प्रेम कुमार मणि का आलेख फिरदौसी का ईरान'
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| फिरदौसी |
किसी भी देश को समग्र तौर पर जानने के लिए उसकी संस्कृति को जानना महत्त्वपूर्ण होता है। फारस यानी कि ईरान प्राचीन विश्व संस्कृति का नेतृत्व करने वाले देशों में से एक रहा है। ईरानी धर्मग्रन्थ 'ज़ेंद अवेस्ता' और भारतीय धर्मग्रन्थ 'वेद' में समानता के कुछ दिलचस्प सूत्र दिखाई पड़ते हैं। शाहनामा दुनिया की क्लासिकल कृतियों में एक प्रमुख कृति मानी जाती है। बकौल प्रेम कुमार मणि "फिरदौसी की कृति 'शाहनामा' अरबी संस्कृति के विरुद्ध ईरान के सांस्कृतिक प्रतिरोध का जीवन्त दस्तावेज है। फिरदौसी और 'शाहनामा' को मैं मध्य एशिया के सांस्कृतिक प्रतिरोध का केन्द्रक मानता हूँ।" ईरान आज अमरीका और इजरायल के हमलों का प्रतिरोध कर रहा है। अपनी स्वतंत्रता और स्वाभिमान की रक्षा करने का अधिकार सभी देशों को है। इसी स्वाभिमान की रक्षा करते हुए प्रमुख ईरानी धार्मिक नेता और वहां के वास्तविक शासक आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई 28 फरवरी 2026 को शहीद हो चुके हैं। अमरीका आज अपनी मनमानियां करता जा रहा है। वेनेजुएला के बाद ईरान उसके निशाने पर है। किसी भी देश की जनता को अपने शासकों के बारे में निर्णय करने का अधिकार होता है। सवाल यह कि अमरीका को चौधराहट दिखाने का अधिकार किसने दिया है? आज अमरीका को रोकने टोकने वाला कोई नहीं है। यह दुनिया के लिए एक अत्यन्त भयावह समय है। संयुक्त राष्ट्र संघ बस तमाशाई बन कर रह गया है। कवि फिरदौसी की भी अपनी मुसीबतें थीं। फिरदौसी का जीवन संघर्षमय रहा। यहाँ तक कि मरने के बाद सुन्नियों ने उसके शव को अपने कब्रगाह में दफन करने की इजाजत तक नहीं दी। लेकिन अलमस्त कवि जैसे पहले से ही अपनी नियति जानता था। उसने लिखा 'मैं कभी नहीं मरूंगा, फारसी शायरी के जो बीज मैंने बोये हैं, वे दुनिया के रहने तक लहलहाते रहेंगे।' प्रेम कुमार मणि ने फ़िरदौसी के हवाले से ईरानी प्रतिरोध की पड़ताल करने की कोशिश की है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं प्रेम कुमार मणि का आलेख फिरदौसी का ईरान'।
'फिरदौसी का ईरान'
प्रेम कुमार मणि
ईरान के राजनीतिक मुखिया अली ख़ामेनेई की मौत की खबर ने मुझे अचानक से ईरान के राजनीतिक और सांस्कृतिक इतिहास पर सोचने के लिए विवश कर दिया। हमारे भारत की तरह ईरान अथवा फारस का भी पुख्ता और पुराना इतिहास है। उसने भी बहुत मुश्किलें झेली हैं. एक समय यह फारस था। बीसवीं सदी में वह तेहरान से ईरान बना। 1979 में वहाँ इस्लामिक क्रांति हुई और राजनीतिक तौर पर एक आधुनिक सोच के मुल्क की जगह वह मुस्लिम कट्टरतावाद का अखाड़ा बनता चला गया। अयातुल्ला खुमैनी ने रज़ा शाह पहलवी के शासन को उखाड़ फेंका था। मैं इसके विस्तार में नहीं जाना चाहूँगा। हाँ, लोगों को यह पता होना चाहिए कि रज़ा शाह पहलवी का शासन भी पश्चिमी, विशेषकर अमेरिकी प्रभाव से ग्रस्त था।
ईरान भौगोलिक रूप से भारत का निकटवर्ती है। मौर्य काल में हमारी सीमाएं उससे छूती थीं. कुछ समय तक उसका एक प्रान्त भारतीय शासन तंत्र में रहा। यही वह मुल्क है जहाँ से कई हजार साल पूर्व आर्य कबीले धीरे-धीरे सरकते हुए हमारे मुल्क में आये और यहीं बस गये। मध्यकाल में पारसी भी वहीं से आये। ईरानी धर्मग्रन्थ 'ज़ेंद अवेस्ता' और भारतीय धर्मग्रन्थ 'वेद' में समानता के कुछ दिलचस्प सूत्र हैं।
हमारे मुल्क की तरह ईरानियों ने भी एक समय अरबी साम्राज्यवाद और इस्लामिक सांस्कृतिक साम्राज्यवाद का मुकाबला किया है। ईरानी संस्कृति अत्यंत समृद्ध और संस्कृत थी। अर्द्धसभ्य अरबी लोगों के हमले से यह आहत तो हुई, किन्तु इसने भरसक संघर्ष किया। वहाँ इस्लाम तलवार की ताकत से जरूर प्रभावी हो गया, लेकिन ईरानियों ने अपनी सांस्कृतिक पहचान बनाये रखी। पारसी लोग तो इधर-उधर चले गए लेकिन जो बचे उन्होंने अरबियों को जाहिल से अधिक कुछ नहीं समझा। राजनीतिक गुलामी जरूर झेली किंतु सांस्कृतिक अभिमान बचाये रखा।
ईरान के सांस्कृतिक संघर्ष का साक्षी फिरदौसी का काव्यग्रंथ 'शाहनामा' रहा है। इस पर कोई दो वर्ष पूर्व मैंने एक छोटा-सा लेख लिखा था, जब पटना जिले के एक गाँव भरतपुरा के गोपाल नारायण पुस्तकालय में सुरक्षित इसकी एक प्राचीन प्रति को देख कर लौटा था। यह हर तरह से अमूल्य है और यही कारण है कि इसे धरोहर के रूप में सुरक्षित किया गया है। एक बार अंतर्राष्ट्रीय स्तर के चोरों ने इसे गायब कर दिया था। इंदिरा गाँधी ने इसे खोजने में व्यक्तिगत दिलचस्पी ली और इंटरपोल की सहायता से चोरों के कब्जे से इसे मुक्त कराया गया। आज इस शाहनामा और उसके रचनाकार फिरदौसी पर कुछ बात कर हम ईरान की धड़कन महसूस करना चाहेंगे।
एक शायर के तौर पर फिरदौसी मुझे मध्यकालीन मध्य एशिया का सांस्कृतिक हीरो लगता है। अपनी जानकारी के अनुसार भारत में 'शाहनामा' को मुगल काल में प्रकाशित किया गया। उस जमाने में गिनी-चुनी प्रतियां तैयार की जाती थीं। जैसे 'बाबरनामा' की कुल पांच प्रतियां अकबर के ज़माने में तैयार की गईं। 'शाहनामा' के प्रतियों की संख्या का पता मुझे नहीं है लेकिन यह भी गिनी-चुनी होगी क्योंकि एक प्रति तैयार करने में उस ज़माने में भी लाखों रूपए लगते थे।
'शाहनामा' का सारांश हिंदी लेखिका नासिरा शर्मा ने हिंदी में 'फिरदौसी शाहनामा' शीर्षक एक जिल्द में ला दिया है। अंग्रेजी में भी यह पुस्तक लुम्स्डेन के प्रयासों से कोई सौ साल पूर्व अनूदित-प्रकाशित है। पर्सियन स्क्रिप्ट में लिखे गए उस महाकाव्य के मूल रूप को मैं देख सका। इसका थोड़ा गुमान तो मुझे है। एक वीरान और उदास गाँव की लाइब्रेरी में उस पुस्तक को देखना अजूबा अनुभव था। इसे देखते हुए ईरान और मध्य एशिया का प्राचीन इतिहास एक दफा मेरे स्मृति-पटल पर नाच गया। फिरदौसी कुछ उसी तरह की हस्ती हैं, जैसे हमारे यहां महाभारतकार व्यास या 'राजतरंगिणी' के रचनाकार कल्हण या कि 'इलियड' वाले होमर। 'शाहनामा' ईरान के प्राचीन राजाओं की दिलचस्प कहानी है, जो ईरान पर अरब आधिपत्य के पूर्व के थे। प्रथम ईरानी राजा क्युमर्स से ले कर अंतिम सासानी राजा तक की कथा इसमें दर्ज है। सब जानते हैं कि ईरान पर अरबों ने सातवीं सदी के उत्तरार्द्ध में प्रभाव बना लिया था। ईरान की राजनीति तो पराजित हुई ही, उसकी सांस्कृतिक अस्मिता भी तहस-नहस कर दी गई। जैसा कि बताया जा चुका है ईरानी सभ्यता अरबी सभ्यता से कहीं विकसित थी। ईरान की जुबान पर्सियन थी और यह अरबी के मुकाबले काफी कोमल और जानदार थी। ईरान में अरबों का काफी विरोध हुआ, किन्तु इतिहास में होता आया है कि बर्बर शक्तियां सभ्य लोगों पर भारी पड़ जाती हैं। लड़ाई में जंगली-बहशी लोग प्रायः जीतते रहे हैं। ईरानियों का भी यही हाल हुआ। बहुत से लोग भाग गए। किन्तु आखिर कितने लोग भाग पाते हैं। जो रह गए उस में ज्यादातर ने अरबों और इस्लाम की गुलामी क़बूल ली। लेकिन ऐसे लोग भी थे जिन्होंने अपनी ईरानियत को जीवित रखने की हरसंभव कोशिश की। फिरदौसी ऐसे ही हीरो थे। उनकी कृति 'शाहनामा' अरबी संस्कृति के विरुद्ध ईरान के सांस्कृतिक प्रतिरोध का दस्तावेज भी है। इसलिए फिरदौसी और 'शाहनामा' को मैं मध्य एशिया के सांस्कृतिक प्रतिरोध का केन्द्रक मानता हूँ। हमारे देश में तो इस दौर की एक पिद्दी-सी लिजलिजी किताब 'पृथ्वीराज रासो' है, जो एक अय्याश राजा की विरुदावली है।
फिरदौसी का समय 940 ईस्वी से 1020 ईस्वी का है। उनका पूरा नाम अल कासिम हसन बिन अली तुसी था। उनके लेखन से पता चलता है कि वह एक किसान परिवार से आते थे। 'शाहनामा' में वह कहते हैं अब एक दहक़ां (किसान) से कहानी सुनो। वह बहुत साफ दिल हैं। जिस 'शाहनामा' को उन्होंने लिखा उसे दक़ीक़ी नाम के एक दूसरे फारसी कवि ने 'गशतासबनामा' शीर्षक से लिखना आरम्भ किया था। कहा जाता है उस कवि को उसके नौकर ने ही मार दिया और उनकी कृति अधूरी रह गई। फिरदौसी ने इस कार्य को अपनी ज़िन्दगी के तीस वर्षों में पूरा किया।
'शाहनामा' में कोई साठ हजार शेर हैं और मुख्यतया यह तीन हिस्सों में है। पहला हिस्सा लोक-साहित्य है, दूसरा पौराणिक कथाओं से भरा है और तीसरा ईरान का राजनीतिक इतिहास है, जिस में राजाओं और शूरवीरों के किस्से हैं। कवि बार-बार याद दिलाता है कि अरबों के आने के पूर्व हम कितने बढे-चढ़े थे। इस्लाम और अरब ने ईरान को वीरान बना दिया था। कवि इसी पीड़ा का महाकाव्यात्मक बयान करता है। ईरान में 'शाहनामा' को आल्हा-उदल की तरह सामूहिक तौर पर गाया जाता है। कोई सांस्कृतिक गुलामी कितनी पीड़ादायक होती है, इसे 'शाहनामा' पढ़ कर जाना जा सकता है।
'शाहनामा' पर संकट फिरदौसी के ज़माने में भी था और आज के ज़माने में भी है। रज़ा शाह पहलवी ने साल 1976 में 'शाहनामा' के अध्ययन के लिए 'बुनियाद-ए-शाहनामा' संस्था बनाई। 1979 की खुमैनी क्रांति ने जैसे ही शाह का तख्ता पलटा, यह संस्था भी ख़त्म हो गई। 'शाहनामा' की प्रतियों को ढूँढ-ढूँढ कर "क्रांतिकारियों" द्वारा जलाया गया।
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| मोहम्मद रज़ा शाह पहलवी |
फिरदौसी का निजी संकट भी जानने लायक है। कहते हैं 'शाहनामा' रचे जाने की ख्याति जब चारों तरफ फैलने लगी तो गजनी के मुहम्मद ने कवि को सन्देश भिजवाया कि वह हर शेर के लिए एक दीनार कवि को प्रदान करेगा। आर्थिक मुश्किलों से जूझते कवि ने दरबार में पुरस्कार के वास्ते किताब पेश की, तब दरबारियों ने मुहम्मद के कान भरे कि यह तो एक काफिर शिया की कृति है और यह सुन्नियों के खिलाफ है। राजा अपने वायदे से मुकर गया और थोड़ा सा धन दे कर कवि की उपेक्षा की। कवि को अपनी तौहीन का एहसास हुआ। उसे ऐसा रंज हुआ कि उसने राजधानी ही छोड़ दी। यही नहीं, उसने सुल्तान के खिलाफ एक शेर भी लिखा। कमाल की बात यह हुई कि पूरा 'शाहनामा' छोड़ जनता ने उसी एक शेर को गाना शुरू कर दिया। सुल्तान को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने साठ हजार दीनार ऊंट पर लाद कर कवि के यहाँ भेजा। कहते हैं, जब दीनार से लदा यह ऊंट कवि के घर पहुंचा तब उसके घर से उसका जनाजा निकल रहा था। कवि की बेटी ने भी धन लेने से इंकार कर दिया।
फिरदौसी की मुसीबतें और भी रहीं। सुन्नियों ने उसे अपने कब्र में दफन करने की इजाजत नहीं दी। लेकिन अलमस्त कवि अपनी नियति जानता था। उसने लिखा है -
न मीरम अज इन, पस की मन जिन्देअम
कि तुख्मे सुखन रा पराकंदे अम।
(मैं कभी नहीं मरूंगा, फारसी शायरी के जो बीज मैंने बोये हैं, वे दुनिया के रहने तक लहलहाते रहेंगे।)
मैंने हमेशा फिरदौसी की नजरों से ईरान को देखा है। उसकी धड़कन सुन-समझ सकता हूँ। मैं वहाँ की जनता के साथ हूँ।
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| प्रेम कुमार मणि |
सम्पर्क
मोबाइल : 9431023942






मणि जी ने बहुत स्पष्टता के साथ ईरान की राजनीतिक सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को प्रस्तुत किया है। इस हेतु बहुत धन्यवाद।
जवाब देंहटाएंनमस्ते! प्आरे कुमार मणि जी ,आपका लेख मैंने पढ़ा । आपने बहुत अच्छी तरह से अपनी यादों से गूँथा। पाठकों के लिए यह लेख बहुत मालूमाती रहेगा । आपने मेरे अनुवाद को पढ़ा । मेरी पुस्तक का चित्र भी डाला । बहुत-बहुत धनयवाद!
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