संजीव कुमार

वरिष्‍ठ कथाकार शेखर जोशी के जन्‍मदिन (10 सितम्‍बर) पर उनके रचनाकर्म पर युवा आलोचक संजीव कुमार का आलेख-



संजीव कुमार




शेखर जोशी : दबे पाँव चलती कहानियाँ







बीती सदी का छठा दशक हिन्‍दी कहानी के अत्यंत ऊर्वर दौर के रूप में आज भी याद किया जाता है। अगर हिन्‍दी के दो दर्जन प्रतिनिधि कहानीकारों की फ़ेहरिस्त बनाई जाए तो उसमें एक तिहाई से ज़्यादा नाम वही होंगे जिनकी ताज़गी-भरी रचना-दृष्टि ने पचास के दशक में कहानी की विधा को साहित्य की परिधि से उठा कर केन्‍द्र में प्रतिष्ठित कर दिया। उस उभार को अविलम्ब ‘नई कहानी’ की संज्ञा के साथ एक आंदोलन का दरजा हासिल हो गया था।



शेखर जोशी उसी उभार के एक सशक्त प्रतिनिधि हैं। उनका शुमार ‘नई कहानी’ में सामाजिक सरोकारों का प्रतिबद्ध स्वर जोड़नेवाले कहानीकारों में होता है। ‘दाज्यू’, ‘कोसी का घटवार’, ‘बदबू’, ‘मेंटल’ जैसी उनकी कहानियों ने न सिर्फ़ उनके मुरीदों और प्रशंसकों की एक बड़ी जमात तैयार की है, बल्कि ‘नई कहानी’ की पहचान को भी अपने तरीके से प्रभावित किया है। पहाड़ी इलाक़ों की ग़रीबी और कठिन जीवन-संघर्ष; उत्पीड़न, यातना, प्रतिरोध, उम्मीद और नाउम्मीदी से भरे औद्योगिक मज़दूर वर्ग के हालात; शहरी-क़स्बाई निम्न और मध्यम मध्यवर्ग के आर्थिक-सामाजिक-नैतिक संकट; धर्म और जाति से जुड़ी घातक रूढि़याँ; दैनन्दिन स्थितियों का वर्गीय चरित्र- ये सभी उनकी कहानियों का विषय बनते रहे हैं। ‘मूड’ को आधार बनाने की बजाय घटनाओं और ठोस ब्यौरों में किस्सा कहनेवाले शेखर जोशी ने इन सभी विषयों को लेकर ऐसी कहानियां लिखी हैं, जो एक ओर विचार-केंद्रित कृत्रिम गढ़ंत से मुक्त हैं, तो दूसरी ओर ‘अनुभव की प्रामाणिकता’ और ‘भोगा हुआ यथार्थ’ के संकरे आशय से भी। इस लिहाज़ से वह अमरकान्‍त और भीष्‍म साहनी की तरह घातक अतियों से कहानी का बचाव करनेवाले रचनाकार हैं।



शेखर हिंदी के सबसे मितभाषी कथाकारों में से हैं। मितभाषी सिर्फ़ इस अर्थ में नहीं कि उन्होंने कम लिखा है, बल्कि इस अर्थ में भी, और यहाँ तो ज़्यादा इसी अर्थ में, कि वह वाचक के रूप में अपनी कहानियों के भीतर और कहानीकार के रूप में कहानियों के बाहर भी अधिक नहीं बोलते। यह संकोच उनके व्यक्तित्व और कृतित्व की पहचान का बहुत महत्वपूर्ण घटक है… और एक अलग बिन्‍दु से देखें तो उनकी विशिष्‍ट पहचान बनने के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा भी। अगर मधुरेश जैसे वरिष्‍ठ कथा-आलोचक को ‘उनके कृतित्व में किसी किस्म की रचनात्मक छलांग का अभाव’ दिखलाई पड़ता है और ऐसा लगता है कि ‘उनके आगे न तो रचनात्मक स्तर पर ही कभी कोई बड़ी चुनौतियां रहीं और न ही अपने सारे वैचारिक आग्रहों के बावजूद संघर्ष और विचार के ऐसे सतेज और प्रखर मुद्दे रहे जो रचनात्मकता में एक अनोखी चमक पैदा करते हैं’(नयी कहानी: पुनर्विचार, प्रथम संस्करण: 1999, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नयी दिल्ली, पृष्‍ठ 178), तो इसका एक बड़ा कारण शेखर जोशी का कम बोलनेवाला और दावेदारी के स्तर पर एक तरह का दब्बूपन बरतनेवाला कथाकार व्यक्तित्व है- ऐसा कथाकार व्यक्तित्व, जो अपने अदृष्य रहने को ही सबसे बड़ा मूल्य मानता है और इसके लिए जो कुछ ज़रूरी जान पड़े, करता है। मसलन- जिन स्थलों पर सामान्यतः दूसरे लेखकों को ज़्यादा शब्दों और/या ब्यौरों और/या इशारों और/या बलाघात की ज़रूरत महसूस होती है, वहाँ से बगैर किसी विशेष ताम-झाम के गुज़र जाना; कथा-स्थितियों के अर्थगर्भत्व और समृद्धि को समझने/सराहने के लिए पाठक को कोई ‘सर्फेस टेंशन’, ‘धक्का’ या ‘सुराग’ न देना; वाचक की मुद्रा में एक सादगी और साधारणता को बजि़द बनाए रखना इत्यादि। ऐसे में ‘बदबू’, ‘मेंटल’, ‘बच्चे का सपना’, ‘नौरंगी बीमार है’, ‘समर्पण’, ‘निर्णायक’, ‘गलता लोहा’, ‘हलवाहा’ जैसी कहानियों के होते हुए भी किसी को ‘रचनात्मकता में एक अनोखी चमक पैदा’ करनेवाले ‘संघर्ष और विचार के सतेज और प्रखर मुद्दों’ का अभाव उनमें दिखलाई दे तो क्या हैरत! मधुरेश लिखते हैं, ‘. . . ‘कोसी का घटवार’ जैसी कहानियाँ शेखर जोशी के यहाँ अपवाद जैसी हैं। अपनी रचना-वस्तु के चुनाव की दृष्टि से भी और उससे भी अधिक उसके कलात्मक निर्वाह की दृष्टि से।’ (वही, पृष्‍ठ 178) बात बिल्कुल सही है, पर वह सही होने के साथ-साथ मुकम्मल तब होगी, जब उसमें यह जोड़ दिया जाए कि इसी कलात्मक निर्वाह के चलते किसी गहरी अंतर्दृष्टि के बगैर भी ‘कोसी का घटवार’ कालजयी रचना बन गई, जबकि शेखर जी की अनेक अंतर्दृष्‍टि‍संपन्न कहानियाँ शायद इसीलिए ज़्यादा समय चर्चा में नहीं रह पाईं कि उनका निर्वाह प्रकटतः कलात्मक नहीं था और न ही उनकी प्रस्तुति की मुद्रा में कोई गहरी बात कहने की दावेदारी थी। ये कम बोलने और आहिस्ता बोलनेवाली कहानियाँ हैं- ऐसी कहानियाँ जो अपने पाठक का सम्मान करती हैं, ज़्यादा समझा कर उसकी समझ एवं संवेदनशीलता के प्रति अविश्‍वास प्रकट नहीं करतीं, साथ ही, ‘दिखनेवाली’ कलात्मकता से अछूती हैं, जो कि अंतर्वस्तु की गुणवत्ता के प्रति लेखक के पुख़्ता आत्मविश्‍वास का सूचक है।



शेखर जोशी की कई कहानियों को पीछे कही गई बातों के उदाहरण की तरह पढ़ा जा सकता है। फिलहाल, ‘समर्पण’ को लें। यहाँ लेखक ने प्रतीक-केंद्रित सामाजिक संघर्ष की गतिकी को जिस तरह से चिन्हित किया है, वह असाधारण है। यज्ञोपवीत-धारण के लिए चलनेवाले अभियान की पूरी प्रक्रिया, उसकी शक्तियाँ और सीमाएँ तथा विचारधारात्मक वर्चस्व की टिकाऊ बनावट- इन सबको एक कहानी में समेटना कोई साधारण बात नहीं ! पर शेखर जोशी का यह ‘समेटना’ इतना आयासहीन है कि कहानी की असाधारणता उसमें छुप-सी जाती है और उसे इकहरे तरीके से पढ़ना सिर्फ़ इसलिए मुमकिन हो जाता है कि लेखक की कथन-भंगी उस इकहरे पठन को कहीं से हतोत्साहित नहीं करती। इसीलिए मधुरेश को यह कहानी ‘शि‍ल्पकारों की जागृत चेतना’ की ऐसी कहानी प्रतीत होती है, जिसमें ‘दीवान वंश के वर्तमान उत्तराधिकारियों के आतंक और पेट की ज्वाला’ से भी नष्‍ट न हो पाने वाली उस चेतना को ‘‘वैद्य जी की बुद्धि का चमत्कार डाइनामाइट की तरह तहस-नहस कर देता है।’ कहानी का यह पठन इतना अधूरा है कि ग़लत है, बावजूद इसके कि वैद्य जी की बुद्धि के चमत्कार को आलोचक यह कह कर एक व्यापक संदर्भ देता है कि ‘वह सिर्फ़ वही करते हैं, जो इस धर्म प्रधान देश में सदियों से होता आया है।’ दरअसल, पूरी कहानी प्रतीक पर केंद्रित संघर्ष (नीची जातियों द्वारा जनेऊ-धारण) के उभार और उतार का बयान है और इस सिलसिले में वह प्रतीक-केंद्रित संघर्ष की शक्तियों को विलक्षण तरीके से रेखांकित करने के साथ-साथ उसकी भयावह सीमाओं को भी सामने लाती है। एक आदर्श संतुलन के साथ वह इस बात को चिन्हित करती है कि अगर सामाजिक प्रतीकों की लड़ाई ठोस उत्पादन-संबंधों से जुड़ी लड़ाई का हमक़दम या हिस्सा बन कर नहीं आती, तो अपनी पूरी नैतिक शक्ति के बावजूद वह कमोबेश ऐसे ही ट्रैजिक-कामिक अंत को प्राप्त होने के लिए अभिशप्त है। ‘सेवक जी की अमृतवाणी मन को संतोष दे गई थी, पर तन को संतोष नहीं दे पाई।’ और इसी चीज़ ने उस व्यापक जागृति की रीढ़ तोड़ कर रख दी, जिसे देख ‘पर-पौरुष पर निर्भर दीवान वंश के कीर्तिस्तंभ की नींव’ मालिक लोगों को हिलती प्रतीत होने लगी थी। कितनी बड़ी विडंबना है कि मालिक लोगों के बगैर कुछ किए उनकी यह ‘शंका धीरे-धीरे स्वतः ही निर्मूल सिद्ध होने लगी’; अंततः भेदभाव के जिस प्रतीक को अपने शरीर पर धारण कर शि‍ल्पकारों-हलवाहों ने उसका भेदभावमूलक प्रतीकार्थ नष्‍ट करना चाहा था, उसे अपने ही हाथों उतार फेंका।



निश्चित रूप से, अगर ‘समर्पण’ के लेखक की कथन-भंगी कहानी के इकहरे पठन को हतोत्साहित नहीं करती, तो यह उसकी कि़स्सागोई का एक दोष है, लेकिन साथ-ही-साथ यह आलोचकों के सराहना-सामर्थ्‍य पर भी एक सवालिया निशान है। क्या अंदाज़े-बयाँ की जटिलता ही कहानी के घटना-कार्य-व्यापार में निहित अर्थगत एवं यथार्थगत जटिलता के प्रति हमें सजग बना पाती है ? और क्या इसीलिए हम सरल व संकोची तरीके से कही गई गहरी बात की गहराई को अनदेखा कर जाते हैं ? क्या घटना-कार्य-व्यापार की योजना अपने-आप में अर्थ-निर्माण की यथेष्‍ट प्रक्रिया नहीं है, बल्कि लेखक की कथन-भंगी और उसके द्वारा उछाले गए सुराग (क्लूज़) ही उस योजना पर अर्थ का आरोपन कर पाते हैं ? क्या हमारी आलोचना यह मानती है कि सुराग-प्रेम नहीं दिखलाते हुए रचे गए अपेक्षाकृत मुक्तमुखी पाठ वस्तुतः अर्थ की दृष्‍टि‍ से विपन्न पाठ हैं ? अगर हिंदी आलोचना को सचमुच शेखर जोषी के यहाँ रचनात्मकता में अनोखी चमक पैदा करनेवाले संघर्ष और विचार के प्रखर मुद्दों का अभाव दिखलाई देता है, तो उसे इन सवालों से रू-ब-रू होना पड़ेगा।



. . . पर, निस्संदेह, यह हिंदी आलोचना की आम राय नहीं है और इसीलिए पूरी आलोचना को इन सवालों के कठघरे में खड़ा करने की ज़रूरत नहीं। विश्‍वनाथ त्रिपाठी ने अपने लेख ‘बदलते समय के रूप’ (कुछ कहानियाँ, कुछ विचार, प्रथम संस्करण: 1998, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली) में ‘हलवाहा’ कहानी पर विचार करते हुए सहज तरीके से बड़ी बात कहनेवाली शेखर जोशी की इस कला को बिल्कुल सही पहचाना है।* कई और कहानियों के संदर्भ में शेखर जोशी की इस कला की पहचान होना अभी बाकी है। ‘समर्पण’ की चर्चा हो ही चुकी है; ‘गलता लोहा’, ‘बच्चे का सपना’, ‘निर्णायक’ आदि कहानियाँ भी इसी श्रेणी में आती हैं। गल कर एक नया आकार लेनेवाले धातु की तरह जातिगत पहचान का स्थान वर्गीय पहचान ले रही है, इस कथ्य को बहुत महीन तरीके से सामने लाती है ‘गलता लोहा’ कहानी। जातिवादी एकजुटता के छद्म का



शि‍कार बना मेधावी ब्राह्मण कुमार अपने लोहार सहपाठी के साथ जो वर्गीय एकजुटता महसूस करता है, और उसका व्यक्तित्व-विकास जातिगत आधार पर निर्मित झूठे भाईचारे की जगह मेहनतकशों के जिस सच्चे भाईचारे की प्रस्तावना करता है, वह कहानी के केंद्र में होने के बावजूद ज़रा भी मुखर नहीं है। उसे अमुखर बनाए रखने का सूक्ष्म कला-विवेक यदि शेखर जोशी में न होता, तो शायद कहानी का कथ्य ज़्यादा व्यापक स्तर पर ‘सुना’ जाता। इसलिए यह कहना ग़लत न होगा कि ‘गलता लोहा’ अपने कला-विवेक की ही बलि चढ़ गई। वैसे शेखर जोशी की कई दूसरी कहानियों की तरह ही यह कहानी भी किसी ‘दिखनेवाली’ कला से प्रायः अछूती है- प्रकट रूप में लगभग कलाविहीन। पूर्वदीप्ति की एक बहुप्रयुक्त तकनीक को छोड़ दें तो कलायुक्तियों का सचेत उपयोग बिल्कुल दिखलाई नहीं पड़ता। नाटकीय शैली यानी दृष्यात्मक प्रविधि बहुत कम अंशों में है; पूरी कहानी पर घटनाओं की पिछली श्रृंखला बताते जाने की शैली यानी परिदृष्यात्मक प्रविधि हावी है। मतलब यह कि कलात्मक निर्वाह के अभाव की शि‍कायत बड़ी आसानी से की जा सकती है, अगर आप कला को उसके दृष्यमान उपादानों से ही पहचानते हों, तो। पर यदि आप कथात्मक विधाओं के अंदर ऊँची आवाज़ में न बोलने को एक महत्वपूर्ण कला मानते हैं, तो वह ‘गलता लोहा’ में है। यहाँ स्थितियों के मध्य सम्‍बन्‍ध को रेखांकित करते हुए लेखक बहुत बारीक रेखाओं का उपयोग करता है और कहीं कमज़ोर निगाहों से ये रेखाएं ओझल न रह जाएँ, इस डर से उनकी बारीकी के साथ कोई समझौता नहीं करता। यहाँ तक कि शीर्षक जिस प्रतीकार्थ को अपने में समेटे हुए है, उसकी ओर भी कोई इशारा ज़ाहिरा तौर पर कहानी के भीतर मौजूद नहीं है। उसे कहानी के मर्म के साथ जोड़ कर पढ़ने, या उसी की रोशनी में कहानी का मर्म निर्धारित करने का पूरा दारोमदार पाठक पर है। पाठक से मर्मज्ञता की मांग करनेवाले इस निर्वाह को अगर हम कलात्मक न मानें, तो निश्‍चि‍त रूप से पच्चिकारियों को ही कला का एकमात्र नमूना मानना पड़ेगा !



वस्तुतः शेखर जोशी की कहानियाँ बड़ी मज़बूती से कला और सौंदर्य की गैररूपवादी धारणा पर टिकी हुई हैं। उनके यहाँ कलात्मक सौंदर्य की सत्ता अंतर्वस्तु के ऐतिहासिक, सामाजिक और नैतिक संदर्भ से परे नहीं है। इस बात के क्या मायने हैं, इसे खुद जोशी जी कहानी ‘सिनारियो’ किसी भी दार्शनिक-सैद्धांतिक लेख के मुक़ाबले अधिक समर्थ ढंग से बता पाती है। ‘सिनारियो’ वृत्तचित्र बनानेवाले एक युवक, रवि की कहानी है। वह अपना कैमरा लेकर एक पहाड़ी गाँव में पहुँचा है। सूर्यास्त के समय सिंदूरी आभा से नहाया हुआ हिमालय का हिम-विस्तार देख वह मंत्र-मुग्ध हो जाता है। हिमालय की इसी शोभा को पर्दे पर जीवंत करने के लिए वह पहाड़ों में आया है। कमेंट्री, पार्श्‍व-संगीत, कालिदास से लेकर पंत तक की काव्य-संपदा का उपयोग- इन सब पर उसने ख़ासा अनुसंधान और चिंतन कर रखा है। जिस घर में वह ठहरा है, वहाँ प्रारूपिक पहाड़ी दरिद्रता के बीच एक बूढ़ी आमां और उसकी बारह-तेरह साल की पोती रहती है। रात को सोने के बाद सुबह-सुबह पता चलता है कि चीड़ के कोयले में दबी आग चूल्हे में बची नहीं रह पाई है और माचिस रखना महंगा पड़ता है, इसलिए चाय बनाने के लिए आग का इंतज़ाम करने की समस्या है। थोड़ी देर बाद रवि देखता है कि आमां की पोती, सरुली एक पीतल का कलछुल लिए पगडंडी के रास्ते कहीं जा रही है। फिर उसी रास्ते वह कलछुल में आग लिए लौटती दिखलाई पड़ती है। घर के पास पहुँचते-पहुँचते अचानक किसी वजह से वह अपना संतुलन खो बैठती है और दूर के बड़े मकान से मांग कर लाए गए अंगारे तुषार भीगी धरती पर बिखर जाते हैं। लगभग बुझ चले अंगारों को जल्दी-जल्दी उठाकर वह कलछुल में रखती है और उन्हें फूंकती हुई घर की ओर भागती है। इस दृष्य को देख अपनी असमर्थता की ग्लानि से भरा हुआ रवि छत से नीचे उतरता है और गोठ के दरवाज़े पर पहुँच कर एक अद्भुत दृष्य देखता है। बच्ची और बुढि़या अंगार के कोने में बची हुई हल्की आंच को फूंक-फूंककर जीवित करने की कोशि‍श में जुटी हुई हैं। धीरे-धीरे आंच का वृत्त फैलने लगता है। फिर उस कलछुल को सूखी फूस और लकडि़यों के बीच रख कर आमां एक फूंक मारती है और लकडि़यां भभककर जल उठती हैं। ‘पूरा गोठ एकबारगी आलोकित हो उठा। चूल्हे के पास बैठी आमां के चेहरे की झुर्रियां जैसे उस सुनहरे आलोक में खिल उठीं।’ इसके बाद कहानी का आखि़री वाक्य है, शेखर जोशी की चिरपरिचित शब्दकृपण शैली में, ‘रवि को सहसा आभास हुआ कि काश ! इस रंगत को वह अपने कैमरे से पकड़ पाता।’



‘सिनारियो’ का सार-संक्षेप देने के बाद इसकी व्याख्या में ज़्यादा कुछ कहने की ज़रूरत तो नहीं, फिर भी कुछ बातें उल्लेखनीय हैं। कहानी शुरू होती है, हिमालय की सांध्यकालीन रंगत के प्रति कलाकार की ललक के साथ, और एक जिजीविषापूर्ण संघर्ष के बाद हासिल हुए अग्नि-आलोक के प्रति उसके सम्मोहन-भाव पर जाकर ख़त्म होती है। कहानी में हिमालय के सौंदर्य पर कोई सवाल नहीं उठाया गया है, लेकिन अंतिम प्रसंग में वाचक के कुछ कहे बगैर ही दो सौंदर्य-दृष्‍टि‍यां आमने-सामने खड़ी हो जाती हैं। इनमें से एक वह है, जो रूप से परे नहीं जाती- हिमशि‍खरों पर रंगों का खेल बिलाशर्त सुंदर है; उसकी सुंदरता का स्रोत दर्शक के किसी ऐतिहासिक-सामाजिक-नैतिक बोध में निहित नहीं है। दूसरी सौंदर्य-दृष्‍टि‍ रूप को विभिन्न सरोकारों और संदर्भों के बीच रख कर देखती है और उनसे जुड़ा ऐतिहासिक-सामाजिक-नैतिक बोध ही रूप को सुरूप या कुरूप बनाता है। कहानी का विकास-क्रम बाद वाले को एक अधिक विकसित सौंदर्य-दृष्‍टि‍ के रूप में प्रस्तावित करता है। लेखक सौंदर्य-दृष्‍टि‍ के मामले में सही-ग़लत, उचित-अनुचित की बहस में नहीं पड़ता और उसकी शैली में ही यह निहित है कि इस तरह की बहस बेमानी है। पर वह बाद वाली दृष्‍टि‍ को अधिक विकसित मानता है, क्योंकि उसमें ‘देखना’ परिस्थितियों की समझ और मानवीय बोध से संपन्न क्रिया है। गोठ में फैले हुए सुनहरे आलोक और उसमें खिली हुई आमां की झुर्रियों के सौंदर्य का पारखी वही हो सकता है, जो इस दृष्य को साकार करनेवाली संघर्ष-यात्रा का साक्षी रहा है और जिसमें संघर्ष तथा जिजीविषा के प्रति एक गहरा नैतिक रुझान है।



यहाँ हठात् याद आता है, शेखर जोशी की एक कहानी ‘आशीर्वचन’ का आखि़री वाक्य, ‘. . . हॉल में बैठे हुए होनहार नई पीढ़ी के कारीगरों की मोहनी सूरत उसकी आँखों के आगे तैर गई।’ वह कौन है, जिसे कारीगरों की नई पीढ़ी ‘होनहार’ लगती है और उनकी सूरत ‘मोहनी’? निश्‍चि‍त रूप से यह कोई प्रबंधक या पूंजीपति नहीं है। यह व्यक्ति है, कारखाने से सेवानिवृत्त होने वाला फोरमैन श्‍यामलाल, जिसने वह ज़माना देखा है, जब ‘कारखाने की एक-एक ईंट रखी गई थी’, जब कारखाने के अंदर ‘सिर उठाने का मतलब सिर कटाना होता था’, जब यहाँ ‘पीने का पानी नहीं मिलता था, कैंटीन नहीं थी, बात-बात पर डिस्चार्ज मिल जाता था’, जिसने ‘ऐसी जीतें’ देखी हैं ‘जिन्हें जीतना आसान नहीं था’, ‘ऐसी हारें’ देखी हैं ‘जिन्हें भूलना आसान नहीं है’। ऐसे व्यक्ति के पास नई पीढ़ी के कारीगरों को देखने की जो नज़र होगी, वह किसी प्रबंधक या पूंजीपति या वर्ग-चेतनाविहीन मज़दूर के पास नहीं हो सकती। इसलिए इन सभी को विज्ञापनों के ‘मॉडलों’ के चेहरे भले ही मोहक लगें, युवा कारीगरों की सूरत मोहक नहीं लग सकती। वहीं श्‍यामलाल को- उसकी विदाई-सभा में से अधीर होकर, बिना उसका भाषण सुने, उन युवा कारीगरों के भागने के बावजूद- यह नई पीढ़ी ‘होनहार’ लगती है और इन कारीगरों की सूरत ‘मोहनी’, क्योंकि उसके पास अपने सपनों और उनके लिए लड़ी गई लड़ाइयों से हासिल हुई एक अलग-सी निग़ाह है।



शेखर जोशी का गैररूपवादी सौंदर्य-बोध हमें वह निग़ाह देता है, जो ऐतिहासिक-सामाजिक-नैतिक बोध की पृष्‍ठभूमि में ‘साधारण’ की सम्मोहकता को देख सकती है। इसी निग़ाह से खुद शेखर जोशी की कहानियों के सौंदर्य को भी पहचान पाना मुमकिन है। उनमें मिलनेवाली गहरी अंतर्दृष्‍टि‍ कहानीकार के सीधा-सादा, नपा-तुला और आहिस्ता बोलने को कलात्मक कथन बना देती है। इसी तर्क से यह समझा जा सकता है कि किसी भी काव्यात्मक युक्ति का उपयोग किए बगैर ‘बच्चे का सपना’ क्यों इतनी काव्यात्मक प्रतीत होती है, ‘निर्णायक’ और ‘मेंटल’ के नायकों के पक्ष में प्रथमदृष्‍टया कोई दलील न देते हुए भी हमें उनका पक्षधर बना देनेवाली किस्सागोई का रहस्य क्या है, ‘हलवाहा’ के आखि़री वाक्य में दिखनेवाली ‘कुलघातक जिबुआ’ के ‘नौसिखिएपन की गवाही’ देती ‘हल के फाल की टेढ़ी-मेढ़ी लकीरें’ कहानी-कला की परिपक्वता की गवाही क्योंकर देती है, ‘बदबू’ का अनमना-सा शि‍ल्प कैसे सर्वनाम-सूचित नायक (वह) के साथ हमारा तादात्म्य कराने वाली अचूक कला बन जाता है और हम उसी नायक के समान एक भयावह अभ्यस्तता का शि‍कार होने से बच जाने की खुशी महसूस कर पाते हैं, नौरंगी के मन को लेकर हमारी कोई भी जिज्ञासा शांत किए बगैर उसके काम पर लौटने की जानकारी के साथ एक झटके में कहानी ख़त्म कर देना कैसे हमारे मन में अनंत अनुगूंजें पैदा करनेवाली युक्ति साबित होता है, इत्यादि।



ऐसा नहीं कि इस तरह की कहानी-कला का पेटेंट हिंदी में शेखर जोशी के पास ही हो, पर वे निश्‍चि‍त रूप से इस कहानी-कला को समझने-समझाने के लिए एक मुकम्मल पाठ हैं।



*विश्‍वनाथ त्रिपाठी के अनुसार, यह ‘इतिहासविरुद्ध यातना’ और उस ‘यातना के संघर्ष’ से निकलनेवाली इतिहासम्मत प्रगति की कहानी है। कहानी के मुख्य पात्र जीवानंद के सामने दुविधा ये है कि वह या तो ज़मीन बेच दे या स्वयं हलवाहा बन जाए। उसके हलवाहे को आजीविका का बेहतर साधन मिल गया है। इधर जीवानंद की ज़मीन पर बद्री प्रधान की नज़रें गड़ी हुई हैं। वह चाहता है कि खेती की मुश्किलें देख कर जीवानंद ज़मीन बेचने का मन बना ले। लेकिन जीवानंद अंततः खुद हल चलाना तय करता है। इसका विश्‍लेषण करते हुए विश्‍वनाथ त्रिपाठी ने खैरा बैल के प्रति जीवानंद की नवोदित आत्मीयता पर तथा कहानी के अंत पर जो टिप्पणी की है, वह शेखर जोशी की मितकथन-शैली पर भी एक उम्दा टिप्पणी है:

हम यातना सहने की प्रक्रिया में उससे मुक्ति के लिए छटपटाते भी हैं- मुक्ति का रास्ता भी ढूंढ़ते हैं- यही यातना का संघर्ष है। जीवानंद पदम के न आने, ज़मीन के बंजर हो जाने, उसके बिक जाने और अपमानित होने की जो यातना भोग रहे थे उससे मुक्ति का मार्ग बैल के प्रति आत्मीयता से होकर गुजरता था।

विपत्ति में आत्मीय का स्मरण होता है। शेखर जोशी की इस कहानी में खैरा बैल का जो प्रकरण है वह संक्षिप्त होने पर भी इतना उपयुक्त है कि प्रेमचंद की ‘दो बैलों की कथा’ और रेणु की ‘तीसरी कसम’ की याद आती है। प्रतीकतः खैरा बैल जीवानंद के उस हार न माननेवाले मन का रूप है जो सोच-विचारकर विपत्ति से पराजित नहीं होता बल्कि आगे बढ़ने का रास्ता खोजता है।

कोई एकालाप नहीं, अंतर्द्वंद्व का कोई चित्रण नहीं। सिर्फ़ संकल्प का मौन- ‘‘सिर झुकाकर वह घर के अंदर घुस गया और हाथ-पैर धोकर संध्या करने लगा।’’

जीवानंद की ज़मीन खरीदने का सपना देखनेवाले बद्री प्रधान ने दूसरे दिन सुबह देखा- ‘‘कुलघातक जिबुआ स्वयं हल चला रहा था। फाल की टेढ़ी-मेढ़ी लकीरें उसके नौसिखिएपन की गवाही दे रही थीं।’’

नौसिखियापन नए जीवन का उदय है। यातना की उपलब्धि। – पृ0 115-116




(लेखक मंच ब्लॉग से साभार)


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