मनोज कुमार झा की कविताएं
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| मनोज कुमार झा |
सामान्य व्यक्ति का जीवन स्वयं में एक महासमर होता है। वह न तो अतिरिक्त के बारे में सोच पाता है न ही वह अतिरिक्त कुछ जुटा पाता है। कपड़ा हो या चप्पल, तब तक उपयोग में लाये जाते हैं जब तक ये खुद साथ न छोड़ दें। कपड़ा छोटा हो गया, कोई बात नहीं, घर का कोई छोटा सदस्य उसका उपयोग कर लेगा। लेकिन वे इन बातों का मतलब क्या समझ पाएँगे जिनके पास सब कुछ इफरात है। ऐसे लोग अपनी चीजों को अक्सर ही फेंक देते हैं जिसे वे बाँटने का नाम दे देते हैं। मनोज कुमार झा हमारे समय के ऐसे कवि हैं जिनको पढ़ना खुद के जीवन और समय को जीने जैसा होता है। उनकी कविताओं को आप एकबारगी नहीं पढ़ सकते। इन कविताओं को पढ़ते हुए एक सिहरन सी होती है। उनकी ये कविताएं भक्त कवियों के पदों जैसी अर्थगर्भित हैं। मनोज अपनी कविता 'असल बातों से दूरी' में लिखते हैं "तुम क्या जान पाओगे इस देश को/ तुम जानते ही नहीं कि कपड़े/ पहले कहाँ फटते हैं/ और तुम जानने की कोशिश भी नहीं करते।" इस अर्थ में वे कबीर की परम्परा से जुड़ते हैं। कबीर का लाजवाब दोहा है "साईं इतना दीजिये, जा में कुटुम समाए। मैं भी भूखा न रहूं, साधु न भूखा जाए॥" आज जब समूची दुनिया को हड़पने और निगलने की हवस चारों तरफ दृश्यमान है, तब इस दोहे की उपयोगिता स्वयं सिद्ध है। मनोज का नया काव्य संग्रह 'किस्सागो रो रहा है' सेतु प्रकाशन से छपा है। कविता, कहानी और गप्प तक को झुठलाने के जमाने में किस्सागो भला कर भी क्या सकता है। कवि को इस संग्रह के लिए बधाई। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं मनोज कुमार झा की कविताएं ।
कविता
मनोज कुमार झा की कविताएं
उलटे
मैं सूअर की तरह मरा
इस लोकतन्त्र में
कीचड़ में लथपथ
मेरे बच्चों को
कोई मुआवजा नहीं मिला
उलटे उन्हें यह सिद्ध करना पड़ रहा
कि पिता सूअर की तरह नहीं मरे।
क्यों
क्या चाहते हो कि सृष्टि सारे रहस्य खोल दे
यह सृष्टि है या तुम्हारे बगीचे का आम!
क्या वह जिससे तुम्हारे प्रेम की शुरुआत हुई है
उस कोने तक जाने दे तुम्हें जहाँ खुद भी नहीं जाती
वह तेरे लिए प्रेम है या गले का मफलर।
जो तुमसे मदद माँगने आया है
वह क्यों दिखा दे तुम्हें सारे घाव
वह आदमी है, बाजार में पड़ा लौकी नहीं।
तुम्हें क्यों चाहिए इतने ब्योरे, प्यारे आदमी
क्यों है इतनी शक्ति की चाह?
रीति
भात खाने के ढंग पर लोग हँस रहे थे
जबकि मैंने भात खाना उनसे सीखा था
जो बिना भरपेट भूख के कुछ भी नहीं खाते थे
क्या मैं गलत जगह पर था!
कोई भीड़
मैंने क्या इसीलिए जन्म लिया था
माँ ने इतने दुख सहे थे
पिता परदेस रहे थे।
क्या इसलिए
पृथ्वी ने साथ दिया
जल ने प्यास बुझायी
अन्न ने भूख मिटायी थी
कि एक दिन कोई भीड़ मुझे मार दे
बिना किसी कसूर के
बस 'होने' के लिए
सूरज की रोशनी से भरे दिन में
चाँदनी से लहलहाती रात में!
क्या इसीलिए
कि कोई भीड़ मुझे मार दे
बस होने के लिए!
एक दिन अकेला
एक दिन तुम भी अकेले हो जाओगे
जैसे कि सब हो जाते हैं
जिनके साथ तुमने मछलियाँ पकड़ीं
वही फेंकेंगे पत्थर
जब पोखर का पंक पाँव को पकड़ लेगा।
जब बाढ़ आएगी तो जल सरोवर को दुखी करेगा
भूकम्प में दूर हो जाएँगी दीवारें अपनी नींव से।
यह सभ्यता
एक अम्बानी की बीवी
तीन लाख का एक कप
यूज एण्ड थ्रो करती है
यह जायज है
हजारों साल की सभ्यता का यह हासिल है।
एक परीछन जमींदार के खेत में ककड़ी
तोड़ते पकड़ा जाता है
उसके मुँह पर कालिख मल दिया जाता है
यह भी हजारों साल की सभ्यता का हासिल है।
असली बातों से दूरी
तुम क्या जान पाओगे इस देश को
तुम जानते ही नहीं कि कपड़े
पहले कहाँ फटते हैं
और तुम जानने की कोशिश भी नहीं करते
तुम कपड़े पहनते हो
और इन्हें फेंक देते हो
जिसे तुम कभी-कभी बाँटना भी कहते हो
तुम क्या जानोगे इस देश को!
आदमी आदमी है
कन्धे पे गमछा लटकाये, ईख का रस पीते
पत्नी से लड़ते और बच्ची को दुलराते
एक लगभग मँगता के बारे में इतना क्यों जानना चाहते हो !
उसे कागजों के घर में क्यों डालना चाहते हो
एक आदमी को किताब में बदलने का दुख समझना
क्या इतना कठिन है ?
यह इच्छा तुम्हें एक ऐसे आदमी में बदल देगी जो जिस पंछी को
स्पर्श करेगा उसके सारे रोम झड़ जाएँगे।
धीर धरो
निकट के मित्र जब चोट धरें
तो धीर धरो
वे भी इसी समाज के हिस्से हैं।
अपनी बनायी दीवार से जब सर फूटे
धीर धरो
वह भी इसी संसार का हिस्सा है।
सन्तान जब टैक्टिकल हो जाए
धरो धीर
दुनिया के सारे नियम लागू होंगे तेरे भी घर में।
जब अकेले पड़ जाओ इस संसार में
तो धीर धरो
यह संसार ऐसे ही चलेगा।
ईश्वर के संग सेल्फी
ईश्वर सेल्फी नहीं लेते
शायद इसलिए कि
वो लोगों को दुख भी देते हैं
और जिन्हें दुख देते
उनके साथ खड़े होने की उन्हें हिम्मत नहीं
या दुखी आदमी उनसे बड़ा होता है
और जो सुखी होते हैं
उसके चेहरे ईश्वर के साथ की सेल्फी में अँट ही नहीं पाते।
खण्ड
मैं तुझसे मिलता भावना के हर खण्ड के साथ
मगर कुछ रह गये धान के खेत में
कुछ पितामह के जलते शव के साथ मसान में।
मैं तुझसे अपने सारे विचारों के साथ मिलता
लेकिन कुछ बस गये अधपढ़ी किताब में
तो कुछ जुलूस में तनी बँधी हुई मुट्ठी में।
मैं तुझसे पूरा का पूरा मिलता
लेकिन बीसवीं सदी के अन्त को लाँघ कर आया हूँ प्रिये।
भय
बहुत खिल गया तेरा चेहरा
कितना चमक रहा साड़ी का किनारा !
अच्छा साथ मिला तुझको ।
कितने दिन बाद देखा तुझे
लग रहा मावस में जल रहा दीया।
पर, एक बात पूछूँ ?
बरजोरी तो नहीं करते तेरे पति
स्वच्छ रहने के लिए ?


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