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हितेन्द्र पटेल का आलेख 'बिपन चंद्र के बारे में सोचते हुए'

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बिपन चन्द्र  कुछ किताबें मील का पत्थर होती हैं। वे इतनी जरूरी होती हैं कि उनके बिना एक समय को मुकम्मल तरीके से जानना दिक्कत तलब हो सकता है। आधुनिक भारत के इतिहास की जब भी बात आती है 'इंडियाज़ स्ट्रगल फॉर इंडिपेंडेंस' का नाम आवश्यक तौर पर लिया जाता है। इसके लेखक बिपन चन्द्र, मृदुला मुखर्जी, आदित्य मुखर्जी, सुचेता महाजन और के ए पणिक्कर हैं। लेकिन इसके लेखक के तौर पर मुख्य तौर पर प्रायः  बिपन चन्द्र का नाम ही लिया जाता है।  बिपन चन्द्र ने अपनी इस किताब में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और गांधी जी के आंदोलनों को एक नए परिप्रेक्ष्य में देखने की कोशिश की है। हितेन्द्र पटेल से हमने अनहद के लिए बिपन चन्द्र पर एक स्मृति आलेख लिखवाया था। हाल में उन्होंने उस आलेख का पुनर्लेखन किया है। अपने आलेख में हितेन्द्र लिखते हैं 'गांधी के नेतृत्व में आंदोलन ने जनसाधारण को राजनीतिक बनाया, औपनिवेशिक शासन की वैधता को क्रमशः कमजोर किया, संघर्ष और विराम की लय के माध्यम से संगठन की शक्ति बचाए रखी और स्वतंत्रता के विचार को विस्तृत सामाजिक स्वीकृति दी। 'इंडियाज़ स्ट्रगल फॉर इंडिपेंडेंस' इसी दृष्टि ...

लू शुन की कहानी 'पागल की डायरी'

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  लू शुन   प्रख्यात कथाकार लू शुन (Lu Xun) को आधुनिक चीनी साहित्य का संस्थापक माना जाता है। उनका वास्तविक नाम झोउ शुरेन (Zhou Shuren) था, और 'लू शुन' उनका उपनाम था। उनका व्यक्तित्व बहुआयामी था। वे उम्दा लघु कथाकार तो थे ही, बेहतर कवि थे और साहित्यिक आलोचक एवं निबंधकार भी थे। उन्होंने  संपादक और अनुवादक की भूमिका भी निभाई। लू शुन स्थानीय भाषा की ताकत जानते थे। इसीलिए उन्होंने शास्त्रीय चीनी भाषा से परहेज करते हुए आम बोलचाल की चीनी भाषा में लिखकर आम जनता तक पहुँचने की कोशिश की। उनके लेखन ने चीन के 'मई चतुर्थ आंदोलन' (May Fourth Movement) और बाद के आधुनिकीकरण व वैचारिक क्रांति को गहराई से प्रभावित किया। 1920 के दशक के उत्तरार्ध से, लू शुन मार्क्सवादी विचारधारा और वामपंथी राजनीति में अधिकाधिक सक्रिय हो गए। 1930 के दशक में, उन्होंने वामपंथी लेखकों के संघ के साथ घनिष्ठ लेकिन तनावपूर्ण संबंध बनाए रखा। माओत्से तुंग द्वारा उनके प्रति उच्च सम्मान के कारण, पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना में उनकी रचनाओं को प्रतिष्ठित माना गया है। 25 सितम्बर को लू शुन का जन्मदिन है। हम उनकी स्मृति को नमन...

कैम्पस में कविता

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साहित्यिक गोष्ठियों का मुख्य उद्देश्य यह होता है कि नए रचनाकारों को समकालीन साहित्य की अधुनातन एवं प्रगतिशील प्रवृत्तियों से न केवल परिचित कराया जाए बल्कि उनमें रचनात्मक प्रवृत्ति को भी बढ़ावा दिया जाए और उनके लेखन को बेहतर स्वरूप प्रदान किया जाए। इस क्रम में उनकी रचनाओं का पाठ कराते हुए उस रचना पर वरिष्ठ एवं समकालीन रचनाकारों द्वारा आलोचनात्मक पड़ताल कर उन्हें बेहतर लिखने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। लिखावट फाउंडेशन ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों के जरिए यह महत्वपूर्ण प्रयास कर रहा है। लिखावट फाउंडेशन का एक महत्वपूर्ण प्रयास 'कैंपस में कविता' है जिसमें वह विश्वविद्यालय और महाविद्यालय में जा कर रचना गोष्ठी आयोजित करने की पहल करता है। हाल ही में लिखावट फाउंडेशन और  आत्माराम सनातन धर्म महाविद्यालय धौलाकुंआ, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में 'कैंपस में कविता' का आयोजन किया गया। इस आयोजन की एक रपट ज्योति त्रिपाठी ने हमें उपलब्ध कराया है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं ज्योति त्रिपाठी की रपट 'कैम्पस में कविता'। रपट   कैम्पस में कविता प्रस्तुति : ज्योति त्रिपाठ...

कैथरिन मेन्सफील्ड की कहानी 'नाशपाती का पेड़'

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कैथरिन मेन्सफील्ड जीवन को जीने का सबका अपना अलग तरीका होता है। इसका कोई एक ढांचा नहीं होता। इसीलिए सब इसे अपने अंदाज में जीने की कोशिश करते हैं। कैथरीन मैन्सफील्ड नैसर्गिक रूप से स्वच्छंद स्वभाव वाली महिला कहानीकार थीं। परंपरागत रूप से स्त्रियों का अनिश्चित भविष्य वाला जीवन उन्हें पसन्द नहीं था। इस विचार ने ही उनमें विद्रोह का बीज-वपन कर दिया। खुद कैथरीन भी अपने जीवन को अपेक्षित मोड़ न दे सकीं जिससे उनका स्वभाव असंतुलित और जीवन अव्यवस्थित रहा। आरंभ में जीवन की कठोरताओं ने उसकी रचनाओं को भी कटुता तथा तीखे व्यंग्य से पूर्ण बनाया। सोलह साल की उम्र में ही अपनी स्कूली दोस्त को लिखे पत्र में उसकी स्वाभाविक स्वतंत्रता की स्पष्ट झलक मिलती है: मैं किस कदर चाहती हूँ कि सभी स्त्रियों का एक निश्चित भविष्य हो- क्या तुम नहीं चाहती? बैठे-बैठे एक अदद पति का इंतजार करने के ख्याल से ही मुझे सख्त नफरत है, लेकिन बहुतेरी लड़कियाँ तो ऐसे ही सोचती हैं। ... तुम्हारी इस ख्वाहिश के बारे में पढ़ कर मैं मुस्कुरा उठी कि तुम अपनी तकदीर खुद बनाना चाहती हो- ओह, कितनी ही बार मैंने खुद भी ऐसा ही महसूस किया है। मेरी ललक...