उदय प्रकाश की कहानी मोहन दास पर विजय शर्मा की विवेचना



उदय प्रकाश
किसी भी रचनाकार के लिए अपने शिल्प और कथ्य से बाहर निकल कर नए शिल्प और कथ्य में रचने की एक बड़ी चुनौती होती है। जो इसे नहीं कर पाते वे अपनी रचना में खुद को ही दुहराने लगते हैं और कुछ नया नहीं रच पाते। महाप्राण निराला बहुत हद तक अपनी रचनाओं में अपने नए शिल्प रचने के लिए जाने जाते हैं सौभाग्यवश हमारे समय के चर्चित रचनाकार उदय प्रकाश भी इस कला में माहिर हैं। उदय प्रकाश अपनी हर रचना के साथ नए शिल्प और कथ्य रूप में अवतरित होते हैं। यही कारण है कि उनकी हर कहानी एक लम्बे समय बाद भी पढने पर नयी लगती है और लम्बे समय तक चर्चा में बनी रहती है। ‘मोहन दास’ उदय प्रकाश की वह चर्चित कहानी है जिसने काफी प्रसिद्धि पायी। साहित्य अकादमी ने उन्हें इस लम्बी कहानी के लिए प्रतिष्ठित अकादमी पुरस्कार प्रदान किया। इस कहानी की एक विवेचना की है मशहूर आलोचक और फिल्म समीक्षक विजय शर्मा ने। तो आइए पढ़ते हैं विजय शर्मा का यह आलेख ‘मोहनदास : समाज की विडम्बना पर अँगुली धरना।’  

मोहनदास: समाज की विडंबना पर अँगुली धरना

विजय शर्मा
मेरे पसंदीदा रचनाकारों में एक नाम है उदयप्रकाश। वे बहुमुखी प्रतिभा के रचनाकार हैं। उदयप्रकाश हिन्दी के चर्चित और बहुपठित कथाकारों में से एक हैं। यह बात दीगर है कि वे कविताएँ भी बहुत सुंदर लिखते हैं और उनका नॉनफ़िक्शन भी उच्च कोटि का होता है। सुनो कारीगर’, अबूतर-कबूतर’, रात में हारमोनियम’ नामक उनके कविता संग्रह हैं। दरियाई घोड़ा’, तिरिछ’, पाल गोमरा का स्कूटर’, पीली छतरी वाली लड़की’ आदि उनके कहानी संग्रह हैं, जिनमें इन्हीं शीर्षकों की लंबी कहानियाँ भी शामिल हैं। विश्व साहित्य से अनुवाद में भी उनका शानी नहीं है। फ़िल्म निर्माण में भी उन्होंने अपना हाथ सफ़लतापूर्वक आजमाया है। इस प्रतिभावान रचनाकार की ओर मेरा ध्यान सबसे पहले उनकी कहानी तिरिछ’ ने आकृष्ट किया। मार्केस की भाँति अतियथार्थवाद शैली की तर्ज पर चलती हुई यह कहानी बहुत दिन तक मन पर हावी रही। अभी हाल में पुन: यह एक पत्रिका में प्रकाशित हुई तो फ़िर पढ़ा और फ़िर काफ़ी दिन मन को हाँन्ट करती रही।



लंबी कहानियों के लिए प्रसिद्ध उदय प्रकाश की हर कहानी अपनी पिछली कहानी से अलग होती है। वे अपने ही बनाए विधान में फ़िट नहीं होते हैं मानो हर बार कहानी रचने के बाद स्वयं ही उस विधान, उस खाँचे को भंग कर देते हैं, जैसे पीने वाले पीने के बाद प्याला तोड़ देते हैं या मृत्यु-दंड सुनाने के बाद न्यायधीश अपनी कलम की नोंक तोड़ देता है। लगता है हर बार कहानी लिखने के साथ एक उदय प्रकाश समाप्त होता है और नई कहानी के साथ एक नए उदय प्रकाश का जन्म होता है। ‘एक कहानी, एक उदय प्रकाश’। कहानी मोहनदास’ के साथ भी एक नए और विशिष्ट उदय प्रकाश का जन्म होता है। यहाँ हम एक नए उदय प्रकाश को पाते हैं। एक ऐसा उदय प्रकाश जो कहानी के बीच-बीच में खुद उपस्थित होने का मोह संवरण नहीं कर पाता है और पाठकों को तमाम सूचनाएँ थमाने सामने आ जाता है इस बात की चिंता किए बिना कि इससे कथा-रस में व्यवधान पड़ रहा है। यह एक काफ़ी लंबी कहानी है। इसे लघु उपन्यास भी कहा जा सकता है। पहले यह एक पत्रिका में प्रकाशित हुई और बाद में पुस्तक के रूप में और अब तो इस पर एक फ़िल्म भी बन चुकी है जिसे देखने का अवसर भी मुझे मिला। कहानी और फ़िल्म दो भिन्न विधाएँ हैं अत: इनमें अंतर है। यह अंतर कहानी मोहनदास और फ़िल्म मोहनदास में भी है। मगर उसकी बात फ़िर कभी और। यहाँ सिर्फ़ मोहनदास कहानी की बात।

अपनी किस्म के विशिष्ट कहानीकार उदय प्रकाश की कहानी मोहनदास’ एक डरे हुए व्यक्ति की कहानी है। असल में यह आज के हर आम इंसान की कहानी है। एक साधारण परिवार के प्रतिभावान व्यक्ति की कहानी जो समाज की क्रूरता का शिकार है। जिसका परिवार मेहनती होते हुए भी गरीब है। पूरा परिवार दिन-रात काम करके भी भूखा-नंगा है। जिसके पास इलाज के लिए फ़ूटी कौड़ी (कुछ लोगों को इस कौड़ी शब्द से आपत्ति हो सकती है क्योंकि अब यह चलन में नहीं है अब तो क्रेडिट कार्ड होता है) नहीं है। सौरी के बाद पत्नी को ढ़ंग की खुराक जुटाने का उपाय नहीं है, इस आदमी के पास। ऐसे आदमी को जीने का क्या हक!



ईमानदार होते हुए भी मोहनदास दर-दर की ठोकरें खाता है। असल में यह आज के हमारे समूचे दौर की क्रूर सच्चाई है। ईमानदार आदमी की आज यही नियति है। सत्ता में बैठे लोगों का भ्रष्टाचार आज किसी से छिपा नहीं है। हालात यह है कि यह भ्रष्टाचार इतना सर्वव्यापी हो चुका है कि आज यह कोई मुद्दा रह ही नहीं गया है। मगर जो लोग सत्ता में नहीं हैं, उनकी हालत भी जगजाहिर है। यह कहानी हमारे समय और समाज का आईना है। आम आदमी के भय के साथ कहानी प्रारंभ होती है। भय का अस्तित्व इतना सर्वग्रासी है कि आदमी अपनी पहचान खोने को राजी है। वह हलफ़नामा उठ कर कहने को तैयार है कि वह मोहनदास नहीं है। ऐसा भय जो व्यक्ति को बदहवास किए हुए है। यह वह व्यक्ति है जो हमारे आस-पास हर जगह मौजूद है, शायद कहीं हम खुद ही हैं मोहनदास। यह हर उस व्यक्ति की कहानी है जिसे पानी पीने के लिए रोज कूँआ खोदना होता है और जिसे रोटी खाने के लिए नित नई फ़सल पैदा करनी होती है। नहीं यह इस आदमी से भी अधिक बदहाल आदमी की कहानी है क्योंकि इसके पास न तो कूँआ खोदने और फ़सल उगाने की जमीन है और न ही आज इसके पास कूँआ खोदने और फ़सल उगाने का अधिकार सुरक्षित रह गया है। हमारे इसी समाज और समय में ऐसे बहुत सारे लोग हैं जिनके पास अधिकार, धन, सत्ता सब कुछ है केवल एक चीज के अलावा। जो चीज इनके पास नहीं है वह है ईमानदारी। विड़म्बना यह है कि इन लोगों की तादात दिन-पर-दिन बढ़ती जा रही है। इसके प्रतिपक्ष में है ईमानदार आदमी, भयभीत आदमी। सत्ताहीन आदमी।



चलती कहानी के बीच में कहानीकार स्वयं उपस्थित होकर कहता है कि वह अपने समय और समाज की जिंदगी का ब्यौरा दे रहा है। पर वह यथार्थ को ज्यों-का-त्यों प्रस्तुत नहीं कर-कह रहा है। असल में फ़ंतासी और यथार्थ को मिला कर अपनी कथा रच रहा है। फ़ंतासी के लेखक को काफ़ी छूट होती है और वह किस्सागोई को भी बनाए रखती है। नाम और कई अन्य समानताओं के चलते कहानी पढ़ते हुए यह आभास बराबर बना रहता है कि कहीं यह महात्मा गाँधी को नायक बना कर रची गई कहानी तो नहीं है। इसी तरह इस कहानी की कई बातें स्वयं उदय प्रकाश के जीवन से मेल खाती हैं। परंतु कहानीकार एक बार स्पष्ट कर चुका है कि राष्ट्रपिता के नाम और उनसे संबंधित बातें मात्र संयोगवश इसमें आई हैं, वरना इनका कहानी से कोई रिश्ता नहीं है। पाठक लेखक की इस बात पर कितना भरोसा करे या करता है यह सोचने की बात है। कहानी में उन्नाव के पास के गढ़ाकोला के सूर्यकांत, मुक्तिबोध, बुश और लादेन भी हैं तथा प्रेमचंद और उनका समय भी कहानी में आया है। कहानी एक लंबे कालखंड और कई नामी-गिरामी लोगों को समेटे हुए है।



कहानी का मोहनदास पढ़ने में तेज था और अपनी मेहनत और लगन से प्रथम श्रेणी में बी.ए. करता है। वह अपनी बिरादरी का पहला बी.ए. पास युवक है। यह बात दीगर है कि हर बार लिखित परीक्षा पास करने के बावजूद साक्षात्कार में सदा छँट जाता है या यूँ कहें छाँट दिया जाता है। खुदा न खास्ता एक बार उसका चयन भी हो जाता है। लेकिन फ़िर उससे भी बड़ी मुसीबत उसके सामने खड़ी हो जाती है क्योंकि उसका नाम रख कर कोई और उसकी नौकरी  हड़प लेता है। सीधा-संकोची मोहनदास स्वाभिमानी है अत: वह हाकिमों को कुछ खिलाता-पिलाता नहीं है जाहिर-सी बात है, वह इसका दंड भोगता है।



इस व्यक्ति की असहायता पाठक के मर्म को झिंझोड़ डालती है। आदमी अपनी संतान को देख कर प्रसन्न होता है लेकिन अपने नवजात बेटे को देख कर मोहनदास का कलेजा दहल उठता है क्योंकि अब एक और पेट पालने की समस्या आ खड़ी हुई है। जबकि पहले कहा जाता था कि एक मुँह के साथ दो हाथ भी आते हैं। मगर अब समय बदल चुका है। सिर्फ़ हाथ होने से आज कुछ नहीं होता है। इस असहाय व्यक्ति मोहनदास को अपने अनुभव से ज्ञात है कि इस समाज में प्रमाण-पत्र, अंक-सूची का कोई महत्व नहीं है। नौकरी पाने के लिए दूसरी कई अन्य योग्यताओं का होना आवश्यक है जो उसके पास नहीं है। असल जिंदगी में आज दूसरों को पीछे ढ़केल कर आगे बढ़ने की योग्यता चाहिए। तमाम संपर्क, जोड़-तोड़ चाहिए, जिनसे मोहनदास का दूर-दूर तक नाता नहीं है। और तो और उसे तब सबसे बड़ा धक्का लगता है जब उसकी वाजिब नौकरी मोहनदास बन कर कोई और ले उड़ता है। कोई उसकी पहचान हड़प लेता है। वह अपनी पहचान साबित करने की हरचहंद कोशिश करता है लेकिन नाकामयाब रहता है। और अंत में जब वह यह साबित करने में जी-जान लगा देता है कि वह मोहनदास नहीं है, तब भी वह यह भी सिद्ध नहीं कर पाता है। इस सारी बदहवास भागदौड़ की व्यर्थता से वह विक्षिप्तता की हद छूने लगता है। तिरिछ’ का प्रमुख पात्र भी शहर की भूलभुलैया में सुबह से शाम तक बदहवास भटकता फ़िरता है। वह तो अंत में विक्षिप्त हो कर दम तोड़ देता है। मगर मोहनदास मरता नहीं है वह निरंतर मरते रहने के लिए जीवित (अगर उसे जीवित रहना कहा जा सकता है) रहता है। एक आदमी आज समाज और समय से टकरा कर लहु-लुहान होते हुए कैसे विक्षिप्तता की ओर फ़िसलता जाता है मोहनदास इसका जीता-जागता उदाहरण है। यह त्रासद मगर आज की एक सच्चाई है।



इस सीधे-सादे आदमी मोहनदास की समझ के बाहर है कि कोई आदमी किसी दूसरे आदमी की पहचान छीन कर कैसे मजे में रह सकता है। यहाँ मुझे केरल के नंबूदरी की कहानी याद आ रही है। नंबूदरी सीधे-सादे स्वभाव के व्यक्ति माने जाते हैं, छल-प्रपंच से कोसो दूर। एक नंबूदरी पहली बार बस की यात्रा कर अपने गाँव से शहर गया और संयोग से बस में उसका थैला, जिसमें उसकी समस्त जमा-पूँजी थी छूट गया। जब उसे याद आया तो वह वापस लेने बस तक गया। उसे यह जान कर बहुत आश्चर्य होता है कि कोई अन्य व्यक्ति उसका झेला ले कर चंपत हो चुका है। उसे स्वप्न में भी विश्वास न था कि कोई व्यक्ति किसी दूसरे का सामान ले जा सकता है। उदयप्रकाश की कहानी मोहनदास अपनी आँखों से देख रहा है कि कोई और आवारा, निकम्मा आदमी अपनी तिकड़म से मोहनदास बना बैठा और आराम से उसकी जायज नौकरी की कमाई हर माह उठा रहा है। यह व्यक्ति नौकरी के सारे अन्य फ़ायदे लूट रहा है जबकि वास्तविक मोहनदास के घर भूँजी भाँग भी नहीं है। यह दुष्ट-शातिर आदमी मोहनदास को उसके नाम से भी वंचित करने की साजिश रचता है तथा इसमें भी पूरी तरह सफ़ल होता है।



यह कहानी समाज में चल रहे भष्टाचार का मुखौटा उतारती है। समाज-सेवा के नाम पर अपनी जेब भरने वालों का पर्दाफ़ाश करती है। सरकारी तंत्र के महाजाल में फ़ँसे आम आदमी की छटपटाहट को मुखर करती है। बिना सोचे-समझे आदमी को गैरसामाजिक करार किए जाने पर व्यंग्य करती है। कहानी गरीबी में फ़लते-फ़ूलते प्रेम, वात्सल्य और ममता के रस-संचार को दिखाती है। साहित्यकार आगत की आहट सुनता है वह समाज को अपने लेखन से सचेत करता है। उदयप्रकाश कहानी के अंत की ओर आते हुए पाठक को कई सूत्र थमाते हैं। ये सूत्र सावधान करते हैं कि यदि समय रहते हम न चेते तो समाज में भ्रष्टाचार का बोलबाला हो जाएगा। युवक पलायन करने लगेंगे या फ़िर आतंकवाद की राह पर चल पड़ेंगे। कहा जाता है कि साहित्यकार भविष्यवक्ता होता है। यह कहानी कई साल पहले लिखी गई थी आज हम यह सब होता हुआ सरेआम देख रहे हैं।



उदयप्रकाश की कहानियों का न केवल शिल्प अनूठा होता है वरन वे बहुत बारीकी से अपने समय और समाज का निरीक्षण भी करते चलते हैं। नोबेल पुरस्कार प्राप्त कवि मिलोश कहते हैं कि कवि के पास डबल विज़न होना चाहिए। एक उसे चीजों को ऊपर से देखना चाहिए, दूर से निरपेक्ष भाव से, विस्तार से देखना चाहिए। दूसरा उसे निकट से देखना चाहिए। बातों को गहराई में, बारीकी से देखना-समझना चाहिए। उदयप्रकाश के पास दोनों विज़न हैं। वे चीजों को जितनी बारीकी से देखते हैं, उतने ही विस्तार में भी देखते हैं।



उदयप्रकाश की एक और विशेषता है वे भारतीय शहरी और गँवई दोनों परिवेशों से परिचित है। साथ-ही-साथ विश्व परिदृश्य पर भी उनकी पैनी नजर है। इतिहास, भूगोल भी कहानी में अपनी जगह बनाते चलते हैं, राजनीति पर भी लेखक की अच्छी पकड़ है। कहानी स्पष्ट रूप से बताती है कि यह सब प्रेमचंद युग में नहीं हो रहा है। यह हो रहा है इक्कीसवीं सदी में, अमेरिका के ट्विन-टावर गिरने के बाद के युग में अर्थात आज के युग में। आज व्यक्ति की योग्यता, उसकी डिग्री का कोई सम्मान नहीं है। (डिग्री जमा करने के तमाम हथकंडे सहज उपलब्ध हैं।) एक समय था जब कहा जाता था लोग आपके कपड़े नहीं आपका गुण देखते हैं (वैसे मुझे यह बात किसी युग में सही नहीं लगती है। क्या जनक के दरबार में अष्टावक्र पर सभासद हँस नहीं रहे थे?) आज उसके चमकते कपड़ों, उसके हेयर स्टाइल, उसके अकड़ कर चलने की पूछ है। अगर आपके कपड़े बेरंग, फ़टे या पैबंद लगे हुए हैं, अगर आपके बाल रुखड़े, खिचड़ी और बेतरतीब हैं, रंगे हुए नहीं हैं, अगर विपत्तियों ने आपके चेहरे की त्वचा पर से नरमाई-लुनाई समाप्त कर वहाँ छुर्रियाँ डाल दी हैं तो आप किसी ऑफ़िस में घुसने के काबिल नहीं रह जाते हैं। आपको वहाँ का चपरासी भी घास नहीं डालता है। एक समय के लद्धड़ लोग सत्ता पा कर आपको अपमानित करने, आपकी हँसी उड़ाने का लाइसेंस पा जाते हैं।



कहानी में नाटकीयता है। यह नाटकीयता उदयप्रकाश की विशेषता है। वे इस नाटकीयता को बखूबी निभा ले जाते हैं। उनकी अन्य कहानियों की भाँति मोहनदास में भी दु:ख, मानसिक प्रताड़ना, संघर्ष, खीज, बेबसी और लाचारी का बड़ा मार्मिक चित्रण हुआ है। इस खूब लंबी कहानी में निरंकुश शासकों की बर्बरता, अनैतिकता और पतन की कहानी बहुत संक्षेप में कही गई है। परंतु बहुत स्पष्ट रूप से कही जाने के कारण कहानी की मार्मिकता को तीखी धार देती हैं। यह कहानी मानवीय संवेदना के कुंद होने की, मनुष्यता के क्षरण की कहानी है। हिन्दी की लम्बी कहानी की परंपरा को मजबूती देती यह कहानी हमारे समाज की यथार्थ तस्वीर दिखाती है और पढ़ने के बाद एक लंबे समय तक आपके साथ रहती है। यह कहानी इतनी प्रभावशाली है कि साहित्य अकादमी ने अपने इतिहास में पहली बार किसी एक कहानी को अपने सम्मान का आधार बनाया।

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विजय शर्मा






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टिप्पणियाँ

  1. विजय शर्मा ने बस दोस्ती निभा दी है .इनकी समीक्षा चलताऊ है और अनावश्यक सदिच्छाओ से भरी हुई है .यह न ही कहानी की खूबियों की गहराई में जाती है न ही इसके अंतरविरोधो को ठीक से बताती है .कहानी में इम्पेर्सोनेशन का रूपक बहुत सशक्त है .हाल ही डोलेज्ल नामक श्वेत युवती का अश्वेत बनकर अश्वेतों के अहम संगठन का मुखिया बने रहना कहानी को बेहद प्रासंगिक बनाता है .मगर कहानी शिल्प और तकनीक के स्तर पर बेहद कमजोर है .वहां वही करुणा जगाऊ प्रयास है नायक के प्रति .इसके लिए नायक को बेवजह दयनीय निरीह दिखाया गया है .यह टिपिकल विनोद शुक्लीय स्टाइल है जो बेहद नकली और पाखण्ड से भरी है .लेफ्ट लिबरल साहित्यकारों को दलितों की रक्षा में लगा दिया गया है --मुक्तिबोध,सोनी, निराला आदि .हद तो तब है जब निराला को दलितों का रखवाला बनाया गया है जो छद्म नाम से विशाल भारत में दलितों के विरुद्ध जहर उगलता था इस तरह रूपक गढ़ने में सेंस ऑफ़ प्रोपोरसन का बिलकुल ख्याल नहीं रखा गया है .कहानी मेरिट के अपमान के बारे में है .इसे जबरदस्ती दलित की कहानी बनाया गया है वह भी गाँधी जैसे दलितों के दुश्मन के मार्फ़त .हद है द्विचारिता का .--मुसाफिर ,८, इंदिरा नगर ,पटना -१

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  2. मुसाफिर भाई, लेफ्ट लिबरल साहित्यकार दलितों की रक्षा में किसके द्वारा लगाए गए हैं मैं नहीं जानता. आलेख से आपकी असहमति का तो स्वागत है लेकिन हम इस बात से सहमत नहीं कि विजय जी ने बस दोस्ती निभायी है. उदय जी के लिखने का अपना तरीका है और उनके लेखन का एक बड़ा वर्ग मुरीद है. दलितों के जीवन को ले कर केवल दलित ही लिख सकते हैं यह अवधारणा अपने आप में कितनी जायज है इसे ले कर तमाम बहसें हो चुकी है.
    अगर यह सब आपको नकली लग रहा है तो सवाल फिर यह है कि वास्तविक समीक्षा किसे कही जाए. क्या किसी ख़ास व्यक्ति की लिखी समीक्षा ही बेहतर है? क्या सिर्फ उखाड़ पछाड़ ही बेहतर समीक्षा है? इसी समीक्षा के मार्फत आपने जो अन्य प्रसंग उठाए हैं उससे हम पूरी तरह अनभिज्ञ हैं. निराला को इलाहाबाद के तमाम लोगों ने देखा है. निराला कैसा जीवन जीते थे इससे हम सब भिज्ञ हैं. जिस व्यक्ति ने अपने जीवन तक की कोई परवाह नहीं की उसके बारे में आपका यह विचार पूर्वाग्रह से ग्रसित लगता है. निराला किस छद्म नाम से दलितों के खिलाफ लिखते थे हो सके तो सप्रमाण बताईये. महज सुनी-सनाई बातों पर यकीन कैसे किया किया जा सकता है

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  3. सुशीलाजी बताने के लिए धन्यवाद। मैं बेनाम लोगों की बातों का उत्तर नहीं देती हूँ। रही बात उदयप्रकाश से दोस्ती की तो इन बेनाम सज्जन की जानकारी के लिए बता दूँ कि मैं उदयप्रकाश के लिखे को जानती हूँ, उन्हें एक बार पुस्तक मेले में देखा है, उनसे मेरा अभी तक दोस्ती का रिश्ता नहीं बना है। संतोष चतुर्वेदीजी ने उत्तर दे दिया है।

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