नीलोत्पल की लम्बी कविता 'वह जीवन को जीवन देती आवाज़'


नीलोत्पल


मां से पुत्र का जैसा जुड़ाव होता है वह शायद ही किसी और सम्बन्ध में दिखाई पड़े। अपनी संतान के लिए मां अपना अस्तित्व तक समाप्त कर देती है। वह चाहती है कि संतान के पास दुनिया का कोई दुःख फटक तक नहीं पाए। मां की उपस्थिति भर से घर गुलजार रहता है। लेकिन उसकी अनुपस्थिति मारक होती है। उसके न होने पर महसूस होता है कि आपने अपना सब कुछ खो दिया है। आपने वह आवाज खो दी है जो हर वक्त आपके साथ रहती थी। नीलोत्पल की एक लम्बी कविता है 'वह जीवन को जीवन देती आवाज़'। अपनी इस कविता में वे लिखते हैं 'उसकी अनुपस्थिति में/ हर चीज़ बोलना बंद कर देती/ जैसे पानी ज़मीन में और गहरे उतर गया।' वे लिखते हैं 'माँ पानी में घुली हुई कोई लोक धुन है'। ऐसी लोक धुन जिससे हर किसी का आत्मीय रिश्ता होता है। ऐसी लोक धुन जिसे सब सुनना चाहते हैं। नीलोत्पल हमारे समय के महत्त्वपूर्ण कवि हैं। हमने उनसे आग्रह कर साल भर पहले यह कविता मंगाई थी। अपरिहार्य कारणों से इस कविता का प्रकाशन नहीं हो पाया। नीलोत्पल ने कविता की बावत कभी टोका नहीं। आज के समय में इतना धैर्य गिने चुने कवियों में ही दिखाई पड़ता है। नील चुपचाप अपनी काव्य साधना में आज भी संलग्न हैं। सरल सहज भाषा में कई बेहतरीन कविताएं उन्होंने लिखी हैं। आइए आज पहली बार पर एक अरसे बाद हम पढ़ते हैं नीलोत्पल की लम्बी कविता 'वह जीवन को जीवन देती आवाज़'।


नीलोत्पल की लम्बी कविता


'वह जीवन को जीवन देती आवाज़' 


1.


मेरे लिखते रहने को 

वह हैरानगी से देखती है 

उसे लिखने के बारे में ज़्यादा पता नहीं 

मसलन वह अनुमान करती है 

कि मेरी कोई हरक़त उसे 

किसी पेशे के नज़दीक ले जाए 

इसलिए कभी-कभी वह मुझे 

मुंशी कह देती है 


एक दफ़े उसने किताब को 

उलट पलट कर देखा 

बहुत देर तक उसे कुछ समझ नहीं आया 

फिर कहा, क्या इसमें कोई रास्ता है 

जो मुझे दिखाई नहीं देता 

उस वक़्त मेरे पास 

मुस्कान के अलावा कुछ नहीं होता 


बीच-बीच में वह ख़ामोश हो जाती है 

जब पेड़ की पत्तियाॅं 

कुछ देर के लिए थम जाती हो 

जब परिंदे गाते नहीं 


मैं उसे कोई भ्रम देना नहीं चाहता 

इसलिए कोशिश करता हूँ 

उसकी आँखों को पढ़ने की 


लगता है जैसे मैं कोई सदियों का प्यासा हूॅं 

अपनी मशक भरने के लिए 

पानी खोज रहा हूॅं रेगिस्तान में 

और वह मुझे रास्ता दिखा रही है



2.


माॅं को ना क्रिकेट के बारे में पता है

ना अर्थव्यवस्था के 


वह किसी मिनिस्टर को नहीं जानती

ना ही उसने कलेक्टर-कमीश्नर की तरह किताबें पढ़ी है 


उसने कभी लाल किला नहीं देखा

ना ही उसने किसी इमारत की

ऊंचाई को छूने की बेकार कोशिश की


सिनेमा में ख़ास रुचि नहीं रही

लेकिन लोकगायिका की तरह

जीवन का हर मर्म गाती रही 


चाहे दुख‌ के कितने पहाड़ टूटे

पर जीवन का संवाद बहुत स्पष्टता से कहा


वह ईश्वर को बहुत मानती है

लेकिन मैंने देखा 

उसकी कोई प्रार्थना सुनी नहीं गई

उलटे उसने अपनी सच्चाई साबित करने में

दूसरों के हिस्सों की परीक्षा भी दी

पूरा जीवन खपा दिया 


सरकार के बारे में

इतना ही जानतीं 

कि घर की ज़रूरत से बड़ी नहीं होती 


वह हमेशा बताती

घर के लिए क्या ज़्यादा ज़रूरी है

मसलन आटे के कनस्तर में 

इतनी बार झांकती

कि सत्ताओं का चरित्र बहुत साफ़ नज़र आता


मैं घर से सत्ता का सफ़र इसी तरह तय करता रहा



3.


पानी गिर रहा था

लगा माँ बोल रही है


अमूमन माँ की आवाज़ पानी जैसी ही है 

वह बोलती है तो भीतर हलचल होती है


उसके बोलने में

पानी जैसी ही सरलता है


लगातार बहते बोलते

उसने जीवन का हर दुख 

पिघला दिया है।


बचपन में जब वह थपकियां दे कर सुलाती थी 

पीठ नाव में बदल जाती 

पानी हिलोर भरता

और हमारी सारी नावें नींद में डूब जाती


उसकी अनुपस्थिति में

हर चीज़ बोलना बंद कर देती

जैसे पानी ज़मीन में और गहरे उतर गया


कभी-कभी वह पानी के गीत गाती 

जैसे सभी मांओं में सदियों की एक धुन गुंथी हुई हो

जिसे वह अपने असंख्य मुंहों से सुनाती आ रही हैं


बरसों बर्तन, कपड़े धोते पछींटते

पानी इस तरह रच बस गया है उसमें 

जैसे अभी कोई सोता बह निकलेगा


वह ममता इसी तरह लुटाती है 

मानो कोई बरसाती नदी

समुद्र हो जाना चाहती हो 


माँ पानी में घुली हुई कोई लोक धुन है।




4.


मां कहती है 

वह कटमा हरूफ़ नहीं पढ़ पाती.


लेकिन वह मुकम्मल शब्दों के 

जितने अर्थ जानती है 

उससे ज़्यादा कटमा शब्दों को 

अपने संघर्ष के ताप से समझ लेती है


वह अपने दुख के दिन 

उन शब्दों के भीतर तलाशती रहती है 

जहां कथाएं अंतहीन हैं


उसकी जिंदगी में कटे शब्द 

कभी रोटी से बड़े नहीं लगे 

महीन दुखों ने उसे इतना तार दिया है 

कि वह मोड़ से पहले घर का रास्ता 

पहचान लेती है


जब भी उसे कोई धार्मिक किताब पढ़ते देखता हूॅं 

वह अपने सघन ताप से 

हर पंक्ति पिघला देती है 

उसका अशेष जीवट 

जीवन का नया अध्याय लिखता है



5.


माँ और मेरी आँखों में 

एक समानता है 

(दोनों में आँसू भरे हैं)


मेरी भी आँखें धंसी हुई हैं 

माँ की तरह


जब किसी छोटे डबरे में 

पानी हिलता है तो 

बादल और पेड़ 

उस डबरे से बाहर हो जाते हैं


डबरे का बिंब 

सूरज को ज़मीन की सतह से छूता है


जैसे माँ अपनी ठंडी चिन से 

मेरे गालों सहलाती थीं 


मेरे मन की दूरी समेट कर 

अपने अंकवार में भर लेती है


माँ की आँखें जीवन का परिमाप है


पिछले दिनों माँ की आँखों से 

आँसू बहने लगे थे 

डॉक्टर कोई बीमारी बताते 

लेकिन मैं जानता हूँ 

वे सारे आँसू मेरे भीतर जमा होते जाते हैं


मैं नहीं जानता 

लेकिन माँ की आँखों से गिरता हर क़तरा 

मेरी ज़िन्दगी को उसकी करुणा से भिगोये रखता है 




6.


(एक)


समय विस्मित करता है


कल जिन हाथों में पला-बढ़ा, 

आज उन्हीं को असहाय होते देख रहा हूॅं 

ममता भरी रोटी खिलाने वाला मन बिखरा पड़ा है 


जी चाहता है

एक कोने में अपने भीतर की सारी चिट्ठियां लिख कर रख दूं 

और हर कविता से पहले,

हर इबादत से पहले 

अपने मन की यह पुकार सुनाऊं 


कैसे मैंने धर्म की गति से पहले 

माॅं की भरोसेमंद उंगलियां थामी 

और जाना‌ करुणा सबसे बड़ा मर्म है 


वह हर क़दम पर ईश्वर को गातीं 

और मैं हर फिक्र से परे

उसके आंचल की छाया में 

जीवन का सबसे सुकून समय जीता


यह जानते हुए कि जीवन पर उसका अटूट विश्वास 

संघर्ष की बुनियाद पर टिका है 

दरअसल मेरी कविता का 

सबसे मजबूत धागा है 


(दो)


क्योंकि वह अक्षर नहीं जानतीं 

क्योंकि उसने कक्षा तीन के आगे 

भरी बारिश से खेतों में पटे कीचड़ में

अपने पैरों को डगमगाने नहीं दिया


वह लगातार खेत से चल कर धरती के फेर लगाती रही 


थक कर कभी जामुन, कभी अमिया के नीचे ठहरी 

लेकिन पृथ्वी की सबसे कठोर जगह पर बसे 

अपने कच्चे घर का पता नहीं भूलती


घर और खेत के बीच 

उसने ककहरा सीखा

याद इतनी कि रटा हुआ भूला जा सकता है 

लेकिन ताप और ठोकर खाया नहीं


(तीन)


वह जीवन में अंतहीन कहानी की तरह शामिल रही


उसकी कहानी के कुछ महत्वपूर्ण किरदार 

दुख,

संघर्ष,

चक्की,

और पति का विछोह 



(चार)


उसके चार बच्चे हैं 

एक बेटी चल बसी 


बचे तीन में 

तीनों बच्चों की समझ 

एक-दूसरे से अलग है 


वह‌ हमेशा चिंतित रहती है 

नहीं चाहती कोई भी जुदा हो


वह जानती है

तीन दिशाओं से लौटना संभव नहीं होता 


इसलिए हर उधड़ी बात 

और रिश्तों के लिए 


अटूट विश्वास से 

सुई और धागा लिए 

तैयार रहती है 





7.


माँएं हमेशा से किसी ओट 

या अधूरी तस्वीर से छिप कर आतीं...


घर की सभी चीजें, बर्तन 

और उनींदी दीवारें जानती हैं कि 

किस तरह एक स्त्री छिपाना नहीं चाहती कुछ भी 

जबकि करीनेदार कुछ भी नहीं उसके बगैर


एक बिखरा संसार 

सुतली के टूटे टुकड़े में गुंथा 

झाडू की सींकें और चींटियों की कतारें 

बदलती हैं एक दृश्य


यह अपदार्थ एक तस्वीर 

या रेशम का महीन धागा नहीं 

एक घुले हुए रंग में दूसरे रंग की अनुपस्थिति है 

बिखरे या उसने आटे में नमक की गौणता


माँओं की गूढ़ता प्रेम में नहीं 

बिखर जाने या अदृश्य हो जाने में है


यह असंतुलन है जिस पर पृथ्वी घूमती है 

उस खरज पीठ पर कोई निशान नहीं


व्यथाओं में सर्वथा आल्हादित 

वह मुस्कुराती है तुम्हारा दायाँ हाथ ले कर 

दरवाज़े के अंतिम छिद्र से दुनिया में 

प्रवेश करती 

अनाम अज्ञात जड़ों की तरह 

जिन्हें सिर्फ़ महसूस किया जाना है


रंगीन बल्बों की रोशनी 

धरती के अंतिम कोनों तक नहीं पहुँचती 

वे बुझे हुए आलाप घर 

तुम्हारी करुणा के द्वीप हैं


आह! पृथ्वी का नन्हा फूल 

झरता है तुम्हारी असीम गोद में



8.


बरसों जिस आवाज़ को सुन कर जागा 

वह आवाज़ तोतों की, चिड़ियों की 

किसी फिल्मी भजन या गीतों की नहीं थी 

किसी गाड़ी के गुजर जाने की भी नहीं 

या बादल गरजे हों 

या बारिश की बूँदें थिरकी हों धरती पर 

वह आवाज़ दुनिया के तमाम नहीं के बीच 

बंद कमरे में घर्राती चुपचाप 

जब मैं इस चुप के बीच होता 

तब पहाड़ी गर्राहट मेरे कानों को आ बेधती 

लेकिन जब गेहूँ, मक्का, बाजरा, दाल या ज्वार पिसी जाती 

मुझे अहसास होता कि 

मैं अपनी भेड़ें चराता 

सुन रहा हूँ पहाड़ी संगीत 

जबकि गाने के लिए 

पर्याप्त शब्द नहीं हैं मेरे पास


दुनिया में जीविका चलाने के लिए 

कितने ही पर्याय मिल सकते है 

लेकिन मैं जैसे चिपका रहा हूँ इसकी छाती से


इसकी घर्र-घर्र करती मशीनी आवाज़ ने 

टूटने नहीं दिया भीतरी इंसान को


मैंने इसे माँ से पाया 

लेकिन माँ के हाथों में 

यह पिता की बीमारी के चलते सौंप दी गई 

माँ नहीं थी पढ़ी-लिखी 

तब भी उसने सीखा दुनिया में रहने के लिए 

हाथ पसारने की नहीं 

ज़रूरत है उन जड़ों की तरह फैलने की 

जो अपनी क्षीणता में भी 

बढ़ जाती हैं ज़मीन के अंदर


वह जुटी रही 

उसने कभी नहीं सीखा अख़बार पढ़ना 

उसकी दुनिया चक्की के इर्द-गिर्द रही


वह मजबूरी में चलाती रही 

ऐसा कहना गलत होगा 

कभी नहीं लगा वह छोड़ देगी चलाना 

उसकी मजबूरी भी भारी थी उन पर 

जो अपनी चाहत के बावजूद 

ऊब जाते हैं अपने कामों से


मैं कभी नहीं जान पाया 

माँ और चक्की किस तरह 

अलग हैं एक-दूसरे से


एक औरत का संघर्ष 

किसी तरह दुख के ढलान से लौट जाता है


फिर चाहे वह पतरे में आटा गूंथने के वक्त आए 

या हाथों की चमड़ियों को घिसते उतर आए फर्श पर

या वह छिपा हो दीवारों की दरारों में 

या हो ईश्वर की तस्वीरों के पीछे 

जिसे पूजती रही माँ ताउम्र


वह लौट जाता है 

जैसे लौट जाती हैं लहरें अनंत में


जैसे बरसों चक्की चलाने के बाद 

दुख की ज़मीन पर उगने लगते हैं फूल


जब तक पिता इसे चलाते रहे 

मैं अंतर नहीं कर पाया 

ज़िन्दगी और चक्की में


जब माँ ने संभाला 

ज़िन्दगी टाँकती रही उन पत्थरों को 

जो बड़े सख्त और सपाट थे 

जाना चक्की किस तरह पिसती है 

दरदरा और बारीक आटा


कॉलेज की डिग्री हासिल कर 

मैंने दुनिया में प्रवेश किया

अपनी तमाम नाकामियों के बाद भी 

छुटी नहीं वह देसी-खाँटी आवाज़ 

जो कहीं और से नहीं 

सीधे भीतर से आ रही थी


मैं लगातार हार रहा था सपने और इच्छाएँ 

लेकिन जीवन बिखरा हुआ था ज्यादा 

अंततः अनिच्छा से भरा, सुनता रहा


जब संघर्ष टूटा 

थक कर चाहा कि बह लूँ 

उस आवाज़ के साथ जो कम से कम 

डूबते वक़्त समुंदर में साथ तो होगी


जैसे झरे पत्ते नष्ट होने से पहले 

अपनी चरमराती आवाज़ में 

कहते हैं अलविदा धरती से 

उन्हें प्यार था


मेरे हिस्से में चक्की 

उन पत्तों की तरह रही 

जो अंत तक 

नहीं कहना चाहते थे अलविदा!


मैं वहीं बैठा हूँ 

जहाँ कुछ दिनों पहले तक

चलती रही चक्की


कई सालों तक यहीं खड़े हो कर 

डाले हैं सुपड़ी में 

अनाज से भरे डब्बे और पोटली


आह! यह ख़ाली जगह 

और मेरे शरीर की ढीली पड़ती चमड़ी


इसके चलते रहने से 

घर की ईटें नाचने लगती थीं 

जैसे गा रही हों सदियों से कोई गीत 

जैसे नदी की सतह पर तैरता हुआ पत्थर


इसकी गहरी कंपनदार आवाज़ ने 

जब भी छुआ मुझे 

अहसास नहीं हुआ किसी अप्रत्याशित घटना का 

लगा सब कुछ गहरे विश्वास के साथ 

आया हुआ-सा


इसके होते जाना 

जिनके खेत अलग कर दिये गए 

जिन्हें छोटा और नीच कहा गया

उन लोगों के दानों और जीवन में 

कोई अंतर नहीं था


रोज एक-आध किलो आटा ले कर 

पेट भरने वाले मजदूर 

दिन भर काम की थकान के बावजूद सभ्य थे


मैं उनसे पूछता-कल 

कहाँ काम लगेगा?

कहते-कौन जाने!


जैसे सदियां बाकी हो 

आज और कल के बीच

उन्हें भरना नहीं है कुआँ 

जो कल किसी तरह फिर खोदा जाएगा 

उन आधी उग आई जड़ों के साथ


जीवन का फैलना उन जड़ों की तरह था 

जिन्हें चूहों ने नहीं कुतरा 

बल्कि हम ही यह सोचते आए कि 

अवसरों और साधन की कमी ने कमजोर किया है


जबकि पत्थर हटाने के बाद देखा तो 

ज़मीन उतनी ही नम और गीली थी।


(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)



सम्पर्क 


मोबाइल : 09826732121

टिप्पणियाँ

  1. सुन्दर कविताएँ। नीलोत्पल जी हमारे समय के महत्त्वपूर्ण कवि हैं।

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  2. बहुत अच्छी और चिरकाल तक यादों में रहने योग्य कविता.

    जवाब देंहटाएं

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