कुंवर नारायण की इतिहासपरक कविताएं
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| कुंवर नारायण |
समय के साथ इतिहास का चोली दामन का सम्बन्ध होता है। इतिहास साक्ष्यों की धार पर अपने अंदाज में ही चलता है। इधर उधर होने की वहां कोई गुंजाईश ही नहीं। अनेक ऐसे व्यक्तित्व हैं जो न केवल घटनाओं के साक्षी रहे बल्कि जिन्होंने अपनी रचनाओं के जरिए इतिहास को सृजित किया। अमीर खुसरो ऐसे ही व्यक्ति थे जो सात सुल्तानों को दिल्ली की गद्दी पर आसीन होने के प्रत्यक्षदर्शी थे। सुल्तान बनने बनाने के षडयंत्रों से वे भलीभांति वाक़िफ़ थे। इसीलिए नफ़रती राजनीति से उन्हें घृणा हो गई। कुंवर जी अपनी अमीर खुसरो कविता में लिखते हैं 'भूल जाना मेरे बच्चे कि ख़ुसरो दरबारी था।/ वह एक ख़्वाब था—/ जो कभी संगीत /कभी कविता / कभी भाषा/ कभी दर्शन से बनता था/वह एक नृशंस युग की सबसे जटिल पहेली था/ जिसे सात बादशाहों ने बूझने / की कोशिश की! कुंवर नारायण ने इतिहास को कविता में बरतने का सराहनीय प्रयास किया है। ये कविताएं उनकी इतिहास दृष्टि की परिचायक हैं। आज उनके जन्मदिन पर हम उनकी स्मृति को प्रणाम करते हैं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं कुंवर नारायण की इतिहासपरक कविताएं।
कुंवर नारायण की इतिहासपरक कविताएं
अमीर खुसरो
हाँ ग़यास, दिल्ली के इसी डगमगाते तख़्त पर
एक नहीं ग्यारह बादशाहों को
बनते और उजड़ते देखा है।
ऊब गया हूँ इस शाही खेल तमाशे से
यह ‘तुग़लकनामा'—बस, अब और नहीं।
बाक़ी ज़िंदगी मुझे जीने दो।
सुल्तानों के हुक्म की तरह नहीं
एक कवि के ख़यालात की तरह आज़ाद
एक पद्मिनी के सौंदर्य की तरह स्वाभिमानी
एक देवल रानी के प्यार की तरह मासूम
एक गोपाल नायक के संगीत की तरह उदात्त
और एक निज़ामुद्दीन औलिया की तरह पाक।
ग़यास एक स्वप्न देखता है, “अब्बा जान
उस संगीत में तो आपकी जीत हुई थी?”
“नहीं बेटा, हम दोनों हार गए थे।
दरबार जीता था।
मैंने बनाए थे जो क़ानून
उसमें सिर्फ़ मेरी ही जीत की गुंजाइश थी।
मैं ही जीतूँ
यह मेरी नहीं आलमपनाह की ख़्वाहिश थी’’
ख़ुसरो जानता है अपने दिल में
उस दिन भी सुल्तानी आतंक ही जीता था
अपनी महफ़िल में।
भूल जाना मेरे बच्चे कि ख़ुसरो दरबारी था।
वह एक ख़्वाब था—
जो कभी संगीत
कभी कविता
कभी भाषा
कभी दर्शन से बनता था
वह एक नृशंस युग की सबसे जटिल पहेली था
जिसे सात बादशाहों ने बूझने की कोशिश की!
ख़ुसरो एक रहस्य था
जो एक गीत गुनगुनाते हुए।
इतिहास की एक बहुत कठिन डगर से गुज़र गया था।
अभिनव गुप्त
सावधान आचार्य!
सरासर झूठ बोलता है आईना
वह सब जो हमारे दाईं ओर है
हमारे बाईं ओर दिखाता,
वह सब जो हमारी बाईं ओर है
हमारे दाईं ओर बताता
अतः
एक शक की गुंजाइश है वहाँ भी
कि हम सिर के बल खड़े हैं
या पाँवों के बल?
या
कहीं ऐसा तो नहीं
कि आकाश और पाताल को मिलाती
एक काल्पनिक रेखा
जहाँ दाएँ बाएँ को काटती है
सचाई का सबसे नाज़ुक बिंदु वही हो?
दुनिया की चिन्ता
छोटी सी दुनिया
बड़े-बड़े इलाके
हर इलाके के
बड़े-बड़े लड़ाके
हर लड़ाके की
बड़ी-बड़ी बन्दूकें
हर बन्दूक के बड़े-बड़े धड़ाके
सबको दुनिया की चिन्ता
सबसे दुनिया को चिन्ता।
चन्द्रगुप्त मौर्य
अब सुलह कर लो
उस पारदर्शी दुश्मन की सीमाहीनता से
जिसने तुम्हें
तुम्हारे ही गढ़ में घेर लिया है
कहाँ तक लड़ोगे
ऐश्वर्य की उस धँसती हुई
विवादास्पद ज़मीन के लिए
जो तुम्हारे पाँवों के नीचे से खिसक रही?
अपनी स्वायत्तता के अधिकारों को त्यागते ही
तुम्हारे शरीर पर जकड़ी जंज़ीरें
शिथिल पड़ जाएँगी। तुम अनुभव करोगे
एक अजीब-सा हल्कापन।
उस शक्ति-अधिग्रहण को स्वीकार करते ही
तुम्हें प्रदान किया जाएगा
मैत्री का एक ढीला चोला-
एक कुशा-मुकुट-
सहारे के लिए एक काष्ठ-कोदंड-
और तुम्हारे ही साम्राज्य में दूर कहीं
एक छोटा-सा क़िला
जिसके अन्दर ही अन्दर तुम
धीरे-धीरे इस संसार से विरक्त होते चले जाओगे...
तुम्हारा पुनर्जन्म होगा, सदियों बाद,
किसी अनुश्रुति में, एक शिलालेख के रूप में...
अबकी वर्तमान में नहीं, अतीत में-
जहाँ तुम विदग्ध सम्राटों की सूची में
स्वयं को अंकित पाओगे।
आजकल कबीरदास
कबीरदास आजकल
मगहर में रहते हैं कबीरदास।
कहाँ है मगहर?
उत्तर प्रदेश में छोटा-सा गाँव
न जाने किस समय में
ठहरी हुई ज़रा-सी जगह में
कुटिया डाल, करते अज्ञातवास
जीते एक निर्वासित जीवन
आजकल कबीरदास
यदा-कदा दिख जाते फ़क़ीरों के भेस में
कभी अनमने-से साहित्य-समाज में
सब कहते-
सह नहीं सके जब
जग की उलटबाँसी,
छोड़ दिया कासी
आजकल कम ही लौटते हैं वे
अपने मध्यकाल में,
रहते हैं त्रिकाल में।
एक दिन दिख गए मुझको
फ़िलहाल में
पूछ बैठा
फक््कड़-से दिखते एक व्यक्ति से
“आप श्री दास तो नहीं,
अनन्त के रिश्तेदार?”
अक्खड़ खड़ी बोली में बोले-
“कोई फ़र्क़ नहीं इसमें
कि मैं 'दास' हूँ या 'प्रसाद'
"नाथ! हूँ या 'दीन!
'गुप्त' हूँ या "नारायण'
या केवल एक समुदाय, हिन्दू या मुसलमान,
या मनुष्य की सामूहिक पहचान
ईश्वर-और-अल्लाह,
या केवल एक शब्द में रमण करता
पूरा ब्रह्मांड,
या सारे शब्दों से परे एक रहस्य”
स्पष्ट था कि पहचान का ही नहीं
भाषा का भी संकट था इस समय
जैसे मेरे और उनके समय को लेकर
उनका अद्वैत भाव-
“कौन कह सकता है कि जिसे
हम जी रहे आज
वह कल की मृत्यु नहीं,
और जिसे हम जी चुके कल
वह कल का भविष्य नहीं?”
उनकी वाणी में एक राज़ था
जैसे उनकी चुप्पी में।
“अनन्त से मेरा कोई नज़दीकी रिश्ता नहीं,
वह केवल एक नाम है
जिससे मैं उसे पुकारता हूँ कभी-कभी
पर जो उसकी पहचान नहीं।
वैसे भी, रिश्तों को नाम देना
बिलकुल फ़र्ज़ी है,
होशियारी ज़रूरी है नामों को ले कर,
लोग लड़ते-मरते हैं
जिन नामों को ले कर
झूठे पड़ जाते वे देखते-देखते,
लाशों में बदल जाते
फूलों के ढेर,
करुणा और सुन्दरता का अनाम भाव
स्वाहा हो जाता है
नामों की जात-पाँत के धधकते पड़ोस में।”
एक दिन मिल गए मुझे
लोदी बाग़ के एक शानदार मक़बरे में।
ज़मीन पर पड़े एक बेताज सिकन्दर को देखकर बोले-
“नापसन्द था मुझे
सत्ता के दरबारों में सिर झुकाना।
जंज़ीरों की तरह लगते थे मुझे
दरबारी कपड़े
जिनमें अपने को जकड़े
पेश होना पड़े किसी को भी
भरे दरबार में
खुद को एक क़ैदी की तरह पकड़े,
चेहरे पर कसे मुखौटे की पाबन्दी को
उतारकर बेचेहरा होते हुए
चाहिए एक ऐसी मुक्ति
जिसमें न प्रसन्नता हो, न उदासी
न किसी का प्रभाव हो, न दबाव
केवल एक दार्शनिक हो अपना सद्भाव
सबके बीच लेकिन सबसे
थोड़ा हट कर भी”
देखकर अपना ज़माना
यक़ीन नहीं होता कि अब बीत गया
उनका ज़माना,
कि अब वे कहीं नहीं,
न् काशी में, न मगहर में
कि अब वे केवल इसे जानने में हैं
कि वस्तुगत हो कर देखना
वस्तुवत् होकर देखना है,
सही को जानना
सही हो जाना है,
उनका हर शब्द एक ज़रूरी भेद करता
दृष्टि और दृष्टि-दोष में
स्थूल की सीमाओं के षड्यन्त्र में
कौन रहता है आशंकित हर घड़ी
कि अब ज़्यादा देर नहीं उसकी हत्या में,
कि वे ही उसे मारेंगे
जिन्हें उसने बेहद प्यार दिया
वे हत्यारे नहीं
अज्ञानी हैं
जो उसे बार-बार मृत्युदंड देते
उसे सूली पर चढ़ाते
उसकी अपनी ही हत्या के जुर्म में।
कौन आश्वस्त है फिर भी
कि वह मरेगा नहीं,
मर सकती है वह दुनिया
जिस पर होते रहते अत्याचार।
आज भी यक़ीन नहीं होता
कि वह जीवनद्रोही नहीं
एक सच्चा गवाह था जीवन का
जिसने जाते-जाते कहा था-
कहाँ जाऊँगा छोड़ कर
इतनी बड़ी दुनिया को
जो मेरे ही अन्दर बसी है
हज़ारों वर्षों से
यहीं रहूँगा-
इसी मिट्टी में मिलूँगा
इसी पानी में बहूँगा
इसी हवा में साँस लूँगा
इसी आग से खेलूँगा
इन्हीं क्षितिजों पर होता रहूँगा
उदय-अस्त,
इसी शून्य में दिखूँगा खोजने पर
अनर्गल वस्तुओं
और आत्मरत दुनिया से विमुख
एक निरुद्वेल में
लिखकर एक अमिट हत्ताक्षर-प्रेम
उसने एक गहरी साँस ली
और भाप बन कर छिप गया
फिर एक बार बादलों के साथ
बेहद में।
कोलंबस का जहाज
बार-बार लौटता है
कोलम्बस का जहाज
खोज कर एक नई दुनिया,
नई-नई माल-मंडियाँ,
हवा में झूमते मस्तूल
लहराती झंडियाँ।
बाज़ारों में दूर ही से
कुछ चमकता तो है −
हो सकता है सोना
हो सकती है पालिश
हो सकता है हीरा
हो सकता है काँच...
ज़रूरी है पक्की जाँच।
ज़रूरी है सावधानी
पृथ्वी पर लौटा है अभी-अभी
अंतरिक्ष यान
खोज कर एक ऐसी दुनिया
जिसमें न जीवन है − न हवा − न पानी
सरहपा
अकेला कवि सरहपा
भटकता है राज्ञी से श्रीपर्वत तक
खोजता मुक्ति का अर्थ
विद्वत्समाज में
सभा गोष्ठियों में
सुंदर विदुषी
कनखियों से देखती उसे
शबर-कन्या
कुशल संधान!
एक ही शर से बींध देती
असावधान कवि का हृदय और बुद्धि
निषेधों को पार करता
एक दुस्साहस
डूबकर नहाता आँखों की नीली झील में
धूप में सीपी-से चमकते कानों में पढ़ता एक मंत्र
चिकने कपोलों पर लिखता प्यार के मनमाने छंद
लहराते केशों की सुगंध में ऊँघती एक मदहोशी
चूमता नाभि-कमल
तितली हो जाता एक मन
जैसे चाँद तारे आकाश में
वैसे ही इंद्रियाँ विभिन्न स्थान शरीर में
दुर्लभ संयोग से
झरते बीज-बिंदु फूलों से
काया से उगता वसंत।
दोनों मिलकर खेलते एक खेल
जिसमें दोनों जीतते हैं एक साथ।
बचा रह जाता
उस खेल का कवित्व,
और स्त्री-पुरुष, ऊँच-नीच के अभेद में
मनुष्य के मुक्त होने का अर्थ।
इब्नबतूता
माबर के जंगलों में
सोचता इब्नेबतूता-पैने बांसों की सूलियों में बिंधे
कौन हैं ये जिनके शरीर से रक्त चूता?
दिन में भी इतना अंधेरा
या सुल्तान अंधा है
जिसकी अंधी आंखों से मैं देख रहा हूं
मशाल की फीकी रोशनी में छटपटाता
तवारीख का एक पन्ना
इस बर्बर समारोह में
कौन है ये अधमरे बच्चे, औरतें
जिनकी बेदम शरीरों से
हाथ पांव एक-एक कर अलग किए जा रहे हैं
काफिर या मनुष्य कौन हैं ये
मेरे इर्द-गिर्द जो
शरीयत के खिलाफ
शराब पिए जा रहे हैं
कोई नहीं, कुछ नहीं
यह सब एक गंदा ख्वाब है
यह सब आज का नहीं
आज से बहुत पहले का इतिहास है
आदिम दरिंदों का
जिसका मैं साक्षी नहीं...
सुल्तान मुझे इजाजत दो
मेरी नमाज का वक्त है।
लखनऊ
किसी नौजवान के जवान तरीक़ों पर त्योरियाँ चढ़ाए
एक टूटी आरामकुर्सी पर
अधलेटे
अधमरे बूढ़े-सा खाँसता हुआ लखनऊ।
कॉफ़ी-हाउस, हज़रतगंज, अमीनाबाद और चौक तक
चार तहज़ीबों में बंटा हुआ लखनऊ।
बिना बात बात-बात पर बहस करते हुए-
एक-दूसरे से ऊबे हुए मगर एक-दूसरे को सहते हुए-
एक-दूसरे से बचते हुए पर एक-दूसरे से टकराते हुए-
ग़म पीते हुए और ग़म खाते हुए-
ज़िन्दगी के लिए तरसते कुछ मरे हुए नौजवानों वाला लखनऊ।
नई शामे-अवध-
दस सेकेण्ड में समझाने-समझनेवाली किसी बात को
क़रीब दो घण्टे की बहस के बाद समझा-समझाया,
अपनी सरपट दौड़ती अक़्ल को
किसी बे-अक़्ल की समझ के छकड़े में जोतकर
हज़रतगंज की सड़क पर दौड़ा-दौड़ाकर थकाया,
ख़्वाहिशों की जगह बहसों से काम चलाया,
और शामे-अवध को शामते-अवध की तरह बिताया।
बाज़ार-
जहां ज़रुरतों का दम घुटता है,
बाज़ार-
जहाँ भीड़ का एक युग चलता है,
सड़कें-
जिन पर जगह नहीं,
भागभाग-
जिसकी वजह नहीं,
महज एक बे-रौनक़ आना-जाना,
यह है-शहर का विसातखाना।
किसी मुर्दा शानोशौकत की क़ब्र-सा,
किसी बेवा के सब्र-सा,
जर्जर गुम्बदों के ऊपर
अवध की उदास शामों का शामियाना थामे,
किसी तवायफ की ग़ज़ल-सा
हर आने वाला दिन किसी बीते हुए कल-सा,
कमान-कमर नवाब के झुके हुए
शरीफ आदाब-सा लखनऊ,
खण्डहरों में सिसकते किसी बेगम के शबाब-सा लखनऊ,
बारीक़ मलमल पर कढ़ी हुई बारीक़ियों की तरह
इस शहर की कमज़ोर नफ़ासत,
नवाबी ज़माने की ज़नानी अदाओं में
किसी मनचले को रिझाने के लिए
क़व्वालियां गाती हुई नज़ाक़त :
किसी मरीज़ की तरह नई ज़िन्दगी के लिए तरसता,
सरशार और मजाज़ का लखनऊ,
किसी शौकीन और हाय किसी बेनियाज़ का लखनऊ
यही है क़िब्ला
हमारा और आपका लखनऊ।
रास्ते (फतेहपुर सीकरी)
वे लोग कहाँ जाने की जल्दी में थे
जो अपना सामान बीच रास्तों में रखकर भूल गए हैं?
नहीं, यह मत कहो कि इन्हीं रास्तों से
हज़ारों-हज़ारों फूल गए हैं...
वह आकस्मिक विदा (कदाचित व्यक्तिगत !)
जो शायद जाने की जल्दी में फिर आने की बात थी।
ये रास्ते, जो कभी खास रास्ते थे,
अब आम रास्ते नहीं।
ये महल, जो बादशाहों के लिए थे
अब किसी के वास्ते नहीं।
आश्चर्य, कि उन बेताब ज़िन्दगियों में
सब्र की गुंजाइश थी...
और ऐसा सब्र कि अब ये पत्थर भी ऊब रहे हैं।
अनात्म देह (फतेहपुर सीकरी)
इन परछाइयों के अलावा भी कोई साथ है।
सीढ़ियों पर चढ़ते हुए लगता है
कि वहाँ कोई है, जहाँ पहुँचूँगा।
मुंडेरों के कन्धे हिलते हैं,
झरोखे झाँकते हैं,
दीवारें सुनती हैं,
मेहराबें जमुहाई लेती,
गुम्बद, ताज़ियों के गुम्बद की तरह
हवा में कांपते हैं।
तालाब के सेवार-वन में जल की परछाईयां चंचल हैं,
हरी काई के कालीन पर एक अनात्मा देह लेटी है
और मीनारें चाहती हैं
कि लुढ़क कर उसके उरोजों को चूम लें।
दिल्ली की तरफ़
जिधर घुड़सवारों का रुख हो
उसी ओर घिसट कर जाते हुए
मैंने उसे कई बार पहले भी देखा है।
दोनों हाथ बंधे, मज़बूरी में, फिर एक बार
कौन था वह? कह नहीं सकता
क्योंकि केवल दो बंधे हुए हाथ ही
दिल्ली पहुँचे थे।
बर्बरों का आगमन
अब किसी भी बात को ले कर
चिंता करना व्यर्थ है। वे आ गये हैं।
उन्होंने फिर एक बार हमें जीत लिया है।
उनके सिपाही, दारोग़ा और जल्लाद —
उनके अफ़सर, सलाहकार और उस्ताद —
उनके हिजड़े, बावर्ची और इमाम —
उनके मसख़रे, बौने और हज्जाम —
उनके दरबारी और उनके नमकहलाल —
उनके मुसाहिब, ख़ुशामदी और दलाल —
चारों तरफ़
छा गये हैं. वे सब के सब
वापस आ गये हैं.
शहर की सभी खास और आम जगहों पर उनका कब्ज़ा है.
उनके फ़ौजी जत्थे अब
लूट और क़त्ले-आम की खुली छूट के लिए बेताब हैं...।
प्यार के बदले
कई दर्द थे जीवन में :
एक दर्द और सही, मैंने सोचा --
इतना भी बे-दर्द होकर क्या जीना !
अपना लिया उसे भी
अपना ही समझ कर
जो दर्द अपनों ने दिया
प्यार के बदले...
कोई दुःख
कोई दु:ख
मनुष्य के साहस से बड़ा नहीं-
वही हारा
जो लड़ा नहीं
और जीवन बीत गया
इतना कुछ था दुनिया में
लड़ने झगड़ने को
पर ऐसा मन मिला
कि ज़रा-से प्यार में डूबा रहा
और जीवन बीत गया..।




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