प्रतुल जोशी




 








प्रतुल जोशी का जन्म इलाहाबाद में २२ मार्च १९६२ को हुआ. पिता शेखर जोशी एवम  माँ  
चन्द्रकला जी के सानिध्य में प्रतुल को बचपन से  ही साहित्यिक  परिवेश  मिला.  
इलाहाबाद विश्वविद्यालय से १९८४ में अर्थशास्त्र से परास्नातक.पिछले २३
वर्षों से आकाशवाणी से जुड़ाव.वर्त्तमान में आकाशवाणी लखनऊ में कार्यकम अधिशाषी.रेडियो के लिए बहुत से नाटकों का लेखन.वहीं बहुत सारे रेडियोफीचर्स का निर्माण.समय समय पर विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में संस्मरण,व्यंग्य,यात्रा-वृतांत,कविता के रूप में योगदान.





एक यात्रा पोनुंग के नाम





मै पासी घाट (अरुणाचल प्रदेश) जा रहा हूँ. यह कल्पना ही मुझे रोमांचित कर रही है. रोमांच का दूसरा कारण था यह सोचना कि इस बार पासी घाट, ब्रह्मपुत्र को स्टीमर द्वारा पार कर पहुँचा जायेगा. पहले भी दो बार पासी घाट गया हूँ.  लेकिन दोनों बार दो अलग-अलग रास्तों से. २००५ के दिसंबर  महीने में   जब  पहली बार पासी घाट (असम के धेमा जी होकर) जाने का अवसर मिला था तो बस तो जैसे पासी घाट को छुआ था. अचानक पता चला की टूटिंग में पहले  सियांग नदी   उत्सव का आयोजन  है और
अरुणाचल प्रदेश राज्य सरकार के सूचना जनसंपर्क विभाग की गाडी में मेरे लिए भी
एक सीट आरक्षि हो गयी है. अपुन के लिए यह किसी बड़ी खुशी से कम का अवसर नहीं  था.
टूटिंग यानी भारत चीन सीमा पर मैक मोहन लाइन के पास का एक कस्बा. अरुणांचल  प्रदेश  के सुदूर
हिस्सों  को करीब से देखने की इच्छा  ईटानगर में  पहुँचने के बाद से तीव्र  हो गयी थी. ईटानगर में मैं मई 2004 में पहुंचा था. आकाशवाणी ईटानगर में कार्यक्रम अधिशाषी के रूप में स्थानान्तरित हो कर. तो २००५ के दिसंबर में टूटिंग जाते समय पासी  घाट रूका  था.रात्रि विश्राम हेतु.  २००७ की जनवरी में दुबारा पासी घाट गया था. इस बार अरुणाचल के अन्य कस्बे आलोंग पहुंचा था. फिर आलोंग के रास्ते पासी घाट में प्रवेश किया था. मौका था दूसरे सियांग नदी उत्सव  में भाग लेने का. 



जून २००७ में ईटानगर से स्थानान्तरित हो कर मैं लखनऊ आ गया था.
ईटानगर में रहते हुए अरूणाचल की विभिन्न जनजातियों के त्यौहारों में मैं शरीक हुआ था. चाहें प्रतिवर्ष ५ अप्रेल को मनाया जाने वाला 'गालो' जनजाति का मोपिन उत्सव हो. 5 जुलाई को मनाया जाने वाला 'आपातानी' जनजाति का 'द्री' उत्सव हो, २६ फरवरी को मनाया जाने वाला 'निशी' जनजाति का न्योकुम उत्सव हो, १४ अप्रैल को मनाया जाने वाला 'खाम्ती' जनजाति का सानकेन उत्सव हो या फिर............... लिस्ट बहुत लम्बी है. क्योकि अरुणाचल में २६ प्रमुख जनजातियां प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों का प्रतिनिधित्व करती है. और इनमें से अधिकांश जनजातियों के उत्सव ईटानगर में भी आयोजित होते है .




लेकिन इन सबसे अलग जिस त्यौहार ने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया था वह था अरुणाचल के ईस्ट सियांग और अपर सियांग जिलों में रहने वाली आदी जनजाति के त्यौहार सोलुंग ने. अरुणाचल से जुडी किताबों में पढ़ा था और ईटानगर में अपने मित्रों से सुना भी था कि सोलुंग त्यौहार में आदी जनजाति की महिलायें अपनी बस्तियों में (अरुणाचल में गाँव को बस्ती कहने का रिवाज है ) ४ रात तक लगातार नृत्य करती हैं. यद्यपि ईटानगर में भी सोलुंग त्यौहार को ४ दिनों तक मनाये जाने की परम्परा है लेकिन यहाँ सोलुंग का स्वरूप नागरी है. यहाँ एक मैदान का नाम ही 'सोलुंग ग्राउन्ड' है. और महिलायें एवं बच्चे प्रतिवर्ष १ सितम्बर से ४ सितम्बर सुबह से शाम तक बहुत सारे सांस्कृतिक कार्यक्रम इस मैदान में प्रस्तुत करते हैं..



तो अरुणाचल प्रवास में मन में दबी जिज्ञासा को शांत करने के लिए हमने कमर कस ली कि इस बार सोलुंग का आनंद पासी घाट की किसी बस्ती में जा कर लिया जाएगा. और यह भी देखेंगे कि क्या यहाँ महिलायें ४ दिन तक नृत्य करती हैं? अरुणाचल छोड़े ४ वर्ष का समय बीत चुका है, लेकिन अरुणाचल की लोक संस्कृति की मोहकता ने अब तक ऐसा सिक्का जमा रखा है  कि बार-बार अरुणाचल जाने का मन करता है. २८ अगस्त २०११ को लखनऊ के चारबाग रेलवे स्टेशन से जब हमने अपनी यात्रा शुरू की तो खुशी, उत्साह और उत्सुकता के मिश्रित भाव हमारे चेहरों पर थे. इस यात्रा में मेरे हमराह थे पत्रकार मित्र सुन्दर अय्यर जो अपने फोटोग्राफी शौक के चलते पत्रकारिता को त्याग कर अब दिन-रात फोटोग्राफी में ही जुटे हैं.







(चित्र 1: ब्रह्म पुत्र नदी में जहाज)

गौहाटी की उमस और गर्मी को झेलते हुए गौहाटी से डिब्रूगढ़ जाने के लिए जब हम कामरूप एक्सप्रेस में बैठे तो एक नए रेल पथ को देखने का उत्साह मन में हिलोरें मार रहा था. गौहाटी से डिब्रूगढ़ जाने का पूरा रास्ता बेहद नयनाभिराम दृश्यों से भरा हुआ था. खेतों में दूर दूर तक खड़ी धान की फसल को देख कर ऐसा लगता जैसे किसी ने धरती को एक लम्बी चौड़ी हरी चादर से ढक दिया हो. इसके साथ ही छोटे-छोटे जलाशयों में ढेर सारा पानी तो कहीं खेतों के पीछे दिखती छोटी-छोटी पर्वत श्रृंखलाएं. मन होता गाड़ी की चेन खींच इन दृश्यों को निहारते रहें. लेकिन हमारी मंजिल तो अभी आगे थी. पहले हमें डिब्रूगढ़ पहुचना था फिर वहां से ब्रह्मपुत्र को पार कर पासी घाट. सुबह ६ बजते बजते हम डिब्रूगढ़ में थे और थोड़ी देर बाद ही ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे. घाट पर स्टीमर यात्रियों को दूसरे छोर पर ले जाने की तैयारी में खडा था. स्टीमर में धीरे धीरे सवारियां भर रहीं थी. यात्रियों के साथ एक जिप्सी और २ मोटर सायकिलें अपनी जगह बना चुकी थीं. भुक-भुक की आवाज के साथ जब स्टीमर ने घाट का किनारा छोड़ा तो मैं एक बार फिर स्मृतियों के प्रांगण में बिचरने लगा.






(चित्र 2: पासी घाट में एक पारंपरिक घर)


पासी घाट यानी अरुणाचल का सबसे पुराना नगर. पासी घाट यानी सियांग के तट पर एक लम्बी चौड़ी घाटी में बसा अरुणाचल के ईस्ट सियांग जिले का मुख्यालय. पासी घाट यानी आदी जनजाति के पदम्, मिन्योंग और पासी लोगों का मूल निवास स्थान. जब अरुणाचल के अन्य हिस्सों में विकास की कोई रोशनी नहीं थी जब अरुणाचल सिर्फ घने बनों से आच्छादित था, उस समय भी पासी घाट में स्कूल कालेज थे. प्रदेश का पहला महाविद्यालय और पहला रेडियो स्टेशन भी पासी घाट में ही खुला. अरुणाचल का एक मात्र हार्टीकल्चर कालेज भी पासी घाट में ही है. अरुणाचल में और ढेर सारी चीजों की शुरूआत पासी घाट से ही हुई. लेकिन पासी घाट में मेरी रुचि यहाँ के संस्थानों को लेकर कदापि नहीं थी. मैं तो सिर्फ और सिर्फ सोलुंग के लिए यहाँ जा रहा था. बल्कि सोलुंग के अवसर पर होने वाले पोनुंग नृत्य को देखने में मेरी रुचि थी. प्रति वर्ष १ से ४ सितम्बर तक सोलुंग त्यौहार पासी घाट और आस-पास के क्षेत्रों में खूब जोश और उत्साह से मनाया जाता है.


१ सितम्बर को हम लोग उस मैदान में थे जहां कुछ देर बाद सोलुंग उत्सव का विधिवत उदघाटन होना था. मुख्य अतिथि के स्वागत के लिए परम्परागत परिधानों में स्थानीय निवासी उपस्थित थे. स्वागत का मुख्य दायित्व स्थानीय सांसद निनोंग एरिंग ने संभाल रखा था. तो मुख्य अतिथि स्थानीय विधायक और राज्य के शिक्षा मंत्री बोसी राम सीराम थे. मुख्य अतिथि के आगमन के साथ ही परम्परागत वेश भुसा में सजी महिलाओं ने सोलुंग गीतों और नृत्य के द्वारा मुख्य अतिथि का स्वागत किया. इसके बाद सोलुंग ध्वज को फहराकर मुख्य अतिथि ने त्यौहार का औपचारिक उदघाटन किया. मुख्य कार्यक्रम सोलुंग मैदान में ही बने एक बड़े हाल में आयोजित किया गया. विभिन्न प्रतियोगिताओं में विजयी बच्चो को पुरस्कृत करने के बाद एवं मुख्य अतिथि एवं वक्ताओं के संबोधन के पश्चात लड़कियों और महिलाओं के विभिन्न गुटों ने आकर्षक नृत्य प्रस्तुत किये. अपने मित्र सुन्दर अय्यर के साथ जब मैं सर्किट हाउस लौटने की तैयारी में था कि तभी हमारे पुराने मित्र और आकाश वाणी पासी घाट में कार्यक्रम अधिशाषी किजीर मिन्दो ने हमें सूचित किया कि हमारा लंच कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के घर पर है. यानी जो थोड़ी देर पहले मेहमान थे अब मेजबान हो गए थे. मिन्दो भाई की कार से हम लोग प्रदेश के शिक्षा मंत्री बोसीराम सीराम के घर पहुचे तो वहां पहले से ही काफी लोग मौजूद थे. परम्परागत रूप से बनाए गए बांस के एक लम्बे-चौड़े हाल में सामने एक छोटे से मंच पर सोलुंग गीतों के साथ ही नेपाली गीतों के साथ नृत्य करती किशोरियां थीं. तो वहीं दूसरी तरफ सिराम साहब बेहद आत्मीयता से आगंतुकों से मिल रहे थे. और सबको भोजन के लिए आमंत्रित कर रहे थे. .




(चित्र 3: मेहमानो का स्वागत करते स्थानीय सांसद)



शाम को हमें उस कार्यक्रम में शरीक होना था जिसके लिये  हम लोगों ने इनी  लम्बी  यात्रा  की  थी. 
टानगर  प्रवास  के दौरान मेरे  मित्रता पासी घाट के ही रहने वाले  सोलुंग तांगु  नाम  के नवयुवक के साथ हो गयी थी. मैं अरुणाचल विश्वविद्यालय  के पत्रकारिता  एवं जनसंचार विभाग में 
विजिटिंग  फैकल्टी था. और सोलुंग वहां एक छात्रधीरे  धीरे  गुरू -शिष्य  से  हम  मित्र बन गए. सोलुंग तांगु दरअसल सोलुंग उत्सव के दिन यानी १ सितम्बर को पैदा हुआ था, इसलिए घर वालों ने उसका नाम सोलुंग रख दिया था. वर्तमान में सोलुंग अरुणांचल के ही अनजाव जिले में केन्द्रीय सरकार के एक कार्यालय में नियुक्त है. छूट्टी नहीं मिलने के कारण वह पासी घाट में नहीं था लेकिन उसने यह व्यवस्था कर दी थी की हम उसके ससुराल में जा कर सोलुंग पर्व का आनंद उठा सकें. पासी घाट से लगभग २० किलो मीटर दूर एक गाँव में हम लोग शाम होते होते पहुँच चुके थे.



(चित्र 4: पोनुंग नृत्य के सदस्य)



गाँव में पोनुंग की तैयारियां चल रहीं थीं. पोनुंग महिलाओं द्वारा किया जाने वाला एक सामूहिक नृत्य है, जिसमे महिलाओं की संख्या निर्धारित नहीं होती. रात्रि ८-९ बजे से शुरू हो कर सुबह ४ बजे तक यह नृत्य चलता है. नृत्य एक गोल घेरे में होता है. गोल घेरे के बीच एक पुरुष गायक (जिसे मिरी कहते हैं.) कुछ पंक्तियाँ गाता है फिर महिलाएँ उन्हीं पंक्तियों को दुहराती हैं. इस दौरान वह अपने दोनों हाथों और पांवो को आगे-पीछे ले जाते हुए दायीं ओर बढ़ती हैं. मिरी द्वारा गाये जा रहे बोलों में सृष्टि के बनने, मनुष्य की उत्पत्ति, मनुष्य की बुराइयों पर जीत, संसार में मनुष्य और उसके सद्गुणों के स्थापित होने का वर्णन जैसी बहुत सी चीजें शामिल होती हैं. वहीं आधुनिक समय में मनोरंजन की दृष्टि से नयी लाइनें भी जोड दी गयी हैं. रात लगभग ९ बजे के आस पास सभी उम्र की महिलाओं का दल बांस के बने एक सामुदायिक हाल में पहुँच गया था. इस सामुदायिक हाल को 'नामघर' के नाम से जाना जाता है. जहां 'नामघर' के भीतर महिलाओं के अलावा गाँव के बड़े बूढ़े और नौजवान थे वहीं 'नामघर' के बाहर गाँव वालो ने बहुत सी दुकाने खोल रखीं थीं. कहीं रिंग फेक कर सामान जीतने वाला स्टाल था,तो कहीं खाने पीने की दूकान, लेकिन सबसे ज्यादा भीड़ तो झंडी मुडा की दुकानों पर थी जहाँ ६ पासे फेक कर पैसा जीतने का खेल था. कुल मिलाकर गाँव के एक मेले का दृश्य वहाँ उपस्थित था.



(चित्र 5: पोनुंग का मिरी)



पोनुंग शुरू हो चुका था. मिरी के बोलो पर महिलाओं ने नृत्य शुरू कर दिया था. एक लम्बे चौड़े आयताकार हाल में बांस की दीवारों के समानांतर, अपने शरीर को हौले-हौले आगे पीछे ले जाती महिलाएँ सोलुंग पर्व की मस्ती में डूबने लगी थी. हाल में लगी सी एफ एल की मदधिम रोशनी नृत्य की मंथर गति में अपना योगदान देती प्रतीत हो रहीं थी. वृद्ध मिरी पूरे जोश के साथ पोनुंग को गति प्रदान करता हुआ लग रहा था. महिलाओं के नृत्य का आकर धीरे-धीरे विस्तार प्राप्त कर रहा था. सभी उम्र की महिलाएँ इस नृत्य में शामिल थी. मै यह सोच कर आश्चर्यचकित था कि कैसे यह सब रात भर नृत्य करेंगी? मिरी के बोलों को दुहराती मंथर गति से अपने स्थान से आगे बढ़ती, पूरे हाल की परिक्रमा करती, एक से वस्त्र पहनी, समूह में अपनी निजता का लोप करतीं यह सब महिलाएँ अपनी संस्कृति 'आदी संस्कृति' के उच्च आदर्शों का प्रतिनिधित्व करती नजर आ रहीं थी. पोनुंग के इस कार्यक्रम के दौरान अचानक स्थानीय सांसद निनोंग एरिंग से मुलाकात हो जाती है. सुबह सोलुंग ग्राउंड पर उनसे परिचय हो चुका था. हम लोगो को बस्ती में देख कर वह भी आश्चर्यचकित हुए बिना नहीं रहते. बताते हैं कि रात भर उन्हें अलग-अलग बस्तियों में जाना होगा .




(चित्र 6:   पोनुंग नृत्य प्रस्तुत करते हुए आदी युवतियाँ)  



रात के १० बज चुके थे. रात्रि का भोजन कराने के बाद (जिसमे स्थानीय जानवर मिथुन का मांस और चावल की बनी देशी बियर अपुंग शामिल थी) हमारे मेजबान हमें पासी घाट स्थित सर्किट हाउस में छोड़ने के लिए गाड़ी स्टार्ट करते हैं. वापस पासी घाट लौटते समय मेरे मन में उमड़ते हैं बहुत से विचार. पोनुंग की यह परम्परा न जाने कितने वर्षो से इस क्षेत्र में चल रही होगी. जहाँ देश के महानगरों, शहरों, कस्बों में उपभोक्तावाद से प्रभावित् होकर हर कोई बाजार के पीछे दौड़ रहा है, वहीँ देश के इस भू भाग में नागरिक न्यूनतम सुविधाओं में जीते हुए भी जीवन का भरपूर लूत्फ उठा रहे हैं. क्या समाज का यह माडल हम सब के लिए अनुकरणीय नहीं है? जिसमे अपनी लोक संस्कृति को बचाए रखने की तड़प है और जीवन को पूरी मासूमियत के साथ जीने की निर्भीकता भी शामिल है.   


सभी चित्र: प्रतुल जोशी एवं सुन्दर अय्यर   



संपर्क:  कार्यक्रम अधिशाषी, आकाशवाणी, 18, विधान सभा मार्ग, लखनऊ


मोबाईल- 09452739500



टिप्पणियाँ

  1. स्मरणीय एवम रोचक प्रस्तुति.एकदम आपके कार्यक्रम 'दुनिया की सिर कर लो' की तरह.बधाई.थोडा खाने-पीने का भी उल्लेख होता तो स्वाद और भी बढ़ जाता.खैर फिर किसी यात्रा की प्रतीक्षा करेंगे.

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