विद्यासागर नौटियाल की कहानी 'माटी वाली'
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| विद्यासागर नौटियाल |
एक जमाना था जब घर मिट्टी के बने होते थे। इन मिट्टी के घरों की बाकायदा लिपाई पुताई की जाती थी। यह लिपाई पुताई गोबर और लाल या पीली मिट्टी से की जाती थी। लिपाई करने वाली महिलाएं होती थीं। यही उनकी आजीविका हुआ करती थी और इसी से उनका गुजर बसर हुआ करता था। लेकिन समय बदला। व्यवस्थाएँ बदलीं। यही नहीं विकास की आंधी में कुछ शहर तक अपना वजूद खो बैठे। इसकी मार समाज के निम्नतम तबकों को झेलनी पड़ी। इन्हें तो वह मुआवजा तक नहीं मिला क्योंकि उनके पास कोई आधिकारिक कागजात तक नहीं थे। विद्यासागर नौटियाल ऐसे प्रतिबद्ध रचनाकार थे जिन्होंने जन सामान्य से जुड़े उन विषयों पर कलम चलाई जिन पर सामान्य तौर पर कोई बात नहीं करता। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं विद्यासागर नौटियाल की चर्चित कहानी 'माटी वाली'।
कहानी
'माटी वाली'
विद्यासागर नौटियाल
शहर के सेमल का तप्पड़ मोहल्ले की ओर बने आखिरी घर की खोली में पहुँच कर उसने दोनों हाथों की मदद से अपने सिर पर धरा बोझा नीचे उतारा। मिट्टी से भरा एक कंटर। माटी वाली। टिहरी शहर में शायद ऐसा कोई घर होगा जिसे वह न जानती हो या जहाँ उसे न जानते हों, घर के कुल निवासी, बरसों से वहाँ रहते आ रहे किराएदार, उनके बच्चे तलक। घर-घर में लाल मिट्टी देते रहने के उस काम को करने वाली वह अकेली है। उसका कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं। उसके बगैर तो लगता है, टिहरी शहर के कई एक घरों में चूल्हों का जलना तक मुश्किल हो जाएगा। वह न रहे तो लोगों के सामने रसोई और भोजन कर लेने के बाद अपने चूल्हे-चौके की लिपाई करने की समस्या पैदा हो जाएगी। भोजन जुटाने और खाने की तरह रोज की एक समस्या। घर में साफ़, लाल मिट्टी तो हर हालत में मौजूद रहनी चाहिए। चूल्हे चौकों को लीपने के अलावा साल-दो साल में मकान के कमरों, दीवारों की गोबरी लिपाई करने के लिए भी लाल माटी की जरूरत पड़ती रहती है। शहर के अंदर कहीं माटाखान है नहीं। भागीरथी और भीलांगना, दो नदियों के तटों पर बसे हुए शहर की मिट्टी इस कदर रेतीली है कि उससे चूल्हों की लिपाई का काम नहीं किया जा सकता। आने वाले नए-नए किराएदार भी एक बार अपने घर के आँगन में उसे देख लेते हैं तो अपने आप माटी वाली के ग्राहक बन जाते हैं। घर-घर जा कर माटी बेचने वाली नाटे कद की एक हरिजन बुढ़िया-माटी वाली।
शहरवासी सिर्फ माटी वाली को नहीं, उसके कंटर को भी अच्छी तरह पहचानते हैं। रद्दी कपड़े को मोड़ कर बनाए गए एक गोल डिल्ले' के ऊपर लाल, चिकनी मिट्टी से छुलबुल भरा कनस्तर टिका रहता है। उसके ऊपर किसी ने कभी कोई ढक्कन लगा हुआ नहीं देखा। अपने कंटर को इस्तेमाल में लाने से पहले वह उसके ऊपरी ढक्कन को काट कर निकाल फेंकती है। ढक्कन के न रहने पर कंटर के अंदर मिट्टी भरने और फिर उसे खाली करने में आसानी रहती है। उसके कंटर को जमीन पर रखते रखते सामने के घर से नौ-दस साल की एक छोटी लड़की कामिनी दौड़ती हुई वहाँ पहुँची और उसके सामने खड़ी हो गई।
"मेरी माँ ने कहा है, जरा हमारे यहाँ भी आ जाना।"
"अभी आती हूँ।"
घर की मालकिन ने माटी वाली को अपने कंटर की माटी कच्चे आँगन के एक कोने पर उड़ेल देने को कह दिया।
"तू बहुत भाग्यवान है। चाय के टैम पर आई है हमारे घर। भाग्यवान आए खाते वक्त।"
वह अपनी रसोई में गई और दो रोटियाँ लेती आई। रोटियाँ उसे सौंप कर वह फिर अपनी रसोई में घुस गई।
माटी वाली के पास अपने अच्छे या बुरे भाग्य के बारे में ज्यादा सोचने का वक्त नहीं था। घर की मालकिन के अंदर जाते ही माटी वाली ने इधर-उधर तेज्ज निगाहें दौड़ाई। हाँ, इस वक्त वह अकेली थी। उसे कोई देख नहीं रहा था। उसने फ़ौरन अपने सिर पर धरे डिल्ले के कपड़े के मोड़ों को हड़बड़ी में एक झटके में खोला और उसे सीधा कर दिया। फिर इकहरा। खुल जाने के बाद वह एक पुरानी चादर के एक फटे हुए कपड़े के रूप में प्रकट हुआ।
मालकिन के बाहर आँगन में निकलने से पहले उसने चुपके से अपने हाथ में थामी दो रोटियों में से एक रोटी को मोड़ा और उसे कपड़े पर लपेट कर गाँठ बाँध दी। साथ ही अपना मुँह यों ही चला कर खाने का दिखावा करने लगी। घर की मालकिन पीतल के एक गिलास में चाय ले कर लौटी। उसने वह गिलास बुढ़िया के पास जमीन पर रख दिया।
"ले, सद्दा-बासी साग कुछ है नहीं अभी। इसी चाय के साथ निगल जा।"
माटी वाली ने खुले कपड़े के एक छोर से पूरी गोलाई में पकड़ कर पीतल का वह गरम गिलास हाथ में उठा लिया। अपने होंठों से गिलास के किनारे को छुआने से पहले, शुरू-शुरू में उसने उसके अंदर रखी गरम चाय को ठंडा करने के लिए सू-सू कर के, उस पर लंबी-लंबी फूँकें मारी। तब रोटी के टुकड़ों को चबाते हुए धीरे-धीरे चाय सुड़कने लगी।
"चाय तो बहुत अच्छा साग हो जाती है ठकुराइन जी।"
"भूख तो अपने में एक साग होती है बुढ़िया। भूख मीठी कि भोजन मीठा?" "तुमने अभी तक पीतल के गिलास सँभाल कर रखे हैं। पूरे बाजार में और किसी घर में अब नहीं मिल सकते ये गिलास।"
"इनके खरीदार कई बार हमारे घर के चक्कर काट कर लौट गए। पुरखों की गाड़ी कमाई से हासिल की गई चीजों को हराम के भाव बेचने को मेरा दिल गवाही नहीं देता। हमें क्या मालूम कैसी तंगी के दिनों में अपनी जीभ पर कोई स्वादिष्ट, चटपटी चीज रखने के बजाय मन मसोस कर दो-दो पैसे जमा करते रहने के बाद खरीदी होंगी उन्होंने ये तमाम चीजें, जिनकी हमारे लोगों की नजरों में अब कोई कीमत नहीं रह गई है। बाजार में जा कर पीतल का भाव पूछो जरा, दाम सुन कर दिमाग चकराने लगता है। और ये व्यापारी हमारे घरों से हराम के भाव इकट्ठा कर ले जाते हैं, तमाम बर्तन भाँडे। काँसे के बरतन भी गायब हो गए हैं, सब घरों से।"
"इतनी लंबी बात नहीं सोचते बाकी लोग। अब जिस घर में जाओ वहाँ या तो स्टील के भाँडे दिखाई देते हैं या फिर काँच और चीनी मिट्टी के।"
"अपनी चीज का मोह बहुत बुरा होता है। मैं तो सोच कर पागल हो जाती हूँ कि अब इस उमर में इस शहर को छोड़ कर हम जाएँगे कहाँ!"
"ठकुराइन जी, जो जमीन-जायदादों के मालिक हैं, वे तो कहीं न कहीं ठिकाने पर जाएँगे ही। पर मैं सोचती हूँ मेरा क्या होगा! मेरी तरफ़ देखने वाला तो कोई भी नहीं।"
चाय खत्म कर माटी वाली ने एक हाथ में अपना कपड़ा उठाया। दूसरे में खाली कंटर और खोली से बाहर निकल कर सामने के घर में चली गई।
उस घर में भी 'कल हर हालत में मिट्टी ले आने के आदेश के साथ उसे दो रोटियाँ मिल गई। उन्हें भी उसने अपने कपड़े के एक दूसरे छोर में बाँध लिया। लोग जानें तो जानें कि वह ये रोटियाँ अपने बुड्ढे के लिए ले जा रही है। उसके घर पहुँचते ही अशक्त बुझ कातर नज्जरों से उसकी ओर देखने लगता है। वह घर में रसोई बनने का इंतजार करने लगता है। आज वह घर पहुँचते ही तीन रोटियाँ अपने बुड्ढे के हवाले कर देगी। रोटियों को देखते ही चेहरा खिल उठेगा बुड्ढे का।
साथ में ऐसा भी बोल देगी, "साग तो कुछ है नहीं अभी।"
और तब उसे जवाब सुनाई देगा, "भूख मीठी कि भोजन मीठा?"
उसका गाँव शहर के इतना पास भी नहीं है। कितना ही तेज चलो फिर भी घर पहुँचने में एक घंटा तो लग ही जाता है। रोज सुबह निकल जाती है वह अपने घर से। पूरा दिन माटाखान में मिट्टी खोदने, फिर विभिन्न स्थानों में फैले घरों तक उसे ढोने में बीत जाता है। घर पहुँचने से पहले रात घिरने लगती है। उसके पास अपना कोई खेत नहीं। जमीन का एक भी टुकड़ा नहीं। झोपड़ी, जिसमें वह गुजारा करती है, गाँव के एक ठाकुर की जमीन पर खड़ी है। उसकी जमीन पर रहने की एवज में उस भले आदमी के घर पर भी माटी वाली को कई तरह के कामों की बेगार करनी होती है।
नहीं, आज वह एक गठरी में बदल गए अपने बुड्ढे को कोरी रोटियाँ नहीं देगी। माटी बेचने से हुई आमदनी से उसने एक पाव प्याज खरीद लिया। प्याज्ज को कूट कर वह उन्हें जल्दी-जल्दी तल लेगी। बुड्ढे को पहले रोटियाँ दिखाएगी ही नहीं। सब्जी तैयार होते ही परोस देगी उसके सामने दो रोटियाँ। अब वह दो रोटियाँ भी नहीं खा सकता। एक ही रोटी खा पाएगा या हद से हद डेढ़। अब उसे ज्यादा नहीं पचता। बाकी बची डेढ़ रोटियों से माटी वाली अपना काम चला लेगी। एक रोटी तो उसके पेट में पहले ही जमा हो चुकी है। मन में यह सब सोचती, हिसाब लगाती हुई वह अपने घर पहुँच गई।
उसके बुड्ढे को अब रोटी की कोई जरूरत नहीं रह गई थी। माटी वाली के पाँवों की आहट सुन कर हमेशा की तरह आज वह चौंका नहीं। उसने अपनी नजरें उसकी ओर नहीं घुमाई। घबराई हुई माटी वाली ने उसे छू कर देखा। वह अपनी माटी को छोड़ कर जा चुका था।
टिहरी बाँध पुनर्वास के साहब ने उससे पूछा कि वह रहती कहाँ है।
"तुम तहसील से अपने घर का प्रमाणपत्र ले आना।"
"मेरी जिनगी तो इस शहर के तमाम घरों में माटी देते गुजर गई साब।"
"माटी कहाँ से लाती हो?"
"माटाखान से लाती हूँ माटी।"
"वह माटाखान चढ़ी है तेरे नाम? अगर है तो हम तेरा नाम लिख देते हैं।"
"माटाखान तो मेरी रोजी है साहब।"
"बुढ़िया हमें जमीन का कागज चाहिए, रोजी का नहीं।"
"बाँध बनने के बाद मैं क्या खाऊँगी साब?"
"इस बात का फैसला तो हम नहीं कर सकते। वह बात तो तुझे खुद ही तय करनी पड़ेगी।"
टिहरी बाँध की दो सुरंगों को बंद कर दिया गया है। शहर में पानी भरने लगा है। शहर में आपाधापी मची है। शहरवासी अपने घरों को छोड़ कर वहाँ से भागने लगे हैं। पानी भर जाने से सबसे पहले कुल श्मशान घाट डूब गए हैं।
माटी वाली अपनी झोपड़ी के बाहर बैठी है। गाँव के हर आने-जाने वाले से एक ही बात कहती जा रही है-"गरीब आदमी का श्मशान नहीं उजड़ना चाहिए।"

हृदय स्पर्शी कहानी है।
जवाब देंहटाएंविनीता बाडमेरा
शानदार कहानी
जवाब देंहटाएंमन को छू लेने वाली कहानी