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रामजी तिवारी

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  फ़िल्में केवल हमारे  मनोरंजन का ही साधन नहीं होतीं बल्कि ये हमारे समय का एक बेहतरीन दस्तावेज भी होती हैं। एक विश्लेषक अपनी सूक्ष्म दृष्टि के द्वारा इन फिल्मों को देख कर उनकी वास्तविकता या दिखावे को समझ और समझा सकता है। वियतनाम युद्ध इतिहास का एक ऐसा ही अध्याय है जिस पर फिल्मकारों ने अनेक फ़िल्में बनाईं। यहाँ यह काबिले-गौर है कि अलग-अलग निर्देशकों द्वारा एक ही विषय वियतनाम युद्ध पर बनायी गयी फिल्मों में उनके काल-स्थान-सोच एवं संस्कृति का स्पष्ट फिल्मांकन दिखाई पड़ता है। आस्कर अवार्ड्स को फिल्मों का  सर्वोच्च सम्मान  माना जाता है लेकिन यहाँ भी तमाम घालमेल होता है। जाहिरा तौर पर अमरीका में दिए जाने वाले इस सम्मान पर अमरीकी सोच एवं मानसिकता भी शामिल होती है और जो फ़िल्में इस प्रतिमान पर खरा उतरतीं हैं उन्हें ही इस सम्मान से नवाजा जाता है। बाक़ी को इससे महरूम कर दिया जाता है। फिर भी दम-ख़म वाली फ़िल्में बिना किसी पुरस्कार-सम्मान के भी दर्शकों का जो प्यार एवं सम्मान पाती हैं वह सम्म़ानित फ़िल्में हांसिल नहीं कर पातीं।

हमारे मित्र रामजी तिवारी की पहली किताब 'आस्कर अवार्ड्स: यह कठपुतली…

दिनेश कर्नाटक

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जन्म -13 जुलाई 1972, रानीबाग (नैनीताल)                        
विधाएं -कहानी, आलोचना, संस्मरण, यात्रा वृत्तांत आदि।
मुख्य कृतियां:  कहानी-संग्रह: काली कुमाऊं का शेरदा तथा अन्य कहानियां

उपन्यास: फिर वही सवाल
सम्मान -  प्रताप नारायण मिश्र स्मृति युवा साहित्यकार सम्मान’ 2010 से सम्मानित।
उपन्यास ‘फिर वही सवाल’ भारतीय ज्ञानपीठ की नवलेखन प्रतियोगिता-2009 में अनुशंसित




दिनेश कर्नाटक हमारे समय के चर्चित युवा कहानीकार हैं। मैकाले का जिन्न' दिनेश की ऐसी ही कहानी है जिसमें उन्होंने हमारी शिक्षा व्यवस्था में व्याप्त खामियों और बेसिर पैर की सरकारी योजनाओं-घोषनाओं का पर्दाफ़ाश किया है। तमाम सरकारी योजनायें कागजों पर तो सफल बतायी जाती हैं जबकि हकीकत कुछ और होती है।  तो आईये आज पढ़ते हैं दिनेश कर्नाटक की यह कहानी. 




दिनेश  कर्नाटक




                                                                (लार्ड मैकाले)

मैकाले का जिन्न


  ‘सरकार के प्रयास, समाज के उन उच्च वर्गों में शिक्षा का प्रसार करने तक सीमित रहने चाहिए, जिनके पास अध्ययन के लिए अवकाश है और जिनकी संस्कृति छन-छनकर जनसाधारण तक पहुंचेगी।’

चंद्रेश्वर

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30 मार्च 1960 को बिहार के बक्सर जनपद के एक गाँव आशा पड़री में जन्म। पहला कविता संग्रह 'अब भी' सन् 2010 में प्रकाशित। एक पुस्तक 'भारत में जन नाट्य आन्दोलन' 1994 में प्रकाशित। 'इप्टा आन्दोलन : कुछ साक्षात्कार' नाम से एक मोनोग्राफ 'कथ्यरूप' की ओर से 1998 में प्रकाशित। वर्तमान में बलरामपुर, उत्तर प्रदेश में एम.एल.के. पी.जी. कॉलेज में हिंदी के एसोसिएट प्रोफेसर।
चंद्रेश्वर पाण्डेय की कविता में एक गँवई मन दिखाई पड़ता है। ऐसा मन जो किसी वक्त दुश्मन पर भी यकीन कर लेना चाहता  है. यहाँ मुझे आस्ट्रियाई रचनाकार स्टीफ़न ज्विग की वह पंक्ति याद आ रही है जिसमें वे कहते हैं कि किसी भी प्रकार की शक्ति हिंसक होती है। यहाँ यह कवि भी कहता है कि 'चाहे जैसा भी हो/ लक्ष्य-भेद/ हिंसा तो होगी ही!' पहली बार पर हम चंद्रेश्वर की कुछ इसी तरह की कविताओं से रू-ब-रू होते हैं।





दुश्मनी में  प्यार

ऐसा तो आया नहीं कोई मेरे जीवन में अब तक जो पिघला न हो मेरे अनुनय-विनय मेरी दुनियादारी से थोड़ा भी

बिलकुल लौह कपाट की तरह आपका ह्रदय  सुना है प्यार  छुपा रहता है दुश्मनी में भी कभी  दुश्मन भी चाहते…