दिनेश कर्नाटक की कहानी 'अब तुम ठीक हो बेटा ?'

दिनेश कर्नाटक

आज की शिक्षा व्यवस्था को केंद्र में रख कर लिखी गयी इस कहानी में दिनेश कर्नाटक ने कई मुद्दों को सूत्रों में उठाने और उन पर बात करने की कोशिश की है. दिनेश स्वयं भी एक शिक्षक हैं और खुद इस तरह की समस्याओं से दो-चार होते होंगे। इस कहानी में दिनेश का अपना वह अनुभव भी है जो  की थाती होता है. आइए  दिनेश कर्नाटक की यह कहानी  'अब तुम ठीक हो बेटा ?'
 
अब तुम ठीक हो बेटा ?

दिनेश कर्नाटक
   
लड़कों को अस्पताल गए हुए काफी देर हो चुकी थी। वे अभी तक लौट कर नहीं आए थे।

आशंकाओं के बादल उनके मन-मस्तिष्क में मंडराने लगे थे। वे विवादों से दूर रहने वाले लोगों में से थे। उलझना उनकी फितरत में नहीं था। अपने अब तक के अनुभव से वे जान चुके थे कि उलझने से ही व्यक्ति मुसीबत में फंसता है। उन्हें शान्ति पसंद थी। वे उसकी ही तलाश में रहते थे। शायद इसलिए कि वह उन्हें कहीं भी नजर नहीं आती थी।

आज ही उस लड़के पर उनका डंडा चलाना और आज ही उसका घायल होना। आसार कुछ अच्छे नहीं लग रहे थे। तिल का ताड़ बनने में आजकल वक्त नहीं लग रहा था। आए दिन बच्चों से मारपीट के मामले अखबारों में आते रहते थे, जिनमें शिक्षकों की खूब फजीहत होती थी। पहले जैसा समय नहीं रहा। अब तो मौका मिलना चाहिए। लोग बवाल खड़ा करने की प्रतीक्षा में लगे रहते थे। जैसे सभी पदों और पेशों की इज्जत घटी थी, वही हाल अब शिक्षकों का भी था। अब वह ‘गोविन्द’ के बराबर में खड़ा नहीं था, बल्कि अपने तथा अपने परिवार की आजीविका के लिए काम करने वाला एक ‘पुर्जा’ मात्र बन कर रह गया था। बच्चे और अभिभावक अब उसे अपने ठेंगे पर रखने लगे थे। उसे यह जताने में कोई कसर नहीं छोड़ते थे कि उनकी मेहरबानी से उसकी दाल-रोटी चल रही है। वह जमाना गया, जब शिक्षक के मारने-पीटने को परसाद समझा जाता था और पता चलने पर कि साहबजादे स्कूल से पिटकर आए हैं घर में और सिकाई होती थी। अब तो बच्चे को डांटना तक मां-बाप को गंवारा नहीं !

अध्यापकों ने कक्षाएं छोड़कर ‘स्टाफ रूम’ की ओर जाना शुरू कर दिया था। उनका इस तरह घंटी बजने से पहले जाना छुट्टी होने का संकेत होता था। बच्चे शिक्षक के कमरे से बाहर निकलते हीं अपनी किताबें समेटते हुए, आपस में जोर-जोर से बातें करने लगे थे। शोर की वजह से अपनी बात सुनाने के लिए उन्हें और जोर से बोलना पड़ रहा था जिससे पूरे विद्यालय में शोरगुल मच चुका था। छोटी कक्षाओं के बच्चे डेस्क में बिखरी हुई किताब-कापियों को जल्दी-जल्दी बस्ते में डालने लगे थे ताकि विद्यालय से निकलने में अपने साथियों से पिछड़ न जाएं। इस अफरातफरी से तेज कोलाहल होने लगा था। लेकिन छुट्टी की खुशी के कारण किसी का इस की ओर ध्यान नहीं था। बच्चों को भूख लग चुकी थी और वे जल्दी-जल्दी घर पहुंच कर खाने पर टूट पड़ने को बेताब हो रहे थे।

अध्यापकों का हाल भी इससे कुछ अलग नहीं था। उन्हें भी वर्षों से घड़ी की सुई के हिसाब से आने-जाने की आदत पड़ चुकी थी। वे इसके इतने आदी हो चुके थे कि समय-सारणी में होने वाला मामूली सा हेर-फेर उन्हें काफी परेशान कर देता था।

रावत जी भी इसी बात से परेशान थे। बारहवीं के एक लड़के के जांघों के बीच में चोट लग गई थी। उन्होंने उसे कुछ और लड़कों के साथ पास के अस्पताल भेज दिया था। छुट्टी हो चुकी थी, मगर अब तक उन लोगों का कहीं कोई पता नहीं था। बगैर उसका हाल-चाल जाने वे जा नहीं सकते थे। मगर विद्यालय में रुकने का भी अब कोई मतलब नहीं था। कर्मचारी तेजी से कमरों में ताला लगाने लगे थे। वे भी दूसरे अध्यापकों के साथ गेट की ओर बढ़ चले। तभी उन्हें दो लड़के गेट से अंदर की ओर आते हुए दिखे। उन्होंने बड़ी राहत महसूस की। पास आते ही उन्होंने बेसब्री से उनसे पूछा-‘सब ठीक-ठाक तो है ना !’
‘सर, आपको अस्पताल में बुला रहे हैं !’ लड़के ने उनकी बात को नजरअंदाज कर उनसे कहा।

‘बुला रहे हैं ! क्या बात है ?’ उन्हें झटका सा लगा था।
‘सर, वो अजय रो रहा है। अस्पताल वालों ने आपको ले कर आने को कहा है !’ लड़के ने फिर से अपनी बात दोहराई।
‘अच्छा तुम चलो ! मैं आता हूं !’ उन्होंने संयत आवाज में कहा।

अनहोनी की आशंका से उनका दिल जोर से धड़कने लगा और हाथ-पांव फूलने लगे। ‘कहीं आज मैं भी किसी मुसीबत में तो नहीं फंसने वाला हूं !’ वे मन ही मन सोच रहे थे और भारी कदमों से गेट से बाहर निकले। रास्ते में उन्हें प्रधानाचार्य दिखे, जिन्हें वे पहले ही मामले से अवगत करा चुके थे। उन्हें देखते ही उन्हें बड़ी राहत मिली थी। उन्होंने उनसे अस्पताल से आये बुलावे का जिक्र कर साथ चलने को कहा।
‘आप हो आईये मेरी जरूरत पड़े तो बुला लेना !’ उन्होंने टका सा जवाब दे दिया।

कुछ देर तक तो उनकी समझ में कुछ भी नहीं आया। प्रधानाचार्य से उन्हें ऐसी उम्मीद नहीं थी। उन्हें एक बार और अपने दिल की धड़कनों के बढ़ने का एहसास हुआ। उनका चेहरा तपने लगा था। वे अपने को अकेला तथा असहाय महसूस करने लगे थे। प्रधानाचार्य से तो वे संस्था प्रमुख के नाते साथ चलने को कह सकते थे, मगर साथ के शिक्षकों से किस मुंह से यह बात कहें ? सोचेंगे अपने मामले में हमें उलझा रहे हैं। घर पहुंचने में देर होगी सो अलग। वे यह सब सोचते हुए उसी तरह उदास कदमों से चलते रहे।

उनकी हालत को समझते हुए साथ चल रहे पाण्डे जी ने कहा-‘हम हैं तो सही आपके साथ......आप बिल्कुल चिन्ता न करें !’
उनकी बात से उन्हें बड़ा बल मिला। मगर उनके संकोची मन को उन्हें साथ ले जाना गंवारा नहीं था। ‘आप रहने दो सर, आपको काफी दूर जाना होता है। जो होगा मैं देख लूंगा !’

‘अरे क्या बात करते हैं सर ! एक दिन थोड़ा देर हो गई तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ेगा। हम चल रहे हैं आपके साथ ! अरे, आदमी ही तो आदमी के काम आता है !’ पांडे जी के बगल में चल रहे मिश्रा जी ने उनकी बात का समर्थन करते हुए कहा।

वे तीनों अस्पताल की ओर चल पड़े। जबकि उनकी बात सुन चुके कुछ शिक्षक कुछ न जानने का अभिनय करते हुए तेजी से अपने घर की ओर चले गये।
रावत जी को बिल्कुल भी अंदेषा नहीं था कि बात इतनी आगे बढ़ जायेगी और उन्हें खुद अस्पताल जाना पड़ेगा। वे सोच थे, ‘जब मैंने कुछ गलत किया ही नहीं तो मैं क्यों परेशान होऊं ?’ यह सोचते हुए उनके मन में एक तरह की दृढ़ता आ रही थी, जो चेहरे पर तनाव के रूप में दिखाई दे रही थी।

    अस्पताल में अच्छी-खासी भीड़ मौजूद थी। छुट्टी से पहले ही भाग जाने वाले कई लड़के आज अस्पताल में नजर आ रहे थे। उनको तो तमाशा चाहिए था, फिर वह साथ के किसी लड़के के घायल होने का मौका क्यों न हो ! रावत जी मन ही मन सोच रहे थे कि आज न जाने क्या होने वाला है ? भीड़ में विद्यालय के बच्चों, मरीजों के अलावा पास की बाजार के कुछ दुकानदार, अगल-बगल के कुछ लोग थे। उनके पहुंचते ही भीड़ उनके इर्द-गिर्द इकट्ठा हो गई। वे तेजी से अस्पताल के अंदर की ओर गये। उनका दिल बैठता जा रहा था। लड़का एक बैंच पर लेटा था। उसके आस-पास कई लोग घेरा बना कर खड़े थे। उनके पहुंचते ही अस्पताल की नर्सों ने उन्हें अजीब नजरों से घूरते हुए कहना शुरू कर दिया-‘बच्चों को मारने से पहले ये लोग सोचते भी नहीं कि कहां पर मारना चाहिए और कहां पर नहीं ! कुछ हो जाता तो ! क्या अपने बच्चों को भी ये ऐसे ही मारते होंगे !’





    वे सीधे लड़के के पास गये-‘कैसा है बेटा ?’
    ‘जी दर्द हो रहा है !’ कराहते हुए उसने कहा था।
    ‘डॉक्टर साहब क्या कह रहे हैं ?’ उन्होंने सामने खड़े लड़कों से पूछा।
    किसी ने कोई जवाब नहीं दिया।

वे डाक्टर साहब के कमरे की ओर मुड़ ही रहे थे कि एक नर्स उनके सामने आ कर खड़ी हो गयी-‘आपने तो हद कर दी गुरु जी, बच्चों को इस तरह पीटा जाता है क्या ? आपके भी तो बच्चे होंगे। कुछ हो जाता तो इसके मां-बाप पर क्या गुजरती ? लोग अपने बच्चों को आपके पास मार खाने के लिए थोड़ा भेजते हैं !’

उसके ऐसा कहते ही दूसरी नर्सें भी उनकी ओर देखते हुए मुह बिचका कर ‘हाय-हाय’ करने लगी। वे अचानक हुए इस हमले से अचकचा गए।
‘ये क्लास के बाहर घूम रहा था। मैंने इसे अंदर जाने को कहा। डंडा मैंने इसके पीछे की तरफ मारा था, जो इसे लगने के बजाय दरवाजे से टकराया। ये अंदर जा कर बैठ गया था। खाली पीरियड था। बच्चे आपस में झगड़ा करके दूसरी क्लासों को डिस्टर्ब न करें यह सोच कर मैं इन्हें पढ़ाने लगा। उस दौरान तो इसे कुछ भी नहीं हुआ। ये आराम से बैठ कर काम कर रहा था। मेरे जाने के बाद लड़कों ने आ कर मुझसे कहा कि ये रो रहा है। मैंने इसे अस्पताल भिजवा दिया। लड़के बता रहे थे कि इसे मेज से टकराने की वजह से चोट लगी है।’ सफाई देते हुए उन्होंने अपने अगल-बगल खड़े लड़कों की ओर समर्थन की उम्मीद से देखा मगर वे उनकी कक्षा के नहीं थे।

नर्स को उनकी बात पर यकीन नहीं हुआ-‘बच्चा खुद कह रहा है कि आपने उसे मारा !’
अब इस महिला को कैसे समझाएं सोच कर उन्होंने बैंच पर लेटे हुए अजय की ओर देखा। मगर वह खिड़की से बाहर की ओर देख कर कराह रहा था।
‘मुझे अपने बच्चों की कसम, मैंने इसे नहीं मारा !’ वे भावुक हो गये थे।
‘अरे आप क्या कोई पुलिस वाली हैं.....जो आरोप तय किये दे रही हैं.....कल को लोग कह दें कि आप के अस्पताल में आया मरीज बीमारी से नहीं आप के लगाए इंजैक्शन से मरा है तो उसकी बात मान ली जाएगी क्या ? अजीब बात करती हैं ! मामले को सुलझाने के बजाय उलझाने में लगी है !’ साथ में आये मिश्रा जी ने बीच में हस्तक्षेप किया।

‘अरे छोडि़ए इनको क्या सफाई दे रहे हैं.....डॉक्टर साब से पता करते हैं....बच्चे की हालत कैसी है..... इन्हें तो तमाशा चाहिए !’ पीछे खड़े पांडे जी उन्हें कंधे से खींचते हुए डॉक्टर के कमरे की ओर ले गये।
नर्सें अभी भी उनकी बातों से आश्ववस्त नहीं थी और ‘हाय-हाय’ की मुद्रा बनाए हुए थी।

‘चोट तो लगी है.....सूजन भी है......पेन किलर और सूजन कम करने की दवा लिख दी है !’ पर्चा  बढ़ाते हुए डॉक्टर ने कहा था।
‘डॉक्टर साहब कोई सीरियस बात तो नहीं है !’ उन्होंने कुर्सी से उठते हुए पूछा।
‘देखिए ये जगह ही ऐसी है कि यहां लगने पर काफी दर्द होता है।‘
‘जी, ठीक कह रहे हैं डॉक साहब !’ मिश्रा जी ने हाथ जोड़ते हुए कहा।
‘आप लोग बाहर जाईये मैं दवा लेकर आता हूं !’ पांडे जी ने उनसे कहा।

‘बच्चे को कुछ देर आराम कर लेने देते हैं ! हटो बच्चो उसे हवा आने दो !’ पांडे जी ने लड़के को घेर कर खड़े विद्यार्थियों से कहा और रावत जी के कंधे पर हाथ डाल कर उन्हें बाहर की ओर ले जाते हुए कहने लगे ‘यह सारा बखेड़ा इन नर्सों ने खड़ा किया है। अपना काम करने के बजाय तमाशा बनाने में लगी हैं। ऐसी करुणा अपने मरीजों को दिखाती तो सरकारी अस्पतालों के ऐसे हाल नहीं होते ! आप ने सही जवाब दिया अब सब से इसी बात को कहिएगा !’
‘पांडे जी, आप भी मुझे ही गलत समझ रहे हैं ? जो हुआ मैं वही बता रहा हूं.....मैं कोई कहानी नहीं बना रहा !‘

‘अरे साहब, सांच को क्या आंच !’ मिश्रा जी ने उनकी बात में जोड़ा।
लोगों की बढ़ती हुई सरगर्मी देख कर पाण्डे जी ने नजदीक आकर धीरे से उनसे कहा-‘हमें कालेज चले जाना चाहिए ! यहां रूकना सही नहीं होगा.....भीड़ का कोई भरोसा नहीं ! भावुकता में लोग सही-गलत नहीं समझते !’
‘मैंने कौन सा गलत काम किया है.....जो डरूं......मेरी वजह से आप लोगों को भी देर हो गयी है....आप लोग चलिए मैं आता हूं.....!’ रावत जी ने दृढ़ता से दोनों की ओर मुखातिब होकर कहा।
‘क्या बात कर रहे हैं रावत जी, आप को अकेला छोड़ कर थोड़ा चले जायेंगे !’ मिश्रा जी ने उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा।



सच तो यह है कि मार-पिटाई पर उनको भी यकीन नहीं था। वे अपने बीस साल के शिक्षण अनुभव से समझ चुके थे कि मार कर न तो आप किसी को सीखा सकते हैं और न ही बदल सकते हैं। इससे आया परिणाम केवल दिखावटी होता है, जो बच्चे के भविष्य के लिए और भी बुरा होता है। बच्चा अपना प्रतिरोध दर्ज करने के लिए आपके द्वारा बतायी बातों के विरूद्ध कार्य करने लगता है। उनका मानना था कि यदि शिक्षक अपने विषय को पढ़ाने में आनन्द लेता हो, पाठ सामग्री को बच्चों को संप्रेषित करना चाहता हो तो बच्चे उसकी ओर ध्यान देते हैं। यदि उसने पढ़ाने के लिए कोई योजना नहीं बनाई है तो बच्चे बहुत जल्दी ऊबने लगते हैं और पूरी कक्षा में अराजकता फैल जाती है। ऐसे में कक्षा को शान्त करने के लिए शिक्षक पहले तो चिल्लाता है। जब इससे भी काम नहीं बनता है तो भय का उपयोग करते हुए एक-दो विद्यार्थियों को पीट देता है। कक्षा शान्त प्रतीत होती है। मगर यह शान्ति बनावटी होती है, जो उनकी छोटी-मोटी खुराफातों से प्रकट होती रहती है। पाठ-योजना न होने के कारण शिक्षक व्यर्थ की बातें करने लगता है, जिससे बच्चों की बेचैनी और बढ़ते जाती है।

उनका मानना था कि बच्चों से दूरी बना कर नहीं बल्कि आत्मीयता का रिश्ता बना कर ही उन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। वे इसी पद्धति को अपनाते भी थे। मगर यह तो आदर्श स्थिति है। बच्चों से उनकी मर्जी के साथ तमाम काम करवा लेना आसान बात नहीं है। कक्षा में कुछ लड़के होते हैं, जो शिक्षक की अपेक्षाओं के अनुसार कार्य करते जाते हैं। जबकि बहुत से कक्षा में तो सहयोग करते हैं लेकिन उन कार्यों को नजरअंदाज कर देते हैं जिन्हें उन्हें घर से कर के लाना होता है। ऐसे बच्चों को वे तमाम तरीकों से प्रेरित करते थे। जब उन्हें लगता कि किसी भी तरह से बात नहीं बन पा रही है और दिया गया कार्य न करने का विद्यार्थियों के तथा उनके परीक्षा परिणाम पर असर पड़ना तय है तो उन्हें मजबूरी में डंडे का सहारा लेना पड़ता था। लेकिन ऐसा करते हुए भी उन्हें लगातार यह एहसास घेरे रहता था कि उन्हें और भी विकल्पों को आजमाना चाहिए था। बच्चों को पीटना चुनौती से निपटने का आसान प्रतीत होता हुआ गलत उपाय है।

जब वे पढ़ते थे, तब शिक्षकों की पिटाई को परसाद माना जाता था और तब के शिक्षक जब-तब आशीर्वाद की तरह उसे बांटा करते थे। उस समय के शिक्षकों का काम बड़ा आसान था। जिसने प्रश्नों के उत्तर रट कर उगल दिए वह होशियार और जो ऐसा नहीं कर सका वह बुद्धू! उन्हें याद है पिटाई ने उन्हें नहीं बदला। बल्कि इसने उनके अंदर विद्यालय तथा शिक्षा के प्रति गुस्सा ही पैदा किया। तब होने वाली पिटाई के पीछे कोई ठोस वजह नहीं होती थी, बल्कि शिक्षक उन्हें भयभीत करके कक्षा में शान्ति बनाने के लिए ऐसा करते थे।

 तब के श्रीवास्तव सर की उन्हें आज भी याद है जो कक्षा में पूरी तैयारी के साथ आते थे और पूरी तन्मयता से अपना पाठ पढ़ा कर चले जाते थे। उनका पढ़ाना सभी को बहुत अच्छा लगता था। शायद ही कभी वे डंडा लेकर आये हों। शायद ही कभी उन्होंने किसी को पीटा हो। लड़के उनके पीरियड में जरूर उपस्थित रहते थे। लेकिन इतना सब होते हुए भी उन्हें उनकी एक बात खलती थी। उनकी बच्चों के साथ अंतरंगता नहीं थी। वे बच्चों के प्रति उदासीन रहते थे। शायद ही वे किसी का नाम जानते थे ! शायद ही उन्होंने कभी किसी से कुछ पूछा हो ? अपना काम ईमानदारी से करते, उसके अलावा किसी से कोई मतलब नहीं ! इसकी भी परवाह नहीं करते थे कि लड़कों ने उनके पढ़ाये पाठों के अभ्यास पक्की कापी में किये भी हैं या नहीं। वे कभी किसी से कापी दिखाने तक को नहीं कहते थे। जिसने दिखायी साइन कर दिये। जिसने नहीं दिखायी उससे कोई सवाल-जवाब नहीं ? बाद में खुद रावत जी ने उनके द्वारा दिये जाने वाले अभ्यास काम को करना छोड़ दिया था। उनसे अपने काम को पूरी निष्ठा से करने की प्रेरणा तो मिलती थी मगर बात इतने से ही तो नहीं बनती !

रावतजी का डंडा शुरू में खूब चला करता था, मगर जब उन्हें यह बोध हुआ कि डंडा हमारी असफलता का प्रतीक है तो उसका प्रयोग काफी कम होता चला गया। मगर वह छूटा इसलिए नहीं क्योंकि उन्हें लगता था कि बहुत से बच्चों को भाषा के साथ-साथ डंडे की भी जरूरत होती है। वे पिटाई का औचित्य स्पष्ट कर उसका प्रयोग करते थे। मगर साथ-साथ वे इसे अपनी कमजोरी भी मान कर चलते थे। उन्हें विश्वास था कि वे इतनी कुशलता से पिटाई का प्रयोग कर सकते हैं कि कभी किसी को नुकसान नहीं होगा। उन्होंने बच्चों के पिछवाड़े को डंडे के उपयोग के लिए सबसे उपयुक्त स्थान के रूप में चिह्नित किया था। यह असर भी करता था और इसमें कभी कोई बवाल होने का भी खतरा नहीं था। बच्चों की पिटाई के खिलाफ कानून बना कर सरकार ने इसे अपराध की श्रेणी में डाल दिया था। अब जब भी वे किसी लड़के को पीटते थे तो इस विश्वास के साथ कि यह वे उसकी भलाई के लिए कर रहे हैं, लेकिन उतनी ही तीव्रता के साथ उन्हें यह भी एहसास होता था कि उन्होंने अपराध किया है। अब वे एक अपराधबोध के साथ जीते थे। अखबार में इस तरह की घटनाओं को पढ़ते हुए उन्हें भय सताता रहता था कि न जाने किस दिन उनके साथ कोई बवाल खड़ा हो जाए। वे इस लत से मुक्त होना चाहते थे। मगर हो नहीं पाते थे।

क्या आज वे भी उन तमाम अध्यापकों की तरह फंस चुके थे जिनके बारे में अखबारों में आया करता था ?
तभी मैली जींस और मैली टी शर्ट तथा गले में सोने की चैन पहने एक युवक जिसका पेट बड़ी बेशर्मी से आगे को निकला हुआ था अपनी पल्सर मोटर साईकिल में तेजी से अस्पताल परिसर के भीतर आया। उसने उतनी ही तेजी से उतरते हुए एक झटके से मोटरसाइकिल को स्टैंड पर खड़ा किया और भीड़ से पूछने लगा-‘कौन है ये रावत.........बच्चों पर जोर दिखाने वाला......!’
भीड़ ने कोने में खड़े शिक्षकों की ओर इशारा किया।

वह तीर की तरह उनकी ओर बढ़ा। उसके हाव-भाव ऐसे थे कि गोया सामना होते ही टूट पड़ेगा। उसके टूटते ही सारी भीड़ भी उन पर टूट पड़ेगी। उन्हें याद आया यह युवक दो-तीन बार कुछ लड़कों के एडमिशन के लिए उनके पास आ चुका था। तब वह उन्हें देखते ही कमर झुका कर नमस्कार किया करता था। अभी वह उन्हें पहचानते हुए भी नहीं पहचान रहा था।

‘मैं हूं रावत......ये चोट मेरे मारने से नहीं लगी है.......चोट उसे खुद ही लगी है.........अपनी कक्षा का विद्यार्थी होने के कारण मैंने उसे अस्पताल भिजवाया!’ किसी अनजानी शक्ति ने उन्हें उसके सामने धकेल दिया।
तेजी से उन लोगों की ओर बढ़ता युवक उनके इस तरह सामने आने से सहम गया।

‘ये कोई तरीका है बच्चों पर हाथ उठाने का..............आप जहां चाहे, वहां मार देंगे.....बच्चे को कुछ हो गया तो !’ उनके करीब आकर उसने तैश में कहा।
‘अपने बच्चों से बढ़ कर तो कुछ नहीं होता......अपने बच्चों की कसम खा कर कहता हूं, मैंने उस जगह पर नहीं मारा......मैंने उसे क्लास के बाहर घूमते हुए देख कर डांटा था......क्या अब टीचर बच्चों की गलत हरकत पर भी कुछ नहीं कह सकता...........मैंने उसे डराने के लिए दरवाजे पर डंडा मारा था, जो वहां से स्लिप होकर उसकी जांघ पर लग गया था। उसके बाद तो ये आराम से कक्षा में बैठ गया था। मैंने क्लास भी ली। तब तो इसको कुछ नहीं हुआ ? एक घंटे बाद पता चला ये रो रहा है। इसके साथ के लड़कों ने बताया कि भागते हुए मेज से टकराने की वजह से इसकी जांघों के बीच में लगी। हम तो उसकी चिन्ता कर रहे हैं और आप हमें ही दोषी बता रहे हैं। क्या अब भलाई का जमाना नहीं रहा ?’

‘आपका मतलब लड़का झूठ बोल रहा है ? वो अपने गुरू जी के साथ ऐसा क्यों करेगा ?’ वह कुछ ढीला पड़ा था।
‘ये तो आप उसी से जा कर पूछो !’ रावत जी ने कहा।
‘देखिये भाई साहब, फिजूल में बात ज्यादा बढ़ाने से कोई फायदा नहीं। आप पहले बच्चे को देख आओ.....उससे पूछताछ कर लो.......फिर कालेज में आ जाओ.........वहां शान्ति से बात कर लेंगे !’ मिश्रा जी ने अपनी मीठी आवाज में उसे समझाया।
साथ आए लोगों के समझाने पर वह अस्पताल के अंदर की ओर चला गया।

तभी तीन-चार लोगों के साथ चीखता-चिल्लाता हुआ एक व्यक्ति गेट से अंदर आता हुआ दिखा। वह लड़के का बाप था। उसके चेहरे पर पीड़ा तथा गुस्से के मिले-जुले भाव नजर आ रहे थे। ‘अभी पुलिस में रिपोर्ट करवाता हूं। इन्होंने समझ क्या रखा है ? बच्चों पर हाथ उठाते हुए इन्हें दया नहीं आती.........ये मास्टर हैं या कसाई ! हम अपने बच्चों को पढ़ने के लिए भिजवाते हैं या मार खाने के लिए ! जेल में चक्की न पिसवाई तो मेरा नाम भी उमेद सिंह नहीं......!’


रावत जी उसे अच्छी तरह से जानते थे। अस्पताल आने से पहले वह ठर्रा चढ़ा कर आया था। वह इतना सीधा आदमी था कि कभी विद्यालय आने पर उसके मुंह से आवाज तक नहीं निकलती थी। उसने गेट से अंदर आते ही उन लोगों को देख लिया था, पर पास आने का साहस नहीं जुटा पाया।
हालात बिगड़ते जा रहे थे। साथ में आये दोनों शिक्षकों की बेचैनी बढ़ती जा रही थी।

‘मेरे ख्याल से यहां रुकना अब हम लोगों के लिए ठीक नहीं होगा। हमें विद्यालय की ओर को चले जाना चाहिए।’ पांडे जी ने एक बार फिर से अपनी बात दोहरायी।
‘आप लोग घर जाईये। मेरी चिन्ता मत करिये। मैं अब मामले को निपटा कर ही जाऊंगा !’
‘रावत जी भीड़ का कोई भरोसा नहीं.......आप जानते हैं.........भीड़ सही-गलत कुछ नहीं जानती !’  मिश्रा जी ने अपना अनुभव सामने रखा।
‘मैं ये भी जानता हूं कि इस जगह पर लगी चोट जितना दर्द देती है, उतने ही जल्दी ठीक भी हो जाती है !’ उन्होंने पूरे आत्मविश्वास से कहा था।
‘ठीक है हम भी आपके साथ ही जायेंगे !’ पांडे जी ने हारकर कहा।

लड़के का पिता कुछ लोगों के साथ बातचीत में मशगूल था। रावत जी सीधे उसके पास गये और उसकी ओर मुखातिब होकर कहने लगे- ‘ठाकुर साहब मैं आपके बच्चे का कक्षा अध्यापक हूं। घबराने की बात नहीं है। बच्चों को चोट-चपट लगती रहती है। उसे थोड़ा चोट लगी है। वो सही हो जायेगा !’
उसने मुंह उठा कर उनकी ओर देखा। वह गुस्से में था।
‘सही हो जायेगा ! आपको कैसे पता वो सही हो जायेगा ?’
‘मैंने उसे पेशाब करने को कहा था। इसका मतलब चोट इतनी गंभीर नहीं है ! फिर हमने उसको सही समय में अस्पताल पहुंचवा दिया था !’


‘आप ने ही पीटा था उसे ?’
‘मैंने नहीं पीटा............उसे मेज से लगी थी !’
‘फोन पर तो मुझे बताया गया था कि मास्साब के मारने से चोट लगी है !’
‘आपकी हालत मैं समझ सकता हूं.......... आप बच्चे से जा कर पता कर लो.........आपकी जगह हम होते तो हम भी ऐसा ही कहते......हम भी बच्चे वाले हैं !’ पांडे जी ने उससे कहा।
‘अपना समझते हो तभी तो ऐसे मारते हो !’ साथ में आये व्यक्ति ने साथ आने का फर्ज निभाते हुए कहा।
‘मैं कुछ नहीं जानता............मेरे लड़के को कुछ नहीं होना चाहिए..........उसे कुछ हुआ तो मैं सब को देख लूंगा !’


‘वो आपका ही नहीं हमारा भी बच्चा है...........पहले आप उसे देख आओ !’ रावत जी ने कहा।
तभी विद्यालय के कुछ लड़के आ गये।
‘सर, उसे तो मेज से लगी है। हमने खुद देखा था।’ एक ने कहा।
‘तुम लोग अभी तक कहां थे.......अंदर जा कर उसके पिता को बताओ........!’ पांडे जी ने उनसे कहा।
‘अब सब ठीक हो जायेगा......चलिए अब कालेज को चलें !’ मिश्रा जी किसी तरह की मुसीबत में नहीं पड़ना चाहते थे।

इस बार रावत जी ने उनकी बात से सहमति जतायी और वे लोग कालेज की ओर को चल पड़े। अब वे काफी राहत महसूस कर रहे थे। अब तक वे भावावेश में थे, लेकिन अब उनकी सांस सम में लौट आयी थी।

कालेज को जाते हुए मिश्रा जी पुराने दिनों को याद कर रहे थे-‘एक हमारा समय था। लोग अध्यापकों से आकर कहा करते थे कि अगर हमारा बच्चा कुछ गड़बड़ करे तो जम कर ठुकाई कीजिएगा। पिटाई करने वाले शिक्षक तब सब से अच्छे माने जाते थे। विद्यार्थी उनकी पिटाई को परसाद के रूप में लेते थे। बड़े होने पर एक-दूसरे से जिक्र करते थे कि फलां मास्साब की पिटाई की वजह से मेरी जिन्दगी बनी है। देखते ही कदमों में गिर जाते थे कि सर आप की वजह से हमारी जिन्दगी बन पाई। अब, हालत यह है कि घर वाले लड़ने को तैयार हैं। देख लेने की धमकी देने लगे हैं।’

‘शिक्षक को मारने का कोई शौक थोड़ा होता है। बच्चों की भलाई चाहता है तभी उन पर हाथ उठाता है। कुम्हार मिट्टी के बर्तनों को भट्टी में न झोंके तो क्या कभी वो काम के लायक हो पायेंगे। तुलसीदास जी भी तो कह गये हैं, ‘भय बिनु होत न प्रीति’। क्या वो सब लोग बेवकूफ थे ?’ मिश्रा जी बोले।
रावत जी उनकी बात पर ‘हां-हूं’ करते रहे।
अचानक पांडे जी ने उनका हाथ पकड़ कर उन्हें रोक दिया। तीनों ठिठक गये। कुछ ही दूरी पर वह मोटा युवक, लड़के का पिता तथा एक अन्य व्यक्ति सड़क के किनारे खड़े थे। उनका इस तरह से आगे जा कर खड़ा होना उन्हें समझ में नहीं आया। कुछ देर के लिए वे वहीं पर खड़े हो गये। रावत जी आगे बढ़ने लगे तो पांडे जी ने उन्हें रोक दिया-‘आगे जाना सही नहीं होगा !’

‘आप मेरे पीछे-पीछे आईये !’ कह कर रावत जी आगे को बढ़ चले।
दोनों उनसे अच्छा खासा फासला बना कर चल रहे थे।
‘बच्चा कैसा है अब ?’ उन्होंने आगे बढ़ कर लड़के के पिता से पूछा।
‘ठीक है मास्साब...........घर भेज दिया !‘ उसने सहजता से उत्तर दिया।
‘थोड़ा गरम पानी से सेक कर लीजिएगा.....ठीक हो जाएगा !’ आश्वस्त होते हुए उन्होंने कहा।

‘गलतफहमी हो गई थी सर......लड़का खुद ही कह रहा था कि उसे मेज से लगी। साथ वालों ने उसकी बात गलत समझी और हमें बता दी। आपकी तो वो तारीफ कर रहा था। कह रहा था सर बायलौजी बहुत अच्छी पढ़ाते हैं। बुरा मत मानियेगा सर.......आपको तकलीफ उठानी पड़ी।‘ मोटे पेट वाले लड़के ने कहा।
‘ऐसी कोई बात नहीं है.........हो जाता है !’ रावत जी ने राहत की सांस लेते हुए कहा।

‘देखिये अगर हम लोग बच्चों की बातों पर एकदम यकीन कर लें तो कितनी गड़बड़ हो सकती है। फिर बच्चों की बातों पर अगर आप उनका पक्ष लेने लगेंगे तो वे बड़ों की इज्जत करना बन्द कर देंगे। कभी भी कोई कदम उठाने से पहले सच्चाई का पता लगा लेना चाहिए।‘ पांडे जी ने मौका लगते ही उनकी क्लास ले ली थी।

‘आप बुरा मत मानियेगा गुरूदेव.......लड़के को आप से ही पढ़ना है.......भूल-चूक माफ करियेगा !’ हाथ जोड़ कर लड़के के पिता ने कहा।
‘अरे, आप निश्चिन्त रहिये.........वो हमारा बच्चा है !’ रावत जी ने उसके कंधे पर हाथ रख कर उसे आश्वस्त किया।
‘सर, आप लोगों को घर छोड़ दूं !’ मोटा युवक बोला।
‘नहीं, हम चले जाएंगे...........आप लोग जाओ !’

अगले दिन जब कालेज के अन्य शिक्षकों को पूरी बात का पता चला तो वे सब आक्रोशित हो उठे।
‘मैं तो कहता हूं बिगड़ने दीजिये इन बच्चों को..........करने दीजिये जो करते हैं...........पता है किसी को हम इन बच्चों के ऊपर कितनी माथापच्चीसी करते हैं........हम पर सवाल उठाने वाले जरा इन मिट्टी के लालों को पास करवाकर दिखा दें .........तब हम जानें.........अरे, शिक्षक का कोई सम्मान ही नहीं रहा। हमारे भी बच्चे स्कूल में पढ़ते हैं। कभी शिकायत करते हैं कि फलां मैडम ने पिटाई की तो छूटते ही कहते हैं ; बेटा, जरूर तुमने कोई गलती की होगी। ऐसे तो कोई किसी को नहीं मारता ! यहां बगैर जाने-समझे सीधे जेल पहुंचाने की तैयारी हो जाती है। अजीब मजाक है !’ हमेशा गुस्सा हो जाने वाले पंत जी ने कहा।

‘पंत जी, मैं कल से एक बात सोच रहा था। मुझे रात को देर तक नींद भी नहीं आई। समय बदल गया है, अब हमें भी बदल जाना चाहिए। हमें बच्चों को उनकी गलती का एहसास कराने के लिए दूसरे तरीके खोजने चाहिए !’ रावत जी ने सहजता से कहा।
‘दूसरा तरीका क्या हो सकता है ? आप रोज उनसे किताब लाने को कहें.........होम वर्क करके लाने को कहें और वो बगैर किताब-कापी के आते रहें तो आप क्या उनकी आरती उतारेंगे !’ पंत जी उसी रौ में बोले।
‘मगर वे खेल के मैदान में जा कर खेल तो नहीं भूलते...........कपड़े पहनना...........भोजन करना तो नहीं भूलते...........भाषा नहीं भूलते !’ रावत जी ने मुस्कराते हुए कहा।
‘आप कहना क्या चाहते हैं ?’ पंत जी ने उत्तेजना में उनसे पूछा।

‘शायद बच्चे हम से पूछना चाहते हैं कि सर, हम जानना चाहते हैं। लेकिन सर, पढ़ाई इतनी बोझिल और उबाऊ क्यों है ? शायद वे हम से पूछना चाहते हैं कि पढ़ाई खेल की तरह आनंद देने वाली और अपनी ओर आकर्षित करने वाली क्यों नहीं है ? इसमें हमारी भागीदारी क्यों नहीं है ? हमें घर में और स्कूल में नासमझ और गैरजिम्मेदार क्यों समझा जाता है ? शिक्षा में लोकतंत्र क्यों नहीं है ?’ रावत जी ने शान्ति से कहा।

‘लोकतंत्र है कहां रावत जी.........सारे खूबसूरत शब्द अब अपना अर्थ खो चुके हैं........लोकतंत्र होता तो क्या लोगों के सामने इतनी बाधाएं होती ?’ पंत जी ने कहा।
‘यही तो सवाल है......इस पर फिर कभी चर्चा करेंगे........फिलहाल तो मुझे पीरियड में जाना है !’ कह कर रावत जी अपनी क्लास की ओर चले गये।
उनके क्लास में पहुंचते ही सभी लड़के खड़े हो गये। उनकी निगाहें लड़के को खोज रही थी। तभी उन्हें वह नजर आया-‘अब तुम ठीक हो बेटा ?’ उन्होंने उससे पूछा।
‘जी, बिल्कुल ठीक !........सारी सर, आपको मेरी वजह से परेशान होना पड़ा !’ उसने कहा।
‘नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है, बेटा !’ कहकर उन्होंने एक गहरी सांस ली और ब्लैक बोर्ड की ओर लपके।

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सम्पर्क -
दिनेश कर्नाटक
ग्राम/पो.आ.-रानीबाग,
जिला-नैनीताल
(उत्तराखंड) पिन-26 31 26
फोनः 05946 244149 

 
मोबाइल- 94117 93190
ई-मेल -  dineshkarnatak12@gmail.com


(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स वरिष्ठ कवि विजेंद्र जी की हैं.)  

टिप्पणियाँ

  1. दिनेश भाई आपने बचपन में लौटा दिया. इसी को समय चक्र कहते हैं. पुराने गुरुजन याद आ गये.

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  2. एक गम्भीर मुद्दे पर बुनी गई यह कहानी शिक्षकीय संवेदना के साथ साथ सामाजिक ताने बाने में आये झोल को खोलकर पाठक के सामने प्रस्तुत करती है ।

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  3. धन्यवाद भाई अमित जी.....प्रमोद दीक्षित जी ....

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