मंगलवार, 26 फ़रवरी 2013

रामजी तिवारी

 


   फ़िल्में केवल हमारे  मनोरंजन का ही साधन नहीं होतीं बल्कि ये हमारे समय का एक बेहतरीन दस्तावेज भी होती हैं। एक विश्लेषक अपनी सूक्ष्म दृष्टि के द्वारा इन फिल्मों को देख कर उनकी वास्तविकता या दिखावे को समझ और समझा सकता है। वियतनाम युद्ध इतिहास का एक ऐसा ही अध्याय है जिस पर फिल्मकारों ने अनेक फ़िल्में बनाईं। यहाँ यह काबिले-गौर है कि अलग-अलग निर्देशकों द्वारा एक ही विषय वियतनाम युद्ध पर बनायी गयी फिल्मों में उनके काल-स्थान-सोच एवं संस्कृति का स्पष्ट फिल्मांकन दिखाई पड़ता है। आस्कर अवार्ड्स को फिल्मों का  सर्वोच्च सम्मान  माना जाता है लेकिन यहाँ भी तमाम घालमेल होता है। जाहिरा तौर पर अमरीका में दिए जाने वाले इस सम्मान पर अमरीकी सोच एवं मानसिकता भी शामिल होती है और जो फ़िल्में इस प्रतिमान पर खरा उतरतीं हैं उन्हें ही इस सम्मान से नवाजा जाता है। बाक़ी को इससे महरूम कर दिया जाता है। फिर भी दम-ख़म वाली फ़िल्में बिना किसी पुरस्कार-सम्मान के भी दर्शकों का जो प्यार एवं सम्मान पाती हैं वह सम्म़ानित फ़िल्में हांसिल नहीं कर पातीं।

हमारे मित्र रामजी तिवारी की पहली किताब 'आस्कर अवार्ड्स: यह कठपुतली कौन नचावै' का विमोचन
प्रतिरोध के सिनेमा द्वारा 22 फरवरी से 24 फरवरी 2013 तक आयोजित 'गोरखपुर फिल्मोत्सव' में 22 फरवरी को 2013 किया गया। इस किताब में रामजी ने आस्कर अवार्ड्स के मिथक एवं यथार्थ को अपनी सूक्ष्म दृष्टि एवं विश्लेषण के द्वारा परखने की कोशिश की है। पहली किताब के प्रकाशन की बधाई देते हुए पहली बार पर प्रस्तुत है रामजी तिवारी की इसी किताब का एक अंश 'वियतनाम युद्ध और हालीवुड मायोपिया'.




  वियतनाम युद्ध और हालीवुड मायोपिया

अब हम उस सबसे महत्वपूर्ण दौर पर आते हैं, जिसने  अमेरिका को अंदर तक मथ दिया था और वह था “वियतनाम का युद्ध” इससे पहले कि हम इस युद्ध  पर बनी फिल्मों की बात  करें, और यह देखें कि आस्कर  पुरस्कृत फिल्मों में वियतनाम युद्ध की कैसी तस्वीर उभरती है, यहाँ उस युद्ध के संक्षिप्त इतिहास को जान लेना समीचीन होगा| सदियों से फ्रेंच कालोनी के रूप में गुलामी का जीवन जीने वाले इस समाज को आजादी  के लिए एक लंबा संघर्ष करना पड़ा 1954 में अंततः फ्रांसीसियों ने वियतनाम छोड़ दिया, और वह आजाद हो गया लेकिन उसकी किस्मत में आजादी और संघर्ष-विराम की यह गाथा लिखी ही नहीं थी| वह शीत युद्ध का दौर था, और कोरियाई युद्ध ने देशों के भीतर देशों को बाँट लेने की नयी परम्परा का सूत्रपात कर दिया था दोनों खेमे नव-स्वतन्त्र देशों पर निगाह लगाए रखते थे, और अपने साथ जोड़ने की हर संभव कोशिश को वैध मानते थे ऐसे में वियतनाम का आजाद होकर साम्यवादी खेमे में चला जाना अमेरिकी खेमें के लिए नाकाबिले-बर्दास्त था ‘हो-ची-मिन्ह’ के नेतृत्व में लड़े गए आजादी के संघर्ष और उसके बाद गठित सरकार को अस्थिर करने की अमेरिकी कोशिशे पहले दिन से ही आरम्भ हो गयीं | गृह युद्ध की स्थिति पैदा कर दी गयी, और जेनेवा कन्वेशन के माध्यम से अंततः 17 पैरलल रेखा के द्वारा वियतनाम को दो हिस्सों में विभाजित कर दिया गया

                                                          (किताब का आवरण)

उत्तरी हिसा साम्यवादी  खेमें में और दक्षिणी  हिस्सा अमेरिकी पिट्ठू के रूप में पूंजीवादी खेमें  में शामिल हुआ दोनों  तरफ इसे लेकर असंतोष था उत्तरी खेमा इस विभाजन को कृत्रिम  और थोपा हुआ मान रहा था और देश का एकीकरण चाहता  था, जबकि दक्षिणी खेमा अमेरिका  को संतुष्ट करने के लिए  उत्तर की सरकार को परेशान करने और उसे अस्थिर करने की चालों को लगातार चल रहा  था अमेरिका से उसे इस बाबत करोड़ों और अरबो डालर की सहायता भी मिल रही थी दक्षिणी  खेमें की तमाम कोशिशों के बाद भी जब उत्तरी साम्यवादी  वियतनाम का कोई खास नुकसान नहीं हुआ, वरन उलटे दक्षिणी  खेमें का ही नुकसान होने लगा, तब अमेरिका को सीधे इस युद्ध  में उतरना पड़ा आइजनहावर से आरम्भ होकर केनेडी, जानसन और निक्सन तक आते-आते अमेरिकी सैनिकों की संख्या इस युद्ध में हजारों से लाखों तक पहुँच गयी जमीनी के साथ साथ हवाई हमले भी बड़े पैमाने पर आजमाए गए यहाँ तक कि पडोसी देशों – कम्बोडिया और लाओस - की सीमाओं में भी घुसकर बम बरसाए गए युद्ध के सारे नैतिक आधार मुँह ताकते रहे और हिरोशिमा में परमाणु बम से हाहाकार मचाने वाले नायक, रासायनिक हथियारों से वियतनाम को तबाह करते रहे वियतनामियों ने गुरिल्ला-युद्ध की अपनी पुरानी रणनीति को पुनः आजमाया, जिसे वे अपने स्वत्रंतता-संघर्ष में सफलता पूर्वक प्रयुक्त कर चुके थे, और युद्ध लंबा खिचने लगा अमेरिकी सैनिको की सैकड़ों और हजारों की संख्या में पहुँचने वाली लाशों ने वहाँ के समाज में हलचल पैदा करना आरम्भ कर दिया दबाव इतना बढ़ गया कि अमेरिका को बाहर निकलने के लिए बाध्य होना पड़ा 1975 में जब युद्ध समाप्त हुआ और वियतनाम का पुनः एकीकरण सम्पन हुआ, तब लगभग बीस साल चले उस हाहाकार का हिसाब लगाने का काम भी शुरू किया गया अनुमानतः उस युद्ध में 15 से 30 लाख लोग मारे गए थे, जिसमे अमेरिकी सैनिकों की संख्या भी पचास हजार के आसपास थी अब यह अलग बात है , कि उस युद्ध को याद करते समय विश्लेषक अक्सर इस तथ्य को गोल कर जाते हैं, कि ‘शेर और मेमने के उस युद्ध में, जब शेर ने इतने घाव खाए थे तब मेमने का क्या हुआ होगा’ 

 
                                                                (आस्कर ट्राफी)

ठीक ही कहा जाता है कि युद्धों ने दुनिया को कई गहरे जख्म दिए हैं। कुछ जख्म तो खड़ी फसलों को नेस्तनाबूद कर देते हैं और कुछ उस समाज या देश की जड़ों में चले जाते हैं, जहाँ से भविष्य की फसलों को उगना है। यह जख्म भी उनमे से एक है, जिसको वियतनाम के पडोसी और उस युद्ध में अमेरिका के मित्र थाईलैंड के खाया जब वियतनाम युद्ध आरम्भ हुआ, तब थाईलैण्ड खुल कर अमेरीका के साथ खड़ा हो गया उसने अपने हवाई अड्डों को अमेरीकी सेना के लिए खोल दिया। जब अमेरिकी सेनाए थाईलैण्ड में उतरीं और युद्ध लम्बा खिंचने लगा तो उन अमेरीकी सैनिकों के मनोरंजन के लिए वेश्याओं की व्यवस्था की गयी। इतिहास में ऐसा नुस्खा पहले भी आजमाया जा चुका था। अमेरीकी सरकार ने थाईलैण्ड के सहयोग के बदले बड़ी मात्रा में उसकी वित्तीय मदद आरम्भ की। थाईलैण्ड का कायाकल्प होने लगा। शहरीकरण तेजी से शुरू हो गया। फैशन, समाज, विचार, संस्कृति और जीवन शैली में आए इस बदलाव ने भूचाल खड़ा कर दिया। थाई समाज की आँखे अमेरीकी डालर की चमक के आगे चौंधियाँ गयी। उसने आँख मूद कर पश्चिम को गले लगाना चाहा, जिसके लिए उसका समाज तैयार नहीं था। वह परजीवी होता चला गया। आसान रास्तों से पैसा कमाना उसकी आदत बन गयी। पश्चिमी चकाचौंध वाली जीवन शैली उसे ऐसा करने के लिए प्रेरित करती रही। अमेरीकी तो चले गये लेकिन यह देश अन्तर्राष्ट्रीय चकलाघर बन कर रह गया। कहना न होगा कि आज भी वह देश डालर द्वारा नाथे गए उसी नथिये में घिसट रहा है |


फिल्मों की तरफ लौटते हैं इस युद्ध पर बनी दो फिल्मो 1978 की “डियर हंटर” और 1986 की “प्लाटून” को आस्कर पुरस्कार मिले हैंडियर हंटर” वियतनाम युद्ध के अमेरिका पर पड़ने वाले प्रभाव को अमेरिकी समाज के माध्यम से देखती है और वहाँ अगर वियतनाम का मोर्चा आता भी है , तो वह एक ट्रेलर के रूप में गुजर जाता है , जिसमे हमें वहाँ की जमीनी हकीकतों का कोई अंदाजा नहीं लग पाता यह फिल्म तीन भागों में चलती है | पहले भाग में, 1967 का अमेरिकी नायक अपने प्रेम में डूबा हुआ है और अपनी सगाई की तैयारी कर रहा है दूसरे में वह वियतनाम युद्ध में पाया जाता है , जहाँ की स्थितियां बेहद भयावह हैं वह कुछ समय के लिए बंदी भी बना लिया जाता है, जिसमे उसे ‘रशियन रौलेट’ खेलने के लिए विवश किया जाता है इस खतरनाक खेल में पिस्तौल की चेंबर में कुछ गोलियों को डाल  कर उसे घुमा दिया जाता है, और बारी-बारी से उसे अपने कनपटी पर रख कर, तब तक जीवन पर दाव लगाया जाता है , जब तक किसी एक की मौत नहीं हो जाती है इस खेल में उसके कुछ साथी मारे भी जाते हैं , लेकिन संयोगवश वह बच जाता है तीसरे दृश्य में वह अमेरिका में दिखाई देता है, जहाँ वह लगभग मनोरोगी की स्थिति में पहुँच चुका है, और इसी खेल को खेलते हुए एक दिन अपनी जान दे देता है


जाहिर है कि यह फिल्म उस प्रक्रिया  को साफ़ नजरअंदाज कर देती है , जिसने वियतनाम युद्ध  को जन्म दिया था | लेकिन इसको लेकर दूसरी आपत्तियां अधिक तार्किक और जायज हैं | ‘एसोसिएटेट प्रेस’ के ‘पीटर अर्नेट, जिन्होंने इस युद्ध को लंबे समय तक कवर किया था, का कहना है, कि बीस साल के इस युद्ध  में ‘रशियन रौलेट’ खेलने के, एक भी ऐसे वाकये का पता  नहीं चलता, जिसका इस फिल्म  में जिक्र किया गया है कुल मिला कर इस फिल्म का ‘केन्द्रीय –तत्व’ ही सफ़ेद झूठ है 1979 के बर्लिन फिल्म समारोह में पहली बार जब इस फिल्म को दिखाया गया था, तब संपूर्ण साम्यवादी खेमे ने यह कहकर ‘वाक्-आउट’ किया था, कि “इस फिल्म के द्वारा वियतनामी जनता का घोर अपमान किया गया हैउन्हें हत्यारा, क्रूर और अमानवीय दिखाया गया है , जो कत्तई रूप से गलत है इस फिल्म के बचाव में आये कुछ विश्लेषकों ने यह तर्क दिया, कि ‘रशियन रौलेट’ के खेल को ‘अविधा’ में नहीं वरन व्यंजना’ में देखना चाहिए, और यह फिल्म इस युद्ध को ‘समग्रता’ में इस खेल की तरह ही खतरनाक मानती है इस तर्क को मान लेने में कोई बुराई नहीं है, बस उसमे यही एक पेंच फसता है, कि उस युद्ध में किसने ‘रशियन रौलेट’ नामक इस खतरनाक खेल को खेला था वियतनामियों ने, जैसा की फिल्म में प्रदर्शित किया गया है, या अमेरिकियों ने, जैसा कि उस युद्ध में वास्तविक रूप से हुआ था


                                                           (डियर हंटर फिल्म का एक दृश्य )

1986 की पुरस्कृत फिल्म 'प्लाटून' अलबत्ता वियतनाम में ही चलती है , लेकिन युद्ध  के दौरान उसमे अमेरिकी  सैन्य कमांडरों द्वारा  दिखाई जाने वाली नैतिकता  और मानवता को पचा पाना  कठिन हैफिल्म दिखाती है कि युद्ध के दौरान  अपने साथियों की मृत्यु पर बौखलाए अमेरिकी सैनिक  जब सामान्य नागरिकों का टार्चर और यौन उत्पीड़न करने लगते हैं, तब उनका कमांडर कैप्टन उन्हें  ऐसा करने से रोकता है और चेतावनी देता है, कि भविष्य में ऐसा करना बर्दाश्त नहीं किया जाएगा बाद में उस और उस  जैसी अन्य टुकड़ियों को काफी नुकसान उठाना पड़ता है, और तब उसके साथी  सैनिक उस कमांडर का  खूब मजाक उड़ाते हैंफिल्म कुल मिला कर अमेरिकी  सैनिकों की कारस्तानियों  पर पर्दा डालने का काम करती है, जिसमे उनके ऊपर  युद्ध के नियमों की अवहेलना के कई संगीन  आरोप लगते रहे हैं 

 
                                                                (प्लाटून फिल्म का एक दृश्य ) 

अब प्रश्न यह उठता है, कि आखिर दुनिया वियतनाम युद्ध को किसलिए याद करती है ? जाहिर तौर पर ,वह अमेरिकी गुरुर के टूटने और बिखरने का युद्ध है, और दोनों में से कोई भी आस्कर विजेता फिल्म इस पर प्रकाश नहीं डालती “ऐसा क्यों है ..?” के जबाब में एक प्रसिद्द अमेरिकी फिल्म निर्देशक अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहते हैं कि “ यह अमेरिका की दुखती हुई रग है | न तो कोई इस विषय पर फिल्म बनाना चाहता है और न ही देखना जाहिर है कि इस स्थिति में पुरस्कृत होने की बात ही बेमानी है दरअसल अमेरिका जब भी अपनी चौखट से बाहर निकलता है, वह ‘वियतनाम युद्ध’ जैसे सवालो से ही अपने आपको घिरा हुआ पाता है मध्यपूर्व से लेकर अफ्रीका के तानाशाहों तक, इराक से अफगानिस्तान तक, हथियारों की बिक्री से हिरोशिमा के हाहाकार तक और धरती के गर्भ में सुरक्षित तेल भंडारों से अंतरिक्ष की ऊँचाईयों में तार-तार होती ओजोन परत तक, यह देश जहाँ भी देखता है, उसे वियतनाम ही दिखाई देता है यही दुखती रग उसे इन विषयों पर फिल्म बनाने से रोकती है वह अपनी खोल में सिमट जाता है और जब कभी कोई निर्माता-निर्देशक इससे बाहर निकलने का साहस दिखाता है, तो आस्कर की निर्णायक मंडली उसे कूड़ेदान में फेंक देती है ऐसी स्थिति में आस्कर पुरस्कारों की सूची से अमेरिका के इस बाह्य जीवन की अनुपस्थिति स्वाभाविक ही लगती है


                                             (हालीवुड की पहाड़ियों का एक नजारा)

वियतनाम युद्ध कुल मिला कर हालीवुड  मायोपिया की तरफ भी इशारा करता है, जिसमे उसका फिल्म उद्योग ऐसे सवालों के सामने अंधा दिखाई देने लगता है, जो दूरगामी  महत्व के हैं और जिनसे  किसी भी देश, समाज या उद्योग का भविष्य निर्धारित होता है इस विषय पर अमेरिका में  सैकड़ों फ़िल्में बनी हैं, लेकिन उनमे सच को बयान करने का साहस कुल मिला कर अनुपस्थित  दिखाई देता है, और जिन कुछ  फिल्मो में यह प्रयास किया भी गया है, उन्हें कोई देखना  नहीं चाहता इसने हालीवुड  सिने-उद्योग के लिए भविष्य का रास्ता भी निर्धारित कर दिया है, और जिसका उसने इराक और अफगानिस्तान युद्ध पर ज्वलंत सवालों से कन्नी काटते  हुए सफलतापूर्वक अनुसरण भी किया हैजाहिर है कि ऐसा करते हुए, कोई भी देश, समाज या उद्योग अपने अंधकारमय भविष्य की पटकथा ही लिख सकता है बहरहाल यहाँ हालीवुड में वियतनाम  युद्ध’ पर बनी कुछ चुनिन्दा फिल्मों को देख लेना ठीक  ही होगा ये हैं फुल मेटल जैकेट’, ‘अपोकेलिप्स नाऊ’, बोर्न आन द फोर्थ जुलाई’, गुड मार्निंग वियतनाम’, वी आर सोल्जर्स, ट्रापिक थंडर,  टाइगर लैंड हेयर, ‘आई आफ द ईगल’,  द ग्रीन बेरेट्स’, ‘कमिंग  होम’, ‘द फाग आफ वार’ और रेस्क्यू डान’ जाहिर है कि हालीवुड की बनी ये फिल्मे वह सब तो नहीं ही बता पाएंगी, जो वहाँ हुआ था, लेकिन फिर  भी इनके सहारे आपको उस युद्ध  का कुछ बेहतर अंदाजा जरुर लग सकता है चुकि वियतनाम  का फिल्म उद्योग इतना विकसित नहीं रहा, और उस युद्ध के दौरान  उसके लिए यह संभव भी नहीं था, इसलिए इस विषय पर वहाँ से बनने वाली फिल्मों का खासा अभाव दिखाई पड़ता हैजो फिल्मे वियतनाम में उस दौरान बनीं भी, वे दक्षिणी वियतनाम  में ही बनी और जिनमे कुल  मिलाकर वही एकांगीपन दिखाई  देता है अलबत्ता वहाँ पर बाद में बनी डाक्यूमेंट्री फिल्मों’ में इसकी थोड़ी व्यस्थित झलक  देखी जा सकती है, फिर भी इस विषय पर अभी बहुत काम किया जाना शेष है

 (रामजी तिवारी ने अभी हाल ही में लेखन  आरम्भ किया है। इन्होने कविताओं और कहानियों के अलावा कुछ यात्रा वृत्तांत भी लिखे हैं जो पर्याप्त चर्चा में रहे हैं। यह आलेख रामजी तिवारी की बहुमुखी प्रतिभा का उदाहरण है जिसमें रामजी तिवारी ने फिल्मों की अपनी गहरी समझ का परिचय दिया है।)
 

संपर्क-
जीवन बीमा निगम
मुख्य शाखा बलिया
बलिया, उत्तर प्रदेश
277201

मोबाईल: 09450546312
ई-मेल:
ramji.tiwari71@gmail.com

रविवार, 24 फ़रवरी 2013

दिनेश कर्नाटक


                               
जन्म -13 जुलाई 1972, रानीबाग (नैनीताल)                        
विधाएं -कहानी, आलोचना, संस्मरण, यात्रा वृत्तांत आदि।
मुख्य कृतियां:  कहानी-संग्रह: काली कुमाऊं का शेरदा तथा अन्य कहानियां

उपन्यास: फिर वही सवाल
सम्मान -  प्रताप नारायण मिश्र स्मृति युवा साहित्यकार सम्मान’ 2010 से सम्मानित।
उपन्यास ‘फिर वही सवाल’ भारतीय ज्ञानपीठ की नवलेखन प्रतियोगिता-2009 में अनुशंसित

            


दिनेश कर्नाटक हमारे समय के चर्चित युवा कहानीकार हैं। मैकाले का जिन्न' दिनेश की ऐसी ही कहानी है जिसमें उन्होंने हमारी शिक्षा व्यवस्था में व्याप्त खामियों और बेसिर पैर की सरकारी योजनाओं-घोषनाओं का पर्दाफ़ाश किया है। तमाम सरकारी योजनायें कागजों पर तो सफल बतायी जाती हैं जबकि हकीकत कुछ और होती है।  तो आईये आज पढ़ते हैं दिनेश कर्नाटक की यह कहानी. 




दिनेश  कर्नाटक




                                                                (लार्ड मैकाले)

मैकाले का जिन्न
   
 
  ‘सरकार के प्रयास, समाज के उन उच्च वर्गों में शिक्षा का प्रसार करने तक सीमित रहने चाहिए, जिनके पास अध्ययन के लिए अवकाश है और जिनकी संस्कृति छन-छनकर जनसाधारण तक पहुंचेगी।’

(मैकाले के ‘फिल्टरेशन सिद्धांत’ को सरकारी नीति घोषित करते हुए तत्कालीन गवर्नर-जनरल लार्ड ऑकलैंड, 24 नव0 1839)

    ‘सरकार को राजकीय विद्यालयों की स्थापना की गति को शनै-शनैः मंद करके, इन विद्यालयों के प्रत्यक्ष उत्तरदायित्व से पृथक हो जाना चाहिए।’
                                    -हर्टांग समिति, 1929

    ‘अपवंचित तथा कमजोर वर्ग के बच्चों को भी निजी विद्यालयों की प्रथम कक्षा में 25 प्रवेश पाने का अधिकार। इसका भुगतान सरकार बाउचर प्रणाली के जरिए करेगी।

                                     -शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009




वे एक-दो नहीं पूरे छह थे। अब्बास, विलाल, अमर, मोहन, नक्षे, पान सिंह ! पढ़ाई-लिखाई को छोड़ कर बाकी सब कामों में उस्ताद ! कक्षा में भूले-भटके ही नजर आते थे। होशियार इतने कि लगातार दस दिन की अनुपस्थिति से पहले कक्षा में नजर आ जाते थे ताकि नाम कटने से बच जाए। इसके बाद किसी दिन कक्षा में दर्शन दे दिये तो हाफ टाइम के बाद मौका लगते ही चम्पत हो जाया करते थे। वे उनकी अनुपस्थिति और अनियमितता को दूर करने के लिए कई तरह के प्रयास कर चुके थे, मगर उनका ढर्रा जस का तस बना हुआ था। समझाने तथा कहने का उन पर कोई असर नहीं होता था। वजह साफ थी, उन्हें अपने घरों का समर्थन प्राप्त था। किसी दिन मां-बाप को उनकी जरूरत होती तो अपने साथ ले लेते। बाकी  दिन उनकी मर्जी चलती!
वे सब कक्षा में अलग-अलग लड़कों के साथ बैठते थे। कॉपी चेक कराने, पाठ पढ़ाने और पूछताछ के समय या तो गायब हो जाते या ऐसे भोले भंडारी बने रहते कि पकड़ में नहीं आ पाते थे। लेकिन कब तक बचते ? पहली मासिक परीक्षा ने कक्षा की पूरी तस्वीर उनके सामने स्पष्ट कर दी। कॉपियों में प्रश्नों के उत्तर लिखने के बजाय प्रश्नों को ही अजीब, टेड़ी-मेड़ी लकीरों के रूप में उतारने के अलावा, उन्होंने कुछ नहीं किया था। कक्षा छह में पहुंच जाने के बावजूद, उन्हें अभी तक लिखना नहीं आ पाया था। उन्हें तुरंत अपने पास बुला कर जब उनसे पढ़ने को कहा गया तो यह भी उनके लिए दुष्कर कार्य हो गया था।




ऐसा भी नहीं था कि कक्षा में सभी बच्चे उनके ही जैसे थे। तीस बच्चों की कक्षा में समीर, संतोष, रऊफ, हर्षित, महमूद जैसे लड़के भी थे जो उत्साह से दिया गया काम करते और जैसे ही किया हुआ काम दिखाने को कहा जाता तो उनमें होड़ सी लग जाती थी। उनके घरों के हालात भी उन लड़कों के घरों से बेहतर नहीं थे। ये बच्चे न तो आए दिन कक्षा में अनुपस्थित रहते थे और न कभी स्कूल से भागते थे। इन बच्चों का पठन-पाठन के प्रति उत्साह देखकर नरेन्द्र सर को भी पढ़ाने में आनन्द आता था। इनके मां-बाप अपनी तमाम मुसीबतों के बावजूद इनसे पढ़ाई के अलावा और कुछ नहीं चाहते थे।

कक्षा के तमाम बच्चों में सब से अलग था, पान सिंह ! अपने उजाड़ चेहरे,  बिखरे हुए बालों, कटे-फटे, मैले और बास मारते कपड़ों के कारण वह कक्षा में सब से अलग नजर आता था। वह आए दिन बहुत ही मार्मिक ढंग से रोते हुए किसी लड़के की शिकायत लेकर उनके सामने खड़ा हो जाता था। ऐसा लगता था, जैसे वह एक तरफ है और कक्षा के सारे लड़के दूसरी ओर ! जिसे देखो वह उसी को परेशान करने में लगा है। उनकी समझ में नहीं आता था कि छोटी-छोटी बातों में होने वाले झगड़ों में उसकी आंखों में इतना पानी कहां से आ जाता है। वे उसे अपने पास बुलाते तो वह अपने दांये हाथ से गंगा-जमुना की तरह बह रहे आंसुओं को पोछता जाता और लम्बी-लम्बी सांसें भरते हुए लड़कों की करतूत भी बताता जाता। उसका रोना दूसरे बच्चों जैसा नहीं होता था। वह रोना ऐसा था, जैसा सब कुछ गंवा देने या सब कुछ खत्म होने के बाद पैदा होता है। हृदय को भेद देने वाला.........! वे जानते थे, उसको रूलाने में बच्चों की शैतानियां ही नहीं उसका अपना जीवन भी सम्मिलित है।
शुरू-शुरू में तो वे उसका रूदन सुन कर घबरा जाते थे। बगैर देर किए उसके रोने को उसके पीडि़त होने का सबूत मान लेते थे और उसके द्वारा दोषी  कहे गए बच्चे को सजा मुकर्रर कर दिया करते थे। पढ़ाने के बीच में भी वह कोई समस्या ले कर आता तो उसको सुलझाने में लग जाते थे। पर जब उसकी समस्याएं खत्म होने के बजाए तेजी से बढ़ने लगी तो उनका माथा ठनका।

‘जरा अपनी काॅपियां लाकर दिखा तो.........देखते हैं...........तू रोने और शिकायत करने के अलावा भी कुछ करता है कि नहीं !’ एक दिन उन्होंने उससे कहा।




कॉपी देखी तो उन्होंने अपना सिर पकड़ लिया। अब तक कितना सारा काम करवा दिया गया था जबकि उसने शुरू के कुछ पेजों में दो-तीन लाइनों में किसी अज्ञात लिपि में कुछ लिखने भर की कोशिश की थी.........कुछ में चित्र बनाने की कोशिश की गयी थी.......फिर यह सब भी छोड़ दिया था।
   
    कभी उन्होंने भी ऐसे ही एक सरकारी स्कूल में पढ़ा था। तब स्थिति दूसरी थी। पढ़ाई के लिए ले-देकर सरकारी तथा सहायता प्राप्त स्कूल ही होते थे। मध्य वर्ग के अधिकांश बच्चे इन्हीं स्कूलों में पढ़ते थे। पब्लिक स्कूल तब समाज के सर्वोच्च तबकों के लिए थे। बीच के पन्द्रह-बीस वर्षों में अचानक पूरी तस्वीर बदल गयी। अब हर आदमी की हैसियत का स्कूल मौजूद है। जैसे शिक्षा न होकर दुकानदारी हो गई। हिन्दी माध्यम के स्कूल पिछड़ेपन की निशानी बन गए। हर वह आदमी जो पैसा खर्च कर सकता है, अपने बच्चों को पब्लिक स्कूलों में डाल देता है। और वह क्यों न ऐसा करे ? शासक वर्ग भी तो अब तक यही करता आया है ! आम आदमी इतना बेवकूफ थोड़ा है कि उसकी चालाकियों को न समझ सके।



‘यह भेड़ चाल हम सब को, कहां लेकर जाएगी, इसका किसी को अंदाज भी है ? जो काम अंग्रेज नहीं कर सके अब उसे खुद हम से करवाया जा रहा है।’ वे प्रायः सोचते थे। उन्हें इन हालातों से निराशा होती थी। वे सोचते थे, अगर समाज के सभी वर्गों के बच्चे एक साथ पढ़ते तो न सिर्फ परस्पर सीखने-सिखाने में प्रेरणा मिलती, बल्कि समाज में सामाजिक सद्भाव, समरसता तथा संवेदनशीलता उत्पन्न होती। विद्यालय लोकतंत्र का निर्माण करने में सहायक होते। अगर ऐसी ही बंटी हुई शिक्षा देनी थी, ऐसा ही भेदभाव से भरा समाज बनाना था तो आजादी और लोकतंत्र का क्या मतलब है ?

     औरों से क्या कहें, खुद उनके बच्चे पब्लिक स्कूल में पढ़ते हैं। उन्होंने खुद इस भेदभाव को तोड़ने की कोशिश की, पर कामयाब न हो सके। जब समाज में दो तरह की शिक्षा है तो उन्हें अपनी हैसियत वाली शिक्षा की ओर जाना ही होगा। रोज दो घंटा उनकी श्रीमती बच्चों की पढ़ाई को देती हैं। हालत यह है कि स्कूल डायरी में लिखे एक-एक निर्देश का पालन होता है। उनका बच्चा अभी पहली में पढ़ता है, लेकिन दोनों भाषाएं लिखने और पढ़ने लगा है। हिन्दी में लिखे को हल्का-फुल्का समझ जाया करता था, लेकिन अंग्रेजी में वह सारा काम रट कर चलाता था। उसे रटते हुए देख कर उन्हें भारी कष्ट होता था, मगर वे कुछ करने की स्थिति में नहीं थे। इधर अपने विद्यालय की हालत यह थी कि कक्षा छह में आने वाले कई बच्चों को वे उस एक में पढ़ने वाले बच्चे के बराबर लिखना-पढ़ना तक नहीं सीखा पा रहे थे।

    ‘शर्मा जी इस बार तो एक-दो नहीं पूरे छह बच्चे ऐसे हैं जिन्हें पढ़ना-लिखना तक नहीं आता !’ उन्होंने स्टाफ रूम में आ कर अपनी समस्या साथी शिक्षक के सामने रखी।
    ‘क्या बताएं........आपकी क्या सभी कक्षाओं में हैं ऐसे बच्चे...........मूड खराब हो जाता है..........दूसरे बच्चों को पढ़ाएं कि इन्हें क ख ग सिखाएं........अरे आप, इनके लिए कुछ करके देख लो..............इनके दिमाग में कुछ घुसता ही नहीं !’ वे जैसे फट पड़े।
    ‘अब मूड खराब करके तो होगा क्या........सवाल ये है........इन बच्चों को पढ़ाया कैसे जाए ?’ उन्होंने प्रश्न  किया।

    ‘ये तो साब, उन प्रायमरी वालों से पूछा जाना चाहिए, जिन्होंने पांच साल तक इन बच्चों के साथ जाने क्या किया ?’ उन्होंने पल्ला छाड़ने के अंदाज में कहा।


 
 ‘शर्मा जी, अगर हम अपना काम जिम्मेदारी से कर रहे हैं तो ऐसे कैसे हो सकता है कि उन लोगों ने अपना काम नहीं किया होगा ? बच्चों की पढ़ाई के लिए विद्यालय तथा शिक्षक के अलावा उसके मां-बाप और समाज की भी तो भूमिका होती है। अब पुराना समय तो है नहीं कि डंडे और भय के बल पर बच्चों को रटा दिया और हो गया आपका काम। रटाना ही होता तो यह काम वे भी करवा चुके होते............आए दिन ट्रेनिंगों में सिखाया जा रहा है कि बच्चों को बस्ते के बोझ, रटन्तु शिक्षा और भय मुक्त माहौल में शिक्षित करना है।’
    ‘इन लोगों ने नए-नए प्रयोग करके शिक्षा का भट्टा बैठा दिया है........बच्चों को पूरी छूट दे दी है.........हमको- आपको अब वो क्या समझते हैं.........कोई भय, कोई डर है उनके अंदर !’ वे आक्रोश में थे।
    ‘यही तो वास्तविक चुनौती है, अब शिक्षक को डराने-धमकाने के बजाय........अपने धैर्य, ज्ञान, कला और करूणा से विद्यार्थी को सीखने को प्रेरित करना है......वरना बच्चों की हंसी का पात्र बनेगा.........इसमें गलत क्या है.....?’
    ‘तो तैयार हो जाईए.......फिर से आ गई दस दिन की ट्रेनिंग.........आप यहां सोच रहो हो बच्चों को कैसे पढ़ाऊं..........उनका आदेश  है पढ़ाना-लिखाना छोड़कर ट्रेनिंग करो !’ वे हंसते हुए बोले।
    ‘मगर ट्रेनिंग को तो गर्मिंयों की छुट्टी में करवाने की बात हुई थी..........सत्र के बीच में करवाने से पढ़ाई का नुकसान होता है। बदले में उपार्जित अवकाश देने की बात तय हुई थी।’ उन्होंने अधीरता से कहा था।
    ‘सरकार उपार्जित अवकाश नहीं देना चाहती। वह इस वित्तीय बोझ को झेलने को तैयार नहीं है।’
    ‘अफसोस तो ये ही है कि सरकार के लिए शिक्षा देना तक बोझ है। शिक्षा को वह लाभ-हानि के तराजू पर तोलती है। मगर हथियारों के लिए उसका खजाना खुला हुआ है !’ वे खिन्न हो गये थे।

    लेकिन वे छह बच्चे जिन्हें अभी तक पढ़ना-लिखना नहीं आ रहा था, हर वक्त उनके दिमाग में घूमते हुए, उन्हें परेशान किए हुए थे। वे दूसरे लोगों की तरह डाक्टर,  इंजीनियर न बन सकने के बाद मजबूरी में शिक्षक नहीं बने थे। उनका पहला और आखिरी सपना शिक्षक होना ही था। बच्चों के बीच होना और पढ़ाना, उनके लिए काम के बजाय जीवन जीने के जैसा था। वे उनसे बातें करते। उन्हें हंसाते। जब बच्चे लय में होते तो पढ़ाई की ओर लौट आते थे। बच्चे खुशी-खुशी पढ़ भी लेते और सब काम कर के ले आते थे। पर कुछ चीजें मायूस किए रहती थी। वहां आने वाले बच्चों के साथ जुड़ने वाली आगे की दो कडि़यां गायब थी। बच्चे स्कूल से निकल कर गंदगी और अभाव के ढेरों, गालियों वाली गलियों, शराब के चौराहों, लालच की दुकानों और झगड़े के खेतों के बीच से होते हुए घर पहुंचते तो कोई उनसे पूछने वाला नहीं होता कि स्कूल में क्या पढ़ा ? कल के लिए कौन सी किताब बस्ते में रखनी है ? कौन सी कॉपी में काम कर के ले जाना है ? उल्टे वही गंदगी, अभाव, झगड़े और गालियां, उनके पीछे-पीछे घर में भी पहुंच जाते। अगले दिन सुबह बाप ने काम में साथ चलने को कहा तो ठीक वरना बुझे-बुझे, बास मारते कपड़ों के साथ कक्षा में  पहुँच जाते। रास्ते में ज्यों-ज्यों साथ के लड़के मिलते जाते........घर पीछे छूटता चला जाता...........सब कुछ भूलकर........मस्त होते जाते। नरेन्द्र सर बच्चों के साथ एक शानदार संवाद की उम्मीद के साथ कक्षा में आते  मगर काफी समय उनका मुंह-हाथ धुलवाने, कपड़ों को ठीक करवाने, डेस्क के नीचे जमा गंदगी को साफ करने में बीत जाता। यह सब कर के अभी पाठ को पढ़ने से पहले उसकी चर्चा कर रहे होते कि घंटी बज जाती।
    अपने विचार मंथन से निकल कर उस दिन वे एक-दूसरे के साथ बातों में मशगूल बच्चों की ओर देखने लगे थे।

    ‘तुम में से कुछ बच्चों को अभी तक ठीक से लिखना तक नहीं आता, वह भी उस भाषा  में जो तुम आराम से बोलते हो। इसी तरह बार-बार अभ्यास करवाने के बावजूद कुछ बच्चों को अभी तक अंग्रेजी में दिनों और महीनों के नाम तक लिखने नहीं आ पा रहे हैं ! क्या प्रायमरी में तुम्हारी मैडम ने तुम लोगों को कुछ नहीं सिखाया ?’ उन्होंने बच्चों से पूछा।
    ‘सिखाया सर, मैडम काफी मेहनत करती थी। ये लोग भाग जाया करते थे। मैडम का दिया काम कर के नहीं लाते थे।’ हमेशा  की तरह समीर ने उन लड़कों की ओर इशारा करते हुए बताया।




 मासिक परीक्षाओं से पहले वे काफी उत्साह के साथ अपना कोर्स पढ़ाने में लगे हुए थे। अब यह सोच कर कि कक्षा के कुछ बच्चों के लिए इस पढ़ाई का कोई मतलब नहीं है, उन्हें काफी अजीब लग रहा था। फिर उन्होंने तय किया कि इस विषय में ज्यादा सोच-विचार करने के बजाय कुछ करना आरंभ कर दिया जाना चाहिए। आगे का रास्ता खुद ही निकलता चला जाएगा। उन सब से एक अतिरिक्त कॉपी  लाने को कह कर, उन्होंने अगले ही दिन से उन्हें अक्षर, शब्द तथा वर्तनी को सिखाने का काम शुरू कर दिया।

    जब तक अलग से व्यवस्था नहीं होती वे बच्चों के लिए अलग-अलग पाठ-योजना बना कर कक्षा में जाते। उन्होंने पान सिंह सहित पीछे की कतार के लड़कों को कक्षा के अपेक्षाकृत बेहतर बच्चों के साथ बैठा दिया था, तथा उनकी सहायता और निगरानी का काम भी उन्हीं लड़कों को सौंप दिया था। वे लगातार उनकी काॅपियों  पर नजर रख रहे थे। परिणामस्वरूप कुछ दिनों से स्कूल आ रहे पान सिंह ने स्कूल आना छोड़ दिया। लड़कों ने पूछने पर बताया, वह घर से स्कूल तो आता है, लेकिन बीच से गायब हो जाता है। बड़े लड़कों के साथ घूमता है, बीड़ी पीता है और ताश खेलता है। उन्हें तुरंत एहसास हो गया कि गलती पान सिंह की नहीं, उनकी है। उन्हें उसे पांच साल का छूटा हुआ कुछ ही दिनों में सिखाने की कोशिश  नहीं करनी चाहिए थी।

उस दिन उन्होंने पूरी कक्षा के बच्चों की कापियों को साथ-साथ देखने और उनसे उनकी प्रगति पर बातचीत करने की योजना बनाई थी। लेकिन सुबह-सुबह प्रार्थना के समय ही मंडल स्तर के एक अधिकारी अपने लाव-लश्कर के साथ विद्यालय में आ गए और शिक्षकों की कतार में हाथ बांध कर खड़े हो गए। एक-एक कर प्रार्थना, शपथ तथा राष्ट्रगान आदि सब निपट गया। प्रधानाचार्य उनके आगे नतमस्तक थे। मानो पूछ रहे हों, ‘सर आगे क्या आदेश है?’

    अधिकारी महोदय ने न सिर्फ मंच संभाल लिया, बल्कि विद्यालय की कमान भी अपने हाथों में ले ली थी। बच्चों से बोले, ‘वे उनके सामने कुछ बातें रखना चाहते हैं, क्या वे उन्हें सुनना चाहेंगे ?’ बच्चों ने जोर से ‘यस सर’ कहा। इससे खुश हो कर उन्होंने बच्चों से पूछा कि वे कितनी देर तक उन्हें सुन सकते हैं, आधा घंटा या एक घंटा ! बच्चों को उनकी यह बात कुछ समझ में नहीं आयी। वे उजबक की तरह उनकी ओर देखते रह गए।

    नरेन्द्र सर को झुंझलाहट हो रही थी। उन्हें लग रहा था, अधिकारी महोदय को शिक्षकों से भी पूछना चाहिए था, कि क्या वे बच्चों को संबोधित कर सकते हैं, आज उनकी कोई खास योजना तो नहीं है जो इससे प्रभावित हो सकती है ! लेकिन जिस तरह से वे प्रधानाचार्य तथा शिक्षकों को तवज्जो दिए बगैर अपना काम करते जा रहे थे, उससे लग रहा था, वे प्रधानाचार्य तथा शिक्षकों को इस लायक ही नहीं समझते कि उनसे कुछ पूछा जाए।



    अधिकारी महोदय ने कुछ विदेशी  तथा भारतीय  राष्ट्रपतियों की जीवन गाथा बच्चों को सुनायी। उन्हें बताया कि कैसे अथक परिश्रम करने तथा मन में ठान लेने की वजह से गरीब घर में पैदा होते हुए भी एक दिन वे उस सर्वोच्च पद पर पहुंच गए। तरक्की करने तथा आगे बढ़ने में न तो गरीबी और न साधारण स्कूलों की पढ़ाई उनके मार्ग की बाधा बनी। आप सब भी एक दिन बड़े आदमी बन सकते हो, जरूरत है जुट जाने की। मेहनत करने की। भाषण के दौरान वे अपने हाव-भावों तथा मंच से ही मातहतों को अपने आदेषों के जरिए बच्चों को यह भी संकेत दे रहे थे कि वे जिन बड़े आदमियों का जिक्र कर रहे हैं, वे भी उन्हीं  में से एक हैं।
    अपना भाषण समाप्त कर वे प्रधानाचार्य से बोले, ‘देखिये, बोर्ड परीक्षाओं में अधिकांश  बच्चे गणित, विज्ञान, अंग्रेजी जैसे विषयों में फेल होते हैं..........इन पर पूरा ध्यान दीजिए !’
    प्रधानाचार्य ने खिलौने की तरह हर बार हिलने वाले अपने सिर को फिर से हिला दिया।
    बड़े साहब आफिस की ओर को चले गये।

    नरेन्द्र सर के भीतर कुछ कुलबुलाने लगा था। वे सोचेन लगे, आखिरकार शिक्षा का उद्देष्य बच्चों को किस तरह का ‘बड़ा’ आदमी बनाना है ? क्या आदमी बड़ा तभी होता है जब वह बड़े पद और हैसियत को प्राप्त कर लेता है ? क्या बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए गणित, विज्ञान और अंग्रेजी पर ही जोर दिया जाना चाहिए ? क्या शारीरिक शिक्षा, कला, संगीत तथा भाषा-साहित्य विद्यालयों के मूलभूत विषय नहीं हैं ?

जिन लोगों के ऊपर शिक्षा को संवारने का दायित्व है, अगर उन्हीं की उस के बारे में  भ्रान्तिपूर्ण समझ होगी तो शिक्षा का क्या हश्र होगा ? विद्यालय में षिक्षकों के पांच पद वर्शों से रिक्त हैं। उनकी व्यवस्था कौन करवायेगा ? ध्वस्त होने के कगार पर पहुंच चुके स्कूल भवन के जीर्णोद्धार की चिन्ता कौन करेगा ? सर्व शिक्षा अभियान, माध्यमिक शिक्षा अभियान, एनएसएस, एनसीसी, चुनाव प्रक्रिया, पल्स पोलियो की रैलियों और राज्य तथा केन्द्र सरकारों के आकस्मिक कार्यक्रमों के बीच शिक्षण का कार्य कब और कैसे होगा ? विद्यार्थियों तथा शिक्षकों की समस्याओं पर चर्चा कौन करेगा ? यह सब करने के बजाय वे बच्चों को क्या सिखाना चाह रहे थे ?

नरेन्द्र सर ने तय किया कि जब वे कक्षाओं की ओर आएंगे तो उनसे जरूर पूछेंगे कि आजादी की लड़ाई में कई अनाम लोगों ने देश  के लिए अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया ! कोई उनका नाम तक नहीं जानता ! कई लोग बड़े कार्यों में संलग्न होते हैं, लेकिन सफल नहीं हो पाते, ऐसे लोगों को वे क्या मानेंगे ? कई लोग आज भी विज्ञापन और प्रदर्शन के बगैर लोगों के जीवन की बेहतरी के लिए कार्य कर रहे हैं। क्या उनका जीवन असफल माना जाएगा ?



    वे अभी बच्चों की उपस्थिति ले कर लौटे ही थे कि पता चला अधिकारी महोदय आफिस के सामने की कक्षाओं की ओर एक चक्कर मार कर चलते बने। क्या उन्हें शिक्षकों से मिलना नहीं चाहिए था ? मगर ये लोग अब असुविधाजनक स्थितियों में नहीं पड़ना चाहते। अगर वे शिक्षकों के बीच जाते तो वे अपने पेशे और विभाग की निजी समस्याओं को उनके सामने रखते........जिसका उनके पास कोई जवाब नहीं होता। इससे अच्छा तो यही है कि निकल लो चुपचाप पतली गली से.......हो गया निरीक्षण!

यह सब भूलकर नरेन्द्र सर ने अभी कक्षा में जाकर चार बच्चों की कापियां भी अच्छे से नहीं देखी थी कि पीरियड खत्म हो गया। उनका सिर चकरा गया। अभी तो घंटी बजी ही थी।
प्रधानाचार्य बोले ‘आज पढ़ाई ऐसे ही होगी.......साहब पीरियड छोटे करने को कह गये हैं..........साहब का कोई भरोसा नहीं......कई बार लौट कर देखने भी आ जाते हैं......!’

    बच्चों के और मूल्यांकन के बाद नरेन्द्र सर को उन छह के अलावा पांच और ऐसे बच्चे मिल चुके थे, जिन पर अलग से ध्यान देने की जरूरत थी। उन्होंने सोचा हो सकता है, वरिष्ठ तथा अनुभवी होने के नाते प्रधानाचार्य के पास कोई बेहतर समाधान हो, कोई सही राय दे दें ! उन्होंने समस्या बता कर उनका निर्देशन चाहा।
    ‘देखिए नरेन्द्र जी, सरकार ने कक्षा एक से पांच तक किसी को फेल न करने का आदेश  दे दिया है। ऐसे में अच्छे बच्चों के साथ बहुत सा कूड़ा-करकट तो आएगा ही। हमारे जमाने में ऐसी समस्या नहीं थी। छंटाई नीचे से ही शुरू हो जाती थी। आगे की कक्षाओं में अच्छे बच्चे ही आ पाते थे।’

    ‘ये काम तो प्राइवेट स्कूल वाले आज भी कर रहे हैं। प्रवेश  परीक्षा और दूसरे तरीकों से समाज के क्रीम बच्चों को अपने वहां ले लेते हैं, फिर हमारे अधिकारी, सरकार और मीडिया उनके साथ हमारी तुलना करने लगता है।’  नरेन्द्र सर ने कहा।
    ‘देखो भाई, कुछ समय और धैर्य बना लो ! सुनने में आ रहा है, अब आठ तक किसी को फेल नहीं किया जाएगा। कोशिश  करते रहो ! ध्यान रखना, ज्यादा बच्चे फेल नहीं होने चाहिए ! वरना हम लोगों पर सवाल उठने लगेंगे ?’

    ‘सर आप जानते हैं, कापी में कुछ न लिखने वाले बच्चे को आगे बढ़ाना मैं उसके साथ अन्याय समझता हूं। पिछली बार पच्चीस प्रतिशत लड़के फेल हो गए थे। आपने कईयों को पास कर देने को कहा। इस बार जो हालत है उसमें तो तीस से चालीस फीसदी बच्चे यहीं रूक जायेंगे। इसके लिए क्यों न अभी से कुछ कर लिया जाए !’

    ‘मुझे बताइये क्या कर सकते हैं आप ! अपना कोर्स पढ़ायेंगे.....या उन्हें अ आ क ख ग सिखायेंगे ! अभिभावकों से कहिए, वे अपने बच्चों की पढ़ाई-लिखाई में ध्यान दें। अपने साथियों से बात कीजिए, उनसे पूछिए वे क्या करते हैं ? परेशान मत होइये। पढ़ाई से ज्यादा सरकार को उनके भोजन और वजीफे की चिन्ता है। आप के पास मध्याह्न भोजन की जिम्मेदारी है, इस बात का ध्यान रखिए कि बच्चों को खाना समय से मिल जाए।’




    ‘लेकिन सर मेरा पहला काम पढ़ाना है। रोज मेरे तीन-चार पीरियड सब्जी, दाल-मसाले की व्यवस्था देखने में लग जाते हैं। शिक्षकों को इस काम में नहीं उलझाया जाना चाहिए ! मुझे भाषा जैसा बुनियादी विषय पढ़ाना होता है। अगर इतना समय बच जाए तो मैं इन बच्चों को और अधिक समय दे पाऊंगा !’

    ‘नरेन्द्रजी भाशा...... ? आप भी..........!’ प्रधानाचार्य हंसने लगे। ‘भाषा से क्या फर्क पड़ता है ? धीरे-धीरे सब सीख जाते हैं। हां, अंग्रेजी में कोई कसर मत छोडि़ए ! ज्यादातर बच्चे उसी में फेल होते हैं। आप चिन्ता मत किया करो। अपने साथियों से बात कर....उनके अनुभव का लाभ उठाइए !’ उन्होंने अपना निर्णय सुनाते हुए कहा।
    ‘अरे हां..........बीएलओ और जनगणना की ड्यूटी के लिए तहसीलदार साहब ने मेहनती शिक्षकों के नाम मांगे गये थे। मैंने आपका नाम भेज दिया है।’ उन्होंने उन्हें सूचना दी।
    ‘मगर मेरे पास तो पहले से ही कई काम हैं ! फिर पढ़ाई का क्या होगा.......बच्चों की विशेष कक्षाओं का क्या होगा ?’ नरेन्द्र सर ने परेशान मुद्रा में कहा।

    ‘अरे कौन सा कल से शुरू हो रहा है........जब होगा देखा जाएगा........सरकारी राज काज है.......आपको ड्यूटी करनी है.........चाहे यहां करो या कहीं और........आपका मीटर तो घूम ही रहा है !’ प्रधानाचार्य हंसते हुए बोले।
    ‘लेकिन.......हमारा काम तो विद्यालय में है..........केन्द्रीय विद्यालय, नवोदय विद्यालय और पब्लिक स्कूलों के शिक्षकों को तो इन कार्यों में नहीं लगाया जाता..........आखिरकार हमारे विद्यालयों के बारे में सरकार का नजरिया क्या है..........क्या ये विद्यालय शिक्षा का दिखावा करने को खोले गये हैं..........क्या षिक्षा पूर्ण कालिक कार्य नहीं है...........क्या सरकारी स्कूलों का शिक्षक बहुउद्देशीय कर्मचारी है ?’ वे तिलमिला गये थे।   
    नरेन्द्र सर और भी बहुत कुछ कहना चाह रहे थे। लेकिन वे जानते थे, प्रधानाचार्य के लिए उनकी बातों का कोई अर्थ नहीं है। गये तो थे, विद्यार्थियों की समस्या का जिक्र करने बदले में उन्होंने उनके सिर पर और भी नयी जिम्मेदारियां डाल दी।

साथ के अध्यापकों से इस समस्या पर चर्चा की। उपाध्याय जी कहने लगे ‘ये समस्या सभी के सामने आती है। लोग अपनी तरह से कोशिश भी करते हैं। लेकिन जब उस कोशिश का बच्चों की ओर से......उनके मां-बाप की ओर से जवाब नहीं आता है तो निराश हो जाते हैं। इस कोषिष में कई बार झुंझलाहट में उनका हाथ उठ जाता है.......बच्चे को गंभीर चोट लगने पर लेने के देने पड़ जाते हैं। आप ने देखा होगा ऐसे मामले अखबारों में किस तरह से आते हैं !’

    ‘कोई इस पर विचार नहीं करता कि शिक्षक अपना आपा क्यों खो बैठता है ? वह ऐसा करने को क्यों मजबूर हो जाता है ? उल्टे उसे खलनायक और अपराधी बना कर जनता के सामने खड़ा कर दिया जाता है। विश्लेषण करने वाले भी, संकट के मूल स्रोत को चिह्नित नहीं कर पाते !’ नरेन्द्र सर ने गंभीरता से कहा।
‘इसलिए अब लोग सिर-दर्द मोल लेने के बजाय चुपचाप अपना कोर्स पूरा करने में लगे रहते हैं !’
    ‘लेकिन ऐसा कोर्स पूरा करने का क्या फायदा जहां बच्चों को पढ़ना-लिखना ही नहीं आता !’ लम्बा निःश्वास छोड़ते हुए नरेन्द्र सर ने कहा।

    ‘बताइए और क्या किया जा सकता है ?’ उपाध्याय जी ने उत्सुकता से उनकी ओर देखते हुए कहा।
    ‘ऐसे बच्चों के लिए सरकार को अलग से पाठ्यक्रम बनाना चाहिए। नवोदय जैसे स्कूल हमारे वहां से होशियार बच्चों को चुनकर ले जाने के बजाय इन विशिष्ट  बच्चों को पढ़ाने के लिए होने चाहिए। वो तो कब होगा पता नहीं, लेकिन मैं सोच रहा हूं........इन बच्चों को अलग से पढ़ाऊं.......स्कूल के बाद !’

    ‘आप सोच तो ठीक रहे हो........ये बच्चे अतिरिक्त ध्यान देने की मांग करते हैं..........लेकिन क्या वे पढ़ने आएंगें......क्या उनके मां-बाप उन्हें पढ़ने भेजेंगे.........सबसे बड़ी बात आपकी इस भलमनसाहत को कहीं पैसा कमाने के रूप में तो नहीं देखा जाएगा ?’

    ‘जिसे जो समझना है समझे.........मुझे जो ठीक लग रहा है.......मैं तो वही करूंगा !’




    एक योजना बनाकर वे फिर से प्रधानाचार्य जी के पास पहुंच गए।
    ‘सर मुझे शाम के समय छह से सात बजे तक एक कक्षा कक्ष चाहिए, वहां में उन बच्चों को पढ़ाऊंगा, जिनके बारे में आप से बात हुई थी।’ उन्होंने बगैर कोई भूमिका बनाए प्रधानाचार्य से कहा।
    प्रधानाचार्य ने गौर से उनकी ओर देखा, फिर बोले-‘आप बच्चों से बात करिए..........उनके अभिभावकों से उनको भेजने को तैयार करिए..........हम बड़े बाबू से पूछते हैं कि आप को कमरा दिया जा सकता है कि नहीं !’

    नरेन्द्र सर की समझ में नहीं आया कि प्रधानाचार्य उनके ऊपर व्यंग्य कर रहे हैं या उनका हौंसला बढ़ा रहे हैं। कमरे के लिए बड़े बाबू से पूछने की बात उनकी समझ में नहीं आयी।
    ‘नरेन्द्र जी इतनी मेहनत आपने अपने लिए की होती तो आज आप कहीं पर डी.एम. या  एस.डी.एम. होते !’ उन्हें सोच में पड़ा हुआ देख कर प्रधानाचार्य ने कहा।

    ‘सर, मैं इस तरह से नहीं सोचता। मैं मानता हूं जो काम आदमी खुशी  से अपना समझ कर करता है, उसके लिए वही बड़ा काम है। मैं तो शिक्षक होने को ही अपने लिए उपलब्धि समझता रहा हूं। बच्चों से भी यही कहता हूं कि जो काम उन्हें सब से अच्छा लगता है, वही काम सब से महान और बड़ा है !’ उन्होंने विनम्रता से कहा।
    ‘आपकी उमर में हम भी बच्चों को पढ़ाने और सिखाने के लिए काफी चिन्तित रहते थे। एक उम्र होती है, जब बहुत कुछ करने का मन करता है। आप जैसे उत्साही लोगों को देख कर अच्छा लगता है !’ प्रधानाचार्य ने कहा।

  
उनके बार-बार बुलाने पर भी अधिकांश  बच्चों के माता-पिता स्कूल में नहीं आये। कारण वे जानते थे। वे सब दिहाड़ी में काम करने वाले मिस्त्री, कारपेंटर, मजदूर, ठेला लगाने वाले दुकानदार या छोटी-मोटी नौकरी करने वाले लोग थे। उनके लिए अपना काम छोड़ कर स्कूल आने का मतलब था, एक दिन की दिहाड़ी से हाथ धोना। जो आए थे, उनमें से एक को छोड़ कर बाकी  ने अपने बच्चों को पढ़ने के लिए भेजने से मना कर दिया था, उनका कहना था उस समय वे बच्चों को अपने साथ काम में लगाते हैं।

अब नरेन्द्र सर बाकी  बचे बच्चों के घर वालों से मिलने जा रहे थे। साथ के लिए उन्होंने कक्षा के दो लड़कों को बुला लिया था। दोनों लड़के उन्हें कस्बे के अंत में बस्ती और गांव को जाती सड़क के पास मिल गए थे। उन लोगों को देखते ही कुछ आवारा कुत्ते और कुछ नंग-धड़ंग बच्चे तेजी से उनकी ओर लपके। कुत्तों ने उन लोगों को सूंघना शुरू कर दिया, जबकि बच्चे उनके बारे में अनुमान लगाने लगे। बस्ती के अंदर कच्ची सड़क के दोनों ओर घरों के इर्द-गिर्द गंदगी बिखरी पड़ी थी। लोगों ने दरवाजे पर आ कर उनकी ओर झांकना शुरू कर दिया था।
‘हम क्या कर सकै हैं, साहब ! जे तो सरकार ने स्कूल खोल दियौ है इसलिए पढ़ने भेज देवे हैं.....वरना हमें तो दो समय की रोटी कमाणें के लिए औलाद चाहिए.........अभी से काम नहीं सीखेगा तो आगे जा कर क्या करेगा ?’
‘करना आप ने नहीं है.........मैं करूंगा.......शाम को चार से छह बजे तक इसको पढ़ाऊंगा......आप ने इसको  भिजवा भर देना है !’
‘पढ़ने-लिखने से कुछ न होवे है। आदमी निकम्मा हो जावे है। काम से जी चुराड़ लगे है। नौकरी का इंतजार करे है। किसी काम का न रह जावै है।’ उसने मुंह बिचकाते हुए कहा।
‘आप ठीक कह रहे हो। आज के बच्चे थोड़ा बहुत पढ़-लिखने के बाद काम करने में शर्म महसूस करने लगते हैं। उन्हें समझाने की जरूरत है कि काम करना शर्म का नहीं गर्व का विषय है। फिर पढ़ना नौकरी के लिए ही नहीं होता है। यह ज्ञान का युग है। मामूली से मामूली काम के लिए पढ़ा-लिखा होना जरूरी हो गया है। जो पढ़ा-लिखा होगा वो अच्छे से अपना काम कर सकेगा !’
वह अविश्वास से उनकी ओर देखता रह गया।

‘पण मास्टर साहब, अब तो तुम लोग भी अपने बच्चों को अपने स्कूलों में न पराण लाग र्यो हो....फेर हमारे बच्चों की एतनी चिन्ता काहे कर रहे हो ?’
‘हम भी पढ़ाते.......मंत्री, सांसद, डीएम, सब के बच्चे एक साथ पढ़ते.......आजाद देश में होना तो यही चाहिए था..........मगर ऐसा है नहीं..........फिलहाल तो जो है, उसी से काम चला लिया जाए !’
‘समझ गया मास्टर साहब, पण मैं आपको पढ़ाने की फीस नी दे पाऊंगा !’ उसने विचित्र नजरों से उनकी ओर देखते हुए कहा।
‘आप को कभी भी..........न तो इस बारे में सोचना है और न ही कुछ देना है............सरकार हमें देती है !’
आखिरकार इस पूरी मेहनत का परिणाम यह निकला कि नरेन्द्र सर को सात बच्चे पढ़ाने को मिले। प्रधानाचार्य  जी ने कमरे के बारे में कोई जवाब नहीं दिया था। वैसे भी अब बड़े कमरे की जरूरत नहीं थी। उन्होंने तय किया कि, इन बच्चों को वे अपने घर में ही पढ़ा लेंगे।
विचार से पत्नी को अवगत कराया तो वह नाराज हो गयी। ‘अपने बच्चों पर ध्यान देने के बजाय आप ये क्या आफत मोल ले रहे हो........स्कूल में पढ़ाते तो हो.......इतना समय अपने बच्चों को पढ़ा देते तो वे क्लास में और अच्छी पोजीशन में आ जाते !’

‘हमारे बच्चे पढ़ाई में ठीक हैं.....इन बच्चों को बुनियादी बातें भी नहीं आती। उन बच्चों की जिम्मेदारी भी हमारी ही है......उनके घरों में हमारी-तुम्हारी तरह कोई पढ़ा-लिखा नहीं है जो उन्हें पढ़ा सके।’
‘आपके अलावा और कौन-कौन है जो बच्चों को पढ़ा रहा है !’ पत्नी ने फिर से प्रश्न किया।
‘मुझे समझ में आ रहा है। मैं पढ़ा रहा हूं। औरों से क्या मतलब है ?’
‘आजकल सब अपने फायदे की जुगत में लगे रहते हैं। मैं किसी काम के लिए कहूंगी, तुरंत मना कर दोगे। आपके पास ऐसे कामों के लिए ही समय है ?’
‘तुम जो समझो !’ कहकर नरेन्द्र सर घूमने निकल गए। कहां तो उन्होंने सोचा था, यह काम करते हुए उन्हें अपने पेशे के प्रति सार्थकता का एहसास होगा। लोग सराहना करेंगे, पर यहां तो जिसे देखो वो टांग खिंचाई  में लगा है।




पान सिंह को स्कूल नहीं आते हुए एक महीना बीत चुका था। उन्होंने उसके घर कई जवाब भिजवाए, पर कोई नहीं आया। आखिरकार उन्हें मजबूर होकर उसका नाम काटना पड़ा। नाम कटने के एक हफ्ते बाद उसकी मां उस को अपने साथ ले कर आई।
‘इतने जवाब भिजवाने के बाद अब आने से क्या फायदा.....अब तो इसका नाम कट चुका है !’ उन्होंने नाराजगी से कहा।

‘क्या बताऊं मास्साब, ये बहुत बिगड़ चुका है। अपने से बड़े लड़कों से दोस्ती कर ली है। उनके साथ आवारा घूमता रहता है। कितना मार दिया, उल्टा तक लटका दिया, पर इस पर कोई असर नहीं पड़ता है !’ उसने कहा।
‘मारने से कुछ नहीं होता.......उससे तो ये और भी बिगड़ जाएगा ! इसके पिता जी कहां हैं ?’ उन्होंने पूछा।
‘दो साल पहले घर से चले गए थे तब से उनका कुछ पता नहीं है !’ उसकी आंखों में आंसू भर आए थे।
‘मैं समझ गया। ऐसे में आप इसको देखोगी या रोजी-रोटी की व्यवस्था करोगी !’

‘मास्साब, मुझे भी रोज काम नहीं मिल पाता। मेरी इच्छा तो थी ये भी कहीं काम में लग जाता तो......आसरा हो जाता..........आपकी कहीं जान-पहचान हो तो देखिएगा ?’
पान सिंह की मां की बात सुनकर चौंक गये थे नरेन्द्र सर !
‘इतनी उम्र में ये कहां काम करेगा........इसी वजह से तो सरकार वजीफा देती है........!’
‘सात-आठ सौ में क्या होता है मास्साब ?’
‘सरकार उसका खर्च उठा रही है.........पूरे घर का नहीं ! दिन का खाना........किताबें..........ताकि वह आगे जा कर अपने लिए और घर के लिए अच्छा कर सके ! अभी क्या होगा.......कहीं बर्तन मांजने में लग जायेगा..........जिन्दगी गर्क हो जाएगी ! ऐसा मत सोचो इसे स्कूल भेजो...........इसका जो भी खर्च होगा मैं देख लूंगा !’ 
‘ठीक है, मास्साब !’ आश्वस्त सी होते हुए उसकी मां ने कहा था।

फिर वे पान सिंह की ओर मुखातिब हुए थे। ‘कल से स्कूल आ जाना......तुझ से कॉपी  दिखाने के लिए नहीं कहूंगा.........सवाल भी नहीं पूछूंगा........तेरा मन हो तो खुद ही कॉपी दिखा देना...........खुद ही सवालों के उत्तर बता देना..........कोई तुझ को परेशान करेगा तो मुझे बताना ! तेरी मम्मी भी अब तुझे नहीं मारेगी........ठीक है...........अब आएगा ना स्कूल !’
‘जी आऊंगा !’ उसने कहा।



तब से पान सिंह रोज स्कूल आता है। अब वह उनके पास कोई शिकायत लेकर भी नहीं आता है। वह डेस्क में काॅपी-किताब रख कर उनके ऊपर झुका रहता है। अपने वादे के अनुसार उन्होंने कभी उस से न कुछ दिखाने को कहा और न कुछ पूछा। ‘स्कूल आता रहेगा तो लड़कों की संगत में कुछ न कुछ सीखता रहेगा। वे सोच रहे थे।

मगर यह बहुत दिनों तक नहीं चल सका।
पान सिंह ने फिर से स्कूल में आना बंद कर दिया। रोज सुबह नरेन्द्र सर जब बयालीस रोल नंबर पर पहुंचते तो उन्हें लगता अभी पान सिंह ‘यस सर’ कहकर अपनी सीट से उठता हुआ दिखायी देगा। लेकिन दिन बीतते चले गए और ऐसा पल कभी नहीं आया।
हर समय पान सिंह का जिक्र करने के कारण अब स्टाफ के कई लोग इस नाम से परिचित हो चुके थे।
साथी शिक्षक कई बार उनसे पूछ लेते थे- ‘और आपके पान सिंह की पढ़ाई कैसी चल रही है ?’
यह उन्हें उनका मजाक नहीं.........संवेदनशीलता लगती थी।
लेकिन शिक्षक ही नहीं अब तो कक्षा के बच्चे भी उन्हें पान सिंह की खबरें देने लगे थे।

‘सर, पान सिंह गुप्ता समोसे वाले के वहां काम करने लगा है ! कह रहा था.........अब स्कूल नहीं पढ़ेगा !’
‘देखो नरेन्द्र सर, ये हालत है, इन बच्चों की.........आपने कितना ध्यान रखा था उसका.......शायद फीस भी जमा की थी........मगर उसे तो नोट कमाने का चस्का लगा हुआ है.......पढ़ेगा कहां से !’
न जाने कितने लोगों ने कितनी बार उन्हें पान सिंह के गुप्ता समोसे वाले के वहां काम करने की बात बता दी थी। मगर वे प्रतिक्रिया में कुछ नहीं कहते थे।

दो महीनों तक उन्होंने उपस्थिति रजिस्टर में पान सिंह की जगह को बनाए रखा। अर्द्धवार्षिक परीक्षा के बाद उस जगह को बाद वाले रोल नंबर से भर दिया। अब पान सिंह ‘ड्राप आउट’ हो चुका था।
नरेन्द्र सर अब पहले से बदल गये थे। वे खिन्न से रहने लगे थे। किसी भी बात पर एकदम नाराज हो जाते थे और तपाक से उत्तर दे देते थे। यह सोचे बगैर कि इसका सामने वाले पर क्या असर पड़ेगा ! ऐसा नहीं है कि अपनी यह बेचैनी और खिन्नता खुद उन्हें नजर नहीं आ रही थी। मगर वे विवश थे।





उस दिन सुकून से बैठे प्रधानाचार्य जी ने उन्हें अपने पास बुलवाया।
‘आइए भाई, नरेन्द्र जी कैसे हैं ? क्या चल रहा है इन दिनों !’ उन्होंने मुस्कराते हुए उनकी ओर देखकर पूछा था।
नरेन्द्र सर को उनकी मुस्कान खुद को चिढ़ाती प्रतीत हुई थी।
‘जी, ठीक हूं !’
‘आपके पान सिंह का क्या हाल है ? सुना उसके लिए आप काफी चिन्तित रहते हैं !’
‘सर, मेरी चिन्ता से न तो उसके घर के हालात बदल सकते हैं और न उसकी पढ़ाई चल सकती है ! सुना, इन दिनों गुप्ता समोसे वाले के वहां काम कर रहा है !’

‘सरकार कुछ कर ले इन्होंने पढ़ना-लिखना थोड़ा है.........अच्छा, आप कुछ बच्चों को पढ़ाने की बात कर रहे थे ! क्या हुआ...........बच्चों के मां-बाप से बात हुई ?
‘बात हो गई है सर ! पढ़ाना भी शुरू कर दिया है !’
‘आप तो क्लास के लिए कह रहे थे !’
‘आपने कहा बड़े बाबू से पूछना पड़ेगा तो मैंने सोचा जब बच्चों को पढ़ाने के लिए बड़े बाबू से पूछना पड़ रहा है तो आपको कष्ट  देने के बजाय कोई और व्यवस्था क्यों न कर ली जाए !’ उन्होंने अपनी कड़ुवाहट को उगल दिया था।

‘नरेन्द्र जी, आप नाराज हो गए !’
‘सर, मैं नाराज क्यों होने लगा !’
कितने बच्चे आने को तैयार हुए ?’
‘सात !’
‘सिर्फ सात.....आप तो कह रहे थे.....दस-बारह बच्चे हैं !’
‘जी हां.....बच्चे तो इतने ही थे.......लेकिन सर, विडंबना यह है कि बच्चों के हालात उन्हें पढ़ने नहीं देते........हमारे योजनाकार.........उनको हर हाल में पढ़ाना चाहते हैं। मगर उनके घरों के हालात नहीं बदलना चाहते। हम सब उनके लिए बनी हुई योजनाओं को लागू करने में लगे रहते हैं...........मुझे ऐसा लगने लगा है सर कि हम सब लोग शिक्षा के इस नाटक में अभिनय कर रहे हैं !’ नरेन्द्र सर ने कई दिनों से परेशान कर रही बातों को कह दिया था।
‘नरेन्द्र जी, अब आप सच्चाई को समझे..........हमेशा से ऐसा ही चलता रहा है.........आगे भी ऐसे ही चलता रहेगा..........! ’ प्रधानाचार्य जी दिव्य ज्ञान देने के अंदाज में बोले ।
‘नहीं सर, आगे भी ऐसा ही नहीं चलता रहना चाहिए !’ कह कर नरेन्द्र सर खड़े हो गए।
‘अरे बैठो भई, कहां की जल्दी में हो..............सब हो जाएगा !’ प्रधानाचार्य ने कहा।
‘सर, मध्याह्न भोजन का दायित्व मेरे पास ही है..................भोजन का समय हो रहा है। जरा नजर मार आऊं !’ कह कर नरेन्द्र सर चले गए और प्रधानाचार्य जी उनको जाते हुए देखते रह गए।






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(कहानी में प्रयुक्त सभी पेंटिंग्स गूगल से साभार ली गयी हैं.)

संपर्क-
दिनेश कर्नाटक
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गुरुवार, 21 फ़रवरी 2013

चंद्रेश्वर




30 मार्च 1960 को बिहार के बक्सर जनपद के एक गाँव आशा पड़री में जन्म।
पहला कविता संग्रह 'अब भी' सन् 2010 में प्रकाशित। एक पुस्तक 'भारत में जन नाट्य आन्दोलन' 1994 में प्रकाशित।
'इप्टा आन्दोलन : कुछ साक्षात्कार' नाम से एक मोनोग्राफ 'कथ्यरूप' की ओर से 1998 में प्रकाशित।
वर्तमान में बलरामपुर, उत्तर प्रदेश में एम.एल.के. पी.जी. कॉलेज में हिंदी के एसोसिएट प्रोफेसर।
चंद्रेश्वर पाण्डेय की कविता में एक गँवई मन दिखाई पड़ता है। ऐसा मन जो किसी वक्त दुश्मन पर भी यकीन कर लेना चाहता  है. यहाँ मुझे आस्ट्रियाई रचनाकार स्टीफ़न ज्विग की वह पंक्ति याद आ रही है जिसमें वे कहते हैं कि किसी भी प्रकार की शक्ति हिंसक होती है। यहाँ यह कवि भी कहता है कि 'चाहे जैसा भी हो/ लक्ष्य-भेद/ हिंसा तो होगी ही!' पहली बार पर हम चंद्रेश्वर की कुछ इसी तरह की कविताओं से रू-ब-रू होते हैं।

 



दुश्मनी में  प्यार


ऐसा तो आया नहीं कोई
मेरे जीवन में
अब तक
जो पिघला न हो
मेरे अनुनय-विनय
मेरी दुनियादारी से
थोड़ा भी


बिलकुल लौह कपाट की तरह
आपका ह्रदय 
सुना है प्यार 
छुपा रहता है
दुश्मनी में भी कभी  दुश्मन भी चाहते हैं
होना रू-ब-रू
आसपास होना


यकीन.... ....
सच में 
यकीन कर लेने का चाहता  है
जी 
किसी वक्त दुश्मन पर भी  


पर, आप तो एकदम ठोस
ठस्स एकदम


थोड़ा भी!
पता नहीं, कितनी ऊर्जा 
कितना ताप चाहिए 
कि पिघल सकें आप
थोड़ा भी!



हिंसा  

अर्जुन की निगाह  थी टिकी
मछली की आँख पर
था जिसे भेदना उसे
दिखाना था करतब
पुरुषार्थ का  

चाहे जैसा भी हो
लक्ष्य-भेद
हिंसा तो होगी ही!



पहलवान चाचा

कौन नहीं जानता गाँव-जवार में
नासिर मियाँ को
मशहूर जो पहलवान चाचा के नाम से
हैं अस्सी-पिचासी के
दिखती उनकी मांसपेशियाँ  कसी-कसी
उनका कद दरमियाना है
उनकी 'सहज विलंबित मंथर गति' के तो
कहने ही क्या
उन्होंने सीखे नहीं सिर्फ दाँव-पेंच
पहलवानी के ही
उनके पास हुनर कई एक से बढ़ कर एक
वे पलक झपकते बैठा देते
कैसी भी मोच खायी हड्डियाँ
सही कर देते कोई दबी  नस
हँसा देते रोते आदमी को
मर्सिया के साथ गाते सोहर भी
मुहर्रम में 'बाना-बनैठी' 'गदका' खेलते
तो बनते दशहरे की रामलीला में
हनुमान भी
देने पर इनाम किसी काम के बदले
कहते इतना भर की 'मना  किया है
कुच्छो लेने से मेरे उस्ताद ने!' 

आज पहलवान चाचा जान  पड़ते पात्र
किसी काल्पनिक दुनिया के
जाने किस मिट्टी या धातु के बने हैं
जो टस से मस नहीं होते
मेरे वक्त में
अपने वक्त में
नेक इरादे से!

 
साथी कमला प्रसाद  

साथी कमला प्रसाद से मिला था
मैं भी
दो-चार बार  

उनके मिलने-जुलने
बात करने के
याराना ढब में ही
था वो जादू
कि जादू विचार की गर्माहट का
कि हम बन जाते थे
उनके करीबी!



थोड़ी-सी जगह  

रेल की इस जनरल बोगी में चाहिए मुझे
थोड़ी-सी जगह
जहाँ रोप सकूँ मैं
अपने पैर  

किस कदर भरी है बोगी
ठसाठस
खिड़कियाँ तक ढँकी हैं
भीड़ से  

कहीं कोई सुराख़  नहीं
कि आ सके इसमें
ताज़ा हवा
मौसम भी उमस भरा
चिपचिपा
कोई गुंजाइश नहीं
जरा भी
कोन चाहेगा होना बेदखल
अपनी जगह से
ऐसे में हो रहा दूभर
साँस लेना  

अब मैं एकदम नाउम्मीद
कि पाना जगह बोगी में
थोड़ी-सी भी
नामुनकिन  

यूँ ही काटना होगा सफ़र
किसी तरह टिकाये पैर
उँगलियों पर...
कि  खिड़की के पास
सीट पर बैठा आदमी सिकुड़ते  हुए
तनिक बनाता है मेरे लिए
थोड़ी-सी जगह !




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