क्रांतिकारी लोकधर्मी कवि तो हू


      
        (चित्र : तो हू)
विगत जनवरी महीने से हमने एक श्रृंखला 'लोकधर्मी कवियों की परम्परा' शुरू की थी। इसे हमारे आग्रह पर लिखा है वरिष्ठ कवि विजेन्द्र जी ने। श्रृंखला की ग्यारहवीं कड़ी में प्रस्तुत है एक आलेख प्रख्यात वियतनामी कवि तो हू पर।

   
विजेंद्र

तो हू को वियतनाम का क्रांतिकारी कवि माना गया है। वह अपने देश की क्रांतिकारी जनता को समर्पित कवि थे। उन्होंने अपनी एक कविता में कहा है -

हृदय है विभाजित मेरा
तीन तरह से
उसका प्रमुख भाग अर्पित है
मेरे दल को
एक भाग में रमती है कविता
तीजा भाग
दिया है प्रेम को


हृदय का यह विभाजन हमें थोड़ा असमंजस में डालेगा। कदाचित हृदय का विभाजन होता नहीं है। हम विभाजित करके भी उसे विभाजित नही कर पाते। मनुष्य हृदय की यही खूबी उसे बड़ा बनाती है। यहाँ विभाजन एक सांकेतिक रूपक है। यानि जीवन की प्राथमिकतायें हम तय करें या न करें? करें तो कैसे करें? बहुत से कवि हैं जिनकी कोई प्राथमिकता होती ही नहीं! कुछ की प्राथमिकतायें समयानुसार बाजार भाव की तरह बदलती रहती हैं! बहुत ही विरल होते हैं वे कवि जो एक बार अपने जीवन की प्राथमिकताये तय करने के बाद उनहें अंत तक निभाते हैं। वे ही कवि इतिहास में कालांकित भी होते हैं। कवि तो हू की प्राथमिकताओं के क्रम पर ध्यान दें। सर्वप्रथम उनका राजनीतिक दल आता है। संकेत है कवि की दलीय प्रतिबद्धता। जनता से उसका एकात्म होना। उसे ही अपनी कविता का प्रेरणा स्रोत समझना। वहीं से अपने रचना कर्म को बराबर खनिज दल बटोरना। कवि तो हू की प्राथमिकताओं का क्रम बहुत ही तर्क संगत और वैज्ञानिक है। अपने लम्बे रचना कर्म के अनुभव के सहारे मुझे लगने लगा है कि कवि की पहली प्राथमिकता अपने देश की जनता से प्यार करना ही है। तभी हम उससे एकात्म हो सकते हैं। उसको शोषण, दमन तथा उत्पीड़न से मुक्त कराने के लिये हम उसके साथ संघर्ष भी कर सकते हैं। जोखिम उठा सकते हैं। उसके लिये अपेक्षित त्याग भी किया जा सकता है। तो कवि होने का अर्थ है हम अपनी पक्षधरता सुनिश्चित करें। हम कहाँ खड़ें है? हमें किन शक्तियों के साथ रहकर संघर्ष करना है। हमारे लक्ष्य क्या हैं? कविता आखिर हम क्यों लिखें? इससे हम किस तरह का काम लेना चाहते हैं? क्या यह हमारे आत्मरंजन का एक आसान तरीका है? कुछ लोग इससे ‘आत्म साक्षात्कार’ कर अलौकिक आनंद की अनुभूति प्राप्त करते है? मुझे लगा कि प्रारंभ से अंत तक हमारा सृजन एक प्रकार से अपने समाज -अपनी जनता की-प्रत्यक्ष-परोक्ष-सेवा ही है। मुझे यह भी अनुभव हुआ कि कविता बहुत ही अनुत्पादक श्रम है। क्योंकि इससे धन नहीं कमाया जा सकता। जो धन कमाने को काव्य सृजन करते हैं वे कवि नही पेशवर लोग हैं। दूसरे, यह ऐसा श्रम है जिसका पारिश्रमिक मुझे नही मिलता। फिर भी जीवन भर सारे कष्ट उठा के मैं इसे सनिष्ठ करता रहता हूँ। मार्क्स ने कवि कर्म की तुलना ‘मधुमक्खियों के श्रम’ से की है। तो हू ने स्वयं सार्वजनिक रूप से अपने को, ‘एक क्रांतिकारी तथा कवि’ दोनों ही घोषित किया था। यह भी कि उनके लिये कवितायें क्रांति के लिये एक हथियार की तरह हैं। यानि कविता का एक प्रयोजन है ‘शिवेतरक्षतये’ जिसे मैं बराबर अपने गद्य में कहता रहा हूँ।

तो हू का जन्म  4 अक्टूबर , 1920 को प्रसिद्ध नगर हू में हुआ था। उनका परिवार गरीब होते हुये भी काव्य-कला प्रेमी था। उनके पिता स्वयं कवि थे। उनकी माता अपने क्षेत्र में परम्परित गीत गाने वाली प्रसिद्ध गायिका थी। इस प्रकार तो हू बहुत ही सृजनशील पारिवारिक वातावरण में पले-उगे थे। ऐसी रचनाशील विरासत पाना किसी भी कवि को एक नैसर्गिक वरदान ही कहा जायेगा। यही वजह है कि तो हू ने अपने कवि पिता के मार्गदर्शन में 6 वर्ष की आयु से ही कविता लिखना प्रारंभ कर दिया था। उन्होंने अपनी एक टिप्पणी, ‘ कविता के लिये प्रथम शिक्षण‘ में कुछ महत्वपूर्ण बातें कही हैं। उनका मानना है कि कविता के प्रति वह बचपन से ही लालायित थे। शायद जन्मजात प्रवृत्ति उनमें कविता के लिये रही हो। उन्होंने बताया है कि उनके पिता चीनी शैली में चौपदे रचते थे। उन्हें यत्र तत्र बिखरे वियतनामी लोक गीतो को एकत्र करने में गहरी अभिरुचि थी। जब तो हू 6 वर्ष के हुये तभी अपने पिता के सहायक बनें। उनके पिता उन्हें बहुत जल्दी सुबह उठा देते थे। वह अपने पिता के लिये कवितायें तथा लोक गीतों की प्रतिलिपियाँ तैयार करने में लग जाते थे। वियतनामी लाकोक्तियों को एक जगह एकत्र करना। उन्हें सुलेख में उतारना। इसी समय कुछ क्षण बचा कर वह स्वयं भी पढ़ते लिखते थे। उनके पिता वियतनामी लोक साहित्य को एकत्र करने के लिये कृतसंकल्प थे। बल्कि उनके जीवन का यह ध्येय ही बन गया था। शिशु कवि तो हू इस काम में अपने पिता की सहायता करते रहे। दूसरे, स्वयं अपनी कविता के लिये खनिज एकत्र करते थे। अपने कवि कर्म की तैयारी भी। यह अनायास हो रहा था। और सायास भी । उनके पिता का यही जीवन बन गया था। तो हू की माता भी पिता के इस काम में बहुत सहायता करती थी। इस तरह कवि तो हू को कविता का पहला प्रशिक्षण अपने पिता से ही मिला। कहें उनके लिये कवि कर्म सीखने के लिये पहला स्कूल उनका घर ही था। पिता उनके काव्य गुरु बने। तो हू का मन धीरे धीरे लोग गीतों से रचा जाने लगा। वह छंद रचने लगे। गीत उन्हें प्रिय थे। उन्होंने 13 साल की आयु में घर छोड़ दिया था। वह घर परिवार से दूर चले गये थे। क्योकि पिता के न रहने पर उनका भाई उनके पालन पोषण के लिये समर्थ न था। उन्हीं दिनों तो हू की कवितायें फान दाँग लू की पत्रिका में छपी। वह केंद्रीय समिति के सदस्य थे। उन्होंने कवि तो हू को सलाह दी कि वह हमेशा ‘जीवन के नज़दीक’ रहें। दूसरे, ‘श्रमिकों , किसानों तथा काम करने वाले सामान्य जन के बीच उठें बैठें’। उन्हीं से ‘भाषा सीखें’ । इस तरह लिखें कि लोगों की समझ में आ जाये। एक तरह से एक नये कवि के लिये ये कुछ शिक्षाप्रद बातें ली ने उनसे कहीं। तो हू की कवितयें बताती हैं कि उन्होंने इन बातों का अक्षरशः पालन किया है। हमारे लिये भी ये बातें सीखने की हैं।

तो हू क्रांतिकारी कवि होते हुये भी एक प्रगीतक (लिरिक) कवि हैं। उनकी कविता में क्रांतिकारी कवि मायकोवस्की जैसा गर्जन - तर्जन न होकर प्रगीति की हृदय स्पर्शीय अंतर्ध्वनियाँ हैं। प्रगीतिपरक हो कर भी तो हू की कविता में भावबोध गहन है। प्रभाव उदात्त।

तो हू एक देश भक्त जातीय कवि भी हैं। उनकी अधिकांश कवितायें उनके देश के लोगों की गहरी त्रासदी तथा संघर्ष की अर्थध्वनियों से आलोकित हैं। वियतनाम का समूचा इतिहास ही गहरी त्रासदी और कठोर जीवन का इतिहास रहा है। तो हू मानते हैं कि उनके देशवासियों -उनकी जनता - के जीवन में दो बातें प्रमुख हैं। एक तो जानलेवा दुख। दूसरे, कठिनतम जीवन संघर्ष। तो हू मानते हैं कि दो चीजों ने ही उन्हें सुरक्षित रखा है। एक तो जनता के प्रति प्रेम। दूसरा, मानवीय गुणों के प्रति गहरी आसक्ति। वियतनाम की जनता को कभी चैन की साँस लेने का अवकाश नही मिला। वियतनाम का इतिहास इस बात का साक्षी है कि इस छोटे से देश पर सदा बाहरी आक्रमण होते रहे। कभी पश्चिम से। तो कभी  दक्षिण तथा उत्तर से। इस तरह वियतनाम का पूरा इतिहास कष्ट तथा दुखद संवेदना का इतिहास है। बाहरी आक्रमण इस देश पर जरूर हुये। पर उसके प्रतिरोध में विद्रोह भी होते रहे। साम्राज्यवादियों तथा सामंतों द्वारा दी गई पीड़ाओं के साथ प्रकृति भी कहर ढाती रही। कभी जीवन विनाशक बाढ़। कभी समुद्री तूफान। मोतें -महामारियाँ -ये सब वियतनामी जनता झेलती रही है। इस तरह वियतनामी जनता कठिनाइयों भरी जिंदगी झेलने की अभ्यस्त हो चुकी है। न तो शान्ति न चैन। तो हू मानते हैं कि चार पाँच हज़ार वर्षों के इतिहास में वियतनामी जनता ने कभी आराम और सुकून नहीं जाना। कवि के मन में गहरा क्षोभ है कि उनके देशवासियों को सामंती क्रूरताओं के साथ प्राकृतिक विनाश भी सहने पड़े हैं. इन कष्टों ने ही वियतनामी नागरिकों के मन में जीवन के प्रति गहरी निष्ठा तथा अदम्य जिजीविषा पैदा की है। कवि मानते हैं कि इस जीने और जिजीविषा के लिये आवश्यक है, जीवन में करुणा, प्रेम, परस्पर भाईचारा, सहयोग तथा तुच्छ स्वार्थों का परित्याग। इसीलिये तो हू कहते हैं कि कोई भी साहित्य अपने देश की जनता की गहन आवाज तथा  जीवन्त धड़कने व्यक्त करता है। जो साहित्य ऐसा नही करता वह हमारे हृदय को भी स्पर्श नहीं करता। यही वजह है कि जनविमुख साहित्य न तो लोकधर्मी होता है। न उसमें सहज संप्रेषणीयता होती हैं। तो हू अपनी एक टिप्पणी में अपने देश के बारे में रूसी भैगोलिक स्थिति का बयान करते हुये कहते है - उनका देश (वियतनाम) बहुत छोटा है। इसके सामने पूर्व दिशा में लहराता-गरजता हुआ समुद्र है। पश्चिम में पीछे की तरफ पर्वत श्रृंखलायें है। उन्होंने कहा है कि चीन की तरह ‘लौंग मार्च’ करने में हम असमर्थ हैं। इसी तरह रूस जैसे बड़े देश की तरह हम पीछे हटते-हटते यूराल पर्वत तक नहीं जा सकते। कवि का मानना है कि वियतनाम की भैगोलिक तथा भूदृश्यी स्थिति ने वहाँ की जनता को एकजुट बने रहने की ताकत दी है। हम अपनी धरती किसी के लिये छोड़ नहीं सकते। साथ ही धरती को कस के पकड़ने के साथ साथ हमें हर मुसीबत के लिये अपनी कमर भी कस लेना जरूरी है इसी सब से यहाँ के कवि की मनोरचना रची जाती है। इसी से वहाँ के लोगों की जीवन शैली भी निर्मित होती रही है। तो हू का यकीन है कि बुनियादी परिवर्तन हर देश की अनिवार्य जरूरत है। पर यह परिवर्तन जड़ों से होना चाहिये।  वियतनामियों को जीवित रहने के लिये आत्मनिर्भर होकर जीना ही एक विकल्प है। वियतनाम के हर गाँव में वहाँ के निवासी परस्पर मित्रवत रहते हैं। जैसे कि बाइबिल में कहा है, ’अच्छा पड़ौसी हमारी जरूरत है। यह भी कि हम अपने पड़ोसी को प्यार करें। पड़ोसी के बिना हमारा सामाजिक जीवन असंभव है। अपने सगे संबंधियों से बढकर होता है अच्छा पड़ोसी। वियतनाम में कहावत है कि ‘अपने बगल के पड़ौस़ी के निमित्त अपने भाई को भी त्याग’ सकते हैं। कवि तो हू ने अपनी इस आत्मपरक टिप्पणी में बताया है कि वियतनाम में घर आमने सामने ही निर्मित होते हैं। इसी वजह से एक साथ ही सबके द्वार खुलते हैं। बंद होते हैं। लोकोक्ति है  कि मित्र के लिये द्वार सदा खुले हैं। पर शत्रु के लिये सदा बंद हैं। कवि का संकेत है कि जो शत्रु हम पर आक्रमण करने को तत्पर हैं उनके लिये हमारे घर तथा हृदय के द्वारा सदा बंद हैं। पर अपने दोस्तों के लिये वे सदा खुले हैं। कोई भी सवाल कर सकता है कि आखिर एक कवि ऐसी बातें क्यों कह रहा है? ध्यान रहे तो हू एक कवि की जरूरतों का बखान कर रहे हैं। पता नही क्यों मुझे बराबर लगता रहा है कि कवि को ये सब बातें  जानना बहुत जरूरी है। मेरी  एक कविता है ‘कवि की ज़रूरतें’ -

एक कवि की जरूरते क्या हैं
अपने देश की जलवायु को जानना एक जरूरत है
अपने इलाके की धरती
गवाक्ष, भूदृश्य, वन घासें
फल फूल
जानना एक ज़रूरत है
यहाँ की वर्षा, ताप, धरती में नमी
कवि को जानना जरूरी है
क्या मैंने कभी सोचा
मेरे जनपद का सबसे सुंदर फूल
कौन सा है
इसके खिलने का समय
उसकी गंध
रंग और पंखड़ियों का
वास्तुशिल्पीय स्थापत्य
मुझे अपनी कविता को
अपने देश की जलवायु से
जोड़ना जरूरी है
अपने देश की पोषाहार व्यवस्था की
तीखी आलोचना
मेरी कविता की जरूरत है  (‘बुझे स्तंभों की छाया‘ , पृ0 53 , ), 1972


अतः कवि तो हू की बात से मैं पूर्णतः सहमत हूँ कि कवि के लिये अपने देश, अपनी जातीयता, संस्कृति, प्रकृति, वनस्पतियाँ,  भूसंरचना, भूगर्भशास्त्र तथा मनुष्यों को परत दर परत जानना बेहद जरूरी है। एक लोकधर्मी कवि इन चीज़ों से परिचित होता ही है। होना चाहिये। जो कवि ऐसा नहीं कर पाते वे अपनी पहचान भी नहीं बना पाते। न उनकी कविता का गहरा असर पाठकों पर होता है। तो हू एक लोकधर्मी क्रांतिकारी कवि होने के नाते ही ये सब बातें अपने पाठकों को बता रहे हैं। साथ ही उन कवियों को भी जो कविता लिखना प्रारंभ कर चुके हैं। कवि को लंबी काव्य यात्रा तय करने के लिये इन बातों से ही ताकत अर्जित करनी पड़ती है।


तो हू लोकधर्मी कवि होने के नाते मार्क्सवाद से भी परिचित हुये। उनके लिये कविता और विचारधारा कोई अलग अलग चीज़ें नहीं हैं। तो हू उस समय के कवि हैं जब फ्रांस में ‘लोकप्रिय मंच’ (popular Front) का समय था। तो हू पार्टी साहित्य की दुकानों पर अक्सर जाते थे। एक दुकान पर वियतनाम तथा फ्रांस के जनवादी तथा साम्यवादी रचनाकारों का साहित्य उपलब्ध था। यह समकालीन पत्रिकाओं का भी केंद्रीय स्थान था। एक दिन तो हू भी उस दुकान में गये। उस समय तक तो हू एक विद्यार्थी थे। साथ ही साम्यवादी युवक संगठन के सदस्य भी। इस दुकान पर ली दुआन देख रेख करते थे। वह कम्युनिस्ट सदस्यों की भूमिगत गतिविधियों को भी देखते थे। तो हू उन्हें एक सामान्य व्यक्ति समझते रहे। यानि एक दुकान चलाने वाला इन्सान। तो हू ने बताया है कि ली बहुधा कोई न कोई्र किताब पढ़ते मिलते थे। तो हू भी वहाँ पुस्तकें पढ़ने आया करते थे। एक दिन तो हू ने ली से कहा कि उनके पास धन नहीं हैं। अतः किताब खरीद नहीं सकते। वह दुकान पर  किताबे पढ़ने के लिये आना चाहते हैं। ली ने उन्हें सहर्ष पढ़ने की अनुमति दे दी। तो हू का कहना है कि यही वह प्रक्रिया थी जिससे उनका परिचय मार्क्सवाद से हुआ। बाद में इसी दुकान में उन्होंने मार्क्सवादी दर्शन का अध्ययन किया। खासतौर पर ‘कम्युनिस्ट मैनिफैस्टो’ , अठारहवी ब्रूमेर, होली फैमिली, लेनिनवाद के सिद्धांत, अक्टूबर क्रांति, आदि विषयक पुस्तकें कवि ने पढ़ डाली। यह एक प्रकार से मार्क्सवादी शिक्षा का प्रारंभ ही था। उनकी कविता की तीसरी आँख। एक बड़े कवि को अपनी विश्वदृष्टि (Vision) विकसित करने के लिये इसी तरह संघर्ष करना पड़ता है।

यह कवि का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि 12 वर्ष की अवस्था में तो हू की माता नहीं रहीं। उसके बाद कवि हाईस्कूल की शिक्षा के लिये चले गये। यहाँ आकर उन्होंने दो बातों के बारे में गहन जानकारी हासिल की। एक तो अपने देश के हालात। दूसरे, मार्क्सवादी विचारधारा। हू नगर में ही तो हू 1938 में ‘लोकतांत्रिक युवा संघ’ के नेता बन गये। बाद में उन्हें ‘इन्डोचायनीज़ कम्युनिस्ट पार्टी’ का सदस्य बना लिया गया। अप्रैल, 1939 में फ्रांस के औपनिवेशिक अधिकारियों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। उन्हें अदल बदल के कई जेलों में रखा गया। जेल में कठोर यातनाओं के बावजूद तू हो ने अपने क्रांतिकारी विचारों को न तो त्यागा। न उनमें कोई संशोधन किया। औपनिवेशिक अधिकारियों से किसी प्रकार का समझौता भी नहीं किया। ऐसी दृढ़ता ही कवि को ऊँचाइयों तक ले जा सकती है।  1942 में अपने कुछेक साथियों के संग तो हू जेल से फरार हो गये। पर अपनी क्रांतिकारी गतिविधियाँ बराबर जारी रखीं। तीन वर्ष के बाद तो हू 1945 में एक समिति के अध्यक्ष चुने गये। 1947 में उन्हें कला-संस्कृति की गतिविधियों की देख रेख का काम सौंपा गया। यह समय था  1945 का। क्रांति की सफलता के बाद हो ची मिन्ह की जनपक्षधर सरकार बन चुकी थी।

तो हू की कविता का विकास तथा उनकी क्रांतिकारी राजनीतिक भूमिका को अलग करके नहीं देखा जा सकता। नहीं देखना चाहिये। जैसे नेरुदा और माइकोवस्की की कविता तथा राजनीतिक गतिविधियों को। तो हू की कवितायें सबसे पहले ‘लोकतांत्रिक फ्रंट’ द्वारा प्रकाश में लाई गई। उनकी कविता में एक नई ध्वनि व्याप्त थी। एक नया मुहावरा। एकदम नया विज़न। वियतनाम की जनता की धड़कने उसमें अनुगुंजित थी। वियतनामी समकालीन कविता में उनकी कविता की अलग पहचान झलकने लगी। देखते ही देखते वह वियतनामी समकालीन कविता के प्रमुख कवि घोषित किये गये।

तो हू  सच्चे अर्थों में लोकधर्मी कवि हैं। क्योंकि उनकी कविता अपने देश की जनता के लिय समर्पित है। उन्हें जन कवि भी कहा गया है। जैसे हमारे यहाँ नागार्जुन। पर नागार्जुन की कविता में वैसी प्रगीति तथा आत्मपरकता नहीं है जैसी तो हू की कविताओं में। तो हू की कविता जैसे मैंने पहले कहा प्रगीतपरक हैं। उनमें समकालीन यथार्थ के संदर्भ होते हुये भी उनका प्रभाव एक प्रगीत जैसा ही पड़ता है। केदारनाथ अग्रवाल की भी बहुत सारी लघु कवितायें प्रगीतपरक है। नागार्जुन ने लम्बी वर्णन प्रधान कवितायें भी लिखी हैं। प्रगीत में वस्तुजगत की बाह्यता को वर्णन करने का अवकाश तथा स्थान कम होता है। कवि अपने मन की बात ही अधिक कह पाते हैं। उनकी एक कविता है , ‘कोयल जब कूकती है’ -

कूकती है जब कोयल
तब लगता है पकने
गरवा धान
तब बाग की शीतल छाँह में
पेड़ पर लगे फलों में
छलकने लगता है रस
उसी समय
गीत फूटता है
खलियान भर उठता है
गेंहूँ की सुनहरी बालियों से
धूप पकने लगती है
जैसे नीला आकाश
लगता है उठा ऊपर को
जैसे फैलता हो आगे तक
हवा में उड़ती है पतंग ....
यौवन ग्रीष्म का
उमड़ता है मेरे हृदय में
बंदीगृह की दीवार तोड़ने को
व्याकुल हैं मेरे पाँव
कितनी घुटन है आज भी
पर कोयल कूकती है
मुक्त हो कर आकाश में।


यहाँ बंदीगृह की घोर घुटन और यातना के बीच भी कवि प्रगीतमयी प्रकृति के सौंदर्य पर रीझता है। उसे वियतनाम के किसानों के कठिन श्रम से उपजे गेंहू तथा खलियान याद आते हैं। नाइजीरियाई कवि वोले शंयिंका ने भी जेल की दीवारो के भीतर एक कविता लिखी है। नाम है ‘ जीवित समाधि’। इस कविता में कवि बंदीगृह में भोगी गई्र यातना का भयावह वर्णन करते हैं -पर न तो किसान याद आते हैं। न प्रकृति का सौंदर्य।

सोलह डग चौड़ी
तेइस डग लम्बी
कठोर घेराबंदी की है उन्होंने
यह है मानवता और सत्य के विरुद्ध
क्यों कि उनका इरादा है
मुझे मानसकि रूप से नष्ट करना
बल्कि हर तरह से नष्ट करना


पूरी कविता में जेल की यातना का वर्णन है। दोनो कवि ही क्रांतिकारी हैं। पर यह फर्क यहाँ नोट करने का है। नागार्जुन भी प्रकृति को कभी नहीं भूलते । 1975 के आपात काल के समय उन्होंने 1976 में एक कविता लिखी,

‘नंगे तरु हैं, नंगी डालें’
नंगे तरु हैं, नंगी उालें
इन्हें कौन से हाथ सँभालें
खीज भड़कती, घुटती आहें
झेल न पाती इन्हें निगाहें
कैदी की लंगड़ी मनुहारें
कैसे इनकी सनक उतारें
मौसम के जादू मचलेंगे
कब इनमें टूसे निकलेंगे
हरियाली का छाजन होगा
आसमान कब साजन होगा
अब भी तो पतझर थक जाये
इनका नंगापन ढंक जाये
हरियाली इन पर झुक आये
नग्ननृत्य अब भी रुक जाये


इस लिहाज़ से नागार्जुन कवि तो हू के करीब आते हैं। 1976 की ही उनकी और कवितायें है, ‘फिसल रही चाँदनी’ तथा, ‘वसंत की अगवानी’। नागार्जुन बंदीगृह की घुटन को प्रकृति के सान्निध्य से कवि तो हू की तरह विस्मृत करते हैं।



तो हू बाह्य प्रकृति के मनोरम सौंदर्य से अपने को एकात्म कर अपनी यातना को प्राकृतिक औदात्य में बदलते हैं। जबकि वालेशयिंका बंदी गृह तथा तानाशाहों की क्रूरता बताते हैं। तो हू की गीतिपरकता उन्हें ऐसा करने को प्रेरित करती है। उनके संस्कार लोकधर्मी हैं। उन्होंने अपने को प्रकृति के बीच उगता-बढ़ता हुआ पाया है। वोले शयिंका के ऊपर पाश्चात्य साहित्य के गहन अध्ययन का गहरा असर है। वह प्रगीति के कवि नहीं हैं। उन पर पश्चिमी आधुनिकता का गहरा प्रभाव भी है। फिर भी वह अपनी जड़ों को अपने देश नाइजीरिया में बहुत गहरे तक धँसी पाते हैं। उनके लोक में बौद्धिक परिष्कृति अधिक है। तो हू और नागार्जुन लोक के ऊबड़खाबड़ पन को धोते माँजते नहीं।

तो हू ने माताओं पर अनेक कवितायें लिखी हैं। जैसें ‘तौम माता’ ,‘बूढ़ी माँ ’ आदि। कवि ने स्वयं  माना है कि उनकी कविताओं में इतनी सारी मातायें आती हैं? उनका तर्क है क्योंकि जब वह बारह साल के थे तभी उनकी माता उन्हें छोड़ कर चली गई। उनका यह भी कहना है कि कोई भी राष्ट्र माताओं के द्वारा ही हर बार अपने को जीवित करता है। उसे शक्ति देता है। जैसे राष्ट्र के लिये माता एक जीवन्त रूपक के समान है। ‘बूढ़ी माँ’ कविता में कवि ने एक वृद्धा माँ की गहन वेदना व्यक्त की है। उसका बेटा आजादी की लड़ाई में शरीक हाने के लिये सीमांत पर गया है। माँ उसके लौटने की प्रतीक्षा में विकल है। ध्वनि है वह लौटेगा भी या नहीं? उसे नीद नहीं आती। कवि साथ ही उसकी गरीबी में अभावों की त्रासदी भी बताता है। इधर गरीबी की मार। उधर बेटा गया है शत्रुओं से लड़ने। जीवन में पर्याप्त भोजन भी उपलब्ध नहीं है। कैसी क्रूर विडम्बना है! इतनी कठिन स्थिति में भी माता को गर्व है कि उसका बेटा शत्रुओं से लड़ने गया होगा-

बूढ़ी माता
सूखे पत्तों के बिछावन पर
लेटी है
पर नींद नहीं आती...
बिछावन पर लेटी बूढ़ी माता
जागती है।


वह चिंता करती है और बेटे के बारे में सोचती है। बाहर बँसवटों में तेज़ हवा और वारिश का अंधड़ है। जितना माता बेटे के बारे में सोचती है उतनी ही वह शत्रु केा घृणा करती है। यही द्वंद्व कविता में गहरी नाटकीयता पैदा करता है। यहाँ माँ का चरित्र भी गतिमय तथा बहुआयामी बनता है। वह सोचती है-

शत्रुओं से लड़ने को
मेरा पुत्र
आज की रात
निकला होगा
लड़ने के लिये।


वह यह भी विचारती है कि आजादी के लिये लड़ने वाले सभी योद्धा घने वनों में नदी नालों को पार करते होंगे। वर्षा में  सराबोर भीगे। बाद में अपनी गरीबी की स्थिति का बयान करती है-

हम जैसे निर्धनों पर तो
सूखे पत्तों का ही
बिछावन हो सकता है
चावल और चूल्हा भी
वह निकला होगा आज की रात
अपने शत्रुओं से लड़ने के लिये
जिस्म पर उसके
पूरे कपड़े भी तो नहीं हैं
पिछले वर्ष हमने
कंद मूल भात में मिला कर
ही जीवन काटा था
लेकिन कामचलाऊ अच्छा था
सुना है
इस साल फसल अच्छी है
सोच से उसका सीना
दरकता है
कौआ की काँव काँव के साथ
फटने को है पौ


इस तरह तो हू की कविताओं में मानवीय संवेदनाओं के भरपूर चित्र कौंधते रहते हैं। उनकी एक प्रसिद्ध कविता है, ‘कवि गियेन दु के प्रति’। कवि ने गियेन की कविता के असर को बताते हुये कहा है -

ज्यादा हुये दो सौ साल से भी
फिर भी तुम्हारी कविता की ध्वनि से
आह्लादित है लोग
जीवन में हमारे
तुम्हारी कविता की धड़कने
आज भी जीवित है
तुम्हारी कविता की ध्वनि ने
कँपा दिया आसमान को
धरती को
झरनों तथा पर्वतों से
निसृत है असंख्य आवाज़े पतझड़ों की...


फिर कवि स्त्री के जीवन के बारे में भी कहते हैं -

स्त्री का जीवन
भरा है उत्पीड़न से
असंख्य स्त्रियों का जीवन
अभिशप्त है
एक ही तरह से


तो हू को अपने आस पास के भूदृश्य और नैसर्गिक छबियाँ बार बार प्रेरित करती हैं। उनकी एक प्रसिद्ध कविता है ‘पहाड़ तथा जल दूर दूर तक’ –

अंकुरित होते सरपत के पौधे
झाड़ झंखाड़
हरे कल्ले


इसी कविता में वह प्रकृति का प्रचण्ड रूप भी बताते हैं –

रेत का ढूहा
काटता है पथ
पहाड़ भी काटता है पथ
लू की लपटें
करती हैं पीठ पर वार
उड़ती हे धूल
धूल से धुँधलाता है वन
बंद करती पथों को रेत
ढंक लेती है सुरंगों को



..... सहसा कवि को अपना गाँव याद आता है –

याद आती है
उन ग्राम वासियों की
जिन्होंने दिया था संबल
उनसे मिलने की प्रबल इच्छा


..... कवि युद्ध के विनाशक रूप को बताते हुये कहते हैं -

तट आग से हुये हैं भस्म
बम वर्षा ने
लहलहाते सरपतों को
बदल दिया है खुदे हुये गड्ढों में


कवि गाँव वालों को याद करते हुये कहते हैं –

जीवनपर्यन्त
नहीं विस्मृत कर पाऊँगा
तुम्हारा उपकार
तुमने हमें हर कदम
अपनी भुजाओं का
दिया है संबल
.... आज भी याद है मुझे
गाँव का हरेक आदमी
सुनहरी चोटी चमकती है पर्वत की


  तो हू मार्क्सवादी विचारधारा से प्रतिबद्ध होते हुये भी वह कविता में उसे प्रचारित करते नहीं लगते। जैसा मायकोवस्की करते दिखते हैं। वे उन विषयों को चुनते हैं जो उनके हृदय के बहुत करीब हैं। बल्कि कहें जो सामान्य जन के जीवन के भी बहुत करीब हैं। पर उनकी कवितायें उनकी जनता के दुख दर्द को बराबर व्यक्त करती हैं। फ्रांसीसी साम्राज्यवादियों के क्रूर शासन से उपजी मनोव्यथायें बार बार व्यक्त करते हैं। कहा जाता है कि तो हू वियतनाम के प्रथम क्म्युनिस्ट कवि हैं। उन्होंने एक नई अग्रगामी कलात्मक कविता की स्वस्थ परम्रा को विकसित किया था। वह वियतनामी समकालीन कविता के प्रवर्तक भी कहे गये हैं। तो हू तथा अन्य कवियों की कविताओं का अंतर बहुत साफ है। तो हू की कवितायें प्रगतिशील विचारधारा को बहुत ही कलात्मक ढंग से व्यक्त कर अपनी पहचान बनाती हैं। वहाँ सामान्य जन की कराहटे सुनी जा सकती हैं। जनता के प्रति साम्राज्यवादियों के अन्याय तथा अत्याचार के चित्र अनुपम हैं। तो हू श्रम के सौंदर्य को भी कभी अनदेखा नहीं करते। उनकी एक कविता है, झाड़ू के शब्द’। एक स्त्री सर्दी की ठिठुराती रात में झाड़ू लगा रही है। जैसे वह श्रमी स्त्री फौलाद या काँसे से निर्मित हो। जब सड़क साफ सुथरी हो जाती है तो सुबह को उस पर से फूलों की भरी गाढ़ियाँ गुज़रती हैं। खिले फूलों के रंग और गंध अपनी छटा बिखेरते हैं। लेकिन कवि सावधान करते हैं उन सौंदर्य प्रतीक -रूपक फूलों को कि वे न भूलें उस स्त्री को जिसने रात भर ठिठुर कर साफ की है सड़क अपनी जान लगा कर -

एकदम शीत कटती रात है
अभी अभी जैसे थमी हो
शीत लहर
थेाड़ा रुक कर
देखता हूँ
सूनी सड़क पर
एक स्त्री लोहे
या काँस्य धातु की बन कर
सड़क की धूल बुहारती है
उसी सड़क से सुबह होते ही
गुज़रती हैं रंग बिरंगे
सुगंधित फूलों से लदी गाढ़ियाँ
ओ फूलो
मत भूलो तुम
उस स़्त्री को
जिसने अपना दम लगा कर
किया है सड़क को साफ
शीत और तपिश की रात में
सुबह को
शाम को
हर तरफ
वह स्त्री साफ करती है
सड़क को
कभी न भूलें हम
सौंदर्य रचा गया है
उसी के हाथों से। 




इसी तरह अपनी ‘संध्या’ कविता में कवि बताते हैं श्रम करते वृद्ध आदमी के बारे में -

एक वृद्ध
खिड़की के पास
बुनता है टोकरी
पीठ झुकाये
मुठ्ठी भर चावलों को
उसकी उँगलियाँ काँपती है
जब खीचता है
सुनहले धागे मूँज के
फूटता है शोक गीत
उसके खुश्क होठों से
यही क्रम चलता रहता है
न वह कभी हँसता है
न बोलता
वृद्ध बैठे बैठे
बुनता रहता है टोकरी
भविष्य की उम्मीद में


अपनी एक और कविता ‘पुष्प और खून’ में वह अपने देश  में क्रांति के बाद की सिथति पर बड़ी मार्मिकता से कहते हैं -

लगातार सौ वर्ष की
प्रतीक्षा के बाद
जैसे स्वप्न में
हमने पाया है
हर्षोल्लास का दिन
अग्नि और लोहे से
अधिक मजबूत है हमारा प्यार
मनुष्य का हृदय भी
कभी बनता है
युद्ध क्षेत्र
वर्षा हो या ग्रीष्म
पृथ्वी गोल है
सुंदर भी
एक आदमी का दुख
बनता है
समूची मनुष्य जाति का दुख
ओ वियतनाम
ये पुष्प
ये खून
भविष्य में होंगे ये
और भी गहरे
और खूबसूरत
घावों का भरना
इतना सरल नहीं
तुम्हरा आधा जिस्म
अभी भी
दुखता है पीड़ा से
फिर भी
आगयी हैं हर्षोल्लास की फिज़ा
वसंत आ गया है
पर्वतों और वनों ने
पहने हैं मुक्ति के हरित वस्त्र
ओ में काँग (नदी)
तुम रहो प्रवाहित
अपने तटों को लाँध कर
फिर से मिला है
हमें नया जीवन
खून होता है एकात्म खून में
आने को वह दिन भी है
जब सब होंगे एक
देश होगा एक
सब होंगे एक।




अपनी कविता ‘वसंत का गान’ में तो हू कविता के बारे में कुछ सूत्र देते हैं -

सम्पूर्ण जीवन की पीड़ा
घनीभूत है
कविता की एक पंक्ति में


$    $  $


हृदय को चाक करती हैं कवितायें


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आज के पहाड़ों ...नदियों के गान
हमरे अग्रजों के कंठ से फूटते हैं


$    $     $ 


वसंत का यह गान
लिखता हूँ
किसके लिये


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कितने ही शिशु हैं
जिन्हें नहीं मिला
पालने का सुख


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कविता उड़ती है अग्नि के डैनों पर


कवि कहते हैं कि क्या चाहिये हम सबको जीने के लिये -


आज़ादी, सुकून, करुणा
अन्न पेट भरने के लिए


तो हू सदा उनके पक्ष में हैं जिनके जीवन में दुख है। उत्पीड़न है। दासता है। लाचारी है

मेरा दिल साथ है उनके
जो सहते हैं उत्पीड़न


‘कविता का संदर्भ’ कविता में तो हू ने कविता की सीमाओं को तेाड़ कर बताया है कि ’कवि और कम्युनिस्ट’ होना अलग अलग नहीं हैं। क्योंकि जो दल का सचिव है वह भी कविता रचता है। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। पर पार्टी सचिव को यदि कवि बने रहना है तो उसे सिर्फ दफ्तर की क्रियाविधि तक ही सीमित नहीं रहना होगा। उसे अपनी इंद्रियाँ चौकन्नी रखनी होंगी। जीवन और प्रकृति के कंप प्रकंप को बड़े ध्यान से पकड़ना होगा। उसे कवि संवेदना को जीवन रस की खुराक देना जरूरी है।  उसका हृदय जनता और प्रकृति के लिये धड़कता रहे। तभी वह रच पायेगा कालांकित कविता -

कम्युनिस्ट दल का सचिव
कवि भी है
दोनो है एक दूसरे के पूरक
नहीं रह सकते एक दूसरे के बिना
सचिव का काम
कागज़ों को
काला पीला करना ही नहीं है
उसे इंद्रिय सजग रहना है
जीवन के हर कंप प्रकंप के प्रति



तो हू की प्रगीतिपरक कविताओं में भले ही बहुत स्पष्ट जीवन संघर्ष न दिखे। पर कविताओं की अंतर्ध्वनियाँ बहुत ही लोकधर्मी तथा रूपकीय हैं। सांकेतिक भी। किसी सामान्य सी बात से कविता प्रारंभ होकर बहुत बड़े फलक को घेर लेती है। अनेक भाव, विचार, संवेदन, संकेत, ध्वनियाँ तथा अर्थबोध परस्पर संग्रथित होकर कविता का वास्तुशिल्पीय संरनात्मक स्थापत्य रचते हैं। तो हू की कविताओं को समझने के लिये हमें अपनी इंद्रियों को भी सावधान रखना होगा। उनकी कविता बौद्धिकता के आतंक से परहेज करती है। वहाँ हमारे मन की परत दर परत खुलती दिखाई देती है। तो हू का चेतन, अवचेतन तथा अचेतन मन तरह तरह की गहराइयों में हमारी यात्रायें कराते हैं। इसीलिये ऊपर से सरल सपाट दिखने वाली ये कवितायें बहुत ही संश्लिष्ट तथा गहन भाव बोध से हमारा परिचय कराती चलती हैं। तो हू की कविता हमें नाजिम तथा वाइ जुई की बार बार याद दिलाती चलती हैं। उनमें क्रांति की गर्जनायें तथा उद्घोष नहीं हैं। जैसा हमें माइकोवस्की या हमारे यहाँ नागार्जुन में मिलता है। उनकी कविता हमे अन्याय, अनाचार, शोषण, उत्पीडन के विरुद्ध लड़ने की ऊर्जा कलात्मक ढंग से प्रदान करती हैं। उनमें जनता के वर्ग-शत्रुओं की पहचान छिपी रहती है। साथ ही आशान्वित भविष्य की पौ फटी दिखाई देती है। उनकी हर काव्य पंक्ति में गहरा आत्मविश्वास तथा जातीयता के प्रति गहन भरोसा व्यक्त होता दिखता है। उनकी एक सुप्रसिद्ध कविता है, ‘ दो बच्चे’। यहाँ कुलीन तथा सामान्य लोगों के बच्चों के वर्गीय फर्क को बड़े तीखे व्यंग्य से व्यक्त किया गया है -

एक बच्चा जीता है जीवन
भरी पूरी
सुख सुविधाओं में 
उसके पास
पश्चिम में बने
बहुत से सुंदर ... कीमती खिलौने हैं
दूसरा बच्चा सिर्फ मुँह देखू है
दूर से खिलौनों को
ललक से देखता रहता है


राष्ट्रीय मुक्तिसंग्राम के समय तो हू ने उस सामंती पतनशील सत्ता का विरोध किया था जो फ्रांसिसी साम्राज्यवादियों के समर्थन से कायम थी। जिसकी वजह से वियतनामियों को गरीबी और भूख के दर्दनाक कष्ट उठाने पड़े थे। भारतीय जनता को भी अंग्रजी साम्राज्य ने ऐसे ही उत्पीड़न तथा दमन से घोर यातनायें दी थी। तो हू की बहुत ही प्रसिद्ध कविता है, ‘तब से अब तक’। इसमें कवि ने कम्युनिज्म के प्रति अपनी संचेतना व्यक्त की है। उनका मानना है कि यही वह क्षण है जब, ‘ सत्य का सूर्य उनके हृदय में दमका था’। उनके अनेक समीक्षकों ने इस कविता को अपने देश के लोगों के लिये एक आह्वान कहा है। उन्हें प्रेरित किया गया है कि वे अपने अधिकारों के लिये संघर्ष करें। इस कविता का दूसरा पक्ष है दमित-पीड़ित लोगों के लिये भारी संबल -

मैं उन हज़ारों परिवारों में से
किसी एक का पुत्र हूँ
उन हज़ारों दुखी उजड़े लोगों का
लघु भ्राता हूँ
हजारों हजार बच्चों का
बड़ा भाई
हम दरबदर है
और लगातार भूख से पीड़ित


इस कविता की ऊचाई और गहराई निहित है उस ध्वनी में जो वियतनामियों में स्वतंत्रता की अदम्य इच्छाशक्ति को व्यक्त करती है –

हम साथ साथ जीते और मरते हैं
हमारा जीवन
एक दूसरे से गुँथा है
कोई शक्ति हमें
अलग नहीं कर सकती
हमारी आत्मा को
बेचा- खरीदा नहीं जा सकता


जब कवि अपनी आत्मा का सौदा करता चलता है अपनी सुखसुविधाओं के लिए तो पह कवि नहीं रहता। एक पेशेवर दुनियादार बनता है। भले ही वह कविता लिखे पर कवि नहीं होता!

फ्रांसिसी उपनिवेशवादियों के विरुद्ध विजय के बाद एक बार फिर तो हू ने वियतनाम के इतिहास में महत्वपूर्ण लेखन किया था। उनकी कविताओं को क्रमशः पढ़ने से पता लगता है कि वह किस तरह प्रारंभ से अंतिम विजय तक फ्रांसिसियों की साम्राज्यवादी नीतियों का विरोध करते रहे। तो हू की कवितायें बोलती है कि वियतनामी लोग अपने देश की मुक्ति के लिये सब कुछ बलिदान कर देने को तैयार हैं। वे होचि मिन्ह के नेतृत्व में पूरी आस्था व्यक्त करते हैं।

कहना न होगा कि  साम्राज्यवादियों का विरोध भारत की तरह ही वियतनामियों के लिये भी बड़े खतरनाक जोखिमों से भरा हुआ था। जाने कितने लोग इसमें शहीद हुये। कितने बरबाद हुये। कितने बेघर- दरबदर। तो हू की कवितायें बताती हैं इतनी कठिनाइयों के बावजूद वियतनामी जनता उज्ज्वल भविष्य के प्रति आशान्वित है। उसका संघर्ष सतत है।



तो हू की कवितायें क्रांति के औदात्य को ही वयक्त नहीं करती। बल्कि वियतनामी जनता के लिये प्रेरणा स्रोत का काम भी करती हैं कि हमें आगे बढ़ने के लिये सतत संघर्ष करना ही होगा। वही हमारी नियति है

अपने देश की मुक्ति के लिये
ट्रौंगसौन पर्वत श्रृंखला को
पार करते हुये
हमारा हृदय

बड़े गौरव का अनुभव करता है

तो हू मानते हैं कि कविता को असरदार होने के लिये जरूरी है कि कवि को अपनी जनता से बेलाग और अचूक प्यार हो। वह उससे एकात्म अनुभव करे। कविता उसकी सेवा के लिये हो। जब हम कवि रूप में अपनी जाति को समर्पित हैं तब हम अपने ‘स्वत्व’ को भूल कर जनता से अछोर जुड़ते हैं। उस समय क्रांति ही हमारा लक्ष्य होता है। राष्ट्र के प्रति पूर्ण समर्पण कवि का दायित्व है। यही कसौटी है एक क्रांतिकारी तथा बड़े लोकधर्मी कवि की। आज हिंदी में कितने कवि हैं जो अपने मुक्तिसंग्राम की अधूरी छूटी क्रांति के संकल्पों को पूरा करने के लिये कृतसंकल्प हैं? अधिकांश कविताओं से लगता है कि कवियों को न तो लोक की चिंता है। न अधूरी छूटी क्रांति की। बल्कि महसूस होता है कि हमने उन्हें विस्मृत कर दिया है। ज्यादातर कवितायें बहुत ही निजी संवेदनों के पहले स्तर पर ही रची जा रही हैं। ऐसा क्यों है? क्योंकि कवि लोक विमुख हैं। उनके सरोकार बड़े नहीं हैं। जब कवि के सरोकार ही बड़े नही तो उसकी विश्वदृष्टि (विज़न) बड़ी केसे होगी? कवितों का फलक भी विस्तृत नहीं हो सकता। आलोचकों को इसकी चिंता नही कि वे हसतक्षेप करें? क्योंकि उनके पास भी तो बड़े सरोकार नहीं हैं? हिंदी की अधिकांश आलोचना पेशेवर हो चुकी है। उसका संबंध कैरियर से हो चुका है। लोक से बिना एकात्म हुये हमारे सरोकार बड़े नहीं हो सकते। इसके लिये हमारे पास किसी बड़े समग्र तथा वैज्ञानिक जीवन-दर्शन की आँख होना जरूरी है। कदाचित तो हू जैसे कवि से हम इस दिशा में प्रेरित हो सकें।

तो हू का काव्य निकष भी ध्यान देने योग्य। उनका मानना है कि लोकधर्मी कवि को बहुत खरा, सच्चा तथा ईमानदार होना पहली शर्त है। दूसरे,  उसे अपने संलक्ष्यों के प्रति कृतसंकल्प, अटल तथा दृढ़प्रतिज्ञ होना भी बहुत जरूरी है। जब तक कवि में ये गुण नहीं हैं तब तक उसकी कविता अपेक्षित ऊँचाइयाँ पा सकेगी इस में संदेह है! दूसरे, इन गुणों के चलते ही कविता असरदार तथा विश्वसनीय होगी। वैसे ये गुण कवि को ही नहीं हर प्रकार के लेखक को जरूरी हैं। इन गुणों की शक्ति से ही कवि क्रूरता, पाखण्ड, अन्याय तथा शोषण- उत्पीड़न का अर्थवान प्रतिरोध कर सकता है। तो हू की कवितायें बताती हैं कि उनके जीवन में भी ये गुण आद्यंत विद्यमान रहे थे। इससे यह ध्वनि भी संकेतित है कि बड़ा तथा प्रभावी कवि होना बिना बड़े मानवीय मूल्यें को धारण किये संभव नहीं है। पहले बहुत अच्छा  इन्सान बाद में कवि। तो हू के इन विचारों से मैं प्रेरित हूँ। मैंने योरुप के किसी कवि या समीक्षक को जीवन की नैतिक संस्कृति के बारे में इतने सुलझे और उच्च विचार व्यक्त करते न सुना। न पढ़ा। न जाना। लगता है कि भारत का कोई लोकधर्मी चिंतक-कवि अपनी बात कह रहा है। क्या यह एशिया तथा योरुप की नैतिक संस्कृति का अंतर तो नही है? तो हू मानते हैं कि कविता के लिये कुछ मानदण्ड हैं। उनके अनुसार पहली चीज़ बहुत ही सुलझी तथा स्पष्ट वैज्ञानिक  विचारधारा है। पहले ही बता चुका हूँ कि तो हू आकण्ठ मार्क्सवादी थे - आद्यंत। यदि ऐसा है तो हमारे कथ्य के चयन तथा उसकी कहन में कठिनाई नही होगी। इसी से कवि की विश्वदृष्टि रची जाती है। दूसरे, वह मानते हैं कि उत्कृष्ट कविता में कलात्मक श्रेष्ठता बहुत जरूरी है। आश्चर्यचकित करने वाली बात है कि तो हू की कवितायें अपने दल को सराहती हैं। जैसे पाब्लो नेरुदा या माइकोवस्की में मिलता है। कईबार नाज़िम में भी। हमारे यहाँ केदारनाथ अग्रवाल और नागार्जुन कुछ सीमा तक कविता में यह जोखिम उठाते हैं। हमारी पीढ़ी के महत्वपूर्ण कवि पाश तथा कुमारेंद्र में भी यह प्रवृत्ति मिलती है। मायकोवस्की कईबार प्रचार के स्तर तक भी आ जाते हैं। पर तो हू की कविता  क्रांति का आह्वान करती है -उसे सराहती भी हैं। पर कविता की कलात्मकता में कोई कमी नहीं आती। वह अपने देश को बार बार कविता में लाते हैं। फिर भी कवितायें न तो विरस हैं। न उबाऊ। न उनमें आत्मपरकता के तत्व का निषेध है। उनमें कोई जार्गन भी नहीं है। उनकी कवितायें पढ़ के यह नहीं लगता कि तो हू बहुत बड़े साम्यवादी दल के राजनीतिक  नेता तथा कार्यकर्ता भी हैं। यह उनकी कविताओं की बहुत बड़ी उपलब्धि है। इससे हम सीख सकते हैं।

तो हू ने अपने प्रिय कवियों के बारे में भी कुछ बातें कही हैं। इन बातों में उनकी गहरी आलोचनात्मक दृष्टि तथा कविता की गहरी समझ व्यक्त होते हैं। सर्वप्रथम वह नाम लेते हैं अपने प्रिय कवि नाज़िम हिकमत का। तो हू ने बताया है कि उन्होंने नाज़िम की सर्वप्रथम कविता पढ़ी, ‘बाल कन्या हिरोशिमा की’। 1955 के बाद पढ़ी ‘मछुआरा प्रशांत महासागर का’ । उन्होंने बताया है कि शुरू में हिकमत एक बेनामी कवि की ज़िदगी जीते रहे। तो हू ने नाज़िम को पढ़ा फ्रैंच भाषा में। यह कवि अपने रुचि के कवियों की कवितायें लगातार पढ़ता रहा है। ‘आजादी’ नामक कविता पढ़ी एलुआ कवि की। लुई अरागाँ की एक कविता पढ़ी। बाद में ‘रेल पटरियों के विभंजको को जागने दो’ कविता पढ़ी नेरुदा की। वियतनाम के आजाद होने के बाद ही तो हू इन कवियों को पढ़ पाये थे। उन्हें लगा कि ये लोकधर्मी कवि उनके गहरे मित्र हैं। नाज़िम का तो वह अनुवाद करना चाहते रहे। नाज़िम हिकमत ऐसे कवि हैं जो बिल्कुल सरल-सहज है। उनके दिल में हर किसी को गहरी तड़प है। एक विशेष बात यह कि अपने देश तुर्की से निर्वासित होकर भी नाजिम कभी देश को नहीं भूले। तो हू ने हिकमत की एक कविता भी उद्धृत की है जो उन्होंने जेल में रहकर अपनी पत्नी को लिखी थी –

ओ मेरी प्रिया
मतलब है समाजवाद का
कि असंख्य भुजायें मिलकर
किसी पर्वत को पलट दें
तो भी
प्रत्येक भुजा अपने को
गर्वोन्नत समझे
ओ प्रिया -
यह भी अर्थ है समाजवाद का
हमारा प्यार
हमसे कुछ न चाहे
न धन, न वैभव
बस संतुष्ट रहे
प्यार और भरोसे में।


तो हू ने हिकमत को अपना ‘दोस्त कवि’ माना है। एक सच्चा दोस्त। पाब्लो नेरुदा को वह पृथ्वी के गर्भ में ‘खौलता लावा’ मानते हैं। उनकी कविता एक प्रकार का ‘वाद्यवृन्द’  है। पालॅ एलुआर में पच्चीकारी अधिक है। जबकि लुई अरागाँ भाषा के महान जादूगर शिल्पी हैं। मयाकोवस्की को वह ’योद्धा कवि’ मानते हैं। ब्रेख्त के लिये उन्होंने ‘इस्पात की तीखी धार’ कहा है। कविता में तो हू बहुत  मितभाषी भी हैं। जीवन की सचाई तथा वैचारिक गहराई के साथ। लोर्का को उन्होंने जीवन के महासमर में एक ‘अविजित योद्धा कवि’ कहा है । तो हू मानते हैं कि उन्होंने इन कवियों को बहुत अधिक नहीं पढ़ा है। इन कालजयी कवियों के काव्य द्वार तक ही वे पहुँच पाये हैं। इन टिप्पणियों से साफ झलकता है कि तो हू की कविता के बारे में क्या समझ है। जिन्होंने उपर्युक्त कवियों को ध्यान से पढ़ा होगा वे तो हू की आलोचकीय सटीकता को बेहतर समझेंगे।
तो हू कविता के सुंदर भविष्य के लिये आशान्वित हैं। जबकि पतनशील कवि -समीक्षक ‘कविता का अंत कहने लगे है। उनका मानना है कि कविता यदि मनुष्य जीवन के करीब है तो वह बराबर विकसित होगी। वह कविता को समाजपरक मान  कर भी व्यक्तिपरक मानते हैं। कविता सामाजिक मनुष्य द्वारा रची गई एक  ऐसी रचना है जो समाज के प्रत्येक व्यक्ति को उन्नत बनाती है। इसीलिये वह कवियों के बीच भी कोई सीमा नहीं मानते। यानि जीवन के गहरे भावबोध से जन्मी कविता परस्पर सीमाओं को तोड़ कर दिक्काल का अतिक्रमण करती है। उन्होंने एक महत्वपूर्ण प्रश्न किया है कि हमारे बीच आखिर कवयित्रियाँ इतनी कम संख्या में क्यों हैं?
तो हू कविता में शब्द संकेतों तथा बिंब ध्वनियों पर बहुत ज़ोर देते हैं। उनके अनुसार कई बार कवि भी अपने कथ्य तथा बचन को समझ नहीं पाते। कविता में अनेक बातें स्फटकीय पारदर्शिता की तरह नहीं होती। न कोई बँधे बँधाए गणितीय बीज-सूत्र होते हैं। कुछ द्रव्य सत्य हमें स्वप्न जैसे लगते हैं। तो हू मानते हैं कि एक कवि दूसरे कवि की कविता पढ़ते समय या उसका अनवुाद करते समय बहुत कुछ अपना भी जोड़ देता है। इसी तरह हमारी समझ जनता के बारे में भी बहुत साफ तथा पारदर्शी नहीं होती। उसके मन में चीज़ें बनती बिगड़ती रहती हैं। फिर भी जनता को समझना दुष्कर नहीं होता। बहुत बार कवि किसी बात को जानने के लिये चाह कर भी ठीक से बता नहीं पाता। द्रव्य सत्य को जब हम फिर से रचते हैं -उसे शब्दों में बाँधते हैं -तो लगता है कि जो करना चाहते थे वह नहीं हुआ। शायद इसीलिये हमें हर अगली कविता के लिये बेचैन होना पड़ता है। सोचते हैं कि शायद इस बार बात पूरी हो जाए। यह सिलसिला अनवरत चलता रहता है। एक उत्कृष्ट कविता का निहितार्थ अथवा मर्म हम एक बार में नहीं समझ सकते। जितनी बार उसे समझने की कोशिश करते हैं लगता है फिर कुछ छूट गया। तो हू इसे कविता की पंक्तियों के बीच का रिक्त स्थान कहते हैं। यद्यपि यह रिक्त होता नहीं। जिसको हम रिक्त समझ रहे हैं वहाँ अर्थध्वनियों की बारीक अनुगूँजें तथा काव्य बिंबों की कौंधें छिपी रहती हैं। तो हू का मानना है कि सही कविता इसी आनुमानिक रिक्ति में निवास करती है। शब्दों के बीच की इस तथाकथित रिक्ति को ....इस शून्यता को -यदि एकाग्र होकर समझे तो हमें अनेक अनुध्वनियों की झंकार सुनाई देगी। अतः जिसे हम रिक्ति समझ रहे हैं वहाँ कविता का सार निहित है। जीवन में न प्रकृति में शून्य कहीं नहीं है। इसलिये काव्यार्थ समझने के लिये हमें धैर्य रखना पड़ता है। काव्य मर्म एक सूक्ष्मबोध से ही अनुध्वनित होता है। उसे उसी स्तर तथा सूक्ष्म प्रक्रिया से ही समझा जा सकता है। तो हू का संकेत है कि कविता में उसके सार तत्व तक जाने के लिये हमें उसके शब्दार्थ तक ही सीमित नहीं रहना चाहिये। शब्द जब रूपकों तथा बिंबों में ढलने लगते हैं तो उनकी अर्थध्वनिया दैनिन्दिन तर्क से नहीं समझी जा सकती। श्रेष्ठ कविता को समझने के लिये हमें काव्य तर्क का ही सहारा लेना होगा। अवधारणात्मक या दार्शनिक तर्क का नहीं। इसी को कवि तो हू शब्दों तथा आत्मा की संश्लिष्टता कहते हैं।


तो हू इतिहास में दो तिथियों को महत्वपूर्ण मानते हैं। 1945 की अगस्त क्रांति। दूसरी 1954 की विजय। 1945  में प्रत्येक वियतनामी नागरिक आज़ाद हुआ। जैसे सदियों के गहन अंधकार के बाद प्रभात। पर 1954 की विजय जैसा वह नहीं था। क्रांति का सबसे बड़ा परिणाम समतामूलक समाज की रचना है।  वियतनामी नागरिक का अगाध आत्म विश्वास जगा है। वियतनाम के लोगों को महसूस हुआ कि उनको कोई परास्त नहीं कर सकता। ऐसा विश्वास उपजा है कवि में लोक से एकात्म होने पर। अपनी मातृभूमि से प्रेम के कारण। अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता की वजह से। तो हू जीवन का सिद्धान्त बताते हुये कहते हैं कि, ’ जो हर प्रकार का श्रम करता है, वही जीवन की कठोरताओं पर विजय पाता है। वही अपने हर दुश्मन को परास्त करता है। ’ एक कवि का यही दर्शन उसे कविता की ऊचाइयों तक ले जाता है। यही सच्ची लोकधर्मिता है। तो हू के लिये स्वतंत्रता ही सर्वेापरि है। हो ची मिन्ह के अनुसार यही ‘मार्क्सवाद का सार’ है। यही समग्र जीवन का भी निचोड़  है।

आजादी मिलने के बाद तो हू को उनके देश ने बहुत सम्मान दिया। उन्हें कई राजकीय उच्च पदों पर रखा गया। वह पहले वियतनामी कवि -व्यक्ति हैं जिन्हें दक्षिण-पूर्व एशिया पुरस्कार से अलंकृत  किया गया था। 1976 में उन्हें पोलिटब्यूरो का सदस्य नियुक्त किया गया। 1980 में उन्होंने उपप्रधान मंत्री का पद सुशोभित किया। 19 दिसम्बर, 2002 में उनका देहावसान हुआ।

तो हू की कविताओं को बड़े आदर सम्मान से आज वियतनाम की शिक्षण संसथाओं में पढ़ाया जाता है। हमें तू हो से सीखना है कि राजनीति तथा समाज से कविता कभी अलग नहीं है। दूसरे, लेकधर्मिता के बिना कविता बड़ी नहीं हो सकती। उनकी कविता उन कला-रूपवादियों को एक माकूल उत्तर है जो  कविता को समाज तथा राजनीति निरपेक्ष मानकर उसे आदमकद शीशे का प्रतिबिंबन बना देते हैं। एक प्रसिद्ध वियतनामी कवि झोन द्वियू का कथन है कि ‘तो हू ने बड़ी सफलता से राजनीति का कविता में विलय’ किया है। उनकी एक कविता ‘ दो शत्रु ’ की पंक्तियों से अपनी बात खत्म करता हूँ -

लाड़ प्यार
ये दोनों ही बहुत आवश्यक हैं
हम नहीं रह सकते
इन दोनों के बिना
पर
अन्याय - अत्याचार
तथा उपेक्षा- अपमान से
हमें घृणा है
दो शत्रु हैं हमारे
मिथ्या दंभ
दूसरे को आदेश देने के लिये
उसे समझना दास।







 


ईमेल : kritioar@gmail.com 
ब्लॉग : poetvijendra.wordpress.com 
मोबाईल  : 09928242515


(आलेख के अंतर्गत दिए गए लोकधर्मी कवि तो हू के सभी चित्र हमने गूगल के सौजन्य से लिए हैं।)

टिप्पणियाँ

  1. लोकधर्मी कवियों की परम्परा' श्रृंखला की ग्यारहवीं कड़ी में वरिष्ठ कवि विजेन्द्र जी का आलेख प्रख्यात वियतनामी कवि तो हू पर पढ़ा ! तो हू की कविताओं को समझने के लिये हमें अपनी इंद्रियों को भी सावधान रखना होगा। उनकी कविता बौद्धिकता के आतंक से परहेज करती है। वहाँ हमारे मन की परत दर परत खुलती दिखाई देती है। तो हू का चेतन, अवचेतन तथा अचेतन मन तरह तरह की गहराइयों में हमारी यात्रायें कराते हैं। ता हू कि कवितायेँ बहुत गहराई में ले जाती हैं ! अन्याय और शोषण, उत्पीडन के के खिलाफ लड़ने कि ताक़त देते हैं !......शाहनाज़ इमरानी

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