हैं। कवि का मन्तव्य कुछ और है। वर्षा में भीगा बाँस साधारण वस्तु तो है, लेकिन वह आवश्यकता के अवसर पर शत्रु पर प्रहार भी कर सकता हे। इसी प्रकार इतिहास की प्रेरक क्रान्तियों और लड़ाकू वीरों का स्मरण करता है। उसका स्पष्ट कथन है-

‘‘बोलती हैं भरखनी टक्करें
चिंघाड़ते हैं पैने नखर
अगौंहे सींग
क्या पूरे इलाके को सकता मार गया
चिनगारियाँ नहीं
उठती लपटों में देखों अपने थके चेहरे
* * * * (उन्हें) शत्रु के विरूद्ध व्यूह रचने का
हक़ है
 * * * * उन्हें इंसान होने का हक़ है
उन्हें तुम्हारे विरूद्ध खड़े होने का हक़ है
लोकतन्त्र में यह हक़ मुक्ति-संग्राम का सार है।’’ (पृ0 36)


इस कवितांश की ओजपूर्ण भाषा सम्बोधन से युक्त द्वन्द्वात्मक हे। इतिहास-बोध से अन्वित है। इतिहास की शिक्षा यही है कि विषमता-समापन के लिए प्रतिरोध और संघर्ष करते रहो। इसी से इतिहास जय-यात्रा की ओर अग्रसर होगा। आखिरकार आज जो तुमुल कोलाहल हो रहा है, वह किसके लिए हो रहा है। कल के लिए। मांगलिक भविष्य के लिए। सदाचार और शिष्टाचार के लिए। इंसानियत की रक्षा के लिए।
अतएव मांगलिक भविष्य के लिए विजेन्द्र सुनते हैं कि

‘‘उठ रहा रह-रह कर शक्ति का जन-रव/ (पृ0 44)

विजेन्द्र को यह आशा है कि –

‘‘सह जान गए हैं
सबके अक्कल डाढ़ें फूट आई हैं
यह लीला है जीवन को बुझाने की
इसे कहीं-का-कहीं रोकने की
अन्दरूनी नाट्यशिल्प
नाटक के भीतर एक और विस्मय भरा
नाट्य एकालाप, सांग रूपक से पहचानी गई
क्रियाशील पदार्थ की गति की
वाक् चमत्कृति
धरती पर जहाँ जहाँ हुआ चित्रांकन
सर्वहारा का, वहीं वहीं जन्मा है
जनता का लोक-युद्ध, युगों-युगों तक निक्षेप प्रक्रिया से।’’ (पृ0 41)


विचारपूर्ण उपरोक्त अंश जन-गण के लोक-युद्ध का समर्थन कर रहा है। विजेन्द्र के उपर्युक्त विचार और उनसे उद्भूत जीवन-मूल्य उनके व्यक्तित्व रूपान्तरण से साक्षात्कार करा रहे हैं। विजेन्द्र शीश महल में खड़े होकर नहीं अपितु लोक के मध्य हाज़िर होकर पर्यवेक्षण करते हैं और अपनी अनुभूतियों की प्रभावपूर्ण अभिव्यक्ति करते हैं। भाषिक संरचना नई है।

विजेन्द्र अपने जनपद के बहाने सम्पूर्ण राष्ट्र की मुक्ति के लिए अभिलाषा व्यक्त करते हैं-

‘‘शत्रु का संगठित विरोध करने को
संगठित भुज-बल चाहिए/’’ (पृष्ठ 46)


आक्रोशपूर्ण स्वर में वे पूछते हैं-

‘‘खुलता त्रिनेत्र
क्यों नहीं लक्ष्य हो अच्छी सेहत।’’ (पृ0 46)


पौराणिक शब्द ‘त्रिनेत्र’ का प्रयोग वैज्ञानिक चेतना के सन्दर्भ में किया गया है।

कवि विजेन्द्र की यह मान्यता है कि लोकोन्मुखी कविता कवि-व्यक्तित्व का रूपान्तरण करती रहती है। उनकी कविता में श्रमशील लोक अपने परिवेश के साथ उपस्थित रहता है। वह कहते हैं कि

‘‘कविता के संग-संग
रचा जाता मन का अन्तरंग
धरती की परत-दर-परत
गहरी खाइयाँ जो अभी भर कहाँ पाईं
इस समय उन्हीं के इलाके मे हूँ
तुम्हें बुलाता
यहाँ से ही देख पाओगे उनकी तपी तँवई पीठ
ओ मेरे
विश्व-कवि भवभूति मुझे भी कहने दो
‘कर्मणि व्यंज्यते प्रज्ञा’
ये सारे शब्द खराटो पर चढ़ कर
अपनी दिन-चर्या बताते हैं।’’ (पृ0 47)

उपर्युक्त कवितांश में विजेन्द्र ने लोक से कविता का अन्तरंग सम्बन्ध जोड़कर विश्व-कवि भवभूति की विचार-विभूति से स्वयं को सम्पन्न किया है। अतएव वह अपने जन को प्रबाधित करते हुए जन के प्रति चिन्ता और आशा व्यक्त करते हैं-

‘‘कुछ कहो यही खड़े-खड़े अपना संकोच तोड़ो
पहचानो अपने जनपद की तासीर
उसकी रगों में प्रवहमान
मिश्र धातुएँ यहाँ क्यों नहीं है
अन्नपूर्णा क्यों नहीं
* * * प्रश्न, प्रश्न, प्रश्न
फलों जैसी चमक उनके चेहरों पर क्यों नहीं है
 * * * * निर्धूम अग्नि की अकुलाहट में
सुनता हूँ उभरती जनशक्ति में
ओ मेरी वाणी
तू मेरे चित्त की उजास बन
चित्त को बना सहोदर
दिक्काल को समेटता छन्द
आदमी की असंख्य भुजाओं के बल से ही
रचा गया है
मोटी-मोटी गर्दनों का मुड़ना
प्रमाण नहीं लक्ष्य-भेद प्रतिभा का।’’ (पृ0 48, 49)


उपर्युक्त उद्धरण का भाषिक संरचना में उद्बोधन के साथ-साथ द्वन्द्वात्मकता भी है। एक ओर जन-गण की असंख्य भुजाओं का बल है, और दूसरी ओर हैं शोषकों की मोटी-मोटी गर्दनें; जिन्हें असंख्य भुजाएँ एक दिन अवश्य दबाएँगी। इतिहास यही समझाता है। रावण और कंस जैसे अत्याचारियों का वध हुआ तो क्या आजकल के रावण-कंस कैसे बचे रहेंगे। क्योंकि जनता अब सच्चाई समझ रही है।

विजेन्द्र ने इस प्रदीर्घ कविता का समापन आशापूर्ण विकल्प से किया है, जो यथास्थिति को तोड़ने वाला है-

‘‘जनता की
संगठित आवाज़ में
मैं सदियों से बोलता आया हूँ
तुम्हें सुनने का अवकाश कहाँ
उसे भाषा कहाँ माना
रचना भी नहीं
उसे मेरा नागरिक युद्ध कहाँ माना
अब से धातुक उगने को हुए
दो-आब में अंकुरित धान
जल-थल जो अब मूर्त हो रहा है
मूर्त सपना, मूर्त आँखों की रोशनी
ये आकाश पृथ्वी
सब मूर्त होने को हैं
यह मेरा दुर्धर्ष समय
मेरी हथेली पर मूर्त हो रहा है
*** *** लड़ते आदमियों की ताकत
आन्दोलित संगठित ऊर्जा
समय मूर्त हो रहा है
जैसे आँच पर फूलती रोटी।’’ (पृ0 52, 53)


उद्धृत अंश में ‘मूर्त’ विशेषण पद की आवृत्ति और अप्रस्तुत विधान कवि द्वारा कल्पित मांगलिक भविष्य को प्रतयक्ष कर दिया है। इस उद्धरण उन आलोचकों पर दोष लगाया है, जो ऐसी लोकोन्मुखी कविता को कविता ही नहीं मानते हैं। भाषा को भी नकारते हैं। ऐसे कवि अथवा आलोचक महानगरीय जीवन-बोध तक सीमित होते हैं। वे व्यक्तित्वान्तरण न करके आदमक़द दर्पण के सामने खड़े होकर आत्म-मुग्ध भाव से ग्रस्त हो जाते हैं।
‘कठफूला बाँस’ का अध्ययन करने के बाद स्पष्ट हो जाता है कि इसके केन्द्र में ‘मलाह’ गाँव उपस्थापित हैं। वहाँ के निवासी का संघर्ष, उनकी प्रतिरोधी भावनाएँ इस कविता का कथ्य हैं, जो नाटकीय और वर्णनात्मक शैली में व्यक्त किया गया है। कवि ने पर्यवेक्षण और वार्तालाप से ‘मलाह’ का जन-जीवन आत्मसात किया है और अपने लोकोन्मुखी व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति की है। कविता के प्रेरक भाव करुणा और सात्विक क्रोध हैं। सम्पूर्ण कविता की संरचना निश्छन्द है, लेकिन उसमें आदि से अन्त ओजपूर्ण एवं मंथर प्रवाह का आभास होता रहता है। सन् सत्तर के दशक ऐसी प्रदीर्घ कविता अन्य समर्थ कवियों ने नहीं रची है। ‘मलाह’ जैसे गाँव के दिक्काल की प्रभावूपर्ण अभिव्यक्ति अन्यत्र विरल है।

‘कठफूला बाँस’ को विजेन्द्र की प्रतिनिधि कविता कह सकते हैं; जिसमें भरतपुर के मलाह गाँव के किसानों की व्यथा-कथा है और उनका प्रतिरोध भी। व्यथा-कथा को राम की संज्ञा प्रदान की है। भारतीय साहित्य में राम-कथा जीवन के उदात्त आदर्शों और अन्याय-अनाचार-दुराचार के प्रबल संगठित प्रतिरोध की कहानी है। भारत का किसान का स्वभाव राम के चरित्र के समान है। वह एक सीमा तक तो अन्याय एवं शोषण सहन करता है, लेकिन जब पानी सिर पर से उतरने लगता है, तब वह प्रतिरोध के लिए हथियार उठा लेता है। ‘मलाह’ गाँव के किसान ऐसे ही हैं, संवाद करते हुए वे बताते हैं कि हमने लोहागढ़ को अभेद्य बनाए रखा। लोधे और गद्दियों ने मिलकर मुक्ति-युद्ध लड़े। सब ने मिलकर धरती पर रुँधें छाँटी। बड़े-बड़े खर मूँदे। पेड़-रूखों ने भी हमारी विपदा सही हे। बड़े-बड़े जुलम देखें हैं। अन्याय और अत्याचार। सब के सब उठे और तोपखाने ठेले। किले जाय गिराए, मीतें जाय फोरीं। गुम्बद जाय तोड़े। जनता तिराह.........तिराह करि उठी, कोई नहीं बोला, शान्ति कहाँ है, न तब, न अब। (पृ0 06-07)

स्थायी शान्ति तो तभी सम्भव है, जब असमानता, भेद-भाव, शोषण, उत्पीड़न का अन्त हो। यही तो ज्वलंत समस्या है, जिसका समाधान संगठित प्रतिरोध है। विजेन्द्र ने इसी का समर्थन किया है। क्रूर व्यवस्था से उत्पीड़ित किसान पूछते हैं-

‘‘बेहड़ जीवन का छन्द है मन्दाक्रान्ता
वही सह सकेगा गहन दुख यक्ष का
उसी से पहचान पाएँगे
जलद, बेलें, पुष्प, नदियाँ, प्रपात, पर्वत-शिखर
लड़ता आदमी देश का अपने
कहो, तुम भी कहो कक्कू
क्या इस ब्रज जनपद में
समूचे लोक दुर्जन हैं
क्या धरती बंजर हुई है
क्या ये ठठरियाँ उघाड़े
यहाँ के मन्मथ हैं।
*** *** *** यही हैं वेणुवादक
*** *** *** हलधर पृथिवीपुत्र
आए दिन वारदातों में जेरवार
आए दिन खून
मैं यहाँ राधिका को
बथुआ खौंटते देखता हूँ
कान्हा को उससे बतियाते
कहाँ है लक्ष्य
कहा देखें एकलव्य।’’ (पृ0 16,17)


उपर्युक्त अंश की भाषा किसानों के अनुरूप है। कथन की प्रश्न-शैली मन की बेचैनी की ओर संकेत कर रही है। ‘मन्दाक्रान्ता’ छंद का सन्दर्भ कालिदास के ‘मेघदूत’ की ओर इशारा कर रहा है और विजेन्द्र ने मलाह गाँव की त्रासदी की कथा सुन कर लिखा है कि इस त्रासदी की

‘‘गहराइयाँ थाहने को जानना होगा
नया भू-गर्भशास्त्र
नया नृविज्ञान, नया अन्तरग्रहीय अन्तरिक्ष
ऐन्थ्रो-जौगर्फी नई
नई विधियाँ परमाणुओं को जोतने की।’’ (पृ0 16)


आशय यह है कि अभिनव शास्त्रों के सम्यक् अध्ययन से समाज-परिवर्तन के लिए मार्ग दिखाया जा सकता है।
‘कठफूला बाँस’ ऐसे किसान कवि की लम्बी कविता है, जो अपने पाठकों की चित्त-भूमि में अग्नि-बीज के पादप की रचना कर सकें-

‘‘अन्धकार में खिंची है जोति-रेखाएँ
मेरी आँखें वहाँ तक क्यों नहीं जातीं
विषांकुर छिदता है कहीं गहरे मर्म में
काल तू अभी ठहर
बोने दे मुझे अग्नि-बीज
बहुत गहरे तक नहीं दिखतीं
मेरे महादेश की की जड़ें
अदृश्य, भीतर पिघली चट्टानों से दबी
सूखे पत्ते झरने के बाद ही
बनेगा नया वृक्ष।’’


यह नया वृक्ष श्रम-संस्कृति की सुखद छाया प्रदान करेगा, क्योंकि ‘‘श्रम से ही रचा जाता सौन्दर्य’’ (पृ0 21) अतएव कवि ने इस जीवन-मूल्य की स्थापना की है- ‘‘धरती उसकी जो जोते अपने बल से।’’ (पृ0 35)
इस आदर्श की पूर्ति के लिए जन-आन्दोलन अनिवार्य है। आजकल आदिवासी जल-जंगल-ज़मीन के लिए संघर्ष कर रहे हैं, और किसान अपनी भूमि की रक्षा के लिए। सम्पूर्ण कविता के सुघड़ स्थापत्य में जीवन ओर प्रकृति के व्यापार इतने संश्लिष्ट हैं कि उन्हें अलगाना असम्भव है। एक उदाहरण देखिए-

‘‘वे अन्दर-ही-अन्दर मुक्ति युद्ध को आमादा हैं
उनके अलाकों में मौसमी नदियाँ प्रलय मचाती हैं
टूटता है उनका साहस

पटवारी अंतड़िया खसोटता है
महाजन धरता है गिरवीं बच्चों को
बँधुआ मजूरी रिवाज है छीजते लोकतन्त्र का
पतरौल, सरपंच, ब्लाक-प्रमुख
सब तैयार हैं लूटने को।’’ (पृ0 39)


फिर भी

‘‘यह हार रब्बी से भरा है
किसान का चौड़ा सीना है।’’ (पृ0 40)

सारांश यह है कि भारतीय किसानों की राम-कथा कटने वाली ‘कठफूला बाँस’ में मलाह गाँव के दुख-दग्ध एवं धेर्यधन किसानों के नाटकीय संवादों के साथ-साथ कवि विजेन्द्र का चिन्तनपूर्ण एकालाप भी चलता रहता है। वह सूत्रधार का काम करता हैं और कविता के मंच पर अपनी व्यथा-कथा सुनाते हैं। अभिनय करते हुए। सक्रिय रूप में।

संस्कृत साहित्य के मर्मज्ञ मनीषी डॉ0 राधाबल्लभ त्रिपाठी ने अपनी सद्यः प्रकाशित पुस्तक ‘नया साहित्य: नया साहित्यशास्त्र’ में संस्कृत एवं हिन्दी काव्य के साथ-साथ उर्दू शायरी का आलोचनात्मक विश्लेषण अलंकारशास्त्र की दृष्टि से किया है। काव्य-कृति में अलंकारों का समावेश श्लाघनीय समझा जाता है। उपर्युक्त पुस्तक के निबन्धों में डॉ0 त्रिपाठी ने परम्परागत अलंकारशास्त्र में कुछ नया जोड़ने का प्रयास किया है। उन्होंने लम्बी कविता में ‘भाविक’ अलंकार का संधान किया है। इस अलंकार में ‘अतीत और अनागत’ को प्रत्यक्षमाण देखा जाता हे। डॉ0 त्रिपाठी के अनुसार ‘वाल्मीकी का रामायण’ जिस तरह भाविक का उदाहरण है, उसी तरह निराला की ‘राम की शक्तिपूजा’ भी। (पृ0 62) दोनों कृतियों में अतीत को प्रत्यक्षवत् देखा गया है। इस दृश्टि से लम्बी कविता ‘कठफूला बाँस’ भी ‘भाविक’ का निदर्शन है। विजेन्द्र ने इस कविता में अतीत की घटनाओं के साथ अनागत एवं स्मृतियों का निरूपण प्रतयक्षवत् किया है। एक उदाहरण द्रष्टव्य है-

‘‘मैं ने देखा
मुकद्दम की घनी भौंहें तनी हैं
कोई कहर......... कोई जानलेवा विपदा
झम्मन उकड़ू बैठे ये सब सुनते रहे
कुन्दन ने तड़ाक से पुट्ठे पर
मच्छर को दे मारा
लगता है उन्हें भनक पड़ी
अब नाटक का अन्त हुआ
ओह ...... यह वो रामलीला नहीं
रावण को हरसाल जलाकर खुश हो लें
यह मुक्तियुद्ध का पूर्वाभ्यास है।’’ (पृ0 50)


अतएव यह कहना समुचित है कि विजेन्द्र प्रत्यक्षता वर्णन के समर्थ कवि हैं। इसीलिए वह श्रमशील लोक और उसके परिवेश का अनुशीलन और विविध शास्त्रों का अध्ययन निरन्तर करते रहते हैं।
भारतीय अकिंचन कृषकों-श्रमिकों के प्रति विजेन्द्र का अन्तरंग सम्बन्ध इस कविता को महत्त्वपूर्ण कृति घोषित करता है।

ऐसी लम्बी कविता तो मुक्तिबोध ने भी नहीं रची है। अतः विजेन्द्र की यह कविता अद्वितीय है, जिसने निराला, केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन की लोकोन्मुखी काव्य-परम्परा काव्य-परम्परा को अग्रसर किया है।
विजेन्द्र ने ‘कठफूला बाँस’ में कृषक वर्ग की एकता पर विशेष बल दिया है। समाज-व्यवस्था बदलने के लिए वह उत्पादनशील वर्गों अर्थात् किसानों और मजदूरों की एकता को अनिवार्य मानते हैं। अपनी डायरी में वह लिखते हैं- ‘‘किसान ही इस देश की जनशक्ति है। रमिकों से उनका गठजोड़ नए भविश्य का संकेत है। इसके बिना कुछ नहीं। ये दोनों हमारी असंख्य भुजाएँ हैं। आँखें हैं। कान हैं। दिल की धड़कने भी। जो कविता इनकी आवाज़ बने, वह मीर है। वे हर समय के साथ हैं। अथाह दुख कठिनाइयों में डूबकर वे जिन्दा हैं। कभी घना कुहरा छटेगा। निखरी धूप खिलेगी। यहीं से कविता के खनिज दल मिलते हैं।’’ (डायरी, 19.12.1974, चिन्तन दिशा, अंक-2, जनवरी- मार्च, 2011 पृ0 69-70) यहाँ एक बात विचारणीय है। क्या बड़े किसान-फार्महाउस के मालिक क्या इस संगठन में शामिल होंगे। नहीं। ऐसा संगठन तो उनके लिए खतरा सिद्ध होगा। अतः दलित-शोषित किसानों की एकता ही अपेक्षित है। वर्ग-संघर्ष के लिए छोटे किसानों, कुशल एवं अकुशल मजदूरों के साथ उस मध्य वर्ग का एकजुट होना अनिवार्य है, जिसे अपना वर्गीय चरित्र रूपान्तरित कर लिया है। बहुजन सुखाय एवं बहुजन हिताय के लिए विचारधारा-संगठन-संघर्ष-समाजवाद अनिवार्य है। इस कविता में श्रमशील जीवन के अनेकानेक चित्रों-वर्णनों के साथ बदलावकारी भौतिकवादी विचारधारा का समावेश यथास्थान कलात्मक ढंग से किया गया है। कवि ने रचना में रामकथा की चर्चा करके संगठित शक्ति पर विशेष बल दिया है, जिससे वर्तमान युग के रावणों का अन्त हो सके। वह ‘‘आतंक...... आतंक...... आतंक’ का समर्थक नहीं है; वह तो यह मानता है कि

‘‘ये मेरा मुक्ति-मार्ग नहीं
मेरी मुक्ति होगी लकड़हारों, घसेरों, बुनकरों
खलासियों, पत्थर-तोड़ाओं के साथ-साथ
उनके बीच जाने की कोई खास रितु नहीं
न कोई मुहूर्त
ओ कवि
धँसो, धँसो इनके भीतर
चलके गढ़ लीकें
डाँगे
और बेहड़
अँधेरे इलाकों में
जहाँ जाने में सकुचाते भगवान भास्कर
मुरझाने को है जहाँ गिरिमल्लिका, जपा कुसुम
खण्डित गजवाहिनियाँ चट्टानें
बबूरों की आहत अक्षौहिणी
इनके भीतर धँसो
*** *** *** जीवंत आकृतियों को सरसब्ज़ होने दो।’’ (पृ0 44, 45)


उपरोक्त पंक्तियाँ यथास्थिति पर प्रहार कर रही हैं, अभिजन या भद्रलोक की सौन्दर्य अभिरूचि पर चोट, कविता के लिए नया सौन्दर्यशास्त्र रच रही हैं, कवि के निजी वैशिष्ट्य की ओर इंगित कर रही हैं, जो महानगरीय कवियों में नहीं पाया जाता है। किसानों द्वारा आत्महत्याओं के त्रासद दौर में यह कविता हताशा नहीं बल्कि आशा का संचार करती है। प्रतिरोध का सौन्दर्य रचती है।



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टिप्पणियाँ

  1. बहुत रोचक , और बेहतरीन समीक्षा लिखी है अमीर चंद जी ने ,परिश्रम और गहन अध्यन का परिणाम इस आलेख में देखा जा सकता है . 'पक्ष ' के संपादक श्री तिवारी जी ने इस कविता पर जो कुछ लिखा था वह हम इस समीक्षा को पढ़कर भी महसूस कर सकते हैं .
    विजेंद्र जी और अमीर चंद जी की उर्जा को सलाम जो आज भी निरंतर सृजन कार्य में लगे हुए हैं . हम युवाओं को आपसे सदा प्रेरणा मिलती है . 'पहली बार ' का आभार . -नित्यानंद गायेन , सादर

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