रणविजय सिंह सत्यकेतु का आलेख 'शुभा : दक्ष शिल्पी की उत्कृष्ट कृति'
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| अनूप लाल मण्डल |
परिचय
जन्म : 11 अक्तूबर 1896
मृत्यु : 21/22 सितंबर 1982
प्रेमचंद के परवर्ती और रेणु के पूर्ववर्ती अनूप लाल मंडल सुप्रसिद्ध उपन्यासकार, कथाकार और समाज सुधारक थे। उन्हें हिंदी साहित्य में वंचितों और उपेक्षित वर्गों को केंद्रीय चरित्र बनाकर लिखने वाले शुरुआती रचनाकारों में गिना जाता है। उन्होंने 20 से अधिक मौलिक और अनूदित उपन्यास लिखे। उनकी रचनाओं में ग्रामीण जीवन, समाज सुधार और यथार्थ का गहरा चित्रण मिलता है। उनके प्रमुख उपन्यासों में 'अपराधी की औलाद', 'मनुष्य इकाई है', 'माटी का माली', 'पिंजरे की उड़ान', 'तूफान और तिनके', 'नया सूरज नया चांद', 'मीमांसा', 'रक्त और रंग', और 'अवध पराया धन' प्रमुख है। उनके चर्चित उपन्यास 'मीमांसा' पर वर्ष 1940 में किशोर साहू द्वारा 'बहुरानी' नामक फिल्म बनाई गई थी। 'रक्त और रंग' उपन्यास को बिहार सरकार की ओर से पुरस्कृत किया गया था। 'शुभा' उपन्यास अप्रकाशित रह गया था। उनके उपन्यास 'तूफान और तिनके' में पिछड़ा वर्ग और समाज का मानक चित्रण किया गया है।
बिहार के कटिहार (तत्कालीन पूर्णिया) जिला के समेली प्रखंड के चकला मौलानगर गांव निवासी अनूपलाल मंडल के स्वाध्याय के जरिए हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग से साहित्यरत्न की उपाधि प्राप्त की।
सम्पत्ति अक्सर पारिवारिक विवाद का कारण बनती है। सामान्यतया घर के बड़े व्यक्ति को पारिवारिक नेतृत्व की जिम्मेदारी सौंप दी जाती है। लेकिन जिम्मेदारी के नाम पर लाभ लोभ की भावना से ग्रसित व्यक्ति न्याय मार्ग से विरत हो जाता है। हालांकि अन्य पारिवारिक सदस्य उसके बड़े होने के नाते उसका आदर करते हैं और उससे न्याय की अपेक्षा करते हैं। लेकिन संकीर्ण स्वार्थों में उलझा वह व्यक्ति अपने पारिवारिक हितों की सुरक्षा में लग जाता है भले ही इसका नुकसान अन्य पारिवारिक सदस्यों को उठाना पड़े। ऐसे लोग नैतिकता की बातें तो ज्यादा करते हैं लेकिन मन मस्तिष्क में अपने हित के बारे में ही सोचते और काम करते हैं। अनूप लाल मण्डल ने अपने उपन्यास 'शुभा' की विषयवस्तु इस पेचोंखम को ही बनाया है।गांधीवाद से प्रभावित मण्डल जी अन्ततः यथार्थवाद की तरफ मुड़ते हैं जिसका चित्रण उन्होंने वीरेश्वर नामक पात्र में किया है। अनूप जी कांग्रेस का भी जिक्र करते हैं जिसने आजादी की लड़ाई का नेतृत्व तो किया लेकिन आजादी के बाद सत्ता की लिप्सा में लग गई। पचास के दशक के कहानीकार अनूप जी प्रेमचंद की कथा परम्परा को आगे बढ़ाते हैं हालांकि बंगाली लेखकों का प्रभाव भी उन पर काफी हद तक दिखाई पड़ता है। 'शुभा' अनूप लाल मंडल का अप्रकाशित उपन्यास है। 'शुभा' का अप्रकाशित रह जाना साहित्यिक विडम्बना है। बहरहाल इस अप्रकाशित उपन्यास की एक विवेचना की है रणविजय सिंह सत्यकेतु ने। इसके माध्यम से सत्यकेतु इस उत्कृष्ट कृति को प्रकाश में लाने का कार्य करते हैं। अनूप जी की आज पुण्यतिथि है। उनकी स्मृति को हम नमन करते हैं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं रणविजय सिंह सत्यकेतु का आलेख 'शुभा : दक्ष शिल्पी की उत्कृष्ट कृति'।
आलेख
'शुभा : दक्ष शिल्पी की उत्कृष्ट कृति'
रणविजय सिंह सत्यकेतु
'शुभा' अनूप लाल मंडल का अप्रकाशित उपन्यास है। 'शुभा' का अप्रकाशित रह जाना साहित्यिक विडम्बना है। लेखन और प्रकाशन का यह द्वन्द्व (साहित्य में अनेकानेक) बेहतर संभावनाओं को विनष्ट करता रहा है। शुभा के साथ ही मैं उन तमाम कृतियों की ओर से कह रहा हूं कि संवेदनशीलता और सहयोग का इतना अभाव नहीं होना चाहिए कि सम्भावित ऊर्जा प्रकाश में भी न आने पाए। लेखकीय प्रतिद्वंदिता, प्रकाशीय हानि-लाभ, साहित्य प्रेम और कला के प्रति समर्पण की भावना के विपरीत है, बल्कि घड़ी-घड़ी/जगह-जगह ऐसा दावा करने वालों की दोहरी मानसिकता का द्योतक है। ऐसे दृष्टान्तों से सिद्ध होता है कि कैसे जमीन से जुड़े समर्थ कलाकार अपनी समस्त/यथेष्ट क्षमताओं के बावजूद धनाभाव एवं सम्पर्काभाव के कारण 'स्टारडम' की दौड़ से न केवल बाहर हो जाते हैं, बल्कि उसमें शामिल भी नहीं हो पाते।
बकौल अनूप लाल मंडल 'कर्ममय, अचंचल, तीक्ष्ण-धी, सदालापी, मधुर स्वभावा, कोमलांगी, नवोढ़ा युवती' 'शुभा' से मेरा साक्षात्कार प्रख्यात साहित्यकार डॉ. मधुकर गंगाधर के घर हुआ। अनूप जी के करीबी, आत्मीय रहे डॉ. मधुकर गंगाधर के पास 'शुभा' की पाण्डुलिपि सुरक्षित है। बिहार-राष्ट्रभाषा-परिषद् की 'परिषद्-पत्रिका' की सम्पादक डॉ. मिथिलेश कुमारी मिश्र ने जब 'अनूपलाल मंडल विशेषांक' के लिए लिखने का आदेश दिया तो कुछ अलग/अछूता लिखने के मेरे असमंजस को अपनी उदारता से दूर किया श्री मधुकर गंगाधर ने। एक अलग, सुरक्षित फाइल में में व्यवस्थित और 82 पेज के फुलस्केप कागज में विस्तृत 'शुभा' से साक्षात्कार कर मुझे हार्दिक प्रसन्नता हुई। उसके संघर्षशील जीवन में अनवरत आती रही घोर कठिनाइयों से लड़ते हुए अपने स्वाभामिमान की रक्षा करते रहने और शून्य से शिखर तक पहुँच जाने वाली शुभा के व्यक्तित्व से मैं गहरे प्रभावित हुआ। कथाशिल्पी अनूप लाल मण्डल द्वारा मनोयोगपूर्वक गढ़ी गई 'शुभा' के अप्रकाशित रह जाने का क्षोभ कुछ और गहरा गया...। औरों के साथ ही डॉ. मधुकर गंगाधर पर भी इसकी जिम्मेदारी जाती है।
'शुभा' एक व्यक्ति प्रधान/नायिका प्रधान उपन्यास है जिसके केन्द्र में इसकी नायिका शुभा है। तमाम घटनाएँ या तो शुभा से सम्बद्ध हैं या उसके ईद-गिर्द घूमती/घटती हैं। यद्यपि उपन्यासकार ने इस छोटे से उपन्यास में घटनाओं की शृंखला खड़ी कर दी है और तत्सम्बन्धी अनेक पात्रों को उपस्थित किया है, किन्तु कोई भी घटना या पात्र शुभा की उपस्थिति को कमतर करने की स्थिति में नहीं है, वीरेश्वर भी नहीं जिसका चरित्र वास्तव में उदात्त कहा जा सकता है और जिसे शुभा के चरित्र/व्यक्तित्व में रह गयी कमी को पूरा करने के लिए ही उपस्थित किया गया लगता है। उपन्यास की शुरुआत वीरेश्वर के प्रणय-निवेदन के प्रति शुभा के विद्रोह करने तथा उपन्यास का अन्त वीरेश्वर के विराट व्यक्तित्व के प्रति शुभा के समर्पण करने से होता है। बाकी कहानी फ्लैश बैक में चलती है जो वास्तव में शुभा के जीवन-संघर्ष की कहानी होती है।
शुभा का जन्म एक मध्यवित्त परिवार में तब हुआ जब देश में विदेशी शासन के विरुद्ध असहयोग आन्दोलन चल रहा था। उसके पिता दो भाइयों में छोटे थे और अपना जीवन सर्वस्व स्वतंत्रता आंदोलन को समर्पित कर चुके थे। बड़े पिता जी (ताऊ) गाँव-समाज के प्रतिष्ठित पंच तथा खानदानी गौरव को हर-सम्भव बचाने को तत्पर व्यक्ति। उसके पिता शंकर कर्म एवं स्वभाव के अनुरूप वर्ण, लिंग, जाति, धर्म आदि के साथ ही शिक्षा, सुविधा, सेवा के मामले में रूढ़िमुक्त थे, इसके विपरीत उसके बड़े पिता जी सदाशिव उतने ही रूढ़िग्रस्त। शंकर कांग्रेस का पूर्णकालिक सदस्य होने के नाते घर के अन्दरूनी मामलों से अनभिज्ञ ही रहा, फलस्वरूप तेज तर्रार सदाशिव छोटे भाई की अंधश्रद्धा का लाभ उठाता रहा। शुभा की अत्यन्त सहनशील माँ सौदामिनी जेठ-जेठानी की आज्ञाकारिणी बनी रही, उसकी बड़ी माँ विद्यावती बड़ी होने के गरूर में सौदामिनी को दिन-रात घर के कामों में नौकरानी की तरह सोजती रही। शुभा के पहले अपनी तीन-तीन संतानों को खो चुकी सौदामिनी मूक-बधिर अपने पति की इच्छा के अनुसार समस्त ऊँच-नीच को सहती रही, कभी चूँ तक नहीं की। माता-पिता के इस बलिदानी चरित्र का असर शुभा पर पड़ा और वह उस घर में उचित सुविधाओं से वंचित रह गयी।
शुभा का वर्ण श्याम, काया इकहरी और भाग्य अधूरा था। वह घर की सम्पत्ति में आधे की हकदार थी, किन्तु कामचलाऊ भोजन और वस्त्र के सिवा और कुछ नहीं पाती थी। इसके विपरीत उसके चचेरे भाई-बहन गौर वर्ण और स्वस्थ काया के तो थे ही, मालिक पिता की संतान होने के नाते बेहतर भोजन-वस्त्र का भी उपभोग करते थे। इस विषमता का गहरा असर शुभा के बाल-सुलभ हृदय पर हुआ, उसके मन में गाँठ बन गयी। शुरू के दिनों में तो अबोध शुभा पारिवारिक तिकड़मों को सहती रही, किन्तु बाद के दिनों में विद्रोह की भावना से भर उठी।
शुभा बचपन से तीक्ष्ण बुद्धि और संयत स्वभाव की थी। जब लोग उसके काले रंग को ले कर उसे चिढ़ाते थे तो उसे बुरा लगता था और उसके मन में प्रश्न उठता कि क्या उसके पिता काले हैं। यही प्रश्न जब उसने अपनी माँ से किया तो सौदामिनी ने बड़े प्यार से उसे समझाया कि वास्तव में रंग में कुछ नहीं बनता-बिगड़ता, गुणों की ही सर्वत्र पूछ होती है। तब बात उसके गले उतर गयी थी। वह लम्बे-तगड़े, साँवले-सलोने पिता के आकर्षक रूप को अपलक देखती रह गई। उसे दो दिन पहले कही गयी माँ की बातों की सच्चाई का साक्षात् दर्शन हो गया, यद्यपि उसकी माँ स्वयं गौरवर्णा रूपसी थी।
शंकर पारिवारिक सम्पत्ति से उदासीन अवश्य था किन्दु शुभा के समुचित विकास की चिन्ता उसे थी। इसलिए वह दूसरे ही दिन शुभा को लेकर कांग्रेस कार्यालय वापस हो जाता है। घर में सौदामिनी के जीवन, हँसी-खुशी का एकमात्र आधार शुभा थी, किन्तु बच्ची की समुचित परवरिश और शिक्षा-दीक्षा की बिना पर अपनी ममता से भरे हृदय पर पत्थर रख लिया। परिवेश का बदलाव रंग लाया, शुभा का चेहरा और स्वभाव दमक उठा। फक्कड़ शंकर शुभा की सम्पूर्ण जिम्मेदारी अपनी धर्मबहन और सदर कांग्रेस की सचिव मीरा दास को सौंप स्वयं उस ओर से निश्चिन्त हो गया। शुभा इतनी बुद्धिमान, परिश्रमी, अनुशासित, संयमी और मिलनसार थी कि मीरा दास के साथ ही दफ्तर से सम्बद्ध सारे लोग उसे खूब पसंद करते थे। मीरा दास और शुभा तो एक-दूसरे के लिए अपरिहार्य बन गईं।
किन्तु शुभा के जीवन में यह स्थिति कायम नहीं रह सकी, बल्कि जल्दी ही समाप्त हो गई। 1936-37 के प्रथम आम चुनाव में कांग्रेस के लिए प्रचार कार्य के दौरान शंकर और मीरा दास की दुर्घटनावश मृत्यु हो गई, शुभा को पुन: अपने गाँव वापस हो जाना पड़ा। भारतीय समाज व्यवस्था की विधवा सौदामिनी और उसकी बदनसीब बेटी शुभा... जिस-तिस तरह से उनका जीवन सरकने लगा। विषय की समझदारी और उसके विश्लेषण की क्षमता को देखते हुए स्कूल के हेडमास्टर ने शुभा का नामांकन सीधे नौवीं कक्षा में कर लिया। विभावती के जल जाने और चचेरी बहन लीला के मन में रार पैदा हो जाने के लिए इतना काफी था। सदाशिव लोकलाज के चलते खुश हुए। इस उपलब्धि से खुश हुआ सदाशिव का बड़ा लड़का विनय और सर्वाधिक खुश था छोटा संजय।
शुभा की पढ़ाई में बाधा न पड़े, इसके लिए अपने बिगड़ते स्वास्थ्य की चिंता छोड़ सौदामिनी जी-जान से घर का सारा काम करने लगी। नतीजा कि जल्दी ही सौदामिनी अस्वस्थ हुई और तमाम तीमारदारी को लांघ मासूम शुभा को नियति के हाथों सौंप कर चल बसी। पति की मृत्यु से टूट चुकी सौदामिनी का मातृत्व उस दिन पूर्णत: असहाय हो गया, जिस दिन शुभा जगह-जगह से फटी साड़ी और बिना बटन के मात्र सेफ्टी पिन टाँके ब्लाउज पहन कर अर्द्धनग्न अवस्था में बिना कुछ खाये-पीये स्कूल चली गई थी। उस दिन सौदामिनी ने अपनी बेटी का विद्रोही रूप देखा था, 'मैं भिखमंगिन की सूरत ले कर स्कूल न जाऊँगी। समझती हूँ कि बाबू जी नहीं रहे तो क्या बाबू जी के हिस्से की जमीन-जायदाद हवा हो गई?' (पृष्ठ 28) सरल, छलछंदहीन प्रकृति के सम्बन्धों का हर तरह से निर्वहन करने वाली सौदामिनी बेटी के और मुखर हो जाने से पहले ही मैदान छोड़ गई, शायद उसी बदनसीब बेटी पर मालिक-मालकिन की कृपा बरसाने के लिए बलिदान हो गई। कुछ मायनों में शुभा पर उनकी कृपा जरूर बरसी।
केवल छह महीने के अन्तराल में पिता और धर्मबुआ के साथ ही शुभा ने अपनी माँ को भी खो दिया। शुभा अपनी माँ के (पार्थिव) पैरों पर निश्चल, मूक लेटी रही... रो भी नहीं सकी। अपनी माँ से वह उन प्रश्नों को पूछ भी नहीं सकी जिसे स्कूल से आने के बाद वह पूछती, '.....पिता की सम्पत्ति पर उसका कुछ भी दावा है या नहीं और यदि है तो क्यों नहीं उसके उपयोग करने का उसे अधिकार मिलना चाहिए। उसके बड़े बाबू जी-सदाशिव-कुछ अबूझ व्यक्ति तो हैं नहीं; लोगों की पंचायतों में उनका न्याय सर्वमान्य समझा जाता है; फिर उनकी दृष्ट अंदर की विषमता पर क्यों नहीं जाती? क्यों दो आँखों से लीला और शुभा को देखते हैं?...' (पृष्ठ 28) सौदामिनी ने चिर मौन से अपनी बेटी को समझा दिया कि वह अपने आक्रोश को गति न दे, बल्कि उसे भीतर ही भीतर साध लेना सीखे। शुभा समझ भी गई; आँखों के आगे हो रहे अन्याय को। अनुचित को साहसपूर्वक चुपचाप सहने के लिए स्वयं साधती रही, अपने भीतर के आक्रोश को गति देने की बजाय परिपक्व हो जाने तक चुप रही। अपने मन में उठे प्रश्नों को कभी बाहर छलकने नहीं दिया, तब भी नहीं जब संजय उसे अपने अधिकार के लिए आवाज उठाने को कहता और तब भी नहीं जब विजया जैसे सहेलियाँ, आत्मीय लोग उसके प्रति हो रहे अन्याय, अनुचित की बाबत उसका समर्थन करते। उपन्यासकार के शब्दों में 'अपने प्रियजनों के विछोह और तज्जनित शोक से शुभा पत्थर बन गई। उसकी कोमल वृत्तियाँ उसी पत्थर के नीचे दब कर चकनाचूर हो गईं। वह सांसारिक प्रपंच की मात्र साक्षी रह गई।' (पृष्ठ 31)
स्कूल जाने के क्रम में ही एक दिन शुभा ने लीला को नटवर से एकांत में हँसते-बोलते पाया। लीला की साड़ी के पल्लू को नटवर के हाथ में देख शुभा का (पारम्परिक) रोष प्रचण्ड हो उठा, उसने नटवर को तीन-चार तमाचे जड़ दिये और लीला के बाल पकड़े उसे घर तक घसीट लाई। इस घटना के बाद लीला के साथ ही शुभा का स्कूल जान भी बन्द हो गया। घर-वर देख कर ले-देकर लीला का धूमधाम से विवाह कर दिया गया। शुभा के लिए भी घर-वर ढूँढा गया, किन्तु उसके कृष्ण वर्ण के कारण बात बनी नहीं। अपनी पढ़ाई के प्रति चिंतित शुभा ने राहत की साँस ली।
अच्छे स्वास्थ्य एवं उचित देखरेख के अभाव में जैसे-तैसे शुभा ने तृतीय श्रेणी से दसवीं उत्तीर्ण की। यह उसकी लगन ही थी कि व्यक्तिगत परीक्षा दे कर भी पास कर गई।
विनय के अपने मन से विवाह कर लेने से सदाशिव के अरमानों पर पानी फिर गया। पन्द्रह हजार की मोटी रकम दहेज में मिलने से रह गई, जेवर के रूप में चढ़ने वाला पच्चीस भर सोना हाथ से निकल गया। इसके पूर्व संजय घर छोड़ कर भाग गया और अपने गुप्त दल के कार्यों में लग गया। कभी किसी से हार नहीं खाने वाले सदाशिव को अपनी संतानों से हारना पड़ा था। विनय की पत्नी जया का जोरदार स्वागत किया शुभा ने, गोया वह सदाशिव और विभावती को अपनी स्वतन्त्र विचारधारा, अपने ठोस अस्तित्व का भान कराना चाहती हो। विनय और जया ने शुभा के व्यक्तित्व को संवारने, उसकी कमियों को दूर करने तथा उसके भीतर बैठी हीन भावना की जगह उसमें आत्मविश्वास को पुख्ता करने का अपने तईं भरसक प्रयास किया। बकौल उपन्यासकार, 'विदुषी जया के आने से शुभा का नवजन्म हुआ।'
संजय विद्रोही हो कर घर छोड़ चुका था, विनय अपनी पत्नी के साथ विदेश चला गया। इस मौके का फायदा उठा कर सदाशिव ने शुभा की इच्छा के विरुद्ध उसकी शादी तय कर दी। किन्तु यहीं सदाशिव को सबसे बड़े विद्रोह का सामना करना पड़ा और परिणामस्वरूप जमाने भर की नजर में अन्यायी, स्वार्थी बन कर खाट पकड़ लेनी पड़ी। शुभा के भीतर का आक्रोश अब पक चुका था, वह समर्थ विद्रोहिनी बन कर उभरी। जब शुभा ने देखा कि ले-दे कर उसका विवाह एक भोंदू उम्रदराज से किया जा रहा है, तो वह संयत न रह सकी। यह उसके जीवन का सर्वाधिक अहम फैसला था, अभी उसके पक्ष को रखने वाला स्वयं उसके सिवा और कोई नहीं रह गया था। बारातियों ने जब बाकी की आधी रकम तुरन्त देने के लिए हो-हल्ला किया तो शुभा को सही स्थिति का भान हुआ। वह बीच जनवासे में गई और दुल्हन के वेश में ही उसने बारातियों से कहा, 'मैं पूछना चाहती हूं कि वीरपुर की बड़ाई क्या दूसरों की हेठी करने में है? जिन्हें औरों की प्रतिष्ठा का ध्यान नहीं, वे क्या मनुष्य कहलाने का दावा कर सकते हैं? जिन्हें हजार गण्डा लड़कियाँ मिल सकती हैं; वे यहां क्यों दौड़ रहे हैं? उन्हें जानना चाहिए कि नारायणगंज की कन्या उतनी सस्ती नहीं, वह शंकर राय की औरस है, जो मातृभूमि पर बलिदान हो चुके हैं ... जो ढाई हजार पहले गिन सकता है वह पीछे भी ढाई हजार गिनने में पाँव पीछे नहीं कर सकता... रुपया ले कर झमेला न हुआ होता तो मंडप पर मेरा बलिदान ही होता। भगवान के घर में देर है, अंधेर नहीं। मैं भालू-बंदर के साथ बँधना नहीं चाहती।' वहीं सबके सामने शुभा ने सदाशिव से अपना पक्ष रखते हुए गम्भीरतापूर्वक कहा, 'मैंने आपका कोई अपराध न किया था कि आप कसाई के हाथ मुझे बेचने को तैयार हुए। आपकी सम्पत्ति पर मेरा भी आधे का अधिकार है। आप मेरी सारी सम्पत्ति दे कर एक सभ्य-सुशिक्षित वंश के लड़के को खरीद सकते थे मेरे लिए। मुझे खुशी होती। मगर नहीं, जिस धन के लिए विनय दा ने अपनी राह आप ढूँढ निकाली और जिस धन के लिए विद्रोही बन कर जेल काट रहे हैं संजय दा, मैं भी अपना अधिकार आपको सौंपती हूं, इस धन से मैं एक पैसा भी नहीं चाहती। मैं अपना पथ आप ढूँढ लूँगी-यही मेरे स्वर्गीय पिता का आदेश था मेरे निमित्त और यही उनका लक्ष्य।' (पृष्ठ 48)
सदाशिव को जवाब दिया शुभा ने, शंकर और सौदामिनी शायद ही कभी दे पाते। अब तक पारिवारिक और सामाजिक दायरे में रह कर शुभा ने जीवन-संघर्ष किया, स्वयं को संघर्ष के योग्य बनाया, इसके बाद उसने तमाम दायरों को झटक दिया। उसी रात उसने घर छोड़ दिया और रात भर भागती रही। रात के अंधेरे में खेत-पथार, बाग-बगीचा, गाँव-जवार लाँघती युवती शुभा अनिश्चित भागती रही अकेली, निर्विकार, निर्भय। सूटकेश को जैसे-तैसे थामे जब उसके पैर जवाब दे गए और प्यास से कंठ सूखने लगा तो वह थम गई और एक वृक्ष के सहारे निढाल हो गई।
नई सुबह शुभा की भेंट एक वृद्ध से हुई जो उसे अपने घर ले गया। वहीं उसकी मुलाकात वीरेश्वर से हुई जो उसे अपने साथ ले गया। पूरे छह वर्ष शुभा वीरेश्वर के साथ रही। वीरेश्वर के साहचर्य-सानिध्य में शुभा ने अपने व्यक्तित्व का निर्माण किया, विदुषी बनी, अपने स्वाभिमान को मजबूती प्रदान की। वीरेश्वर तटस्थ भाव से उसके व्यक्तित्व-निर्माण और निरन्तर विकास में तन-मन-धन से लगा रहा। इस बीच शुभा का सम्पर्क अपने घर वालों से एकदम समाप्त हो गया और समाप्त हो गई विवाह करने की उसकी इच्छा। देश आजाद हो गया था, लोगों ने अपने-अपने ढंग से अपनी जगह ढूँढ ली, अपना-अपना मुकाम हासिल किया। किन्तु शुभा अब भी संतुष्ट नहीं थी, बल्कि बाद के दिनों में समर्थता हासिल करने पर उसमें अनुचित अहंकार घर कर गया, एक तरह की ईर्ष्या की भावना उसमें उत्पन्न हो गई। वह वीरेश्वर के उदात्त चरित्र से हर तरह से लाभान्वित, किन्तु उसके व्यक्तित्व की विराटता का सही आकलन नहीं कर पाई। सेवाश्रम की अन्य स्त्रियों से वीरेश्वर की निकटता से ईर्ष्या करना और वीरेश्वर से जानबूझ दूरी बनाए रखने का अहंकार उसे असाधारणता से दूर कर देता है। इसलिए जब वीरेश्वर उससे प्रणय का लिखित निवेदन करता है तो वह न केवल विद्रोह कर बैठती है, बल्कि आश्रम छोड़ कर चली जाती है। किन्तु वीरेश्वर उसका प्रतिवाद नहीं करता है, उल्टे विदेश जाने वाले कल्चरल डेलीगेशन में उसे शामिल कराने की व्यवस्था कराता है।
वीरेश्वर का संक्षिप्त परिचय देते हुए उपन्यासकार प्रथम पृष्ठ पर ही लिखता है, वीरेश्वर-अपने समय विश्वविद्यालय का एक कृति छात्र, उदीयमान कलाकार, मातृभूमि की बलि-वेदी पर प्राणाहुति देने वाला गरम दल का सर्वमान्य नेता, पुन: महात्मा गाँधी के आह्वान पर उनके जीवन काल तक कांग्रेसकर्मी, फिर स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद सर्वोदयी नेता के रूप में 'सेवाश्रम' के आद्यसंस्थापक, संचालक, कर्मठ, सदाचारी, चिरकुमार, स्वप्नद्रष्टा-प्रौढ़, मितभाषी-संक्षेप में यही है वह वीरेश्वर!' उस वीरेश्वर के सानिध्य-संरक्षण में छह साल रह कर भी यदि शुभा उसके प्रणय निवेदन को कठोरता से ठुकराती है तो यह उसके व्यक्तित्व की दृढ़ता ही कही जाएगी, किन्तु उसकी दृष्टि-व्यापकता कतई नहीं। यह व्यापकता उसमें आती है वीरेश्वर से दूर हो कर। विदेश से लौटने के बाद वह अपने भाई विनय और भाभी जया से मिलती है। विनय प्रोफेसर हो गया है और जया अखिल भारतीय महिला सम्मेलन की केन्द्रीय नेत्री बन गई। सम्मेलन के कार्य से ही एक बार जया सेवाश्रम गई, जहाँ उसे शुभा और वीरेश्वर के बारे में जानकारी मिली। शुभा के दिल्ली प्रवास के दौरान ही सेवाश्रम की वर्तमान संचालिका पुष्पा की ओर से तार आया जिससे मालूम हुआ कि वीरेश्वर कैवल्यधाम में मरणासन्न है और संजय का अनुरोध है कि शुभा जल्दी वहाँ पहुँचे। संजय घर से विद्रोह कर जिस दल में सक्रिय रहा उसका नायक यही वीरेश्वर था, यह जान कर शुभा को बड़ा आश्चर्य हुआ। इससे बड़ी खुशी यह हुई कि उसे वीरेश्वर से क्षमा मांगने का अवसर प्राप्त हो गया। सम्बन्धों के एक-एक तार पुन: जुड़ गए। शुभा लगभग भागती (यद्यपि ट्रेन से) हुई कैवल्यधाम पहुँची। अब तक वह वीरेश्वर की विराटता को आत्मसात कर चुकी थी और उसके मन का सारा मैल धुल चुका था। शुभा वीरेश्वर के पैरों पर गिर पड़ी और पाश्चाताप के आँसू बहाए। अबकी उसने वीरेश्वर से प्रणय-निवेदन किया तथा वीरेश्वर की जीवन के प्रति निराशा को भगाने में कामयाब हुई।
यहाँ आ कर शुभा पूर्णता को प्राप्त करती है। उपन्यास का अन्त होता है और उपन्यासकार एक जीवंत चरित्र के निर्माण में सफल होते हैं। बचपन से ही घोर दुख और सिलसिलेवार कठिनाइयों से जूझती शुभा के मन में संपन्नता पाने के बाद भी रह गए कुछ मैल को धोकर अनूपलाल मंडल उसे निष्कलुष बना कर ही दम लेते हैं और इस तरह एक सम्पूर्ण नारी का निर्माण करते हैं। शुभा अनूप जी की हृदय-वत्सलता, न्यायशीलता, उद्दाम संकल्पशीलता, लक्ष्य-संधान की क्षमता का जीवंत रूप है। शुभा को सुखांत जीवन प्रदान कर अनूप जी सत्य और उचित की विजय की शाश्वतता को मूर्तता प्रदान करने, स्वीकारने का प्रयास करते हैं। यहाँ भारतीय आशावाद का पक्ष प्रस्तुत करते हुए अनूप जी आत्यन्तिक दुखों में भी अखंड धैर्य, दृढ़ता और संकल्पशक्ति को बनाए रखने की राह दिखाते हैं- यही वजह है कि अपने कर्म और संकल्पशक्ति के सहारे शुभा शून्य से शिखर तक पहुँचती है। भारतीय नारियों के आगे तमाम बन्धनों, बंदिशों को तोड़ कर नई दुनिया में प्रवेश करती है और वह सब कर दिखाती है जो एक पुरुष कर सकता है।
बचपन से त्रासदी की शिकार, संघर्षशील, विद्रोही और अन्तत: सफल जीव को प्राप्त शुभा का चरित्र प्रेरणास्पद है। वह हिन्दी साहित्य की प्रखर नायिका हो सकती है, उसका दावा बनता भी है। देर-सबेर शुभा सबके सामने आएगी अवश्य, तब उसके व्यक्तित्व का सामना करने में लोकप्रिय नायिकाओं को असहजता महसूस हो सकती है। आज जबकि नारी जागरण और उसके अधिकारों को ले कर जोर-शोर से आन्दोलन चलाए जा रहे हैं, अनूप जी की शुभा ऐसे में दृष्टान्त बन कर उभर सकती है। मानदण्ड मुहैया करा सकती है। नारी-शोषण के अनेकानेक तरीके हैं, उनसे न केवल बच निकलने, बल्कि उसके विरुद्ध खड़ा हो जाने के लिए शुभा जैसा जीवट चाहिए, प्रखर मस्तिष्क चाहिए। अन्यथा उचित समझ के बावजूद नारी विभावती के रूप में शोभित होती है और सारी सुविधाओं के बावजूद लीला की तरह दिग्भ्रमित होती है। सरल और विनीत होना अच्छी बात है, किन्तु इस वजह से अन्याय, अनुचित को सह लेना बुरी बात है। शुभा यथार्थ और आदर्श दोनों रूप में सामने आती है। बारातियों को फटकार लगा कर सदाशिव को अपना अधिकार बताने के बाद घर छोड़ने के पहले की शुभा एक आदर्श नारी के रूप में सामने आती है। आज शुभा के इस परवर्ती रूप को अपवाद नहीं, समयोचित कहा जा सकता है। अपने रचना काल के समय संदर्भ में शुभा का यह रूप उपन्यासकार अनूपलाल मण्डल की दृष्टि-व्यापकता को सिद्ध करता है।
जगह-जगह तद्भव, देशज और बोलचाल के शब्दों का प्रयोग किया गया है 'शुभा' में, फिर भी समग्रत: इसकी भाषा प्रांजल और संस्कृतनिष्ठ ही कही जाएगी। एक बहुत बड़ी समयावधि और घटना वैविध्य को बहुत कम पृष्ठों में समेट लिया है उपन्यासकार ने। उपन्यास की सघनता, कथानक का कसाव और अनेक पात्रों का यथेष्ट चित्रण बहुत कम शब्दों, वाक्यों का प्रयोग कर के सफलतापूर्वक कर देना भाषा पर अनूप जी की गहरी पकड़ को दर्शाता है। उनके यहाँ कोशीय और व्याकरणिक शब्दों का अतुल भंडार है, इसका दर्शन उपन्यास के शुरू से अन्त तक होता है। इनके शब्दों और वाक्यों में चित्रात्मकता ऐसी है कि घटनाएं सामने घटती प्रतीत होती हैं और पात्र कहीं आसपास ही उपस्थित जान पड़ता है। यद्यपित पाण्डुलिपि में भाषागत त्रुटियाँ रह गई हैं जो अस्वाभाविक नहीं है, किन्तु इसे दूर करने के लिए मनोयोगपूर्ण संपादन की जरूरत है और यह दायित्व केवल वही निभा सकता है जो 'शुभा' में गहराई तक डूबा हो, उसकी सांगोपांग समझ में उपन्यासकार से दृष्टिभिन्नता नहीं रखता हो।
संरचनात्मक दृष्टि से भी एकाधिक त्रुटियाँ हैं 'शुभा' में। विनय से जुड़ी घटनाएं इतनी तेजी से अकस्मात घट जाती हैं कि थोड़ी-बहुत अस्वाभाविकता का पुट आ जाता है, इसी तरह संजय से जुड़ी घटनाएँ अक्सर अतिरिक्त आक्रमकता का आभास देती हैं। शुभा से पूर्व लीला का विवाह हो जाना गहन सामाजिकता से मेल नहीं खाता है, वह भी जबकि शुभा के पिता शंकर और माता सौदामिनी की असामयिक मृत्य हो गई है और सदाशिव स्वयं पारम्परिक सामाजिकता के संवाहक पंच हैं। हर तरह से टूट चुके सदाशिव का संजय पर भरोसा करना स्वाभाविक है, किन्तु कैवल्यधाम जाने और वीरेश्वर की परिचर्या में यथेष्ट वित्त खर्चने का उसका प्रस्ताव अप्रत्याशित हृदय परिवर्तन की ओर संकेत करता है। ऐसी बात नहीं है कि इस तरह की घटनाएँ होती ही नहीं, हो नहीं सकती ...अनूप लाल मण्डल ने जीवन के कई रंग देखे, कई मोड़ों को पार किया, यथार्थ से उनका गहरा सम्बन्ध रहा... कुछ नया रचने, कोई अलग स्वरूप खड़ा करने में कतरब्यौंत, जोड़-तोड़ करनी ही पड़ती है। ऐसा जोखिम कोई सिद्धहस्त कलाकार, निपुण योद्धा ही उठा सकता है। किसी पात्र का एकमुश्त परिचय देना या उसकी विशेषता गिना देना और बाद में घटनाक्रम में उसको जस्टिफाई करने की हर सम्भव कोशिश करना लेखकीय पूर्वाग्रह को सूचित करता है। इससे पाठक को असुविधा हो सकती है, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति में कुछ न कुछ कमियाँ होती हैं जो कभी न कभी उभर कर सामने आ जाती हैं। पूर्वनिर्धारित छवि में विचलन की किसी भी संभावना मात्र से पाठक को क्षोभ हो सकता है।यह स्थिति बड़े से बड़े लेखक के लिए अहितकर हो सकती है। कोई सिद्धहस्त और मँजा हुआ लेखक ही ऐसा जोखिम उठाता है - अनूप लाल मण्डल ने यह किया है और सफलतापूर्वक किया है। विलक्षण कल्पनाशीलता को कलात्मक भाषा के जरिये यथार्थत: साकार कर देने की अद्भुत क्षमता है इनमें। उपन्यास-कला पर इनकी इतनी पकड़ है कि इनके पात्र इनके गिनाए पूर्वलक्षणों के अनुसार ही चलते हैं। जहाँ कहीं भी उनके चरित्र में विचलन आता है तो वे सहज स्वीकार कर लेते हैं, आत्मविश्लेषण एवं त्रुटि स्वीकार्य की विनम्रता इनके पात्रों के गुणों को और भी बढ़ा देती है।
'शुभा' न केवल अनूप लाल मण्डल की दक्ष कथाकारिता से सुसज्जित है, बल्कि इनके वैचारिक वैशिष्टय से भी विभूषित है। जैसे 'मनुष्य की कल्पना हर समय फलवती नहीं होती, उसकी इच्छा-आकांक्षा भी अधूरी रह जाती है बहुधा। शायद वह अपने-आपको किसी कल्पना में फँसा कर भुलाए रखना चाहता है, शायद वह कल्पना करने में ही तन्मय रहा करता है। पर प्रकृति या नियति, जो भी नाम दिया जाए, अपनी जगह सारी लीला रचती है, उसी में उसकी सार्थकता है, उसी में उसका कर्तृत्व। वहाँ मानव मात्र एक कठपुतली बना रह जाता है और वह प्रकृति या नियति उसकी सूत्रधार होती है। यही संसार है और यही है वह मानव, पुन: प्रकृति ने जहाँ कष्ट-यंत्रणा की सृष्टि की है वहाँ उसके सहन करने की शक्ति भी मानव को सहजात मिली है। काल स्वत: सब कुछ भुला देता है। यदि ऐसा न होता तो जाने मानव की क्या गति हुई होती। संयोग और वियोग चिरंतन हैं -एक दूसरे का अभिन्न अंग। एक में दूसरा ओतप्रोत, जो बाहर से दीख नहीं पड़ता, पर काल के प्रवाह में संयोग का आनन्द और वियोग की यंत्रणा, जाने किस तरह तिरोहित हो जाती है कि उसका चिह्नमात्र नहीं रह जाता।' (पृष्ठ 19) इसी तरह शुभा-वीरेश्वर की वार्ता के जरिये अनूप जी देहतत्व, प्रेम, सौन्दर्य आदि के विषय में अपने विचार प्रस्तुत करते हैं तथा जया के माध्यम से नारियों की स्थिति एवं उसमें हो सकने वाले सुधारों, उपायों की चर्चा करते हैं।
उपन्यास में वीरेश्वर के साथ ही संजय विशिष्ट पात्र है जिसमें न्याय-अन्याय, उचित-अनुचित, सत्य-असत्य को जांचने परखने की समुचित क्षमता है, साथ ही परिस्थिति के अनुसार व्यवहार करने का गुण भी। वह कर्मठ, दयालु, स्वाभिमानी, विद्रोह किन्तु चंचल है। जया का व्यक्तित्व और उसका वैचारिक स्तर उसकी पृष्ठभूमि के अनुसार ही है।
पारिवारिक छल कपट, भेद भाव, ईर्ष्या द्वेष से बिखरते संयुक्त परिवार, उससे भी आगे टूटते एकल परिवार का ज्वलंत दस्तावेज है 'शुभा'। व्यक्तिगत स्वार्थ और दोहरी मानसिकता के कारण नैतिक पतन होने तथा इसकी वजह से निकटतम सम्बन्धों में आयी दरार को सलीके से प्रस्तुत करता है 'शुभा'। नि:स्वार्थ सेवा करने वालों और जीवन में त्याग करने वालों को अन्तत: संघर्षमय अभावमय जीवन ही बिताना पड़ता है, शायद इसी जीवन में मानवता सुरक्षित रह भी पाती है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद विभिन्न संस्थाओं, प्रतिष्ठानों के चरित्र में आये बदलाव को भी रेखांकित किया गया है। स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद वीरेश्वर और उसके दल के लोग कांग्रेस छोड़ देते हैं। कारण कांग्रेस में अब सेवाभावना की जगह सत्ताभोग लिप्सा बढ़ गई होती है। वीरेश्वर जैसे निष्ठावान कर्मठ कार्यकर्ताओं, संचालकों के हटने से सर्वोदय के लिए प्रतिबद्ध 'सेवाश्रम' को मशीन के रूप में इंगित किया गया है। 50 के दशक के बाद के कथाकार होते तो इसी विषय को नग्न यथार्थता के साथ प्रस्तुत करते, किन्तु अनूप जी पुरानी पीढ़ी के कथाकार हैं जिनका उद्देश्य समस्याओं को उजागर करने के साथ ही उसके समुचित समाधान को भी इंगित करना है। अपने पात्रों को अन्तत: सामाजिक संदर्भ में खरा उतरने को प्रेरित करना तब समय की मांग भी रही होगी। अनूप जी पर गाँधीवादी विचारों का प्रभाव अवश्य रहा होगा, जो वस्तुत: पारम्परिक भारतीय समाज व्यवस्था को ही त्रुटिहीन प्रस्तुत करने का प्रयास है। उस कालजन्य सुधारवादी लेखक, समन्वयवादी विचारक प्रकारान्तर से गांधीवाद से प्रभावित रहे। यद्यपि वीरेश्वर जैसे उदात्त नायक का प्रयास अनूप जी की गांधीवाद से व्यावहारिक दूरी को ही अंकित करता है।
अन्तत: मैं 'शुभा' से प्रभावित अवश्य हूं, किन्तु इसकी यथोचित समीक्षा शायद ही कर पाया हूं। यह काम दायित्व सुधी विशेषज्ञ समीक्षक ही पूरा करेंगे। मैं तो केवल 'शुभा' को प्रकाश में ला भर रहा हूं।
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| रणविजय सिंह सत्यकेतु |
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रणविजय सिंह सत्यकेतु
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