आत्मा रंजन के कविता संग्रह पर आशीष सिंह की समीक्षा "पगडंडियां गवाह हैं" को पढ़ते हुए।


आत्मा रंजन



युवा कवि आत्मा रंजन का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। काव्य-रूप में ढालने के लिए विषयों के चुनाव से ले कर कविता की भाषा और शिल्प तक में आत्मारंजन और कवियों से बिल्कुल अलग खड़े नजर आते हैं। बिना किसी बडबोलेपन के सीधे-सीधे अपनी बात कहने के पक्षधर आत्मा रंजन सिद्धान्त और व्यवहार में एका के भी हिमायती हैं। कवि का यह दुर्लभ गुण उनकी कविताओं से होते हुए आपको आभासित हो जायेगा। आत्मा रंजन का कविता संग्रह "पगडंडियां गवाह  हैं" चर्चित कविता संग्रहों में से एक है। इस संग्रह पर एक समीक्षा लिखी है युवा आलोचक आशीष सिंह ने। तो आइए आज पहली बार पर पढ़ते हैं युवा कवि आत्मा रंजन के कविता संग्रह पर आशीष सिंह की समीक्षा "पगडंडियां गवाह  हैं" को पढ़ते  हुए।     


"पगडंडियां गवाह  हैं" को पढ़ते  हुए 

आशीष सिंह


1

कविता तथाकथित सभ्यता और नफासत  के पीछे  ठिठकी  बदरंग दुनिया  की पोलपट्टी खोलती  है उस पर  पड़े आवरण को उलट देती है इसीलिए हमारे हृदय में बार बार  जगह  बनाती है। यह तमाम अन्यान्य शास्त्रों से आगे बढ़ कर  स्थाई महत्व की जगह बना लेती है।   आचार्य  राम चन्द्र शुक्ल के शब्दों में कहें सभ्यता  के  आवरण  में ढकी  मनुष्य  की सहज और स्वाभाविक वृत्ति  उसके  "प्रच्छन्न रुप"  मात्र का प्रदर्शन  करती है। यह प्रच्छन्न और बनावटी  रुप कितना  भी  नेकनीयती और  आदर्श  की बात करे या कितना  लोकलुभावन  कौतुकी रुप  को प्रकट करे हमारे बौद्धिक  कुतूहल का विषय बन सकता  है लेकिन  "मर्मस्पर्शी" नही हो पाता। क्योंकि यह  हमारे और  सामाजिक  ताने-बाने में मौजूद  वास्तविक स्वरुप का दिग्दर्शन करा पाने में अपने आप को असमर्थ पाती है। इसीलिए  "प्रच्छन्नता  का उद्घाटन  कवि कर्म  का  एक मुख्य  अंग  है।  ज्यों-ज्यों  सभ्यता  बढ़ती जायेगी  त्यों-त्यों  कवियों  के लिए यह  काम बढ़ता जायेगा। मनुष्य  के हृदय  की वृत्तियों  से सीधा  सम्बन्ध  रखने वाले  रुपों और  व्यापारों  को प्रत्यक्ष  करने के लिए उसे  बहुत  से  पदों  को  हटाना  पड़ेगा।   इस से यह स्पष्ट है कि  ज्यों-ज्यों हमारी  वृत्तियों पर सभ्यता के नये-नये आवरण चढ़ते जायेंगे त्यों-त्यों एक  ओर  तो कविता  की आवश्यकता  बढ़ती जायेगीदूसरी  ओर  कवि-कर्म  कठिन  होता  जायेगा"


आज के घन अन्धकारमय सभ्यता में मनुष्य हो पाने, न हो पाने के बीच   हम  पाते  हैं  कि आज  पुराने जड़ हो चुके विचार का अन्तिम संस्कार   करते  हैं या प्रतिरोध रहित  मनुष्य का। यह  कैसा सभ्य दिन  है जब पुराने अंधेरे  की ताकतें आज भी बलवती हैं। मेरे सामने युवा कवि आत्मा रंजन की  एक  कविता  "मरा  हुआ  आदमीहै। मै  इससे  एक  तरह से जूझ  रहा हूँ। यह पढ़ते  हुए  मुझे   अनायास  उदय  प्रकाश   की  बहुचर्चित  कविता  "मरने  के बाद”  याद  आ रही है जिसमें वे  कहते  हैं –

मरने  के  बाद  आदमी
कुछ नहीं   बोलता
मरने  के बाद  आदमी
कुछ  नहीं   सोचता
और  कुछ न सोचने से 
कुछ  न बोलने से 
आदमी  मर जाता  है।

अपने  छात्र जीवन में इस कविता  को पोस्टर  में  या कविता पाठ  में खूब  इस्तेमाल करते रहे हैं।  प्रथमतः इसीलिए  तो कि लोगों  को  झकझोरा  जाय  उनको  उद्वेलित  किया जाय। लेकिन  इसे आज  आत्मा रंजन  की  मौजूदा  कविता  से जोड़ कर  पढ़ता  हूँ  तो इसकी सीमा  और एक तरह आरोपित किसिम  की अगुआपन  झलकता  है। यह सोये हुए आदमियों और  उनके  अन्दर  चल रहे द्वन्द्व को अनदेखा सा कर रहा  है। या यूं  कहे  कि कतार  में तत्काल  शामिल न हो पाने वालों की जमीनी मनःस्थिति  से किसी  भी  प्रकार नाता  कायम किए बिनाहम   उन्हें  अपने से छिटक  दे रहे  हैं। इस प्रकार यह कविता  हमें नारे के रुप इस्तेमाल करने के लिए जितनी  सहज और  स्वयं सिद्ध लगती  है उतनी ही ज्यादा हमारे मन  पर  चढे  सभ्यता  के आवरण  को छू कर चली जाती है। हमें "मर्मस्पर्शी" नहीं लगती। उसके बरक्स आज का एक  युवा  कवि  अपनी कविता  में  इस  मरे हुए आदमी  की  ताकत  को कुछ  इस रुप  में देखता  है।

मरा  हुआ  आदमी

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(
एक)

बहुत  पहले की  बात  है 
सोया  हुआ  था  एक  आदमी 
घने  अंधेरे  में
बिल्कुल   जड़प्रतिरोध रहित
मृत  जान  उन्होंने
कर डाला  उसका   अन्तिम   संस्कार
नहीं   यह
बहुत  पुराना  अंधेरा   नहीं 
आज  ही  का  कोई  सभ्य  दिन  है।

(दो)

अलबत्ता
यह बहुत  कम  होता  है
चीखता  है जब  भी
मरा  हुआ  आदमी
जीवित   से  हो  जाता है
ज्यादा  ताकतवर 
खौफ़नाक!

जन सामान्य में मौजूद विशिष्टता को तलाशने और गहरे मानवीय सरोकार से लैस  ऐसी  कविताएँ सहज भाव से  हमें अपनी ओर खींच लेती हैं।  यहाँ चमत्कृत करने की आकांक्षा नहीं साधारण या लगभग तिरस्कृत  करार दिए गए  जीवन की  आंच है। इस ठंडे और आत्म-केंद्रित समय में उम्मीद की ऐसी चिनगियां  ही जीवन के प्रति आस्थावान बनाती  है।
 
2

चुप्पियों का चीत्कार
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कभी  प्रेमिकाओं के काबिल
नहीं होते फूल
कहीं प्रेमिकाएँ नहीं होती
फूलों के काबिल
कौन समझे कौन जाने
चुप्पियों  का चीत्कार
कि कैसे विवश 
अर्पित किए जा रहे फूल 
प्रेम की तरह 
कितना  विवश
बेतहाशा  उमड़ता  हुआ –
मन


कविता  बंधन नहीं  स्वीकार करती है, हँसी  जब बंध जाती है  तब अर्थ बदल जाते हैं हवा बंधने से मना करती है और प्रेम  अपनी गहनता में मौनता ग्रहण कर सकती है, अपने आप में ही नहीं अपने पूरे परिवेश में ऊभ चूभ होते गोता लगाने में  भी   झिझकना स्वीकार नहीं कर पाती, हर काल में प्रेम बंधनमुक्त होने की ओर ही आगे बढ़ता है, अपने समय   की जड़ श्रृंखलाओं को तोड़ना, सतत  कमजोर  करते जाना   ही  वह अपनी स्वाभाविक वृत्ति मानती है। यही वह मानवीय प्रवृत्ति है जो सबसे ज्यादा मानवीय सौंदर्य की रक्षा करती मिलती है, लेकिन  यह  कभी  भी  अपनी   महत्ता  का  दावा भी  नहीं   करती। आत्मारंजन  की यह छोटी सी कविता  कितने बहुआयामी अर्थों  से भरी है वह अपने आप में हमारे अपने समय पर एक गम्भीर  टिप्पणी-सी  है। एक कवि अपने समय की विशिष्टता पर बात करते हुए जब सामान्यीकरण  करता है तभी उसका  सामाजिक उत्तरदायित्व का बोध हमें समझ में आता है। अक्सर सामाजिक  विडम्बनाओं पर बात करते  हुए हमारे कवि उन  विरुपताओं की चर्चा इतनी विविधता से करते हैं जिनसे  हमारा सामना आये दिन होता हैं, वाह्य और आन्तरिक बंधनों की  महीन व्याख्यायें हमारे मनो-मस्तिष्क को इस कदर आवृत्त कर लेती हैं कि उससे  बाहर  सोच पाने और उसकी ठोस जमीन को पहचान पाने के लिए कई परतों   नीचे   झांकने  और टटोलने  की कोशिशें करनी  पड़ती है। ऐसी कविताओं  पर टिप्पणी  करते हुए मुक्तिबोध कहते  हैं कि कविता जब "भाव इतना  अधिक  प्रसंगबद्ध  हो कर  विशिष्ट हो जाता  है कि पाठक को अपने संवेदनात्मक  अनुमानों का  बार-बार प्रयोग  करने  पर उस  यथार्थ का आकलन नहीं  हो  पाता"। लेकिन  यहाँ  हम पाते हैं कि भाव अपनी सघनता के साथ हमारे सोये हुए मनस्तंतुओं  को जाग्रत करती  जाते   हैं, हमारी संवेदनाओं  को बहुत धीरे-धीरे  लेकिन पूरी जिम्मेदारी के साथ उभारने-जगाने  की कोशिशें   करती जाती है। एक सच्ची-कविता यही तो करती है। फूल  यानि प्रेम  जिसके  रंग, गंध और रुप सब आपस में इतना  एकाकार हैं  कि  उसे कहीं  से भी  अलगाया नहीं  जा सकता। अलगाने की सोच  भी  मानवीय कृत्य में  गिनना  अनुचित  ही है मेरी नजर  में। इतने  समानुपातिक अहसास  में  गुंथा बुना होता है कि  किसी   भी  अंश की कम या ज्यादा  कर के तारीफ़  नही की जा सकती।  लेकिन  पूँजीकृत सामाजिक  संरचना  में प्रेम की कीमत उसके अलग-अलग अंशों में काट  छांट कर द्रव्यीकृत  करने  तक जाया  जाता है।  उपयोग में लाओ और फेंकों की संस्कृति  ही इनके मूल्यों का निर्धारक  हैं। चीज़ों को इसी रुप में स्वीकार कर लेने वाले सतह की चमक का प्रतिचित्रण करने वाले भी  अपने समय के सार भूत सत्व को निखार पाने में अक्षम साबित  होते  रहे  हैं। और  वे  इसे  ही आज का चलन कह कर प्रचलित  करते रहे  है। हमें केदार नाथ सिंह की कविता  याद  आ रही  है –

जहाँ  लिखा  है प्यार
 वहाँ लिख दो सड़क
फर्क नहीं पड़ता
हमारे समय का नारा है
फर्क नहीं पड़ता

जबकि  हिंदी कविता  अपने सामंती ढाँचागत सामाजिक  संरचना के जमाने से ही एक तरफ सीमाबद्ध दायरे में स्त्री  का सौंदर्य और  रूपरंग का वर्णन  करते  हुए अपने अधिकार बोध को दर्शाती  मिलती है। जिसे उस जमाने की संकुचित मनोवृति का परिचायक माना गया। वहीं उस  जमाने के हृदय की आवाज अपने बंधनों को नकार कर, अपने संबंधों कोइन दायरों  को, रुढ़िबद्ध  रुचि को धिक्कारते  हुए  कहती रही है कि 'अति सूधौ सनेह  को मारग  है' यहाँ  चालाकी करने वाले, लाभ हानि का हिसाब लगाने वाले वणिक बुद्धि  अनुपयोगी हैं, वे समाज के अतिरिक्त  तत्व हैं। इसका  सीधा  मतलब रहा  है कि प्रेम का हमेशा  बिकाऊ, और अधिकार बोध जताने वाली व्यवस्था  से विरोध रहा  है। और यह विरोध ज्यों-ज्यों समाज  अपने  सभ्यता के नये सोपानों  पर कदम रखता गया  है उतना ही जटिल  और  गहराता  गया है। इसीलिए आज प्रेम का सवाल व्यक्तिगत मुक्ति का नहीं  सामाजिक मुक्ति से गहरे तौर पर जुड़ा सवाल  है। यह हमारे परिवेश  और इनका नियमन करने वाली  सामाजिक शक्तियों के सामने वैकल्पिक दुनिया का सवाल  है।

आत्मारंजन अपनी एक अन्य कविता "बनना  नहीं  होता" में आज के मूल्य को, आज के  बांकपन को प्रश्नांकित  करते  हुए कहते  हैं कि आज मोहक मुस्कान एक रणनीति का हिस्सा  बन चुका है, हर चीज़ों की तरह सब से मानवीय  भावना  का भी  वस्तुकरण करके इसे हर कीमत पर पूँजी में बदलने को ही कुशलता, दक्षता  का पैमाना माना जाता  है।   मूल्यों के तौर  पर  कितने  खोखले हैंकितने  रसहीन  हैं यह पैमाने जब कि  इससे महज रिश्ते तौले जा सकते हैं, चमकाये जा सकते हैं उन्हें पाया नहीं  जा सकता और कवि कहता है

जाने  कब समझेंगे लोग 
कि वास्तव  में –
फूल को देखने के लिए 
पहले फूल होना पड़ता है।

फूल  को देखने के लिए, पहले फूल होना पड़ता हैपढ़ते हुए हमें अनायास कहीं अन्दर से अपने शमशेर की आवाज  बहुत धीमी  आवाज सुनाई  पड़ती  है  कि  'अर्थ नहीं  कुछ मेरे पास, फिर भी मैं करता हूँ प्यार' "चुप्पियों का चीत्कार”  कविता  अपने तीखेपन के साथ  हमारे सामने अपने समय   का  कटु यथार्थ ला खड़ा करती है। हम अपने उच्चतम  मनोभूमि से आज  के जमीनी सच से दो चार होते  हैं। वधिक सरीखी यह व्यवस्था, इसकी मूल्यगत नयी परिधियां कितनी संकुचित  हैं, कितनी संकरी हैं जहाँ  उम्मीद को अंखुवाने के पहले कुचलना उन्नति का आधार   मान्यता प्राप्त  करता है। विवशताजन्य  रिश्ते अपनी गंधहीन  आभा  से दीखने लगते हैं। जहाँ खूबसूरती है, तेजी है  लेकिन आत्मिक आह्लाद और अपनी स्वाभाविक  प्रकृति  उस बंधन से छिटक कर आगे निकल जाने को   कसमसा  रही  है, मन   मसोस रहा है । यही है इस कविता  की ताकत। और कवि  की  सचेतन भूमिका जो अलग से हावी नहीं दिखती बल्कि प्रक्रिया में ही अपनी  भूमिका का निर्वहन  करती है। कथ्य और कलात्मकता एकमेक हैं यहाँ। जहाँ  'मन' अपने बंधन को धता बताते आगे  बढ़ जाने को लालायित   "बेतहाशा" उमड़ रहा है।

कौन  समझे  कौन जाने
चुप्पियों का चीत्कार
कि कैसे  विवश
अर्पित  किए  जा रहे  हैं फूल 
प्रेम की तरह 
कितना  विवश 
बेतहाशा  उमड़ता  हुआ 
मन।

इस  कविता  में "चुप्पियों" के  मध्य पसरी हूक, चीख  हमारे सामने बहुत कुछ घटता सा दीखने लगता है। इस चुप्पी को हम अकसर रीति के नाम परपरम्परा के नाम पर, और बहुत उदार और  "आधुनिक" हुए तो   तमाम संसाधनों  और  सुविधाओं  की भीड़  में भुलवा  देने की कोशिश करते हैं। सुनना नहीं  चाहते, सुनने  से बचने  की कोशिश जरुर  करते हैं।  यह हमें  विचलित करती हैजबकि  इसके कारणभूत  सत्य   का सामना करने की दिशा ही सकारात्मक दिशा है।

अक्सर हम पाते हैं कि  कवि अपने समय को तो कटघरे में खड़ा करते हैं लेकिन स्वयं व्यक्ति के तौर पर  उनकी  भूमिका दर्शक की या नैरेटर की बन जाती  है। यहीं पर हम अपनी जबाबदेही से किनाराकशीं करते मिलते  हैं जब कि हम पाते हैं कि निराला और मुक्तिबोध प्रभृति तमाम कवियों की कविता में उनका व्यक्तित्व उभरता मिलता है। अपने आप से सवाल जबाब करते इन कवियों की कविता में आत्मगतता अपने वर्गमूल के अन्तर्विरोधों  की छाया लिए मिलती है।  आगे चल कर यह वैयक्तिकता अपने चरम व्यक्तिवाद में परिणत होते हुए कई  कवियों में  आत्म ग्रस्तता तक पसरी  मिलती  है।  जिसका प्रतिकार करते हुए नागार्जुन, त्रिलोचन, शील,  केदारनाथ अग्रवाल,   वेणु गोपाल, विजेंद्र आदि तमाम जन-कवियों ने जन-जीवन की छवियों और उथलपुथल  को अपने आत्मिक संवाद के  जरिए  काव्य-जगत में पुनरागमन  किया।  यहाँ  कवि अपने समय के सवालों को पराया व्यक्ति बन कर नहीं  बल्कि  अपने लोगों के साथ गहरे सरोकार को रखते  हुए खुद को प्रकट करता  है। आज हम देखते हैं कि प्रचार और विज्ञापनी सभ्यता के आवरण में मोहांध तमाम कवि   महज  बहिरंग का वर्णन और शाब्दिक  बयान तक ही अपनी प्रतिबद्धता की सीमा रेखा खींचें, ठिठकते  मिलते  हैं।  यहाँ खुद से संवाद या आत्मगत सवालों की आवाजाही बहुत कम दीखती है।  अपनी उपस्थिति दर्ज करा लेने की होड़ ज्यादा दीखती है। उनकी कविता में हमें उनका व्यक्तित्व भी  बहुत क्षीण अनुभवजन्य  और यथास्थितिपूर्ण मिलता है। भले ही वे कविता में बतौर प्रचलन 'लोक' की बात करें या जनता की आवाज को उठाने का उपक्रम करते मिलें। वह महज नामानुक्रमिणिका में नाम दर्ज कराने तक सीमित लगता  है। ऐसे निरीह कवि व्यक्तित्व से आप ईमानदार कविता की उम्मीद भी  भला कैसे कर सकते हैं। हाँ, इन भलेमानुष  कवियों की एक  मोटी पहचान यह है कि उनकी कविता बोलती ज्यादा है। और या तो बयानों और वर्णनों के सहारे अपना समस्त ज्ञान काव्यमय रुप में   सकेल  रहे   होते  है या कुछ मूर्त छवि चित्रों  की  महज   इन्दराजी।  जबकि   आत्मारंजन की  अधिकांश कविताओं    में  कवि  व्यक्तित्व   की छाप अपने सहज व्यवहार और आगे की ओर देखती निगाह के तौर पर साफ साफ पढ़ने को मिल   जाती  है। इसी मायने में यह कवि कई युवा   कवियों  की तरह ज्यादा भरोसे  का   कवि   है 

बहुत जरूरी होता है
असहायता की स्थिति   से 
उबारने को आतुर हाथों की
मंशा समझ लेना
खासकर जब कि 
विश्वास बहेलिए की 
आड़ की तरह
किया जा रहा हो इस्तेमाल
और वे आँख मूँद कर
कर लेते हैं हम पर विश्वास
आसान नहीं  उनका भी  सामना
विश्वास के साथ 
असंभव कह चुकने के बाद 
खेद प्रकट करना, नहीं आसान
कैसे दुर्दिनों ने घेरा है
खिन्नतुम हो उदास
ओ मेरे अंतरंग सखा
मेरे विश्वास  ...!

         
(
विश्वास : एक)


आज के कठिन विश्वास और भरोसे पर संकट के समय में कवि अपने को बार-बार कुरेदता है और जबाबदेही का सामना करने से गुरेज नहीं करता। यह व्यक्ति पर सवाल कर के  या क्या दुर्दिन है कह कर अपने समय को कटघरे में रख कर बच निकलता तब कोई बात नहीं थी कविता हो जाती, मानक पूरा हो जाता और हमें सिखा देती क्या करे हम, समय ही ऐसा आन पड़ा है कि हाथ को हाथ नहीं  सूझता। भरोसे  का  जमाना  नहीं  रहा  आदि आदि। तब यह महज एक यथास्थितिवादी कविता बनकर रह जाती लेकिन यहाँ आत्म-संवाद है। अपने आप से आँखें मिला पाने की हिम्मत है और दोस्तों! यह है कवि व्यक्तित्व। इसी श्रृंखला की दूसरी कविता   में  आत्मारंजन   विश्वास को हमारे सामने अविश्वसनीय तरीके से नहीं बल्कि भरे पूरे जाने पहचाने सम्बन्धों की सघनता में दृढ़  भरोसे के साथ रखते  हुए  कहते    हैं-


वे  भी  जो  जानते तक नहीं तुम्हें
थामे  हुए  हैं तुम्हारी  ही उँगली
जैसे बीज भी तर से झाँकता  अँकुर 
जैसे पृथ्वी  पर आँखें उघाड़ता  बच्चा  ,,,,,
तुम ही हो सारथी  जीवन के 
रथ भी  तुम्हीं 
सबसे बड़ी  ताक़त के जनक
उदास मत हो मेरे दोस्त 
बहेलियों की कुटिल कालिमा के खिलाफ 
यूँ ही  झिलमिलाते रहो
यूँ ही  टिमटिमाते
कि बची रहे बनी रहे
बहती रहे यह सृष्टि 

अविरत, अविरल
-------------------
 3

जिस भी  रचनाकार के पास जीवन के जितने ज्यादा करीबी अनुभव होते हैं  उसकी रचना में उतने  ही कम पच्चीकारी, बेलबूटों की साज सज्जा और 'नपुंसकदार्शनिक शब्द-जाल होंगे।  प्रकृति हो  या   मानवीय समाज में डूब कर अपने आसपास  के चरित्रों की गाथा  का गान हो, उनके अन्दर चल रही कसमकस या जीवन से अथाह प्यार सभी  कुछ अधिकतर सतत क्रियाओं में दर्ज होता है। महज  पंक्तियों में नहीं। लम्बे लम्बे वाक्यों में नहीं। बड़ी बात सी दरयाफ्त करती  उनमें गूंथे गये सचेतन दार्शनिक  उक्तियों में भी  नहीं। क्या कोई यह बतायेगा कि आखिर आज हमारे कहानी कविता  में जितना ज्यादा वर्णन और वाह्य प्रतिचित्रण मिलता है उतने ज्यादा हम उसमें  अपना मान कर आवाजाही नहीं  कर पाते हैं। रचनाकार की छवि महज देखने  वाले  अक्रिय रहे  सा व्यक्ति में बदल कर रह जाती है। उसकी भाव सम्पदा में दृष्टा की आत्मीयता  शब्दों में व्यक्त होने मात्र पर निर्भर होती मिलती  है। जब कि एक अच्छी कविता अपनी सीमाओं को अतिक्रमित करती हुई अपने समय की वास्तविक चिन्ताओं में उलझती जूझती मिलती है। यहीं पर रचना और जीवन के द्वन्द्व  का ताप   हम महसूस कर पाते हैं। जहाँ यह नहीं है वहाँ जीवन कम जीवन की व्याख्या ज्यादा है। वहाँ एक दूरी साफ-साफ महसूस की जा सकती है। अन्यथा कवि धरती के सीने में अपना कान लगा कर उसकी धड़कन सुनते-गुनते भी  बहुत कुछ कहते-कहते रह जाता है। उसके पास 'विषयों की कमी नहीं उनका आधिक्य ही बार-बार' कुछ और कहने के लिए  उद्वेलित करता है। जिसे  बाबा तुलसी से ले कर अपने मुक्तिबोध तक ने बार बार व्यक्त करते और पूर्णता में न व्यक्त कर पाने की विवशता  दर्ज करते रहे हैं।
  
यही दूरी  हम  उनकवियों की कविताओं में भी  देखते हैं जो लोक के नाम को बड़ी विहंगम भाव-भंगिमा के साथ हमारे सामने पेश करते हैं। जिनके बारे में हमारे समय  के तमाम  सुधी जन बेहद जिंदादिली के साथ प्रस्तुत कर रहे होते हैं। वे उसकी वर्णनात्मकमकता  पर  ही रीझ कर निर्णय  सुना देते हैं। उसमें जीवन का कौन सा अंश है, उसकी गति प्रगति का रुप क्या है, प्रकृति  या लोक की पैबन्दसाजी आज की फैशनेबुल माँग की खानापूर्ति  तो नहीं कर रही है। इस पर  कमोबेश  कम ही  बात करते हैं। भाषा और वस्तु तथ्य के सहारे हम जीवन को शब्द देते हैं लेकिन कविता में अपनी कलात्मकता के साथ जीवन किस रुप में है उसकी आवाज कैसी है, पुकार किसको सम्बोधित है आदि-आदि तमाम  सवाल जो  हमसे  सम्बोधित होते  हैं जिनकी अनदेखी  चाह कर भी  नहीं कर सकते, न ही करना उचित है। गर अनदेखी करते हैं तब वह मेरा सृजन नहीं है क्योंकि जहाँ  सिरजा  यानि बचाये जाने की आकांक्षा नहीं है। जहाँ सिरजना  होगा वहीं  वहीं उसके  जनन  की पीड़ा  का  भारवहन  सम्भव है। रचनात्मक पीड़ा को  यानि कविता के व्यक्त अव्यक्त को मुक्तिबोध अपनी प्रसिद्ध  कविता "ब्रह्मराक्षस" में मानों इन शब्दों में कह दे रहे हैं 

- समझ में आ न सकता हो 
कि जैसे बात का आधार
लेकिन बात गहरी  हो' -

“पगडण्डियाँ  गवाह हैं" के रचनाकार आत्मा रंजन  की कविताओं से गुजरते हुए  हम अनायास अपने आसपास की कुछ और कविताओं भी  सोचने लगते हैं। 


इस संकलन में कई कविताएँ मेहनती कौम की जिंदगी का अक्स दिखाती  हैं। ज्यादातर ये निम्न मध्यवर्गीय जन की निगाह से यहाँ जगह पाती हैं। जो धरती को अपने हक हकूक के रूप में जीतने की आकांक्षा नहीं पालते हैं बल्कि उससे भेंटना चाहते हैं। उसके सीने पर लोटते जीते अपने सुख को उन अर्थों में व्यक्त करते हैं जिन अर्थों में धरती पर कब्ज़ा जमाये बैठे "विजेता" नहीं जान पाते न अहसास  कर सकते  हैं। "पगडण्डियां गवाह है" में एक कविता  है  "पृथ्वी पर लेटना"  इसे पढ़ते हुए आपके सामने धरती के बेटों के  सुख के क्षण  कैसे और कब होते हैं! कर्मरत जन की जिंदगी, कर्ममय जीवन और उसी अन्तराल में घुलेमिले सुख की छवि हमारी निगाह में तैर जाती है। यह थोड़ी लम्बी कविता है। इसके बावजूद इसके कुछ अंश हम आपसे साझा करना चाहते  हैं। 

पृथ्वी पर लेटना
पृथ्वी को भेंटना भी  है
ठीक वैसे जैसे
थकी हुई  हो देह
पीड़ा से पस्त हो रीढ़  की हड्डी
सुस्ताने  की राहत में 
गैंती-बेलचे के आसपास  ही कहीं
उन्हीं की तरह
निढाल लेट जाना
धरती पर पीठ के बल"

और कवि बताता है कि  उसके धूल धूसरित पैर के आराम की मुद्रा, सुकून  को  कोई योगाचार्य  नहीं समझ सकता। क्योंकि योग आदि के जरिये अपने देह को बनाने संवारने का सुख इस समाज में उन्हीं के लिए सम्भव है जिनको मेहनत नहीं करनी पड़ती बल्कि  वे तो दूसरों की मेहनत का सुख-भोग करने को ही  जीते हैं। यह जीना  भी  कोई जीना  है! जबकि  यहाँ धरती पर लेटा  धरती का लाडला बेटा उन सब से अलग है और -

मत छेड़ो उसे ऐसे  में 
धरती  के लाडले  बेटे का 
माँ से सीधा  संवाद  है यह
माँ पृथ्वी दुलरा  -बतिया रही है
सेंकती सहलाती उसकी
पिराती पीठ
बिछावन दुभाषिया  है यहाँ
मत बात करो 
आलीशान गद्दों वाली चारपाई की 
वंचित होता / चूक जाता 
स्नेहिल स्पर्श
खालिस दुलार
कि तमाम खालिस चीजों के बीच 
सुविधा एक बाधा  है"

सुविधा  एक बाधा है। मध्य वर्ग  सुविधाओं के दायरे में  जीने और उसके गिरफ्त में बंधे रहने के चलते वह प्रकृति और जीवन के  स्वाभाविक  ताप से दूर होता जाता है। गलाकाटू प्रतिस्पर्धा और दिखावटी  जीवन उसकी  जरुरत  और  कमजोरी  दोनों  है।  उसके सुख के पैमाने उसे बोझिल और ऊबाऊ बनाते हैं। वह उनसे निकलने की चाहत में ही शायद दिशाहीन दौड़ लगाता हो। वह और अधिक अधिकार की भागमभाग में उलझता घिरता जाता है। और उसकी गर्वोक्ति अपनी निजी  मुक्ति की चाहत  उसे औरों को गुलाम बना लेने तक ले जाती है। लेकिन सुख नहीं पाता। पाये भी  क्यों जब तक उसकी मुक्ति की आकांक्षा में बहुतों की मुक्ति का स्वर नहीं निकलता यानि वह जब तक एक प्रकार से जन समुदाय से कटा रहता है। धरती से कटा तबका   मामूली सी दिखने वाली मिट्टी तक से हार जाती है। कवि यहाँ “मिट्टी में मिलाने और धूल चटाने" जैसे बहुप्रचलित मुहावरों को कुछ इन नये अर्थों में प्रयोग करता है वह भी  चमत्कृत करने या कोई  बहुत असामान्य बात कहने के लिए नहीं बल्कि यहाँ भी  जानी-पहचानी सी लगने वाली  जरूरी  बात करता मिलता है –

“मिट्टी में मिलाने 
धूल चटाने जैसै उक्तियां
विजेताओं के दंभ से निकली
पृथ्वी की अवमानना है
इसी दंभ ने रची है दरअसल
यह व्याख्या  और व्यवस्था
जीत और हार की"

विजेताओं और पराजितों के इतिहास में किनका नाम दर्ज है। अमूमन उनका जिनका धरती से लगाव नहीं बल्कि इस पर शासन करने की मंशा रही है। समय इन पर मिट्टी डालता जाता है। बचता है तो सिर्फ जीवन। मिट्टी से जुड़ कर जीवन जीने और जीवन की जरूरी भौतिक सम्पदाओं को देने वालों का  जीवन। जो कहावतों-मुहावरों और जनश्रुतियों में अलिखित सा दर्ज रहता है। उन पोथियों  में नाम  दर्ज नहीं होता जिनकी राह शासन सत्ता से हो कर गुजरती है। और वे दर्ज भी  इसीलिए करते कराते  हैं कि उनके नाम गुम हो जाने की ज्यादा सम्भावना होती है यह चिन्ता ही उन्हें और छोटा-कमतरी का शिकार  बना देती है। लेकिन ये विजेय बने रहने की आकांक्षा पाले  शासक वर्ग  के अनुगामी  बार-बार भूल जाते हैं कि  उनका भविष्य में मिट्टी में दफ़न होता रहा है।  जन-कवि  केदार नाथ अग्रवाल के शब्दों में जो
"
जीवन की धूल चाट कर बडा हुआ है" वह ही धरती का वास्तविक स्वाद  जानता  है।

“कौन समझाये  इन्हें  कि सिर्फ
हारने  वाला  ही नहीं
मिलता  है मिट्टी  में
यह भी  कि धूल चाटने वाला ही
जानता  है असल में
मिट्टी  की महक 
धरती का स्वाद"

इसी क्रम में इस संकलन में कारीगरों की जिंदगी को दिखाते उनके श्रम सौंदर्य का बखान करते  कई एक कविताएँ  हैं मसलन "पत्थर चिनाई करने वाले" व 'रंग पुताई करने वाले'। जिसमें वे उनकी जिंदगी को उनके काम से अलग करके नहीं दिखाते  हैं बल्कि उसी में नत्थी हो कर गतिशील दिखाते बोलते बतियाते मिलते हैं। निम्नमध्यवर्गीय जीवन की तसवीर यहाँ अपने पूरे चारित्रिक रेखांकन के साथ आत्मारंजन की कविता  में दीख  पड़ती है। जिन विषयों पर उनके समकालीन कवियों ने कम ही लिखा  है। जैसे  कि उनकी तीन कविताएँ 'दुकानदारों’ पर  हैं। वे उसके ग्राहक  के लिए "रसीली जुबान"  में सत्कार करते सम्बोधन  के साथ ऐसे पेश आता है मानों जीवन जगत का आत्मीय सौंदर्य-बोध का वह बेताज बादशाह  हो। बच्चों को पुचकारने  से ले कर ईश्वर के प्रति  उमडती आस्था  देख कर  लोग उसे महान कवि, कला प्रेमी या पहुँचा  हुआ दार्शनिक  माने बगैर नहीं रह सकते। उस के व्यक्तित्व  का उजला  रूप इन शब्दों तक आते-आते अपना अर्थ बदल  देता  है जब कविता कहती है अपने दुकानदार  के बारे में –


पूजा घर के ठीक नीचे
जरा ओट में है बही और गल्ला
जिनके आसपास
खामोश चमक रही  कुछ इबारतें
जैसे  - 'आज नकद कल उधार'
'ग्राहक और मौत का 
कोई भरोसा नहीं...' और
'ग्राहक ही ईश्वर  है।'


(
दुकानदार : संदर्भ एक)

बेचने खरीदने  में ही अपने जीवन की कुशलता  तलाशते निम्न मध्य-वर्ग की त्रासद जीवन स्थितियों को "तोल मोल में माहिर : संदर्भ तीन" कविता में कवि कुछ इन अर्थों में व्यक्त करता  है कि क्या जीवन का मूल्य सिर्फ   चीजों की कीमत में तय होती रहेगी। इसमें वह क्या है जिसकी मूल्य नहीं किया जा सकता। जीवन  बना लेने की अंधी और डंडीमार दौड़ में बस जीवन छोड सब कुछ रह जाता है। जीवन का स्वाद नहीं मिल पाता। यहीं कवि आत्मारंजन की अपनी काव्यात्मक विशेषता  और मानवीय उदात्तता  का परिचय मिलता है। वे हमारे सामने समाज के सबसे दलित बंचित तबके के पक्ष में खड़े हो कर या सामाजिक  अन्तर्विरोधों  की बात करने के बावजूद  वे मनुष्य  न हो पाने की आकांक्षा  को नहीं भूल पाते। यह उनकी सम्पूर्ण काव्यजगत का केन्द्रीय  काव्यात्मक गुण कहा जाय  तो गलत नहीं  होगा। अपने समय की विडम्बनाओं और अन्तर्विरोधों भरा जीवन जीने के अभिशप्त जन की मानवीय  जरुरत को बार-बार संस्पर्श  करते  हैं। वह भी  पूँजीवादी तंत्र की, अमानवीय बनाने वाले तंत्र  की आलोचनात्मक  चीरफाड़ करते हुए, मेहनती कौम के श्रम सौंदर्य का बखान करने के बावजूद विरोधी वर्ग  में जीवन के उल्लास की आकांक्षा जगाते मिलते हैं। वह भी  उनके पूँजी केन्द्रित, सुविधाजनक जीवन-शैली के पीछे की निस्सारता  बताते  हुए। तब उनका कवि कर्म सम्पूर्ण सामाजिक मुक्ति की मानवीय जरुरत का आख्यान बन कर हमारे सामने आता है। वे निश्चित तौर संघर्षशील जन के कवि हैं लेकिन पूरी मानवता को मुक्ति कराने की आकांक्षा से लैस कवि  भी  हैं। यही उनकी  मूल  सीफत बनती दिखती  है। और जानते हैं कहाँ चोट करनी  है और कहाँ गरिमापूर्ण जीवन के साथ आ खड़ा  होना  है।

                    
4

स्त्री  मुक्ति के  सवाल पर बात करते हुए  उनकी  कई  कविताएँ हमारे सामने बिलकुल जानी-पहचानी तस्वीर के साथ कुछ नये सवाल ला खड़ा करती हैं। मसलन उनकी एक छोटी सी कविता "हँसी वह"  प्रस्तुत  है  -

जी खोल कर हँसी वह 
पूरे वेग से 
उसकी पारदर्शी  हँसी
सुबह की ताजा  धूप-सी 
हवाओं  में छिटकी
फिर अचानक  सहमी 
ठिठकी  वह 
आया ख्याल
ऐसे  हँसना नहीं  चाहिए  था उसे
वह एक लड़की  है 
उसके ऊपर  के दाँत 
बेढब  हैं 
कुछ बाहर को निकले हुए।

कविता  के पहले बंद में हमें  निश्छल पवित्र हँसी  अपनी ओर खींच लेती है। सुबह की ताजी धूप सी पसरी हर ओर  छिटक कर  पूरे परिवेश को अलग रंग दे देती  है।  वह बंधती नहीं है। लेकिन ज्यों ही हमारे  सामाजिक  ताने-बाने और उसमें पैबस्त मूल्य व मान्यताएँ जो एक लड़की की सुन्दरता का पैमाना  शारीरिक सुन्दरता, रंग, गढ़न या  बुनावट से ही सब कुछ तय करती है। यह याद आते  ही उन्मुक्त पवित्र हँसी मजबूरी की मुस्कराहट में बदल जाती  है ।

“आया ख्याल
ऐसे हँसना नहीं था उसे
वह एक लड़की है"

यह पंक्ति  इस "सभ्याचार" से लदे-फंदे समाज पर  मर्मभेदी  तीखी टिप्पणी है। हमें अन्दर तक परेशान कर देती है। कचोटती सी  पंक्ति है यह। यहाँ कवि  हमारे समाज में सौंदर्य के स्थापित  मापदंडों से अलग अनभिजात्य सौंदर्य को हमारे सामने ला खड़ा करता है। जो कि  अपने समाज की बद्धमूल  अवधारणाओं को ही प्रश्नांकित नही करती है बल्कि मनुष्यत्व की राह में कितने कदम अभी  चलना बाकी है इसकी जरुरत भी बताती है। एक तरफ पारदर्शी पवित्र हँसी जिसकी जद में पूरी प्रकृति  शामिल हो जाती है वहीं मानव निर्मित  समाज  की निगाह  की कमतरी, सुंदरता की वास्तविक छवि बांधी जाती सी है। यह कविता पढ़ते हुए निराला की कविता  "रानी  और कानी" का याद आना स्वाभाविक है। सब कुछ में  निपुण  रानी  अपने आपके बारे में सोचते हुए अपने आप में सिमट कर रह जाती है। “मार खा रोयी नहीं" का दुख हम कहाँ  देख पाते हैं। सुनने की बात क्या कहें!

आत्मारंजन अपनी रचनात्मक ऊर्जा और आवेग अपनी परम्परा से प्राप्त  करते हैं। स्त्री मुक्ति  का तथाकथित आधुनिकतावादी विमर्श  में फँस कर वे निष्कर्षमूलक काव्यात्मक संवेदना से अपने कथ्य की परिपूर्ति कर के  चुका नहीं जाते बल्कि  अपनी सामाजिक  वस्तुस्थिति को जीवन की सर्वांगिकता में व्यक्त करते हैं। इसी में उनकी काव्य प्रविधि भी छुपी   है। उनके काव्य शिल्प की बुनावट इस तरह से आपस में गुंथी बुनी है कि इन्हें  अलहदा कर देख सकना सहज नहीं। हम पाते हैं कि इन काव्य पंक्तियों का सृजनकर्ता जीवन की अन्यान्य कई एक  छवियों  को  ठहर कर देखता है, कुछ भी  अनदेखा कर, 'पास आउट 'कर गुजर नहीं जाना चाहता। इसीलिए  आन्तरिक गठन में गतिशील  होने के बावजूद काव्य पंक्तियां हड़बड़ी का शिकार नहीं हैं। मद्धिम गति से जीवन का आस्वादन करती कराती चलती हैं। और सहृदयों  को पंक्तियों के मध्य बचे अवकाश में भी  जीवन की धड़कन सुनने के लिए आहिस्ता से  रोक रोक लेती हैं । इसीलिए मुझे "पगडंडियां गवाह हैं" की कविताओं से गुजरते हुए कई एक बार पूरी कविता उद्धृत करना पड़ा। और जब कभी भी   मन मार कर कुछ पंक्ति दर्ज की;  कविता की मूल ध्वनि  लगातार पीछा करती रही। यह है इन कविताओं की ताकत  जो कि समकालीन युवा कविता की मजबूत आवाज के रूप में हमारे आसपास को  ध्वनित कर  रही है। यहाँ कवि की कविता   जीवन के द्वन्द्व और आकांक्षाओं  को अपनी पंक्तियों  के मध्य अवकाश में भी, चुप्पी में भी अनकहा रहे जा रहे समय को तलाशती हैं, महसूसती हैं। यह आधुनिकता तथाकथित "मार्डनिटी"  या फैशनेबुल आधुनिकता नहीं  है। बल्कि  जीवन में धंसे सवालों  से  रूबरू होने पर जनमती है, अग्रसरित होते हुए  हमें अपनी परम्परा  की सीमाओं और शक्तियों से परिचित कराती  है। प्रगतिशील कवियों में जनकवि  त्रिलोचन की आधुनिकता का उत्स भी  सहज सामान्य जीवन में अपनी जगह तलाशती है। यहाँ ऊपर से मूल्य-निर्धारण नहीं है जैसा कि तमाम अन्य कवियों के भाषागत और काव्यगत योगदान में हम पाते हैं। इसके   बरक्स वे  सामान्य जीवन के सामान्य प्रसंगों को बिना 'मोडीफाई' किये उसे हूबहू  दर्ज करते हैं। उनमें जनमते अन्तर्विरोधों के स्वाभाविक चरित्र से पहचान कराते हैं। त्रिलोचन की कविता इसी मायने में हमारे समाज के क्रियाशील जीवन की कविता बन कर उनसे उभरते जनमते नये सवालों और चिन्ताओं से  हमें संस्कारित करती है। उन सामाजिक चुनौतियों के प्रति सोचने को विवश करती है। यही उनकी कविता की ताकत है जो बारंबार अपने साहित्यिक अग्रजों  गालिब, निराला,  तुलसी, कबीर की ओर देखती  मिलती है। "चम्पा काले अच्छर नहीं चीन्हती", “नगई महरा"  जैसी तमाम कविताएँ इसका जीवंत  प्रमाण हैं। उसी प्रगतिशील परम्परा का विकास हमें युवा कवि आत्मारंजन की कविता  में भी  दिखाई देता है। वह चाहे लोक चरित्रों  को ले कर लिखी गई कविताएँ हो या सामान्य जीवन की दैनंदिन  छवियां हों। आत्मारंजन के  यहाँ न तो  स्त्री बनाम पुरुष का आधुनिकता वादी चलताऊ विमर्श है और न ही  सामाजिक वस्तुस्थिति में स्त्री की आधुनिक छवियों में कैद  तसवीरें हैं। यहाँ सतह पर  दिखने में  परम्परागत  लग सकता है, वास्तव में यहाँ अपनी  देशज जमीन से  उठती वे  तमाम छवियां हैं जिनमें हमारे समय का सारभूत सत्य झांकता नजर आता है।  जो कर्मरत रह कर भी  अपने होने की जरुरत खोजती-बीनती मिलती है। "पगडंडियां गवाह है" की पहली ही कविता "कंकड़ छांटती”  स्त्री   का एक ऐसा गतिशील  चरित्र हमारे सामने ला खडी करती है जो अन्यतम है। भागते हांफते समय के बीचों-बीच' 'काम से लौटने' के  बाद दाल छांटने बैठी स्त्री"  पूरे इत्मिनान से टांगे पसार बैठ गई है गृहस्थ मुद्रा में"  वह महज दाल नहीं  बीन रही बल्कि  दुनिया को निष्कंकर करने में जुटी है। और यहीं पर कवि उसके मन में चल रहे तमाम सवालों को मानो छू लेना चाहता है कि-

एक स्त्री  का हाथ है यह 
दानों के बीचोंबीच पसरा स्त्री  का मन
घुसपैठिये तिनके, सड़े पिचके  दाने तक 
धरे जाते हुए
तो फिर कंकड़ की क्या मजाल!
एक पुरुष को
अनावश्यक ही लगता रहा है यह कार्य
या फिर तीव्रतर होती जीवन की गति का बहाना
उसकी  अनुपस्थिति  दर्ज होती है फिर
दानों के बीचोंबीच
स्वाद की अपूर्णता में खटकती 
उसकी  अनुपस्थिति 
भूख की राहत के बीच 
दांतो तले चुभती 
कंकड़ की रड़क के साथ 
चुभती रड़कती है उसकी अनुपस्थिति
खाद्य और खाने की 
तहज़ीब  और तमीज बताती हुई"

हमारे समाज को सुंदर और सभ्य बनाने में, तहज़ीब व तमीज से जीने लायक बनाने में जब तक पुरुष 'जीवन की व्यस्तता' का बहाना बना कर अलग-थलग रहेगा सामाजिक  मुक्ति का सवाल अधूरा रहेगा।  एक सामान्य दैनंदिन जीवन का प्रसंग अपने कथ्य में कितने जरूरी  कार्यभार  सहेजे है और सक्रिय है वह "कंकड़ बीनती" कविता बेहतर तरीके से कह दे रही है। आधी आबादी की आवाज भागेदारी की भंगिमा में उठाने की शैली  कवि आत्मारंजन की अपनी कहन शैली है। एक स्त्री  के मन में खदबदाते  और उठते गिरते सवालों को, आशाओं को हम नजदीक से कितना जानते हैं और कितना  जानने की कोशिश करते हैं। हाँडी " नामक कविता  में कवि इस  स्त्री  से पूछ ही पड़ता है –

"
सच-सच बताना
क्या रिश्ता  है तुम्हारा  इस हाँडी  से
माँजती हो इसे रोज
चमकाती  हो गुनगुनाते  हुए
और छोड़ देती  हो 
उसका एक हिस्सा
जलने की जागीर सा
खामोशी  से”

“हाँडी”  की भाँति   जीवन की आग पर खुदबुदाती, गुनगुनाती स्त्री  को एक पुरुष कितना पहचानता  है। यह यक्ष प्रश्न  उन तमाम लोगों  से हैं जो "स्त्री  मुक्ति के प्रश्न”  का कारोबार करने में मुब्तिला हैं। और उनसे  भी  जो स्त्री  को "न जाने जा सकने" वाली पंक्ति में बांध कर देखना चाहते  हैं और उसे इस प्रकार महज चली आ रही  रूढ़ियों पर एक नया ठप्पा लगा कर बैठ जाते हैं। विमर्श के नाम पर जो विद्वतजन विचारों की फेरी लगा रहे  हैं महज बाजार की मांग पर  दिखावटी मुक्ति की ऐसी मुहिम चला रहे  हैं जो स्त्री को सामाजिक बेड़ियों से मुक्त करने के नाम पर चमकदार लिहाफ और चकाचौंध भरी दुनियादारी के सिंकजे में जकड़ देने में लगे हैं। मुक्ति के नाम पर स्त्री  की विज्ञापनी छवि उसे मुक्त नहीं करती बल्कि मौजूद पूँजीवादी व्यवस्था  --बाजार तंत्र उसकी मासूमियत और छवि का वस्तुकरण करता है, उसे माल की तरीके से पेश करता है। मौजूदा लोभ लाभवादी संस्कृति में मुस्कान तक बिकाऊ है। इस तंत्र में स्त्री  चाहे अनचाहे नये किसिम के, आधुनिक कहे जा रहे समय के मकड़जाल में स्वयमेव गिरफ्त होती नजर आती है। तथाकथित विमर्श  और बाजारवादी बहेलियों के जाल में मुक्ति की आकांक्षा पाले  स्त्रियों  का आखेटन जारी है। जब कि यह मुक्ति नहीं बल्कि 'मुक्ति की आग का व्यापार’ है –

"आँच का व्यापार भी  है
हर तरफ जोरों पर
सतरंगे तिलिस्मी प्रकाश की चकाचौंध में
उधर टी. वी.  पर भी  रचा जा रह
आँच का प्रपंच
जरूरी है आग
और उससे भी  जरूरी है आँच
नासमझ हैं 
समझ नहीं रहे वे 
आग और आँच का फर्क 
आग और आँच का उपयोग 
पूजने से जड़ हो जाएगी
कैद होने पर तोड़ देगी दम
मनोरंजन मात्र नहीं हो सकती
आग या आँच
खतरनाक है उनकी नासमझी "

(औरत की आँच)

आत्मारंजन की कविता का स्थापत्य किसी एक रूपक या प्रतीक के सहारे से  ज्यादा  अपनी समग्र बुनावट में ज्यादा ताकतवर बन कर अपनी बात कहती है। अधिकांश कवि चमकती काव्य पंक्ति या कुछ बड़ी सी लगने वाली पंक्ति को कविता में सचेतन विन्यस्त कर अपनी सजगता का  परिचय देते हैं। और हम कविता में उसकी समग्र ध्वनि और अन्तर ध्वनि  को पहचानने सुनने की बजाय उन्हीं पंक्तियों पर लहालोट हो अपनी ममता लुटा देते हैं जबकि यह कविता की "खण्डित तस्वीर" है। वास्तविकता में एक  महत्वपूर्ण कवि का  काव्य कर्म समग्रता में अपनी अर्थ-छवि और भाव-छवि लिए होती है। उसे खंडो और अंशों में व्यक्त करने की बजाय उसकी समग्र बुनावट में ही समझा जा सकता है।  निराला यूँ ही नहीं  कविता के समग्र छवि की तुलना  एक पुष्प गुच्छ से करते हैं। जिसके वृंत, कलीपरागकण और गंध मिल कर उसकी छविमयता और अर्थमयता रचते हैं न कि उन्हें अलगा कर, या कि विलगा कर। हम आत्मारंजन जी की कविता को पढ़ते समझते यही पाते हैं। इसमें विचार गुंथा है लेकिन उसकी समग्रता के रंगरोगन के साथ  न कि ऊपर से चमकदार दिखने के रूप में। समकालीन युवा कवियों में आत्मारंजन की कविता  विचार-बोध और भाव-बोध दोनों धरातलों पर अपने को पूरी कलात्मक सौंदर्य के साथ फलीभूत करती है।  उनकी कविता की सामाजिक भूमिका  अपने समस्त  कलात्मक मायनों के संग - संग  अपने कवि दायित्व का निर्वहन करती हुई आगे आती  है। 

‘पगडंडियां गवाह हैं' काव्य संकलन की तमाम कविताएँ  अपने समय काल की सच्ची जद्दोजहद से जन्मी कविताएँ हैं। अपने वजूद के साथ धूल मिट्टी और पसीने से भिदी नाक नक्श लिए। इसीलिए इनका कलरव एक तरफ  जहाँ  जीवन राग का गान   लिए हुए   हैं  तो दूसरी तरफ बुज़ुर्ग हों या बच्चे उनके प्रति बदलते हमारे दृष्टिकोण को प्रश्नांकित सी करती मिलती हैं। बच्चों की  जिंदगी  में प्रवेश कर चुके तमाम इलेक्ट्रॉनिक  सामान हमारी उंगलियों की जगह लेती जा रही है। आखिर बच्चों को  हम कितना समय दे पाते हैं? उन्हें कितना समझते हैं? भागदौड़ भरी ज़िन्दगी  में अपनी उम्मीदों का बोझ हम उन कंधों पर लादने की कोशिश करते हैं जिन्हें कदाचित ही हम उनकी निगाह से समझने की कोशिश करते हैं। कवि ने बिना किसी अमूर्तन के आज की वास्तविक सच्चाई और उसके अन्तर्विरोधों को रखने में कोताही नहीं की। जब आज के माता पिता के कानों में  मोबाइल की लीड लगी है। अपनी दुनिया में हम डूबे हैं । ऐसे में बच्चे की आवाज हम तक कहाँ आ पाती है। ऐसे में खींजता हुआ रुआंसा बच्चा आपकी उंगली की पकड़ से निकल जाना चाहता है। आप के साथ से ज्यादा सुकून उसे वीडियो गेम या रिमोट में नजर आ रहा है। 

'उसका इस तरह सोचना
इस सदी का एक खतरनाक हादसा है 
बहुत जरूरी है कि कुछ ऐसा करें 
कि  बना रहे यह 
अंगुलियों का स्नेहिल  स्पर्श
और जड़ होती सदी पर 
यह नन्हीं  स्निग्ध पकड़
कि इतनी ही नर्म  ऊष्म 
बची रहे यह पृथ्वी
    
(नई सदी में टहलते हुए)

दुनियादार  बनते समय में बच्चों की मासूमियत छीजते देखना अपनी नई पीढ़ी के  सुकोमल मनो-मस्तिष्क का अकाल पोढा़ते जाने  को देखना   है। दुखता है यह।  यह किसी भी  किसिम से उपयुक्त नहीं है। "उम्र से पहले" कविता  की अंतिम पंक्तियां अपने समय से चुभता सवाल सी करती हैं

"यह खुशी की नहीं, चिंता की बात है दोस्त!
कि उम्र  से पहले बड़े  हो रहे हैं बच्चे।"

इस प्रकार हमारे सामने कवि आत्मारंजन का यह संकलन जीवन की बहुविषयक  सरोकार समोये हम सबसे  मुखातिब  है। यहाँ  कविता  के लिए कविता नहीं है वह चाहे "ओ जुल्फिया रे" के बहाने की आदिम ग्रामीण  सामूहिकता की आवाज हो या गमला  सरीखे अपने आप  में सिमटता  जा रहा  तथाकथित  शहरापा हो जहाँ छज्जे की ओट में भी   किसी दूसरे के लिए जगह नहीं  है। यह आत्मकेंद्रण नई सभ्यता  के जीवन में  मौजूद  फांक  को दिखाती है   आत्मारंजन की कविता  महज  बयान की कविता नहीं बल्कि ज़िन्दगी से सरोकार की कविता है। जिसे कई बार पढ़ने और निकट आ कर महसूसने की जरुरत  है। 



 
सम्पर्क
आशीष सिंह
E -2 / 653, सेक्टर-F
जानकीपुरम, लखनऊ- 226021

मोबाईल – 08739015727




समीक्ष्य कृति का नाम – पगडंडियां गवाह  हैं  

कवि - आत्मारंजन 

प्रकाशक  --अंतिका प्रकाशन 
सी-56/ यू जी एफ-4
शालीमार गार्डन